Thursday, May 26, 2016

मोदी ने बहायी विकास की गंगा


-डॉ. सौरभ मालवीय                            
देश में भारतीय जनता पार्टी की सरकार को दो वर्ष हो गए हैं. इन दो वर्षों में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने विश्वभर के अनेक देशों में यात्रा कर उनसे संबंध प्रगाढ़ बनाने का प्रयास किया है. जनकल्याण की अनेक योजनाएं शुरू की हैं. सरकार ने अनेक कल्याणकारी कार्य किए हैं कि हर जगह मोदी ही मोदी के जयकारे हैं. सरकार ने विकास का नारा दिया और विकास को ही प्राथमिकता दी. चहुंओर विकास की गंगा बह रही है. स्वास्थ्य सेवाओं के बारे में प्रधानमंत्री का कहना है कि अगर देश के एक करोड़ लोग गैस की सब्स‍िडी छोड़ सकते हैं, तो देश के डॉक्टर भी 12 महीनों में 12 दिन गरीब प्रसूता माताओं को दे सकते हैं. देश में डॉक्‍टरों की कमी है, इसलिए डॉक्‍टरों की रिटायरमेंट की उम्र 60-62 की बजाय 65 साल कर दी जाएगी, ताकि डॉक्‍टरों की सेवा ली जा सकें और नये डॉक्‍टर तैयार किए जा सकें. वह कहते हैं कि यह स्वच्छता अभि‍यान गरीबों के लिए है. गरीब बीमार होते हैं, तो उनका रोजगार छिन जाता है. लोगों ने स्वच्छता अभि‍यान को अपना लिया है. प्रधानमंत्री मुद्रा योजना लेकर आए, ताकि जो लोग छोटा-मोटा काम करते हैं, वे बैंकों से पैसे लेकर अपना कारोबार आगे बढ़ा सकें. प्रधानमंत्री महिला शिक्षा पर बल दे रहे हैं. उनका कहना है कि जब तक देश की हर बेटी नहीं पढ़ेगी, नहीं बढ़ेगी, देश का कर्ज रहेगा. कृषि और किसानों पर भी सरकार विशेष ध्यान दे रही है. जैविक खेती को बढ़ावा देने के साथ-साथ मिट्टी के रखरखाव पर भी बल दिया जा रहा है, इसके लिए सरकार ने मिट्टी स्वास्थ्य कार्ड योजना शुरू की है. सरकार ऐसी फसल बीमा योजना लाई हैं, जिससे किसान के खेत के अंदर काटकर रखी गई फसल को हानि पहुंचने पर उसे उसकी भी बीमा राशि मिल सकेगी. चीनी मिलें गन्ना किसानों को समय पर भुगतान करें, इस बारे में भी प्रयास किया जाएगा. वर्ष 2022 तक किसानों की आमदनी दोगुनी करने का सरकार का ल्क्ष्य है. गांवों को बिजली. पानी, सड़क जैसी सुविधाएं उपलब्ध कराने पर ध्यान दिया जा रहा है.

वास्तव में ’राष्ट्र सर्वोपरि’ यह कहते नहीं, बल्कि उसे जीते हैं प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी. पिछले कुछ दशकों में भारतीय जनमानस का मनोबल जिस प्रकार से टूटा था और अब मानों उसमें उड़ान का एक नया पंख लग गया है और अपने देश ही नहीं, अपितु विश्वभर में भारत का सीना चौड़ा करके शक्ति संपन्न राष्ट्रों एवं पड़ोसी देशों से कंधे से कंधा मिलाकर कदमताल करने लगा है भारत.

किसी भी देश, समाज और राष्ट्र के विकास की प्रक्रिया के आधारभूत तत्व मानवता, राष्ट्र, समुदाय, परिवार और व्यक्ति ही केंद्र में होता है, जिससे वहां के लोग आपसी भाईचारे से अपनी विकास की नैया को आगे बढ़ाते हैं. अपने दो वर्ष के कार्यकाल में मोदी इसी मूल तत्व के साथ आगे बढ़ रहे हैं.  एक वर्ष पहले जब नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा ने पूर्ण बहुमत से केंद्र में सरकार बनाई तब इनके सामने तमाम चुनौतियां खड़ी थीं और जन अपेक्षाएं मोदी के सामने सर माथे पर. ऐसे में प्रधानमंत्री और उनके मंत्रिपरिषद के सहयोगियों के लिए चुनौतियों का सामना करते हुए विकास के पहिये को आगे बढ़ाना आसान राह नहीं थी, परन्तु मात्र 365 दिन में ही मोदी के कार्ययोजना का आधार बताता है कि उनके पास दूर दृष्टि और स्पष्ट दृष्टि है, तभी तो पिछले दो वर्षों से समाचार- पत्रों में भ्रष्टाचार, महंगाई, सरकार के ढुलमुल निर्णय, मंत्रियों का मनमर्जी, भाई-भतीजावाद, परिवारवाद अब नहीं दिखता.

किसी भी सरकार और देश के लिए उसकी छवि महत्त्वपूर्ण होती है. मोदी इस बात को बखूबी समझते हैं. इसलिए विश्व भर के तमाम देशो में जाकर भारत को याचक नहीं, बल्कि शक्तिशाली और समर्थ देश के नाते स्थापित कर रहे हैं. नरेंद्र मोदी जिस पार्टी के प्रतिनिधि के रूप में आज प्रधानमंत्री बने हैं, उस भारतीय जनता पार्टी का मूल विचार एकात्म मानव दर्शन एवं सांस्कृतिक राष्ट्रवाद है और दीनदयाल उपाध्याय भी इसी विचार को सत्ता द्वारा समाज के प्रत्येक तबके तक पहुचाने की बात करते थे.  समाज के सामने उपस्थित चुनौतियों के समाधान के लिए सरकार अलग-अलग समाधान खोजने की जगह एक योजनाबद्ध तरीके से काम करे.  लोगों के जीवन की गुणवत्ता, आधारभूत संरचना और सेवाओं में सुधार सामूहिक रूप से हो. प्रधानमंत्री इसी योजना के साथ गरीबों, वंचितों और पीछे छूट गए लोगों के लिए प्रतिबद्व है और वे अंत्योदय के सिद्धांत पर कार्य करते दिख रहे हैं.
     
भारत में आजादी के बाद शब्दों की विलासिता का जबरदस्त दौर कुछ तथाकथित बुद्धिजीवियों ने चलाया. इन्होंने देश में तत्कालीन सत्ताधारियों को छल-कपट से अपने घेरे में ले लिया. परिणामस्वरूप राष्ट्रीयता से ओत-प्रोत जीवनशैली का मार्ग निरन्तर अवरुद्ध होता गया. अब अवरुद्ध मार्ग खुलने लगा है. संस्कृति से उपजा संस्कार बोलने लगा है. सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का आधार हमारी युगों पुरानी संस्कृति है, जो शताब्दियों से चली आ रही है. यह सांस्कृतिक एकता है, जो किसी भी बंधन से अधिक मजबूत और टिकाऊ है, जो किसी देश में लोगों को एकजुट करने में सक्षम है और जिसमें इस देश को एक राष्ट्र के सूत्र में बांध रखा है. भारत की संस्कृति भारत की धरती की उपज है. उसकी चेतना की देन है. साधना की पूंजी है. उसकी एकता, एकात्मता, विशालता, समन्वय धरती से निकला है. भारत में आसेतु-हिमालय एक संस्कृति है. उससे भारतीय राष्ट्र जीवन प्रेरित हुआ है. अनादिकाल से यहां का समाज अनेक सम्प्रदायों को उत्पन्न करके भी एक ही मूल से जीवन रस ग्रहण करता आया है. सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के एजेंडे को नरेंद्र मोदी इसी रूप में पूरा कर रहे है.
           
