Showing posts with label धरोहर. Show all posts
Showing posts with label धरोहर. Show all posts

Thursday, July 9, 2026

रानी अवंतीबाई लोधी की प्रतिमा का अनावरणा


-डॉ. सौरभ मालवीय  
उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ की सरकार देश-प्रदेश के महापुरुषों और वीरांगनाओं को पूर्ण आदर-सम्मान दे रही है। उनकी प्रतिमाओं को स्थापित करना इसका प्रमाण है। मुख्यमंत्री ने 9 जुलाई 2026 को जनपद बांदा में वीरांगना रानी अवंतीबाई लोधी की प्रतिमा का अनावरण किया।  

इस अवसर पर आयोजित कार्यक्रम को संबोधित करते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि वीरांगना रानी अवंतीबाई लोधी ने भारत की आन-बान-शान की रक्षा और देश की आजादी के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया। उनका बलिदान और त्याग आज भी देशवासियों के लिए प्रेरणास्रोत है।

उन्होंने कहा कि लगभग तीन वर्ष पहले भी उन्हें बांदा में दो महत्वपूर्ण प्रतिमाओं के अनावरण का अवसर मिला था। आज वीरांगना अवंतीबाई की प्रतिमा के अनावरण से यह गौरवशाली परम्परा आगे बढ़ी है। बांदा का सिटी डेवलपमेंट प्लान, विकसित होती सड़कें और अन्य विकास कार्य इस बात के प्रमाण हैं कि योजनाबद्ध विकास किस प्रकार किसी शहर की पहचान बदल सकता है।

उन्होंने सन् 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम का उल्लेख करते हुए कहा कि उस समय पूरे देश में आजादी की प्रबल इच्छा थी। बैरकपुर में मंगल पाण्डे ने क्रांति की चिंगारी जलाई, मेरठ में कोतवाल धनसिंह गुर्जर ने उसका नेतृत्व किया, कानपुर के बिठूर में तात्या टोपे ने उसे आगे बढ़ाया और झांसी में महारानी लक्ष्मीबाई ने वीरता का अद्भुत उदाहरण प्रस्तुत किया। इसी महान परंपरा में वीरांगना रानी अवंतीबाई लोधी ने भी राष्ट्रधर्म को सर्वोपरि मानते हुए मातृभूमि की रक्षा के लिए अपने प्राणों का बलिदान दिया।

उन्होंने कहा कि आज भले ही वीरांगना रानी अवंतीबाई लोधी हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनका साहस, संघर्ष और बलिदान आने वाली पीढ़ियों के लिए सदैव प्रेरणा का स्रोत बना रहेगा। उन्होंने प्रतिमा स्थापना से जुड़े सभी लोगों अभिनंदन करते हुए कहा कि ऐसे प्रयास समाज में राष्ट्रनायकों के प्रति सम्मान और कृतज्ञता की भावना को मजबूत करते हैं। उन्होंने कहा कि जब अच्छे नेता चुने जाते हैं, तो महापुरुषों को ऐसे ही सम्मान मिलता है। यह सम्मान उन नायकों-नायिकाओं और वीरों-वीरांगनाओं के प्रति कृतज्ञता है, जिनके लिए राष्ट्रधर्म ही सर्वोपरि था और उसके लिए बलिदान दिया। इसी परंपरा में वीरांगना अवंतीबाई लोधी का नाम भी आता है।

इस अवसर पर जलशक्ति राज्य मंत्री श्री रामकेश निषाद, पीडब्ल्यूडी राज्यमंत्री श्री बृजेश सिंह, विधायक श्री प्रकाश द्विवेदी, श्रीमती ओममणी वर्मा सहित अन्य जनप्रतिनिधिगण तथा वरिष्ठ अधिकारी उपस्थित थे।


Tuesday, June 30, 2026

सुप्रसिद्ध कथावाचक पंडित राधेश्याम की प्रतिमा का अनावरण


डॉ. सौरभ मालवीय  
उत्तर प्रदेश सरकार राज्य के कलाकारों को पूर्ण सादर-सम्मान दे रही है। इसका नवीनतम उदाहरण हिन्दी साहित्य एवं लोकनाट्य परंपरा के महान नाटककार एवं सुप्रसिद्ध कथावाचक पंडित राधेश्याम कथावाचक हैं। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी ने 30 जून 2026 को बरेली में पंडित राधेश्याम कथावाचक स्मृति भवन ऑडिटोरियम में पंडित राधेश्याम कथावाचक की प्रतिमा का अनावरण किया।

ज्ञातव्य है कि पंडित राधेश्याम कथावाचक का जन्म 25 नवम्बर 1890 को बरेली के बिहारीपुर मोहल्ले में पंडित बांकेलाल के परिवार में हुआ था। पंडित राधेश्याम हिन्दी साहित्य के महान नाटककार एवं प्रसिद्ध कथावाचक थे। उनकी सर्वाधिक लोकप्रिय कृति ‘राधेश्याम रामायण‘ है, जिसे उन्होंने खड़ीबोली और लोकनाट्य शैली में 25 खंडों में पद्यबद्ध किया। मात्र 17 वर्ष की आयु में रचित इस अमर कृति ने देशभर में अभूतपूर्व लोकप्रियता प्राप्त की। उनके जीवनकाल में ही इसकी हिन्दी एवं उर्दू में कुल मिलाकर लगभग पौने दो करोड़ से अधिक प्रतियां प्रकाशित एवं विक्रय हुईं। पंडित राधेश्याम कथावाचक को स्वतंत्र भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने भी राष्ट्रपति भवन आमंत्रित कर 15 दिनों तक श्रीराम कथा का श्रवण किया था। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की स्थापना के लिए धन संग्रह के दौरान उन्होंने अपनी एक वर्ष की संपूर्ण आय महामना मदन मोहन मालवीय जी को समर्पित कर दी थी। अपनी आत्मकथा ‘मेरा नाटक काल‘ का लेखन भी पंडित राधेश्याम ने अपने जीवन के अंतिम चरण में किया।

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी ने इस अवसर पर आयोजित कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कहा कि विरासत का सम्मान हमारी प्रगति का आधार है। जो समाज अपनी विरासत का सम्मान व संरक्षण करता है, उसी समाज के विकास का मार्ग भी प्रशस्त होता है। जो अपने पूर्वजों तथा अपनी विरासत की दुर्गति करता है, वह अपनी उन्नति की दुर्गति करता है। आज पंडित राधेश्याम कथावाचक की प्रतिमा के अनावरण का सौभाग्य उनके लिए अत्यंत प्रसन्नता की बात है। उनकी कथा सुनते-सुनते हम बड़े हुए हैं।

उन्होंने कहा कि महर्षि वाल्मीकिकृत रामायण ने देश को जोड़ने का कार्य किया। संत तुलसीदास जी ने श्रीराम नाम की ताकत का एहसास हमें कराया। जब तुलसीदास जी से लोगों ने कहा कि आप राज दरबार में जाएंगे, तो आपको भी नवरत्नों में शामिल किया जाएगा, तब उन्होंने कहा कि ‘मेरे राजा एक ही हैं और वह प्रभु श्रीराम हैं। जो कार्य संत तुलसीदास ने श्रीरामचरितमानस के माध्यम से लोगों को जोड़कर किया, वहीं कार्य पंडित राधेश्याम ने किया। उनके संवाद रामलीला मंचन का आधार बने। सनातन धर्म में पंडित राधेश्याम की महत्वपूर्ण भूमिका है, उनके प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करना हमारा दायित्व है। जटायु हों या हनुमान जी, प्रभु श्रीराम की भक्ति जिसने भी की, उसका उद्धार हुआ है।

उन्होंने कहा कि त्रेतायुग में जो कार्य महर्षि वाल्मीकि और मध्यकाल में जो कार्य संत तुलसीदास ने किया, वही कार्य आधुनिक काल में पंडित राधेश्याम कथावाचक ने किया है। सनातन भारत की आत्मा है। पंडित राधेश्याम का सनातन धर्म के प्रति बहुत बड़ा योगदान है। पंडित राधेश्याम जी ने राम नाम की महत्ता से हम सबको बहुत ही सरल भाषा में, सहजता के साथ संवादों के माध्यम से जागरूक किया। रामायण को लोक व्यवहार की बहुत सरल भाषा में प्रस्तुत किया। आज हमें उनकी मूर्ति के अनावरण के माध्यम से उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है।

उन्होंने कहा कि पंडित राधेश्याम ने अपनी लेखनी और कथावाचन से भारतीय संस्कृति, श्रीराम कथा एवं सनातन मूल्यों को जन-जन तक पहुंचाने का कार्य किया। उनका साहित्यिक योगदान भावी पीढ़ी के लिए सदैव प्रेरणास्रोत बनेगा। ऐसे महान साहित्यकारों और सांस्कृतिक विभूतियों का सम्मान करना समाज और शासन, दोनों का दायित्व है।

उन्होंने कहा कि वर्ष 1963 में पंडित राधेश्याम कथावाचक ने अपने भौतिक व नश्वर देह से मुक्ति प्राप्त की, लेकिन उनको वह सम्मान नहीं मिल सका, जो आज मिला है। पंडित राधेश्याम के घरको पर्यटन विभाग के माध्यम से म्यूजियम बनाया जाए। इस कार्य में राज्य सरकार पूरा सहयोग करेगी। इस म्यूजियम में पंडित जी की समस्त स्मृतियां संग्रहीत की जाएगी, जिससे आने वाली पीढ़ियां भी उसका लाभ प्राप्त कर सकती हैं।
इस अवसर पर वित्त एवं संसदीय कार्य मंत्री श्री सुरेश कुमार खन्ना, पशुधन एवं दुग्ध विकास मंत्री श्री धर्मपाल सिंह, वन एवं पर्या वरण राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) श्री अरुण कुमार सक्सेना, सहकारिता राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) श्री जेपीएस राठौर, बरेली के महापौर डॉ. उमेश गौतम सहित अन्य जनप्रतिनिधिगण, पंडित राधेश्याम कथावाचक के परिजन तथा अन्य सदस्यगण उपस्थित थे।

Tuesday, April 28, 2026

महादेव मंदिर के शिखर पर ध्वजारोहण


उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा कि प्रभु श्रीराम के इष्ट देवावाधिदेव महादेव शिव शम्भू थे। लंका में जाने से पूर्व प्रभु श्रीराम ने रामेश्वरम् में भगवान शिव की अराधना की थी। भगवान शिव माता पार्वती को प्रभु श्रीराम की कथा सुनाते हैं और प्रभु श्रीराम अपने अभियान को आगे बढ़ाने के लिए भगवान शिव की अराधना कर रहे हैं। प्रभु श्रीराम के आराध्य भगवान शिव के इस भव्य मंदिर में आज सनातन धर्म का पताका फहर रहा है। यह भारत के गौरव को आगे बढ़ाने वाला पताका है।

