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Sunday, January 11, 2026

युवाओं के प्रेरणा स्रोत हैं स्वामी विवेकानन्द


डॉ. सौरभ मालवीय  
स्वामी विवेकानन्द ने भारतीय दर्शन से विश्व को परिचित करवाया। वह ज्ञान का अथाह भंडार थे। उनकी शिक्षाएं अनमोल हैं, तभी तो वह आज भी विश्व में करोड़ों लोगों के लिए प्रेरणा का स्रोत बनी हुई हैं। उनका आदर्श वाक्य है- "उठो, जागो और तब तक मत रुको जब तक लक्ष्य प्राप्त न हो जाए।"  यह केवल एक वाक्य नहीं है, अपितु यह सफलता का मंत्र है। यदि हम इसे अपने जीवन में धारण कर लें, तो किसी भी कार्य में सफलता निश्चित है।   

शिक्षा प्रणाली 
स्वामी विवेकानन्द भारतीय शिक्षा के संबंध में गुरुकुल शिक्षा प्रणाली को महत्व देते थे। वह वैदिक एवं संस्कारों युक्त शिक्षा के प्रबल समर्थक थे। वह कहते थे कि शिक्षा वही है, जो बालक के शारीरिक, मानसिक, आध्यात्मिक एवं चारित्रिक गुणों का विकास कर सके। शिक्षा गुरुगृह में ही प्राप्त की जा सकती है। शिक्षा मनुष्य को उसके आदर्श और असीम विकास की ओर ले जाने की प्रक्रिया है। शिक्षा बालक का शारीरिक, मानसिक, नैतिक तथा आध्यात्मिक विकास करता है। पढ़ने के लिए आवश्यक है एकाग्रता, एकाग्रता के लिए आवश्यक है ध्यान, ध्यान से ही हम इंद्रियों पर संयम रखकर एकाग्रता प्राप्त कर सकते है। जिस शिक्षा से हम अपना जीवन निर्माण कर सकें, मनुष्य बन सकें, चरित्र गठन कर सकें और विचारों का सामंजस्य कर सकें वहीं वास्तव में शिक्षा कहलाने योग्य है। उनका मानना था कि मनुष्य अंतिम श्वास तक सीखता है। इसलिए वह कहते थे कि जब तक जीना, तब तक सीखना, अनुभव ही जगत में सर्वश्रेष्ठ शिक्षक है। स्वयं को कभी कमजोर मत समझो, क्योंकि ये सबसे बड़ा पाप है। दिन में एक बार स्वयं से अवश्य बात करो, अन्यथा आप विश्व के सबसे महत्वपूर्ण व्यक्ति से बात करने का अवसर खो देंगे। इसका तात्पर्य है कि मनुष्य स्वयं से भी प्रेम करे, स्वयं को भी मान दे। यदि वह स्वयं को मान देगा, तो इससे उसके आत्मविश्वास में वृद्धि होगी।    
वास्तव में प्राचीन काल में बालक गुरुकुल में ही निवास करते थे। सदैव गुरु की निगरानी में रहने के कारण बाल्यकाल से ही उनका चरित्र निर्माण आरंभ हो जाता था। यह वह समय होता है जब बालक गीली मिट्टी के समान होते हैं। इस आयु में उन्हें जैसा आकार दिया जाए, वह उसी में ढल जाते हैं। उस समय शिक्षा महादान की भांति थी। विद्यार्थियों को शिक्षा नि:शुल्क प्रदान की जाती थी। इसका संपूर्ण व्यय राजा अथवा शासन वहन करता था। उनके आवास, भोजन, वस्त्र, चिकित्सा आदि की व्यवस्था शासन द्वारा की जाती थी। शिक्षा की यह एक उत्तम व्यवस्था थी। इसे आज भी आदर्श माना जाता है।  

आध्यात्मिक शिक्षा 
स्वामी विवेकानन्द केवल अक्षर ज्ञान को शिक्षा नहीं मानते थे। उनका कहना था कि शिक्षा आध्यात्मिक जागरूकता प्रदान करने वाली होनी चाहिए, जिससे अधिक शक्ति एवं आत्मविश्वास पैदा हो। वह युवाओं को आध्यात्म और योग के प्रति जागरूक करते थे। उनका मानना था कि आध्यात्म हमारी आत्मा को पवित्र करता है। यह मन को शांति प्रदान करता है। आध्यात्मिक व्यक्ति समाज को आदर्श समाज बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसकी प्रकार योग शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य के लिए अति आवश्यक है। योग करने से शरीर स्वस्थ रहता है। शरीर के स्वस्थ रहने से मन भी स्वस्थ रहता है।      
           
स्वामीजी आत्मनिर्भरता को महत्व देते थे। उनके अनुसार दूसरों पर निर्भर रहना मूर्खता है। उनका यह कथन सही है। मनुष्य को अपने परिश्रम से सबकुछ अर्जित करना चाहिए। दूसरों पर निर्भर रहने वाले लोग जहां अपना आत्मविश्वास खो देते हैं, वहीं वे समाज में अपने लिए विशेष सम्मान भी अर्जित नहीं कर पाते। उद्यम से सबकुछ प्राप्त किया जा सकता है। स्वामीजी कहते थे कि पवित्रता, धैर्य और उद्यम ये तीनों गुण एक साथ समायोजित होते हैं। बुराई एवं अपवाद की चिंता किए बिना कार्य करो, सफलता अवश्य प्राप्त होगी। शिक्षा केवल परीक्षा उत्तीर्ण करने और कुछ जीविका प्राप्त करने से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है। ऐसी शिक्षा जो केवल आजीविका कमाने में सहायता प्रदान करती है, वह महान मूल्य नहीं रखती है।

महिला शिक्षा 
स्वामी विवेकानन्द ने महिलाओं के साथ भेदभाव करने का जमकर विरोध किया। उन्होंने कहा था कि समाज में महिलाओं के साथ भेदभाव नहीं किया जाना चाहिए, तभी हमारा समाज इस संकीर्ण सोच से बाहर आएगा। जिस दिन महिलाओं के साथ किसी भी प्रकार से भेदभाव नहीं किया जाएगा, उस दिन हमारा राष्ट्र एवं समाज विश्व में सर्वोपरि होगा। उन्होंने महिलाओं को शिक्षित करने पर विशेष बल दिया। वे कहते थे कि सभी प्राणियों में वही एक आत्मा विद्यमान है, इसलिए महिलाओं पर अनुचित नियंत्रण सर्वथा अवांछनीय है। वैदिक कालीन मैत्रेयी, गार्गी आदि पुण्य स्मृति महिलाओं ने ऋषियों का स्थान प्राप्त कर लिया था। सभी उन्नत राष्ट्रों ने महिलाओं को समुचित स्थान देकर महानता प्राप्त की है। जो देश, राष्ट्र महिलाओं का आदर नहीं करते, वे कभी बड़े नहीं हो पाए और न भविष्य में बड़े होंगे। 
उल्लेखनीय है कि 12 जनवरी 1863 को कलकत्ता के कायस्थ परिवार में जन्मे स्वामी विवेकानन्द ने अमेरिका के शिकागो में आयोजित विश्व धर्म सम्मेलन में हिंदू धर्म का प्रतिनिधित्व कर उसे सार्वभौमिक पहचान दिलाई। उनके बचपन का नाम नरेन्द्रनाथ दत्त था। उनके पिता विश्वनाथ दत्त कलकत्ता उच्च न्यायालय के एक प्रसिद्ध अधिवक्ता थे। उनकी माता भुवनेश्वरी देवी धार्मिक विचारों की गृहिणी थीं। वह बाल्यावस्था से ही कुशाग्र बुद्धि के थे। उनके घर में नियमपूर्वक प्रतिदिन पूजा-पाठ होता था। साथ ही नियमित रूप से भजन-कीर्तन भी होता रहता था। परिवार के धार्मिक वातावरण का उन पर भी प्रभाव गहरा पड़ा। वह अपने गुरु रामकृष्ण देव से अत्यधिक प्रभावित थे। उन्होंने अपने गुरु से ही यह ज्ञान प्राप्त किया कि समस्त जीव स्वयं परमात्मा का ही अंश हैं, इसलिए मानव जाति की सेवा द्वारा परमात्मा की भी सेवा की जा सकती है।

ऐतिहासिक भाषण 
स्वामी विवेकानन्द ने 11 सितंबर 1893 को अमेरिका के शिकागो की धर्म संसद में ऐसा भाषण दिया था, जिसने समस्त विश्व के समक्ष भारत की गौरान्वित करने वाली छवि प्रस्तुत की थी। अपने भाषण में उन्होंने कई महत्वपूर्ण बिन्दुओं पर प्रकाश डालते हुए कहा था- “अमरीकी भाइयों और बहनों, आपने जिस सौहार्द और स्नेह के साथ हम लोगों का स्वागत किया है, उसके प्रति आभार प्रकट करने के निमित्त खड़े होते समय मेरा हृदय अवर्णनीय हर्ष से पूर्ण हो रहा है। संसार में संन्यासियों की सबसे प्राचीन परम्परा की ओर से मैं आपको धन्यवाद देता हूं, धर्मों की माता की ओर से धन्यवाद देता हूं और सभी सम्प्रदायों एवं मतों के कोटि कोटि हिन्दुओं की ओर से भी धन्यवाद देता हूं। 
मैं इस मंच पर से बोलने वाले उन कतिपय वक्ताओं के प्रति भी धन्यवाद ज्ञापित करता हूं, जिन्होंने प्राची के प्रतिनिधियों का उल्लेख करते समय आपको यह बताया है कि सुदूर देशों के ये लोग सहिष्णुता का भाव विविध देशों में प्रचारित करने के गौरव का दावा कर सकते हैं। मैं एक ऐसे धर्म का अनुयायी होने में गर्व का अनुभव करता हूं, जिसने संसार को सहिष्णुता तथा सार्वभौम स्वीकृत- दोनों की ही शिक्षा दी हैं।
हम लोग सब धर्मों के प्रति केवल सहिष्णुता में ही विश्वास नहीं करते वरन समस्त धर्मों को सच्चा मान कर स्वीकार करते हैं। मुझे ऐसे देश का व्यक्ति होने का अभिमान है, जिसने इस पृथ्वी के समस्त धर्मों और देशों के उत्पीड़ितों और शरणार्थियों को आश्रय दिया है। मुझे आपको यह बतलाते हुए गर्व होता हैं कि हमने अपने वक्ष में उन यहूदियों के विशुद्धतम अवशिष्ट को स्थान दिया था, जिन्होंने दक्षिण भारत आकर उसी वर्ष शरण ली थी जिस वर्ष उनका पवित्र मन्दिर रोमन जाति के अत्याचार से धूल में मिला दिया गया था।
ऐसे धर्म का अनुयायी होने में मैं गर्व का अनुभव करता हूं, जिसने महान जरथुष्ट जाति के अवशिष्ट अंश को शरण दी और जिसका पालन वह अब तक कर रहा है। भाइयो मैं आप लोगों को एक स्रोत की कुछ पंक्तियां सुनाता हूं, जिसकी आवृति मैं बचपन से कर रहा हूं और जिसकी आवृति प्रतिदिन लाखों मनुष्य किया करते हैं -
रुचीनां वैचित्र्यादृजुकुटिलनानापथजुषाम्। नृणामेको गम्यस्त्वमसि पयसामर्णव इव॥ 
अर्थात जैसे विभिन्न नदियां भिन्न भिन्न स्रोतों से निकलकर समुद्र में मिल जाती हैं उसी प्रकार हे प्रभो! भिन्न भिन्न रुचि के अनुसार विभिन्न टेढ़े-मेढ़े अथवा सीधे रास्ते से जानेवाले लोग अन्त में तुझमें ही आकर मिल जाते हैं।“

राष्ट्रीय युवा दिवस
स्वामी विवेकानन्द के जन्म दिवस 12 जनवरी को प्रतिवर्ष राष्ट्रीय युवा दिवस के रूप में मनाया जाता है। उल्लेखनीय है कि विश्व के अधिकांश देशों में कोई न कोई दिन युवा दिवस के रूप में मनाया जाता है। संयुक्त राष्ट्र संघ के निर्णयानुसार वर्ष 1985 को अंतरराष्ट्रीय युवा वर्ष घोषित किया गया। प्रथम बार वर्ष 2000 में अंतरराष्ट्रीय युवा दिवस का आयोजन आरंभ किया गया था। संयुक्त राष्ट्र ने 17 दिसंबर 1999 को प्रत्येक वर्ष 12 अगस्त को अंतरराष्ट्रीय युवा दिवस के रूप में मनाने की घोषणा की थी। अंतरराष्ट्रीय युवा दिवस मनाने का अर्थ है कि सरकार युवा के मुद्दों और उनकी बातों पर ध्यान आकर्षित करे। भारत में इसका प्रारंभ वर्ष 1985 से हुआ, जब सरकार ने स्वामी विवेकानन्द के जन्म दिवस पर अर्थात 12 जनवरी को प्रतिवर्ष राष्ट्रीय युवा दिवस के रूप में मनाने की घोषणा की। युवा दिवस के रूप में स्वामी विवेकानन्द का जन्मदिवस चुनने के बारे में सरकार का विचार था कि स्वामी विवेकानन्द का दर्शन एवं उनका जीवन भारतीय युवकों के लिए प्रेरणा का बहुत बड़ा स्रोत हो सकता है।

Wednesday, December 24, 2025

राष्ट्र को समर्पित रहा अटलजी का जीवन


डॉ. सौरभ मालवीय  
भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता एवं पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी एक कुशल राजनीतिज्ञ, प्रखर चिंतक, गंभीर पत्रकार, सहृदय कवि एवं लेखक थे। साहित्य उन्हें विरासत में प्राप्त हुआ था। उन्होंने पत्रकारिता से जीवन प्रारंभ किया तथा साहित्य एवं राजनीति में अपार ख्याति अर्जित की। उनका संपूर्ण जीवन राष्ट्र को समर्पित रहा। वह कहते थे- “मैं चाहता हूं भारत एक महान राष्ट्र बने, शक्तिशाली बने, संसार के राष्ट्रों में प्रथम पंक्ति में आए।”
 
प्रारंभिक जीवन 
अटल बिहारी वाजपेयी का जन्म 25 दिसंबर 1924 को मध्य प्रदेश के ग्वालियर में हुआ था। उनके पिता पंडित कृष्ण बिहारी वाजपेयी अध्यापक थे और माता कृष्णा देवी गृहिणी थीं। वह बचपन से ही अंतर्मुखी एवं प्रतिभाशाली थे। उनकी प्रारंभिक शिक्षा बड़नगर के गोरखी विद्यालय में हुई। यहां से उन्होंने आठवीं कक्षा तक की शिक्षा प्राप्त की। जब वह पांचवीं कक्षा में थे तब उन्होंने प्रथम बार भाषण दिया था। बड़नगर में उच्च शिक्षा की व्यवस्था न होने के कारण उन्हें ग्वालियर जाना पड़ा। वहां के विक्टोरिया कॉलेजियट स्कूल से उन्होंने इंटरमीडिएट तक की पढ़ाई की। इस विद्यालय में रहते हुए उन्होंने वाद-विवाद प्रतियोगिताओं में भाग लिया तथा प्रथम पुरस्कार भी जीता। उन्होंने विक्टोरिया कॉलेज से स्नातक स्तर की शिक्षा ग्रहण की। कॉलेज जीवन में ही उन्होंने राजनीतिक गतिविधियों में भाग लेना आरंभ कर दिया था। आरंभ में वह छात्र संगठन से जुड़े। इसके पश्चात वह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़ गए। ग्वालियर से स्नातक उपाधि प्राप्त करने के पश्चात् वह कानपुर चले गए। यहां उन्होंने डीएवी महाविद्यालय से कला में स्नातकोत्तर उपाधि प्रथम श्रेणी में प्राप्त की। तदुपरांत वह पीएचडी करने के लिए लखनऊ गए, परंतु वह सफल नहीं हो सके, क्योंकि पत्रकारिता से जुड़ने के कारण उन्हें अध्ययन के लिए समय नहीं मिल रहा था। 

पत्रकार के रूप में अटलजी 
अटलजी लखनऊ आकर समाचार-पत्र राष्ट्रधर्म के सह सम्पादक के रूप में कार्य करने लगे। वह मासिक पत्रिका राष्ट्रधर्म के प्रथम संपादक भी रहे हैं। अटलजी कहते थे- “छात्र जीवन से ही मेरी इच्छा संपादक बनने की थी। लिखने-पढ़ने का शौक और छपा हुआ नाम देखने का मोह भी। इसलिए जब एमए की पढ़ाई पूरी की और कानून की पढ़ाई अधूरी छोड़ने के पश्चात् सरकारी नौकरी न करने का पक्का इरादा बना लिया और साथ ही अपना पूरा समय समाज की सेवा में लगाने का मन भी। उस समय पूज्य भाऊ राव देवरस जी के इस प्रस्ताव को तुरंत स्वीकार कर लिया कि संघ द्वारा प्रकाशित होने वाले राष्ट्रधर्म के संपादन में कार्य करूंगा, श्री राजीवलोचन जी भी साथ होंगे। अगस्त 1947 में पहला अंक निकला और इसने उस समय के प्रमुख साहित्यकार सर सीताराम, डॉ. भगवान दास, अमृतलाल नागर, श्री नारायण चतुर्वेदी, आचार्य वृहस्पति व प्रोफेसर धर्मवीर को जोड़कर धूम मचा दी।“
कुछ समय के पश्चात 14 जनवरी 1948 को भारत प्रेस से मुद्रित होने वाला दूसरा समाचार पत्र पांचजन्य भी प्रकाशित होने लगा। अटलजी इसके प्रथम संपादक बनाए गए। 15 अगस्त 1947 को देश स्वतंत्र हो गया था। कुछ समय के पश्चात 30 जनवरी 1948 को महात्मा गांधी की हत्या हुई। इसके पश्चात् भारत सरकार ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को प्रतिबंधित कर दिया। इसके साथ ही भारत प्रेस को बंद कर दिया गया, क्योंकि भारत प्रेस भी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रभाव क्षेत्र में थी। भारत प्रेस के बंद होने के पश्चात अटलजी इलाहाबाद चले गए। यहां उन्होंने क्राइसिस टाइम्स नामक अंग्रेजी साप्ताहिक के लिए कार्य करना आरंभ कर दिया। परंतु जैसे ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर लगा प्रतिबंध हटा, वह पुन: लखनऊ आ गए और उनके संपादन में स्वदेश नामक दैनिक समाचार-पत्र प्रकाशित होने लगा, परंतु हानि के कारण स्वदेश को बंद कर दिया गया। वर्ष 1949 में काशी से सप्ताहिक ’चेतना’ का प्रकाशन प्रारंभ हुआ। इसके संपादक का कार्यभार अटलजी को सौंपा गया। उन्होंने इसे सफलता के शिखर तक पहुंचा दिया। 