पिछले पांच दशकों में भारत के राजनीतिक नेत्तृत्व के पास विश्व में अपना सामर्थ्य बताने के लिए कुछ भी नहीं था. सच तो यह है कि इन राजनीतिक दुष्चक्रों के कारण हम अपनी अहिंसा को अपनी कायरता की ढाल बनाकर जी रहे थे. आज पहली बार विश्व की महाशक्तियों ने समझा है कि भारत की अहिंसा इसके सामर्थ्य से निकलती है, जो भारत को 60 वर्षो में पहली बार मिली है. सवा सौ करोड़ भारतीयों के स्वाभिमान का भारत अब खड़ा हो चुका है और यह आत्मविश्वास ही सबसे बड़ी पूंजी है. तभी तो इस पूंजी का शंखनाद न्यूयार्क के मैडिसन स्क्वायर गार्डन से लेकर सिडनी, बीजिंग, काठमांडू और ईरान तक अपने समर्थ भारत की कहानी से गूंज रहा है. दो वर्षों के काम का आधार मजबूत इरादों को पूरा करता दिख रहा है. नरेंद्र मोदी को अपने इरादे मजबूत कर के भारत के लिए और परिश्रम करने की आवश्यकता है.

मोदी सरकार ने अभी दो वर्ष ही पूरे किए हैं. इस सरकार के तीन वर्ष अभी शेष हैं. आशा है कि मोदी सरकार आगामी वर्षों में भी विकास के नित नये सोपान तय करेगी.

Monday, May 23, 2016

माता नर्मदा को समर्पित है बगिया


 
यहां प्राकृतिक रूप से आमनमर्दा पुष्पों,केले और अन्य बहुत से फलों के पेड़ और जड़ी-बूटियां है. इस बगिया में माता नर्मदा खेलती और भ्रमण करती थीं.

Sunday, May 22, 2016

पुण्य सलिला मां नर्मदा से साक्षात्कार

 
मातृत्व भारतीय संस्कृति में अतुलनीय स्थान है. मातृत्व केवल एक शरीर में नहीं बसता, अपितु एक भाव के रूप में संपूर्ण समाज में प्रभावित होता. मेकलसुता मां नर्मदा मातृत्व के भाव का एक ऐसा ही विराट प्रवाह है, जो अनंतकाल से अपनी भूमि और उस पर जन्म लेने वाली असंख्य संतानों को सभ्यता,संस्कारों, भक्ति, कला, प्रेम, स्वतंत्रता और समृद्धि के जीवन मूल्यों से पोषित करती है और अन्ततः अपनी सन्तानों के लिए मुक्ति का साधन भी बनती है.

Saturday, May 21, 2016

अमरकंटक

 
यहां सुकून है शान्ति है और आनन्द है
अमरकण्टक प्रवास पर हूं. यहां के खूबसूरत झरने, पवित्र नदियां, ऊंची पहाड़ियों और शांत वातावरण मंत्रमुग्ध करने वाला है, चारों ओर टीक और महुआ के गगन चुम्बी पेड़ हैं. अमरकंटक से माता नर्मदा और सोन नदी की उत्पत्ति हुई है. भगवान शिव की पुत्री नर्मदा जीवनदायिनी नदी रूप में यहां से बहती है. मुझे दर्शन का अवसर मिला है.  कुछ दिनों तक आप सभी को भी यहां के बारे में बताने का प्रयास करूंगा.

Thursday, May 19, 2016

वैज्ञानिक वंदना शिवा से सुखद मुलाकात


दार्शनिक, पर्यावरण कार्यकर्ता, पर्यावरण संबंधी नारी अधिकारवादी एवं कई पुस्तकों की लेखिका हैं. वर्तमान में दिल्ली में स्थित, शिवा अग्रणी वैज्ञानिक और तकनीकी पत्रिकाओं में 300 से अधिक लेखों की रचनाकार हैं. उन्होंने 1978 में डॉक्टरी शोध निबंध: "हिडेन वैरिएबल्स एंड लोकैलिटी इन क्वान्टम थ्योरी" के साथ पश्चिमी ओंटेरियो विश्वविद्यालय, कनाडा से अपनी पीएचडी की उपाधि प्राप्त की.
1982 में उन्होंने विज्ञान, प्रौद्योगिकी एवं परिस्थिति विज्ञान के लिए अनुसंधान फाउंडेशन की स्थापना की, जिसने नवदान्य की रचना की. उनकी पुस्तक "स्टेयिंग अलाइव" ने तीसरी दुनिया की महिलाओं के संबंध में धारणा को पुन: परिभाषित करने में सहायता की. शिवा ने अंतर्राष्ट्रीय वैश्वीकरण मंच, महिलाओं के पर्यावरण एवं विकास संगठन एवं तीसरी दुनिया के नेटवर्क सहित भारत एवं विदेशों में सरकारों तथा गैर-सरकारी संगठनों के सलाहकार के रूप में भी कार्य किया है.

Wednesday, May 18, 2016

स्मृतियों का संसार

 
आज अंतर्राष्ट्रीय संग्रहालय दिवस है. इस अवसर पर भोपाल स्थित दुष्यन्त कुमार स्मारक पाण्डुलिपि संग्रहालय में विद्धवान साहित्यकारों की स्मृतियों के बीच.

Monday, May 16, 2016

पत्रकारिता विश्वविद्यालय का चीन के विवि के साथ एमओयू


चीन के मीडिया और प्रिंटिंग तकनीक के प्रमुख विश्वविद्यालय बीजिंग इस्टीट्यूट ऑफ ग्राफिक कम्युनिकेशन के साथ एमओयू हुआ है. माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफ.बीके कुठियाला और बिआईजीसी की ओर से प्रेसिडेंट लुओ और विभाग की निदेशक झेंग शेरु ने एमओयू पर हस्ताक्षर किए. दोनों मिलकर शोध, अकादमिक सहयोग करते हुए स्टूडेंट एक्सचेंज प्रोग्राम चलाएंगे.

Sunday, May 15, 2016

विचार कुंभ : परंपराओं को जीवित रखने का प्रयास


डॊ. सौरभ मालवीय
मध्यप्रदेश के उज्जैन में चल रहे सिंहस्थ कुंभ के दौरान 12 से 14 मई तक निनौरा में तीन दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय विचार महाकुंभ का आयोजन किया गया. इस दौरान धार्मिक ही नहीं, बल्कि सामाजिक मुद्दों पर भी खुलकर चर्चा की गई. वक्ताओं ने कृषि, पर्यावरण, शिक्षा, संस्कृति, भाषा, चिकित्सा, स्वच्छता, महिला सशक्तिकरण आदि विषयों पर अपने विचार व्यक्त करते हुए देश और समाज के उत्थान पर बल दिया.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विचार कुंभ को संबोधित करते हुए संत-महात्माओं से आग्रह किया कि वे धरती की समस्याओं पर प्रतिवर्ष सात दिन का विचार कुंभ आयोजित करें. उन्होंने कहा कि आदिकाल से चले आ रहे कुंभ के समय और कालखंड को लेकर अलग-अलग मत है, लेकिन इतना निश्चित है कि यह मानव की सांस्कृतिक यात्रा की पुरातन व्यवस्था में से एक है. इस विशाल भारत को अपने में समेटने का प्रयास कुंभ मेले के माध्यम से ही होता है. उन्होंने कहा कि समाज की चिंता करने वाले ऋषि-मुनि 12 वर्ष में एक बार प्रयाग में कुंभ में एकत्रित होते थे, जिसमें वे विचार विमर्श करते हुए विगत वर्ष की सामाजिक स्थिति का अध्ययन करते थे, उसका विश्लेषण करते थे. इसके साथ ही समाज के लिए आगामी 12 वर्षों की दिशा तय करके योजना बनाते थे. उन्होंने कहा कि प्रयाग से अपने-अपने स्थान पर जाकर संत महात्मा योजना पर कार्य करने लगते थे. इतना ही नहीं तीन वर्ष में उज्जैन, नासिक, इलाहाबाद में होने वाले कुंभ में जब वे एकत्रित होते थे, तब विमर्श करते थे कि प्रयाग में जो योजना बनाई गई थी, उस पर क्या कार्य हुआ और क्या नहीं हुआ. तत्पश्चात आगामी तीन वर्ष की योजना बनाई जाती थी. यह एक अद्भुत सामाजिक संरचना थी,  परंतु समय के साथ इसके रूप में परिवर्तन आया. अब कुंभ केवल डुबकी लगाने, पाप धोने और पुण्य कमाने तक ही सीमित होकर रह गया है.   उन्होंने कहा कि विचार कुंभ के माध्यम से उज्जैन में एक नया प्रयास प्रारंभ हुआ है. यह प्रयास शताब्दियों पुरानी परंपरा का आधुनिक रूप है. इस आयोजन में वैश्विक चुनौतियों और मानव कल्याण के क्या प्रयास हो सकते हैं, इस पर विचार हुआ है. इस मंथन से जो 51 अमृत बिंदु निकले है, अब उन पर कार्य होना चाहिए. उन्होंने उपस्थित साधु-संतों और अखाड़ों के प्रमुख से आह्वान किया कि वे इन 51 अमृत बिंदुओं पर प्रतिवर्ष एक सप्ताह का विचार कुंभ अपने भक्तों के बीच करने पर विचार अवश्य करें, ताकि विचारों को मूर्त रूप दिया जा सके.

