Monday, July 13, 2026

लोकतंत्र का ध्वजवाहक है भारत

   


भाऊराव देवरस सेवा न्यास द्वारा 19 मई, 1995 को उत्तर प्रदेश के लखनऊ में आयोजित समारोह को अध्यक्ष के रूप में संबोधित करते हुए श्री अटल बिहारी वाजपेयी ने भारतीय संसद की स्थिति पर प्रकाश डाला. अपने भाषण में उन्होंने कहा कि जैसा आपने अभी सुना मुझे बहुत छोटा-सा, मगर बहुत मीठा-सा काम करना है. मुझे आज के वक्ता का परिचय देना है. यह तो सभी जानते हैं कि पाटिल साहब लोकसभा के अध्यक्ष हैं, लेकिन यह बात सब लोग नहीं जानते कि किस तरह से महाराष्ट्र के औरंगाबाद क्षेत्र के एक छोटे-से गांव में जन्म लेकर, म्युनिसिपैलिटी, विधानसभा और फिर लोकसभा- इन सारी  सीढ़ियों को पार करके पाटिल साहब आज जिस ऊंचे स्थान पर पहुंचे हैं, वह बिना कठोर परिश्रम के, बिना प्रामाणिकता के, बिना गंभीर अध्ययन के, और कर्म और व्यवहार में बिना समन्वय के प्राप्त नहीं किया जा सकता. मैं तो उन लोगों में से हूं, जो सीधे लोकसभा में छलांग लगाकर पहुंच गए. लेकिन आज लोकसभा का संचालन जिनके हाथ में है, वे अपने जीवन के सारे अनुभवों के निचोड़ के आधार पर और विश्व की परिस्थिति और भारत की दशा, इनका सही आकलन करने के बाद संसदीय लोकतंत्र देश में किस तरह से शक्तिशाली होगा, इसकी चिंता में लगे हैं और इसके चिंतन में भी लगे हैं. पहले वे म्युनिसिपैलिटी के अध्यक्ष बने, फिर महाराष्ट्र विधानसभा के सदस्य बने, वहां उपमंत्री रहे, फिर डिप्टी स्पीकर चुने गए, फिर स्पीकर चुने गए, फिर लोकसभा में आए, मंत्री पद का दायित्व संभाला, अनेक मंत्रालय देखे, सुरक्षा मंत्रालय से विशेष संबंध रहा.  स्पीकर के नाते वे लोकसभा के सदस्यों का नियमन करते हैं. हमें अनुशासन में रखते हैं. सदन की मर्यादा बनाए रखने के लिए बड़े तत्पर रहते हैं. लोकतांत्रिक जीवन-मूल्यों में उनकी आस्था संसद की कार्यवाही में भी देखी जा सकती है. 