कवि एवं लेखक   
अटलजी ने बचपन से ही कविताएं लिखनी प्रारंभ कर दी थीं। स्वदेश-प्रेम, जीवन-दर्शन, प्रकृति तथा मधुर भाव की कविताएं उन्हें बाल्यावस्था से ही आकर्षित करती रहीं। उनकी कविताओं में प्रेम, करुणा एवं वेदना है। एक पत्रकार के रूप में वह बहुत गंभीर दिखाई देते थे। उनके लेखों में ज्वलंत प्रश्न हैं, समस्याओं का उल्लेख है तो उनका समाधान भी है। वह सामाजिक विषयों को उठाते एवं अतीत की भूलों से शिक्षा लेते हुए सुधार की बात करते थे। एक राजनेता के रूप में जब वह भाषण देते हैं, तो उसमें क्रांति के स्वर सुनाई देते थे। वह कहते थे- “मेरे भाषणों में मेरा लेखक ही बोलता है, पर ऐसा नहीं कि राजनेता मौन रहता है। मेरे लेखक और राजनेता का परस्पर समन्वय ही मेरे भाषणों में उतरता है। यह जरूर है कि राजनेता ने लेखक से बहुत कुछ पाया है। साहित्यकार को अपने प्रति सच्चा होना चाहिए। उसे समाज के लिए अपने दायित्व का सही अर्थों में निर्वाह करना चाहिए। उसके तर्क प्रामाणिक हो। उसकी दृष्टि रचनात्मक होनी चाहिए। वह समसामयिकता को साथ लेकर चले, पर आने वाले कल की चिंता जरूर करे। वे भारत को विश्वशक्ति के रूप में देखना चाहते हैं।“ 

अटलजी ने कई पुस्तकें लिखी थीं, जिनमें अमर बलिदान, अमर आग है, बिंदु-बिंदु विचार, सेक्युलरवाद, 
कैदी कविराय की कुंडलियां, मृत्यु या हत्या, जनसंघ और मुसलमान, मेरी इक्यावन कविताएं, न दैन्यं न पलायनम, मेरी संसदीय यात्रा (चार खंड), संकल्प-काल एवं गठबंधन की राजनीति सम्मिलित हैं। इनके अतिरिक्त उनकी कई और पुस्तकें भी हैं। फोर डिकेड्स इन पार्लियामेंट, जो 1957 से 1995 तक के उनके भाषणों का संग्रह है। इसी तरह न्यू डाइमेंशन ऒफ इंडियाज फ़ॊरेन पॊलिसी, जिसमें विदेश मंत्री रहते हुए उनके 1977 से 1979 तक के भाषण संकलित हैं। संसद में तीन दशक (तीन खंड), जो 1957 से 1992 तक संसद में दिए गए भाषणों का संग्रह है। प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी (तीन खंड), जिसमें 1996 से 2004 उनके भाषण सम्मिलित हैं। राजनीति की रपटीली राहें, जो उनके साक्षात्कार और भाषणों का संग्रह है। शक्ति से शांति तक, जिसमें उनके प्रधानमंत्री कार्यकाल के भाषण संकलित हैं। कुछ लिख कुछ भाषण, जो पत्रकारिता के समय के लेख और भाषण सम्मिलित हैं। राजनीति के उस पार, जिसमें उनके भाषण संकलित हैं। इसके अलावा उनके लेख, उनकी कविताएं विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुईं, जिनमें राष्ट्रधर्म, पांचजन्य, धर्मयुग, नई कमल ज्योति, साप्ताहिक हिंदुस्तान, कादिम्बनी और नवनीत आदि सम्मिलित हैं। 

प्रधानमंत्री के रूप में विशेष कार्य  
अटलजी 16 मई 1996 को देश के प्रधानमंत्री बने तथा 28 मई को उन्होंने त्यागपत्र दे दिया। इस कारण वह मात्र 13 दिनों तक ही प्रधानमंत्री रहे। इसके पश्चात 9 मार्च 1998 को वह द्वितीय बार प्रधानमंत्री बने। वर्ष 1999 के लोकसभा चुनाव में एनडीए को स्पष्ट बहुमत प्राप्त हुआ। वह 13 अक्टूबर 1999 को तृतीय बार प्रधानमंत्री बने तथा 22 मई 2004 तक अपना कार्यकाल पूर्ण किया। उन्होंने अपने कार्यकाल में अनेक उत्कृष्ट कार्य किए। उन्होंने वर्ष 1998 में पोखरण में हुए परमाणु परीक्षण के पश्चात् संसद को संबोधत किया। उन्होंने कहा- “यह कोई आत्मश्लाघा के लिए नहीं था। ये हमारी नीति है और मैं समझता हूं कि देश की नीति है यह कि न्यूनतम अवरोध होना चाहिए। वह विश्वसनीय भी होना चाहिए। इसीलिए परीक्षण का निर्णय लिया गया।“

उन्होंने वर्ष 1999 में भारतीय संचार निगम लिमिटेड अर्थात बीएसएनएल का एकाधिकार समाप्त करने के लिए नई टेलिकॉम नीति लागू की। इसके कारण लोगों को सस्ती दरों पर दूरभाष सेवा उपलब्ध हो सकी। उन्होंने भारत एवं पाकिस्तान के आपसी संबंधों को सुधारने के प्रयास को गति प्रदान की। उन्होंने फरवरी 1999 में दिल्ली-लाहौर बस सेवा प्रारंभ की। प्रथम बस सेवा से वह स्वयं लाहौर गए। उन्होंने सर्व शिक्षा अभियान को बढ़ावा दिया। उन्होंने 6 से 14 वर्ष के बच्चों को नि:शुल्क शिक्षा प्रदान करने का अभियान प्रारंभ किया। उन्होंने अपनी लिखी पंक्तियों ‘स्कूल चले हम’ से इसे प्रचारित किया। इससे निर्धनता के कारण पढ़ाई छोड़ने वाले बच्चों को अत्यंत लाभ हुआ। वह कहते थे- “शिक्षा के द्वारा व्यक्ति के व्यक्तित्व का विकास होता है, व्यक्तित्व के उत्तम विकास के लिए शिक्षा का स्वरूप आदर्शों से युक्त होना चाहिए। हमारी माटी में आदर्शों की कमी नहीं है। शिक्षा द्वारा ही हम नवयुवकों में राष्ट्र प्रेम की भावना जाग्रत कर सकते हैं।“

उन्होंने संविधान में संशोधन की आवश्यकता पर विचार करने के लिए एक फरवरी 2000 को संविधान समीक्षा का राष्ट्रीय आयोग गठित किया। उन्होंने वर्ष 2001 में होने वाली जातिगत जनगणना पर रोक लगाई। 
उन्होंने 13 दिसंबर 2001 को संसद पर हुए हमले को गंभीरता से लिया तथा आतंकवाद निरोधी पोटा कानून बनाया। यह पूर्व के टाडा कानून की तुलना में अत्यधिक कठोर था। उन्होंने 32 संगठनों पर पोटा के अंतर्गत प्रतिबंध लगाया। उन्होंने दिल्ली, मुंबई, चेन्नई एवं कोलकाता को जोड़ने के लिए चतुर्भुज सड़क परियोजना लागू की। इसके साथ ही उन्होंने ग्रामीण क्षेत्रों के लिए प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना लागू की। इससे आर्थिक विकास को गति मिली। उन्होंने राष्ट्रीय स्तर पर नदियों को जोड़ने की योजना का ढांचा भी बनवाया, परंतु इस पर कार्य नहीं हो पाया।

सम्मान 
अटलजी ने एक पत्रकार, साहित्यकार, कवि एवं देश के प्रधानमंत्री, संसद की विभिन्न महत्वपूर्ण स्थायी समितियों के अध्यक्ष एवं विपक्ष के नेता के रूप में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनके उत्कृष्ट कार्यों के लिए उन्हें कई पुरस्कारों से सम्मानित किया गया। राष्ट्र के प्रति उनकी समर्पित सेवाओं के लिए 25 जनवरी 1992 में राष्ट्रपति ने उन्हें पद्म विभूषण से सम्मानित किया। उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान ने 28 सितंबर 1992 को उन्हें ’हिंदी गौरव’ से सम्मानित किया। अगले वर्ष 20 अप्रैल 1993 को कानपुर विश्वविद्यालय ने उन्हें डी लिट की उपाधि प्रदान की। उनके सेवाभावी और स्वार्थ त्यागी जीवन के लिए उन्हें 1 अगस्त 1994 में लोकमान्य तिलक पुरस्कार से सम्मानित किया गया। इसके पश्चात 17 अगस्त 1994 को संसद ने उन्हें श्रेष्ठ सासंद चुना गया तथा पंडित गोविंद वल्लभ पंत पुरस्कार से सम्मानित किया। इसके पश्चात् 27 मार्च 2015 भारत रत्न पुरस्कार से सम्मानित किया गया। इतने महत्वपूर्ण सम्मान पाने वाली अटलजी कहते थे- “मैं अपनी सीमाओं से परिचित हूं। मुझे अपनी कमियों का अहसास है। निर्णायकों ने अवश्य ही मेरी न्यूनताओं को नजर अंदाज करके मुझे निर्वाचित किया है। सद्भाव में अभाव दिखाई नहीं देता है। यह देश बड़ा है अद्भुत है, बड़ा अनूठा है। किसी भी पत्थर को सिंदूर लगाकर अभिवादन किया जा सकता है।“ 

Sunday, December 21, 2025

समाज सुधारक पंडित मदनमोहन मालवीय


डॉ. सौरभ मालवीय 

पंडित मदनमोहन मालवीय महान स्वतंत्रता सेनानी होने के साथ-साथ एक कुशल राजनीतिज्ञ, सफल शिक्षाविद एवं महान समाज सुधारक भी थे। उन्होंने जातिवाद और दलितों की स्थिति सुधारने के लिए भरसक प्रयत्न किए। उनके अनुसार- “यदि आप मानव आत्मा की आंतरिक शुद्धता को स्वीकार करते हैं, तो आप या आपका धर्म किसी भी व्यक्ति के स्पर्श या संगति से कभी भी अशुद्ध या अपवित्र नहीं हो सकता है। हम मानते हैं कि धर्म चरित्र का आधार है और मानव सुख का सबसे बड़ा स्त्रोत है। धार्मिकता और धर्म कायम रहने दें, और सभी समुदाय और समाज प्रगति करें। हमारी प्यारी मातृभूमि को अपना खोया हुआ गौरव वापस दिलाएं। भारत के पुत्र विजयी हों। जो इंसान अपने स्वयं की निंदा सुन लेता है वह सारे विश्व पर विजय प्राप्त कर लेता है।“ 

पंडित मदनमोहन मालवीय का जन्म 25 दिसम्बर, 1861 को उत्तर प्रदेश के इलाहबाद में हुआ था। उनके पिता का नाम ब्रजनाथ और माता का नाम भूनादेवी था। वह मालवा के मूल निवासी थे, इसलिए उन्हें मालवीय कहा जाता है। उनकी प्राथमिक शिक्षा इलाहाबाद के श्री धर्मज्ञानोपदेश पाठशाला में हुई। यहां सनातन धर्म की शिक्षा दी जाती थी। इसके पश्चात उन्होंने वर्ष 1879 में इलाहाबाद जिला स्कूल से प्रवेश परीक्षा उत्तीर्ण की तथा उन्होंने म्योर सेंट्रल कॉलेज से एफए की परिक्षा उत्तीर्ण की। उन्होंने कलकत्ता विश्विद्यालय से बीए की परीक्षा उत्तीर्ण की। आर्थिक स्थिति अच्छी न होने के कारण पढ़ाई के दौरान उन्हें अनेक समस्याओं का सामना करना पड़ा। उन्होंने वर्ष 1884 में इलाहाबाद के एक सरकारी स्कूल में अध्यापन का कार्य आरंभ कर दिया। यहां उन्हें 40 रुपये मासिक वेतन मिलता था। इससे उनकी आर्थिक समस्या का कुछ समाधान हुआ। उन्होंने वर्ष 1891 में एलएलबी की परीक्षा उत्तीर्ण की। उन्होंने पहले जिला न्यायालय और उसके पश्चात वर्ष 1893 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय में अधिवक्ता के रूप में अपना कार्य प्रारम्भ किया।

राजनीति में भी पंडित मदनमोहन मालवीय की गहरी रुचि थी। वह वर्ष 1909 में लाहौर, 1918 और 1930 में दिल्ली और 1932 में कोलकाता में कांग्रेस के अधिवेशन के अध्यक्ष रहे। वह वर्ष 1903-18 के दौरान प्रांतीय विधायी परिषद और 1910-20 तक केंद्रीय परिषद के सदस्य रहे। वह 1916-18 के दौरान भारतीय विधायी सभा के निर्वाचित सदस्य रहे। वर्ष 1930 में जब महात्मा गांधी ने नमक सत्याग्रह और सविनय अवज्ञा आंदोलन आरम्भ किया, तो उन्होंने उसमें भाग लिया और जेल गए। वह 50 वर्षों तक कांग्रेस में सक्रिय रहे। उन्होंने वर्ष 1937 में राजनीति से संन्यास ले लिया तथा अपना सारा ध्यान सामाजिक कार्यों पर केंद्रित कर दिया। उन्होंने महिलाओं की शिक्षा पर बल दिया। उन्होंने बाल विवाह का विरोध किया तथा विधवा पुनर्विवाह का समर्थन किया।  

वह भारतीय संस्कृति के कट्टर समर्थक थे। वह समस्त कर्मकांड, रीति रिवाज, मूर्तिपूजन आदि को हिन्दू धर्म का मौलिक अंग मानते थे। इसलिए धार्मिक मंच पर आर्यसमाज की विचार धारा का विरोध करने के लिए उन्होंने जनमत संगठित करना आरम्भ किया। उनके प्रयासों के कारण ही पहले 'भारतधर्म महामंडल तथा उसके पश्चात 'अखिल भारतीय सनातन धर्म' सभा की स्थापना हुई। वह हिन्दी को बहुत महत्त्व देते थे। वह कहते थे- “भाषा की उन्नति करने में हमारा सर्वप्रथम कर्तव्य यह है कि हम स्वच्छ भाषा लिखें। पुस्तकें भी ऐसी ही भाषा में लिखी जाएं। ऐसा यत्न हो कि जिससे जो कुछ लिखा जाए, वह हिन्दी भाषा में लिखा जाए। जब भाषा में शब्द न मिलें तब संस्कृत से लीजिए या बनाइए।”

वह विद्यार्थियों को देश का भावी कर्णधार मानते थे. उनके अनुसार- "भारतीय विद्यार्थियों के मार्ग में आने वाली वर्तमान कठिनाइयों का कोई अंत नहीं है। सबसे बड़ी कठिनता यह है कि शिक्षा का माध्यम हमारी मातृभाषा न होकर एक अत्यंत दुरुह विदेशी भाषा है। सभ्य संसार के किसी भी अन्य भाग में जन-समुदाय की शिक्षा का माध्यम विदेशी भाषा नहीं है। अंग्रेजी माध्यम भारतीय शिक्षा में सबसे बड़ा विघ्न है।“ वह मानते थे कि केवल हिन्दी में ही राष्ट्रभाषा बनने की क्षमता है। वह हिन्दी एवं संस्कृत भाषा के प्रबल समर्थक थे। हिन्दी के बारे में उनका कहना था- “हिंदुस्तान की उन्नति हिन्दी को अपनाने से ही हो सकती है।” उनके अनुसार- “बिजली की रोशनी से रात्रि का कुछ अंधकार दूर हो सकता है, किंतु सूर्य का काम बिजली नहीं कर सकती। इसी भांति हम विदेशी भाषा से सूर्य का प्रकाश नहीं कर सकते। साहित्य और देश की उन्नति अपने देश की भाषा द्वारा ही हो सकती है।”

उन्होंने उत्तर प्रदेश के न्यायालयों और कार्यालयों में हिन्दी को व्यवहार योग्य भाषा के रूप में स्वीकृत कराया। इससे पूर्व केवल उर्दू ही न्यायालयों और सरकारी कार्यालयों की भाषा थी। उन्होंने वर्ष 1890 में हिन्दी के प्रचार व प्रसार के लिए जन आंदोलन आरम्भ किया था। उनके प्रयासों का ही परिणाम है कि सरकारी कार्यालयों में हिन्दी में कामकाज होने लगा। उनकी सहायता से वर्ष 1910 में इलाहाबाद में 'अखिल भारतीय हिन्दी साहित्य सम्मेलन' की स्थापना की गई। वह शिक्षा को अत्यंत महत्त्व देते थे। उनके अनुसार- “शिक्षा से ही देश और समाज में नवीन उदय होता है। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की स्थापना में पंडित मदनमोहन मालवीय का योगदान था। उनकी पत्रकारिता में भी गहरी रुचि थी। उन्होंने अनेक पत्र-पत्रिकाओं के प्रकाशन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई तथा अनेक वर्षों तक कई पत्र-पत्रिकाओं के सम्पादक के रूप में कार्य किया। 
 
वह कहते थे- “भारत की एकता का मुख्य आधार है एक संस्कृति, जिसका उत्साह कभी नहीं टूटा। यही इसकी विशेषता है।“ उन्होंने वर्ष 1906 में इलाहाबाद के कुम्भ के अवसर पर सनातन धर्म के विराट अधिवेशन का आयोजन कराया। इस अवसर पर उन्होंने 'सनातन धर्म-संग्रह' नामक एक बृहत ग्रंथ तैयार करवाकर महासभा में उपस्थित किया। उन्होंने कई वर्ष तक उस सनातन धर्म सभा के अनेक विशाल अधिवेशन आयोजित करवाए। उन्होंने सनातन धर्म सभा के सिद्धांतों के प्रचार के लिए 'सनातन धर्म' नामक साप्ताहिक पत्र आरंभ किया। 

उनमें देशभक्ति की भावना कूट-कूट कर भरी हुई थी। वह युवाओं को देश के प्रति अपने कर्तव्यों का पालन करने की सीख देते हुए कहते हैं- “नागरिक का सर्वश्रेष्ठ कर्तव्य यह है कि वह मातृभूमि के सम्मान की रक्षा के लिए अपने जीवन का बालिदन कर दे। इसके साथ- साथ मैं आपको यह भी बता देना चाहता हूं कि वही कर्त्तव्य आपको यही भी सिखलाता है, इसी सेवा के लिए जीवन सुरक्षित रखा जाए और मूर्खतापूर्ण जोश में आकर शीघ्र ही समाप्त न कर दिया जाए। अतएव मैं आपसे यही चाहता हूं कि आप अपने उत्तरदायित्व को समझते हुए शुद्ध भाव से उपयुक्त संरक्षकता में रहकर देश की स्वतंत्रता के लिए अपना कार्य करें।“ वह मानते थे कि देशभक्ति सदैव राष्ट्रहित का चिंतन करने की प्रेरणा देती है। उनके अनुसार- “‘स्वराज्य का सबसे बड़ा साधन यह है कि देश में जहां तक संभव हो, प्राणी-प्राणी में देश की भक्ति का भाव बढ़ाया जाय। इससे लोगों में परस्पर प्रीति और परस्पर विश्वास बढ़ेंगे तथा बैर और फूट घटेगी। इससे और अनंत उत्तम गुण मनुष्य में उत्पन्न होंगे, जो उनको देश की सेवा करने के योग्य बनावेंगे और अनेक प्रकार के पाप तथा लज्जा के कामों से उनको बचावेंगे।“  
     