विचार कुंभ को संबोधित करते हुए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत ने कहा कि विकास करते समय प्रत्येक देश की प्रकृति का विचार करना चाहिए. ऐसा ही परिवर्तन दुनिया की वैचारिकता में दिखाई दे रहा है. विविधता को स्वीकार किया जा रहा है और दुनिया कहने लगी है कि विविधता को अलंकार के रूप में देखना चाहिए, दोष के रूप में नहीं. अब तो यह भी कहा जाने लगा है कि विविधता को स्वीकार कर सम्मानित करना चाहिए, केवल सहिष्णुता नहीं, उससे भी आगे जाना है. उन्होंने कहा कि अस्तित्व के लिए संघर्ष करने के बजाय अब समन्वय की ओर जाना पड़ेगा, धीरे-धीरे सभी लोग यह मानने लगे हैं. व्यवस्था समतायुक्त और शोषणमुक्त होनी चाहिए. जब तक सभी को सुख प्राप्त नहीं होता, तब तक शाश्वत सुख दिवास्वप्न है. उन्होंने यह भी कहा कि भारत में जन्म लेने वाले लोगों की दो माताएं हैं, एक जन्म देने वाली और दूसरी भारत माता. जन्म देने वाली माता के कारण शरीर मिला, मातृभूमि के कारण संस्कार मिला, पोषण मिला. उन्होंने कहा कि भारत की परंपरा के अनुसार सारे जीव सृष्टि की संतानें हैं. मनुष्यता का संस्कार देने वाली सृष्टि है. मध्य प्रदेश में कुंभ की वैचारिक परंपरा को पुनर्जीवित किया जा रहा है. आज विश्वभर के चिंतक, विचारक एक हो गए हैं. संयुक्त राष्ट्र संघ की ओर से कहा गया है कि सनातन परंपरा में इन सत्यों की बहुत पूर्व से जानकारी है. आज के परिपेक्ष्य में हमें सनातन मूल्यों के प्रकाश में विज्ञान के साथ जाना होगा. यह करके विश्व की नई रचना कैसी हो, इसका मॉडल अपने देश के जीवन में देना होगा.

जूना पीठाधीश्वर महामंडलेश्वर स्वामी अवधेशानंद गिरि ने कहा कि अगली सदी भारत की सदी है, क्योंकि जब पश्चिम की उपभोक्तावादी संस्कृति थक जाएगी, तब भारत के आध्यात्मिक नेतृत्व की आवश्यकता होगी. भारत की भूमि से ही आध्यात्मिक मार्ग निकलेगा, जो विश्व का मार्गदर्शन करेगा. उन्होंने कहा कि मनुष्य की दो विशेषता प्रधान हैं कर्म की स्वायत्तता और चिंतन की स्वतंत्रता. मनुष्य का संकल्प जैसा होगा उसकी सिद्धि भी वैसी ही होगी. संकल्प की पवित्रता से सकारात्मकता आती है. उन्होंने कहा कि विश्व में गुणवत्तापूर्ण जीवन के लिए अच्छा वातावरण उत्पन्न करने की आवश्यकता है. अधिकारों के प्रति जाग्रति तो बढ़ी है, परंतु कर्त्तव्यों के प्रति विस्मृति भी बढ़ी है. वर्तमान समय में परोपकार की प्रवृत्ति पैदा करने की आवश्यकता है. उन्होंने कहा कि यह विचार-कुंभ विश्व को अधिक से से अधिक वृक्ष लगाने और पृथ्वी को हरा-भरा बनाने का संदेश देगा. उन्होंने क्षिप्रा नदी के किनारे वृहद वृक्षारोपण का आह्वान किया,  ताकि हरित क्षेत्र बढ़ सके. श्री चिदानंद स्वामी ने कहा कि नदियों के किनारे इतना पेड़ लगाएं कि हरित क्षेत्र बन जाए. जन्मदिन पर पेड़ लगाएं और पेड़ लगाने का बहाना तलाशें.

योगगुरु और पतंजलि आयुर्वेद के प्रमुख बाबा रामदेव ने कृषि एवं कुटीर उद्योग पर चर्चा करते हुए कहा कि देश की आर्थिक स्थिति में सुधार लाने के लिए कुटीर उद्योग की वस्तुओं को अपनाना होगा. कुटीर उद्योग का बहुत बड़ा क्षेत्र है और यह आवश्यक है कि इसे आम जनता प्रोत्साहित करे. उन्होंने कहा कि अगर हम हाथ से बने सामान का ही उपयोग करने लगें, तो इसका लाभ कर्मकारों के साथ देश को भी होगा, क्योंकि तब देश की मुद्रा बाहर नहीं जाएगी.  हमें सूती कपड़े पहनने चाहिए, जिससे भारतीय बुनकरों, कामगारों को काम मिल सके. उन्होंने कहा कि स्वदेशी को प्रोत्साहित करने वाली नीतियां बनाई जानी चाहिए. उन्होंने लोगों से आह्वान किया कि वे भी कुटीर उद्योग की ओर बढ़ें और जो लोग प्रशिक्षण हासिल करके शैम्पू, साबुन आदि बनाना चाहते हैं, उन्हें वह प्रशिक्षण देंगे.

इस अवसर पर भारतीय जनता पार्टी के महासचिव राम माधव ने कहा कि जीवन को सुलभ और सरल बनाने के लिए भारतीय पुरातन शास्त्रों का परायण करना चाहिए. सर्वे भवन्तु सुखिनः की अवधारणा का पालन का करना चाहिए. अच्छे के साथ अच्छा और बुरे का साथ भी अच्छा करना चाहिए.

मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने विचार महाकुंभ के उद्देश्य की चर्चा करते हुए कहा कि कुंभ का संबंध ही विचार-मंथन से है. उन्होंने कहा कि संतों की विचार प्रक्रिया से कल्याणकारी राज्य का कल्याण हो, यही उददेश्य है. भारत में सभी तरह के विचारों, विचार-पक्रियाओं और दर्शन का आदर किया गया है. सभी को पर्याप्त आदर और सम्मान है. आज के समय में सबसे बडी चिंता यह है कि मानव जीवन गुणवत्तापूर्ण कैसे हो. कौन से तरीके और व्यवहार हैं, जिनसे मानव जीवन सुखी और अर्थपूर्ण बन सकता है. विज्ञान और आध्यात्मिकता या दोनों के परस्पर मेल से यह संभव है. इसलिए इस पर विचार करना आवश्यक है. विज्ञान और अध्यात्म दोनों एक दूसरे के पूरक हैं. उन्होंने कहा कि ग्लोबल वार्मिंग, परंपरागत खेती, मूल्य आधारित जीवन, धर्म और आध्यात्म जैसे विषयों का वैश्विक महत्व है. उन्होंने महिला सशक्तीकरण को बढ़ावा देने पर बल दिया. इसके साथ ही उन्होंने राज्य सरकार की योजनाओं का उल्लेख करते हुए कहा कि सत्ता के सूत्र शक्ति रूपा महिलाओं हाथ में सौंपेंगे. पुलिस सहित अन्य विभागों की भर्ती में 33 प्रतिशत महिलाओं को आरक्षण मिलेगा. अगले शैक्षणिक सत्र से शिक्षा के पाठ्यक्रम में महिला सशक्तिकरण, आत्म निर्भरता, स्वाभिमान, संवेदनशीलता के पाठ शामिल किए जाएंगें. किसी भी विज्ञापन में नारी देह के प्रदर्शन को प्रतिबंधित किया जाएगा और इसके लिए हम कानून भी बनाएंगे. महिला मजदूरों को समान कार्य का समान वेतन दिया जाएगा. मध्यप्रदेश में शराब की कोई भी नई दुकान नहीं खोली जाएगी और नशामुक्ति अभियान चलाया जाएगा. राज्य को शक्ति प्रदेश बनाएंगे, जिसमें महिलाओं को संपूर्ण अधिकार दिए जाएंगे. बेटा-बेटी बराबर हैं, यह जनअभियान चलाया जाएगा.

साध्वी ऋतम्भरा ने कहा कि नारी निकेतन किसी समस्या का हल नहीं है. नारी को आंतरिक और बाहरी रूप से सशक्त बनाने के लिए नीति बनाने की आवश्यकता है. महिलाओं को रोटी कमाने लायक बनाए.

श्रीमती मृदुला सिंन्हा ने कहा कि महिलाओं के लिए विशेष योजनाओं की महती आवश्यकता है. शिक्षा पाठ्यक्रमों में नारी उत्थान के पाठ शामिल किए जाने चाहिए. बच्चों को चाहिए कि वे माता-पिता को वृद्धाश्रम नहीं भेजें. उन्होंने कहा कि विवाह करना अनिवार्य नहीं, बल्कि आवश्यक है. इस संबंध को निभाना चाहिए.
सुश्री साध्वी भगवती ने कहा कि बड़ा होना जरूरी नहीं, बल्कि बढ़िया होना जरूरी है, यह भाव भारतीय जनमानस में पैदा करने हेतु अभियान चलाया जाना चाहिए. नारी के अंदर विद्यमान अच्छे संस्कारों को प्रोत्साहित करने हेतु शुभ शक्ति नामक योजना संचालित की जानी चाहिए.

शिव भरत गुप्त ने कहा कि स्त्री के चरित्र को लांक्षित करने वाले लोगों और कथनों को रोकने के लिए एक विशेष कानून होना चाहिए. स्त्री की प्रकृति के अनुरूप रॊल मॊडल तैयार करना चाहिए, जो उनके अनुकूल हो. स्त्रियों के सशक्तिकरण के लिए केवल आरक्षण एक मात्र समाधान नहीं है, उसके लिए एक सोशल रॊल मॊडल तैयार करना होगा, ऐसी सामाजिक और नई संस्थाएं बनानी होंगी, जिससे परिवार और बच्चों के साथ-साथ महिलाओं के अकेलेपन को दूर किया जा सके, इसके लिए भी महिलाओं को ही जिम्मेदारी सौंपनी होंगी.
यूएन वीमेन की सदस्य अंजू पांडे ने कहा कि कार्यशील महिलाओं के कार्य या गृह कार्य का भी मूल्यांकन होना चाहिए. महिलाओं के अनपेड वर्क पर ध्यान केन्द्रित कर उस पर भी विमर्श होना चाहिए. पुरुषों की मानसिक स्थिति बदलने के लिए भी सरकारी प्रयास किए जाने चाहिए.

सुश्री निवेदिता बिड़े ने कहा कि समाज में महिलाओं के प्रति सोच बदलने एवं उनका आदर करने के लिए जनजाग्रति हेतु योजनाएं बनाई जाएं. स्त्री-पुरूष में समानता एवं भ्रूण हत्या रोकने से समाज में एकात्मता एवं आत्मीयता का भाव उत्पन्न होगा.
सुश्री गीता बलवंत गुण्डे ने कहा कि समाज में लिंग भेद के प्रति सामाजिक संवेदना पैदा करने की आवश्यकता है. भारतीय विकास की अवधारणा के आधार पर बाल विकास को मॊडल बनाया जाना चाहिए. शिक्षा के द्वारा महिलाओं में आत्मविश्वास को बढ़ाए जाने की नीति बनाने की आवश्यकता है.
स्वामिनी विमला नंदनी ने कहा कि बच्चों में बाल्यकाल की आयु में संपूर्ण विकास की कार्ययोजना बने. मां के गर्व से ही कन्या के प्रोत्साहन को बढ़ावा दिया जाए.

विचार कुंभ में 45 देशों से आए प्रतिनिधियों ने भाग लिया. विभिन्न मुद्दों पर विदेशी वक्ताओं ने भी अपने विचार रखे. श्रीलंका के वरिष्ठ सलाहकार सतत विकास एवं वन मंत्रालय मिस्टर उच्चिता डि जोयसा ने पर्यावरण परिवर्तन और सतत विकास पर चर्चा करते हुए कहा कि हमें विकास के साथ संरक्षण पर बल देना चाहिए. सतत स्थाई विकास पर ध्यान केन्द्रित किया जाना चाहिए. भविष्य की पीढ़ी और पर्यावरण को ध्यान में रखकर ही विकास करना चाहिए. विश्व के 193 देशों के द्वारा न्यूयार्क में किए गए पर्यावरणीय विमर्श और उसके निष्कर्षों को संपूर्ण विश्व में लागू किए जाने के प्रयास किए जाने चाहिए. पृथ्वी के भविष्य पर चिंतन करना अनिवार्य है. पर्यावरणीय स्तर पर नवीन विश्व नीति को तैयार करना चाहिए. गरीबी के लिए भोजन, स्वास्थ्य, स्वच्छ जल, प्रदान करने हेतु प्रयास किए जाने चाहिए.

अमेरिका के न्यूयार्क स्थित सिटी यूनिवर्सिटी की प्रो. रेबेक्का ब्रेट्सपीस ने कहा कि भोजन के मानकीकरण और फूड सिक्योरिटी को बढ़ावा देने के साथ ही भोजन की बर्बादी को राकने हेतु विशेष प्रयास किए जाने चाहिए.
अमेरिका की ओक्लाहामा यूनिवर्सिटी के डॊ. सुभाष ने कहा कि प्राचीन धंधों या प्राचीन व्यवसाय पद्धतियों को लुप्त होने से बचाने का प्रयास करना चाहिए. भारतीय संस्कृति के पर्यावरणीय पक्षों को उजागर करने पर बल देना चाहिए. आत्म विद्या और प्राचीन भारतीय विज्ञान को प्रसारित करना चाहिए. जड़-चेतनमय विज्ञान के विकास पर बल देना चाहिए.
संयुक्त राज्य अमेरिका से आए वैदिक शिक्षाविद डेविड फ्राले (पंडित वामदेव शास्त्री) ने कहा कि आयुर्वेद और योग वेदांत का आधुनिकीकरण करना चाहिए, ताकि वह अत्यधिक प्रभावी बन सके. एलोपैथिक की अपेक्षा आयुर्वेद पर विशेष बल दिया जाना चाहिए. आयुर्वेद और योग की शिक्षा प्रत्येक बच्चे को बाल्यावस्था से दिया जाना अनिवार्य होना चाहिए. संयुक्त राज्य अमेरिका के ही वैदिकवेत्ता माइकल ए. क्रीमो (धु्रपद कर्मा) ने कहा कि वैदिक ज्ञान और संस्कृति के अध्ययन को बढ़ावा देना चाहिए. शांति और सद्भाव के गुरुकुल शिक्षा को बढ़ावा दिया जाना चाहिए.

