Tuesday, December 6, 2016

‘भारत की ज्ञान परंपरा’ विषय पर दो दिवसीय राष्ट्रीय संविमर्श का समापन

पटना। भारतीय परंपरा के अनुसार हमारे चिंतन में कई धाराएँ हैं, लेकिन पश्चिम ने केवल एक ही धारा को समझा और फैलाया। विदेशी ताकतों ने हमेशा से ही हमारी ज्ञान परंपरा को दबाकर रखने की कोशिश की है। हमारे विज्ञान और सेवा भाव को हमेशा नीचा दिखाने की कोशिश की गयी है, जिसके कारण हमने अपनी समृद्ध ज्ञान परंपरा को बहुत हद तक खो दिया है। आज फिर से हमें अपनी ज्ञान परंपरा और सामाजिक व्यवस्था को समझने और अपने तरीके से परिभाषित करने की ज़रूरत है। यह विचार पूर्व केंद्रीय मंत्री संजय पासवान ने ‘भारतीय की ज्ञान परंपरा’ विषय पर आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय संविमर्श में व्यक्त किये। यह कार्यक्रम माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल द्वारा पटना में आयोजित किया गया। विश्वविद्यालय ने अपने रजत जयंती वर्ष के उपलक्ष्य में देश के अलग-अलग राज्यों और शहरों में विमर्शों का आयोजन कर रहा है।
श्री पासवान ने कहा की आज हमें अपनी ज्ञान परंपरा, सामाजिक व्यवस्था और जीवनशैली को बाजारवाद से बचने की ज़रूरत है। हमें पश्चिमी सभ्यताओं और विदेशी ज्ञान-विज्ञान को दरकिनार कर अपनी परम्पराओं और मान्यताओं का पुनरोत्थान करते हुए भारतीयता में पूरी तरह रमना होगा। उन्होंने इसके लिए इस बात पर जोर दिया की हमें आज सभी विचारधाराओं के लोगों से संवाद करना होगा और उनको साथ लेकर चलना होगा। जाति व्यवस्था पर अपने विचार रखते हुए उन्होंने कहा की जातियों के मिटाने की नहीं बल्कि आज उन्हें मिलाने की आवश्यकता है। हमारी परंपरा विविधताओं का सम्मान करने की है और उनमे एकता स्थापित करने की है, जिसे आज अच्छी तरह से व्यवहार में उतारना होगा ताकि भारत पूरे विश्व में एक बड़ी ताकत के रूप में उभर सके।
कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. बृज किशोर कुठियाला ने कहा की भारतीय ज्ञान को स्थापित करने की नहीं बल्कि इस ज्ञान के व्यापक भंडार को खोजने की ज़रूरत है। प्राचीन ग्रंथों में छुपे इस ज्ञान के खजाने को खोजकर, उसे संवार कर मानव कल्याण के लिए उसको इस्तेमाल में लाने की आवश्यकता पर जोर देते हुए उन्होंने कहा की आज भारत के शैक्षणिक संस्थाओं को इस कार्य के लिए आगे आना होगा और समर्पित भाव से ऐसी परियोजनाओं में जुटना होगा ताकि कोई बाहरी संस्था या इंसान इस भण्डार की खोजकर उसको एक विकृत रूप में दुनिया के सामने पेश न करे। उन्होंने कहा कि यहाँ का ज्ञान-विज्ञान युगों से प्रकृति के अनुकूल रहा है और इसी कारण भारत की जीवनशैली भी औरों से हमेशा श्रेष्ठ रही है। प्रो. कुठियाला ने कहा की आज इस कार्य को करने में हम पूरी तरह सक्षम हैं आवश्यकता है तो सिर्फ संकल्प की। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि जो लोग प्राचीन भारतीय ज्ञान की खोज में लगे हैं उन्हें यह सुनिश्चित करना होगा कि वह अपने कार्यों को केवल सेमिनार, कांफ्रेंस और पठन-पाठन तक सीमित न रखकर समाज और पूरी मानवता तक लेकर जायें ताकि इससे परम वैभव की स्थिति को प्राप्त किया जा सके। उन्होंने कहा कि पत्रकारिता विश्वविद्यालय इस कार्य को विद्यार्थियों तक ले जाने की भरपूर कोशिश कर रहा है।
वरिष्ठ पत्रकार और पांचजन्य के संपादक श्री हितेश शंकर ने अपने उद्बोधन में कहा की आज पं. दीनदयाल के विचारों को व्यवहार में लाने की आवश्यकता है जिसमें वह समाज और सृष्टि को समझने की बात करते हैं। उन्होंने कहा कि भारतीय शिक्षा व्यवस्था में शिक्षा के उद्द्येश्य, विषयों का चयन, पाठ्यक्रमों में प्रवेश और पात्रता, वातावरण तथा मूल्यांकन जैसे महत्वपूर्ण पहलुओं को शामिल किया जाना चाहिए ताकि शिक्षा से समाज का पूर्ण विकास हो सके।
सामाजिक कार्यकर्ता स्वांत रंजन ने शिक्षा और ज्ञान को समाज के निचले स्तर तक ले जाने की बात पर जोर दिया और कहा कि ऐसा करने से समाज के हर वर्ग में जागरूकता आयेगी। साथ ही उन्होंने भारत की प्राचीन व्यवस्थाओं और मान्यताओं को समझकर आज के सन्दर्भ में उन्हें इस्तेमाल में लाने की बात कही। श्री रंजन ने पत्रकारिता विश्वविद्यालय द्वारा किये जा रहे इस अनूठे कार्य की सराहना करते हुए कहा कि भारत की प्राचीन ज्ञान पद्दति को फिर से समझना और इसके लिए विभिन्न जगहों पर जाकर युवाओं और लोगों को प्रेरित करने अपने आप में बेहद प्रशंशनीय कार्य है।
  इससे पूर्व संविमर्श में वैदिक गणित पर रोहतक के राकेश भाटिया, भारत में विज्ञान की परंपरा पर महाराष्ट्र के प्रो. पीपी होले, डॉ. श्रीराम ज्योतिषी, डॉ. सीएस वार्नेकर, भारत की मेगालिथ रचनाओं की वैज्ञानिकता विषय पर फ़्रांस से आये डॉ. सर्जे ली गुरियक ने व्याख्यान दिए। कार्यक्रम का संयोजन डॉ. सौरभ मालवीय और लोकेन्द्र सिंह ने किया। इस कार्यक्रम में माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के जनसंचार विभाग के अध्यक्ष संजय द्विवेदी, इलेक्ट्रोनिक मीडिया विभाग के अध्यक्ष डॉ. श्रीकांत सिंह, जनसंपर्क एवं विज्ञापन विभाग के अध्यक्ष डॉ. पवित्र श्रीवास्तव, नॉएडा परिसर से डॉ. अरुण भगत भी शामिल हुए।