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ  29 अप्रैल, 2026 को श्रीराम जन्मभूमि मंदिर, अयोध्या परिसर स्थित श्री शम्भू महादेव मंदिर के शिखर पर धर्म ध्वजारोहण करने के उपरांत आयोजित कार्यक्रम में अपने विचार व्यक्त कर रहे थे। इससे पूर्व, उन्होंने ने श्रीराम जन्मभूमि मंदिर, श्री हनुमानगढ़ी मंदिर तथा श्री शम्भू महादेव मंदिर में दर्शन-पूजन किया। 

उन्होंने कहा कि श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन भारतीय इतिहास का महत्वपूर्ण अभियान रहा है। दुनिया में कहीं भी इस प्रकार का आयोजन नहीं हुआ होगा। दुनिया के प्रत्येक सनातन धर्मावलम्बी के मन में एक ही भाव होता था कि हमारे प्रभू श्रीराम का भव्य मंदिर बने। वह शान हमें प्राप्त हो और उस कार्यक्रम को वह अपनी आंखों से देख सकें। आज से लगभग 500 वर्ष पूर्व, प्रभु श्रीराम जन्मभूमि मंदिर को अपवित्र करके एक विवादित ढांचा खड़ा कर दिया गया था, लेकिन बिना किसी रोक-टोक, दबाव तथा बिना भय के भारत के सनातन धर्मावलम्बी लगातार दृढ़ संकल्पित होकर इस आंदोलन से जुड़े रहे। स्वर्गीय अशोक सिंघल जी उस बिखरी हुई ताकत को एक करने के लिए आगे आए।

उन्होंने कहा कि वर्ष 1983 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने जब इस आंदोलन को अपने हाथों में लिया, तो आंदोलन अपने चरम की ओर बढ़ता गया। जाति, क्षेत्र व भाषा की दीवारें टूट गईं। अरूणाचल प्रदेश, उड़ीसा, नागालैंड, मिजोरम, जम्मू-कश्मीर, लद्दाख, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, छत्तीसगढ़ सहित देश के किसी भी कोने में जाते हैं, तो हम लोगों को देखते ही सबसे पहले वहां के लोगों के मुख से ‘जय श्रीराम’ शब्द निकलता है। इसी माह पश्चिम बंगाल के चुनाव में वहां के दूरदराज के गांवों में भ्रमण के दौरान वहां के लोग भी मुझे देखते ही ‘जय श्रीराम’ का संबोधन करते थे।

उन्होंने कहा कि प्रभु श्रीराम देश को जोड़ने के माध्यम हैं। त्रेता युग से ही प्रभु श्रीराम उत्तर से दक्षिण, भगवान श्रीकृष्ण पूरब से पश्चिम तथा भगवान शिवशंकर द्वादश ज्योतिर्लिंगों के माध्यम से पूरे भारत को जोड़ रहे हैं। डॉ. राम मनोहर लोहिया ने भी कहा था कि जब तक प्रभु श्रीराम, श्रीकृष्ण और शिव शंकर हैं, तब तक भारत का र्कोइ  बाल-बांका नहीं कर सकता।

उन्होंने कहा कि आज हम सभी इस पूरे पड़ाव का महत्वपूर्ण हिस्सा बनने जा रहे हैं। हम सभी गुलामी का ढांचा हटने के भी साक्षी है। माननीय उच्चतम न्यायालय ने व्यापक हित, देशहित तथा भारत के सनातन धर्म की भावनाओं के अनुरूप साक्ष्यों एवं प्रमाणों के आधार पर श्रीराम जन्मभूमि मंदिर पर सर्वसम्मत फैसला दिया था। इस फैसले का स्वागत देश ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया ने किया था। प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी के कर-कमलों से 5 अगस्त 2020 को प्रभु श्रीराम जन्मभूमि पर भव्य श्रीराम मंदिर निर्माण के लिए भूमि-पूजन तथा 22 जनवरी 2024 को श्रीरामलला की प्राण-प्रतिष्ठा का कार्यक्रम सम्पन्न हुआ था। इसके बाद श्रीराम दरबार की मूर्ति-प्रतिष्ठा, श्रीराम जन्मभूमि मंदिर पर धर्मध्वजा का आरोहण तथा 19 मार्च 2026 को श्रीराम यंत्र की स्थापना कार्य संपन्न हुआ था। यह भारतीय इतिहास के स्वर्ण अक्षरों में लिखी जाने वाली तिथियां हैं। हम सभी इन तिथियों के साक्षी हैं।

उन्होंने कहा कि जब हम प्रभु की शरण में भक्त व याचक बन कर जाते हैं, तो प्रभु हमारी मनोकामनाओं को पूर्ण करते हैं। प्रभु जब अपना काम कराना चाहते हैं, तभी सफलता भी प्राप्त होती है। इतने बड़े आंदोलन के पश्चात अंततः विजय प्राप्त हुई। ‘यतो धर्मस्ततो जयः’ अर्थात् जहां धर्म है, वहीं विजय है। जहां अयोध्या तथा प्रभु श्रीराम होंगे, वहां विजय अवश्य होगी। सम-विषम परिस्थितियों में हम झुकेंगे नहीं, रुकेंगे नहीं, डिगेंगे नहीं तथा अपने लक्ष्य को प्राप्त करेंगे, अयोध्या ने इसे पूरी दुनिया को बताया है। आज अयोध्या में लाखों श्रद्धालु दर्शन कर रहे हैं। यहां रेलवे तथा एयर कनेक्टिविटी की बेहतरीन सुविधा है। अयोध्या में चारों तरफ 4-लेन सड़कें बन चुकी हैं। यह नई अयोध्या त्रेता युग की याद दिला रही है।

उन्होंने कहा कि सभी सनातन धर्मावलम्बियों के एक साथ तथा एक स्वर में आवाज उठाने के परिणामस्वरूप ही प्रभु श्रीराम के भव्य मंदिर का निर्माण संभव हो पाया है। हम बंटे थे, तभी विधर्मी उसका लाभ उठा पाये थे। आज हम एकजुट होकर उनका मुकाबला कर रहे हैं, तो प्रत्येक व्यक्ति सुरक्षित है। अपनी विरासत को गौरव के साथ हम आने वाली पीढ़ी को बताने की स्थिति में हैं कि हमारे सामने प्रभु श्रीराम मंदिर पर फैसला,  प्रभु श्रीराम मंदिर के निर्माण के लिए भूमि-पूजन, प्रभु श्रीरामलला व श्रीराम दरबार की प्राण-प्रतिष्ठा, मंदिर के शिखर पर धर्मध्वजा का आरोहण तथा श्रीराम यंत्र की स्थापना कार्यक्रम सम्पन्न हुआ था। हम सभी ने इन सभी ऐतिहासिक क्षणों तथा रामनवमी के दिन प्रभु श्रीरामलला को सूर्य तिलक लगते हुए अपनी आखों से देखा है। यह आंदोलन दुनिया के लिए एक अनूठा उदाहरण है। दुनिया इसका अनुसरण करने के लिए लालायित है।

उन्होंने कहा कि आज प्रभु श्रीराम जन्मभूमि परिसर में भगवान शिव मंदिर में भगवा ध्वज का आहोरण भव्यता के साथ संपन्न हुआ है। माता पार्वती को प्रभु श्रीराम की कथा भगवान शिव ही सुना रहे हैं। काक भुशुंडी उसका वाचन कर रहे हैं। कौन सी योनि है, जो राम कथा की पिपासी न हो। आज हम साक्षात प्रभु श्रीराम मंदिर में दर्शन कर रहे हैं। हम सभी को सनातन धर्म की एकता के माध्यम से भारत की एकता-अखंडता को बनाए रखने में अपना योगदान देना होगा। अपनी विरासत को मजबूती के साथ आगे बढ़ाने के लिए कृतसंकल्पित होना होगा। अपने महापुरुषों को जातीयता के दायरे में बांटने वालों से सावधान रहना होगा। आज प्रत्येक सनातन धर्मावलम्बी अपनी विरासत पर गौरव की अनुभूति कर रहा है। जिस दिन 140 करोड़ भारतवासी अपने नेतृत्व पर मजबूती से विश्वास कर आगे बढ़ेंगे, दुनिया की कोई ताकत उनका सामना नहीं कर सकेगी। नये भारत को इसी दिशा में आगे बढ़ाने के लिए हम सभी को संकल्पित होना होगा।

इस अवसर पर कृषि मंत्री सूर्य प्रताप शाही, श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ न्यास क्षेत्र के महासचिव चम्पत राय, अयोध्या के महापौर गिरीशपति त्रिपाठी सहित अन्य गणमान्य व्यक्ति उपस्थित थे।

Saturday, March 7, 2026

ब्रज भारत की आस्था, संस्कृति कृति और आध्यात्मिक परम्परा का केंद्र


उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा है कि ब्रज क्षेत्र भारत की आस्था, संस्कृति और आध्यात्मिक परम्परा का अत्यंत महत्वपूर्ण केंद्र है। प्रदेश सरकार यहाँ की परम्परा और श्रद्धालुओं की आस्था का सम्मान करते हुए ब्रज क्षेत्र के विकास के लिए प्रतिबद्ध है। तीर्थ स्थलों के संरक्षण के साथ ही, श्रद्धालुओं की सुविधा, पर्यावरण संरक्षण, स्वच्छता, आधारभूत ढांचे के विकास और सांस्कृतिक विरासत के संवर्धन को प्राथमिकता दी जा रही है। इससे ब्रज क्षेत्र की पहचान और अधिक सुदृढ़ होगी तथा यहां आने वाले श्रद्धालुओं को बेहतर सुविधाएं प्राप्त हो सकेंगी।