अमेरिका से आई योगिनी साम्भवी ने कहा कि समझ हमारी मूल प्रकृति है, सबसे पहले हमें अपने आप को ही समझने की आवश्यकता है.
दक्षिण कोरिया के प्रो. गी लोंग ली ने कहा कि दर्द से हमें भागना नहीं चाहिए, हम इसी के माध्यम से विवेक, मुक्ति और निर्वाण प्राप्त कर सकते हैं.
जापान से आए यसुआ कामाता ने कहा कि हर किसी को पूर्णतावादी सोच की ओर बढ़ना चाहिए. संकीर्ण मानसिक स्थिति से बचना चाहिए.
थाइलैंड से आए पर्यावरणविद् बिक्कुनी धर्मनंदा ने कहा कि महिलाओं पहले से ही सशक्त हैं, बस उनकी शक्ति को छीना न जाए, उन्हें आगे बढ़ने का भरपूर मौका दिया जाना चाहिए. उन्हें आगे बढ़ने के पर्याप्त अवसर प्रदान करने चाहिए.
कम्बोडिया के गेसी सम्पटेन ने कहा कि योग मनुष्य का अंतिम सत्य है, और किसी किताब से आप इसे नहीं सीख सकते, इसे केवल अभ्यास से ही सीखा जा सकता है. अतः योग और ध्यान के व्यावहारिक पहलू पर ध्यान देना चाहिए.
कम्बोडिया के ही सॊन सुबर्ट ने कहा कि किसान जो हमारा पेट भरते हैं, उनके आत्म सम्मान और गरिमा का सरकार विशेष ध्यान रखना चाहिए.

बांग्लादेश के मुख्य सूचना आयुक्त मोहम्मद ग़ुलाम रहमान ने कहा कि मीडिया को महिलाओं के सकारात्मक स्वरूप और उनके लिए अनुकूल वातावारण को तैयार करने हेतु भरसक प्रयास करने चाहिए.
डॊ. सच्चिदानंद जोशी ने कहा कि मीडिया की स्वतंत्रता के साथ उसकी विश्वसनीयता बनी रहे, इसके लिए भारतीय प्रेस परिषद की तरह एथिकल रेगुलेटरी अथॊरिटी बनाने की आवश्यकता है. बार काउंसिल ऒ इंडिया की तरह ही पत्रकारों का भी पंजीकरण जरूरी होना चाहिए. पत्रकार बनने के लिए न्यूनतम मानदंड स्थापित करने की आवश्यकता है.
श्री सक्रांत सानु ने कहा कि पारम्परिक शिक्षा पद्धति को पुनर्जीवित करना होगा. मीडिया की विश्वसनीयता को बढ़ाने के लिए पत्रकारों को प्राप्त सुविधाओं का पत्रकारों द्वारा खुलासा किया जाना चाहिए. कोई भी देश अपनी भाषा के बिना विकसित नहीं हो सकता, लिहाजा मातृभाषा में शिक्षण तंत्र को विकसित करने की आवश्कता है.
प्रो. टीएन सिंह ने कहा कि शिक्षात्मक उपलब्धियों को जनमाध्यमों द्वारा सही माध्यम से सही लोगों तक पहुंचाना चाहिए. मीडिया को खबरें उन्हीं संदर्भों में दिखानी चाहिए, जो समाज के लिए उपयोगी हैं. शिक्षा के क्षेत्र में जो अच्छा काम कर रहे हैं, उन्हें मीडिया द्वारा महत्व दिया जाना चाहिए.
डॊ. विनय सहस्त्रबुद्धे ने स्वच्छता पर चर्चा करते हुए कहा कि जिस ग्रामीण परिवार के पास अपना शौचालय नहीं होगा, उसे चुनाव लड़ने से वंचित कर दिया जाना चाहिए. उन्होंने कहा कि किसी भी कीमत पर पानी को खुला न छोड़ा जाए.
पांडिचेरी स्थित अरविन्दो आश्रम के श्रद्धालु रनाडे ने कहा कि हर किसी को चाहिए कि वह अपने में सातत्य भाव, एकत्व भाव, अनन्तता बोध और भारतीय बोध का विस्तार करता करे.

विचार कुंभ आयोजन समिति के अध्यक्ष अनिल माधव दवे ने जैविक खेती को प्रोत्साहित करने पर बल देते हुए कहा कि किसानों को शून्य बजट खेती के लिए (सुभाष पालेकर मॊडल) प्रेरित किया जाए. देशी गायों को प्रत्येक परिवार में पाल कर कृषि को संबल दिया जा सकता है.

अंतर्राष्ट्रीय विचार महाकुंभ के आयोजन के माध्यम से भारत की गौरवशाली परंपरा को जीवित रखने का प्रयास किया गया. जिस प्रकार वक्ताओं ने देश और समाज से जुड़े विषयों पर विचार-विमर्श किया और जनहित में कार्य करने का आह्वान किया, उसे देखते हुए कहा जा सकता है कि विचार महाकुंभ अपने उद्देश्य में सफ़ल रहा है.

Saturday, May 7, 2016

काव्य संग्रह ’बिखरने से बचाया जाए’ का लोकार्पण


दिल्ली के कन्सटीट्यूशन क्लब (डिप्टी चेयरमैन हॉल) में आज शाम लेखिका श्रीमती अलका सिंह के काव्य संग्रह ’बिखरने से बचाया जाए’ का लोकार्पण प्रख्यात साहित्यकार एवं आलोचक डॊ. नामवर सिंह ने किया. इस मौक़े पर उन्होंने कहा कि हिंदी में ग़ज़ल लिखना मुश्किल काम है. बहुत कम लोग ही लिखते हैं, लेकिन अलका सिंह की किताब एक उम्मीद जगाती है कि कविता, ग़ज़लें और मुक्तक को आने वाली पीढ़ी ज़िंदा रखेंगी. यह अनूठा काव्य संग्रह है. उन्होंने कहा कि लोकार्पण कार्यक्रम में इतने लोगों का जुटना अपने आप में मायने रखता है. राजनीति करने वालों ने दिल्ली को उजाड़ दिया है, यह केवल राजधानी बन कर न रहे, बिखरने से बचे. इसके लिए कविताएं ज़रूरी हैं. ’ज़रूरी तो नहीं खुशियां ही मिलें दामन में, कुछ ग़मो को भी तो सीने से लगाया जा’ बेहतरीन शेअर है.

समीक्षक अनंत विजय ने कहा कि यह संग्रह कॉकटेल है, जिसमे ग़ज़लें, कविताएं और मुक्तक हैं. हिंदी साहित्य में प्रेम का भाव है, लेकिन इस संग्रह ने नई उम्मीद जगाई है. रिश्तों को लेकर लेखिका की बेचैनी साफ़ झलकती है.
’दाग़ अच्छे है’ में अंग्रेज़ी के शब्दो का प्रयोग धूप में मोती की तरह है. आधुनिक युग की त्रासदी ’सुख बेच दिए, सुविधाओं की ख़ातिर’ में साफ़ झलकती है. शब्दों के साथ ठिठोली क़ाबिले-तारीफ़ है.