Monday, December 5, 2016

‘भारत की ज्ञान परंपरा’ विषय पर दो दिवसीय राष्ट्रीय संविमर्श

पटना। भारत हमेशा से ही ज्ञान आराधक राष्ट्र रहा है। भारत की ज्ञान परंपरा औरों से विशेष इसलिए है क्योंकि यह केवल हमारे बाहर मौजूद लौकिक (मटेरियल) ज्ञान को ही महत्वपूर्ण नहीं मानती बल्कि आत्म-चिंतन द्वारा प्राप्त भीतर के ज्ञान को भी समान महत्व देती है। हमारे ऋषि-मुनियों ने हजारों वर्ष पूर्व इन दोनों ही प्रकार के ज्ञान को कड़ी साधना से अर्जित कर ग्रंथो के रूप में मानव समाज के लिए प्रस्तुत किया। आज चाहे योग की बात हो, विज्ञान की या फिर गणित की, पूरी दुनिया ने भारतीय ज्ञान से कुछ न कुछ लिया है। इस प्रकार हम एक श्रेष्ठ ज्ञान परंपरा के उत्तराधिकारी हैं। यह विचार ‘भारत की ज्ञान परंपरा’ विषय पर आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय संविमर्श में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह सरकार्यवाहक दत्तात्रेय होसबोले व्यक्त किए। अपने रजत जयंती वर्ष के उपलक्ष्य में इस संविमर्श का आयोजन माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल द्वारा पटना में किया है।
श्री होसबोले ने कहा की ज्ञान केवल पुस्तकें पढ़कर सूचनाओं को एकत्र करना नहीं है। बल्कि इन सूचनाओं का मानव हित में उपयोग कर पाने की क्षमता ज्ञान है। उन्होंने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा के अनुसार पुस्तकों के अलावा, आत्म-चिंतन के द्वारा और विभिन्न प्रश्नों के उत्तर ढूंढ़कर भी ज्ञान हासिल कर सकते हैं। उन्होंने बताया कि हमारे प्राचीन ग्रंथों में इस बात तक का उल्लेख किया गया है कि हजारों वर्ष पूर्व किस प्रकार नदियों के रास्तों का भी वैज्ञानिक पद्धति से निर्माण कर उनको प्रवाहित किया गया। उन्होंने भारत की ज्ञान परंपरा के पुनरोत्थान में पत्रकारिता विश्वविद्यालय द्वारा किये जाने वाले कार्यों की सराहना करते हुए कहा की आज जहाँ कुछ विश्वविद्यालय अपने मूल उद्देश्य से भटक गए हैं, वहीँ यह विश्वविद्यालय सही मायने में ज्ञान साधना कर रहा है। भारतीय ज्ञान परंपरा के क्षेत्र में किये गए अपने महत्वपूर्ण कार्यों को विश्वविद्यालय ने देश के अलग-अलग राज्यों में पहुँचाया है।
संविमर्श की अध्यक्षता कर रहे विश्वविद्यालय के कुलपति, प्रो. बृज किशोर कुठियाला ने कहा कि आज के परिदृश्य तथा भविष्य की ज़रूरतों को ध्यान में रखते हुए हमें अपने ज्ञान की समृद्ध परंपरा को उपयोग में लाने की आवश्यकता है। आज से हजारों साल पहले जिस प्रकार हमारे ऋषि-मुनियों ने प्रकृति को समझा था और उसके साथ जैसा सम्बन्ध स्थापित किया था, उसे आज लागू करने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा की उस ज्ञान को प्राप्त करने का सबसे प्रभावशाली माध्यम संस्कृत भाषा है, जिसकी आज उपेक्षा हो रही है। उनका मानना है कि आज जिस स्तर पर संस्कृत स्कूल तथा महाविद्यालयों में पढाई जा रही है, वह नाकाफी है। उन्होंने कहा कि आज विश्व को भारत की प्राचीन और समृद्ध ज्ञान की आवश्यकता है, लेकिन हमारे इस ज्ञान के भण्डार को आज पश्चिम के कुछ कथित विद्वान अपनी समझ के अनुसार उसकी व्याख्या करने की चेष्टा कर रहे हैं जबकि आवश्यकता है कि हम उस ज्ञान को भारतीय परंपरा के अनुसार व्याख्या कर दुनिया तक ले जायें ताकि उसमे कोई त्रुटी न हो और उसके औचित्य को सही मायनों में दुनिया को समझा सकें। वहीँ, उद्घाटन समारोह के विशिष्ट अतिथि वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. शत्रुघ्न प्रसाद ने कहा कि पश्चिमी देशों ने हमेशा से ही अपने ज्ञान परंपरा को हमारे ऊपर थोपने का प्रयास किया है जबकि हमारे देश के विद्वानों ने समय-समय पर इसका विरोध किया। आज आवश्यकता है कि वर्षों से उपेक्षित अपने ज्ञान को आगे लायें।
संविमर्श में सोमवार को ‘भारत में संवाद की परंपरा’ विषय पर काठमांडू विश्वविद्यालय, नेपाल से आये डॉ. निर्मल मणि अधिकारी ने व्याख्यान दिया। उन्होंने भरत मुनि और महर्षि नारद को उल्लेखित करते हुए बताया कि भारत में सदैव लोकहित में संवाद की परंपरा रही है। दूसरे सत्र में ‘भारत में अर्थशास्त्र और समाजशास्त्र की परंपरा’ विषय पर प्रख्यात साहित्यकार एवं शिक्षाविद प्रो. रामेश्वर पंकज मिश्र ने व्याख्यान दिया। जबकि ‘भारत में अध्यात्म का आधार’ विषय पर बीकानेर से आये स्वामी सुबोधगिरि और ‘आयुर्वेद और जीव विज्ञान की परंपरा’ पर भोपाल से आये वैद्य चन्द्रशेखर ने अपने व्याख्यान दिए।
      आज इन विषयों पर विमर्श : संविमर्श में मंगलवार को वैदिक गणित पर रोहतक के राकेश भाटिया, भारत में विज्ञान की परंपरा पर महाराष्ट्र के प्रो. पीपी होले, डॉ. श्रीराम ज्योतिषी, डॉ. सीएस वार्नेकर, भारत की मेगालिथ रचनाओं की वैज्ञानिकता विषय पर फ़्रांस से आये डॉ. सर्जे ली गुरियक सहित पूर्व केन्द्रीय मंत्री डॉ. संजय पासवान के व्याख्यान होंगे।