मुख्यमंत्री 7 मार्च 2026 को जनपद मथुरा स्थित वृन्दावन में गीता शोध संस्थान एवं रासलीला अकादमी परिसर स्थित यमुना एक्सप्रेस-वे औद्योगिक विकास प्राधिकरण के क्षेत्रीय कार्यालय सभागार में आयोजित उत्तर प्रदेश ब्रज तीर्थ विकास परिषद की अष्टम बोर्ड बैठक की अध्यक्षता कर रहे थे। बैठक में लगभग 300 करोड़ रुपये के कार्यों को स्वीकृति प्रदान की गई। ब्रज क्षेत्र के समग्र विकास, तीर्थ स्थलों के संरक्षण तथा श्रद्धालुओं के लिए सुविधाओं के विस्तार से जुड़े कई महत्वपूर्ण प्रस्तावों को मंजूरी दी गई। बैठक में मथुरा-वृन्दावन रेल मार्ग के 11.80 किलोमीटर लम्बे ट्रैक को 4-लेन मार्ग में विकसित करने के प्रस्ताव पर चर्चा हुई। इस संबंध में मुख्यमंत्री ने लोक निर्माण विभाग, ब्रज तीर्थ विकास परिषद तथा जिला प्रशासन को रेलवे विभाग से समन्वय स्थापित कर भूमि अथवा भूमि मूल्य से संबंधित आवश्यक कार्यवाही करने के निर्देश दिए। उन्होंने कहा कि पॉड रैपिड ट्रांजिट सिस्टम की व्यवहारिकता का अध्ययन किया जाए। उन्होंने ब्रज की प्रसिद्ध 84 कोस परिक्रमा मार्ग के विकास के लिए संबंधित विभागों को कार्ययोजना तेजी से लागू करने के निर्देश दिए।

बैठक में गोवर्धन, मथुरा और वृन्दावन में पार्किंग, टीपीओ तथा अन्य जनसुविधाओं को विकसित करने के लिए चिन्हित भूमि पर पीपीपी मॉडल के तहत कार्य कराने का निर्णय लिया गया। मुख्यमंत्री ने छाता क्षेत्र के ग्राम अजीजपुर में प्रस्तावित वाटर म्यूजियम के लिए चिन्हित भूमि को सिंचाई विभाग से परिषद को हस्तान्तरित करने की प्रक्रिया शीघ्र पूर्ण कराने के निर्देश दिए।

मुख्यमंत्रीने ब्रज क्षेत्र में 36 वनों के ईको-रेस्टोरेशन प्रोजेक्ट की सराहना करते हुए आगामी वर्षा ऋतु में वन महोत्सव के दौरान व्यापक वृक्षारोपण अभियान चलाने के निर्देश दिए। उन्होंने इस अभियान में जल संरक्षण, खारे पानी के उपचार तथा जनसहभागिता को भी शामिल करने पर बल दिया। बैठक में यमुना एक्सप्रेस-वे औद्योगिक विकास प्राधिकरण के अंतर्गत विकसित होने वाली हेरिटेज सिटी पर भी चर्चा हुई। बैठक में यमुना रिवरफ्रंट परियोजना के अंतर्गत मथुरा से वृन्दावन के बीच जलमार्ग विकसित कर पीपीपी मॉडल पर क्रूज और नौका संचालन शुरू करने की योजना पर भी सहमति बनी। उन्होंने ने गोवर्धन स्थित पारसौली में सूरदास ब्रज अकादमी के संचालन के लिए आवश्यक कार्मिकों की तैनाती सुनिश्चित करने के निर्देश दिए। उन्होंने परिषद की वर्ष 2025-26 की कार्ययोजना में प्रस्तावित परियोजनाओं के लिए बजट स्वीकृत करते हुए कहा कि परिषद द्वारा अनुमोदित परियोजनाओं के बजट में किसी प्रकार की कटौती न की जाए और उन्हें शीघ्र धरातल पर उतारा जाए। नगर निकायों में श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए स्वच्छता, सुरक्षा और आधारभूत ढांचे को मजबूत करने पर भी जोर दिया गया। उन्होंने जल निगम और नगर निगम द्वारा एसटीपी, एसपीएस तथा पम्पिंग स्टेशन के निर्माण कार्यों को तेजी से पूरा कर यमुना नदी में प्रदूषण कम करने के निर्देश दिए।

उन्होंने उत्तर प्रदेश ब्रज तीर्थ विकास परिषद के माध्यम से विभिन्न विभागों को निर्धारित दिशा-निर्देशों का पालन सुनिश्चित कराने के निर्देश दिए। उन्होंने कहा कि मथुरा-वृन्दावन सहित पूरे ब्रज क्षेत्र में सफाई व्यवस्था पर विशेष ध्यान दिया जाए।


बैठक में लिए गए प्रमुख निर्णयों के अनुसार मथुरा-वृन्दावन रेल ट्रैक के स्थान पर 11.80 किलोमीटर लम्बा 4-लेन मार्ग विकसित करने की प्रक्रिया को तेज किया जाएगा। ब्रज की 84 कोस परिक्रमा मार्ग के विकास के लिए लोक निर्माण विभाग और धर्मार्थ कार्य विभाग को आवश्यक दिशा-निर्देश दिए गए हैं। मथुरा, वृन्दावन और गोवर्धन में पार्किंग तथा अन्य जनसुविधाओं का विकास पीपीपी मॉडल के माध्यम से किया जाएगा। यमुना नदी में मथुरा से वृन्दावन के बीच जलमार्ग विकसित कर क्रूज और नौका संचालन की योजना को भी आगे बढ़ाया जाएगा। साथ ही, ब्रज क्षेत्र में पर्यावरण संरक्षण के लिए 36 वनों के ईको-रेस्टोरेशन और व्यापक वृक्षारोपण अभियान को प्रोत्साहित किया जाएगा तथा छाता क्षेत्र के ग्राम अजीजपुर में प्रस्तावित वाटर म्यूजियम के लिए चिन्हित भूमि को सिंचाई विभाग से परिषद को हस्तान्तरित करने की प्रक्रिया शीघ्र पूर्ण कराई जाएगी।

बैठक के दौरान मुख्यमंत्री ने उत्तर प्रदेश ब्रज तीर्थ विकास परिषद के डोनेशन मैनेजमेंट डिजिटल सिस्टम का शुभारम्भ किया। मथुरा भ्रमण के दौरान मुख्यमंत्री ने श्रीकृष्ण जन्मस्थान मंदिर में दर्शन-पूजन किया। उन्होंने श्रद्धालुओं के साथ फूलों की होली खेली। उन्होंने गीता शोध संस्थान के निर्माणाधीन स्वामी हरिदास प्रेक्षागृह का निरीक्षण किया। उन्होंने अन्नपूर्णा भवन की पाकशाला का अवलोकन किया तथा भोजन हेतु लोगों के बैठने की व्यवस्था का जायजा लिया।

मुख्यमंत्री जी ने मथुरा के थाना पर्यटन में आवासीय एवं अनावासीय भवनों के निर्माण कार्यों का उद्घाटन किया। यह थाना अपराध नियंत्रण के साथ-साथ तीर्थयात्रियों को विश्वस्तरीय सुविधा और सहायता प्रदान करने के लिए एक अत्याधुनिक केंद्र के रूप में कार्य करेगा।


Sunday, February 1, 2026

रविदास जयंती पर प्रतिमा का अनावरण


उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी ने कहा कि संत शिरोमणि सद्गुरु रविदास जी महाराज जी का प्रकटीकरण काशी के सीर गोवर्धन में माघी पूर्णिमा के दिन हुआ था। उनकी दिव्य आभा से आलोकित होकर समाज ‘एक भारत-श्रेष्ठ भारत’ के निर्माण की दिशा में आगे बढ़ रहा है। सद्गुरु रविदास जी महाराज ने प्रत्येक नागरिक को वैष्णव परम्परा के अनुरूप जिस उपासना के लिए प्रेरित किया, वह जीवन में कर्म की प्रधानता व मन की शुद्धता को महत्व देता है तथा प्रत्येक नागरिक को लोक कल्याण के प्रति आग्रही बनाता है।

मुख्यमंत्री ने 1 फरवरी 2026 को लखनऊ में संत शिरोमणि सद्गुरु रविदास जी महाराज की 649वीं जयंती के अवसर पर सद्गुरु रविदास जी की प्रतिमा का अनावरण व सभागार का लोकार्पण किया। इस अवसर पर उन्होंने सद्गुरु रविदास जी की प्रतिमा पर माल्यार्पण कर उन्हें नमन किया। उन्होंने कहा कि रविदास जी का स्पष्ट मानना था कि ‘मन चंगा तो कठौती में गंगा’ अर्थात यदि आपका मन साफ है, तो सभी कुछ आपके कर्म पर निर्भर करता है। यदि आप अच्छा कर्म करेंगे, तो अच्छा फल पाएंगे तथा बुरा कर्म करेंगे, तो पाप से आपको कोई नहीं बचा सकता। जब सद्गुरु रविदास जी महाराज का इस धरा धाम पर प्रकटीकरण हुआ, वह गुलामी का कालखंड था। देश विदेशी आक्रान्ताओं से आतंकित व त्रस्त था। उस समय भी उन्होंने साधना की पवित्रता और साधना को कर्म की साधना के रूप में बदलने का कार्य किया।

उन्होंने कहा कि संत रामानंद जी से दीक्षा प्राप्त करने के उपरान्त सद्गुरु रविदास जी महाराज ने अपने कर्म की साधना के माध्यम से लोक कल्याण का मार्ग प्रशस्त किया। जगदगुरु रामानंदाचार्य ने मध्यकाल में 12 शिष्य बनाए, जो 12 अलग-अलग जातियों से थे। उन्होंने एक महिला को भी अपना शिष्य बनाया था। उस कालखंड में  भी समाज को जोड़ने का जितना बड़ा कार्य हमारे इन संतों ने किया, वह अद्भुत था। उसी नींव पर वर्तमान भारत का निर्माण हुआ है। वही प्रेरणा गुलामी के बंधन को तोड़ने में हम सभी की प्रेरणा रही है।

उन्होंने कहा कि सद्गुरु रविदास जी महाराज ने 600 वर्ष पूर्व कहा था कि राज ऐसा होना चाहिए, जहां सभी को अन्न प्राप्त हो, अर्थात कोई भूखा न सोए और प्रत्येक व्यक्ति को सम्मानजनक जीवन जीने का अवसर मिल सके। कहा जाता है कि ‘वृथा न जाहिं देव ऋषि वाणी’ अर्थात एक संत की वाणी कभी व्यर्थ नहीं होती। इस भाव को मुगलों, ब्रिटिशर्स तथा आजादी के बाद में विभिन्न सरकारों ने भुला दिया, लेकिन वर्ष 2014 में प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी के नेतृत्व एवं मार्गदर्शन में सबसे पहले देश के प्रत्येक गरीब के बैंक अकाउंट खुलवाए गये, जिससे शासन की योजनओं का लाभ सीधे उनके अकाउंट में प्राप्त हो सके।