वह कहते थे- “राष्ट्रीयता उस भाव का नाम है जो कि देश के सम्पूर्ण निवासियों के हृदयों में देश-हित की लालसा के साथ व्याप रहा हो, जिसके आगे अन्य भावों की श्रेणी नीची ही रहती हो। भारत में राष्ट्रीय भाव कैसे पैदा हो? प्रत्येक भाव में भक्ति और प्रेम होते हैं और प्रत्येक प्रेम और भक्ति के आधार भी होते हैं। यह प्रकृति का नियम है कि मनुष्य जिस वस्तु से प्रेम रखता है उसका दास बन जाता है और उसके आगे अन्य समस्त वस्तुओं को तुच्छ मानता है। धन ही से प्रेम रखने वाले धर्म और यश की कुछ भी अपेक्षा नही करते; और जिनको धर्म और यश प्यारा है, उनके आगे धन मिट्टी जैसा ही है। देशभक्ति का संचार हमारे ह्रदय से स्वार्थ को निकाल कर फेंक देगा। हम अदूरदर्शी, स्वार्थी और खुशामदियों की तरह ऐसे कार्य कदापि नही करेंगे जिनसे कि देशवासियों को हानि पहुंचे; बल्कि दूरदर्शी, परमार्थी, सत्यशील और दृढ़ताप्रिय आत्माओं की भांति, असंख्यों कष्ट उठाते हुए भी वही करेंगे, जिसमें देश का भला हो। निर्धन धनवान, निर्बल बलवान और मुर्ख बुद्धिमान हो जाएं, प्रत्येक प्रकार के सामाजिक दुःख मिटें और दुर्भिक्ष आदि विपत्तियां दूर होकर लाखों बिलबिलाती हुई आत्माओं को सुख पहुंचे। देश-भक्ति द्वारा इतने धर्मों का संपादन होता हुआ देख कर भी यदि कोई धर्म के आगे देशभक्ति को कुछ नही समझता, उस पुरुष को जान लीजिये कि वह धर्म के तत्व ही को नही पहचानता। इसमें संदेह नहीं कि जो देशवासी अपनी मातृ-भूमि की गुरुता को भली भांति समझ लेंगे, उनमें धर्म-भेद और वर्ण-भेद रहते हुए भी एकता का अभाव नहीं पाया जाएगा। यदि आप विद्वान है, बलवान् है और धनवान हैं तो आपका धर्म यह है कि अपनी विद्या, धन और बल को देश की सेवा में लगाओ। उनकी सहायता करो जो कि तुम्हारी सहायता के भूखे है। उनको योग्य बनाओ जो कि अन्यथा अयोग्य ही बने रहेंगे।“
सामाजिक कार्यों में भी उन्होंने अपनी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने वर्ष 1919 में कुम्भ मेले के अवसर पर प्रयाग में 'प्रयाग सेवा समिति' का गठन किया. इसका उद्देश्य कुम्भ मेले में बाहर से आने वाले तीर्थयात्रियों को मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध कराना था। पंडित मदनमोहन मालवीय ने वर्ष 1913 में हरिद्वार में गंगा तट पर बांध बनाने की ब्रिटिश सरकार की योजना का जमकर विरोध किया तथा उन्हें सफलता भी प्राप्त हुई।  

वह कट्टर हिन्दू थे और हिन्दू धर्म छोड़कर जाने वाले लोगों को पुनः हिन्दू धर्म में वापस ले आते थे। उन्होंने दलितों के मंदिरों में प्रवेश निषेध की बुराई के विरुद्ध देशभर में आंदोलन चलाया। वह तीन बार हिन्दू महासभा के अध्यक्ष चुने गए। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की स्थापना उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि मानी जाती है। उन्होंने 'सत्यमेव जयते' के नारे का प्रचार-प्रसार करके इसे लोकप्रिय बनाया। बाद में यह राष्ट्रीय आदर्श वाक्य बन गया और इसे राष्ट्रीय प्रतीक के नीचे अंकित किया गया। 

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने उन्हें ‘महामना’ की संज्ञा दी थी। देश के द्वितीय राष्ट्रपति डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने उन्हें 'कर्मयोगी' कहा था। पंडित मदनमोहन मालवीय के उल्लेखनीय कार्यों के दृष्टिगत विगत 24 दिसम्बर, 2014 को देश के तत्कालीन राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने मरणोपरांत उन्हें भारत के सबसे बड़े नागरिक सम्मान 'भारत रत्न' से सम्मानित किया। 12 नवम्बर, 1946 को इलाहाबाद में उनका निधन हो गया। उन्होंने अपना जीवन राष्ट्र को समर्पित कर दिया था। उन्होंने अपनी अंतिम सांस तक जन साधारण के लिए तक संघर्ष किया। राष्ट्र उनके योगदान को कभी भूल नहीं सकता।

वर्तमान में उनकी शिक्षाएं अत्यंत प्रासंगिक हैं। आशा है कि यह स्मारिका उनकी शिक्षाओं के प्रचार-प्रसार में महत्ती भूमिका निभाएगी।  

Friday, December 5, 2025

आम्बेडकर, समरसता और संघ


डॉ. सौरभ मालवीय  
देश में सामाजिक समता एवं सामाजिक न्याय के लिए प्रमुखता से स्वर मुखर करने वालों में डॉक्टर भीमराव आम्बेडकर का नाम अग्रणीय है। उन्होंने बाल्यकाल से ही अस्पृश्यता का सामना किया था। विद्यालय से लेकर नौकरी तक उन्होंने भेदभाव का दंश झेला। इससे उनकी आत्मा चीत्कार उठी। उन्होंने अस्पृश्यता के उन्मूलन के लिए कार्य करने का संकल्प लिया। उन्होंने देशभर की यात्रा की तथा दलितों के अधिकारों के लिए स्वर मुखर किया। उन्होंने अपना संपूर्ण जीवन अस्पृश्यता के उन्मूलन के कार्यों के लिए समर्पित कर दिया। उनका मानना था कि सेवक बनकर ही कोई बड़ा कार्य किया जा सकता है। इसलिए वह कहते थे- “एक महान आदमी एक आम आदमी से इस तरह से अलग है कि वह समाज का सेवक बनने को तैयार रहता है।“

डॉक्टर भीमराव आम्बेडकर ने सामाजिक समरसता का जो स्वप्न देखा था, उसे साकार करने के लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अभियान चला रहा है। वास्तव में संघ अपने स्थापना काल से ही सामाजिक समरसता के लिए कार्य कर रहा है। डॉक्टर केशव बलिराम हेडगवार ने सामाजिक समरसता, एकता, अखंडता एवं सशक्त समाज के निर्माण के उद्देश से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की थी। उनका कहना था कि हमारा निश्चय और स्पष्ट ध्येय ही हमारी प्रगति का मूल कारण है। हम लोगों को हमेशा सोचना चाहिए कि जिस कार्य को करने का हमने प्रण किया है, और जो उद्देश्य हमारे सामने है, उसे प्राप्त करने के लिए हम कितना कार्य कर रहे हैं। प्रत्येक अधिकारी एवं शिक्षक को प्रत्येक के मन में यह विचार भर देना चाहिए कि मैं स्वयं ही संघ हूं। प्रत्येक व्यक्ति को अपने चरित्र पर विचार करना चाहिए। अपने चरित्र को कभी भी कमजोर व क्षीण न होने दें। आप इस भ्रम में न रहें कि लोग हमारी ओर नहीं देखते। वे हमारे कार्य तथा हमारे व्यक्तिगत आचरण की ओर आलोचनात्मक दृष्टि से देखते हैं। हमें केवल अपने कार्य में व्यक्तिगत चाल-चलन की दृष्टि से सावधानी नहीं बरतनी चाहिए, अपितु सामूहिक एवं सार्वजनिक जीवन में भी इसका ध्यान रखना चाहिए‌। 

वह कहते थे कि बिना कष्ट उठाए और बिना स्वार्थ त्याग किए, हमें कुछ भी फल मिलना असंभव है। अपने समाज में संगठन निर्माण कर उसे बलवान तथा अजेय बनाने के अतिरिक्त हमें और कुछ नहीं करना है। इतना कर देने पर सारा कार्य स्वयं ही हो जाएगा। हमें आज सताने वाली सारी राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक समस्याएं आसानी से हल हो जाएंगी। अनुशासन अपने संगठन की नींव है, इसी पर हमें विशाल इमारत को खड़ा करना है। किसी भी भूल से यदि नींव जरा सी भी कच्ची रह गई, तो इमारत का उस ओर का भाग ढल जाएगा। इमारत में दरार पड़ जाएगी और आखिर में वह संपूर्ण इमारत ढह जाएगी। जीवन में निस्वार्थ भावना आए बिना खरा अनुशासन निर्माण नहीं होता। 

सामाजिक समरसता के बारे में उनका कहना था कि संघ का लक्ष्य भारत राष्ट्र को पुनः परम वैभव तक ले जाना है। समरसता के बिना, समता स्थायी नहीं हो सकती, और दोनों के अभाव में राष्ट्रीयता की कल्पना भी नहीं की जा सकती। हमारा कार्य अखिल हिंदू समाज के लिए होने के कारण, उसके किसी भी अंग की उपेक्षा करने से काम नहीं चलेगा। सभी हिंदू भाइयों के साथ फिर वह किसी भी उच्च या नीच श्रेणी के समझे जाते हों, हमारा व्यवहार हर एक से प्रेम का होना चाहिए। किसी भी हिंदू भाई को नीच समझकर उसे दुत्कारना पाप है।

वह कहते थे कि संघ का कार्य सुचारू रूप से चलाने के लिए हमें लोक संग्रह के तत्वों को भली भांति समझ लेना होगा। संघ केवल स्वयंसेवकों के लिए नहीं, अपितु संघ के बाहर जो लोग हैं, उनके लिए भी है। हमारा यह कर्तव्य हो जाता है कि उन लोगों को हम राष्ट्र के उद्धार का सच्चा मार्ग बताएं। वयोवृद्ध लोगों का संघ कार्य में काफी महत्वपूर्ण स्थान है। वे संघ के महत्वपूर्ण कार्यों का दायित्व उठा सकते हैं। यदि प्रौढ़ लोग अपने प्रतिष्ठा और व्यवहार कुशलता का उपयोग संघ कार्य किए तो करें, तो युवा अधिक उत्साह से कार्य कर सकेंगे। प्रत्येक व्यक्ति को उत्साह और हिम्मत से आगे आना चाहिए, और संघ कार्यों में जुट जाना चाहिए। इस समाज को जागृत एवं संगठित करना ही राष्ट्र का जागरण एवं संगठन है। यही राष्ट्र धर्म है। ध्येय पर अविचल दृष्टि रखकर, मार्ग में मखमली बिछौने हो या कांटे बिखरे हों, उनकी चिंता न करते हुए निरंतर आगे ही बढ़ने को दृढ़ निश्चय वाले क्रियाशील तरुण खड़े करने पड़ेंगे। पूर्ण संस्कार दिए बिना, देशभक्ति का स्थाई स्वरूप निर्माण होना संभव नहीं है तथा इस प्रकार की स्थिति का निर्माण होने तक सामाजिक व्यवहार में प्रमाणिकता भी संभव नहीं।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के द्वितीय सरसंघचालक माधव सदाशिव गोलवलकर ने सामाजिक समरसता पर विचार व्यक्त करते हुए कहा था कि समरसता के लिए आत्मग्लानि दूर करने के लिए आत्मबोध को जगाना पड़ेगा, स्वार्थ के स्थान पर निस्वार्थ भाव का निर्माण करना पड़ेगा। सभी भेदों को भुलाकर एकात्मकता का भाव जागृत करना पड़ेगा।   

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में किसी भी प्रकार का भेदभाव नहीं किया जाता। महात्मा गांधी भी संघ के कार्यों से प्रभावित हुए थे। उन्होंने वर्ष 1934 में वर्धा में आयोजित राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का शिविर देखा था, जिसमें सभी जातियों के लोग सम्मिलित हुए थे। इसमें दलित समाज के लोग भी थे। उस समय राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए महात्मा गांधी ने कहा था कि आपके संगठन में अस्पृश्यता का अभाव देखकर मैं बहुत संतुष्ट हूं।     

इसी प्रकार डॉक्टर भीमराव आम्बेडकर भी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यों से प्रभावित हुए थे। उन्हें वर्ष 1939 में पुणे में आयोजित राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रशिक्षण शिविर को देखने का अवसर प्राप्त हुआ। उन्होंने अनुभव किया कि शिविर में सभी जातियों के लोग प्रशिक्षण प्राप्त कर रहे हैं। इसमें दलित समाज के लोग भी सम्मिलित थे। शिविर में सबके साथ समान व्यवहार किया जा रहा था। 

उल्लेखनीय है कि हमारे पवित्र धार्मिक ग्रंथों में समरसता का प्रमुखता से उल्लेख किया गया है। भगवदगीता में भगवान् श्रीकृष्ण ने कहा है- “पंडिता: समादर्शिन:” अर्थात विद्वान सबको समान दृष्टि से देखते हैं। कहने का अभिप्राय है कि विद्वान सबको समान मानते हैं तथा वे किसी के साथ किसी भी प्रकार का भेदभाव नहीं करते।          
भीमराव आम्बेडकर समानता पर सर्वाधिक बल देते थे। वह कहते थे कि अगर देश की अलग-अलग जातियां एक दूसरे से अपनी लड़ाई समाप्त नहीं करेंगी, तो देश एकजुट कभी नहीं हो सकता। यदि हम एक संयुक्त एकीकृत आधुनिक भारत चाहते हैं तो सभी धर्म-शास्त्रों की संप्रभुता का अंत होना चाहिए। हमारे पास यह आजादी इसलिए है ताकि हम उन चीजों को सुधार सकें, जो सामाजिक व्यवस्था, असमानता, भेदभाव और अन्य चीजों से भरी है जो हमारे मौलिक अधिकारों के विरोधी हैं। एक सफल क्रांति के लिए केवल असंतोष का होना ही काफी नहीं है अपितु इसके लिए न्याय, राजनीतिक और सामाजिक अधिकारों में गहरी आस्था का होना भी बहुत आवश्यक है। राजनीतिक अत्याचार सामाजिक अत्याचार की तुलना में कुछ भी नहीं है और जो सुधारक समाज की अवज्ञा करता है, वह सरकार की अवज्ञा करने वाले राजनीतिज्ञ से ज्यादा साहसी हैं। जब तक आप सामाजिक स्वतंत्रता हासिल नहीं कर लेते तब तक आपको कानून चाहे जो भी स्वतंत्रता देता है वह आपके किसी काम की नहीं। यदि हम एक संयुक्त एकीकृत आधुनिक भारत चाहते हैं तो सभी धर्म-शास्त्रों की संप्रभुता का अंत होना चाहिए।

भीमराव आम्बेडकर ने दलित समाज के सामाजिक एवं आर्थिक उत्थान के लिए अनेक महत्वपूर्ण कार्य किए। उनका कहना था कि आप स्वयं को अस्पृस्य न मानें, अपना घर साफ रखें। पुराने और घिनौने रीति-रिवाजों को छोड़ देना चाहिए। हमारे पास यह आजादी इसलिए है ताकि हम उन चीजों को सुधार सकें जो सामाजिक व्यवस्था, असमानता, भेद-भाव और अन्य चीजों से भरी हैं जो हमारे मौलिक अधिकारों की विरोधी हैं। राष्ट्रवाद तभी औचित्य ग्रहण कर सकता है, जब लोगों के बीच जाति, नस्ल या रंग का अंतर भुलाकर उसमें सामाजिक भ्रातृत्व को सर्वोच्च स्थान दिया जाए। 

वह कहते थे कि आदि से अंत तक हम सिर्फ एक भारतीय है। हम जो स्वतंत्रता मिली हैं उसके लिए क्या कर रहे हैं? यह स्वतंत्रता हमें अपनी सामाजिक व्यवस्था को सुधारने के लिए मिली हैं। जो असमानता, भेदभाव और अन्य चीजों से भरी हुई है, जो हमारे मौलिक अधिकारों के साथ संघर्ष करती है। स्वेतंत्रता का अर्थ साहस है, और साहस एक पार्टी में व्याक्तियों के संयोजन से पैदा होता है। वह यह भी कहते थे कि देश के विकास के लिए नौजवानों को आगे आना चाहिए। पानी की बूद जब सागर में मिलती है तो अपनी पहचान खो देती है। इसके विपरीत व्यक्ति समाज में रहता है पर अपनी पहचान नहीं  खोता। इंसान का  वन  स्वतंत्र है। वह सिर्फ समाज के विकास के लिए  पैदा  नहीं हुआ, अपितु स्वयं के विकास के  लिए भी पैदा हुआ है। 

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का मानना है कि हम लोगों को समझना चाहिए कि लौकिक दृष्टि से समाज को समर्थ, सुप्रतिष्ठित, सद्धर्माघिष्ठित बनाने में तभी सफल हो सकेंगे, जब उस प्राचीन परंपरा को हम लोग युगानुकूल बना, फिर से पुनरुज्जीवित कर पाएंगे। युगानुकूल कहने का यह कारण है कि प्रत्येक युग में वह परंपरा उचित रूप धारण करके खड़ी हुर्इ है। कभी केवल गिरि-कंदराओं में, अरण्यों में रहने वाले तपस्वी हुए तो कभी योगी निकले, कभी यज्ञ-यागादि द्वारा और कभी भगवद्-भजन करने वाले भक्तों और संतों द्वारा यह परंपरा अपने यहां चली है।