Sunday, November 20, 2016

प्रवक्ता डॉट कॉम की आठवीं वर्षगांठ मनाई


प्रवक्ता डॉट कॉम के आठ वर्ष पूरे होने पर नई दिल्ली स्थित कॉस्टिट्यूशन क्लब के स्पीकर हॉल में ‘मीडिया और राष्ट्रीय सुरक्षा’ विषय पर 19 नवम्बर 2016 को एक संगोष्ठी का आयोजन किया गया। इस अवसर पर आईआईएमसी के महानिदेशक श्री केजी सुरेश, एनयूजे के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री रासबिहारी, वरिष्ठ पत्रकार और समीक्षक श्री अनंत विजय, बॉलीवुड की सुप्रसिद्ध पटकथा लेखिका सुश्री अद्वैता काला,  छत्तीसगढ़ से सांसद चंदूलाल साहू, नवभारत टाइम्स के पूर्व संपादक डॉ. नंदकिशोर त्रिखा, दूरदर्शन के अतिरिक्त महानिदेशक श्री रंजन मुख़र्जी समेत कई गणमान्य उपस्थित रहे।

इस संगोष्ठी की अध्यक्षता आईआईएमसी के महानिदेशक श्री केजी सुरेश ने की, वहीं संचालन माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय के प्राध्यापक डॉ. सौरभ मालवीय ने किया, स्वागत संबोधन प्रवक्ता के संस्थापक व प्रबंध संपादक भारत भूषण ने किया, विषय प्रवेश संजीव सिन्हा ने किया और अतिथियों का स्वागत सुशांत कुमार, विनोद बिधुरी, विकास आनंद तथा  अलका सिंह ने किया।

संगोष्ठी को संबोधित करते हुए वरिष्ठ पत्रकार और समीक्षक अनंत विजय ने कहा कि हमें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है लेकिन राष्ट्रीय सुरक्षा से समझौता नहीं किया जाना चाहिए। उन्होंने मिडिया के स्वतंत्रता को जरुरी बताते हुए सरकार द्वारा नए कठोर प्रेस कोड बनाने पर बल दिया और कहा कि जो मिडिया हाउस उस कानून का अतिक्रमण करे उसके लिए कड़े दंड का भी प्रावधान हो। वास्तव में आज मीडिया के संचालन को लेकर कोई मान्यकानून नहीं है ।

वहीं, सुप्रसिद्ध पटकथा लेखिका सुश्री अद्वैता काला ने अपने मिडिया के साथ के कई अनुभव साझा किये और कहा कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता जरूरी है लेकिन स्वनियमन की भी आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित रिपोर्टिंग के समय राष्ट्रीय हित और संवेदनशीलता का ध्यान रखा जाना चाहिए।

वहीं, एनयूजे (इंडिया) के राष्ट्रीय अध्यक्ष रासबिहारी ने कहा कि यह कहना कि मीडिया स्वतंत्र है, बिल्कुल झूठ है, स्वतंत्रता तो सिर्फ अखबार और टीवी के मालिकों को है, देश में पत्रकारों की स्थिति बहुत ही चिंताजनक है। उन्होंने कहा की मीडिया के प्रति पूर्वाग्रह ठीक नहीं, मीडिया को आत्मचिंतन करने की जरूरत है। उन्होंने सरकार से जल्द से जल्द पत्रकार सुरक्षा कानून बनाने का आह्वान भी किया।

कार्यक्रम के अध्यक्षीय उद्बोधन में केजी सुरेश ने मंच एवं तमाम पत्रकारों को अपने अनुभव साझा करते हुए मीडिया एवं राष्ट्रीय सुरक्षा को विस्तार से रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि नया मीडिया का जमाना है और अब न्यू मिडिया के आने से जनता एजेंडासेटर है। उन्होंने कहा कि सरकार की तरफ से नहीं, समाज की ओर से नियमन होना चाहिए, क्योंकि मीडिया की स्वतंत्रता बहुत महत्वपूर्ण है। उन्होंने कहा अमेरिका में राष्ट्रीय हित सर्वोपरि है और हमारे देश में इसे शर्मिंदगी का विषय बना दिया गया है। उन्होंने मीडिया में वनसाइडेड वर्जन के प्रचलन पर विचार की जरूरत को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि स्टूडियो आधारित टॉक शो, सर्वे और एनालिसिस ज्यादा होने से टीवी न्यूज चैनल्स अब जमीनी हकीकत से दूर हो रहे हैं और अब फील्ड रिपोर्टिंग भी खत्म हो रही है, इसी का असर था कि अमेरिकी मिडिया भी राष्ट्रपति चुनाव का आकलन गलत किया।