विगत 6 वर्षों से प्रत्येक जरूरतमंद को निःशुल्क राशन और स्वास्थ्य सुविधा का लाभ ‘सबका साथ और सबका विकास’ के भाव से प्रदान किया जा रहा है। यह सतगुरु रविदास जी महाराज की प्रेरणा से सम्भव हो पाया है। प्रत्येक घर में शौचालय का निर्माण कराया गया, ताकि हर व्यक्ति को सम्मानजनक जीवन जीने की प्रेरणा दी जा सके। गरीबों को अपना सिर ढकने के लिए आवास उपलब्ध कराया गया। रसोई गैस तथा बिजली के निःशुल्क कनेक्शन उपलब्ध कराए गये। आज यहां सद्गुरु रविदास जी महाराज की भव्य प्रतिमा और सभागार के लोकार्पण का अवसर प्राप्त हुआ। अब सर्दी, गर्मी, बरसात आदि किसी भी मौसम में संत रविदास सेवा समिति को कष्ट नहीं उठाना पड़ेगा। यहां पर आराम से बैठकर कार्यक्रम सम्पन्न किए जा सकेंगे। भजन मंडली तथा भक्तगण आराम से बैठ पाएंगे। वक्तागण मंच से उद्बोधन कर सकेंगे। वर्ष 2017 के पूर्व संत रविदास जी महाराज की पावन जन्मभूमि सीर गोवर्धन, काशी में जाने का रास्ता नहीं था। लंगर का हॉल नहीं था। आज वहां देश भर से लगभग दो लाख श्रद्धालु आए हैं। 

उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री जी की प्रेरणा से डबल इंजन सरकार ने सद्गुरु रविदास जी महाराज की जन्मभूमि सीर गोवर्धन को चार लेन सड़क से जोड़ा है। वहां संत रविदास जी महाराज के नाम पर भूमि क्रय कर विभिन्न कार्यक्रमों के लिए जमीन उपलब्ध करवाई गयी। लंगर हॉल का निर्माण किया गया, जहां 500 लोग एक साथ लंगर प्राप्त कर सकते हैं। संत रविदास जी महाराज की भव्य प्रतिमा स्थापित की गई, जिसे पांच किलोमीटर दूर से भी देखा जा सकता है। आज सीर गोवर्धन भव्य स्वरूप युक्त धाम बन गया है। उन्होंने कहा कि हमें अपने महापुरुषों व संतों के प्रति श्रद्धा और आदर का भाव रखना चाहिए। गुलामी के कालखंड का स्मरण कर विभाजनकारी ताकतों  को फिर से सिर उठाने का अवसर नहीं देना चाहिए। हम सभी को एकजुट होकर समाज की संरचना को मजबूत करते हुए आगे बढ़ना है। हमारी एकता इन पूज्य संतों की दिव्य साधना और उससे प्राप्त सिद्धि का प्रतिफल इस देश को प्रदान करेगी। देश की एकता व सम्प्रभुता के लिए हम सभी को मिलकर कार्य करना होगा। यही सद्गुरु रविदास जी महाराज की प्रेरणा थी।

उन्होंने कहा कि डबल इंजन सरकार द्वारा प्रदेश भर में सनातन धर्म से जुड़े स्थलों के पुनरोद्धार का कार्य किया जा रहा है। इनमें लालापुर में महर्षि वाल्मीकि, राजापुर में संत तुलसीदास, चित्रकूट धाम, माँ विन्ध्यवासिनी धाम, अयोध्या धाम, नैमिषारण्य धाम, सुकतीर्थ, मथुरा- वृंदावन तथा भगवान बुद्ध से जुड़े बौद्ध सर्किट आदि 1200 से 1500 स्थानों पर किया गया कार्य सम्मिलित है। यह सभी कार्य प्रधानमंत्री जी के मंत्र ‘सबका साथ सबका विकास, सबका विश्वास और सबका प्रयास’ मंत्र पर चलकर प्रदेश के प्रत्येक जनपद में बिना भेदभाव किए गये। इस मंत्र की प्रेरणा का प्रभाव आज यहां हम सभी को देखने को मिल रहा है। उन्होंने कहा कि आज माघी पूर्णिमा के पावन अवसर पर प्रयागराज त्रिवेणी में प्रातः 10 बजे तक लगभग एक करोड़ श्रद्धालु स्नान कर चुके हैं। प्रयागराज में लाखों की संख्या में कल्पवासी विगत एक माह से व्रत, साधना तथा भगवत भजन में लीन थे। आज उनकी साधना का एक माह पूर्ण हुआ है। कठिन परिस्थितियों में सर्दी, गर्मी तथा बरसात की परवाह किए बिना कठिन साधना से जूझते हुए तपा हुआ शरीर ही संकट के समय चुनौती का सामना करने के लिए स्वयं को तैयार कर पाएगा। श्रद्धालुजन माँ गंगा, माँ यमुना तथा माँ सरस्वती की त्रिवेणी में आस्था की डुबकी लगाकर अपने घर को प्रस्थान करेंगे। यह संतों की प्रेरणा तथा भारत की सनातन परम्परा है। माघी पूर्णिमा के अवसर पर दिव्य स्नान का लाभ लेने वाले श्रद्धालुजन को बधाई एवं मंगलमय शुभकामनाएं। माँ गंगा से प्रार्थना है कि वह उनकी मनोकामनाओं को पूर्ण करें। सद्गुरु रविदास जी महाराज से प्रार्थना है कि वह अपने सभी भक्तों का कल्याण करें।

उन्होंने सद्गुरु रविदास जी महाराज की दिव्य वाणी और दिव्य सिद्धि का उदाहरण देते हुए कहा कि जब रविदास जी के सहयोगी ने उनसे कहा कि चलो रविदास गंगा स्नान करते हैं, तो उन्होंने कहा कि मेरे पास आज ज्यादा काम है। इस कार्य को पूर्ण करना आवश्यक है। मेरी ओर से माँ गंगा को दमड़ी समर्पित कर देना। उनके सहयोगी संत ने माँ गंगा में स्नान कर उनकी पूजा अर्चना की, लेकिन इसका कोई प्रभाव परिलक्षित नहीं हुआ। लेकिन जैसे ही, उन्होंने रविदास जी द्वारा प्रदान की गई दमड़ी माँ गंगा को समर्पित की, तो माँ गंगा ने वह दमड़ी अपना हाथ बढ़ाकर स्वीकार की। जब उन्होंने माँ गंगा से पूछा कि यह कैसे सम्भव हुआ, तो उन्होंने उत्तर दिया कि रविदास मेरे सच्चे भक्त हैं। 

उन्होंने कहा कि माँ गंगा भी अपने सच्चे भक्तों को पहचानती हैं। कहा गया है कि ‘जैसी चाह, वैसी राह’ अर्थात
हम जैसा भाव अपने मन में रखेंगे, हमें उसी प्रकार के परिणाम प्राप्त होंगे। 
कार्यक्रम को उपमुख्यमंत्री श्री ब्रजेश पाठक ने भी सम्बोधित किया।

Tuesday, January 6, 2026

आगरा के बटेश्वर में नाविक सुनाएंगे लोक कथाएं


यमुना तट पर बसे ऐतिहासिक एवं धार्मिक पर्यटन ग्राम बटेश्वर में ग्रामीण पर्यटन को नई दिशा देने का महत्वाकांक्षी प्रयास किया गया है। स्थानीय नाविकों को केवल नाव संचालन तक सीमित न रखते हुए उन्हें कहानी कहने की कला से जोड़ने का प्रयास किया गया, जिससे पर्यटकों को बाह बटेश्वर की संस्कृति, इतिहास और आस्था से परिचित कराया जा सके। मान्यवर कांशीराम पर्यटन प्रबंधन संस्थान (एमकेआईटीएम) लखनऊ के सहयोग से एसडीआरएफ टीम द्वारा आयोजित तीन दिवसीय विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम 5 से 7 जनवरी तक नाविकों को आपदा प्रबंधन, आपात स्थितियों में प्राथमिक उपचार तथा ऑनलाइन पेमेंट जैसी आधुनिक सुविधाओं संबंधी प्रशिक्षण भी दिया गया।

उत्तर प्रदेश के पर्यटन एवं संस्कृति मंत्री जयवीर सिंह ने 7 जनवरी 2026 को लखनऊ में यह जानकारी देते हुए बताया कि बटेश्वर में ग्रामीण पर्यटन को सशक्त बनाना हमारी प्राथमिकता है। नाविकों को स्टोरी टेलिंग, आपदा प्रबंधन और आधुनिक डिजिटल सुविधाओं से जोड़कर हम उन्हें केवल सेवा प्रदाता नहीं, बल्कि बटेश्वर की संस्कृति, इतिहास और आस्था का संवाहक बना रहे हैं। इससे पर्यटकों का अनुभव और अधिक परिपक्व होगा, वहीं स्थानीय समुदाय के लिए आजीविका के नए अवसर भी सृजित होंगे।

नाविक प्रशिक्षण कार्यक्रम के दौरान मान्यवर काशीराम इंस्टीट्यूट, लखनऊ के स्टोरी टेलर गौरव श्रीवास्तव ने प्रशिक्षुओं को बाह बटेश्वर की धार्मिक, सांस्कृतिक एवं पर्यटन विरासत के संबंध में विस्तृत जानकारी दी गई। उन्होंने बताया कि किस प्रकार स्टोरी टेलिंग के माध्यम से यहां आने वाले पर्यटकों को घाटों, नौका विहार एवं प्रमुख पर्यटन स्थलों की जानकारी प्रभावी ढंग से दी जा सकती है। स्थानीय पर्यटन स्थल से जुड़ी कहानी किस प्रकार पर्यटकों की यात्रा को यादगार बनाने में अहम होती है। प्रशिक्षुओं को सैलानियों के साथ शिष्टाचारपूर्ण संवाद के साथ पेश आने का प्रशिक्षण दिया गया।


उन्होंने बताया कि वर्ष 2024 से उत्तर प्रदेश पर्यटन द्वारा लगातार नाविकों को प्रशिक्षित किया जा रहा है, अब तक 2500 से ज्यादा लोगों को उनके द्वारा प्रशिक्षण दिया गया। एसडीआरएफ की टीम ने आपात स्थितियों से निपटने के व्यावहारिक तरीके सिखाए। वहीं चिकित्सकों ने संकट के समय सीपीआर एवं त्वरित प्राथमिक उपचार की जानकारी दी। इसके साथ ही ऑनलाइन पेमेंट जैसी आधुनिक सुविधाओं का प्रशिक्षण देकर नाविकों को पर्यटन की बदलती जरूरतों के अनुरूप तैयार किया गया। कार्यक्रम के समापन अवसर पर सभी नाविकों को पहचान और एकरूपता देने दे उद्देश्य से टीशर्ट व सदरी का वितरण किया गया। बटेश्वर के अटल संकुल केंद्र में आयोजित तीन दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम में कुल 32 नाविकों को प्रशिक्षित किया गया। 