Tuesday, October 21, 2025

पंडित दीनदयाल उपाध्याय – व्यक्ति नहीं विचार दर्शन है


डॉ. सौरभ मालवीय
“भारत में रहने वाला और इसके प्रति ममत्व की भावना रखने वाला मानव समूह एक जन हैं। उनकी जीवन प्रणाली, कला, साहित्य, दर्शन सब भारतीय संस्कृति है। इसलिए भारतीय राष्ट्रवाद का आधार यह संस्कृति है। इस संस्कृति में निष्ठा रहे तभी भारत एकात्म रहेगा।” ये शब्द पंडित दीनदयाल उपाध्याय के हैं, जिन्हें जनसंघ के राष्ट्र जीवन दर्शन का निर्माता माना जाता है। वे मानते थे कि राजनीतिक जीवन दर्शन का पहला सूत्र संस्कृति निष्ठा है।
वास्तव में भारतीय ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ में विश्वास रखते हैं। यह हमारा मूल मंत्र है। इसके अनुसार भारत में सभी धर्मों को समान अधिकार प्राप्त है। इसी कारण भारत विश्व गुरु माना जाता है। पंडित दीनदयाल उपाध्याय एक राष्ट्रवादी चिंतक के रूप में जाने जाते हैं। एकात्म मानववाद के रूप में उन्होंने अपने विचारों की व्याख्या की तथा एक राष्ट्रवादी दर्शन के रूप में इसे स्थापित करने का प्रयास किया। उन्होंने एकात्म मानववाद दर्शन को जन-जन तक पहुंचाने का प्रयास किया। वे न केवल वैचारिक चुनौतियों के प्रति सजग थे, परन्तु उन चुनौतियों का सामना राष्ट्रवाद के माध्यम से करने को दृष्ट संकल्प भी प्रतीत होते हैं। भारत जैसे विशाल एवं सर्वसाधन सम्पन्न राष्ट्र जिसने अपनी ऐतिहासिक तथा सांस्कृतिक पृष्ठभूमि के आधार पर सम्पूर्ण विश्व को अपने ज्ञान पुंज से आलोकित कर मानवता का पाठ पढ़ाया तथा विश्व में जगतगुरु के पद पर प्रतिस्थापित हुआ, ऐसे विशाल राष्ट्र के पराधीनता के कारणों पर दीनदयाल जी का विचार और स्वाधीनता पश्चात् समर्थ और सशक्त भारत बनाने में उनके विचार प्रेरणास्पद हैं।
प्रसिद्ध विचारक और प्रख्यात पत्रकार पंडित दीनदयाल उपाध्याय अपने व्यस्त राजनीतिक जीवन में से अनेक वर्षों तक ऒर्गेनाइजर, राष्ट्रधर्म, पांचजन्य में तत्कालीन राजनीतिक-आर्थिक घटनाक्रम पर गम्भीर विवेचनात्मक टिप्पणियां लिखते रहे। यद्यपि विषय तत्कालीन होता या, तो भी उस पर दीनदयाल जी की टिप्पणी सामयिक के साथ-साथ बहुधा दीर्घकालीन या स्थायी महत्व की भी होती थी।
भारत को एक नई शुरुआत करनी पड़ेगी, इस बात को मानते हुए लेख में वे स्पष्टता के साथ लिखते कि फिर से वापस नहीं लौटा जा सकता। अतः दुनिया के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलना ही होगा, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि दासता के काल में आगामी विकृतियों को हम दूर करने का प्रयास न करें। वे लिखते हैं- अतः हमको सावधानी रखनी होगी कि हम अपने जर्जर शरीर को रोगमुक्त करके जब तक स्वस्थ होकर खड़े हों, तब तक बीच में ही कोई हमारे ऊपर हावी न हो जाएं। साथ ही संसार के अनेक देशों के साथ हमारे संबंध रहे हैं। हमें अनेक पुराने अप्राकृतिक संबंध तोड़ने पड़ेंगे, नवीन निर्माण करने होंगे।
अपने एकात्म मानववाद दर्शन के अंतर्गत उन्होंने राष्ट्र की चित्ति की अवधारणा को व्याख्यायित करने का निरंतर प्रयास किया। दीनदयाल जी चित्ति को राष्ट्र के अस्तित्व का मुख्य आधार मानते थे। उनका मानना था कि भारत को बलशाली और वैभवशाली तभी बनाया जा सकता है, जब भारत की चित्ति को समझा जा सके। चित्ति को बिना समझे राष्ट्र को समझना दुष्कर है तथा बिना राष्ट्र को समझे इसे बलशाली और वैभवशाली बनना असम्भव है। इस प्रश्न को रेखांकित करते हुए वे लिखते हैं-
हमारे राष्ट्र जीवन की चित्ति क्या है? हमारी आत्मा का क्या स्वरूप है? इस स्वरूप की व्याख्या करना कठिन है उसका तो साक्षात्कार ही संभव है, किंतु जिन महापुरूषों ने राष्ट्रात्मा का पूर्ण साक्षात्कार किया, जिनके जीवन में चित्ति का प्रकाश उज्ज्वलतम रहा है। उनके जीवन की ओर देखने से, उनके जीवन की क्रियाओं और घटनाओं का विश्लेषण करने से, हम अपनी चित्ति के स्वरूप की कुछ झलक पा सकते हैं। प्राचीन काल से लेकर आज तक चली आने वाली राष्ट्र पुरुषों की परंपरा के भीतर छिपे हुए सूत्र को यदि हम ढूंढें, तो संभवतया चित्ति के व्यक्त परिणाम की मीमांसा से उसके अव्यक्त कारण की भी हमको अनुभूति हो सके। जिन महान् विभूतियों के नाम स्मरण मात्र से हम अपने जीवन में दुर्बलता के क्षणों में शक्ति का अनुभव करते हैं, कायरता की कृति का स्थान वीर व्रत ले लेता है, उनके जीवन में कौन सी बात है, जो हममें इतना सामर्थ्य भर देती है? कौन सी चीज है जिसके लिए हम मर मिटने के लिए तैयार हो जाते हैं? हमारा मस्तक श्रद्धा से किसके सामने नत होता है और क्यों? वह कौन सा लक्ष्य है, जिसके चारों ओर हमारा राष्ट्र जीवन घूमता आया है? अपने राष्ट्र के किस तत्व को बचाने के लिए हमने बड़े-बड़े युद्ध किए? किसके लिए लाखों का बलिदान हुआ? उत्तर हो सकता है भारत की भूमि के लिए। किंतु भारत से तात्पर्य क्या जड़ भूमि से है? क्या हमने हिमालय के पत्थर और गंगा के जल की रक्षा की है? हमारे अवतारों ने किस हेतु जन्म लिया था? उनको हम भगवान् का अवतार क्यों कहते हैं? इस लेख में इन प्रश्नों का उत्तर ढूंढते हुए वे अनेक वैचारिक प्रश्नों का साक्षात्कार पाठकों को कराते हैं।
हमारा धर्म हमारे राष्ट्र की आत्मा है। बिना धर्म के राष्ट्र जीवन का कोई अर्थ नहीं रहता। भारतीय राष्ट्र न तो हिमालय से लेकर कन्याकुमारी तक फैले हुए भू-खंड से बन सकता है और न तीस करोड़ मनुष्यों के झुंड से। एक ऐसा सूत्र चाहिए, जो तीस करोड़ को एक-दूसरे से बांध सके, जो तीस कोटि को इस भूमि में बांध सके। वह सूत्र हमारा धर्म ही है। बिना धर्म के भारतीय जीवन का चैतन्य ही नष्ट हो जाएगा, उसकी प्रेरक शक्ति ही जाती रहेगी। अपनी धार्मिक विशेषता के कारण ही संसार के भिन्न-भिन्न जन समूहों में हम भी राष्ट्र के नाते खड़े हो सकते हैं। धर्म के पैमाने से ही हमने सबको नापा है। धर्म की कसौटी पर ही कसकर हमने खरे-खोटे की जांच की है। हमने किसी को महापुरुष मानकर पूजा है तो इसलिए कि उनके जीवन में पग-पग हमको धार्मिकता दृष्टिगोचर होती है। राम हमारे आराध्य देव बनकर रहे हैं और रावण सदा से घृणा का पात्र बना है। क्यों? राम धर्म के रक्षक थे और रावण धर्म का विनाश करना चाहता था। युधिष्ठिर और दुर्योधन दोनों भाई-भाई थे, दोनों राज्य चाहते थे, एक के प्रति हमारे मन में श्रद्धा है, तो दूसरे के प्रति घृणा।
दीनदयालजी राष्ट्र के समक्ष उपस्थित विभिन्न वैचारिक चुनौतियों के अंतर्गत द्विसंस्कृतिवाद तथा बहुसंस्कृतिवाद भी मानते हैं अपने लेख में वे भारत को एक संस्कृति वाला राष्ट्र मानते हैं। अपने लेख ‘राष्ट्रजीवन की समस्याएं’ राष्ट्रधर्म में लिखते हैं-
भारत में एक ही संस्कृति रह सकती है। एक से अधिक संस्कृतियों का नारा देश के टुकड़े-टुकड़े करके हमारे जीवन का विनाश कर देगा। अतः आज लीग का द्विसंस्कृतिवाद, कांग्रेस का प्रच्छन्न द्विसंस्कृतिवाद तथा साम्यवादियों का बहुसंस्कृतिवाद नहीं चल सकता। आज तक एक-संस्कृतिवाद को संप्रदायवाद कहकर ठुकराया गया, किंतु अब कांग्रेस के विद्वान भी अपनी गलती समझकर इस एक-संस्कृतिवाद को अपना रहे हैं। इसी भावना और विचार से भारत की एकता तथा अखंडता बनी रह सकती है तथा तभी हम अपनी संपूर्ण समस्याओं को सुलझा सकते हैं।
उनके अनुसार भारत में चार प्रधान वर्ग दिखाई पड़ते हैं, जिसकी व्याख्या उन्होंने निम्नवत् की है-
अर्थवादी पहला वर्ग, अर्थवादी संपत्ति को ही सर्वस्व समझता है तथा उसके स्वामित्व एवं वितरण में ही सब प्रकार की दुरवस्था की जड़ मानकर उसमें सुधार करना ही अपना एकमेव कर्तव्य समझता है। उसका एकमेव लक्ष्य ‘अर्थ’ है। साम्यवादी एवं समाजवादी इस वर्ग के लोग हैं। इनके अनुसार भारत की राजनीति का निर्धारण अर्थनीति के आधार पर होना चाहिए तथा संस्कृति एवं मत को वे गौण समझकर अधिक महत्व देने को तैयार नहीं हैं।
राजनीतिवादी दूसरा वर्ग है। यह जीवन का संपूर्ण महत्व राजनीतिक प्रमुख प्राप्त करने में ही समझता है तथा राजनीतिक दृष्टि से ही संस्कृति, मजहब तथा अर्थनीति की व्याख्या करता है। अर्थवादी यदि एकदम उद्योगों का राष्ट्रीयकरण अथवा बिना मुआविजा दिए जमींदारी उन्मूलन चाहता है, तो राजनीतिवादी अपने राजनीतिक कारणों से ऐसा करने में असमर्थ है। उसके लिए इस प्रकार संस्कृति एवं मजहब का भी मूल्य अपनी राजनीति के लिए ही है, अन्यथा नहीं। इस वर्ग के अधिकांश लोग कांग्रेस में हैं, जो आज भारत की राजनीतिक बागडोर संभाले हुए हैं।
मतवादी तीसरा वर्ग, मजहब परस्त या मतवादी है। इसे धर्मनिष्ठ कहना ठीक नहीं होगा, क्योंकि धर्म मजहब या मत से बड़ा तथा विशाल है। यह वर्ग अपने-अपने मजहब के सिद्धांतों के अनुसार ही देश की राजनीति अथवा अर्थनीति को चलाना चाहता है। इस प्रकार का वर्ग मुल्ला-मौलवियों अथवा रूढ़िवादी कट्टरपंथियों के रूप में अब भी थोड़ा बहुत विद्यमान है, यद्यपि आजकल उसका बहुत प्रभाव नहीं रह गया है।
संस्कृतिवादी चौथा वर्ग है। इसका विश्वास है कि भारत की आत्मा का स्वरूप प्रमुखतया संस्कृति ही है। अतः अपनी संस्कृति की रक्षा एवं विकास ही हमारा कर्तव्य होना चाहिए। यदि हमारा सांस्कृतिक ह्रास हो गया तथा हमने पश्चिम के अर्थ प्रधान अथवा भोग प्रधान जीवन को अपना लिया, तो हम निश्चित ही समाप्त हो जाएंगे। यह वर्ग भारत में बहुत बड़ा है। इसके लोग राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में तथा कुछ अंशों में कांग्रेस में भी हैं। कांग्रेस के ऐसे लोग राजनीति को केवल संस्कृति का पोषक मात्र ही मानते हैं, संस्कृति का निर्णायक नहीं। हिंदीवादी सब लोग इसी वर्ग के हैं।
जहां संस्कृतिवाद के दृष्टिकोण को सार्थक मानते हैं, वहीं इसके विभिन्न स्वरूपों एवं समस्याओं के प्रति भी सचेत हैं। संस्कृति का स्वरूप कैसा हो इसमें कौन सा तत्व हो आदि विषयों पर हो रहे विवाद को भी वे एक समस्या ही मानते हैं, वे कहते हैं-
आज भी भारत में प्रमुख समस्या सांस्कृतिक ही है। वह भी आज दो प्रकार से उपस्थित है, प्रथम तो संस्कृति को ही भारतीय जीवन का प्रथम तत्व मानना तथा दूसरे यदि इसे मान लें, तो उस संस्कृति का रूप कौन सा हो? विचार के लिए यद्यपि यह समस्या दो प्रकार की मालूम होती है, किंतु वास्तव में है एक ही। क्योंकि एक बार संस्कृति का जीवन को प्रमुख एवं आवश्यक तत्व मान लेने पर उसके स्वरूप के संबंध में झगड़ा नहीं रहता, न उसके संबंध में किसी प्रकार का मतभेद ही उत्पन्न होता है। यह मतभेद तो तब उत्पन्न होता है, जब अन्य तत्वों को प्रधानता देकर संस्कृति को उसके अनुरूप उन ढांचों में ढकने का प्रयत्न किया जाता है।
अंततः वे एक संस्कृतिवाद को ही उत्तम मार्ग मानते हैं तथा राष्ट्र के लिए आवश्यक तत्व बताते हैं वे लिखते हैं-
केवल एक-संस्कृतिवादी लोग ही ऐसे हैं, जिनके समक्ष और कोई ध्येय नहीं है तथा जैसा कि हमने देखा, संस्कृति ही भारत की आत्मा होने के कारण वे भारतीयता की रक्षा एवं विकास कर सकते हैं। शेष सब तो पश्चिम का अनुकरण करके या तो पूंजीवाद अथवा रूस की तरह आर्थिक प्रजातंत्र तथा राजनीतिक पूंजीवादी का निर्माण करना चाहते हैं। अतः उनमें सब प्रकार की संभावना होते हुए भी इस बात की संभावना कम नहीं है कि उनके द्वारा भी भारतीय आत्मा का तथा भारतीयत्व का विनाश हो जाए। अतः आज की प्रमुख आवश्यकता तो यह है कि एक-संस्कृतिवादियों के साथ पूर्ण सहयोग किया जाए। तभी हम गौरव और वैभव से खड़े हो सकेंगे तथा भारत-विभाजन जैसी भावी दुर्घटनाओं को रोक सकेंगे।
15 अगस्त, 1947 को हमने एक मोर्चा जीत लिया। हमारे देश से अंग्रेजी राज्य विदा हो गया। उस राज्य के कारण हमारी प्रतिभा के विकास में जो बाधाएं उपस्थित की जा रही थीं, उनका कारण हट गया, हम अपना विकास करने के लिए स्वतंत्र हो गए। अपनी आत्मानुभूति का मार्ग खुल गया। किंतु अभी भी मानव की प्रगति में हमको सहायता करनी है। मानव द्वारा छेड़े गए युद्ध में जिन-जिन शस्त्रों का प्रयोग हमने अब तक किया है, जिनके चलाने में हम निपुण हैं तथा जिन पर पिछली सहस्राब्दियों में जंग लग गई थी, उन्हें पुनः तीक्ष्ण करना है तथा अपने युद्ध कौशल का परिचय देकर मानव को विजय बनाना है। आज यदि हमारे मन में उन पद्धतियों के विषय में ही मोह पैदा हो जाए, जिनके पुरस्कर्ताओं से हम अब तक लड़ते रहे हैं, तो यही कहना होगा कि हम न तो स्वतंत्रता का सच्चा स्वरूप समझ पाए हैं और न अपने जीवन के ध्येय को ही पहचान पाए हैं। हमारी आत्मा ने अंग्रेजी राज्य के प्रति विद्रोह केवल इसलिए नहीं किया कि दिल्ली में बैठकर राज्य करने वाला एक अंग्रेज था, अपितु इसलिए भी कि हमारे दिन-प्रतिदिन के जीवन में हमारे जीवन की गति में विदेशी पद्धतियां, रीति-रिवाज विदेशी दृष्टिकोण और आदर्श अडंगा लगा रहे थे, हमारे संपूर्ण वातावरण को दूषित कर रहे थे, हमारे लिए सांस लेना भी दूभर हो गया था। आज यदि दिल्ली का शासनकर्ता अंग्रेज के स्थान पर हममें से ही एक, हमारे ही रक्त और मांस का एक अंश हो गया है, तो हमको इसका हर्ष है, संतोष है किंतु हम चाहते हैं कि उनकी भावनाएं और कामनाएं भी हमारी भावनाएं और कामनाएं हों। जिस देश की मिट्टी से उसका शरीर बना है, उसके प्रत्येक रंजकण का इतिहास उसके शरीर के कण-कण से प्रति ध्वनित होना चाहिए तीस कोटि के हृदयों को समष्टिगत भावनाओं से उसका हृदय उद्वेलित होना चाहिए तथा उनके जीवन के विकास के अनुकूल, उनकी प्रकृति और स्वभाव अनुसार तथा उनकी भावनाओं और कामनाओं के अनुरूप पद्धतियों की सृष्टि उसके द्वारा होनी चाहिए। यदि ऐसा नहीं होता तो हमको कहना होगा कि अभी भी स्वतंत्रता की लड़ाई बाकी है। अभी हम अपनी आत्मानुभूति में आनेवाली बाधाओं को दूर नहीं कर पाए हैं।
आर्थिक स्वाधीनता के साथ-साथ सामाजिक और सांस्कृतिक स्वतंत्रता की भी आवश्यकता है। आत्मानुभूति के प्रयत्नों में जिन सामाजिक व्यवस्थाओं एवं पद्धतियों की राष्ट्र अपनी सहायता के लिए सृष्टि करता है अथवा जिन रीति-रिवाजों में उसकी आत्मा की अभिव्यक्ति होती है, वे ही यदि कालावपात से उसके मार्ग में बाधक होकर उसके ऊपर भार रूप हो जाएं तो उनसे मुक्ति पाना भी प्रत्येक राष्ट्र के लिए आवश्यक है। यात्रा की एक मंजिल में जो साधन उपयोगी सिद्ध हुए हैं वे दूसरी मंजिल में भी उपयोगी सिद्ध होंगे यह आवश्यक नहीं। साधन तो प्रत्येक मंजिल के अनुरूप ही चाहिए तथा इस प्रकार प्रयाण करते हुए प्राचीन साधनों का मोह परतंत्रता का ही कारण हो सकता है, क्योंकि स्वतंत्रता केवल उन तंत्रों का समष्टिगत नाम है जो स्वानुभूति में सहायक होते हैं।
राष्ट्र की सांस्कृतिक स्वतंत्रता तो अत्यंत महत्व की है, क्योंकि संस्कृति ही राष्ट्र के संपूर्ण शरीर में प्राणों के समान संचार करती है। प्रकृति के तत्वों पर विलय पाने के प्रयत्न में तथा मानवानुभूति की कल्पना में मानव जिस जीवन दृष्टि की रचना करता है वह उसकी संस्कृति है। संस्कृति कभी गतिहीन नहीं होती अपितु वह निरंतर गतिशील फिर भी उसका अपना एक अस्तित्व है। नदी के प्रवाह की भांति निरंतर गतिशील होते हुए भी वह अपनी निजी विशेषताएं रखती हैं, जो उस सांस्कृतिक दृष्टिकोण को उत्पन्न करने वाले समाज के संस्कारों में तथा उस सांस्कृतिक भावना से जन्य राष्ट्र के साहित्य, कलाए दर्शन, स्मृति शास्त्र, समाज रचना इतिहास एवं सभ्यता के विभिन्न अंग अंगों में व्यक्त होती हैं। परतंत्रता के काल में इन सब पर प्रभाव पड़ जाता है तथा स्वाभाविक प्रवाह अवरुद्ध हो जाता है। आज स्वतंत्र होने पर आवश्यक है कि हमारे प्रवाह की संपूर्ण बाधाएं दूर हों तथा हम अपनी प्रतिभा अनुरूप राष्ट्र के संपूर्ण क्षेत्रों में विकास कर सकें। राष्ट्र भक्ति की भावना को निर्माण करने और उसको साकार स्वरूप देने का श्रेय भी राष्ट्र की संस्कृति को ही है तथा वही राष्ट्र की संकुचित सीमाओं को तोड़कर मानव की एकात्मता का अनुभव कराती है। अतः संस्कृति की स्वतंत्रता परमावश्यक है। बिना उसके राष्ट्र की स्वतंत्रता निरर्थक ही नहीं, टिकाऊ भी नहीं रह सकेगी।
(लेखक लखनऊ विश्वविद्यालय में पत्रकारिता विभाग के अध्यक्ष है।)