हमारा लोकतंत्र संसार का सबसे बड़ा लोकतंत्र है. लोकतंत्र की परंपरा हमारे यहां बड़ी प्राचीन है. यह ठीक है कि आज लोकतंत्र का जो ढांचा हम विकसित कर रहे हैं, उसका ऊपरी आवरण, ब्रिटेन की संसदीय पद्धति का है. लेकिन बात ढांचे की नहीं हो रही है. वाद-विवाद के द्वारा, शास्त्रार्थ के द्वारा, विवादग्रस्त प्रश्नों का नियमन करना, यह जिस देश की परंपरा में और प्राचीन संस्कृति में घुला हुआ है, वह सचमुच में, संसार में लोकतंत्र का ध्वजवाहक बनकर आगे चले, इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है. भारत में ऐसा होता था. यहां जो गणतंत्र थे, उनमें मतदान की प्रक्रिया थी.  समितियों का निर्माण करके प्रश्न तय करने का विधान था. बाद में  कालखंड ऐसा आया कि हमारा विकास अवरुद्ध हो गया. आज हम फिर से संसार के सबसे बड़े लोकतंत्र के रूप में खड़े हैं. नये-नये आजाद हुए देश के लोकतंत्र को अपने लिए अनुकरणीय समझते हैं. वे चकित हैं कि पचास साल से, निर्बाध रूप से, लोकतंत्र चल रहा है. उनके यहां तो लोकतंत्र कठिनाइयों में पड़ जाता है. कठिनाइयों में हम भी पड़ जाते हैं, लेकिन उन कठिनाइयों में से निकल भी जाते हैं. उसमें भी लोकतंत्र की शक्ति प्रकट होती है. लोक शक्ति का प्रकटीकरण होता है. लेकिन वे हमारे लोकतंत्र को बड़ी ललचायी नजरों से देखते हैं. अभी-अभी यूरोप में क्रांतिकारी परिवर्तन हुआ. सोवियत साम्राज्य बिखर गया. अनेक देशों ने अपनी खोई हुई स्वाधीनता पा ली. नागरिकों ने भी व्यक्तिगत स्वाधीनता अर्जित की. अब वहां लोकतंत्र चल रहा है. वे हमसे सीखना चाहते हैं.  वे जानना चाहते हैं कि हम लोकतंत्र को किस तरह से सफलतापूर्वक चला रहे हैं ? इसमें पाटिल साहब का योगदान उल्लेखनीय है.

पाटिल साहब ने जहां इस बात पर बल दिया है कि कानून बनाने के साथ-साथ लोकसभा जन-जीवन के ज्वलंत प्रश्नों पर भी अपना अभिमत प्रकट करती रहे, वहां लोकसभा किस तरह से सरकार पर अंकुश लगा सकती है, उसके खर्चों पर, इसके लिए उन्होंने संसदीय पद्धति का प्रारंभ किया है. अभी तक हम लोकसभा में चर्चा करके अलग-अलग मंत्रालयों की मांगों पर अपना अभिमत प्रकट कर दिया करते थे, लेकिन ब्यौरे में जाकर विवरण में जाकर, एक-एक खर्चे की गहराई में जाकर देखना सदन के लिए संभव नहीं होता था. इतना समय भी नहीं था और इतना लोग ध्यान लगाकर काम करें, ऐसा भी नहीं होता था. अब संसदीय समितियां काम कर रही हैं. लोकसभा का कोई न कोई सदस्य किसी न किसी समिति का सदस्य है. अलग-अलग मंत्रालयों की देखरेख का काम इन समितियों के पास है और वे समितियां मंत्रालयों की पूरी छानबीन करती हैं. कितना बजट था, कितना पैसा खर्च हुआ और ज्यादा खर्च हुआ, तो क्यों ज्यादा खर्च हुआ ? उनके सामने अधिकारी आते हैं. उनकी गवाहियां ली जाती हैं.  समितियां रिपोर्ट देती हैं. सदन रिपोर्ट की चर्चा कर सकता है, उस मंत्रालय के बारे में, उस मंत्रालय की विभिन्न गतिविधियों के बारे में. यह बड़ा प्रयोग है. पहले आशंका थी. मन में संदेह था. अब धीरे-धीरे वे संदेह छंट गए हैं और संसदीय पद्धति, स्थायी समितियों की जो परिकल्पना है, वह अधिकाधिक लोगों को पसंद आ रही है. 