पर्यटन एवं संस्कृति मंत्री जयवीर सिह ने बताया कि उत्तर प्रदेश में पर्यटन को हम केवल पर्यटन स्थलों तक सीमित न रखते हुए स्थानीय समुदायों को भी सहभागी बना रहे हैं। नाविकों के निरंतर प्रशिक्षण के माध्यम से उन्हें कौशल, आत्मविश्वास और पहचान मिल रही है। हमारा लक्ष्य समावेशी पर्यटन को बढ़ावा देते हुए जन सहभागिता और सामुदायिक भागीदारी को पर्यटन विकास की मजबूत आधारशिला बनाना है, ताकि पर्यटन का लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे।


Saturday, December 27, 2025

बौद्ध सर्किट बना उत्तर प्रदेश की वैश्विक पहचान


उत्तर प्रदेश पर्यटन विभाग की दूरगामी नीतियों और निरंतर प्रयासों का सकारात्मक असर अब स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगा है। राज्य का बौद्ध सर्किट आस्था, विश्वास और वैश्विक पर्यटन का सशक्त केंद्र बनकर उभर रहा है। पर्यटन विभाग की जनवरी से सितम्बर 2025 की रिपोर्ट के अनुसार प्रदेश के बौद्ध स्थलों पर देश-विदेश से आने वाले पर्यटकों और श्रद्धालुओं की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है। सारनाथ, कुशीनगर, श्रावस्ती, कौशांबी, कपिलवस्तु और संकिसा जैसे छह प्रमुख बौद्ध स्थल न केवल राष्ट्रीय बल्कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी पर्यटकों को आकर्षित कर रहे हैं, जो उत्तर प्रदेश को वैश्विक बौद्ध पर्यटन मानचित्र पर नई पहचान दिला रहे हैं।

पर्यटन मंत्री जयवीर सिंह ने 28 दिसम्बर 2025 को लखनऊ में यह जानकारी देते हुए बताया कि उत्तर प्रदेश में बौद्ध पर्यटन को लेकर लगातार बढ़ती वैश्विक रुचि देखने को मिल रही है। उन्होंने कहा कि वर्ष 2025 के नौ महीनों (जनवरी से सितम्बर) के दौरान भगवान बुद्ध से जुड़े प्रदेश के छह प्रमुख स्थलों पर कुल 61,15,850 पर्यटकों ने दर्शन किए, जिनमें 58,44,591 घरेलू तथा 2,71,259 विदेशी पर्यटक शामिल हैं। यह आंकड़े प्रदेश में बौद्ध विरासत की अंतर्राष्ट्रीय पहचान और पर्यटन सुविधाओं के सुदृढ़ीकरण का प्रमाण हैं। पर्यटन विभाग का अनुमान है कि वर्ष 2025 के अंत तक इन पवित्र स्थलों पर आने वाले पर्यटकों की संख्या 64 लाख के पार जा सकती है।

उत्तर प्रदेश का कौशांबी जिला ऐतिहासिक, धार्मिक और सांस्कृतिक तीनों दृष्टि से महत्वपूर्ण स्थल है। इसका संबंध प्राचीन कौशांबी नगर सभ्यता से है, जिसका उल्लेख वाल्मीकि रचित रामायण और महाभारत में मिलता है। महाभारत में इसे ’कुशम्ब’ के नाम से जाना जाता था। बौद्ध धर्म के अनुयायियों के लिए यह भूमि विशेष महत्व रखती है, क्योंकि भगवान बुद्ध ने यहीं अपना छठा और नौवां वर्षावास व्यतीत किया था। वर्ष 2025 के जनवरी से सितम्बर के बीच जनपद में कुल 23,19,237 पर्यटकों का आगमन दर्ज किया गया, जिनमें 2,884 विदेशी पर्यटक शामिल हैं। राज्य के पर्यटन विकास में कौशांबी विशेष महत्व रखता है। 

उत्तर प्रदेश के भगवान बुद्ध से जुड़े प्रमुख तीर्थ स्थलों पर वर्ष 2025 (जनवरी से सितम्बर) में देशी-विदेशी पर्यटकों की उल्लेखनीय उपस्थिति दर्ज की गई है, जिससे प्रदेश के बौद्ध पर्यटन को नई गति मिली है। सारनाथ, कुशीनगर, श्रावस्ती, कपिलवस्तु और संकिसा जैसे ऐतिहासिक स्थलों पर बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं और पर्यटक पहुंचे। कपिलवस्तु में कुल 51,795 पर्यटकों ने भ्रमण किया, जिनमें 15,423 विदेशी सैलानी शामिल रहे। वहीं महापरिनिर्वाण स्थली कुशीनगर में सर्वाधिक 18,60,507 पर्यटकों का आगमन हुआ, जिनमें 1,88,131 विदेशी पर्यटक थे। तथागत द्वारा प्रथम उपदेश दिए गये पावन स्थल सारनाथ में 17,75,489 पर्यटक पहुंचे, जिनमें 64,821 विदेशी आगंतुक शामिल रहे। इसी क्रम में श्रावस्ती में 79,245 तथा संकिसा में 29,577 पर्यटकों का आगमन दर्ज किया गया, जो यह दर्शाता है कि उत्तर प्रदेश वैश्विक बौद्ध पर्यटन मानचित्र पर निरंतर सशक्त रूप से उभर रहा है।

भगवान बुद्ध से जुड़े उत्तर प्रदेश के प्रमुख स्थल सारनाथ, कुशीनगर, श्रावस्ती, कपिलवस्तु, कौशांबी और संकिसा देश ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया के बौद्ध श्रद्धालुओं और पर्यटकों के लिए आस्था व आकर्षण का केंद्र बने हुए हैं। पर्यटन विभाग के आंकड़े इस बढ़ते रुझान की स्पष्ट तस्दीक करते हैं। वर्ष 2023 में इन स्थलों पर कुल 47,04,317 पर्यटकों ने भ्रमण किया, जिनमें 2,54,688 विदेशी सैलानी शामिल थे। वहीं वर्ष 2024 में यह संख्या तेजी से बढ़ती और कुल 61,47,826 पर्यटक इन स्थलों तक पहुंचे, जिनमें 3,53,461 विदेशी पर्यटक रहे। यह बढ़ती संख्या प्रदेश के बौद्ध पर्यटन को वैश्विक पहचान दिलाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण संकेत है।
प्रदेश के संस्कृति एवं पर्यटन विभाग के प्रमुख सचिव अमृत अभिजात ने बताया कि उत्तर प्रदेश पर्यटन विश्व के प्रमुख मंचों जैसे-पैसिफिक एशिया ट्रैवल एसोसिएशन, जापान टूरिज्म एक्सपो, आईएफटीएम टॉप रेसा और वर्ल्ड ट्रेवल मार्केट लंदन आदि पर राज्य के बौद्ध सर्किट और भगवान बुद्ध से जुड़े पवित्र स्थलों को प्रभावी ढंग से प्रस्तुत कर रहा है। विभाग द्वारा थाईलैंड, वियतनाम, मलेशिया, श्रीलंका, भूटान, जापान, लाओ पीडीआर, कंबोडिया, सिंगापुर और इंडोनेशिया जैसे बौद्ध बहुल देशों के टूर ऑपरेटरों, भिक्षुओं और मीडिया प्रतिनिधियों के लिए विशेष फैमिलियराइजेशन ट्रिप का आयोजन भी किया जाता रहा है। पर्यटन विभाग की ’बोधि यात्रा’ पहल ने उत्तर प्रदेश की वैश्विक पर्यटन मानचित्र पर उपस्थिति को और अधिक सुदृढ़ किया है।
लखनऊ: 28 दिसम्बर 2025

Wednesday, December 24, 2025

पांडुलिपि धरोहर के संरक्षण के लिए समझौता


भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय के ज्ञान भारतम् मिशन तथा उत्तर प्रदेश सरकार संस्कृति विभाग के मध्य देश की पांडुलिपि धरोहर के संरक्षण के लिए 23 दिसम्बर 2025 को नई दिल्ली में एक समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए गए।

इस अवसर पर उत्तर प्रदेश के संस्कृति एवं पर्यटन मंत्री जयवीर सिंह ने कहा कि यह समझौता प्रधानमंत्री नरेंद्र
मोदी के मार्गदर्शन एवं मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सांस्कृतिक दृष्टि के अनुरूप किया गया है। इसका उद्देश्य राज्य एवं देश की प्राचीन पांडुलिपियों तथा ज्ञान परम्परा का संरक्षण कर उन्हें आधुनिक तकनीक के माध्यम से सुरक्षित रखना है। उत्तर प्रदेश वेदों, उपनिषदों, संतों और महापुरुषों की भूमि है, जहां मंदिरों, मठों, पुस्तकालयों, विश्वविद्यालयों एवं निजी संग्रहों में बड़ी संख्या में बहुमूल्य पांडुलिपियां उपलब्ध हैं। इस समझौते के अंतर्गत इन पांडुलिपियों का सर्वेक्षण, सूचीकरण, संरक्षण, डिजिटलीकरण, अनुवाद एवं शोध किया जाएगा। 

उन्होंने कहा कि यह पहल सरकार की ‘विरासत से विकास’ की नीति के अनुरूप है, जिससे शिक्षा, शोध, संस्कृति एवं पर्यटन को भी बढ़ावा मिलेगा। पांडुलिपियों को राष्ट्रीय डिजिटल भंडार से जोड़े जाने से वे देश-विदेश के विद्वानों एवं आम जनमानस के लिए सुलभ होंगी। उन्होंने कहा कि हमारी सांस्कृतिक विरासत केवल अतीत की धरोहर नहीं, बल्कि भविष्य के लिए मार्गदर्शक है। परम्परागत ज्ञान को आधुनिक तकनीक से जोड़कर हम इसे सुरक्षित कर रहे हैं। 

