Friday, August 21, 2026

महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम : बेरोजगारों को काम मिला

जीविकोपार्जन के लिए किसी भी व्यक्ति को कार्य की आवश्यकता होती है. देश में बेरोजगारी एक बड़ी समस्या है, जो दिन-प्रतिदिन बढ़ रही है। बेरोजगारी कई समस्याओं की जड़ है. बेरोजगार युवा मानसिक तनाव का शिकार हो जाते हैं, वे नशे की लत के आदी बन जाते हैं, अकसर युवा भटक जाते हैं. वे आपराधिक दलदल में फंस जाते हैं. इसके कारण उनका जीवन तो नष्ट होता ही है, साथ ही परिवार के मान-सम्मान पर भी बुरा प्रभाव पड़ता है. बेरोजगार युवकों द्वारा आत्महत्या करने के समाचार भी सुनने को मिलते रहते हैं. जनवरी 2018 में पंजाब के अमृतसर के निवासी रोहित ठाकुर ने फांसी लगाकर जान दे दी. बेरोजगार होने के कारण वह अपने परिवार का पालन-पोषण ठीक से नहीं कर पा रहा था. इसके कारण वह तनाव में रहता था. इसी महीने राजस्थान के अजमेर के किशन सिंह ने भी बेरोजगारी से तंग आकर फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली. इसी जनवरी के महीने में उत्तराखंड के बायखला सेलाकुई के निवासी प्रेम सिंह ने भी फांसी लगाकर अपनी इहलीला समाप्त कर ली. वह भी रोजगार न मिलने के कारण बहुत दुखी रहता था. बेरोजगारी के कारण उसके घर में कलेश रहता था. 

बेरोजगारी की समस्या से निपटने के लिए कांग्रेस नेतृत्व वाली संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार ने एक महत्वकांक्षी योजना आरंभ की थी. महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम एक रोजगार गारंटी योजना है. कांग्रेस नेतृत्व वाली संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार ने इसे लागू किया था. राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम 25 अगस्त 2005 को पारित हुआ. इसका पहला चरण 2 फरवरी 2006 से आंध्र प्रदेश के अनंतपुर जिले से शुरू हुआ. उस समय देश के 200 जिलों को इसमें सम्मिलित किया गया. इसके दूसरे चरण 2007- 08 से देश के 130 और जिलों को इसमें सम्मिलित किया गया. फिर इसके तीसरे चरण में 1 अप्रैल 2008 से देश के सभी जिलों में इस योजना को लागू कर दिया गया. शुरू में इसे राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम कहा जाता था, लेकिन 2 अक्टूबर 2009 को इसका पुनः नामकरण किया गया और इसे महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम कहा जाने लगा. 

यह योजना प्रत्येक वित्तीय वर्ष में किसी भी ग्रामीण परिवार के उन वयस्क सदस्यों को 100 दिन का रोजगार उपलब्ध कराती है, जो प्रतिदिन न्यूनतम मजदूरी पर सार्वजनिक कार्य-संबंधित अकुशल मजदूरी करने के लिए तैयार हैं. इस अधिनियम को ग्रामीण लोगों की क्रय शक्ति को बढ़ाने के उद्देश्य से शुरू किया गया था, मुख्य रूप से ग्रामीण भारत में रहने वाले लोगों के लिए अर्ध-कौशलपूर्ण या बिना कौशलपूर्ण कार्य, चाहे वे गरीबी रेखा से नीचे हों या ना हों. नियत कार्य बल का लगभग एक तिहाई महिलाओं से निर्मित है. 

यह अधिनियम, राज्य सरकारों को ’महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम योजनाओं’ को लागू करने के निर्देश देता है. इसके अंतर्गत केन्द्र सरकार मजदूरी की लागत, माल की लागत का तीन चौथाई और प्रशासनिक लागत का कुछ प्रतिशत वहन करती है. राज्य सरकारें बेरोजगारी भत्ता, माल की लागत का एक चौथाई और राज्य परिषद की प्रशासनिक लागत को वहन करती है. चूंकि राज्य सरकारें बेरोजगारी भत्ता देती हैं, उन्हें श्रमिकों को रोजगार प्रदान करने के लिए भारी प्रोत्साहन दिया जाता है. हालांकि बेरोजगारी भत्ते की राशि को निश्चित करना राज्य सरकार पर निर्भर है, जो इस शर्त के अधीन है कि यह पहले 30 दिनों के लिए न्यूनतम मजदूरी के एक चौथाई भाग से कम ना हो और उसके बाद न्यूनतम मजदूरी का आधे से कम ना हो. प्रति परिवार 100 दिनों का रोजगार या बेरोजगारी भत्ता सक्षम और इच्छुक श्रमिकों को हर वित्तीय वर्ष में प्रदान किया जाना चाहिए. दूसरे शब्दों में यदि योग्य आवेदक को मांग पर 15 दिनों के भीतर कार्य न मिल पाए तो बेरोजगारी भत्ता दिया जाएगा भत्ते की दर पहले 30 दिनों के लिए बेरोजगारी भत्ते की दर दूरी पर का 25 प्रतिशत होगा और उसके बाद 50 प्रतिशत हो जाएगी. स्थाई संपत्ति योजना का एक महत्वपूर्ण लक्ष्य है कि स्थाई संपत्ति का सृजन करना और ग्रामीण परिवारों की आजीविका का साधन आधार को मजबूत बनाना इस के कामों में ठेकेदारों द्वारा कार्य निष्पादन की अनुमति नहीं है. आवेदक के निवास से पांच किलोमीटर के भीतर काम उपलब्ध कराए जाएंगे. पांच किलोमीटर की परिधि से अधिक होने पर संबंधित व्यक्ति को परिवहन तथा आजीविका मद में 10 प्रतिशत अतिरिक्त मजदूरी प्रदान की जाएगी. मजदूरी भुगतान प्रति सप्ताह या अन्य मामलों में काम के पूरा होने के 15 दिनों के भीतर इस मजदूरी का आंशिक भाग नगद रूप से प्रतिदिन दिया जाएगा. यदि कोई व्यक्ति सूचित किए गए समय से 15 दिनों के भीतर कार्यस्थल पर रिपोर्ट नहीं करता, तो वह बेरोजगारी भत्ते का अधिकारी नहीं होगा, परंतु कार्य के लिए पुनः आवेदन दे सकेगा.

इसके अंतर्गत श्रमिकों को स्वच्छ पेयजल, बच्चों के लिए शेड, विश्राम के लिए समय, प्राथमिक उपचार बॉक्स के साथ कार्य के दौरान घटित किसी आकस्मिक घटना का सामना करने के लिए अनुसंधान उपलब्ध कराई जाएगी, कोई कामगार कार्यस्थल कार्य के दौरान घायल होता है, तो वह निशुल्क चिकित्सा सुविधा पाने का हकदार होगा. घायल श्रमिक के अस्पताल में भर्ती करवाने पर राज्य सरकार द्वारा निशुल्क चिकित्सा सुविधा दवा तथा घायल व्यक्ति की प्रतिदिन की मजदूरी राशि का 50 प्रतिशत पाने का अभी का अधिकारी होगा. कार्यस्थल पर दुर्घटना के कारण पंजीकृत मजदूर की स्थाई विकलांगता या मृत्यु हो जाने की स्थिति में मृत्यु या पूर्ण विकलांगता की स्थिति में केंद्र सरकार द्वारा अधिसूचित राशि या 25 हजार रुपये पीड़ित व्यक्ति के परिवार को दी जाएगी.

और पता जमा करते हैं. जांच के बाद पंचायत, घरों को पंजीकृत करता है और एक जॉब कार्ड प्रदान करता है. जॉब कार्ड में, पंजीकृत वयस्क सदस्य का ब्यौरा और उसकी फोटो शामिल होती है. एक पंजीकृत व्यक्ति निरंतर कार्य के कम से कम चौदह दिनों के लिए पंचायत या कार्यक्रम अधिकारी को लिखित रूप से आवेदन प्रस्तुत कर सकता है. आवेदन दैनिक बेरोजगारी भत्ता आवेदक को भुगतान किया जाएगा. इस अधिनियम के तहत पुरुषों और महिलाओं के बीच किसी भी प्रकार के भेदभाव की अनुमति नहीं है. इसलिए पुरुषों और महिलाओं को समान वेतन भुगतान किया जाना चाहिए. सभी वयस्क रोजगार के लिए आवेदन कर सकते हैं.

महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम ग्रामीण विकास और रोजगार के दोहरे लक्ष्य को प्राप्त करता है. इसके तहत कई कार्य कराए जाते हैं, जिनमें जल संरक्षण और जल संग्रहण, सुखा बचाओ, वनरोपण, वृक्षारोपण, सिंचाई नहरों के साथ शुक्ष्म एवं लघु सिंचाई कार्य, अनुसूचित जाति जनजाति समुदाय की भूमिका भूमि सुधार के लाभ लोगों की भूमिका इंदिरा आवास योजना के लाभ होगी परिवार के सदस्यों की भूमि के लिए सिंचाई की व्यवस्था परंपरागत जल स्रोतों का पुनरुद्धार, भूमि विकास बाढ़ नियंत्रण तथा सुरक्षा एवं प्रभावित क्षेत्र में जल निकासी की व्यवस्था, बारहमासी सड़क की सुविधा, सड़क निर्माण में जहां कहीं भी आवश्यक हो, वहां पर पुलिया का निर्माण करना, राज्य सरकार से परामर्श के बाद केंद्र सरकार द्वारा अधिसूचित अन्य कार्य सम्मिलित हैं.