कवयित्री अनामिका ने कहा कि लेखिका की सोच व्यापक है, समावेशी है समेटने की कोशिश है. स्पष्ट और मुखर होकर बेबाकी से हर बात कही गई है. कई आयामों को छूती ये रचनाएं सीधे मन को छूती हैं.
अमरनाथ अमर ने कहा की कविता कई सवाल उठाती है और समाधान देती है. "अपना कफ़न ओढ़ कर सोने लगे हैं लोग" विश्व स्थिति को व्यक्त करती है. मंच संचालन माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल में सहायक प्राध्यापक डॊ. सौरभ मालवीय ने किया. सार्थक पहल का यह आयोजन प्रवक्ता डॉट कॉम तथा नया मीडिया मंच के संयुक्त तत्वावधान में हुआ. इस अवसर पर साहित्य और पत्रकारिता के क्षेत्र की जानी मानी हस्तियां मौजूद थीं.
लोकार्पण समारोह की एक झलक
 
 
 
आयोजन के व्यवस्था पक्ष में पीछे खड़े अनिल पांडेय जी साथ ही प्रवक्ता डॉट काम के भारत भूषण और संजीव सिन्हा साथ ही सामाजिक कार्यकर्ता अमरनाथ झा सहित अन्य साथी.

Friday, May 6, 2016

साहित्य और समाज


डॊ. सौरभ मालवीय
साहित्य समाज का दर्पण है, समाज का प्रतिबिम्ब है, समाज का मार्गदर्शक है तथा समाज का लेखा-जोखा है. किसी भी राष्ट्र या सभ्यता की जानकारी उसके साहित्य से प्राप्त होती है. साहित्य लोकजीवन का अभिन्न अंग है.  किसी भी काल के साहित्य से उस समय की परिस्थितियों, जनमानस के रहन-सहन, खान-पान व अन्य गतिविधियों का पता चलता है. समाज साहित्य को प्रभावित करता है और साहित्य समाज पर प्रभाव डालता है. दोनों एक सिक्के के दो पहलू हैं. साहित्य का समाज से वही संबंध है, जो संबंध आत्मा का शरीर से होता है. साहित्य समाज रूपी शरीर की आत्मा है. साहित्य अजर-अमर है. महान विद्वान योननागोची के अनुसार समाज नष्ट हो सकता है, राष्ट्र भी नष्ट हो सकता है, किन्तु साहित्य का नाश कभी नहीं हो सकता.

साहित्य संस्कृत के ’सहित’ शब्द से बना है. संस्कृत के विद्वानों के अनुसार साहित्य का अर्थ है- "हितेन सह सहित तस्य भवः” अर्थात कल्याणकारी भाव.  कहा जा सकता है कि साहित्य लोककल्याण के लिए ही सृजित किया जाता है. साहित्य का उद्देश्य मनोरंजन करना मात्र नहीं है, अपितु इसका उद्देश्य समाज का मार्गदर्शन करना भी है. राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त के शब्दों में-
केवल मनोरंजन न कवि का कर्म होना चाहिए
उसमें उचित उपदेश का भी मर्म होना चाहिए
महान साहित्यकारों ने साहित्य को लेकर अपने विचार व्यक्त किए हैं. बीसवीं शताब्दी के हिन्दी के प्रमुख साहित्यकार आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने साहित्य को ‘जनता की चित्तवृत्ति का संचित प्रतिबिंब’ माना है. आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी ने साहित्य को ‘ज्ञानराशि का संचित कोश’ कहा है. पंडित बाल कृष्ण भट्ट साहित्य को ‘जन समूह के हृदय का विकास’ मानते हैं.

प्राचीन काल में भारतीय सभ्यता अति समृद्ध थी. हमारी सभ्यता इतनी उन्नत थी कि हम आज भी उस पर गर्व करते हैं. किसी भाषा के वाचिक और लिखित सामग्री को साहित्य कह सकते हैं. विश्व में प्राचीन वाचिक साहित्य आदिवासी भाषाओं में प्राप्त होता है. भारतीय संस्कृत साहित्य ऋग्वेद से प्रारंभ होता है. व्यास, वाल्मीकि जैसे पौराणिक ऋषियों ने महाभारत एवं रामायण जैसे महाकाव्यों की रचना की. भास, कालिदास एवं अन्य कवियों ने संस्कृत में नाटक लिखे, साहित्य की अमूल्य धरोहर है. भक्त साहित्य में अवधी में गोस्वामी तुलसीदास, बृज भाषा में सूरदास, मारवाड़ी में मीरा बाई, खड़ीबोली में कबीर, रसखान, मैथिली में विद्यापति आदि प्रमुख हैं. जिस राष्ट्र और समाज का साहित्य जितना अधिक समृद्ध होगा, वह राष्ट्र और समाज भी उतना ही समृद्ध होगा. किसी राष्ट्र और समाज की स्थिति जाननी हो, तो उसका साहित्य देखना चाहिए.

मानव सभ्यता के विकास में साहित्य का महत्वपूर्ण योगदान रहा है. विचारों ने साहित्य को जन्म दिया तथा साहित्य ने मानव की विचारधारा को गतिशीलता प्रदान की, उसे सभ्य बनाने का कार्य किया. मानव की विचारधारा में परिवर्तन लाने का कार्य साहित्य द्वारा ही किया जाता है. इतिहास साक्षी है कि किसी भी राष्ट्र या समाज में आज तक जितने भी परिवर्तन आए, वे सब साहित्य के माध्यम से ही आए. साहित्यकार समाज में फैली कुरीतियों, विसंगतियों, विकॄतियों, अभावों, विसमताओं, असमानताओं आदि के बारे में लिखता है, इनके प्रति जनमानस को जागरूक करने का कार्य करता है. साहित्य जनहित के लिए होता है. जब सामाजिक जीवन में नैतिक मूल्यों का पतन होने लगता है, तो साहित्य जनमानस मार्गदर्शन करता है.
मानव को जन्म से लेकर मृत्यु तक जीवन के हर क्षेत्र में समाज की आवश्यकता पड़ती है. मानव समाज का एक अभिन्न अंग है. जीवन में मानव के साथ क्या घटित होता है, उसे साहित्यकार शब्दों में रचकर साहित्य की रचना करता है, अर्थात साहित्यकार जो देखता है, अनुभव करता है, चिंतन करता है, विश्लेषण करता है, उसे लिख देता है. साहित्य सृजन के लिए विषयवस्तु समाज के ही विभिन्न पक्षों से ली जाती है. साहित्यकार साहित्य की रचना करते समय अपने विचारों और कल्पना को भी सम्मिलित करता है.

वर्तमान में मीडिया समाज के लिए मज़बूत कड़ी साबित हो रहा है. समाचार-पत्रों की प्रासंगिकता सदैव रही है और भविष्य में भी रहेगी. मीडिया में परिवर्तन युगानुकूल है, जो स्वाभाविक है, लेकिन भाषा की दृष्टि से समाचार-पत्रों में गिरावट देखने को मिल रही है. इसका बड़ा कारण यही लगता है कि आज के परिवेश में समाचार-पत्रों से साहित्य लुप्त हो रहा है, जबकि साहित्य को समृद्ध करने में समाचार-पत्रों की महती भूमिका रही है, परंतु आज समाचार-पत्रों ने ही स्वयं को साहित्य से दूर कर लिया है, जो अच्छा संकेत नहीं है. आज आवश्यकता है कि समाचार-पत्रों में साहित्य का समावेश हो और वे अपनी परंपरा को समृद्ध बनाएं. वास्तव में पहले के संपादक समाचार-पत्र को साहित्य से दूर नहीं मानते थे, बल्कि त्वरित साहित्य का दर्जा देते थे. अब न उस तरह के संपादक रहे, न समाचार-पत्रों में साहित्य के लिए स्थान. साहित्य मात्र साप्ताहिक छपने वाले सप्लीमेंट्‌स में सिमट गया है. समाचार-पत्रों से साहित्य के लुप्त होने का एक बड़ा कारण यह भी है कि अब समाचार-पत्रों में संपादक का दायित्व ऐसे लोग निभा रहे हैं, जिनका साहित्य से कभी कोई सरोकार नहीं रहा. समाचार-पत्रों के मालिकों को ऐसे संपादक चाहिएं, जो उन्हें मोटी धनराशि कमाकर दे सकें. समाचार-पत्रों को अधिक से अधिक विज्ञापन दिला सकें, राजनीतिक गलियारे में उनकी पहुंच बढ़ सके.



