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वंदे मातरम का विभिन्न भाषाओं में अनुवाद होगा

डॊ. सौरभ मालवीय
राष्ट्र गीत वंदे मातरम एक बार भी चर्चा में है. इस बार मद्रास उच्च न्यायालय की वजह से इसके गायन का मुद्दा गरमाया है.   मद्रास उच्च न्यायालय के न्यायधीश एमवी मुरलीधरन ने आदेश दिया है कि राष्ट्रगीत वंदे-मातरम को हर सरकारी/ग़ैर-सरकारी कार्यालयों/संस्थानों/उद्योगों में हर महीने कम से कम एक बार गाना होगा. यह गीत मूल रूप से बांग्ला और संस्कृत भाषा में है, इसलिए इसे तमिल और अंग्रेज़ी में अनुवाद करने के भी आदेश दिए गए हैं. उल्लेखनीय है कि एक ओर मुस्लिम समुदाय से ही वंदे मातरम के विरोध में स्वर उठ रहे हैं, वहीं दूसरी ओर एक मुस्लिम लड़की ने ही वंदे मातरम का पंजाबी में अनुवाद कर सराहनीय कार्य किया है.वंदे मातरम का पंजाबी अनुवाद करने वाली फ़िरदौस ख़ान शाइरा, लेखिका और पत्रकार हैं. अरबिंदो घोष ने इस गीत का अंग्रेज़ी में और आरिफ़ मोहम्मद ख़ान ने उर्दू में अनुवाद किया. उर्दू में ’वंदे मातरम’ का अर्थ है ’मां तुझे सलाम’. ऐसे में किसी को भी अपनी मां को सलाम करने में आपत्ति नहीं होनी चाहिए. आशा है कि आगे भी देश-विदेश की अन्य भाषाओं में इसका अनुवाद होगा.

उल्लेखनीय यह भी है कि जिस मामले में मद…
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सेवाकार्य

आशीष भैया है
कुष्ट पीड़ित बन्धुओं/ भगनियों की सेवा हेतु जीवन समर्पित 'दिव्यप्रेम सेवा मिशन' नाम से हरिद्वार में प्रकल्प है अनाथ बच्चों और उस पीड़ित परिवार के बच्चो की शिक्षा,चिकित्सा हेतु आवासीय सेवाकार्य का प्रकल्प है।
आशीष भैया विज्ञान संकाय से स्नातकोत्तर करने के बाद माँ भारती की सेवा हेतु संघ के प्रचारक बन गए गोरखपुर में महानगर प्रचारक रहे उस समय मैं 10वी का विद्यार्थी था आशीष जी स्कूटर से चलते थे मुझे सौभाग्य मिला कुछ वर्ष साथ रहने का । कुष्ट पीड़ित लोगों की समाज में उपेक्षा और तिरस्कार देख कर उनके लिए कुछ करना चाहिए यह सोचते हुए उन पीड़ितों के साथ ही अपना आश्रम बना लिए । इस पुनीत कार्य हेतु आशीष जी को प्रणाम।

नवभारत टाइम्स

सहारनपुर का सच
नवभारत टाइम्स

सावरकर जयंती

स्वातंत्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर की जयंती है।
भारत माता के लिए असंख्य कष्ट भोगने वाले सावरकर को कोटि-कोटि प्रणाम...

प्रसिद्ध इतिहासकार प्रो.मक्खन सिंह

सानिध्य
प्रसिद्ध इतिहासकार प्रो.मक्खन सिंह
विचार दर्शन भारतीय दृष्टि
विश्व सभ्यता और विचार-चिन्तन का इतिहास काफी पुराना है। लेकिन इस समूची पृथ्वी पर पहली बार भारत में ही मनुष्य की संवेदनाओं चिंतन प्रारंभ किया भारतीय चिंतन का आधार हमारी युगों पुरानी संस्कृति है। भारत एक देश है और सभी भारतीय जन एक है, परन्तु हमारा यह विश्वास है कि भारत के एकत्व का आधार उसकी युगों पुरानी अपनी संस्कृति में निहित है- इस बात को न्यायालयों ने उनके निर्णयों में स्वीकार किया है। सांस्कृतिक चिंतन एक आध्यात्मिक अवधारणा है और यही है भारतीय का वैशिष्ट्य। राष्ट्र का आधार हमारी संस्कृति और विरासत है। हमारे लिए ऐसे राष्ट्रवाद का कोई अर्थ नहीं जो हमे वेदों, पुराणों, रामायण, महाभारत, गौतमबुद्ध, भगवान महावीर स्वामी, शंकराचार्य, गुरूनानक, महाराणा प्रताप, शिवाजी महाराज, स्वामी दयानन्द, लोकमान्य तिलक, महात्मा गांधी, पण्डित दीनदयाल उपाध्याय और असंख्य अन्य राष्ट्रीय अधिनायकों से अलग करता हो। यह राष्ट्रवाद ही हमारा धर्म है।

लड़की तो नहीं मिली, जिन्दगी का मिशन मिल गया

17 अगस्त 2006 को रोड एक्सीडेंट में सर फट गया. 60 प्रतिशत हिस्सा बाहर निकल गया. डॉक्टरों ने मृत बता दिया. शरीर को अग्नि में सुपुर्द करने की तैयारी शुरू हो गई, लेकिन नियति को कुछ और ही कराना था इसलिए आजाद पाण्डेय की सांसे किसी कोने में छुपी थी. आजाद जिन्दा थे, शरीर में कुछ हल-चल हुई. गोरखपुर सावित्री नर्सिंग होम में भगवन बनकर एक डॉक्टर आजाद को नई जिन्दगी देने में सहायक बने, परन्तु आजाद स्मरण शक्ति खो दिए थे. शरीर और दिमाग दोनों का इलाज दिल्ली और गोरखपुर में चलता रहा. धीरे-धीरे सुधार होता गया. इसी बिच एक घटना होती है दिल्ली इलाज के लिए आजाद अपने पापा के साथ आते है. ट्रेन के जनरल डिब्बे में दोनों बैठे है. खिड़की से बहार आजाद की नज़र पड़ती है. एक छोटी सी बच्ची 7-8 साल की जो ट्रेन से फेकी हुई गंदगी को खा रही थी. यह देखकर आजाद चिल्लाये,शोर मचाये और पापा से बोले इसे अपना खाना दीजिये. पापा ने डांटा, लोगो ने समझाया. मगर आजाद के जिद्द के सामने किसी की नही चली और पापा ने पूरा खाना दे दिया. बच्ची खाने लगी. ट्रेन चल पड़ी. आजाद बोलने लगे पापा को ख़ुशी हुई. मेरा बेटा ठीक हो गया.
कुछ वर्षो तक आजाद पाण्डेय…

लोकार्पण

वर्तमान परिप्रेक्ष्य में राष्ट्रीय पत्रकारिता, पुस्तिका का लोकार्पण