पलायन को रोकने में भी महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम अत्यंय प्रभावी प्रमाणित हुआ है. ग्रामीण विकास राज्य मंत्री रामकृपाल यादव के अनुसार मंत्रालय ने सूखा प्रभावित क्षेत्रों में मनरेगा के तहत 50 दिन के लिए अतिरिक्त अकुशल रोजगार उपलब्ध कराने जैसे कदम उठाए हैं. वर्ष 2016-17 के दौरान मनरेगा के अंतर्गत सात सूखा प्रभावित राज्यों को 150 दिन के काम की अनुमति दी गई. वर्तमान वर्ष में इस प्रावधान के तहत केरल और पुद्दुचेरी को काम दिया गया है. मंत्रालय ग्रामीण और शहरी अंतर को पाटने तथा ग्रामीण क्षेत्रों से शहरी क्षेत्रों में होने वाले पलायन को रोकने के उद्देश्य से श्यामा प्रसाद मुखर्जी रूर्बन मिशन के अंतर्गत ग्रामीण केंद्रों का भी निर्माण कर रहा है. स्वतंत्र आकलनकर्ताओं के माध्यम से मंत्रालय द्वारा कराए गए अध्ययन में पाया गया कि महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम के परिणामस्वरूप विशेष मौसम में होने वाले पलायन में कमी आई है. अन्य अध्ययनों में भी दर्शाया गया कि घर के निकट काम देने और कार्यस्थल पर उचित माहौल उपलब्ध कराने से पलायन कम करने में महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम का प्रत्यक्ष और सकारात्मक प्रभाव पड़ा है. उन्होंने कहा कि मंत्रालय द्वारा ऐसे अध्ययनों का सार ‘मनरेगा समीक्षा’ नामक प्रकाशन में दिया गया है.

ग्रामीण विकास मंत्रालय की सिफारिश पर राष्ट्रीय ग्रामीण विकास और पंचायती राज संस्थान ने पलायन की समस्या पर दो अध्ययन करवाए हैं. इनके नाम हैं- कठिन समय में होने वाले पलायन पर महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी कार्यक्रम का प्रभाव : भारत के चयनित राज्यों का एक अध्ययन और जनजातीय लोगों के पलायन पर महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार अधिनियम का प्रभाव : पश्चिम बंगाल के जंगलमहल जिले में एक मामले का अध्ययन.

सरकार युवाओं को आत्मनिरभर बनाने पर विशेष बल दे रही है. राज्यसभा सांसद  महेश पोद्दार के अनुसार कि देश के युवा बेरोजगारों को बेरोजगारी भत्ता देकर आश्रित बनाने के स्थान पर उन्हें आत्मनिर्भर बनाना ज्यादा श्रेयस्कर है. सरकार इसी दिशा में काम कर रही है. युवाओं को रोजगार के लिए तैयार करने की जरूरत पर है. देश के युवाओं को रोजगार के लिए तैयार करना चाहिए, उन्हें बेरोजगारी भत्ता देकर आश्रित नहीं बनाना चाहिए. देश की आबादी का एक बड़ा हिस्सा कृषि के माध्यम से रोजगार पाता है. केंद्र सरकार ने किसानों की आय दुगुनी करने का स्पष्ट लक्ष्य निर्धारित किया है. स्पष्ट है कि सरकार ने जब किसानों की आय दुगुनी करने का लक्ष्य रखा है, तो कृषि क्षेत्र में रोजगार के अवसर भी बढ़ेंगे. रोजगार के अवसरों में यह बढ़ोतरी केवल परंपरागत कृषि कार्य में ही नहीं बल्कि मूल्य संवर्द्धन, प्रसंस्करण और विपणन के क्षेत्र में भी होगी. सरकार ने हर हाथ को हुनर, हर पेट को अनाज, हर घर में बिजली, हर घर तक पानी, हर घर तक सड़क और हर परिवार तक बैंक खाता के माध्यम से सामाजिक सुरक्षा का लक्ष्य भी निर्धारित किया है. ये तमाम योजनाएं प्रचुर मात्रा में रोजगार सृजन करेंगी, इसमें संदेह की कोई गुंजाइश नहीं है. 

वास्तव में बेरोजगारों को कार्य उपलब्ध कराने की यह एक प्रभावी योजना है. परंतु बढ़ती जनसंख्या के कारण लोगों को योजनाओं का उतना लाभ नहीं मिल पाता, जितनी उनसे अपेक्षा की जाती है. परंतु यह सत्य है कि इस योजना के कारण आज करोड़ों लोगों को रोजगार मिला है.


(डॉ सौरभ मालवीय की पुस्तक- 'विकास के पथ पर भारत' से)

राष्ट्रीय कृषि बाजार यानी ई-नाम : किसान लाभान्वित होंगे


फसल उगाने से लेकर उसे बेचने तक किसानों को कई समस्याओं से जूझना पड़ता है। फसल काटने के बाद किसानों को चिंता होती है कि उन्हें उनकी फसल के सही दाम मिलेंगे भी या नहीं। ऐसे समाचार सुनने को मिलते रहते हैं कि किसानों को अपनी फसल बेचने के लिए व्यापारी नहीं मिले। फसल न बिकने पर क्रोधित किसानों ने स्वयं अपनी फसल नष्ट कर दी या फिर उसे सड़क पर फेंक दिया, जो पशुओं का भोजन बन गई। अच्छी फसल के लिए लगातार पांचवीं बार ‘कृषि कर्मण पुरस्कार’ जीतने वाले मध्यप्रदेश के किसानों को भी फसलों के वाजिब दाम नहीं मिल पा रहे हैं। सब्जी, फलों, अनाज एवं दलहनों की अच्छी उपज होने के बाद भी उन्हें उनकी उपज का उचित मूल्य नहीं मिला। लागत से बहुत कम दाम मिलने के कारण किसानों ने विरोध प्रकट करते हुए प्याज, टमाटर, दूध एवं पपीते की फसल को सड़कों पर फेंक दिया। किसानों को दुख है कि अरहर, उड़द एवं मसूर के साथ-साथ गेहूं को बाजार में बेचने पर लागत से कम मूल्य मिला। उन्होंने विरोधस्वरूप राज्यव्यापी आंदोलन चलाया। मध्य प्रदेश के मंदसौर में 6 जून वर्ष 2017  को पुलिस की गोलीबारी में छह किसानों की मौत हो गई। इसके अतिरिक्त कर्ज एवं फसल खराब होने से परेशान 160 से अधिक किसानों की कथित आत्महत्या की खबरें भी छाई रहीं। जनवरी 2018 में आलू के सबसे बड़े उत्पादक राज्य उत्तर प्रदेश में किसानों ने उत्पाद का उचित दाम न मिलने पर सड़कों पर आलू फेंक दिया। कुछ समय पहले पंजाब के किसानों ने भी सड़कों पर आलू फेंक दिया था। उनका कहना था कि मंडी तक आलू ले जाने में जितनी लागत आ रही है, उन्हें उपज के उससे भी कम दाम मिल रहे हैं। ऐसे में बोरियां बचाने के लिए उन्होंने आलू फेंक दिया।
 
किसानों को इस समस्या को देखते हुए केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय कृषि बाजार यानी ई-नाम की परियोजना शुरू की है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने बाबा साहेब भीम राव अम्बेडकर की जयंती 14 अप्रैल, 2016 को राष्ट्रीय कृषि बाजार के लिए ई-ट्रेडिंग प्लेटफॉर्म ‘ई-नाम’ की प्रायोगिक परियोजना का शुभारंभ किया। प्रारंभिक काल से ही आठ राज्यों की 21 मंडियां ‘ई-नाम’ से जुड़ गई हैं। पांच माह के भीतर 200 मंडियों को और मार्च, 2018 तक 585 मंडियों को राष्ट्रीय कृषि बाजार से जोड़ने का लक्ष्य रखा गया। इस अवसर पर प्रधानमंत्री ने किसानों को संबोधित करते हुए कहा कि इस पहल से पारदर्शिता आएगी, जिससे किसान काफी हद तक लाभान्वित होंगे। यह कृषि समुदाय के लिए एक बड़ा बदलाव है। कृषि क्षेत्र को समग्र रूप में देखना होगा और इसके बाद ही किसानों को अधिकतम लाभ सुनिश्चित किया जा सकता है। 