इस सबके बीच कुछ समाचार-पत्र ऐसे भी हैं, जो साहित्य को संजोए हुए हैं. साहित्य की अनेक पत्रिकाएं भी प्रकाशित हो रही हैं, परंतु उनके पास पर्याप्त संसाधन न होने के कारण उन्हें आर्थिक समस्याओं का सामना करना पड़ता है. साहित्य ने सदैव राष्ट्र और समाज को नई दिशा देने का कार्य किया है. साहित्य जनमानस को सकारात्मक सोच तथा लोककल्याण के कार्यों के लिए प्रेरणा देने का कार्य करता है.  साहित्य के विकास की कहानी मानव सभ्यता के विकास की गाथा है, इसलिए यह अति आवश्यक है कि साहित्य लेखन निरंतर जारी रहना चाहिए, अन्यथा सभ्यता का विकास अवरुद्ध हो जाएगा.

Thursday, May 5, 2016

'बिखरने से बचाया जाए' काव्य संग्रह का लोकार्पण कल


नई दिल्ली. आगामी 7 मई दिन (शनिवार) को कन्सटीट्यूशन क्लब (डिप्टी चेयरमैन हॉल) में शाम चार बजे लेखिका श्रीमती अलका सिंह के काव्य संग्रह ’बिखरने से बचाया जाए’ का लोकार्पण प्रख्यात साहित्यकार एवं आलोचक डॊ. .नामवर सिंह द्वारा किया जाएगा. इस साहित्य समागम का आयोजन नया मीडिया मंच और प्रवक्ता.कॉम के संयुक्त तत्वाधान में किया जा रहा है. कार्यक्रम की अध्यक्षता डॊ. नामवर सिंह करेंगे तथा बतौर वक्ता साहित्यकार एवं सुप्रसिद्ध कवयित्री डॊ.अनामिका, श्री अमरनाथ अमर, कार्यक्रम निर्देशक दुरदर्शन, नई दिल्ली तथा वरिष्ठ पत्रकार एवं समीक्षक अनंत विजय होंगे. मंच संचालन माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल में सहायक प्राध्यापक डॊ. सौरभ मालवीय करेंगे. लेखिका अलका सिंह ने बताया कि कार्यक्रम में और भी कई लेखक, कवि और पत्रकार अपनी उपस्थिति दर्ज कराएंगे.

Wednesday, May 4, 2016

सद गुरु का सानिध्य


मैं कभी मेधावी छात्र नहीं रहा जबकि बारहवी तक विज्ञान संकाय का विद्यार्थी था फिर स्नातक हिन्दी साहित्य में, स्नातकोत्तर प्रसारण पत्रकारिता में और PhD भी मीडिया में ही पूर्ण की. उन दिनों उदंडता, कुतर्क और विवाद यह मेरे स्वभाव का अंग था. प्रायः किसी न किसी से बहसबाजी हो ही जाती और उसका अंत विवाद के साथ होता. इस कारण मेरी छवि ठीक नहीं बन रही थी. इसी बीच मुझे संघ कार्यालय पर रहने का अवसर मिला. यहां यह बताना चाहूँगा कि संघ कार्यालय अर्थात संघ के पूर्णकालिक प्रचारक का निवास (प्रचारक वह होता है, जो अपना पूरा जीवन संघ कार्य के लिए देता है) कार्यालय की दिनचर्या सुनिश्चित है. प्रातः जागरण मंत्र से प्रारम्भ होकर जलपान, भोजन, संध्या और रात्रि भोजन, विश्राम तक सब कुछ समयबद्ध रहता. अनुशासन और आध्यात्मिक वातावरण के कारण लगता की कार्यालय एक मन्दिर है.
कार्यालय पर रहते हुए मेरे श्रद्धा के केन्द्र में अनेक ऋषितुल्य प्रचारक हैं, जिनका जिक्र अभी और करूँगा. इसी क्रम में उस समय देवरिया के जिला प्रचारक श्री बालमुकुन्द जी से परिचय हुआ. बालमुकुंद जी इतिहास में स्नातकोत्तर, बीएड और PhD हैं. स्वभावतया मिलनसार, मृदुभाषी, सरल-सहज हैं, जो प्रचारक वृत्ति होती ही है. मैं अपने गाँव देवरिया जाता रहता था. इस कारण इनसे आत्मीयता बढ़ती गई. पहली यात्रा वैष्णव देवी 1999 में बालमुकुंद जी के साथ हुई. समय की गति बढ़ती रही और अपने जीवन की यात्रा होती रही. इनके साथ कुशीनगर, मऊ, आजमगढ़ आदि जिलों मे मोटरसाइकिल से खूब घूमा.
एक घटना का जिक्र करना चाहूँगा. बालमुकुंद जी बस्ती में विभाग प्रचारक थे. नगर के एक कार्यकर्ता के पुत्र का विवाह सम्पन्न हुआ. पुत्र भी स्वयंसेवक है. दोनों लोग कार्यालय आए और इस खुशी के अवसर पर भाई साहब को एक घड़ी दी. अगले दिन जब मैं वापस आने लगा, तो बालमुकुंद जी ने वह घड़ी मुझे दी. मैं हतप्रभ था. भाई साहब बोले "आप विश्विद्यालय में पढ़ते हैं, समय को समझें." इसी मंत्र ने मुझे स्वयं को और समय को समझने की शक्ति विकसित की. और आज भी मैं समझने का सार्थक प्रयास कर रहा हूँ.
ऐसे सदगुरु का आज आशीर्वाद भोपाल में प्राप्त है. माननीय डॉ.बालमुकुन्द जी वर्तमान में इतिहास संकलन योजना के राष्ट्रीय संगठन मंत्री हैं, केंद्र दिल्ली है.

 


साहित्य और समाज


डॊ. सौरभ मालवीय
साहित्य समाज का दर्पण है, समाज का प्रतिबिम्ब है, समाज का मार्गदर्शक है तथा समाज का लेखा-जोखा है. किसी भी राष्ट्र या सभ्यता की जानकारी उसके साहित्य से प्राप्त होती है. साहित्य लोकजीवन का अभिन्न अंग है.  किसी भी काल के साहित्य से उस समय की परिस्थितियों, जनमानस के रहन-सहन, खान-पान व अन्य गतिविधियों का पता चलता है. समाज साहित्य को प्रभावित करता है और साहित्य समाज पर प्रभाव डालता है. दोनों एक सिक्के के दो पहलू हैं. साहित्य का समाज से वही संबंध है, जो संबंध आत्मा का शरीर से होता है. साहित्य समाज रूपी शरीर की आत्मा है. साहित्य अजर-अमर है. महान विद्वान योननागोची के अनुसार समाज नष्ट हो सकता है, राष्ट्र भी नष्ट हो सकता है, किन्तु साहित्य का नाश कभी नहीं हो सकता.