इस अवसर पर प्रवक्ता टीम को शुभकामना देने छत्तीसगढ़, महासमुंद से सांसद चंदूलाल साहू भी उपस्थित थे जो प्रवक्ता डॉट कॉम के 8 वर्ष पूरे करने पर शुभकामनाएं दीं और कहा कि प्रवक्ता हमेशा जन जन का प्रवक्ता बने यही मेरी आशा है ।

वहीं, नवभारत टाइम्स के पूर्व संपादक डॉ. नंदकिशोर त्रिखा ने प्रवक्ता डॉट कॉम  के उज्ज्वल भविष्य की कामना की और कहा कि प्रवक्ता देश, समाज और जन-जन का प्रवक्ता बने, यही उम्मीद है ।
वहीं, आकाशवाणी संवाददाता भोपाल, म.प्र. से सारिक नूर प्रवक्ता डॉट कॉम को शुभ्कम्माना देते हुए कहा कि बौधिक जगत में एक क्रांती का नाम है प्रवक्ता, जहाँ पर मिडिया, साहित्यकार और आम जन सबके लिए पूरा खुराक रहता है।

इस संगोष्ठी में लगभग 225 से अधिक पत्रकारों, लेखकों व सोशल मीडिया एक्टिविस्ट्स की उपस्थिति रही, जिसमें वरिष्ठ पत्रकार उमेश चतुर्वेदी, डा.अरुण भगत, प्रशून लतान, संजय राय, शिव शक्ति नाथ बक्सी, भवेश नंदन, लोकसभा टीवी से श्याम जी समेत कई गणमान्य उपस्थित रहे।

समारोह की झलकियां















कुशलता


मीडिया विशेषज्ञ मित्रवर डॉ. सौरभ मालवीय ने प्रवक्ता सम्मेलन 2016 का जिस कुशलता और जीवंतता के साथ संचालन किया, उससे कार्यक्रम की सुंदरता में चार चांद लग गए। कार्यक्रम से 2 दिन पूर्व मित्र से निवेदन किया और वह भोपाल से दिल्ली पधारकर केवल अतिथि ही नहीं बना रहा, अपितु कार्यक्रम की व्यवस्था में भी उसने हाथ बंटा दिया।
-संजीव सिन्हा 

Monday, November 14, 2016

आत्मिक मुलाकात

चाणक्य धारावाहिक के निर्देशक एवं अभिनेता आदरणीय चंद्रप्रकाश द्विवेदी

लोकमंथन


चर्चा- भारतीय संस्कृति
प्रसिद्ध नृत्यांगना सोनल मानसिंह
तीन दिवसीय लोकमंथन-भोपाल

एक संवाद


पाकिस्तानी मूल के प्रख्यात लेखक डॉ. तारेक फ़तेह

Saturday, November 12, 2016

लोकमंथन


भारतीय ज्ञान परम्परा में शास्त्रार्थ विद्वानों की चिति रही है। आज मध्यप्रदेश विधानसभा परिसर में लोकमंथन के इस आयोजन में यह देखने का सपना पूर्ण हुआ।

उदघाटन सत्र


'राष्ट्र सर्वोपरि' विचारकों एवं कर्मशीलों का राष्ट्रीय विमर्श आज से तीन दिन भोपाल में

Friday, November 11, 2016

लोकमंथन




स्वागत-वन्दन-अभिनन्दन
लोकमंथन 
12,13 एवं 14 नवम्बर 2016  को विधानसभा भवन,भोपाल

लोकमंथन


स्वागत-वन्दन-अभिनन्दन
लोकमंथन
12,13 एवं 14 नवम्बर को विधानसभा भवन,भोपाल

Saturday, November 5, 2016

बधाई



समरस समाज, समर्थ भारत अंक सुमंगलम प्रभा के संपादक राजकुमार जी को श्रेष्ठ अंक निकालने के लिए ह्रदय से बधाई और शुभकामनाएं

Saturday, October 22, 2016

भेंट

सहज, सरल, आत्मिक और कलमकार रत्नेश्वर जी एक चर्चित कथाकार हैं. पटना प्रवास में मिलने की इच्छा व्यक्त की. फिर क्या था इन्होंने मुझे घर आमंत्रित किया और मेरे आने की प्रतीक्षा करने लगे. प्रवेश द्वार पर रस्सी से बंधी एक घण्टी और अंदर पहुंचते ही विशाल पुस्तकालय ज्ञान यज्ञ जैसा घर का वातावरण. तमाम चर्चाओं के साथ कब दो घंटा बीत गया पता ही नहीं चला. एक दिन पहले ही 50 साल पूरे किए थे. मेरे हिस्से का केक, मिठाई थी ही. जम कर खाने का सुख, मुझे लगा कि एक लेखक का समय कीमती होता है, इसलिए नमस्कार नमस्कार के साथ पटना से प्रस्थान.

Friday, October 21, 2016

संवाद

बिहार बीजेपी के संगठन मंत्री आदरणीय नागेंद्र जी का सानिध्य और संवाद का अवसर आज पटना में मिला।

पटना में एक सार्थक संवाद

वरिष्ठ पत्रकार देवेंद्र मिश्र जी, संजीव कुमार, कृष्णकांत ओझा और सेन्ट्रल यूनिवसिर्टी, पत्रकारिता विभाग के अध्यक्ष डॉ अतीस परासर साथ में लोकेन्द्र सिंह।

सानिध्य

 


बिहार बीजेपी के संगठन मंत्री आदरणीय नागेंद्र जी का सानिध्य एवं संवाद का अवसर आज पटना में मिला।