उल्लेखनीय है कि राष्ट्रीय कृषि बाजार यानी ई-नाम एक पैन-इंडिया इलेक्ट्रॉनिक व्यापार पोर्टल है, जो कृषि से संबंधित उपजो के लिए एक एकीकृत राष्ट्रीय बाजार का निर्माण करने के लिए मौजूदा कृषि उपज बाजार समिति मंडी का एक प्रसार है। ई-नाम पोर्टल सभी एपीएमसी से संबंधित सूचना और सेवाओं के लिए एक ही स्थान पर सेवा प्रदान करता है। इसमें अन्य सेवाओं के बीच उपज के आगमन और कीमतों, व्यापार प्रस्तावों को खरीदने और बेचने, व्यापार प्रस्तावों पर प्रतिक्रिया के लिए प्रावधान शामिल हैं। जब कृषि उपज लेन देन मंडी के माध्यम से होना आरंभ होता है, तो ऑनलाइन बाजार से लेन-देन संबंधित व्यय और जानकारी असममिति कम होती है। कृषि बाजार को राज्यों द्वारा उनके कृषि-व्यवसाय विनिमय द्वारा संचालित किया जाता है। इसके अंतर्गत राज्य को विभिन्न बाजार क्षेत्रों में बांटा जाता है, जिसमें से प्रत्येक का संचालन अलग-अलग कृषि उपज बाजार समिति द्वारा किया जाता है। यह समिति शुल्क के साथ अपने व्यवसाय विनिमय को लागू करती है। बाजारों के इस विखंडन के कारण राज्य के भीतर, एक बाजार से दूसरे बाजार में कृषि उपजो के आवागमन तथा कृषि-उत्पाद के अलग-अलग तरह से निपटान में बाधा पहुंचाता है और मंडी शुल्कों के अलग-अलग स्तर किसानों के अनुरूप लाभ के बिना उपभोक्ताओं के लिए कीमतें बढ़ती जाती है।

ई-नाम राज्य एवं राष्ट्रीय दोनों ही स्तर पर ऑनलाइन व्यापार मंच का निर्माण करके इन चुनौतियों को ध्यान दिलाता है। संपूर्ण एकीकृत बाजारों की प्रक्रियाओं को व्यवस्थित करने के लिए एकरूपता को प्रोत्साहित करता है। खरीददारों और विक्रेताओं के बीच की विषम जानकारी को हटाता है तथा वास्तविक मांग एवं आपूर्ति पर आधारित वास्तविक समय मूल्य की खोज को बढ़ावा देता है। नीलामी प्रक्रिया में पारदर्शिता को बढ़ावा देता है और अपनी उपज की गुणवत्ता वाले अनुरूप मूल्यों एवं ऑनलाइन भुगतान तथा बेहतर गुणवत्ता वाले उत्पाद की उपलब्धता के माध्यम से किसान को राष्ट्रव्यापी बाजार की पहुंच प्राप्त करवाता है। साथ ही उपभोक्ता को अधिक उचित मूल्य पर उत्पाद उपलब्ध करवाता है।

विनियमित बाजार में पारदर्शी विक्रय सुविधा और मूल्य की खोज के लिए राष्ट्रीय ई-बाजार मंच प्रारंभ से ही है। अपनी राज्य कृषि विपणन बोर्ड/ कृषि उपज बाजार समिति द्वारा ई-व्यापार के विज्ञापन के लिए इच्छुक राज्य अपनी कृषि उपज बाजार समिति अधिनियम में तदनुसार उपयुक्त प्रावधानों को पूरा करते हैं। बाजार यार्ड में भौतिक उपस्थिति या दुकान / परिसर के कब्जे के किसी पूर्व शर्त के बिना राज्य के अधिकारियों द्वारा व्यापारियों / खरीदारों और कमीशन एजेंटों लिबरल लाइसेंस उपलब्ध कराया जाएगा। व्यापारी का एक लाइसेंस राज्य भर के सभी बाजारों में मान्य रहेगा। इसके अंतर्गत कृषि उपज की गुणवत्ता मानकों के अनुरूप और खरीददारों द्वारा सूचित बोली सक्षम करने के लिए प्रत्येक बाजार में परख करने की क्रिया के लिए (गुणवत्ता परीक्षण) मूलभूत सुविधाओ का प्रावधान किया गया है। सामान्य व्यापार के लिए गुणवतियो को अब तक 69 उपजों के लिए विकसित किया गया है। बाजार शुल्क एकत्र करने के एक स्तर, अर्थात् किसान के पहले थोक खरीद पर। किसानों की सुविधा के लिए मंडी में ही इस सुविधा का उपयोग करने के लिए चयनित मंडी में/ या नजदीक मिट्टी परीक्षण प्रयोगशालाओं का प्रावधान भी है। नागार्जुन फर्टलाइजर्स और केमिकल्स लिमिटेड रणनीतिक साथी (एस.पी) है, जो विकास, परिचालन और मंच का रखरखान करने के लिए जिम्मेदार है। रणनीतिक साथी की मुख्य भूमिका बहुत ही व्यापक है और इसमें सॉफ्टवेयर बनाना, ई-नाम के साथ एकीकृत होने के इच्छुक राज्यों में मंडियों की विशिष्ट आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए इसे अनुकूल बनाना और मंच पर चलाना सम्मिलित है।

व्यापारियों एवं कमीशन एजेंट के लिए बेहतर निगरानी और पूरी तरह से पारदर्शी व्यवस्था है, जो निविदा/नीलामी प्रक्रिया में जाने या अनजाने में हेरफेर की किसी भी संभावना को समाप्त करती है। सभी लेन-देन लेखांकन के माध्यम से बाजार शुल्क संचयन में सुधार जो बाजार में जगह ले रहे हैं। जनशक्ति आवश्यकताओं में कमी क्योंकि निविदा/ नीलामी प्रक्रिया प्रणाली के माध्यम से जगह ले लेता है। आमदनी एवं मूल्यों का विश्लेषण और पूर्वानुमान लगाया जाता है। प्रत्येक कृषि उपज बाजार समिति की गतिविधियों की जानकारी वेबसाइट पर उपलब्ध है। यह किसानों को ई-नाम उत्पाद को बेचने और प्रतिस्पर्धात्मक मूल्य प्राप्त करने के लिए अधिक विकल्प प्रदान करने का वादा करता है। व्यापारियों के लिए ई-नाम माध्यमिक व्यापार के लिए एक बड़े राष्ट्रीय बाजार का पहुंच प्रदान करेगा। थोक खरीदार, संसाधक और निर्यातक के लिए यह स्थानीय मंडी व्यापार में सीधी भागीदारी को सक्षम करेगा, जिससे वित्तीय मध्यस्थता के खर्च में कमी होगी।

बाजार का एकीकरण और ऑनलाइन व्यापार उपलब्ध कराने के लिए आवश्यक है कि राज्यों के संबंध में योजना के तहत सहायता की मांग करने से पहले एक एकल लाइसेंस हो। यह लाइसेंस राज्य भर में मान्य हो और बाजार शुल्क को एक स्तर में एकत्र किया जाए। इसके अतिरिक्त उत्कृष्ट मूल्य खोज के साधन के रूप में इलेक्ट्रॉनिक नीलामी का प्रावधान होना चाहिए। केवल इन तीन पूर्व-पेक्षाओं को पूर्ण करने वाले राज्य और केंद्र शासित प्रदेश इस योजना के अंतर्गत सहयोग के पात्र होंगे। राज्यों को यह सुनिश्चित कर लेना चाहिए कि सुधार कृषि उपज बाजार समिति अधिनियमों और कानूनों दोनों में उचित और स्पष्ट प्रावधानों के अनुसार अक्षरश: पूरा किया गया है। राज्य विपणन बोर्ड/ कृषि उपज बाजार समिति के अलावा ई-नीलामी मंच को सक्षम करना आवश्यक है। राज्यों को यह सुनिश्चित करने की आवश्यकता पड़ेगी कि जो मंडियां ई-नाम के साथ एकीकृत हैं, वे उत्तम ऑनलाइन संयोजकता, हार्डवेयर और जांचे गए उपकरणों के लिए प्रावधान बनाती है

ई-मंच से जुड़ने के लिए इच्छुक राज्यों/ केंद्रशासित प्रदेशों में चयनित 585 विनियमित थोक बाजारों में ई-नाम को प्रसारित किया रहा है। छोटे किसानों का कृषि व्यवसाय सहायता संघ ई-नाम का संचालन रणनीतिक साथी से प्राप्त तकनीकी सहायता के साथ कार्यान्वयन एजेंसी के रूप में हो रहा है। ई-नाम पर व्यापार के लिए वस्तुओं को जांचने की सुविधा के लिए, आम व्यापार योग्य मानकों को 90 उपजो के लिए विकसित किया गया है।

कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री राधा मोहन सिंह के अनुसार यह परियोजना एक ऑनलाइन पोर्टल द्वारा संचालित हो रही है, जिसे राज्य की मंडियों से जोड़ा जा रहा है। इसका सॉफ्टवेयर सभी इच्छुक राज्यों को नि:शुल्क दिया गया है और कामकाज में मदद के लिए हर भागीदार मंडी में एक वर्ष के लिए एक जानकार व्यक्ति को नियुक्त किया जा रहा है। इस परियोजना के तहत भारत सरकार, राज्यों की प्रस्तावित कृषि मंडी को 30 लाख रुपये का अनुदान दे रही है। इस पोर्टल से संबंधित जानकारी प्राप्त करने के लिए किसानों को 24 घंटे किसान हेल्पलाइन सेवाएं उपलब्ध होंगी। कृषि मंत्रालय ने अपने लिए एक कृषि विकास वृक्ष की अवधारणा अपनाई है और इसी कृषि वृक्ष के अंदर कृषि मंत्रालय ने किसानों के समग्र विकास के लिए विभिन्न परियोजनाएं शुरू की हैं। भारत में पहली बार “एक राष्ट्र – एक बाजार” विकसित हो रहा है और यह कृषि बाजार अंतरराष्ट्रीय स्तर का होगा, इसके लिए सबको मिलकर काम करना होगा।



(डॉ सौरभ मालवीय की पुस्तक- 'विकास के पथ पर भारत' से)

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विद्यालयों में राजनीति नहीं, शिक्षा का वातावरण चाहिए
लोकतंत्र में सवाल उठाना, सरकार से जवाब मांगना और अपनी बात रखना हर नागरिक का अधिकार है। लेकिन विद्यालय जैसे पवित्र शैक्षणिक परिसर को राजनीतिक गतिविधियों का अखाड़ा बनाना उचित नहीं कहा जा सकता।
राजस्थान के विद्यालयों में निरीक्षण और आंदोलन के लिए राजनीतिक कार्यकर्ताओं के दल-बल के साथ पहुंचने की घटना इसी गंभीर प्रश्न को सामने लाती है। यदि ग्रामीणों ने उन्हें विद्यालय परिसर से बाहर किया, तो यह भी इस बात का संकेत है कि समाज अपने बच्चों की शिक्षा को राजनीतिक हस्तक्षेप से मुक्त रखना चाहता है।
राजनीति के अपने मंच हैं, आंदोलन के अपने स्थान हैं, विद्यालय बच्चों के भविष्य निर्माण का केंद्र हैं।
छात्रों के कंधे पर राजनीति करना निंदनीय है, बल्कि यह शिक्षा के मूल उद्देश्य के साथ भी अन्याय है। बच्चों को राजनीतिक संघर्ष का माध्यम बनाने के बजाय उनके हाथों में पुस्तक, ज्ञान और संस्कार दिए जाने चाहिए।
लोकतंत्र में असहमति का सम्मान हो, प्रश्न पूछे जाएं, सरकार की जवाबदेही तय हो,लेकिन विद्यालय की गरिमा और विद्यार्थियों के भविष्य की कीमत पर नहीं।

Thursday, August 20, 2026

प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना : किसानों को आस बंधी


भारत एक कृषि प्रधान देश है, जहां अधिकतक ग्रामीण कृषि पर आश्रित हैं। कृषि किसानों का मुख्य व्यवसाय है, परंतु प्रतिवर्ष प्राकृतिक आपदाओं अथवा आगजनी के कारण किसानों की फसल नष्ट हो जाती है। कभी अत्यधिक वर्षा के कारण फसल नष्ट हो जाती है, कभी ओलावृष्टि खड़ी फसल पर आपदा बनकर टूट पड़ती है, तो कभी सूखा पड़ जाता है। सूखे के कारण बिजाई नहीं हो पाती, तो कभी सिंचाई के अभाव में खड़ी फसल सूख जाती है। इसके अतिरिक्त आगजनी भी फसल को राख कर देती है। ऐसी स्थिति में किसानों पर संकट के बादल छा जाते हैं। उनका जीवन आर्थिक समस्याओं से घिर जाता है। किसान ऋण लेकर बुआई करते हैं। अकसर उन्हें खाद, बीज और कीटनाशकों तक के लिए ऋण लेना पड़ता है। फसल नष्ट होने पर उन्हें उत्पाद की हानि तो होती ही है, साथ ही ऋण पर बढ़ता ब्याज उनके लिए एक बड़ा संकट बन जाता है। वे दाने-दाने के लिए मोहताज हो जाते हैं। भुखमरी उन्हें तोड़ डालती है. ऐसे में कोई उपाय न देख किसान आत्महत्या तक कर लेते हैं। 

किसानों को प्राकृतिक आपदाओं और आगजनी आदि के कारण नष्ट हुई फसल की हानि की भरपाई करने के लिए केंद्र सरकार ने एक योजना आरंभ की है, जिसका नाम है प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना। 
 प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 13 जनवरी 2016 को फसल बीमा योजना का अनावरण किया। यह योजना उन किसानों पर प्रीमियम का बोझ कम करने में सहायता करेगी, जो अपनी खेती के लिए ऋण लेते हैं। यह योजना खराब मौसम से किसानों की रक्षा भी करेगी। बीमा दावे के निपटान की प्रक्रिया को तेज और आसान बनाने का निर्णय लिया गया है, ताकि किसान फसल बीमा योजना के संबंध में किसी समस्या का सामना न करें। यह योजना भारत के हर राज्य में संबंधित राज्य सरकारों के साथ मिलकर लागू की गई है। 

इस योजना के अनुसार किसानों द्वारा सभी खरीफ फसलों के लिए केवल 2 प्रतिशत एवं सभी रबी फसलों के लिए 1.5 प्रतिशत का एक समान प्रीमियम का भुगतान किया जाना है। वार्षिक वाणिज्यिक और बागवानी फसलों के मामले में प्रीमियम केवल 5 प्रतिशत होगा। किसानों द्वारा भुगतान किए जाने वाले प्रीमियम की दरें बहुत ही कम हैं और शेष प्रीमियम का भुगतान सरकार द्वारा किया जाएगा, ताकि किसी भी प्रकार की प्राकृतिक आपदाओं में फसल हानि के लिए किसानों को पूर्ण बीमित राशि प्रदान की जाए। सरकारी सब्सिडी पर कोई ऊपरी सीमा नहीं है। भले ही शेष प्रीमियम 90 प्रतिशत हो, यह सरकार द्वारा वहन किया जाएगा। इससे पहले प्रीमियम दर पर कैपिंग का प्रावधान था, जिससे किसानों को कम कम दावे का भुगतान होता था। अब इसे हटा दिया गया है और किसानों को बिना किसी कटौती के पूरी बीमित राशि का दावा मिलेगा। काफी हद तक प्रौद्योगिकी के उपयोग को प्रोत्साहित किया जाएगा। दावा भुगतान में होने वाली देरी को कम करने के लिए फसल काटने के डेटा को एकत्रित एवं अपलोड करने हेतु स्मार्ट फोन, रिमोट सेंसिंग ड्रोन और जीपीएस तकनीक का इस्तेमाल किया जाएगा। वर्ष 2016-2017 के बजट में प्रस्तुत योजना का आवंटन 5, 550 करोड़ रूपये का है। बीमा योजना को एक मात्र बीमा कंपनी, भारतीय कृषि बीमा कंपनी द्वारा नियंत्रित किया जाएगा।
प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना,  राष्ट्रीय कृषि बीमा योजना एवं संशोधित राष्ट्रीय कृषि बीमा योजना की एक प्रतिस्थापन योजना है और इसलिए इसे सेवा कर से छूट दी गई है।

इस योजना का उद्देश्य प्राकृतिक आपदाओं, कीट और रोगों के परिणामस्वरूप अधिसूचित फसल में से किसी की विफलता की स्थिति में किसानों को बीमा कवरेज और वित्तीय सहायता प्रदान करना है। कृषि में किसानों की सतत प्रक्रिया सुनिश्चित करने के लिए उनकी आय को स्थायित्व देना है। किसानों को कृषि में नवाचार एवं आधुनिक पद्धतियों को अपनाने के लिए प्रोत्साहित करना है। इसके साथ ही कृषि क्षेत्र में ऋण के प्रवाह को सुनिश्चित करना है।

इस योजना के तहत जिन किसानों को शामिल किया गया है, उनमें अधिसूचित क्षेत्रों में अधिसूचित फसल उगाने वाले पट्टेदार/ जोतदार किसानों सहित सभी किसान कवरेज के लिए पात्र हैं। गैर ऋणी किसानों को राज्य में प्रचलित के भूमि रिकार्ड अधिकार, भूमि कब्जा प्रमाण पत्र आदि आवश्यक दस्तावेजी प्रस्तुत करना आवश्यक हैं। इसके अलावा राज्य सरकार द्वारा अनुमति अधिसूचित लागू अनुबंध, समझौते के विवरण आदि अन्य संबंधित दस्तावेजों भी आवश्यक हैं। अनिवार्य घटक वित्तीय संस्थाओं से अधिसूचित फसलों के लिए मौसमी कृषि कार्यों के लिए ऋण लेने वाले सभी किसान अनिवार्यतः आच्छादित होंगे। स्वैच्छिक घटक गैर ऋणी किसानों के लिए योजना वैकल्पिक होगी।
योजना के तहत अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति/महिला किसानों की अधिकतम कवरेज सुनिश्चित करने के लिए विशेष प्रयास किया जाएगा। इसके तहत बजट आबंटन और उपयोग संबंधित राज्य के अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति/सामान्य वर्ग द्वारा भूमि भूमि-धारण के अनुपात में होगा। पंचायती राज संस्थाओं को कार्यान्वयन एवं फसल बीमा योजनाओं पर किसानों की प्रतिक्रिया प्राप्त करने के लिए शामिल किया जा सकता है।