Friday, July 25, 2025

प्रभात झा जी की पुण्यतिथि


श्रद्धेय प्रभात झा जी की पुण्य स्मरण तिथि 
एक पत्रकार से राजनेता तक का सफल यात्रा करने वाले भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष, मप्र भाजपाध्यक्ष, राज्यसभा सांसद, कमल संदेश के संपादक जैसे अनेक दायित्वों का कुशलतापूर्वक निर्वहन करनेवाले स्व. श्री प्रभात झा जी की पहली पुण्यतिथि है। 
श्रद्धेय प्रभातजी को शत-शत नमन।

Sunday, June 22, 2025

युवाओं के प्रेरणा स्रोत हैं स्वामी विवेकानन्द


डॉ. सौरभ मालवीय  
स्वामी विवेकानन्द ने भारतीय दर्शन से विश्व को परिचित करवाया। वह ज्ञान का अथाह भंडार थे। उनकी शिक्षाएं अनमोल हैं, तभी तो वह आज भी विश्व में करोड़ों लोगों के लिए प्रेरणा का स्रोत बनी हुई हैं। उनका आदर्श वाक्य है- "उठो, जागो और तब तक मत रुको जब तक लक्ष्य प्राप्त न हो जाए।"  यह केवल एक वाक्य नहीं है, अपितु यह सफलता का मंत्र है। यदि हम इसे अपने जीवन में धारण कर लें, तो किसी भी कार्य में सफलता निश्चित है।   

शिक्षा प्रणाली 
स्वामी विवेकानन्द भारतीय शिक्षा के संबंध में गुरुकुल शिक्षा प्रणाली को महत्व देते थे। वह वैदिक एवं संस्कारों युक्त शिक्षा के प्रबल समर्थक थे। वह कहते थे कि शिक्षा वही है, जो बालक के शारीरिक, मानसिक, आध्यात्मिक एवं चारित्रिक गुणों का विकास कर सके। शिक्षा गुरुगृह में ही प्राप्त की जा सकती है। शिक्षा मनुष्य को उसके आदर्श और असीम विकास की ओर ले जाने की प्रक्रिया है। शिक्षा बालक का शारीरिक, मानसिक, नैतिक तथा आध्यात्मिक विकास करता है। पढ़ने के लिए आवश्यक है एकाग्रता, एकाग्रता के लिए आवश्यक है ध्यान, ध्यान से ही हम इंद्रियों पर संयम रखकर एकाग्रता प्राप्त कर सकते है। जिस शिक्षा से हम अपना जीवन निर्माण कर सकें, मनुष्य बन सकें, चरित्र गठन कर सकें और विचारों का सामंजस्य कर सकें वहीं वास्तव में शिक्षा कहलाने योग्य है। उनका मानना था कि मनुष्य अंतिम श्वास तक सीखता है। इसलिए वह कहते थे कि जब तक जीना, तब तक सीखना, अनुभव ही जगत में सर्वश्रेष्ठ शिक्षक है। स्वयं को कभी कमजोर मत समझो, क्योंकि ये सबसे बड़ा पाप है। दिन में एक बार स्वयं से अवश्य बात करो, अन्यथा आप विश्व के सबसे महत्वपूर्ण व्यक्ति से बात करने का अवसर खो देंगे। इसका तात्पर्य है कि मनुष्य स्वयं से भी प्रेम करे, स्वयं को भी मान दे। यदि वह स्वयं को मान देगा, तो इससे उसके आत्मविश्वास में वृद्धि होगी।    

वास्तव में प्राचीन काल में बालक गुरुकुल में ही निवास करते थे। सदैव गुरु की निगरानी में रहने के कारण बाल्यकाल से ही उनका चरित्र निर्माण आरंभ हो जाता था। यह वह समय होता है जब बालक गीली मिट्टी के समान होते हैं। इस आयु में उन्हें जैसा आकार दिया जाए, वह उसी में ढल जाते हैं। उस समय शिक्षा महादान की भांति थी। विद्यार्थियों को शिक्षा नि:शुल्क प्रदान की जाती थी। इसका संपूर्ण व्यय राजा अथवा शासन वहन करता था। उनके आवास, भोजन, वस्त्र, चिकित्सा आदि की व्यवस्था शासन द्वारा की जाती थी। शिक्षा की यह एक उत्तम व्यवस्था थी। इसे आज भी आदर्श माना जाता है।  

आध्यात्मिक शिक्षा 
स्वामी विवेकानन्द केवल अक्षर ज्ञान को शिक्षा नहीं मानते थे। उनका कहना था कि शिक्षा आध्यात्मिक जागरूकता प्रदान करने वाली होनी चाहिए, जिससे अधिक शक्ति एवं आत्मविश्वास पैदा हो। वह युवाओं को आध्यात्म और योग के प्रति जागरूक करते थे। उनका मानना था कि आध्यात्म हमारी आत्मा को पवित्र करता है। यह मन को शांति प्रदान करता है। आध्यात्मिक व्यक्ति समाज को आदर्श समाज बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसकी प्रकार योग शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य के लिए अति आवश्यक है। योग करने से शरीर स्वस्थ रहता है। शरीर के स्वस्थ रहने से मन भी स्वस्थ रहता है। 
                
स्वामीजी आत्मनिर्भरता को महत्व देते थे। उनके अनुसार दूसरों पर निर्भर रहना मूर्खता है। उनका यह कथन सही है। मनुष्य को अपने परिश्रम से सबकुछ अर्जित करना चाहिए। दूसरों पर निर्भर रहने वाले लोग जहां अपना आत्मविश्वास खो देते हैं, वहीं वे समाज में अपने लिए विशेष सम्मान भी अर्जित नहीं कर पाते। उद्यम से सबकुछ प्राप्त किया जा सकता है। स्वामीजी कहते थे कि पवित्रता, धैर्य और उद्यम ये तीनों गुण एक साथ समायोजित होते हैं। बुराई एवं अपवाद की चिंता किए बिना कार्य करो, सफलता अवश्य प्राप्त होगी। शिक्षा केवल परीक्षा उत्तीर्ण करने और कुछ जीविका प्राप्त करने से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है। ऐसी शिक्षा जो केवल आजीविका कमाने में सहायता प्रदान करती है, वह महान मूल्य नहीं रखती है।

महिला शिक्षा 
स्वामी विवेकानन्द ने महिलाओं के साथ भेदभाव करने का जमकर विरोध किया। उन्होंने कहा था कि समाज में महिलाओं के साथ भेदभाव नहीं किया जाना चाहिए, तभी हमारा समाज इस संकीर्ण सोच से बाहर आएगा। जिस दिन महिलाओं के साथ किसी भी प्रकार से भेदभाव नहीं किया जाएगा, उस दिन हमारा राष्ट्र एवं समाज विश्व में सर्वोपरि होगा। उन्होंने महिलाओं को शिक्षित करने पर विशेष बल दिया। वे कहते थे कि सभी प्राणियों में वही एक आत्मा विद्यमान है, इसलिए महिलाओं पर अनुचित नियंत्रण सर्वथा अवांछनीय है। वैदिक कालीन मैत्रेयी, गार्गी आदि पुण्य स्मृति महिलाओं ने ऋषियों का स्थान प्राप्त कर लिया था। सभी उन्नत राष्ट्रों ने महिलाओं को समुचित स्थान देकर महानता प्राप्त की है। जो देश, राष्ट्र महिलाओं का आदर नहीं करते, वे कभी बड़े नहीं हो पाए और न भविष्य में बड़े होंगे। 

उल्लेखनीय है कि 12 जनवरी 1863 को कलकत्ता के कायस्थ परिवार में जन्मे स्वामी विवेकानन्द ने अमेरिका के शिकागो में आयोजित विश्व धर्म सम्मेलन में हिंदू धर्म का प्रतिनिधित्व कर उसे सार्वभौमिक पहचान दिलाई। उनके बचपन का नाम नरेन्द्रनाथ दत्त था। उनके पिता विश्वनाथ दत्त कलकत्ता उच्च न्यायालय के एक प्रसिद्ध अधिवक्ता थे। उनकी माता भुवनेश्वरी देवी धार्मिक विचारों की गृहिणी थीं। वह बाल्यावस्था से ही कुशाग्र बुद्धि के थे। उनके घर में नियमपूर्वक प्रतिदिन पूजा-पाठ होता था। साथ ही नियमित रूप से भजन-कीर्तन भी होता रहता था। परिवार के धार्मिक वातावरण का उन पर भी प्रभाव गहरा पड़ा। वह अपने गुरु रामकृष्ण देव से अत्यधिक प्रभावित थे। उन्होंने अपने गुरु से ही यह ज्ञान प्राप्त किया कि समस्त जीव स्वयं परमात्मा का ही अंश हैं, इसलिए मानव जाति की सेवा द्वारा परमात्मा की भी सेवा की जा सकती है।

ऐतिहासिक भाषण 
स्वामी विवेकानन्द ने 11 सितंबर 1893 को अमेरिका के शिकागो की धर्म संसद में ऐसा भाषण दिया था, जिसने समस्त विश्व के समक्ष भारत की गौरान्वित करने वाली छवि प्रस्तुत की थी। अपने भाषण मंन उन्होंने कई महत्वपूर्ण बिन्दुओं पर प्रकाश डालते हुए कहा था- “अमरीकी भाइयों और बहनों, आपने जिस सौहार्द और स्नेह के साथ हम लोगों का स्वागत किया है, उसके प्रति आभार प्रकट करने के निमित्त खड़े होते समय मेरा हृदय अवर्णनीय हर्ष से पूर्ण हो रहा है। संसार में संन्यासियों की सबसे प्राचीन परम्परा की ओर से मैं आपको धन्यवाद देता हूं, धर्मों की माता की ओर से धन्यवाद देता हूं और सभी सम्प्रदायों एवं मतों के कोटि कोटि हिन्दुओं की ओर से भी धन्यवाद देता हूं। 

मैं इस मंच पर से बोलने वाले उन कतिपय वक्ताओं के प्रति भी धन्यवाद ज्ञापित करता हूं, जिन्होंने प्राची के प्रतिनिधियों का उल्लेख करते समय आपको यह बताया है कि सुदूर देशों के ये लोग सहिष्णुता का भाव विविध देशों में प्रचारित करने के गौरव का दावा कर सकते हैं। मैं एक ऐसे धर्म का अनुयायी होने में गर्व का अनुभव करता हूं, जिसने संसार को सहिष्णुता तथा सार्वभौम स्वीकृत- दोनों की ही शिक्षा दी हैं।

हम लोग सब धर्मों के प्रति केवल सहिष्णुता में ही विश्वास नहीं करते वरन समस्त धर्मों को सच्चा मान कर स्वीकार करते हैं। मुझे ऐसे देश का व्यक्ति होने का अभिमान है, जिसने इस पृथ्वी के समस्त धर्मों और देशों के उत्पीड़ितों और शरणार्थियों को आश्रय दिया है। मुझे आपको यह बतलाते हुए गर्व होता हैं कि हमने अपने वक्ष में उन यहूदियों के विशुद्धतम अवशिष्ट को स्थान दिया था, जिन्होंने दक्षिण भारत आकर उसी वर्ष शरण ली थी जिस वर्ष उनका पवित्र मन्दिर रोमन जाति के अत्याचार से धूल में मिला दिया गया था।

ऐसे धर्म का अनुयायी होने में मैं गर्व का अनुभव करता हूं, जिसने महान जरथुष्ट जाति के अवशिष्ट अंश को शरण दी और जिसका पालन वह अब तक कर रहा है। भाइयो मैं आप लोगों को एक स्रोत की कुछ पंक्तियां सुनाता हूं, जिसकी आवृति मैं बचपन से कर रहा हूं और जिसकी आवृति प्रतिदिन लाखों मनुष्य किया करते हैं -
रुचीनां वैचित्र्यादृजुकुटिलनानापथजुषाम्। नृणामेको गम्यस्त्वमसि पयसामर्णव इव॥ 
अर्थात जैसे विभिन्न नदियां भिन्न भिन्न स्रोतों से निकलकर समुद्र में मिल जाती हैं उसी प्रकार हे प्रभो! भिन्न भिन्न रुचि के अनुसार विभिन्न टेढ़े-मेढ़े अथवा सीधे रास्ते से जानेवाले लोग अन्त में तुझमें ही आकर मिल जाते हैं।“

राष्ट्रीय युवा दिवस
स्वामी विवेकानन्द के जन्म दिवस 12 जनवरी को प्रतिवर्ष राष्ट्रीय युवा दिवस के रूप में मनाया जाता है। उल्लेखनीय है कि विश्व के अधिकांश देशों में कोई न कोई दिन युवा दिवस के रूप में मनाया जाता है। संयुक्त राष्ट्र संघ के निर्णयानुसार वर्ष 1985 को अंतरराष्ट्रीय युवा वर्ष घोषित किया गया। प्रथम बार वर्ष 2000 में अंतरराष्ट्रीय युवा दिवस का आयोजन आरंभ किया गया था। संयुक्त राष्ट्र ने 17 दिसंबर 1999 को प्रत्येक वर्ष 12 अगस्त को अंतरराष्ट्रीय युवा दिवस के रूप में मनाने की घोषणा की थी। अंतरराष्ट्रीय युवा दिवस मनाने का अर्थ है कि सरकार युवा के मुद्दों और उनकी बातों पर ध्यान आकर्षित करे। भारत में इसका प्रारंभ वर्ष 1985 से हुआ, जब सरकार ने स्वामी विवेकानन्द के जन्म दिवस पर अर्थात 12 जनवरी को प्रतिवर्ष राष्ट्रीय युवा दिवस के रूप में मनाने की घोषणा की। युवा दिवस के रूप में स्वामी विवेकानन्द का जन्मदिवस चुनने के बारे में सरकार का विचार था कि स्वामी विवेकानन्द का दर्शन एवं उनका जीवन भारतीय युवकों के लिए प्रेरणा का बहुत बड़ा स्रोत हो सकता है। 

Saturday, June 21, 2025

मोदी के नेतृत्व में सिविल सेवाओं का लोकतंत्रीकरण हुआ


प्रधानमंत्री श्री नरेन्‍द्र मोदी के नेतृत्व में पिछले 11 वर्षों में युवा आकांक्षाओं के लोकतंत्रीकरण के साथ सिविल सेवाओं का लोकतंत्रीकरण हुआ है। यह बात दूरदर्शन समाचार को दिए एक विशेष साक्षात्कार में केंद्रीय मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने कही है।   

डॉ. जितेंद्र सिंह ने बताया कि एक समय में आईएएस और सिविल सेवा केवल बिहार, तमिलनाडु, केरल आदि जैसे कुछ राज्यों तक ही सीमित थी, लेकिन आज हमें उन राज्यों से टॉपर मिल रहे हैं, जो पहले पंजाब, हरियाणा और जम्मू-कश्मीर के टॉपर्स की सूची में शायद पहले कभी शामिल नहीं होते थे। उन्होंने जम्मू-कश्मीर के सीमावर्ती जिले पुंछ की युवा लड़की परसनजीत कौर का उदाहरण दिया, जिसने पहले ही प्रयास में 2022 की सिविल सेवा परीक्षा में अखिल भारतीय रैंक 11 हासिल की या पंजाब के लड़के अनमोल शेर सिंह बेदी का उदाहरण दिया, जिसने 2016 की सिविल सेवा परीक्षा में अखिल भारतीय रैंक 2 हासिल की थी।

मंत्री डॉ. जितेन्द्र सिंह ने कहा कि इससे व्यवस्था द्वारा प्रदत्त निष्पक्षता और समान अवसर में विश्वास बहाल हुआ है, तथा इससे युवाओं की आकांक्षाओं का लोकतंत्रीकरण भी हुआ है।
डॉ. जितेन्द्र सिंह ने कहा, ‘‘यह लोकतंत्र का सच्चा सार है - जहां हर मां को, चाहे उसकी सामाजिक-आर्थिक स्थिति कुछ भी हो, यह विश्वास होता है कि उसका बच्चा शीर्ष पर पहुंच सकता है।’’
डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि पिछले 11 साल भारत के लिए परिवर्तनकारी रहे हैं। उन्होंने कहा, ‘‘जिस चीज के लिए कई पीढ़ियां दशकों से तरस रही थीं, वह महज एक दशक में संभव हो गई है।’’ उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी ने अतीत के आंसू पोंछे हैं और उनकी जगह उम्मीद और भविष्य की आकांक्षाओं से आंखें भर गई हैं।
मंत्री महोदय ने कहा कि प्रत्येक बीतता वर्ष एक नया मील का पत्थर साबित हो रहा है - चाहे वह बुनियादी ढांचे, शासन, प्रौद्योगिकी या युवा सशक्तिकरण के क्षेत्र में हो - जिससे प्रत्येक भारतीय के लिए अभूतपूर्व अवसर पैदा हो रहे हैं।
केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी, पृथ्वी विज्ञान राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) तथा प्रधानमंत्री कार्यालय, परमाणु ऊर्जा विभाग, अंतरिक्ष विभाग, कार्मिक, लोक शिकायत एवं पेंशन राज्य मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में नागरिकों का आत्म-सम्मान बहाल हुआ है। प्रधानमंत्री के 2016 के ऐतिहासिक ‘‘स्टार्ट-अप इंडिया, स्टैंड-अप इंडिया’’ आह्वान का जिक्र करते हुए उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि इसने पारंपरिक सरकारी नौकरियों से परे रोजगार के क्षितिज को कैसे व्यापक बनाया है।
मंत्री ने कहा, ‘‘तभी लोगों को एहसास हुआ कि नौकरी का मतलब केवल ‘‘सरकारी नौकरी’’ नहीं है, बल्कि नवाचार, उद्यम और स्टार्टअप भी है।’’
उन्होंने कहा कि भारत का बायोटेक क्षेत्र इसका एक आदर्श उदाहरण है - 2014 में केवल 50 स्टार्टअप से बढ़कर 2024 में 10,075 से अधिक हो गया है, और मूल्यांकन 10 बिलियन डॉलर से बढ़कर लगभग 170 बिलियन डॉलर हो गया है। उन्होंने इसका श्रेय मजबूत सार्वजनिक-निजी भागीदारी और बायो-ई3 और राष्ट्रीय क्वांटम मिशन जैसी दूरदर्शी नीतियों को दिया।
डॉ. जितेन्द्र सिंह ने पूर्वोत्तर और जम्मू-कश्मीर के भारत के विकास की मुख्यधारा में शामिल होने की सराहना की।
उन्होंने कहा, ‘‘दशकों तक ये क्षेत्र रेलवे का इंतजार करते रहे, लेकिन प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में अब उन घाटियों में भी ट्रेनें चल रही हैं जो कभी अलग-थलग थीं।’’