Tuesday, October 18, 2016

स्मार्ट सिटी योजना : आधुनिक राष्ट्र निर्माण का अभिनव पहल

डॉ. सौरभ मालवीय
किसी भी देश, समाज और राष्ट्र के विकास की प्रक्रिया के आधारभूत तत्व सामाजिक-आर्थिक दृष्टिकोण, वैचारिक स्पष्टता और सांस्कृतिक विकास ही उसका आधार स्तम्भ होता है जिससे वहां के लोग आपसी भाईचारे से विकास की नैया आगे बढ़ाते है। समाज का प्रत्येक वह व्यक्ति जो राष्ट्र का नेतृत्व करना चाहता है उसके पास राष्ट्र निर्माण के लिए एक दृष्टि होनी चाहिए साथ ही उसे क्रियात्मक रूप देने के लिए एक कारगर योजना भी होनी चाहिए। भारत का यह दुर्भाग्य रहा है कि कहने को तो देश के पास राष्ट्र-नायको की कभी कोई कमी नही रही, परंतु आजादी के समय से लेकर मई 2014 तक एक से बढ़ कर एक बुद्धि वादियों के हाथ में देश का नेतृत्व रहा लेकिन राष्ट्र निर्माण के लिए उनके द्वारा जो भी पहल की गई वह मौलिक सोच पर आधारित नही थी। देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू जहा देश को समय से पहले इंग्लैंड (विकसित राष्ट्र) बनाना चाहते थे, वही भारत के अंतिम कांग्रेसी प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह की सोच कभी उनकी खुद की नही रही और वो पूरे कार्य काल तक नाम मात्र के कठपुतली प्रधानमंत्री बन कर रह गए। राष्ट्र को विकसित राष्ट्र बनाने का स्वप्न देखना और उसे किसी भी फार्मूले के तहत विकसित राष्ट्र के रूप मे पहल करना गलत नही है, गलती उस दृष्टि की है जिसमे राष्ट्र को देखने की मौलिक सोच और राष्ट्रीय दृष्टि का अभाव है, वर्तमान के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सत्ता-सीन होने से पहले तक कमोवेश देश की यही स्थिति रही है, जिनके हाथ मे राष्ट्र के  निर्माण का दायित्व था उनकी सोच कभी समाजवादी चश्मे की चकाचौध की शिकार थी तो कभी उनके दृष्टि पर गाहे बगाहे लाल सलाम का कब्जा रहा, इसका प्रतिफल ये रहा की राष्ट्र निर्माण की जो भी आर्थिक नीति बनी और सामाजिक पहल की गई वह निहायत अव्यवहारिक और राष्ट्र को दिवालिया बनाने वाला रहा उन नीतियों का कुफ़ल ही राष्ट्र को 1990 मे आर्थिक संकट के रूप मे भुगतना पड़ा, अर्थशास्त्र का हर ज्ञाता इस बात को जानता है कि राष्ट्र निर्माण की नीतिया लोकप्रियता की चासनी से सराबोर नही हो सकती है वो दवा की तरह से कड़वी होती है जो वर्तमान मे कष्टकारी और भविष्य के लिए हितकारी  परिणाम होता है ।
भारतीय जनता पार्टी ने नरेंद्र मोदी की राष्ट्रीय सोच और इसी समझ के नाते उनके हाथ में देश का नेतृत्व देने का निर्णय लिया मोदी जी ने भी प्रधानमंत्री बनने के बाद हाल- फिलहाल तक किसी भी मोर्चे पर निराश नही किया और जनाकांक्षाओं की, प्रतीक बनकर जनता के बीच अपने को प्रस्तुत किए है उनके पास दूर दृष्टि और स्पष्ट दृष्टि है, उन्होने प्रधानमंत्री बनते ही भारत के आधुनिक निर्माण के लिए कई मूर्त कार्य योजनाओं की रूप रेखा प्रस्तुत की, इसी क्रम में उन्होने भारत के शहरो का जिस कार्य योजना के तहत काया कल्प करने का निर्णय लिया उनकी उस अभिनव पहल को स्मार्ट सिटी के रूप में पहचान मिली और इसके तहत ही भारतीय शहरों के आधुनिकरण की रूप रेखा बनाई गई। भाजपा सरकार का उद्देश्य देश में ऐसे 100 स्मार्ट सिटी के निर्माण का लक्ष्य है जो पूरी तरह से आधुनिक संसाधनों से युक्त होंगे, एक निश्चित पैमाने के तहत राज्यों से पन्द्रह दिन के अंदर स्मार्ट सिटी के लायक शहरों की सूची भेजने का निर्देश दिया गया, साथ ही ऐसा मानक पैमाना बनाया गया जिसके तहत यह सुनिश्चित किया गया की प्रत्येक राज्य में कम से कम एक स्मार्ट सिटी का निर्माण अवश्य किया जा सके। स्वयं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने 25 जून 2015 को स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट को देश के सामने प्रस्तुत किया स्मार्ट सिटी की रूप रेखा प्रस्तुत करते हुये केंद्र सरकार के शहरी विकस मंत्रालय की ओर से बताया गया की हर राज्य में कम से कम एक स्मार्ट सिटी का अवश्य विकास किया जाएगा साथ ही यह भी बताया गया  की स्मार्ट सिटी का निर्माण दो चरणों में होगा, पहले चरण के तहत नई स्मार्ट सीटियों का निर्माण किया जाएगा और दूसरे चरण में पुरानी स्मार्ट सीटियों का नवीनीकरण किया जाएगा, स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट के तहत केंद्र सरकार ने प्रयोग के तौर पर दो बड़े शहरों के बीच स्मार्ट सिटी के निर्माण का निर्णय किया है। इन स्मार्ट सीटियों की खास बात यह है की इसका निर्माण एक लाख से अधिक की आबादी वाले शहरों में किया जा रहा है, योजना के तहत जिन शहरों में स्मार्ट सीटियों का निर्माण कार्य होना है वहा नगर निगम की ओर से बिजली पानी और यातायात की व्यवस्था का होना सुनिश्चित किया जाएगा साथ ही इन शहरों में सूचना प्रौध्योगिकी से संबन्धित प्रयोग लायक मूल-भूत संसाधनो का होना जरूरी है। स्मार्ट सिटी के विकास के साथ केंद्र सरकार द्वारा जो ध्यान देने योग्य प्रावधान किया गया है वह यह है की एक स्मार्ट सिटी को अपने नजदीकी शहर के विकास में मदद करनी होगी इस प्रावधान मे केंद्र सरकार की विशेष कर प्रधानमंत्री मोदी की दूरदर्शी सोच की झलक मिलती है। उनका मानना है की आधुनिक सुविधाओं और विकास को  सीमित दायरे तक ही सीमित नही होना चाहिए बल्कि उसका लाभ जितना संभव हो सके आस-पास के क्षेत्र के लोगो को भी मिलना चाहिए। केंद्र सरकार की इस बात की भी तारीफ होनी चाहिए की इस योजना का निर्माण राजनीतिक आग्रहों और दुराग्रहों से मुक्त हो कर किया गया है । अगर ऐसा नहीं होता तो विरोधी विचारधारा, समाजवादी पार्टी की नेतृत्व वाले राज्य उत्तर-प्रदेश के सर्वाधिक शहरों को इस प्रोजेक्ट में स्थान नही मिलता क्योकि मोदी जी के भारत के विकास का जो नजरिया है वह व्यापक है उनका मानना है की देश का विकास एक व्यापक लक्ष्य है इसके लिए कार्य योजना बनाते समय समग्रता से समाज के प्रत्येक वर्ग को ध्यान मे रख कर करना है, राष्ट्र के परमवैभव तक पहुचने तक सभी राजनीतिक दलों को आपसी मतभेद दरकिनार कर राष्ट्र निर्माण मे अपनी भूमिका सुनिश्चित करनी चाहिए इस लिहाज से भी स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट के गर्भ में भविष्य के भारत की छवि छिपी हुई है। देश में कई महानगर है वहा सुविधाओं की कोई कमी नही है सारे संसाधन उन्नत अवस्था में है लेकिन सही मायने में देश का विकास तभी होगा जब उन्नत संसाधनो की पहुँच तक राष्ट्र के आम नागरिक को न जाना पड़े बल्कि वे ही आसानी से उसकी पहुँच में हो। स्मार्ट सिटी के विकास के बाद राष्ट्र के विकेंद्रकृत व्यवस्था को धरातल पर लाने में भी पूरा सहयोग मिलेगा और विकास आसानी से गावों की ओर उन्मुक्त होंगे, नासमझ लोग मोदी जी पर शहर वादी और पुजीपतिवादी होने का आरोप लगाते है जबकि वे इस प्रोजेक्ट के माध्यम से पूजी और पुजीपतियों की दिशा गावों की ओर करना चाहते है। प्रधानमंत्री की योजना स्मार्ट सिटी के बाद स्मार्ट गाँव बनाने की भी है ताकि छोटे शहर के छात्रों ,कलाकारों और उध्यमियों को एक प्लेटफॉर्म दिलाने के बाद गाँव के युवाओं को भी बेहतर अवसर के लिए उचित मंच उपलब्ध कराया जा सके। वास्तविक विकसित राष्ट्र की पहचान उसके सर्वाधिक विकसित शहरो से नही होती बल्कि उसके पास कितने सर्वाधिक विकसित शहर है से होती है। तात्पर्य स्पष्ट है विकसित राष्ट्र के मुकाम तक पहुचने के लिए राष्ट्र का विकेंद्रीकृत शहरीकरण एक बड़ी समस्या है, पूरे विश्वास के साथ कहा जा सकता है की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का यह अभिनव प्रयोग समृद्ध, सुदृढ़ और सशक्त भारत का नींव रखी है स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट जैसे योजनाओं के मदद से ही भारत सही मायने में 21वी सदी में विश्वगुरु और विकसित राष्ट्र बन सकेगा।