साहित्य संस्कृत के ’सहित’ शब्द से बना है. संस्कृत के विद्वानों के अनुसार साहित्य का अर्थ है- "हितेन सह सहित तस्य भवः” अर्थात कल्याणकारी भाव.  कहा जा सकता है कि साहित्य लोककल्याण के लिए ही सृजित किया जाता है. साहित्य का उद्देश्य मनोरंजन करना मात्र नहीं है, अपितु इसका उद्देश्य समाज का मार्गदर्शन करना भी है. राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त के शब्दों में-
केवल मनोरंजन न कवि का कर्म होना चाहिए
उसमें उचित उपदेश का भी मर्म होना चाहिए
महान साहित्यकारों ने साहित्य को लेकर अपने विचार व्यक्त किए हैं. बीसवीं शताब्दी के हिन्दी के प्रमुख साहित्यकार आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने साहित्य को ‘जनता की चित्तवृत्ति का संचित प्रतिबिंब’ माना है. आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी ने साहित्य को ‘ज्ञानराशि का संचित कोश’ कहा है. पंडित बाल कृष्ण भट्ट साहित्य को ‘जन समूह के हृदय का विकास’ मानते हैं.

प्राचीन काल में भारतीय सभ्यता अति समृद्ध थी. हमारी सभ्यता इतनी उन्नत थी कि हम आज भी उस पर गर्व करते हैं. किसी भाषा के वाचिक और लिखित सामग्री को साहित्य कह सकते हैं. विश्व में प्राचीन वाचिक साहित्य आदिवासी भाषाओं में प्राप्त होता है. भारतीय संस्कृत साहित्य ऋग्वेद से प्रारंभ होता है. व्यास, वाल्मीकि जैसे पौराणिक ऋषियों ने महाभारत एवं रामायण जैसे महाकाव्यों की रचना की. भास, कालिदास एवं अन्य कवियों ने संस्कृत में नाटक लिखे, साहित्य की अमूल्य धरोहर है. भक्त साहित्य में अवधी में गोस्वामी तुलसीदास, बृज भाषा में सूरदास, मारवाड़ी में मीरा बाई, खड़ीबोली में कबीर, रसखान, मैथिली में विद्यापति आदि प्रमुख हैं. जिस राष्ट्र और समाज का साहित्य जितना अधिक समृद्ध होगा, वह राष्ट्र और समाज भी उतना ही समृद्ध होगा. किसी राष्ट्र और समाज की स्थिति जाननी हो, तो उसका साहित्य देखना चाहिए.

मानव सभ्यता के विकास में साहित्य का महत्वपूर्ण योगदान रहा है. विचारों ने साहित्य को जन्म दिया तथा साहित्य ने मानव की विचारधारा को गतिशीलता प्रदान की, उसे सभ्य बनाने का कार्य किया. मानव की विचारधारा में परिवर्तन लाने का कार्य साहित्य द्वारा ही किया जाता है. इतिहास साक्षी है कि किसी भी राष्ट्र या समाज में आज तक जितने भी परिवर्तन आए, वे सब साहित्य के माध्यम से ही आए. साहित्यकार समाज में फैली कुरीतियों, विसंगतियों, विकॄतियों, अभावों, विसमताओं, असमानताओं आदि के बारे में लिखता है, इनके प्रति जनमानस को जागरूक करने का कार्य करता है. साहित्य जनहित के लिए होता है. जब सामाजिक जीवन में नैतिक मूल्यों का पतन होने लगता है, तो साहित्य जनमानस मार्गदर्शन करता है.
मानव को जन्म से लेकर मृत्यु तक जीवन के हर क्षेत्र में समाज की आवश्यकता पड़ती है. मानव समाज का एक अभिन्न अंग है. जीवन में मानव के साथ क्या घटित होता है, उसे साहित्यकार शब्दों में रचकर साहित्य की रचना करता है, अर्थात साहित्यकार जो देखता है, अनुभव करता है, चिंतन करता है, विश्लेषण करता है, उसे लिख देता है. साहित्य सृजन के लिए विषयवस्तु समाज के ही विभिन्न पक्षों से ली जाती है. साहित्यकार साहित्य की रचना करते समय अपने विचारों और कल्पना को भी सम्मिलित करता है.

वर्तमान में मीडिया समाज के लिए मज़बूत कड़ी साबित हो रहा है. समाचार-पत्रों की प्रासंगिकता सदैव रही है और भविष्य में भी रहेगी. मीडिया में परिवर्तन युगानुकूल है, जो स्वाभाविक है, लेकिन भाषा की दृष्टि से समाचार-पत्रों में गिरावट देखने को मिल रही है. इसका बड़ा कारण यही लगता है कि आज के परिवेश में समाचार-पत्रों से साहित्य लुप्त हो रहा है, जबकि साहित्य को समृद्ध करने में समाचार-पत्रों की महती भूमिका रही है, परंतु आज समाचार-पत्रों ने ही स्वयं को साहित्य से दूर कर लिया है, जो अच्छा संकेत नहीं है. आज आवश्यकता है कि समाचार-पत्रों में साहित्य का समावेश हो और वे अपनी परंपरा को समृद्ध बनाएं. वास्तव में पहले के संपादक समाचार-पत्र को साहित्य से दूर नहीं मानते थे, बल्कि त्वरित साहित्य का दर्जा देते थे. अब न उस तरह के संपादक रहे, न समाचार-पत्रों में साहित्य के लिए स्थान. साहित्य मात्र साप्ताहिक छपने वाले सप्लीमेंट्‌स में सिमट गया है. समाचार-पत्रों से साहित्य के लुप्त होने का एक बड़ा कारण यह भी है कि अब समाचार-पत्रों में संपादक का दायित्व ऐसे लोग निभा रहे हैं, जिनका साहित्य से कभी कोई सरोकार नहीं रहा. समाचार-पत्रों के मालिकों को ऐसे संपादक चाहिएं, जो उन्हें मोटी धनराशि कमाकर दे सकें. समाचार-पत्रों को अधिक से अधिक विज्ञापन दिला सकें, राजनीतिक गलियारे में उनकी पहुंच बढ़ सके.

इस सबके बीच कुछ समाचार-पत्र ऐसे भी हैं, जो साहित्य को संजोए हुए हैं. साहित्य की अनेक पत्रिकाएं भी प्रकाशित हो रही हैं, परंतु उनके पास पर्याप्त संसाधन न होने के कारण उन्हें आर्थिक समस्याओं का सामना करना पड़ता है. साहित्य ने सदैव राष्ट्र और समाज को नई दिशा देने का कार्य किया है. साहित्य जनमानस को सकारात्मक सोच तथा लोककल्याण के कार्यों के लिए प्रेरणा देने का कार्य करता है.  साहित्य के विकास की कहानी मानव सभ्यता के विकास की गाथा है, इसलिए यह अति आवश्यक है कि साहित्य लेखन निरंतर जारी रहना चाहिए, अन्यथा सभ्यता का विकास अवरुद्ध हो जाएगा.

Tuesday, May 3, 2016

ज़िंदगी की असली उड़ान अभी बाक़ी है


ज़िंदगी की असली उड़ान अभी बाक़ी है
ज़िंदगी के कई इम्तेहान अभी बाक़ी हैं
स्नातक प्रथम वर्ष (इलेक्ट्रानिक मीडिया) के ये छात्र मेरे पास आए और बोले कि एक वेबसाइट और डॉक्यूमेंट्री के लिए हम आप से चर्चा करेंगे. भविष्य के इन युवा पत्रकारों को हार्दिक शुभकामनाएं.

Monday, May 2, 2016

जो भी करों शिद्दत से करो

 
इस नदी की धार में ठंडी हवा आती तो है
नाव जर्जर ही सही, लहरों से टकराती तो है

अल्पसंख्यकवाद से मुक्ति पर विचार हो

  - डॉ. सौरभ मालवीय      भारत एक विशाल देश है। यहां विभिन्न समुदाय के लोग निवास करते हैं। उनकी भिन्न-भिन्न संस्कृतियां हैं , परन्तु सबकी...