मंत्री ने 1972 में जम्मू स्टेशन के पहली बार चालू होने और उसके बाद आधी सदी तक प्रधानमंत्री मोदी द्वारा इस सपने को पूरा करने तथा वंदे भारत रेलगाड़ियों को हरी झंडी दिखाने तक के लंबे अंतराल को याद किया।
भावनात्मक उदाहरणों का हवाला देते हुए डॉ. जितेन्द्र सिंह ने दुखद अहमदाबाद हवाई दुर्घटना में मणिपुर की युवा चालक दल की लड़कियों की मृत्यु का उल्लेख किया, जो इस बात को भी चिहिन्‍त किया कि  अलगाव से लेकर अंतर्राष्ट्रीय विमानन और आतिथ्य उद्योग का हिस्सा बनने तक, यह क्षेत्र कितनी दूर तक आ गया है।
डॉ. जितेंद्र सिंह ने अंतरिक्ष और जैव प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में भारत के नेतृत्व की पुष्टि की, विज्ञान और नवाचार में देश की बढ़ती वैश्विक प्रतिष्ठा पर प्रकाश डाला। उन्होंने घोषणा की कि भारत के अंतरिक्ष यात्री, ग्रुप कैप्टन शुभांशु शुक्ला, एक्सिओम-4 मिशन पर मिशन पायलट के रूप में काम करेंगे, जहां वे जैव प्रौद्योगिकी विभाग (डीबीटी) द्वारा स्वदेशी रूप से विकसित बायोटेक किट का उपयोग करके अत्याधुनिक अंतरिक्ष जीव विज्ञान प्रयोग करेंगे। डॉ. सिंह ने यह भी बताया कि भारत 2035 तक अपना स्वयं का ‘भारत अंतरिक्ष स्टेशन’ स्थापित करने की दिशा में लगातार आगे बढ़ रहा है, जो देश की अंतरिक्ष महत्वाकांक्षाओं में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है।
उन्होंने इस बात पर बल दिया कि विश्व अब भारत के साथ सक्रिय रूप से सहयोग कर रहा है और इसकी वैज्ञानिक क्षमताओं को मान्यता दे रहा है, जो एक विश्वसनीय वैश्विक विज्ञान साझेदार के रूप में देश के उत्‍थान का प्रमाण है।
डॉ. जितेंद्र सिंह ने कई ऐतिहासिक शासन सुधारों पर प्रकाश डाला, जिन्होंने पिछले एक दशक में नागरिक-केंद्रित सेवा वितरण को बदल दिया है। उन्होंने कहा कि भारत का लोक शिकायत निवारण तंत्र सीपीजीआरएएमएस एक वैश्विक मॉडल के रूप में विकसित हुआ है, जो 2014 में केवल 2 लाख की तुलना में 2024 में 26 लाख से अधिक शिकायतों का निपटारा करेगा, और 96 प्रतिशत की प्रभावशाली निपटान दर के साथ।
मंत्री डॉ. सिंह ने पेंशनभोगियों के लिए डिजिटल जीवन प्रमाण पत्र (डीएलसी) की शुरुआत के बारे में भी बात की, जिसने चेहरे की पहचान तकनीक के माध्यम से बुजुर्ग नागरिकों को सत्यापन के लिए बैंकों में जाने की आवश्यकता को समाप्त कर दिया है - सरकार में अपनी तरह की पहली पहल। इसके अलावा, उन्होंने प्रगतिशील पेंशन सुधारों का हवाला दिया, जिसमें विधवा और तलाकशुदा बेटियों के लिए पारिवारिक पेंशन का प्रावधान और महिला अधिकारियों के लिए अपने जीवनसाथी तक सीमित रहने के बजाय माता-पिता या बच्चों को लाभार्थी के रूप में नामित करने की सुविधा शामिल है - जो शासन के प्रति अधिक समावेशी और कल्‍याणकारी दृष्टिकोण को दर्शाता है।
मोदी सरकार की निर्मल छवि के रिकॉर्ड पर प्रकाश डालते हुए डॉ. जितेंद्र सिंह ने गर्व से कहा, ‘‘पिछले 11 वर्षों में केंद्रीय मंत्रिपरिषद के किसी भी सदस्य के खिलाफ भ्रष्टाचार का एक भी आरोप सामने नहीं आया है। इसकी तुलना पिछली सरकार से करें, जब भ्रष्टाचार आम बात थी।’’
मंत्री ने राजनीति में आए सांस्कृतिक बदलाव की ओर भी ध्यान दिलाया, जहां सरकार अब नागरिकों को वोट बैंक के रूप में वर्गीकृत नहीं करती है, बल्कि गैर-परंपरागत मतदाता क्षेत्रों में प्रधानमंत्री आवास योजना सहित योजनाओं की 100 प्रतिशत संतुष्टि सुनिश्चित करती है।
जम्मू-कश्मीर में मौजूदा स्थिति पर डॉ. जितेंद्र सिंह ने भरोसा दिलाया कि हालात सामान्य हो गए हैं और पर्यटन फल-फूल रहा है। उन्होंने कहा, ‘‘आज पहलगाम जाएं, जहां हाल ही में एक दुखद घटना घटी थी - आप वहां लोगों से भरी भीड़ पाएंगे।’’
डॉ. जितेन्द्र सिंह ने जम्मू-कश्मीर में लिथियम भंडार का भी उल्लेख किया तथा इसे संभावित आर्थिक परिवर्तनकारी बताया। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि क्षेत्र के युवा महत्वाकांक्षी हैं तथा वे इस अवसर को हाथ से जाने नहीं देना चाहते।
अपने भाषण का समापन करते हुए डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा, ‘‘विकसित भारत 2047 के पीछे असली प्रेरक शक्ति भारत के नागरिक होंगे। यह उनका समर्थन, आकांक्षा और भागीदारी ही है जो भारत की यात्रा के अगले 25 वर्षों को आकार देगी।’’

Friday, April 18, 2025

अहिल्यबाई होलकर भारतीयता की प्रतीक थी : डॉ.सौरभ मालवीय





शिक्षा का क्षेत्र ही सामाजिक परिवर्तन का सबसे सशक्त माध्यम माध्यम होता है। उसमें साहित्य की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। साहित्य ही ज्ञान को संरक्षित करता है। संस्कारयुक्त शिक्षा हमारा उद्देश्य है। विद्या भारती अनेक वर्षों से समाज में भारतीयता पूर्ण शिक्षा एवं आध्यात्मिक मूल्यों से जुड़े रहने का लक्ष्य लेकर काम कर रही है।

 उक्त बातें विद्या भारती के क्षेत्रीय मंत्री डॉ.सौरभ मालवीय ने भारतीय शिक्षा समिति कानपुर प्रांत द्वारा प्रकाशित  'लोकमाता अहिल्याबाई होल्कर' विशेषांक के विमोचन करते हुए कही।

सरस्वती  विद्या मंदिर इंटर कॉलेज दामोदर नगर कानपुर में भारतीय शिक्षा समिति कानपुर प्रांत द्वारा तीन दिवसीय प्रधानाचार्य समीक्षा एवं कार्य योजना बैठक आयोजित की गई जिसमें सभी संकुल से प्रधानाचार्य ने सहभाग किया। कार्यक्रम का शुभारंभ श्री भवानी जी प्रांत संघ चालक , डॉ. सौरभ मालवीय क्षेत्रीय  मंत्री पूर्वी उत्तर प्रदेश, श्री रजनीश जी प्रांत संगठन मंत्री कानपुर प्रांत  ने दीप  प्रज्ज्वलित किया। डॉक्टर सौरभ मालवीय, भवानी जी प्रांत संघ चालक जी ने श्री रजनीश जी ने अनुभव पत्रिका का विमोचन संकुल प्रमुख व प्रांत प्रमुख श्री रामकृष्ण बाजपेई जी के साथ किया इसके बाद मा सौरभ मालवीय जी ने  कानपुर प्रांत की बेवसाइट का लोकार्पण किया इसके बाद डॉ.मालवीय ने कहा कि हम योजना बनाकर कार्य  करते हैं हमारी प्रमुख भूमिका विद्यालय को श्रेष्ठ बनाना है विद्यालय जीवंत है इसके हम प्रेरक हैं  तब विद्यालय समाज केंद्रित होता है। छात्रों के सर्वांगीड़ और समग्र विकास को ध्यान में रखते हुए बहुत सारे कार्यक्रम और गतिविधियों की योजना भी हम विद्यालय स्तर पर करते है।

भवानी जी ने कहा कि हम राष्ट्र निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका का कार्य करते हैं अतः हमको अपने कार्य के प्रति समर्पित होकर कार्य करना चाहिए इस कार्यक्रम में मा ,डॉक्टर  राकेश निरंजन जी अध्यक्ष, श्री अयोध्या प्रसाद जी मिश्र प्रदेश निरीक्षक, श्री आर के सिंह जी सह मंत्री जी  श्री अजय जी ,श्री शिवकरण जी संभाग निरीक्षक श्री शिव सिंह जी सेवा प्रमुख,विद्यालय के प्रबंधक श्री ओम  प्रकाश अग्रवाल जी तथा समस्त प्रधानाचार्य बंधु एवं भगिनी उपस्थित रहे।

Saturday, April 12, 2025

सामाजिक क्रांति के अग्रदूत : बाबासाहेब आंबेडकर

डॊ. सौरभ मालवीय
सामाजिक समता, सामाजिक न्याय, सामाजिक अभिसरण जैसे समाज परिवर्तन के मुद्दों को प्रमुखता से स्वर देने और परिणाम तक लाने वाले प्रमुख लोगों में डॊ. भीमराव आंबेडकर का नाम अग्रणीय है. उन्हें बाबा साहेब के नाम से जाना जाता है. एकात्म समाज निर्माण, सामाजिक समस्याओं, अस्पृश्यता जैसे सामजिक मसले पर उनका मन संवेदनशील एवं व्यापक था.  उन्होंने अपना संपूर्ण जीवन ऊंच-नीच, भेदभाव, छुआछूत के उन्मूलन के कार्यों के लिए समर्पित कर दिया.  वे कहा करते थे- एक महान आदमी एक आम आदमी से इस तरह से अलग है कि वह समाज का सेवक बनने को तैयार रहता है.

4 अप्रैल, 1891 को मध्य प्रदेश के महू में जन्मे भीमराव आंबेडकर रामजी मालोजी सकपाल और भीमाबाई की चौदहवीं संतान थे. वह हिंदू महार जाति से संबंध रखते थे, जो अछूत कहे जाते थे. इसके कारण उनके साथ समाज में भेदभाव किया जाता था. उनके पिता भारतीय सेना में सेवारत थे. पहले भीमराव का उपनाम सकपाल था, लेकिन उनके पिता ने अपने मूल गांव अंबाडवे के नाम पर उनका उपनाम अंबावडेकर लिखवाया, जो बाद में आंबेडकर हो गया.
पिता की स्वानिवृति के बाद उनका परिवार महाराष्ट्र के सतारा में चला गया. उनकी मां की मृत्यु के बाद उनके पिता ने दूसरा विवाह कर लिया और बॉम्बे में जाकर बस गए. यहीं उन्होंने शिक्षा ग्रहण की. वर्ष 1906 में मात्र 15 वर्ष की आयु में उनका विवाह नौ वर्षीय रमाबाई से कर दिया गया. वर्ष 1908 में उन्होंने बारहवीं की परीक्षा उत्तीर्ण की. विद्यालय की शिक्षा पूर्ण करने के बाद उन्होंने बॉम्बे के एल्फिनस्टोन कॉलेज में दाखिला लिया. उन्हें गायकवाड़ के राजा सहयाजी से 25 रुपये मासिक की स्कॉलरशिप मिलने लगी थी.
वर्ष 1912 में उन्होंने राजनीति विज्ञान व अर्थशास्त्र में स्नातकोत्तर की उपाधि ली.  इसके बाद उच्च शिक्षा के लिए वह अमेरिका चले गए. वर्ष 1916 में उन्हें उनके एक शोध के लिए पीएचडी से सम्मानित किया गया. इसके बाद वह लंदन चले गए, किन्तु उन्हें बीच में ही लौटना पड़ा. आजीविका के लिए इस समयावधि में उन्होंने कई कार्य किए. वह मुंबई के सिडनेम कॉलेज ऑफ कॉमर्स एंड इकोनोमिक्स में राजनीतिक अर्थव्यवस्था के प्राध्यापक भी रहे. इसके पश्चात एक बार फिर वह इंग्लैंड चले गए. वर्ष 1923 में उन्होंने अपना शोध ’रुपये की समस्याएं’ पूरा कर लिया. उन्हें लंदन विश्वविद्यालय द्वारा ’डॉक्टर ऑफ साईंस’ की उपाधि प्रदान की गई.  उन्हें ब्रिटिश बार में बैरिस्टर के रूप में प्रवेश मिल गया. स्वदेश वापस लौटते हुए भीमराव आंबेडकर तीन महीने जर्मनी में रुके और बॉन विश्वविद्यालय में  उन्होंने अपना अर्थशास्त्र का अध्ययन जारी रखा. उन्हें  8 जून, 1927 कोलंबिया विश्वविद्यालय द्वारा पीएचडी प्रदान की गई.

भीमराव आंबेडकर को बचपन से ही अस्पृश्यता से जूझना पड़ा. विद्यालय से लेकर नौकरी करने तक उनके साथ भेदभाव किया जाता रहा.  इस भेदभाव और निरादर ने उनके मन को बहुत ठेस पहुंचाई. उन्होंने छूआछूत के समूल नाश के लिए कार्य करने का प्रण लिया. उन्होंने कहा कि नीची जाति व जनजाति एवं दलित के लिए देश में एक भिन्न चुनाव प्रणाली होनी चाहिए. उन्होंने देशभर में घूम-घूम कर दलितों के अधिकारों के लिए आवाज उठाई और लोगों को जागरूक करने का कार्य किया. उन्होंने एक समाचार-पत्र ‘मूक्नायका’ (लीडर ऑफ़ साइलेंट) प्रारंभ किया. एक बार उनके भाषण से प्रभावित होकर कोल्हापुर के शासक शाहूकर ने अपने पद से त्यागपत्र दे दिया, जिसकी देशभर में चर्चा हुई. इस घटना ने भारतीय राजनीति को एक नया आयाम दिया.

वर्ष 1936 में भीमराव आंबेडकर ने स्वतंत्र मजदूर पार्टी की स्थापना की. अगले वर्ष 1937 के केन्द्रीय विधानसभा चुनाव में उनकी पार्टी ने 15 सीटों पर विजय प्राप्त की. उन्होंने इस दल को ऒल इंडिया शिड्यूल कास्ट पार्टी में परिवर्तित कर दिया. वह वर्ष 1946 में संविधान सभा के चुनाव में खड़े हुए, किन्तु उन्हें असफलता मिली. वह रक्षा सलाहकार समिति और वाइसराय की कार्यकारी परिषद के लिए श्रम मंत्री के रूप में सेवारत रहे. वह देश के पहले कानून मंत्री बने. उन्हें संविधान गठन समिति का अध्यक्ष बनाया गया.

भीमराव आंबेडकर समानता पर विशेष बल देते थे. वह कहते थे- अगर देश की अलग अलग जाति एक दुसरे से अपनी लड़ाई समाप्त नहीं करेंगी, तो देश एकजुट कभी नहीं हो सकता. यदि हम एक संयुक्त एकीकृत आधुनिक भारत चाहते हैं तो सभी धर्म-शास्त्रों की संप्रभुता का अंत होना चाहिए. हमारे पास यह आजादी इसलिए है ताकि हम उन चीजों को सुधार सकें, जो सामाजिक व्यवस्था, असमानता, भेदभाव और अन्य चीजों से भरी है जो हमारे मौलिक अधिकारों के विरोधी हैं. एक सफल क्रांति के लिए केवल असंतोष का होना ही काफी नहीं है बल्कि इसके लिए न्याय, राजनीतिक और सामाजिक अधिकारों में गहरी आस्था का होना भी बहुत आवश्यक है. राजनीतिक अत्याचार सामाजिक अत्याचार की तुलना में कुछ भी नहीं है और जो सुधारक समाज की अवज्ञा करता है, वह सरकार की अवज्ञा करने वाले राजनीतिज्ञ से ज्यादा साहसी हैं. जब तक आप सामाजिक स्वतंत्रता हासिल नहीं कर लेते तब तक आपको कानून चाहे जो भी स्वतंत्रता देता है वह आपके किसी काम की नहीं.यदि हम एक संयुक्त एकीकृत आधुनिक भारत चाहते हैं तो सभी धर्म-शास्त्रों की संप्रभुता का अंत होना चाहिए.

भीमराव आंबेडकर का बचपन परिवार के अत्यंत संस्कारी एवं धार्मिक वातावरण में बीता था. उनके घर में रामायण, पाण्डव प्रताप, ज्ञानेश्वरी व अन्य संत वांग्मय के नित्य पाठन होते थे, जिसके कारण उन्हें श्रेष्ठ संस्कार मिले. वह कहते थे- मैं एक ऐसे धर्म को मानता हूं जो स्वतंत्रता, समानता और भाई-चारा सिखाये. वर्ष 1950 में वह एक बौद्धिक सम्मेलन में भाग लेने के लिए श्रीलंका गए, जहां वह बौद्ध धर्म से अत्यधिक प्रभावित हुए. स्वदेश वापसी पर उन्होंने बौद्ध व उनके धर्म के बारे में पुस्तक लिखी. उन्होंने बौद्ध धर्म ग्रहण कर लिया. उन्होंने वर्ष 1955 में भारतीय बौध्या महासभा की स्थापना की. उन्होंने 14 अक्टूबर, 1956 को एक आम सभा का आयोजन किया, जिसमें उनके पांच लाख समर्थकों ने  बौद्ध धर्म अपनाया. इसके कुछ समय पश्चात 6 दिसम्बर, 1956 को दिल्ली में उनका निधन हो गया. उनका अंतिम संस्कार बौद्ध धर्म की रीति के अनुसार किया गया. वर्ष 1990 में मरणोपरांत उन्हें देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान  भारत रत्न से सम्मानित किया गया. कई भाषाओं के ज्ञाता बाबासाहब ने अनेक पुस्तकें भी लिखी हैं.