इस अवसर पर उत्तर प्रदेश के संस्कृति एवं पर्यटन विभाग के प्रमुख सचिव अमृत अभिजात ने कहा कि इस समझौता ज्ञापन से राज्य में पांडुलिपि संरक्षण से जुड़े कार्यों को एक व्यवस्थित और वैज्ञानिक ढांचा प्राप्त होगा। इस समझौते के माध्यम से पांडुलिपियों के सर्वेक्षण, संरक्षण एवं डिजिटलीकरण का कार्य  पारदर्शी और सुनियोजित तरीके से किया जाएगा। इससे विद्वानों, शोधकर्ताओं एवं छात्रों को राज्य की समृद्ध ज्ञान परम्परा से जुड़ने का अवसर मिलेगा तथा उत्तर प्रदेश की सांस्कृतिक धरोहर को राष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान मिलेगी। इस समझौते के क्रियान्वयन हेतु संस्कृति विभाग को नोडल विभाग बनाया गया है।
लखनऊ: 24 दिसम्बर 2025

Tuesday, December 9, 2025

दीपावली की वैश्विक लोकप्रियता और बढ़ेगी : मोदी


प्रकाश का पर्व दीपावली अब यूनेस्को की मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत सूची में सम्मिलित हो गया है। इसकी औपचारिक घोषणा विगत 8 से 13 दिसंबर को नई दिल्ली स्थित लाल किले में आयोजित बीसवें यूनेस्को अंतर-सरकारी समिति सत्र में की गई। दीपावली का यह सम्मिलन भारत की ओर से सूचीबद्ध सोलहवां तत्व है। इस निर्णय को 194 सदस्य देशों के प्रतिनिधियों, अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों और यूनेस्को के वैश्विक नेटवर्क के सदस्यों की उपस्थिति में अपनाया गया। दीपावली एक जीवंत और सतत विकसित होती सांस्कृतिक परंपरा है, जिसे समुदाय पीढ़ियों से संजोते और आगे बढ़ाते आ रहे हैं। यह सामाजिक सद्भाव, सामुदायिक सहभागिता और समग्र विकास को सुदृढ़ता प्रदान करती है।

प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने दीपावली को यूनेस्को की अमूर्त विरासत सूची में सम्मिलित किए जाने पर प्रसन्नता और गर्व व्यक्त करते हुए कहा- “भारत और दुनिया भर के लोग रोमांचित हैं। हमारे लिए, दीपावली हमारी संस्कृति और लोकाचार से बहुत गहराई से जुड़ी हुई है। यह हमारी सभ्यता की आत्मा है। यह प्रकाश और धार्मिकता का प्रतीक है। दीपावली को यूनेस्को की अमूर्त विरासत सूची में सम्मिलित करने से इस पर्व की वैश्विक लोकप्रियता और भी बढ़ेगी। प्रभु श्री राम के आदर्श हमारा शाश्वत रूप से मार्गदर्शन करते रहें।"

यूनेस्को की प्रतिनिधि सूची में किसी भी तत्व को सम्मिलित करने के लिए सदस्य देशों को मूल्यांकन के लिए एक विस्तृत नामांकन दस्तावेज़ प्रस्तुत करना आवश्यक होता है। हर देश दो वर्ष में एक तत्व नामांकित कर सकता है। भारत ने 2024–25 चक्र के लिए ‘दीपावली’ पर्व को नामांकित किया था।

इनटैन्जिबल कल्चरल हेरिटेज की सुरक्षा के लिए यूनेस्को ने 17 अक्टूबर 2003 को पेरिस में अपने 32वें जनरल कॉन्फ्रेंस के दौरान 2003 कन्वेंशन को अपनाया। कन्वेंशन ने विश्वभर की चिंताओं का जवाब दिया कि ग्लोबलाइज़ेशन, सामाजिक बदलाव और सीमित संसाधनों के कारण जीवित सांस्कृतिक परंपराएं, बोलने के तरीके, परफॉर्मिंग आर्ट्स, सामाजिक रीति-रिवाज, रस्में, ज्ञान के तरीके और कारीगरी पर खतरा बढ़ रहा है और उन्हें बचाने की आवश्यकता है।

भारत के लिए दीपावली केवल एक वार्षिक त्योहार से कहीं अधिक है। यह लाखों लोगों की भावनाओं और संस्कृति के ताने-बाने में बुनी हुई एक जीती-जागती परंपरा है। प्रत्येक वर्ष जब शहरों, गांवों और दूर-दराज के क्षेत्रों में दीये जलने लगते हैं, तो दीपावली प्रसन्नता और जुड़ाव की जानी-पहचानी भावना को फिर से जगाती है। यह लोगों को रुकने, स्मरण करने और एक साथ आने के लिए बुलाती है, जिससे विश्व को बताया जा सके कि यह त्योहार मानवता की मूल्यवान सांस्कृतिक परंपराओं में सही मायने में क्यों स्थान पाने का अधिकारी है।

संस्कृति मंत्रालय ने इस निर्णय का स्वागत किया और कहा कि इस शिलालेख से भारत की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत के बारे में दुनिया भर में जागरूकता बढ़ेगी और आने वाली पीढ़ियों के लिए समुदाय-आधारित परंपराओं की रक्षा के प्रयासों को सुदृढ़ता मिलेगी।

केंद्रीय संस्कृति मंत्री गजेन्द्र सिंह ने अंतरराष्ट्रीढय प्रतिनिधिमंडल को संबोधित करते हुए कहा कि यह शिलालेख भारत और विश्वभर के उन समुदायों के लिए अत्यंत गौरव का क्षण है जो दीपावली की शाश्वत भावना को जीवित रखते हैं। यह त्योहार ‘तमसो मा ज्योतिर्गमय’ के सार्वभौमिक संदेश का प्रतीक है, जो अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाने की भावना को दर्शाता है और आशा, नवजीवन तथा सद्भाव का प्रतिनिधित्व करता है।

उन्होंने त्योहार की जीवंतता और जन-केंद्रित प्रकृति का उल्लेकख करते हुए इस बात पर बल दिया कि दीपावली उत्सोव के पीछे लाखों लोगों का योगदान होता है, जिनमें दीये बनाने वाले कुम्हार, उत्सव की सजावट करने वाले कारीगर, किसान, मिठाई बनाने वाले, पुजारी और सदियों पुरानी परंपराओं को निभाने वाले परिवार सम्मिलित हैं। यह मान्यता उस सामूहिक श्रम को श्रद्धांजलि है जो इस परंपरा को कायम रखता है।

केंद्रीय मंत्री ने प्रवासी भारतीयों की जीवंत भूमिका को भी स्वीकार किया, जिनके दक्षिण पूर्व एशिया, अफ्रीका, खाड़ी देशों, यूरोप और कैरेबियन में मनाए जाने वाले दीपावली समारोहों ने दीपावली के संदेश को महाद्वीपों में फैलाया है और सांस्कृतिक सेतुओं को मजबूत किया है। इस शिलालेख के साथ ही इस विरासत की रक्षा करने और इसे भावी पीढ़ियों तक पहुंचाने की नई जिम्मेदारी भी आती है। केंद्रीय मंत्री ने नागरिकों से दीपावली की एकता की भावना को अपनाने और भारत की समृद्ध अमूर्त सांस्कृतिक परंपराओं का समर्थन जारी रखने का आग्रह किया।

दीपावली को इसकी गहरी सांस्कृतिक महत्ता और विभिन्न क्षेत्रों, समुदायों तथा वैश्विक भारतीय प्रवासी समुदाय में मनाए जाने वाले जन त्योहार के रूप में मान्यता प्राप्त है। यह एकता, नवीनीकरण और सामाजिक सामंजस्य के सिद्धांतों का प्रतीक है। दीये जलाना, रंगोली बनाना, पारंपरिक शिल्पकला, अनुष्ठान, सामुदायिक समारोह और पीढ़ी दर पीढ़ी ज्ञान का हस्तांतरण जैसी इसकी विविध प्रथाएं त्योहार की शाश्वत जीवंतता और भौगोलिकता की सीमाओं के भीतर अनुकूलन करने की क्षमता को दर्शाती हैं।

संगीत नाटक अकादमी के माध्यम से संस्कृति मंत्रालय द्वारा तैयार किए गए इस नामांकन में भारतभर के कलाकारों, शिल्पकारों, कृषि समुदायों, प्रवासी समूहों, विशेष आवश्यकताओं वाले व्यक्तियों, ट्रांसजेंडर समुदायों, सांस्कृतिक संगठनों और परंपरा के वाहकों के साथ व्यापक राष्ट्रव्यापी परामर्श किया गया। उनके सामूहिक अनुभवों ने दीपावली के समावेशी स्वरूप, समुदाय-आधारित निरंतरता और कुम्हारों और रंगोली कलाकारों से लेकर मिठाई बनाने वालों, फूल विक्रेताओं और शिल्पकारों तक आजीविका के व्यापक इकोसिस्टनम को उजागर किया।

यूनेस्को के शिलालेख में दीपावली को एक जीवंत विरासत के रूप में मान्यता दी गई है जो सामाजिक आपसदारी को सुदृढ़ करती है। यह त्योकहार पारंपरिक शिल्प कौशल का समर्थन करता है, उदारता और कल्याण के मूल्यों को सुदृढ़ करता है तथा आजीविका संवर्धन, लैंगिक समानता, सांस्कृतिक शिक्षा और सामुदायिक कल्याण सहित कई सतत विकास लक्ष्यों में सार्थक योगदान देता है।

दीपावली यूनेस्को की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत सूची में शामिल


रोशनी का पर्व दीपावली अब यूनेस्को की मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत सूची में शामिल हो गया है। इसकी औपचारिक घोषणा 8–13 दिसंबर 2025 को नई दिल्ली स्थित लाल किले में आयोजित 20वें यूनेस्को अंतर-सरकारी समिति सत्र में की गई। दीपावली का यह सम्मिलन भारत की ओर से सूचीबद्ध 16वाँ तत्व है। इस निर्णय को 194 सदस्य देशों के प्रतिनिधियों, अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों और यूनेस्को के वैश्विक नेटवर्क के सदस्यों की उपस्थिति में अपनाया गया। दीपावली एक जीवंत और सतत विकसित होती सांस्कृतिक परंपरा है, जिसे समुदाय पीढ़ियों से संजोते और आगे बढ़ाते आ रहे हैं। यह सामाजिक सद्भाव, सामुदायिक सहभागिता और समग्र विकास को मजबूती प्रदान करती है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दीपावली को मिली वैश्विक मान्यता का स्वागत करते हुए कहा कि यह पर्व भारत की संस्कृति, मूल्यों और सभ्यता की आत्मा से गहराई से जुड़ा हुआ है।