पाटिल साहब केवल भारत की लोकसभा का संचालन करते हैं, ऐसा नहीं है. कॊमनवेल्थ के देशों का एक संगठन है, वे इसकी भी अध्यक्षता कर चुके हैं. सारे संसार की पार्लियामेंट की एक एसोसिएशन है, वे उसकी भी अध्यक्षता कर चुके हैं. अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलनों में भारत का प्रतिनिधित्व करते हैं और भारतीय लोकतंत्र की प्रतिभा से और प्रतिमा से सबको प्रभावित रखते हैं. वे लोकसभा के अध्यक्ष हैं, और मैं एक छोटा-सा सदस्य हूं. आप जानते हैं. अभी राजनाथ सिंह जी लोकसभा अध्यक्ष को और मुझको समकक्ष रख रहे थे कि तीन-तीन बत्तियां इन्होंने जलाईं. मैं तीन बत्तियां नहीं जलाना चाहता था और चाहता था कि राजनाथ सिंह जी भी एकाध बत्ती जलाएं. लेकिन इन्होंने सारा भार मेरे ऊपर छोड़ दिया. लोकसभा के अध्यक्ष के ऊंचे आसन पर जो बैठता है, मुझे कभी बोलने का अवसर दे या न दे और कभी अध्यक्ष महोदय कह सकते हैं कि माननीय सदस्य ! आप सदन के बाहर जाइए और मैं आज्ञा का उल्लंघन नहीं कर सकता. यह बात अलग है कि ऐसी स्थिति आएगी नहीं, लेकिन कुछ सदस्यों के लिए आती है और तब वे जड़ हो जाते हैं. शांति से समझा-बुझाकर ताकि पार्लियामेंट की गरिमा बनी रहे. यह बात अलग है कि गरिमा क्षीण हो रही है, लेकिन उनकी पूरी कोशिश है कि वह बनी रहे.

और, इस काम में जितना योगदान मैं दे सकता हूं, देता रहता हूं. यद्यपि मेरी पार्टी वालों को भी कभी-कभी ऐसे क्षण आंदोलित कर देते हैं, जब उनकी इच्छा भी कुएं में कूदने की होती है. जो अध्यक्ष के सामने जगह होती है, लोकसभा में उसको ’वैल’ कहते हैं ’वैल’. और मेम्बर अपना स्थान छोड़कर कुएं में आ जाते हैं, तो समझो कि दो-दो हाथ होने वाले हैं. ये दो-दो हाथ जबान से ही होते हैं. अब उसको भी टाला जाना चाहिए.

40 साल से ऊपर का मेरा संसद का अनुभव कभी-कभी मुझे बहुत पीड़ित कर देता है, दुखी कर देता है. हम किधर जा रहे हैं ? और जब मैं यह बात कह रहा हूं, तो खाली दिल्ली की संसद ही मेरे ध्यान में है, लखनऊ का विधानमंडल तो मेरे ध्यान में बिल्कुल नहीं है. यहां तो सारी मर्यादाएं टूट गई हैं. सारे मूल्य जैसे ताक पर रख दिए गए हैं. मैं किसी एक पार्टी को इसके लिए दोष नहीं देता, क्योंकि पार्टी समाज में से उत्पन्न हुई है और समाज के समर्थन से खड़ी है. निर्वाचित होकर आई है. लेकिन कुछ मूल्य ऐसे हैं, जिनके साथ समझौता नहीं होना चाहिए. सरकारें बदलेंगी. कोई सरकार स्थिर नहीं है. लेकिन संसद रहेगी, विधानमंडल रहेगा. और वह अगर रहेगा, तो उसे चलाना होगा, नियमों के अनुसार, निर्देशों के अनुसार, परंपरा के अनुसार, मर्यादा में रहकर, सीमाओं के भीतर. स्वतंत्रता और उच्छृंखलता में अंतर है. स्वतंत्रता में अपने को बांधने का भाव है. कोई दूसरा बांधे, विरोध करेंगे. इसीलिए पराधीनता के खिलाफ लड़े, लेकिन हम स्वेच्छा से ऐसे बंधन में बंध सकते हैं, जो हमारी आत्माभिव्यक्ति में सहायक हो. जो हमारे कल्याण का भी रास्ता बनाए और जो पूरे समाज को भी कल्याण के पथ पर ले जाए, प्रगति के पथ पर ले जाए.