Monday, October 10, 2016

सांस्कृतिक एकता की प्रतीक विजयदशमी


डॊ. सौरभ मालवीय
भारत एक विशाल देश है. इसकी भौगोलिक संरचना जितनी विशाल है, उतनी ही विशाल है इसकी संस्कृति. यह भारत की सांस्कृतिक विशेषता ही है कि कोई भी पर्व समस्त भारत में एक जैसी श्रद्धा और विश्वास के साथ मनाया जाता है, भले ही उसे मनाने की विधि भिन्न हो. ऐसा ही एक पावन पर्व है दशहरा, जिसे विजयदशमी के नाम से भी जाना जाता है. दशहरा भारत का एक महत्वपूर्ण त्यौहार है. विश्वभर में हिन्दू इसे हर्षोल्लास के साथ मनाते हैं. यह अश्विन मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को मनाया जाता है. इस दिन भगवान विष्णु के अवतार राम ने रावण का वध कर असत्य पर सत्य की विजय प्राप्त की थी. रावण भगवान राम की पत्नी सीता का अपहरण करके लंका ले गया था. भगवान राम देवी दुर्गा के भक्त थे, उन्होंने युद्ध के दौरान पहले नौ दिन तक मां दुर्गा की पूजा की और दसवें दिन रावण का वध कर अपनी पत्नी को मुक्त कराया. दशहरा वर्ष की तीन अत्यंत महत्वपूर्ण तिथियों में से एक है, जिनमें चैत्र शुक्ल की एवं कार्तिक शुक्ल की प्रतिपदा भी सम्मिलित है. यह शक्ति की पूजा का पर्व है. इस दिन देवी दुर्गा की भी पूजा-अर्चना की जाती है. इस दिन लोग नया कार्य प्रारंभ करना अति शुभ माना जाता है. दशहरे के दिन नीलकंठ के दर्शन को बहुत ही शुभ माना जाता है. नवरात्रि में स्वर्ण और आभूषणों की खरीद को शुभ माना जाता है.