बाबासाहब ने जीवनपर्यंत छूआछूत का विरोध किया. उन्होंने दलित समाज के सामाजिक और आर्थिक उत्थान के लिए सरहानीय कार्य किए. वह कहते है कि आप स्वयं को अस्पृस्य न मानें, अपना घर साफ रखें.  पुराने और घिनौने रीति-रिवाजों को छोड़ देना चाहिए.
निसंदेह, देश उनके योगदान को कभी भुला नहीं पाएगा.

Monday, March 24, 2025

योगी सरकार के आठ वर्ष


डॉ. सौरभ मालवीय   
उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ की सरकार ने अपने द्वितीय कार्यकाल के तीन वर्ष पूर्ण कर लिए हैं। उन्होंने 25 मार्च 2022 को द्वितीय बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली थी। इस अवसर पर उन्होंने शपथ लेते हुए कहा था कि “मैं आदित्यनाथ योगी, ईश्वर की शपथ लेता हूं कि मैं विधि द्वारा स्थापित भारत के संविधान के प्रति सच्ची श्रद्धा और निष्ठा रखूंगा। मैं भारत की प्रभुता और अखंडता को अक्षुण्ण रखूंगा। मैं उत्तर प्रदेश राज्य के मुख्यमंत्री के रूप में अपने कर्तव्यों का श्रद्धापूर्वक और शुद्ध अंतःकरण से निर्वाहन करूंगा तथा मैं भय या पक्षपात, अनुराग या द्वेष के बिना, सभी प्रकार के लोगों के प्रति संविधान और विधि के अनुसार न्याय करूंगा।“

योगी आदित्यनाथ अपनी इस शपथ का किस प्रकार हृदय से पालन कर रहे हैं, यह सर्वविदित है। इससे पूर्व उन्होंने प्रथम बार 17 मार्च 2017 को मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी। वह पांच बार गोरखपुर से सांसद रहे चुके हैं। प्रदेश की जनता को उनकी कार्यशैली इतनी सर्वोत्तम लगी कि उसने वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव में पुन: भारतीय जनता पार्टी को पूर्ण बहुमत से विजयी बना दिया अर्थात 403 सदस्यों वाली उत्तर प्रदेश विधानसभा के चुनाव में भाजपा और उसके सहयोगी दलों को 273 सीटों पर विजय प्राप्त हुई। इस प्रकार योगी आदित्यनाथ को द्वितीय बार उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।  

उल्लेखनीय है कि उत्तर प्रदेश के राजनीतिक इतिहास में लगभग साढ़े तीन दशक के पश्चात किसी राज्नीतिक दल को पुन: सत्ता में लाने वाले योगी आदित्यनाथ प्रथम राजनेता हैं। उन्हें अपने मुख्यमंत्रित्व कार्यकाल में अनेक समस्याओं से जूझना पड़ा। उन पर अनेक आरोप लगे। उन पर बुल्डोजर से लोगों के मकान तोड़ने के आरोप लगे। इसके लिए उनकी बहुत आलोचना हुई, परंतु उन्होंने इसकी कोई चिंता नहीं की तथा अपना कार्य को निरंतर जारी रखा।  इसके अतिरिक्त अधिकारियों के स्थानान्तरण के कारण योगी सरकार पर अनके प्रश्नचिन्ह लगे, परंतु उनकी कार्यशैली में कोई अंतर नहीं आया।  

योगी आदित्यनाथ हिंदुत्वादी हैं। उनके शासनकाल में प्रदेश में धार्मिक गतिविधियों को अत्यंत प्रोत्साहित किया जा रहा है। महाकुंभ का सफल आयोजन इस बात का प्रमाण है। महाकुंभ से पूर्व प्रयागराज के ऐतिहासिक मंदिरों का जीर्णोद्धार एवं नवीनीकरण किया गया। योगी आदित्यनाथ के निर्देश पर पर्यटन विभाग, स्मार्ट सिटी एवं प्रयागराज विकास प्राधिकरण मिलकर यह कार्य संपन्न किया। मेला प्रशासन ने श्रद्धालुओं और पर्यटकों की आस्था एवं सुविधा को प्राथमिकता दी। महाकुंभ मेले के दृष्टिगत प्रदेश को हरभरा बनाने पर विशेष ध्यान दिया गया। इसके अतिरिक्त स्वच्छता पर विशेष बल दिया गया। यातायात सुविधाओं को सुदृढ़ किया गया। योगी आदित्यनाथ के परिश्रम का परिणाम है कि इस मेले में 50 करोड़ से अधिक लोगों ने स्नान कर पुण्य अर्जित किया। इसके अतिरिक्त राज्य में प्रत्येक वर्ष कांवड़ यात्रा पर यात्रियों की सुविधाओं का विशेष ध्यान रखा जाता है। यात्रियों के मार्ग में टेंट लगाए जाते हैं। उन पर हेलिकॉप्टर से पुष्प वर्षा की जाती है। प्रशासनिक अधिकारी इस आयोजन में बढ़ चढ़कर सम्मिलित होते हैं।     

वास्तव में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ बिना किसी पूर्वाग्रह एवं भेदभाव के कार्य करते हैं, जिससे लोगों में सरकार के प्रति सकारात्मक संदेश जाता है। उनकी समयावधि में धार्मिक स्थलों से लाउडस्पीकरों को उतरवा दिया गया। रमजान से पूर्व मस्जिदों की निरीक्षण किया गया कि उनमें लाउडस्पीकर तो नहीं लगे हैं। इस वर्ष होली पर मस्जिदों को तिरपाल से ढक गया। 

वास्तव में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भाजपा के चाल, चरित्र एवं चेहरे के अनुसार ही हिंदुत्व की छवि को सुदृढ़ करने का निरंतर प्रयास कर रहे हैं। प्राचीन नगरों के नाम परिवर्तित करना तथा अयोध्या में मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम के मंदिर का निर्माण इसके उदाहरण हैं। सरकार नमामि गंगे योजना के अंतर्गत गंगा को स्वच्छ एवं निर्मल करने पर विशेष बल दे रही है। गंगा का प्रदूषण कम करने के लिए स्मार्ट गंगा सिटी परियोजना पर कार्य चल रहा है। योगी सरकार राज्य में पर्यटन विशेषकर धार्मिक पर्यटन को भी प्रोत्साहित कर रही है। राज्य में गौ संरक्षण एवं संवर्धन के लिए मुख्यमंत्री निराश्रित गौवंश सहभागिता योजना प्रारम्भ की गई है, जिसके सुखद परिणाम सामने आ रहे हैं।   

उत्तर प्रदेश में निरा श्रय लोगों को आवास देने के लिए उत्तर प्रदेश आवास विकास योजना प्रारम्भ की गई। निर्धन परिवारों को आर्थिक सहायता उपलब्ध कराने के लिए राष्ट्रीय पारिवारिक लाभ योजना आरम्भ की गई। प्रवासी श्रमिकों को आजीविका देने के लिए आत्मनिर्भर उत्तर प्रदेश रोजगार अभियान प्रारम्भ किया गया। बेरोजगारों को स्वरोजगार के लिए ऋण उपलब्ध कराने के लिए मुख्यमंत्री युवा स्वरोजगार योजना आरम्भ की गई। बेरोजगार युवाओं को प्रशिक्षण दिलाने के लिए उत्तर प्रदेश कौशल विकास मिशन तथा मुख्यमंत्री शिक्षुता प्रोत्साहन योजना प्रारम्भ की गई। राज्य के युवाओं को आत्मनिर्भर बनाने के लिए मुख्यमंत्री ग्रामोद्योग रोजगार योजना प्रारम्भ की गई। बेरोजगार युवाओं को बेरोजगारी भत्ता प्रदान करने के लिए उत्तर प्रदेश बेरोजगारी भत्ता नामक योजना आरम्भ की गई। राज्य के श्रमिकों को सरकारी योजनाओं का पूरा लाभ देने के लिए श्रमिक पंजीकरण योजना प्रारम्भ की गई। श्रमिकों के भरण पोषण के लिए राज्य में श्रमिक भरण पोषण योजना आरम्भ की गई है। इसके साथ ही राज्य की समृद्धि के लिए उद्योगों को प्रोत्साहित किया जा रहा है।

योगी सरकार ने कृषि क्षेत्र पर भी विशेष ध्यान दिया है। प्रदेश में जैविक खेती को प्रोत्साहन देने के लिए परम्परागत खेती विकास योजना चलाई जा रही है। खेतों को पर्याप्त सिंचाई जल उपलब्ध कराने के लिए उत्तर प्रदेश नि:शुल्क बोरिंग योजना तथा उत्तर प्रदेश किसान उदय योजना संचालित की जा रही है। इनके अतिरिक्त बीज ग्राम योजना के अंतर्गत किसानों को धान एवं गेहूं के बीज पर विशेष अनुदान दिया जा रहा है। पारदर्शी किसान सेवा योजना के अंतर्गत किसानों को आर्थिक सहायता प्रदान की जा रही है। मुख्यमंत्री किसान एवं सर्वहित बीमा योजना के अंतर्गत किसानों को समुचित उपचार की सुविधा प्रदान की जा रही है। किसानों को ऋण के बोझ से मुक्त करने के लिए किसान ऋण मोचन योजना प्रारम्भ की गई। मुख्यमंत्री कृषक दुर्घटना कल्याण योजना के अंतर्गत किसानों को वित्तीय सहायता प्रदान की जा रही है।  

प्रदेश में अनाथ बच्चों को शरण देने के लिए मुख्यमंत्री बाल सेवा योजना प्रारम्भ की गई। महिला सशक्तिकरण के लिए भी सरकार अनेक योजनाएं चला रही है। मुख्यमंत्री कन्या सुमंगला योजना के अंतर्गत निर्धन परिवारों की पुत्रियों को शिक्षा के लिए वित्तीय सहायता प्रदान की जा रही है। उत्तर प्रदेश भाग्यलक्ष्मी योजना के अंतर्गत पुत्री की शिक्षा और विवाह के लिए आर्थिक सहायता प्रदान की जा रही है। इसके अतिरिक्त लोगों को घर बैठे बैंकिंग सुविधाएं उपलब्ध कराने के लिए बैंकिंग संवाददाता सखी योजना प्रारम्भ की गई है। इससे जहां लोगों को घर पर बैंकिंग सुविधाएं प्राप्त हो रही हैं, वहीं महिलाओं को भी रोजगार प्राप्त हुआ है। 

प्रदेश में अनेक पेंशन योजनाएं संचालित की जा रही हैं, जिनमें उत्तर प्रदेश पेंशन योजना, विधवा पेंशन योजना तथा उत्तर प्रदेश दिव्यांगजन पेंशन योजना सम्मिलित हैं। सरकार लड़कियों और दिव्यांगों के विवाह के लिए अनुदान प्रदान कर रही है। उत्तर प्रदेश विवाह अनुदान योजना के अंतर्गत लड़कियों के विवाह के लिए सरकार द्वारा अनुदान प्रदान किया जाता है। दिव्यांगजन विवाह प्रोत्साहन योजना के अंतर्गत दिव्यांगजनों के विवाह लिए आर्थिक सहायता प्रदान की जाती है। 

योगी सरकार शिक्षा के क्षेत्र में भी उल्लेखनीय कार्य कर रही है। प्रदेश में विद्यालयों, महाविद्यालयों एवं व्यवसायिक प्रशिक्षण केंद्रों एवं उनके नये भवनों की स्थापना की जा रही है। गोरखपुर में आयुष विश्वविद्यालय का निर्माण किय जा रहा है। उत्तर प्रदेश छात्रवृत्ति योजना के अंतर्गत छात्रों को छात्रवृत्ति प्रदान की जा रही है। उच्च शिक्षा में 119 राजकीय महाविद्यालयों में ई-लर्निंग पाठ्यक्रम विकसित किए गए हैं तथा 87 राजकीय महाविद्यालयों में स्मार्ट कक्षाओं की व्यवस्था की गई है तथा प्रदेश के 27 विश्वविद्यालयों द्वारा राष्ट्रीय स्तर के संस्थानों के साथ 111 अनुबंध पर हस्ताक्षर किए गए हैं। इसके अतिरिक्त 26 नये सरकारी पॉलिटेक्निक स्वीकृत किए गए हैं, जबकि 24 निर्माणाधीन हैं। 

सरकार ने अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में पदक प्राप्त करने वाले और विभिन्न विभागों में 24 पदों की पहचान करने वाले खिलाड़ियों को राजपत्रित अधिकारी बनाने का भी निर्णय लिया है। एक जिला एक खेल योजना के अंतर्गत प्रत्येक जिले में खेलो इंडिया सेंटर स्थापित किए जा रहे हैं। 

स्वास्थ्य के क्षेत्र में भी योगी सरकार सरहनीय कार्य कर रही है। प्रदेश के सभी 4600 प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में हेल्थ एटीएम लगाए जा रहे हैं। प्रदेश के 65 जिलों में चिकित्सा महाविद्यालय चल रहे हैं तथा गोरखपुर और रायबरेली में एम्स चल रहे हैं। इसके अतिरिक्त आयुष्मान कार्ड के माध्यम से प्रदेश के करोड़ों लोगों को पांच लाख रुपये तक के स्वास्थ्य बीमा के अंतर्गत लाया गया है। योगी सरकार सुरक्षा व्यवस्था को लेकर भी गंभीर है। महिलाओं को सुरक्षा प्रदान करने के लिए सेफ सिटी योजना प्रारम्भ की गई है। विद्युत क्षेत्र में भी योगी सरकार उत्कृष्ट कार्य किया है। परिवहन के क्षेत्र में भी सरकार ने सराहनीय कार्य किए हैं। 

नि:संदेह उत्तर प्रदेश में योगी श्री आदित्य नाथ ने मुख्यमंत्री का पदभार ग्रहण करने के पश्चात प्रदेश प्रदेश में विकास कार्यों की गंगा बहा दी है। आज उत्तर प्रदेश ने विभिन्न क्षेत्रों में देशभर में अपनी पृथक पहचान स्थापित की है। कृषि उत्पादों में भी उत्तर प्रदेश अग्रणी रहा है। गन्ना एवं चीनी उत्पादन में उत्तर प्रदेश लगातार देश में प्रथम स्थान पर रहा। गन्ना मूल्य का भुगतान कर उत्तर प्रदेश देश में अग्रणी रहा। खाद्यान्न गेहूं, आलू, हरी मटर, आम, आंवला एवं दुग्ध उत्पादन में उत्तर प्रदेश देश में प्रथम रहा। तिलहन उत्पादन में भी उत्तर प्रदेश प्रथम स्थान पर रहा। किसानों को देय अनुदान को डीबीटी के माध्यम से भुगतान करने वाला उत्तर प्रदेश देश का प्रथम राज्य है। उत्तर प्रदेश किसानों के लिए बाजार को व्यापक बनाने हेतु मंडी अधिनियम में संशोधन करने वाला देश का प्रथम राज्य है। प्रधानमंत्री स्वनिधि योजना के क्रियान्वयन में भी उत्तर प्रदेश देश में प्रथम स्थान पर रहा। 
लोगों को नि:शुल्क विद्युत कनेक्शन देने में उत्तर प्रदेश देश में प्रथम रहा। इसी प्रकार उज्ज्वला योजना के अंतर्गत नि:शुल्क गैस कनेक्शन देने में उत्तर प्रदेश देश में अग्रणी रहा। उत्तर प्रदेश प्रधानमंत्री जीवन ज्योति योजना के अंतर्गत लोगों को लाभान्वित कर देश में द्वितीय स्थान पर रहा।   

निर्माण कार्यों में भी उत्तर प्रदेश किसी से पीछे नहीं है। प्रधानमंत्री आवास योजना के अंतर्गत शहरी एवं ग्रामीण क्षेत्रों में 40 लाख से अधिक निर्माण एवं निर्माण कार्यों को स्वीकृति देकर उत्तर प्रदेश अग्रणी रहा। इसके अतिरिक्त उत्तर प्रदेश पांच एक्सप्रेस वे का एक साथ निर्माण कर अग्रणी रहा। साथ ही 30 नये मेडिकल कॉलेजों का निर्माण करके भी उत्तर प्रदेश अग्रणी रहा है। उत्तर प्रदेश आवास योजना के अंतर्गत लाभार्थियों के आधार कार्ड सीडिंग, आवास चयन, प्रथम द्वितीय, तृतीय किस्त जारी करने और आवास निर्माण आदि के प्रदर्शन में भी अग्रणी रहा। उत्तर प्रदेश दो करोड़ 61 लाख व्यक्तिगत शौचालयों का निर्माण करके भी देश में प्रथम स्थान पर रहा है।         
उत्तर प्रदेश स्वास्थ्य नीति लागू करने वाला देश का प्रथम राज्य है। उत्तर प्रदेश सर्वाधिक कोरोना जांच एवं टीकाकरण करने वाला राज्य है। उत्तर प्रदेश कोरोना काल में सर्वाधिक नि:शुल्क खाद्यान्न वितरित करने वाला राज्य रहा। उत्तर प्रदेश कोरोना काल में दूसरे राज्यों से घर वापस आने वाले कामगारों तथा असंगठित श्रमिकों, फेरी वालों, रिक्शा चालकों, कुलियों, पल्लेदारों आदि को नि:शुल्क खाद्यान्न एवं भरण पोषण भत्ता देने वाला अग्रणी राज्य है। नोएडा में उत्तर भारत के प्रथम डेटा सेंटर की स्थापना हुई।   

औद्योगीकरण के लिए भूमि उपलब्धता एवं आवंटन में भी उत्तर प्रदेश देश के शीर्ष राज्यों में सम्मिलित है। साथ ही उत्तर प्रदेश सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्योगों की स्थापना में देश में अग्रणी रहा। सैनिटाइजर और मास्क उत्पादन में भी उत्तर प्रदेश अग्रणी रहा। उत्तर प्रदेश सर्वाधिक सरकारी नौकरियां और रोजगार देने वाला राज्य है। 

उत्तर प्रदेश ने ‘एक जनपद-एक योजना’ को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई। उत्तर प्रदेश सभी थानों में महिला हेल्प डेस्क की स्थापना करने वाला उत्तर भारत का प्रथम राज्य है। उत्तर प्रदेश ने महात्मा गांधी रोजगार गारंटी अधिनियम के अंतर्गत 101 करोड़ से अधिक मानव दिवस सृजित कर डेढ़ करोड़ श्रमिकों को रोजगार दिया। उत्तर प्रदेश कौशल विकास नीति को लागू करने वाला प्रथम राज्य है। 