यह योजना बड़े पैमाने पर आपदाओं के लिए प्रत्येक अधिसूचित फसल के लिए एक 'क्षेत्र दृष्टिकोण आधार' यानी परिभाषित क्षेत्रों पर लागू की जाएगी। यह धारणा है कि सभी बीमित किसान को बीमा की एक इकाई के रूप में एक फसल के लिए ’अधिसूचित क्षेत्र’ के रूप में परिभाषित किया जाना चाहिए, जो समान जोखिम का सामना करते हैं और काफी हद तक एक समान प्रति हेक्टेयर उत्पादन के लागत, प्रति हेक्टेयर तुलनीय कृषि आय और अधिसूचित क्षेत्र में जोखिम के कारण एक समान फसल हानि अनुभव करते हैं। अधिसूचित फसल के लिए बीमा की इकाई को जनसंख्या की दृष्टि से समरूप जोखिम वाले क्षेत्र से मिलान किया जा सकता है।
परिभाषित जोखिम के कारण स्थानीय आपदाओं और पोस्ट-हार्वेस्ट हानि के जोखिम के लिए, हानि के आकलन के लिए बीमा की इकाई प्रभावित व्यक्तिगत किसान का बीमाकृत क्षेत्र होगा।

बीमा कंपनियों के कार्यान्वयन पर समग्र नियंत्रण कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के तहत किया जाएगा। मंत्रालय द्वारा नामित पैनल में शामिल भारतीय कृषि बीमा कंपनी और कुछ निजी बीमा कंपनियां वर्तमान में सरकार द्वारा प्रायोजित कृषि, फसल बीमा योजना में भाग लेंगी। निजी कंपनियों का चुनाव राज्यों के उपर छोड़ दिया गया है। पूरे राज्य के लिए एक बीमा कंपनी होगी। कार्यान्वयन एजेंसी का चुनाव तीन साल की अवधि के लिए किया जा सकता है, तथापि राज्य सरकार/केन्द्र शासित प्रदेश तथा संबंधित बीमा कंपनी यदि प्रासंगिक हो, तो शर्तों पर फिर से बातचीत करने के लिए स्वतंत्र हैं। यह बीमा कंपनियों को किसानों के बीच सामाजिक-आर्थिक विकास के लिए विभिन्न कल्याणकारी गतिविधियों में प्रीमियम बचत से निवेश करने के माध्यम से विश्वसनीयता स्थापित करने के लिए सुविधा प्रदान करेगा।

राज्य में योजना के कार्यक्रम की निगरानी के लिए संबंधित राज्य की मौजूदा फसल बीमा पर राज्य स्तरीय समन्वय समिति जिम्मेदार होगी। हालांकि कृषि सहयोग और किसान कल्याण विभाग के संयुक्त सचिव की अध्यक्षता में एक राष्ट्रीय स्तर की निगरानी समिति राष्ट्रीय स्तर पर इस योजना की निगरानी करेगी। किसानों को अधिकतम लाभ सुनिश्चित करने के लिए प्रत्येक फसली मौसम के दौरान प्रभावी कार्यान्वयन के लिए कई निगरानी उपायों का पालन प्रस्तावित है, जैसे नोडल बैंकों के बिचौलिये आगे मिलान के लिए बीमित किसानों (ऋणी और गैर-ऋणी दोनों) की सूची अपेक्षित विवरण जैसे नाम, पिता का नाम, बैंक खाता नंबर, गांव, श्रेणी - लघु और सीमांत समूह, महिला, बीमित होल्डिंग, बीमित फसल, एकत्र प्रीमियम, सरकारी सब्सिडी आदि सॉफ्ट कॉपी में संबंधित शाखा से प्राप्त कर सकते हैं। इसे ई मंच तैयार हो जाने पर ऑनलाइन कर दिया जाएगा।
संबंधित बीमा कंपनियों से दावों की राशि प्राप्त करने के बाद, वित्तीय संस्थाओं/बैंकों को एक सप्ताह के भीतर दावा राशि लाभार्थियों के खाते में हस्तांतरण कर देना चाहिए। इसे किसानों के खातों में बीमा कंपनी द्वारा सीधे ऑनलाइन हस्तांतरित कर दिया जाएगा।
लाभार्थियों की सूची (बैंकवार एवं बीमित क्षेत्रवार) फसल बीमा पोर्टल एवं संबंधित बीमा कंपनियों की वेबसाइट पर अपलोड किया जा सकता है।
लगभग 5 प्रतिशत लाभार्थियों को क्षेत्रीय कार्यालयों/बीमा कंपनियों के स्थानीय कार्यालयों द्वारा सत्यापित किया जा सकता है, जो संबंधित जिला स्तरीय निगरानी समिति और राज्य सरकार/फसल बीमा पर राज्य स्तरीय समन्वय समिति को प्रतिक्रिया भेजेंगे।
बीमा कंपनी द्वारा सत्यापित लाभार्थियों में से कम से कम 10 प्रतिशत संबंधित जिला स्तरीय निगरानी समिति द्वारा प्रतिसत्यापित किए जाएंगे और वे अपनी प्रतिक्रिया राज्य सरकार को भेजेंगे।
लाभार्थियों में से 1 से 2 प्रतिशत का सत्यापन बीमा कंपनी के प्रधान कार्यालय/केंद्र सरकार द्वारा नियुक्त स्वतंत्र एजेंसियों/राष्ट्रीय स्तर की निगरानी समिति द्वारा किया जा सकता है और वे आवश्यक रिपोर्ट केन्द्र सरकार को भेजेंगे। इसके अतिरिक्त पहले से ही चल रही फसल बीमा योजनाओं राष्ट्रीय कृषि बीमा योजना, मौसम आधारित फसल बीमा योजना, संशोधित राष्ट्रीय कृषि बीमा योजना और नारियल पाम बीमा योजना के कार्यान्वयन और निगरानी की देखरेख कर रही है जिला स्तरीय निगरानी समिति इस नई
योजना के उचित प्रबंधन के लिए जिम्मेदार होगी।

भारत सरकार ने योजनायों के बेहतर प्रशासन, समन्वय, जानकारी के समुचित प्रचार-प्रसार और पारदर्शिता के लिए एक बीमा पोर्टल आरंभ किया है। इसके साथ ही एक एंड्रॉयड आधारित फसल बीमा ऐप्प भी शुरू किया गया है, जिसे फसल बीमा, कृषि सहयोग और किसान कल्याण विभाग की वेबसाइट से डाउनलोड किया जा सकता है।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा, ’प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना अब तक जितनी योजनाएं थीं उनकी विशेषताओं को तो समाहित करती ही है लेकिन जो कमियां थीं, उनका प्रभावी समाधान देती है। अब तक की सबसे कम प्रीमियम दर, सरल टेक्नालॉजी जैसे मोबाइल फोन का उपयोग कर नुक़सान का त्वरित आंकलन, निश्चित समय सीमा में पूरे दावे का भुगतान। “यह एक ऐतिहासिक दिन है, मेरा विश्वास है किसानों के कल्याण से प्रेरित प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना किसानों के जीवन में बहुत बड़ा परिवर्तन लाएगी। प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना: आपदाओं के दायरे को बढ़ाया गया - जल भराव, फसल कटाई के बाद होने वाले नुकसान जैसी आपदाओं को सम्मिलित किया।”
इसमें कोई संदेह नहीं है कि प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना किसानों के लिए एक वरदान है। इससे प्राकृतिक आपदाओं या आगजनी के कारण नष्ट हुई फसल की हानि की भरपाई हो सकेगी।



(डॉ सौरभ मालवीय की पुस्तक- 'विकास के पथ पर भारत' से)

दीन दयाल उपाध्याय ग्राम ज्योति योजना : गांवों में उजियारा होगा


देश के अधिकतर गांवों में आज भी विद्युत संकट एक चुनौती बना हुआ है। ग्रामीण क्षेत्रों में उपभोक्ताओं के बदलते आधार, जीवन स्तर में सुधार के कारण बिजली की मांग दिन प्रतिदिन बढ़ती जा रही है, जिसके लिए ग्रामीण मूलभूत ढांचे में वृद्धि की आवश्यकता है। देश के ग्रामीण कृषि और गैर-कृषि उपभोक्ताओं को आमतौर पर स्थानीय वितरण नेटवर्क से सेवाएं मिलती हैं। देश के अनेक ग्रामीण क्षेत्रों को अपर्याप्त विद्युत आपूर्ति का सामना करना पड़ रहा है। परिणामस्वरूप जन उपयोगी वितरण सेवाओं को लोड शेडिंग करने के लिए बाध्य होना पड़ता है, जिसके कारण कृषि और गैर-कृषि उपभोक्ताओं के लिए विद्युत की आपूर्ति प्रभावित होती है। ग्रामीण क्षेत्रों में पर्याप्त विद्युत न मिलने के कारण कृषि कार्य बुरी तरह प्रभावित होते हैं। इससे किसानों को बहुत हानि होती है।