दशहरा नवरात्रि के बाद दसवें दिन मनाया जाता है. देशभर में दशहरे का उत्सव बहुत ही धूमधाम से मनाया जाता है. जगह-जगह मेले लगते हैं. दशहरे से पूर्व रामलीला का आयोजन किया जाता. इस दौरान नवरात्रि भी होती हैं. कहीं-कहीं रामलीला का मंचन होता है, तो कहीं जागरण होते हैं. दशहरे के दिन रावण के पुतले का दहन किया जाता है. इस दिन रावण, उसके भाई कुम्भकर्ण और पुत्र मेघनाद के पुतले जलाए जाते हैं. कलाकार राम, सीता और लक्ष्मण के रूप धारण करते हैं और अग्नि बाण इन पुतलों को मारते हैं. पुतलों में पटाखे भरे होते हैं, जिससे वे आग लगते ही जलने लगते हैं.

समस्त भारत के विभिन्न प्रदेशों में दशहरे का यह पर्व विभिन्न प्रकार से मनाया जाता है. कश्मीर में नवरात्रि के नौ दिन माता रानी को समर्पित रहते हैं. इस दौरान लोग उपवास रखते हैं. एक परंपरा के अनुसार नौ दिनों तक लोग माता खीर भवानी के दर्शन करने के लिए जाते हैं. यह मंदिर एक झील के बीचोबीच स्थित है.  हिमाचल प्रदेश के कुल्लू का दशहरा बहुत प्रसिद्ध है. रंग-बिरंगे वस्त्रों से सुसज्जित पहाड़ी लोग अपनी परंपरा के अनुसार अपने ग्रामीण देवता की शोभायात्रा निकालते हैं. इस दौरान वे तुरही, बिगुल, ढोल, नगाड़े आदि वाद्य बजाते हैं तथा नाचते-गाते चलते हैं. शोभायात्रा नगर के विभिन्न भागों में होती हुई मुख्य स्थान तक पहुंचती है. फिर ग्रामीण देवता रघुनाथजी की पूजा-अर्चना से दशहरे के उत्सव का शुभारंभ होता है. हिमाचल प्रदेश के साथ लगते पंजाब तथा हरियाणा में दशहरे पर नवरात्रि की धूम रहती है. लोग उपवास रखते हैं. रात में जागरण होता है. यहां भी रावण-दहन होता है और मेले लगते हैं. उत्तर प्रदेश में भी दशहरा श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जाता है. यहां रात में रामलीला का मंचन होता है और दशहरे के दिन रावण दहन किया जाता है.

बंगाल, ओडिशा एवं असम में दशहरा दुर्गा पूजा के रूप में मनाया जाता है.  बंगाल में पांच दिवसीय उत्सव मनाया जाता है. ओडिशा और असम में यह पर्व चार दिन तक चलता है. यहां भव्य पंडाल तैयार किए जाते हैं तथा उनमें देवी दुर्गा की मूर्तियां स्थापित की जाती हैं. देवी दुर्गा की पूजा-अर्चना की जाती है. दशमी के दिन विशेष पूजा का आयोजन किया जाता है. महिलाएं देवी के माथे पर सिंदूर चढ़ाती हैं. इसके पश्चात देवी की प्रतिमाओं का विसर्जन किया जाता है. विसर्जन यात्रा में असंख्य लोग सम्मिलित होते हैं.

गुजरात में भी दशहरे के उत्सव के दौरान नवरात्रि की धूम रहती है. कुंआरी लड़कियां सिर पर मिट्टी के रंगीन घड़े रखकर नृत्य करती हैं, जिसे गरबा कहा जाता है. पूजा-अर्चना और आरती के बाद डांडिया रास का आयोजन किया जाता है. महाराष्ट्र में भी नवरात्रि में नौ दिन मां दुर्गा की उपासना की जाती है तथा दसवें दिन विद्या की देवी सरस्वती की स्तुति की जाती है. इस दिन बच्चे आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए मां सरस्वती की पूजा करते हैं.

तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश एवं कर्नाटक में दशहरे के उत्सव के दौरान लक्ष्मी, सरस्वती और दुर्गा की पूजा की जाती है. पहले तीन दिन धन और समृद्धि की देवी लक्ष्मी का पूजन होता है. दूसरे दिन कला एवं विद्या की देवी सरस्वती-की अर्चना की जाती है तथा और अंतिम दिन शक्ति की देवी दुर्गा की उपासना की जाती है. कर्नाटक के मैसूर का दशहरा बहुत प्रसिद्ध है. मैसूर में दशहरे के समय पूरे शहर की गलियों को प्रकाश से ससज्जित किया जाता है और हाथियों का शृंगार कर पूरे शहर में एक भव्य शोभायात्रा निकाली जाती है. इन द्रविड़ प्रदेशों में रावण का दहन का नहीं किया जाता.

छत्तीसगढ़ के बस्तर में भी दशहरा का बहुत ही अलग तरीके से मनाया जाता है. यहां इस दिन देवी दंतेश्वरी की आराधना की जाती है. दंतेश्वरी माता बस्तर अंचल के निवासियों की आराध्य देवी हैं, जो दुर्गा का ही रूप हैं. यहां यह त्यौहार 75 दिन यानी श्रावण मास की अमावस से आश्विन मास की शुक्ल त्रयोदशी तक चलता है. प्रथम दिन जिसे काछिन गादि कहते हैं, देवी से समारोह आरंभ करने की अनुमति ली जाती है. देवी कांटों की सेज पर विरजमान होती हैं, जिसे काछिन गादि कहा जाता है. यह कन्या एक अनुसूचित जाति की है, जिससे बस्तर के राजपरिवार के व्यक्ति अनुमति लेते हैं. बताया जाता है कि यह समारोह लगभग पंद्रहवीं शताब्दी में आरंभ हुआ था. काछिन गादि के बाद जोगी-बिठाई होती है, तदुपरांत भीतर रैनी (विजयदशमी) और बाहर रैनी (रथ-यात्रा) निकाली जाती है. अंत में मुरिया दरबार का आयोजन किया जाता है.इसका समापन अश्विन शुक्ल त्रयोदशी को ओहाड़ी पर्व से होता है.