उत्तर प्रदेश में प्रधानमंत्री जनधन योजना के अंतर्गत सर्वाधिक सात करोड़ दो लाख खाते खोले गए। उत्तर प्रदेश अटल पेंशन योजना के अंतर्गत 36 लाख 60 हजार 615 लोगों को लाभान्वित कर देश में अग्रणी रहा। उत्तर प्रदेश ई-मार्केट प्लेस जेम के माध्यम से सर्वाधिक सरकारी खरीददारी करने में अग्रणी रहा। उत्तर प्रदेश ई-चालान व्यवस्था लागू करने वाला देश का प्रथम राज्य है। ई-प्रोसिसक्यूशन प्रणाली लागू करने में भी यह राज्य अग्रणी है। उत्तर प्रदेश ने 39 करोड़ 42 लाख पौधारोपण करके रिकॉर्ड स्थापित किया। उत्तर प्रदेश मानव वन्य जीव संघर्ष को आपदा घोषित करने वाला प्रथम राज्य है। उत्तर प्रदेश सूचनाओं के आदान-प्रदान एवं पारदर्शिता में भी अग्रणी है।  
उत्कृष्ट कार्यों के लिए उत्तर प्रदेश सरकार को अनेक पुरस्कार प्राप्त हुए हैं। प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि योजना के क्रियान्वयन में उत्तर प्रदेश को देश में सर्वाधिक प्रदर्शन का पुरस्कार प्राप्त हुआ। भारत सरकार द्वारा उत्तर प्रदेश को दो करोड़ रुपये का कृषि कर्मण पुरस्कार प्राप्त हुआ। उत्तर प्रदेश को पंचायती राज मंत्रालय भारत सरकार द्वारा उत्कृष्ट प्रदर्शन हेतु राष्ट्रीय ई-गवर्नेंस पुरस्कार प्राप्त हुआ है। ई-टेंडरिंग प्रणाली में उत्तर प्रदेश ने सर्वोत्तम प्रदर्शन के लिए अवार्ड प्राप्त किया। महिलाओं की सुरक्षा के लिए सभी बसों में पैनिक बटन एवं सीसीटीवी कैमरों की व्यवस्था करने वाला उत्तर प्रदेश देश का प्रथम राज्य बना। उत्तर प्रदेश में अविरल और निर्मल गंगा के प्रति जन जागरूकता के लिए प्रथम बार गंगा यात्रा का आयोजन किया गया। अयोध्या दीपोत्सव में उत्तर प्रदेश ने विश्व कीर्तिमान स्थापित किया। भाजपा अपने घोषणा-पत्र में जनता से किए वादों को पूर्ण करने के लिए निरंतर प्रयासरत है। 

Sunday, December 22, 2024

सहृदय कवि अटलजी

अटल जी के जन्म दिवस 25 दिसंबर पर विशेष
डॊ. सौरभ मालवीय 
पूर्व प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी को एक राजनीतिज्ञ के रूप में जाना जाता है. राजनीतिज्ञ होने के अलावा वह साहित्यकार भी हैं. उन्हें साहित्य विरासत में मिला था. वह कहते हैं, ‘रामचरितमानस’ तो मेरी प्रेरणा का स्रोत रहा है. जीवन की समग्रता का जो वर्णन गोस्वामी तुलसीदास ने किया है, वैसा विश्व-साहित्य में नहीं हुआ है. बचपन से ही उन्होंने कविताएं लिखनी शुरू कर दी थीं. स्वदेश-प्रेम, जीवन-दर्शन, प्रकृति तथा मधुर भाव की कविताएं उन्हें बाल्यावस्था से ही आकर्षित करती रही हैं. उनकी कविताओं में प्रेम है, करुणा है, वेदना है. एक पत्रकार के रूप में वे बहत गंभीर दिखाई देते हैं. वे कहते हैं, मेरे भाषणों में मेरा लेखक ही बोलता है, पर ऐसा नहीं कि राजनेता मौन रहता है. मेरे लेखक और राजनेता का परस्पर समन्वय ही मेरे भाषणों में उतरता है. यह जरूर है कि राजनेता ने लेखक से बहुत कुछ पाया है. साहित्यकार को अपने प्रति सच्चा होना चाहिए. उसे समाज के लिए अपने दायित्व का सही अर्थों में निर्वाह करना चाहिए. उसके तर्क प्रामाणिक हो. उसकी दृष्टि रचनात्मक होनी चाहिए. वह समसामयिकता को साथ लेकर चले, पर आने वाले कल की चिंता जरूर करे. वे भारत को विश्वशक्ति के रूप में देखना चाहते हैं. वे कहते हैं, मैं चाहता हूं भारत एक महान राष्ट्र बने, शक्तिशाली बने, संसार के राष्ट्रों में प्रथम पंक्ति में आए.

जब वह पांचवीं कक्षा में थे, तब उन्होंने प्रथम बार भाषण दिया था. लेकिन बड़नगर में उच्च शिक्षा की व्यवस्था न होने के कारण उन्हें ग्वालियर जाना पड़ा. उन्हें विक्टोरिया कॉलेजियट स्कूल में दाख़िल कराया गया, जहां से उन्होंने इंटरमीडिएट तक की पढ़ाई की. इस विद्यालय में रहते हुए उन्होंने वाद-विवाद प्रतियोगिताओं में भाग लिया तथा प्रथम पुरस्कार भी जीता. उन्होंने विक्टोरिया कॉलेज से स्नातक स्तर की शिक्षा ग्रहण की. कॉलेज जीवन में ही उन्होंने राजनीतिक गतिविधियों में भाग लेना आरंभ कर दिया था. वह 1943 में कॉलेज यूनियन के सचिव रहे और 1944 में उपाध्यक्ष भी बने. ग्वालियर की स्नातक उपाधि प्राप्त करने के बाद वह कानपुर चले गए. यहां उन्होंने डीएवी महाविद्यालय में प्रवेश लिया. उन्होंने कला में स्नातकोत्तर उपाधि प्रथम श्रेणी में प्राप्त की. इसके बाद वह पीएचडी करने के लिए लखनऊ चले गए. पढ़ाई के साथ-साथ वह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्य भी करने लगे. परंतु वह पीएचडी करने में सफलता प्राप्त नहीं कर सके, क्योंकि पत्रकारिता से जुड़ने के कारण उन्हें अध्ययन के लिए समय नहीं मिल रहा था. उस समय राष्ट्रधर्म नामक समाचार-पत्र पंडित दीनदयाल उपाध्याय के संपादन में लखनऊ से मुद्रित हो रहा था. तब अटलजी इसके सह सम्पादक के रूप में कार्य करने लगे. पंडित दीनदयाल उपाध्याय इस समाचार-पत्र का संपादकीय स्वयं लिखते थे और शेष कार्य अटलजी एवं उनके सहायक करते थे. राष्ट्रधर्म समाचार-पत्र का प्रसार बहुत बढ़ गया. ऐसे में इसके लिए स्वयं की प्रेस का प्रबंध किया गया, जिसका नाम भारत प्रेस रखा गया था. वह मासिक पत्रिका राष्ट्रधर्म के प्रथम संपादक रहे हैं. वह प्रथमांक से 26 अक्टूबर, 1950 तक इसके संपादक रहे.
अटल जी कहते हैं कि छात्र जीवन से ही मेरी इच्छा संपादक बनने की थी. लिखने-पढ़ने का शौक और छपा हुआ नाम देखने का मोह भी. इसलिए जब एमए की पढ़ाई पूरी की और कानून की पढ़ाई अधूरी छोड़ने के बाद सरकारी नौकरी न करने का पक्का इरादा बना लिया और साथ ही अपना पूरा समय समाज की सेवा में लगाने का मन भी. उस समय पूज्य भाऊ राव देवरस जी के इस प्रस्ताव को तुरंत स्वीकार कर लिया कि संघ द्वारा प्रकाशित होने वाले राष्ट्रधर्म के संपादन में कार्य करूंगा, श्री राजीवलोचन जी भी साथ होंगे. अगस्त 1947 में पहला अंक निकला और इसने उस समय के प्रमुख साहित्यकार सर सीताराम, डॉ. भगवान दास, अमृतलाल नागर, श्री नारायण चतुर्वेदी, आचार्य वृहस्पति व प्रोफेसर धर्मवीर को जोड़कर धूम मचा दी.

कुछ समय के पश्चात 14 जनवरी 1948 को भारत प्रेस से मुद्रित होने वाला दूसरा समाचार पत्र पांचजन्य भी प्रकाशित होने लगा. अटलजी इसके प्रथम संपादक बनाए गए. इस समाचार-पत्र का संपादन पूर्ण रूप से वही करते थे. 15 अगस्त, 1947 को देश स्वतंत्र हो गया था. कुछ समय के पश्चात 30 जनवरी, 1948 को महात्मा गांधी की हत्या हुई. इसके बाद भारत सरकार ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को प्रतिबंधित कर दिया. इसके साथ ही भारत प्रेस को बंद कर दिया गया, क्योंकि भारत प्रेस भी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रभाव क्षेत्र में थी. भारत प्रेस के बंद होने के पश्चात अटलजी इलाहाबाद चले गए. यहां उन्होंने क्राइसिस टाइम्स नामक अंग्रेज़ी साप्ताहिक के लिए कार्य करना आरंभ कर दिया. परंतु जैसे ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर लगा प्रतिबंध हटा, वह पुन: लखनऊ आ गए और उनके संपादन में स्वदेश नामक दैनिक समाचार-पत्र प्रकाशित होने लगा. परंतु हानि के कारण स्वदेश को बंद कर दिया गया. वर्ष 1949 में काशी से सप्ताहिक ’चेतना’ का प्रकाशन प्रारंभ हुआ. इसके संपादक का कार्यभार अटलजी को सौंपा गया. उन्होंने इसे सफलता के शिखर तक पहुंचा दिया.

फिर वर्ष 1950 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से प्रतिबंध हटने क बाद दैनिक स्वदेश का पुन: प्रकाशन शुरू हो गया. दुर्भाग्यवश वर्ष 1952 में प्रथम लोकसभा चुनाव के बाद आर्थिक संकट के कारण स्वदेश को बंद करना पड़ा. उस समय अटलजी ने इसका अंतिम संपादकीय लिखा, जिसका शीर्षक था अलविदा. यह संपादकीय बहुत चर्चित हुआ. इसके बाद वह दिल्ली आ गए और यहां से प्रकाशित होने वाले समाचार पत्र वीर अर्जुन में कार्य करने लगे. यह दैनिक एवं साप्ताहिक दोनों आधार पर प्रकाशित हो रहा था.
अपने संपादक कार्यकाल के बारे में अटलजी कहते हैं, उन दिनों संपादन का कार्य बड़े दायित्व का कार्य समझा जाता था. उसके साथ प्रतिष्ठा भी जुड़ी होती थी. वेतन तथा अन्य सुविधाओं पर उतना ध्यान नहीं दिया जाता था. हम तो अवैतनिक संपादक ही रहे. केवल जरूरी खर्च भर के लिए ही पैसे लेते थे. सुविधाएं नाममात्र कीं, किंतु विचारधारा के प्रचार का एक अदभुत संतोष था. दैनिक समाचार-पत्रों के संपादन के बारे में वे कहते हैं, दैनिक पत्र के संपादन का आनंद तो और ही है. उसका अपना अलग ही आनंद होता है. मुझे याद है, शाम से जो कार्य प्रारंभ होता था कि कौन कितनी देर रात समाचारों को खोजता है और उनके प्रकाशन में आगे रहता है. प्राय: प्रतिदिन भोर में जब चिड़ियां चहचहाने लगती थीं, तो थकान से चूर होकर खाट पर लेटते थे. और ऐसी गहरी नींद आती थी कि उसका स्मरण कर इस समय भी मन पुलकित हो जाता है.

अटलजी कहते हैं, ‘रामचरितमानस’ तो मेरी प्रेरणा का स्रोत रहा है. जीवन की समग्रता का जो वर्णन गोस्वामी तुलसीदास ने किया है, वैसा विश्व-साहित्य में नहीं हुआ है. काव्य लेखन के बारे में उनका कहना है, साहित्य के प्रति रुचि मुझे उत्तराधिकार के रूप में मिली है. परिवार का वातावरण साहित्यिक था. मेरे बाबा पंडित श्यामलाल वाजपेयी बटेश्वर में रहते थे. उन्हें संस्कृत और हिन्दी की कविताओं में बहुत रुचि थी. यद्यपि वे कवि नहीं थे, परंतु काव्य प्रेमी थे. उन्हें दोनों ही भाषाओं की बहुत सी कविताएं कंठस्थ थीं. वे अकसर बोलचाल में छंदों को उदधृत करते थे. मेरे पिता पंडित कृष्ण बिहारी वाजपेयी ग्वालियर रियासत के प्रसिद्ध कवि थे. वे ब्रज और खड़ी बोली में काव्य लेखन करते थे. उनकी कविता ’ईश्वर प्रार्थना’ विद्यालयों में प्रात: सामूहिक रूप से गाई जाती थी. यह सब देख-सुन कर मन को अति प्रसन्नता मिलती थी.  पिता जी की देखा-देखी मैं भी तुकबंदी करने लगा. फिर कवि सम्मेलनों में जाने लगा. ग्वालियर की हिंदी साहित्य सभा की गोष्ठियों में कविताएं पढ़ने लगा. लोगों द्वारा प्रशंसा मिली प्रशंसा ने उत्साह बढ़ाया.

अटलजी कहते हैं, सच्चाई यह है कि कविता और राजनीति साथ-साथ नहीं चल सकतीं. ऐसी राजनीति, जिसमें प्राय: प्रतिदिन भाषण देना जरूरी है और भाषण भी ऐसा जो श्रोताओं को प्रभावित कर सके, तो फिर कविता की एकांत साधना के लिए समय और वातावरन ही कहां मिल पाता है. मैंने जो थोड़ी-सी कविताएं लिखी हैं, वे परिस्थिति-सापेक्ष हैं और आसपास की दुनिया को प्रतिबिम्बित करती हैं.
अपने कवि के प्रति ईमानदार रहने के लिए मुझे काफी कीमत चुकानी पड़ी है, किंतु कवि और राजनीतिक कार्यकर्ता के बीच मेल बिठाने का मैं निरंतर प्रयास करता रहा हूं. कभी-कभी इच्छा होती है कि सब कुछ छोड़कर कहीं एकांत में पढ़ने, लिखने और चिंतन करने में अपने को खो दूं, किंतु ऐसा नहीं कर पाता.  मैं यह भी जानता हूं कि मेरे पाठक मेरी कविता के प्रेमी इसलिए हैं कि वे इस बात से खुश हैं कि मैं राजनीति के रेगिस्तान में रहते हुए भी, अपने हृदय में छोटी-सी स्नेह-सलिला बहाए रखता हूं.
अटलजी राजनीति में रहते हुए भी साहित्य से जुड़े रहे.  वे कहते हैं कि राजनीति और साहित्य दोनों ही जीवन के अंग हैं. वास्तव में ऐसा होता है कि जो लोग राजनीति से जुड़े हैं, वे साहित्य के लिए समय नहीं निकाल पाते. इसी तरह साहित्य से जुड़े लोग राजनीति के लिए समय नहीं दे पाते. किंतु ऐसे लोग भी हैं, जो दोनों से जुड़े होते हैं और दोनों के लिए ही समय देते हैं. परंतु आज के राजनेता साहित्य से दूर हैं, इसी कारण उनमें मानवीय संवेदना का स्रोत सूख-सा गया है. कवि संवेदनशील होता है. तानाशाहों में क्रूरता इसीलिए आ जाती है, क्योंकि वे संवेदनहीन होते हैं. एक कवि के हृदय में दया, क्षमा, करुणा और प्रेम होता है, इसलिए वह खून की होली नहीं खेल सकता. साहित्यकार को पहले अपने प्रति सच्चा होना चाहिए. इसके पश्चात उसे समाज के प्रति अपने दायित्य का सही अर्थों में निर्वाह करना चाहिए.  वह भले ही वर्तमान को लेकर चले, किंतु उसे आने वाले कल की भी चिंता करनी चाहिए. अतीत में जो श्रेष्ठ है, उससे वह प्रेरणा ले, परंतु यह कभी न बूले कि उसे भविष्य का सुंदर निर्माण करना है. उसे ऐसे साहित्य की रचना करनी है, जो मानव मात्र के कल्याण की बात करे.

अटलजी ने कई पुस्तकें लिखी हैं. इसके अलावा उनके लेख, उनकी कविताएं विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुईं, जिनमें राष्टधर्म, पांचजन्य, धर्मयुग, नई कमल ज्योति, साप्ताहिक हिंदुस्तान, कांदिम्बनी और नवनीत आदि सम्मिलित हैं. पत्रकार के रूप में अपना जीवन आरंभ करने वाले अटलजी को कई पुरस्कारों से सम्मानित किया जा चुका है. राष्ट्र के प्रति उनकी समर्पित सेवाओं के लिए 25 जनवरी, 1992 में राष्ट्रपति ने उन्हें पद्म विभूषण से सम्मानित किया. उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान ने 28 सितंबर 1992 को उन्हें ’हिंदी गौरव’ सए सम्मानित किया. इस अवसर पर उन्हें 51 हजार रुपये की धनराशि प्रदान की गई, परंतु उन्होंने उसी समय इसे सम्मान सहित संस्थान को अपनी ओर से भेंट कर दिया. अगले वर्ष 20 अप्रैल 1993  को कानपुर विश्वविद्यालय ने उन्हें डी लिट की उपाधि प्रदान की. उनके सेवाभावी और स्वार्थ त्यागी जीवन के लिए उन्हें 1 अगस्त 1994 में लोकमान्य तिलक पुरस्कार से सम्मानित किया गया.  इसके पश्चात 17 अगस्त 1994 को संसद ने उन्हें श्रेष्ठ सासंद चुना गया तथा पंडित गोविंद वल्लभ पंत पुरस्कार से सम्मानित किया. इसके बाद 27 मार्च, 2015 भारत रत्न पुरस्कार से सम्मानित किया गया. इतने महत्वपूर्ण सम्मान पाने वाली अटलजी कहते हैं, मैं अपनी सीमाओं से परिचित हूं. मुझे अपनी कमियों का अहसास है. निर्णायकों ने अवश्य ही मेरी न्यूनताओं को नजरांदाज करके मुझे निर्वाचित किया है. सदभाव में अभाव दिखाई नहीं देता है. यह देश बड़ा है अदभुत है, बड़ा अनूठा है. किसी भी पत्थर को सिंदूर लगाकर अभिवादन किया जा सकता है.

 अटलजी ने जीवन में अनेक कष्ट भी झेले, किंतु उन्होंने कभी हार नहीं मानी. हर समस्या को उन्होंने एक चुनौती के रूप में लेकर साहस से उसका सामना किया.

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