ग्रामीण क्षेत्रों की विद्युत समस्या से छुटकारा दिलाने के लिए केन्द्र सरकार ने दीन दयाल उपाध्याय ग्राम ज्योति योजना बनाई है। इसका उद्देश्य देश के ग्रामीण क्षेत्रों के उपभोक्ताओं को निरंतर बिजली की आपूर्ति प्रदान करना है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 20 नवंबर, 2014 को इसे प्रारंभ किया। इस योजना के अंतर्गत सरकार ने 1000 दिनों के भीतर 1 मई,  2018 तक 18,452 अविद्युतीकृत गांवों का विद्युतीकरण करने का निर्णय लिया है। इस योजना के लिए कुल 43 हजार 33 करोड़ के निवेश की आवश्यकता है। योजना की पूरी अवधि में केन्द्र सरकार 33 हजार 4 सौ 53 करोड़ रुपये की सहायता देगी। यह योजना मौजूदा राजीव गांधी ग्रामीण विद्युतीकरण योजना को प्रतिस्थापित करेगी, किन्तु राजीव गांधी विद्युतीकरण योजना की सुविधाओं को दीन दयाल उपाध्याय ग्राम ज्योति योजना की नई योजना में सम्मिलित किया गया है और राजीव गांधी ग्रामीण विद्युतीकरण योजना की बची हुई राशि को इसमें सम्मिलित किया जाएगा। यह योजना विद्युत मंत्रालय के प्रमुख कार्यक्रमों में से एक है और बिजली की निर्बाध आपूर्ति की सुविधा को बेहतर बनाएगी। इसससे 24 घंटे बिजली की आपूर्ति में सहायता मिलेगी।

इस योजना के अंतर्गत ग्रामीण क्षेत्रों में कृषि एवं गैर कृषि उपभोक्ताओं की आपूर्ति को सही तरीके से बहाल करने के लिए कृषि और गैर कृषि फीडरों का पृथक्करण किया जाएगा। ग्रामीण क्षेत्रों में ट्रांसफार्मर / फीडरों / उपभोक्ताओं की नपाई सहित उप-पारेषण और वितरण की आधारभूत संरचना का सुदृढ़ीकरण एवं आवर्धन होगा। इसके अतिरिक्त राजीव गांधी विद्युतीकरण योजना के अंतर्गत पहले से ही स्वीकृत माइक्रो ग्रिड और ऑफ ग्रिड वितरण नेटवर्क एवं ग्रामीण विद्युतीकरण परियोजनाओं को पूरा किया जाना है।

मौजूदा राजीव गांधी ग्रामीण विद्युतीकरण योजना को दीन दयाल उपाध्याय ग्राम ज्योति योजना में समाहित किया गया है। सभी डिस्कॉम इस योजना के तहत वित्तीय सहायता के पात्र हैं। इस योजना के अंतर्गत निजी डिस्कॉम और राज्य के विद्युत विभागों सहित सभी डिस्कॉम वित्तीय सहायता के पात्र हैं। डिस्कॉम ग्रामीण बुनियादी ढांचे को मजबूत बनाने लिए विशिष्ट नेटवर्क की आवश्यकता को प्राथमिकता देंगे और योजना के तहत कवरेज के लिए परियोजनाओं की विस्तृत परियोजना रिपोर्ट तैयार करेंगे। ग्रामीण विद्युतीकरण निगम लिमिटेड योजना के कार्यान्वयन और संचालन के लिए नोडल एजेंसी है। यह विद्युत मंत्रालय और केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण को इस योजना के कार्यान्वयन पर वित्तीय और भौतिक दोनों प्रगति को दर्शाते हुए मासिक प्रगति रिपोर्ट प्रस्तुत करेगा। समय-समय पर इस परियोजना के कार्यान्वयन के लिए आवश्यक सभी दिशा निर्देशों और स्वरूपों को अधिसूचित किया जाएगा। निगरानी समिति को प्रस्तुत करने से पूर्व विस्तृत परियोजना रिपोर्ट का मूल्यांकन करना होगा। स्वीकृति के लिए निगरानी समिति की बैठकों का आयोजन करने के लिए संबंधित सभी काम संचालित करना होगा। विस्तृत परियोजना रिपोर्ट के प्रस्तुतीकरण और परियोजनाओं के मासिक आय योजना को संधारित करने के लिए एक समर्पित वेब पोर्टल का विकास किया जाएगा। साथ ही कार्यों की गुणवत्ता सहित परियोजनाओं की भौतिक और वित्तीय प्रगति की निगरानी भी सुनिश्चित की जाएगी। 

इस योजना से ग्रामीणों विशेषकर किसानों को बहुत लाभ होगा। सभी गांवों और घरों का विद्युतीकरण किया जाएगा। किसानों को पर्याप्त विद्युत उपलब्ध होने से वे समय पर कृषि कार्य कर पाएंगे। समय पर खेतों की सिंचाई हो सकेगी, जिससे कृषि उपज में वृद्धि होगी। इसके साथ ही छोटे और कुटीर उद्यमों का विकास होगा और इससे रोजगार के नये अवसर उपलब्ध होंगे। विद्युत से स्वास्थ्य, शिक्षा, बैंकिंग सेवाओं में सुधार होगा। विद्युत होगी, तो गांवों में रेडियो, टेलीफोन, टेलीविजन, इंटरनेट सेवाओं का भी विस्तार होगा। इसके अलावा स्कूलों, पंचायतों, अस्पतालों और पुलिस स्टेशनों को भी पर्याप्त बिजली उपलब्ध कराई जा सकेगी। बिजली पर्याप्त की उपलब्धता के कारण सामाजिक विकास होगा।  

निगरानी समिति परियोजनाओं को स्वीकृति देगी और इस योजना के कार्यान्वयन की निगरानी करेगी। योजना के अंतर्गत निर्धारित दिशा-निर्देशों के अनुसार इस योजना के कार्यान्वयन को सुनिश्चित करने के लिए विद्युत मंत्रालय, राज्य सरकार और डिस्कॉम के बीच उपयुक्त त्रिपक्षीय समझौते को निष्पादित किया जाएगा। राज्य विद्युत विभागों के मामलों में द्विपक्षीय समझौते को निष्पादित किया जाएगा।  परियोजना को टर्नकी आधार पर लागू किया जाएगा। खुली प्रतिस्पर्धी बोली प्रक्रिया के अनुसार निर्धारित मूल्य के आधार पर टर्नकी अनुबंध प्रदान किया जाएगा। निगरानी समिति द्वारा अनुमोदन की सूचना के तीन महीने के भीतर परियोजनाओं को सम्मानित किया जाना है। असाधारण परिस्थितियों में निगरानी समिति के अनुमोदन के साथ आंशिक टर्नकी / विभागीय आधार पर निष्पादन अनुमति दी जाएगी। इस योजना के अंतर्गत परियोजनाओं को कार्य पत्र जारी होने की तिथि से 24 महीने की अवधि के भीतर पूरा कर लिया जाना सुनिश्चत किया गया है।

इस योजना का अनुदान भाग विशेष श्रेणी के राज्यों के अलावा अन्य राज्यों के लिए 60 प्रतिशत (निर्धारित मील के पत्थर की उपलब्धि पर 75 प्रतिशत तक) और विशेष श्रेणी के राज्यों के लिए 85 प्रतिशत (निर्धारित मील के पत्थर की उपलब्धि पर 90 प्रतिशत तक) है। अतिरिक्त अनुदान के लिए मील के पत्थर योजना को समय पर पूरा करना, प्रति प्रक्षेपवक्र समग्र तकनीकी एवं वाणिज्यिक हानि में कमी और राज्य सरकार द्वारा अनुदान का अग्रिम रिलीज हैं। सभी पूर्वोत्तर राज्यों सिक्किम, जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड सहित को विशेष राज्यों की श्रेणी में सम्मिलित किया गया हैं।

इस परियोजना को मिशन मोड के आधार पर लिया गया है और विद्युतीकरण के लिए कार्यान्वयन सारणी को 12 महीने की समय सीमा में सीमित करना एवं ग्राम विद्युतीकरण प्रक्रिया को निगरानी के लिए निर्धारित समय सीमा के 12 चरणों के मील के पत्थर में विभाजित किया गया है। अप्रैल 2015 से 14 अगस्त, 2015 तक कुल 1654 गांवों को विद्युतीकृत किया गया और केन्द्र सरकार द्वारा मिशन मोड रूप में पहल करने के बाद 15 अगस्त, 2015 से 17 अप्रैल, 2016 तक 5689 अतिरिक्त गांवों को विद्युतीकृत किया गया। प्रगति में और तेजी लाने के लिए ग्राम विद्युत अभियंता के माध्यम से निगरानी की जा रही है एवं मासिक आधार पर प्रगति की समीक्षा, योजना और निगरानी की बैठक आयोजित की जा रही है। राज्य डिस्कॉम के साथ विद्युतीकरण के स्तर पर वाले गांवों की सूची साझा करने का कार्य भी चल रहा है। ऐसे गांवों की पहचान की जा रही है, जहां प्रगति में देरी हो रही है। 