यूनेस्को की प्रतिनिधि सूची में किसी भी तत्व को शामिल करने के लिए सदस्य देशों को मूल्यांकन के लिए एक विस्तृत नामांकन दस्तावेज़ प्रस्तुत करना आवश्यक होता है। हर देश दो वर्ष में एक तत्व नामांकित कर सकता है। भारत ने 2024–25 चक्र के लिए ‘दीपावली’ पर्व को नामांकित किया था।

इनटैन्जिबल कल्चरल हेरिटेज की सुरक्षा के लिए, UNESCO ने 17 अक्टूबर 2003 को पेरिस में अपने 32वें जनरल कॉन्फ्रेंस के दौरान 2003 कन्वेंशन को अपनाया। कन्वेंशन ने दुनिया भर की चिंताओं का जवाब दिया कि ग्लोबलाइज़ेशन, सामाजिक बदलाव और सीमित संसाधनों की वजह से जीवित सांस्कृतिक परंपराएं, बोलने के तरीके, परफॉर्मिंग आर्ट्स, सामाजिक रीति-रिवाज, रस्में, ज्ञान के तरीके और कारीगरी पर खतरा बढ़ रहा है और उन्हें बचाने की ज़रूरत है।

भारत के लिए दीपावली सिर्फ़ एक सालाना त्योहार से कहीं ज़्यादा है; यह लाखों लोगों के इमोशनल और कल्चरल ताने-बाने में बुनी हुई एक जीती-जागती परंपरा है। हर साल, जब शहरों, गांवों और दूर-दराज के इलाकों में दीये जलने लगते हैं, तो दीपावली खुशी, नई शुरुआत और जुड़ाव की जानी-पहचानी भावना को फिर से जगाती है। यह लोगों को रुकने, याद करने और एक साथ आने के लिए बुलाती है ताकि दुनिया को याद दिलाया जा सके कि यह त्योहार इंसानियत की कीमती कल्चरल परंपराओं में सही मायने में क्यों जगह पाने का हकदार है।
संस्कृति मंत्रालय ने इस फैसले का स्वागत किया और कहा कि इस लेख से भारत की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत के बारे में दुनिया भर में जागरूकता बढ़ेगी और आने वाली पीढ़ियों के लिए समुदाय-आधारित परंपराओं की रक्षा के प्रयासों को मजबूती मिलेगी।
 
दीपावली, जिसे दिवाली भी कहते हैं, कार्तिक अमावस्या को मनाई जाती है, जो आमतौर पर अक्टूबर या नवंबर में आती है। दीपावली की बुनियादी सोच में सभी लोगों के लिए खुशहाली, नई शुरुआत और खुशहाली का जश्न मनाना शामिल है। इसका सबको साथ लेकर चलने वाला स्वभाव आपसी सम्मान को बढ़ावा देता है और अलग-अलग लोगों और समुदायों के बीच अलग-अलग तरह के लोगों के बीच एकता को बढ़ावा देता है; इसलिए, त्योहार का कोई भी पहलू सामाजिक मेलजोल और सांस्कृतिक एकता के सम्मान के उसूलों के खिलाफ नहीं है। घरों, सड़कों और मंदिरों को कई तेल के दीयों से रोशन किया जाता है, जिससे एक गर्म सुनहरी चमक निकलती है जो अंधेरे पर रोशनी और बुराई पर अच्छाई की जीत दिखाती है। बाज़ार चमकीले कपड़ों और बारीक हाथ से बनी चीज़ों से भरे होते हैं जो रोशनी में चमकते हैं, जिससे त्योहार का माहौल और भी अच्छा हो जाता है। जैसे-जैसे शाम होती है, आसमान आतिशबाजी के शानदार नज़ारे से रोशन हो जाता है।
दीपावली की प्रचलित कथाएं
रामायण में, यह त्योहार भगवान राम, सीता और लक्ष्मण के 14 साल के वनवास के बाद अयोध्या लौटने और रावण पर उनकी जीत का प्रतीक है, जिसका उत्सव दीये जलाकर मनाया जाता है। महाभारत में, यह पांडवों के वनवास के बाद लौटने का प्रतीक है।
नरक चतुर्दशी भगवान कृष्ण की नरकासुर पर जीत की याद में मनाई जाती है, जो बुराई के अंत का प्रतीक है।
माना जाता है कि दीपावली की रात देवी लक्ष्मी रोशनी वाले घरों में आती हैं।
24वें तीर्थंकर भगवान महावीर ने दीपावली के दिन पावापुरी में निर्वाण प्राप्त किया था। उनके शिष्यों ने रोते हुए उनसे न जाने की विनती की। महावीर ने उनसे अपने भीतर का दीपक जलाने और अंधेरे पर विजय पाने का आग्रह किया। जैन भक्त इस त्योहार को निर्वाण दिवस के रूप में उत्साह के साथ मनाते हैं।
हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार, तारकासुर के पुत्रों जिन्हें राक्षस त्रिपुरासुर कहा जाता था, को वरदान मिला था कि वे सिर्फ़ एक तीर से ही मारे जा सकते हैं। उन्होंने तब तक कहर बरपाया जब तक भगवान शिव ने त्रिपुरांतक के रूप में उन्हें एक तीर से खत्म नहीं कर दिया। इस जीत को दीपावली या देव दीपावली के रूप में मनाया जाता है, जिसमें भक्त गंगा में स्नान करते हैं, दीये जलाते हैं और भगवान शिव की पूजा करते हैं।
राजा बलि की वापसी: महाराष्ट्र में दीपावली राजा बलि की यात्रा का प्रतीक है, जो न्याय और उदारता का प्रतीक है।
काली पूजा: बंगाल, ओडिशा और असम में दीपावली पर सुरक्षा और अंदरूनी शक्ति के लिए देवी काली की पूजा होती है।
गोवर्धन/अन्नकूट: कुछ इलाकों में कृष्ण द्वारा गोवर्धन पर्वत उठाने की याद में, यह विनम्रता और प्रकृति के प्रति आभार का प्रतीक है।

दीये जलाने के साथ-साथ, दीपावली में कई तरह के काम शामिल हैं जैसे सुंदर रंगोली बनाना, मिठाइयाँ बनाना, घर सजाना, रस्में निभाना, तोहफ़े देना और कम्युनिटी में इकट्ठा होना। यह फसल, संस्कृति और पौराणिक कथाओं का जश्न मनाता है, जिसमें अलग-अलग इलाकों के बदलाव इसकी विविधता को दिखाते हैं। यह त्योहार उम्मीद, खुशहाली और कम्युनिटी की भागीदारी के ज़रिए नएपन, नई शुरुआत और सामाजिक एकता को दिखाता है। दीपावली एक रात के उत्सव से कहीं अधिक है; यह पांच उत्सव के दिनों में खूबसूरती से मनाया जाता है, हर दिन का अपना आकर्षण और महत्व होता है। त्योहार धनतेरस से शुरू होता है, जो शुभ शुरुआत का दिन है, जब परिवार नए धातु के बर्तन या ज़रूरी चीज़ें खरीदते हैं जो समृद्ध का प्रतीक हैं। अगली सुबह नरक चतुर्दशी होती है, जिसे नकारात्मकता को दूर करने और सकारात्मक ऊर्जा के लिए अनुष्ठानों और दीपक जलाने के साथ मनाया जाता है।
तीसरा दिन दीपावली का सबसे खास दिन होता है- पवित्र लक्ष्मी-गणेश की पूजा। घर रंग-बिरंगी रंगोली, स्वादिष्ट मिठाइयों की खुशबू और अनेक दीयों की रोशनी से रोशन हो जाते हैं।

चौथे दिन, परिवार और दोस्त एक-दूसरे से मिलते हैं, उपहार देते हैं और अपने रिश्तों को मजबूत करते हैं और खुशियों को साझा करते हैं। यह त्योहार भाई दूज के साथ खत्म होता है, जो भाई-बहन के रिश्ते का दिल से सम्मान करने वाला है, जिसे प्रार्थना, आशीर्वाद और रीति-रिवाजों के साथ मनाया जाता है।

दीपावली पूरे देश में रोज़ी-रोटी और पारंपरिक हुनर ​​को बढ़ावा देती है। गांव के लोग इसे ऐसे रीति-रिवाजों से मनाते हैं जो प्रकृति का सम्मान करते हैं और खेती-बाड़ी के चक्र को दिखाते हैं। कारीगर—कुम्हार, लालटेन बनाने वाले, डेकोरेटर, फूलवाले, मिठाई बनाने वाले, जौहरी, कपड़ा कारीगर और छोटे बिज़नेस—इस त्योहार के दौरान आर्थिक गतिविधियों में बढ़ोतरी देखते हैं। उनका काम भारत की अर्थव्यवस्था के लिए बहुत ज़रूरी है।
दीपावली दान, उदारता और खाने की सुरक्षा के मूल्यों को भी मज़बूत करती है; कई समुदाय बुज़ुर्गों, देखने में अक्षम लोगों, जेल के कैदियों और खास ज़रूरतों वाले लोगों के लिए खाना बांटने, दान देने और खास सभाओं में शामिल होते हैं।

हाल के सालों में, पर्यावरण की देखभाल ने दीपावली मनाने की कहानी को तेज़ी से आकार दिया है। सरकारी दखल, जैसे CSIR-NEERI द्वारा “ग्रीन क्रैकर्स” का डेवलपमेंट और स्वच्छ दिवाली और शुभ दिवाली जैसे नेशनल कैंपेन ने त्योहार की सांस्कृतिक भावना को बनाए रखते हुए इको-फ्रेंडली त्योहारों को बढ़ावा दिया है। घरों, बाज़ारों और पब्लिक जगहों की सफ़ाई से जुड़े रीति-रिवाज़ साफ़-सफ़ाई और हेल्दी लाइफस्टाइल को बढ़ावा देते हैं, जबकि परिवारों और दोस्तों का एक साथ आना सामाजिक और भावनात्मक भलाई को बढ़ाता है।