दशहरे के दिन वनस्पतियों का पूजन भी किया जाता है. रावण दहन के पश्चात शमी नामक वृक्ष की पत्तियों को स्वर्ण पत्तियों के रूप में एक-दूसरे को ससम्मान प्रदान कर सुख-समृद्धि की कामना की जाती है.
इसके साथ ही अपराजिता (विष्णु-क्रांता) के पुष्प भगवान राम के चरणों में अर्पित किए जाते हैं. नीले रंग के पुष्प वाला यह पौधा भगवान विष्णु को प्रिय है.

दशहरे का केवल धार्मिक महत्व ही नहीं है, अपितु यह हमारी सांस्कृतिक एकता का भी प्रतीक है.

Monday, October 3, 2016

परली वैद्यनाथ


महाराष्ट्र राज्य के मराठवाडा क्षेत्र के बीड़ जिले में स्थित धार्मिक नगर परली वैजनाथ (परली वैद्यनाथ), और यहां पर स्थित है भगवान शिव का सुप्रसिद्ध ज्योतिर्लिंग मंदिर, जिसमें विराजते हैं भगवान् वैद्यनाथ जो की शिवपुराण के कोटिरुद्रसंहिता के 28वें अध्याय के अंतर्गत वर्णित द्वादशज्योतिर्लिंगस्तोत्रं के अनुसार भगवान शिव के बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक हैं. हालांकि बहुत से लोग मानते हैं की यह ज्योतिर्लिंग झारखंड के देवघर में स्थित बैद्यनाथ धाम मंदिर में स्थित है, फिर भी भक्तों का एक बड़ा वर्ग मानता है की बैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग परली में ही है.

परली वैद्यनाथ




महाराष्ट्र राज्य के मराठवाडा क्षेत्र के बीड़ जिले में स्थित धार्मिक नगर परली वैजनाथ (परली वैद्यनाथ), और यहाँ पर स्थित है भगवान शिव का सुप्रसिद्ध ज्योतिर्लिंग मंदिर, जिसमें विराजते हैं भगवान् वैद्यनाथ जो की शिवपुराण के कोटिरुद्रसंहिता के २८ वें अध्याय के  अंतर्गत वर्णित द्वादशज्योतिर्लिंगस्तोत्रं के अनुसार भगवान शिव के बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक हैं. हालाँकि बहुत से लोग मानते हैं की यह ज्योतिर्लिंग झारखण्ड के देवघर में स्थित बैद्यनाथ धाम मंदिर में स्थित है, फिर भी भक्तों का एक बड़ा वर्ग मानता है की बैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग परली में ही है.

Saturday, October 1, 2016

पुनरुथान के लिए शोध


रिसर्च फॉर रिसर्जेन्स फाउंडेशन, डॉ उज्ज्वला चक्रदेव का उदबोधन

Friday, September 30, 2016

पुनरुथान के लिए शोध

 



पुनरुथान के लिए शोध 
रिसर्च फॉर रिसर्जेन्स फाउंडेशन, डॉ उज्ज्वला चक्रदेव का उदबोधन

Thursday, September 15, 2016

गाय तितिक्षा की मूर्ति होती है

यहां गाय को पंक्ति में भोजन कराया जाता है
बिप्र धेनु सूर संत हित, लिन्ह मनुज अवतार।
निज इच्छा निर्मित तनु माया गुन गोपार॥
अर्थात ब्राम्हण (प्रबुध्द जन) धेनु (गाय) सूर(देवता) संत (सभ्य लोग) इनके लिए ही परमात्मा अवतरित होते हैं. वह परमात्मा स्वयं के इच्छा से निर्मित होते हैं और मायातीत, गुणातीत एवम् इन्द्रीयातीत इसमें गाय तत्व इतना महत्वपूर्ण हैं कि वह सबका आश्रय है. गाय में 33 कोटि देवी-देवताओं का वास रहता है. इस लिए गाय का प्रत्येक अंग पूज्यनीय माना जाता है. गो सेवा करने से एक साथ 33 करोड़ देवता प्रसन्न होते हैं. गाय सरलता शुध्दता और सात्विकता की मूर्ति है. गऊ माता की पीट में ब्रह्म, गले में विष्णु और मुख में रूद्र निवास करते हैं, मध्य भाग में सभी देवगण और रोम-रोम में सभी महार्षि बसते हैं. सभी दानों में गो दान सर्वधिक महत्वपूर्ण माना जाता है.
गाय को भारतीय मनीषा में माता केवल इसीलिए नहीं कहा कि हम उसका दूध पीते हैं. मां इसलिए भी नहीं कहा कि उसके बछड़े हमारे लिए कृषि कार्य में श्रेष्ठ रहते हैं, अपितु हमने मां इसलिए कहा है कि गाय की आंख का वात्सल्य सृष्टि के सभी प्राणियों की आंखों से अधिक आकर्षक होता है. अब तो मनोवैज्ञानिक भी इस गाय की आंखों और उसके वात्सल्य संवेदनाओं की महत्ता स्वीकारने लगे हैं. ऋषियों का ऐसा मनतव्य है कि गाय की आंखों में प्रीति पूर्ण ढंग से आंख डालकर देखने से सहज ध्यान फलित होता है. श्रीकृष्ण भगवान को भगवान बनाने में सर्वाधिक महत्वपूर्ण भूमिका गायों की ही थी. स्वयं ऋषियों का यह अनुभव है कि गाय की संगति में रहने से तितिक्षा की प्राप्ति होती है. गाय तितिक्षा की मूर्ति होती है. इसी कारण गाय को धर्म की जननी कहते हैं.

Wednesday, September 14, 2016

विश्व विजय दिवस


स्वामी विवेकानंद के शिकागो भाषण प्रसंग पर माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविध्यालय-भोपाल द्वारा आयोजित "विश्व विजय दिवस" के मुख्य वक्ता श्री हेमंत जी मुक्तिबोध.

मकर संक्रांति पर विशेष आलेख

हिंदी विवेक के डिजिटल साप्ताहिक में पढ़ें- https://hindivivek.org/paakshik-ank मकर संक्रांति पर विशेष आलेख