वास्तव में ग्रामीण क्षेत्रों में विद्युत की आपूर्ति करने वाली वितरण कम्पनियों की वित्तीय हालत खराब होने के कारण वितरण नेटवर्क में निवेश कम हुआ है। विश्वसनीयता और गुणवत्ता बढ़ाने के लिए आपूर्ति-वितरण नेटवर्क को सुदृढ़ बनाने की आवश्यकता है। बिजली वितरण की व्यावसायिक व्यवहारिकता में सुधार के लिए उपभोक्ताओं की सभी श्रेणियों की मीटरिंग करने की आवश्यकता है।
निसंदेह दीन दयाल उपाध्याय ग्राम ज्योति योजना से ग्रामीण क्षेत्रों में पर्याप्त विद्युत पहुंचाई जा सकेगी और ग्रामों में उजियारा हो जाएगा।



(डॉ सौरभ मालवीय की पुस्तक- 'विकास के पथ पर भारत' से)

Wednesday, August 19, 2026

नैतिक एवं आध्यात्मिक शिक्षा की क्षेत्रीय टोली बैठक सम्पन्न







लखनऊ। विद्या भारती पूर्वी उत्तर प्रदेश की नैतिक एवं आध्यात्मिक शिक्षा की क्षेत्रीय टोली की बैठक निराला नगर, लखनऊ में सम्पन्न हुई। बैठक के समापन सत्र में डॉ. सौरभ मालवीय ने कहा कि विद्या भारती का उद्देश्य बालकों में भारत-केंद्रित शिक्षा का संचार, नैतिक मूल्यों का विकास और आध्यात्मिक भाव की जागृति करना है।

उन्होंने कहा कि शिक्षा का मूल उद्देश्य बालक के व्यक्तित्व का सर्वांगीण विकास है। भारतीय ज्ञान परंपरा, संस्कार, संस्कृति और जीवन-मूल्यों से जुड़ी शिक्षा बालकों को अपनी जड़ों से जोड़ने के साथ-साथ उन्हें राष्ट्र और समाज के प्रति जिम्मेदार नागरिक बनने की प्रेरणा देती है।

डॉ. मालवीय ने कहा कि नैतिक एवं आध्यात्मिक शिक्षा के माध्यम से विद्यार्थियों में सत्य, अनुशासन, सेवा, संवेदना, कर्तव्यबोध और राष्ट्रनिष्ठा जैसे जीवन-मूल्यों का विकास किया जाना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि विद्या भारती इसी दृष्टि के साथ शिक्षा को संस्कार और चरित्र निर्माण का माध्यम बनाने के लिए निरंतर कार्य कर रही है।

बैठक में नैतिक एवं आध्यात्मिक शिक्षा को विद्यालयों में अधिक प्रभावी एवं व्यवहारिक रूप से लागू करने, आचार्यों के प्रशिक्षण तथा विद्यार्थियों में भारतीय जीवन-दृष्टि के विकास से जुड़े विभिन्न विषयों पर चर्चा की गई।

परम्परागत खेती विकास योजना : जैविक खेती से लहलहाएंगी फसलें

देश में प्राचीन काल से ही जैविक खेती की जाती रही है। भारत परम्परागत रूप से विश्व का सबसे बड़ा जैविक कृषि करने वाला देश है। अब भी देश के बहुत बड़े भू–भाग में परम्परागत ज्ञान के आधार पर जैविक खेती की जाती है। जैविक खादों पर आधारित पारम्परिक खेती को जैविक खेती कहा जाता है। बदलते समय के साथ कृषि भूमि कम होने लगी और बढ़ती जनसंख्या का भार सीमित कृष क्षेत्र पर आ गया। ऐसी स्थिति में अधिक से अधिक उत्पादन लेने की होड़ लग गई। रासायनिक उर्वरकों का अंधाधुंध प्रयोग किया जाने लगा। इससे उत्पादन तो बढ़ गया, परंतु दिनों-दिन भूमि की उर्वरा शक्ति कम होने लगी। निसंदेह रासायनिक उर्वरकों के कारण उत्पादन बढ़ा, किन्तु इस तरह अधिक समय तक खेती नहीं की जा सकती। इसे देखते हुए पारम्परिक जैविक खेती और भी महत्वपूर्ण हो गई है। आज विश्व भर में जैविक खाद्य के लिए मांग में महत्वपूर्ण वृद्धि हुई है। जैविक खेती की तकनीक को बढ़ावा मिलने से देश इन खाद्य पदार्थों के विशाल निर्यात की संभावनाओं को साकार कर सकता है। इस सबको ध्यान में रखते हुए भारत सरकार ने परम्परागत कृषि विकास योजना शुरू की है।

राष्ट्रीय सतत कृषि मिशन के अंतर्गत मृदा स्वास्थ्य प्रबंधन का एक सविस्तारित घटक है। परम्परागत कृषि विकास योजना के अंतर्गत जैविक खेती को क्लस्टर पद्धति और प्रमाणीकरण और भागीदारिता गारंटी प्रणाली द्वारा प्रोत्साहित किया जाता है। कृषि एवं सहकारिता विभाग द्वारा वर्ष 2015-16 से एक नई परम्परागत कृषि विकास योजना का शुभारम्भ किया गया है। इस योजना का उद्देश्य जैविक उत्पादों के प्रमाणीकरण और विपणन को प्रोत्साहन करना है। इस योजना के अंतर्गत सम्मिलित घटक सहभागिता जैविक प्रतिभूति प्रणाली या प्रमाणीकरण और भागीदारिता गारंटी प्रणाली को सुदृढ़ता प्रदान करने के तारतम्य में हैं। इसी दिशा में भारत सरकार कृषि एवं सहकारिता विभाग द्वारा क्षेत्रीय परिषद के रूप में राष्ट्रीय जैविक खेती केन्द्र गाजियाबाद से पंजीयन करवाकर, प्रमाणीकरण और भागीदारिता गारंटी प्रणाली लागू करने संबंधी कार्यवाही के लिए जिला आतमा (एटीएम) समितियों को अधिकृत किया गया है। योजना के अंतर्गत गैर सरकारी संगठनों के माध्यम से प्रत्येक क्लस्टर को विभिन्न सुविधाएं उपलब्ध कराईं जाएंगी। एक क्लस्टर पर कुल 14.35 लाख रुपये खर्च किए जाएंगे। पहले वर्ष में 6,80 लाख रुपये, दूसरे वर्ष में 4.81 लाख रुपये एवं तीसरे वर्ष में 2.72 लाख रुपये की आर्थिक सहायता प्रत्येक क्लस्टर को दी जाएगी। इन रुपयों का इस्तेमाल किसानों को जैविक खेती के बारे में बताने के लिए होने वाली बैठक, एक्सपोजर विजिट, प्रशिक्षण सत्र, ऑनलाइन पंजीकरण, मृदा परीक्षण, जैविक खेती व नर्सरी की जानकारी, लिक्विड बायोफर्टीलाइजर, लिक्विड बायो पेस्टीसाइड उपलब्ध कराने, नीम तेल, बर्मी कंपोस्ट और कृषि यंत्र आदि उपलब्ध कराने पर किया जाएगा। वर्मी कम्पोस्ट का उत्पादन एवं उपयोग, बायोफर्टीलाइजर और बायोपेस्टीसाइड के बारे में प्रशिक्षण, पंच गव्य के उपयोग और उत्पादन पर प्रशिक्षण आदि इसके साथ ही जैविक खेती से पैदा होने वाले उत्पाद की पैकिंग एवं परिवहन के लिए भी अनुदान दिया जाएगा।

इस योजना का उद्देश्य प्रमाणित जैविक खेती के माध्यम से वाणिज्यिक जैविक उत्पादन को बढ़ावा देना है। उपज को कीटनाशक मुक्त करके उपभोक्ता को पौष्टिक खाद्यान्न उपलब्ध कराना है। जैविक खेती से किसानों की आमदनी में बढ़ोतरी होगी और व्यापारियों को भी बाजार उपलब्ध होगा। इसके साथ ही यह योजना उत्पादन के लिए प्राकृतिक संसाधन जुटाने के लिए भी किसानों को प्रेरित करेगी। किसान प्राकृतिक वस्तुओं का प्रयोग करके भरपूर और उन्नत फसल उगा सकेंगे। 