दीपावली का कल्चरल इकोसिस्टम कई सस्टेनेबल डेवलपमेंट गोल्स (SDGs) में अहम योगदान देता है, जिसमें रोज़ी-रोटी के सपोर्ट से गरीबी कम करना, सबको साथ लेकर चलने और क्राफ़्ट परंपराओं से जेंडर इक्वालिटी, कम्युनिटी बॉन्डिंग और साफ़-सफ़ाई के तरीकों से भलाई, और कल्चरल ट्रांसमिशन से अच्छी शिक्षा शामिल है। UNESCO की इंसानियत की इनटैंजिबल कल्चरल हेरिटेज की लिस्ट में दीपावली के लिए नॉमिनेशन प्रोसेस एक सबको साथ लेकर चलने वाले, कम्युनिटी-ड्रिवन अप्रोच को दिखाता है। मिनिस्ट्री ऑफ़ कल्चर के तहत संगीत नाटक अकादमी ने देश भर के स्कॉलर्स, प्रैक्टिशनर्स, आर्टिस्ट्स, राइटर्स और स्पेशलिस्ट्स की एक अलग-अलग तरह की एक्सपर्ट कमिटी बनाई। इसमें पूरे भारत के कम्युनिटीज़, हिमालय से लेकर तटों तक, और शहरों से लेकर दूर-दराज के गाँवों तक, डायस्पोरा, आदिवासी ग्रुप्स, ट्रांसजेंडर कम्युनिटीज़, और दूसरे जैसे आर्टिस्ट्स, किसान, और धार्मिक ग्रुप्स शामिल थे। अलग-अलग फॉर्मेट्स में टेस्टिमोनियल्स में पर्सनल एक्सपीरियंस और दीपावली की कल्चरल इंपॉर्टेंस को दिखाया गया, कम्युनिटी की सहमति को कन्फर्म किया गया और एक जीती-जागती परंपरा के तौर पर इसकी डाइवर्सिटी और रेजिलिएंस को दिखाया गया।

UNESCO की इनटैंजिबल कल्चरल हेरिटेज लिस्ट में दीपावली का नाम आना उन लाखों लोगों को एक ट्रिब्यूट है जो इसे श्रद्धा से मनाते हैं, उन आर्टिस्ट्स को जो इसकी परंपराओं को ज़िंदा रखते हैं, और उन टाइमलेस प्रिंसिपल्स को जो यह दिखाता है। यह दुनिया को बताता है कि भारत की कल्चरल हेरिटेज को सिर्फ़ याद नहीं किया जाता, बल्कि इसे जिया जाता है, प्यार किया जाता है, और आगे बढ़ाया जाता है।

Monday, November 24, 2025

प्राचीन रविदास मंदिर का सौंदर्यीकरण


डॉ. सौरभ मालवीय  
उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ की सरकार राज्य में धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा दे रही है। उत्तर प्रदेश पर्यटन विभाग राजधानी लखनऊ में धार्मिक पर्यटन को नई दिशा देने के उद्देश्य से धार्मिक स्थलों के समग्र विकास पर तीव्र गति से कार्य कर रहा है। इसी कड़ी में लखनऊ के अलीगंज स्थित प्राचीन संत रविदास मंदिर का समेकित पर्यटन विकास 04.64 करोड़ रुपए की स्वीकृत योजना के अंतर्गत प्रारम्भ हो गया है। सौंदर्यीकरण से लेकर आधुनिक पर्यटक सुविधाओं के विस्तार तक पूरे परिसर को नया रूप देने की तैयारी है। 

उत्तर प्रदेश के पर्यटन एवं संस्कृति मंत्री जयवीर सिंह ने 24 नवम्बर 2025 को लखनऊ में यह जानकारी देते हुए कहा कि संत रविदास मंदिर के प्रति श्रद्धालुओं की आस्था, बढ़ती भीड़ और स्थानीय महत्व को ध्यान में रखकर विकास कार्य  किए जा रहे हैं। इनमें सड़क मरम्मत, पेयजल व्यवस्था, बेहतर प्रकाश व्यवस्था, श्रद्धालुओं के बैठने के लिए बेंच तथा मंदिर परिसर के जर्जर भागों का पुनरुद्धार जैसे कार्य  सम्मिलित हैं। सरकार का प्रयास है कि विकास कार्यों के माध्यम से भक्तों के लिए सुगम, सुरक्षित और बेहतर अनुभव सुनिश्चित किया जा सके।

उल्लेखनीय है कि अलीगंज स्थित संत रविदास मंदिर राजधानी के प्राचीन धार्मिक स्थलों में से एक माना जाता है। मंदिर के मुख्य द्वार पर अंकित स्थापना वर्ष 1924 इस बात का प्रमाण है कि यह मंदिर 101 वर्ष पुराना है। यह स्थल दशकों से स्थानीय समुदाय के धार्मिक, सांस्कृतिक और सामाजिक जीवन का केंद्र रहा है। मंदिर परिसर में तीन प्राचीन समाधियां भी स्थित हैं, जिनमें से एक को मंदिर के निर्माणसे पूर्व का माना जाता है। बाकी दो समाधियां बाबा लीलादास और बाबा टिकाईदास से संबंधित हैं, जिन्होंने लंबे समय तक मंदिर में सेवाएं दीं।

संत रविदास मंदिर के प्रति स्थानीय समुदाय का भावनात्मक जुड़ाव अत्यंत गहरा रहा है। मंदिर के बाहर वर्षों से जूतों की मरम्मत का कार्य करने वाले नौमी लाल बताते हैं कि उनके पिता भी इसी स्थान पर कार्य किया करते थे। वहीं, मिष्ठान विक्रेता भोलानाथ का कहना है कि उनके बाबा 1931 से मंदिर के बाहर दुकान लगाते थे। तभी से यह पूरा क्षेत्र धार्मिक और सामाजिक गतिविधियों का महत्वपूर्ण के केंद्र रहा है। संत रविदास जयंती पर यहां हर वर्ष बड़े पैमाने पर विशेष आयोजन होता है, जिसमें स्थानीय लोग भाग लेते हैं। मंदिर परिसर को सजाने-संवारने में अपना योगदान देते हैं। स्थानीय व्यापारियों का मानना है कि मंदिर के सौंदर्यीकरण के बाद श्रद्धालुओं की संख्या में निश्चित रूप से वृद्धि की संभावना है।

इस मंदिर का समेकित पर्यटन विकास सरकार की प्राथमिकताओं में सम्मिलित है। मंदिर परिसर के सौंदर्यीकरण, अवसंरचनात्मक सुधार और आधुनिक सुविधाओं के विस्तार का कार्य तीव्र गति से प्रारम्भ हो चुका है। सरकार का उद्देश्य श्रद्धालुओं को एक बेहतर, सुरक्षित और सुव्यवस्थित वातावरण उपलब्ध कराना है। इस मंदिर से स्थानीय समुदाय पीढ़ियों से भावनात्मक रूप से जुड़े हैं। इसके विकास से न केवल भक्तों की सुविधा बढ़ेगी, अपितु क्षेत्र में रोजगार-व्यापार के नए अवसर भी सृजित होंगे। 
24 नवम्बर 2025

Saturday, July 12, 2025

मोदी ने यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में मराठा सैन्य परिदृश्य को शामिल करने की सराहना की


प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने भारत के मराठा सैन्य परिदृश्यों को प्रतिष्ठित यूनेस्को विश्व धरोहर सूची में शामिल किए जाने पर अत्यधिक गर्व और प्रसन्नता व्यक्त की है।
उन्होंने कहा कि अंकित धरोहर में 12 भव्‍य किले शामिल हैं- 11 महाराष्ट्र में और 1 तमिलनाडु में स्थित है।
प्रधानमंत्री ने मराठा साम्राज्य के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा, "जब हम गौरवशाली मराठा साम्राज्य की बात करते हैं, तो हम इसे सुशासन, सैन्य शक्ति, सांस्कृतिक गौरव और सामाजिक कल्याण पर जोर के साथ जोड़ते हैं। ये महान शासक हमें किसी भी अन्याय के आगे झुकने से मना करने के लिए प्रेरित करते हैं।"
उन्होंने नागरिकों से मराठा साम्राज्य के समृद्ध इतिहास के बारे में जानने के लिए इन किलों का भ्रमण करने का आग्रह किया।
प्रधानमंत्री ने 2014 में रायगढ़ किले की अपनी यात्रा की यादें साझा की और एक तस्वीर भी साझा की जिसमें उन्होंने छत्रपति शिवाजी महाराज को श्रद्धांजलि अर्पित की।
प्रधानमंत्री ने उक्‍त सम्‍मान के बारे में यूनेस्‍को की एक पोस्‍ट का उत्‍तर देते हुए कहा:
"हर भारतीय इस सम्‍मान से उत्साहित है।
इन 'मराठा सैन्य परिदृश्यों' में 12 भव्‍य किले शामिल हैं जिनमें से 11 महाराष्ट्र में और 1 तमिलनाडु में हैं।
जब हम गौरवशाली मराठा साम्राज्य की बात करते हैं, तो हम इसे सुशासन, सैन्य शक्ति, सांस्कृतिक गौरव और सामाजिक कल्याण पर ज़ोर से जोड़ते हैं। ये  महान शासक किसी भी अन्याय के आगे न झुकने के अपने साहस से हमें प्रेरित करते हैं।
मैं सभी से इन किलों को देखने और मराठा साम्राज्य के समृद्ध इतिहास के बारे में जानने का आह्वान करता हूं।"
"यहां 2014 में रायगढ़ किले की मेरी यात्रा की तस्वीरें हैं। छत्रपति शिवाजी महाराज को नमन करने का अवसर मिला। उस यात्रा को मैं हमेशा संजो कर रखूंगा।"

Friday, January 22, 2021

नैमिषारण्य धाम




नैमिषारण्य धाम
प्रथम नैमिष पुण्यं , चक्रतीर्थ च पुष्करम।
अन्योषां चैव तिरथानां संख्यां नास्ति महीतले।।
चक्रतीर्थ-:  एक गोलाकार सरोवर है, जिसमें श्रद्धालुजन स्नान व भजन-पूजन करते है। मान्यता है कि यही पर ब्रह्मा जी द्वारा महर्षि शौनक व अन्य ऋषियों को दिए गए चक्र की नेमि भूमि में प्रविष्ठ हुई थी। देवी भागवत, महाभारत, ब्रह्मा एवं स्कंद पुराण आदि में चक्रतीर्थ का उल्लेख है। पांडवों ने अपने कुल सम्बन्धियों की आत्मा की शांति के लिए 12 वर्षों तक तप किया।
सोमवती अमावस्या पर यहां स्नान का विशेष महत्व है।

स्मार्ट सिटी योजना : आधुनिक राष्ट्र निर्माण का अभिनव पहल

किसी भी देश, समाज और राष्ट्र के विकास की प्रक्रिया के आधारभूत तत्व सामाजिक-आर्थिक दृष्टिकोण, वैचारिक स्पष्टता और सांस्कृतिक विकास ही उसका आध...