परम्परागत कृषि विकास योजना पहली व्यापक योजना है, जिसका कार्यान्वयन प्रति 20 हैक्टेयर के क्लस्टर आधार पर राज्य सरकारों द्वारा किया जाता है। किसान हित समूहों को जैविक खेती शुरू करने के लिए प्रेरित किया जाएगा। क्लस्टर के अंतर्गत किसानों को अधिकतम एक हैक्टेयर तक की वित्तीय सहायता दी जाती है। जैविक खेती का काम शुरू करने के लिए 50 या उससे अधिक ऐसे किसान एक क्लस्टर बनाएंगे, जिनके पास 50 एकड़ भूमि होगी। इस तरह तीन वर्षों के दौरान जैविक खेती के तहत 10 हजार क्लस्टर बनाए जाएंगे, जो पांच लाख एकड़ के क्षेत्र को कवर करेंगे। प्रमाणीकरण पर व्यय के लिए किसानों पर कोई भार या दायित्व नहीं होगा। फसलों की बुआई के लिए, बीज खरीदने और उपज को बाजार में पहुंचाने के लिए हर किसान को तीन वर्षों में प्रति एकड़ 20 हजार रुपये दिए जाएंगे। परम्परागत संसाधनों का उपयोग करके जैविक खेती को प्रोत्साहित किया जाएगा और जैविक उत्पादों को बाजार के साथ जोड़ा जाएगा। यह किसानों को शामिल करके घरेलू उत्पादन और जैविक उत्पादों के प्रमाणीकरण को बढ़ाएगा। 

उल्लेखनीय है कि देश में वर्तमान में 22.5 लाख हेक्टेयर भूमि पर जैविक खेती हो रही है, जिसमे परंपरागत कृषि विकास योजना से 3,60,400 किसान को लाभ पहुंचा है। इसी तरह पूर्वोत्तर राज्यों के क्षेत्रों में जैविक कृषि के अंतर्गत 50 हजार हेक्टेयर क्षेत्र को कवर करने का लक्ष्य है। नवंबर, 2017 तक 45863 हेक्टेयर क्षेत्र को जैविक योग्य क्षेत्र में परिवर्तित किया जा चुका है और 2406 किसान समूहों का गठन कर लिया गया है, 2500 किसान हित समूह लक्ष्य के मुकाबले 44064 किसानों को योजना से जोड़ा जा चुका है। 

केन्द्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री राधा मोहन सिंह के अनुसार विश्व के कुछ वैज्ञानिक इसे 'डिफाल्ट ऑर्गेनिक' कहते हैं, लेकिन हमें यह समझने की आवश्यकता है कि जो किसान परंपरागत रूप से जैविक खेती कर रहे हैं, यह उनकी मजबूरी नहीं, उनकी पसंद है। बेहद गहरी समझ के साथ वे इस रास्ते पर सदियों से चल रहे हैं। आज, वे रासायनिक खाद का इस्तेमाल नहीं करते तो यह उनकी अज्ञानता नहीं है, बल्कि उन्होंने बहुत सोच-समझ कर ऐसा न करने का निर्णय किया है। इसलिए उनकी इस खेती की विधि को 'बाई डिफाल्ट' नहीं कहा जा सकता। भारत सरकार इस बात को स्वीकार करती है कि पिछले कुछ दशकों में खेतों में रासायनिक खाद के अंधाधुंध उपयोग ने यह सवाल पैदा कर दिया है कि इस तरह हम कितने दिन खेती कर सकेंगे? रासायनिक खाद युक्त खेती से पर्यावरण के साथ सामाजिक-आर्थिक और उत्पादन से जुड़े मुद्दे भी हैं, जो हमारा ध्यान अपनी ओर आकर्षित कर रहे हैं। अब देश में खाद्य आपूर्ति की कोई समस्या नही है, लेकिन देश की बढ़ती जनसंख्या को सुरक्षित एवं पौष्टिक खाद्यान्न उपलब्ध कराने की महत्वपूर्ण चुनौती का कार्य अभी शेष है, हमारी निर्भरता रासायनिक खेती पर हो गई है, जिसमें हम रासायनिक उर्वरक, कीट-रोग नाशी एवं अन्य रसायनों का प्रयोग करके उत्पादन तो बढ़ गया, लेकिन अनियंत्रित उपयोग से असुरक्षित खाद्यान्न उत्पन्न करने की समस्या पनप गई है।

केन्द्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री के अनुसार परम्परागत खेती विकास योजना के अधीन 29 राज्यों और एक संघ राज्य क्षेत्र की वार्षिक कार्य योजना 7186 क्लस्टर विकसित करने के लिए कुल 511.76 करोड़ रूपये के कुल परिव्यय के साथ अनुमोदित किया गया है, जिसमें से वर्ष 2015-16 के दौरान राज्यो को 226 करोड़ रूपये निर्मुक्त किए गए। वर्ष 2016-17 के दौरान उपयोग में लाए जाने के लिए 2814 कलस्टरों के निर्माण के लिए 10 हजार कलस्टरों के लक्ष्य की प्राप्ति के लिए केन्द्रीय प्रोयोजित योजना के रूप में परम्परागत कृषि विकास योजना के लिए वर्ष 2016-17 के लिए 297 रूपये की राशि आवंटित की गई।

उत्तर प्रदेश में परम्परागत कृषि विकास योजना वर्ष 2015-16 से प्रारंभ हुई और 28750 एकड़ मे 28750 किसान को लाभ पहुंचा है। केन्द्र सरकार की परम्परागत खेती विकास योजना के अंतर्गत पथम चरण में बुंदेलखंड के सभी जिलों समेत उत्तर प्रदेश के 15 जिलों को इसमें शामिल किया गया है। पहले चरण में यह योजना तीन वित्तीय वर्ष के लिए बनाई गई है। इस योजना के बेहतर क्रियान्वयन के लिए गैर सरकारी संगठन का चयन किया गया है। क्लस्टर को जैविक खेती की पूरी जानकारी के साथ-साथ बेहतर क्रियान्वयन की तकनीक और तमाम संसाधन उपलब्ध कराए जाएंगे। पूरे प्रदेश में 28,750 एकड़ भूमि का चयन किया गया और 575 क्लस्टर बनाए गए हैं। इस योजना के अंतर्गत गैर सरकारी संगठनों के माध्यम से प्रत्येक क्लस्टर को विभिन्न सुविधाएं उपलब्ध कराईं जाएंगी। एक क्लस्टर पर कुल 14.35 लाख रुपये खर्च किए  जाएंगे। पहले वर्ष में 6,80 लाख रुपये, दूसरे वर्ष में 4.81 लाख रुपये व तीसरे वर्ष में 2.72 लाख रुपये की मदद प्रत्येक क्लस्टर को दी जाएगी। 
किसानों के जैविक उत्पादों के विपणन के लिए उत्तर प्रदेश सरकार पांच लाख रुपये प्रति जनपद को देकर बिक्री केन्द्र खुलवा रही है। इस योजना के तहत वर्ष 2015-16 में केन्द्र ने उत्तर प्रदेश को 2052.20 करोड़ की राशि दी, लेकिन इसमें से खर्च केवल 1075.692 करोड़ रुपये हुए। वर्ष 2016-17 में केन्द्र अब तक इस मद में उत्तर प्रदेश को 1270.64 करोड़ रुपये दे चुका है।

कृषि मंत्री के अनुसार वर्ष 2016 में जल संसाधन, नदी विकास एवं गंगा संरक्षण मंत्रालय और कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के बीच एक समझौता हुआ है, जिसके तहत उत्तराखंड में गंगा की धारा से लेकर पश्चिम बंगाल तक 1657 ग्राम पंचायतों में नमामि गंगे परियोजना के तहत परंपरागत कृषि विकास योजना के अंतर्गत 1657 क्लस्टर में जैविक खेती विकसित की जाएगी। इस परियोजना के अंतर्गत कृषि मंत्रालय क्लस्टर निर्माण के साथ एकीकृत पोषक तत्व प्रबंधन और माइक्रो सिचाई तकनीक पर प्रशिक्षण भी उपलब्ध कराएगा। 

यदि हम इन रासायनिक आदानो के अंधाधुंध प्रयोग द्वारा पर्यावरण पर होने वाले दुष्प्रभावों का विश्लेषण करें, तो पता चलेगा कि इन सारे रासायनिक पदार्थों का बड़ा भाग मिट्टी, भू-जल, हवा और पौधों में समाविष्ट हो जाता है। ये रसायन छिडकाव के समय वायु के साथ दूर तक अन्य पौधों को प्रदूषित कर देते हैं। भूमि में प्रवेश करने वाले ये रसायन भू-जल में मिलकर, पानी के अन्य स्रोतो को भी प्रदूषित कर देते हैं। रसायनों के दुष्प्रभाव से विश्व में जलवायु परिवर्तन और प्रकृति के पर्यावरण में असंतुलन उत्पन्न हो गया है, और मानवों पर भी गंभीर दुष्प्रभाव देखे गए हैं। धरती मां के स्वास्थ्य, सतत उत्पादन, आमजन को सुरक्षित एवं पौष्टिक खाद्यान के लिए जैविक कृषि आज राष्ट्रीय एवं वैश्विक आवश्यकता है।

निसंदेह जैविक खेती से न केवल भूमि की उर्वरता बनी रहेगी, अपितु खाद्यान्न भी विषैले होने से बच जाएंगे.


(डॉ सौरभ मालवीय की पुस्तक- 'विकास के पथ पर भारत' से)

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