मित्रों, भाषण देने की मेरी कोई इच्छा नहीं है. मैं तो न्यास के अध्यक्ष के नाते पाटिल साहब का बहुत आभारी हूं कि उन्होंने हमारा निमंत्रण स्वीकार किया. यह कार्यक्रम प्रेस में काफी चर्चा का विषय बन चुका है. अभी भी अटकलें लगाई जा रही हैं. तिवारी जी आए थे, तब भी मैंने कहा था, आज मैं फिर दोहराता हूं कि यह गैर राजनीतिक मंच है. मैं दल से जुड़ा हुआ हूं, मगर दल से जुड़ा हूं यह मेरे जीवन का, मेरे आचरण का एक पहलू है. और भी पहलू हैं और उनमें मैं दल की बात नहीं आने देता. और ’दल-दल’ की बात तो बिल्कुल नहीं आने देता. दल अपनी जगह है. राजनीति सर्वांग जीवन नहीं है, उसका एक पहलू है. और यही शिक्षा हमने पाई है, यही संस्कार हमने पाए हैं. लेकिन आज हर चीज़ को राजनीति के लक्ष्य से नत्थी कर दिया जाता है, बांध दिया जाता है. इसमें व्यक्ति का सही मूल्यांकन नहीं हो पाता और परिस्थिति का भी सच्चा आकलन नहीं हो पाता. इसी का कारण है कि राजनीति में अस्पृश्यता बहुत बढ़ गई है. एक-दूसरे को जैसे सहन नहीं कर सकते. एक-दूसरे के प्रति आदर से बोल नहीं सकते. इसीलिए ब्रिटेन की पार्लियामेंट का नियम है कि मेम्बर का नाम नहीं लिया जाएगा. ’आनरेबिल मेम्बर’ कहा जाएगा. और जहां से चुनकर आया है- ’ आनरेबिल मेम्बर फ्रॊम लखनऊ’ इतना काफी है. यहां असल में कहां से चुनकर आया है, इसकी तो गिनती ही नहीं होती. नाम, बिना किसी आदर के, बिना किसी सम्मान के भाव के लिए जाते हैं, गाली-गलौच होती है. बड़ा दुख होता है. मैंने पाटिल साहब से कहा कि आप चलिए, शायद आपकी उपस्थिति का, आपके आचरण का, आपके भाषण का लखनऊ पर भी कुछ असर होगा. लखनऊ के राजनेताओं पर असर होगा. और आज, उनकी उपस्थिति यहां लखनऊ में ’भाऊराव देवरस सेवा न्यास’ के अंतर्गत होने वाले कार्यक्रम में, जो देश की राजनीति के लिए शुभ संकेत है. यह इस बात का प्रमाण है. भले ही कठिनाइयां आ रही हों, मगर अंत में हम लोकतंत्र की मशाल को जलता हुआ रखने में सफल होंगे और यह मशाल निरंतर हमारा पथ-प्रदर्शन करती रहेगी.

मित्रों, यह व्याख्यानमाला आरंभ की गई है, आज इसका दूसरा पुष्प गूंथा जाना है. श्री शिवराज पाटिल जी ने हमारा आमंत्रण स्वीकार किया, हम उनके आभारी हैं. अब मैं उनको भाषण के लिए आमंत्रित कर रहा हूं. 
सवेरे कुछ लोग हवाई अड्डे पर गए थे और वे पाटिल साहब को पुष्पमाला अर्पित करने के अवसर से वंचित हो गए थे. अगर वे पुष्प अभी तक सूखे न हों और उनमें से कोई पुष्प लाए हों, तो मैं निमंत्रण देता हूं कि वे पाटिल साहब को यहां आकर सम्मान करें.
-डॉ. सौरभ मालवीय

(पुस्तक- 'राष्ट्रवादी पत्रकारिता के शिखर पुरुष अटल बिहारी वाजपेयी' से)

भारतीय राष्ट्र का मूल

   


राष्ट्रीय एकता को सुदृढ़ बनाने के लिए आवश्यक है कि हम राष्ट्र की स्पष्ट कल्पना लेकर चलें. राष्ट्र कुछ संप्रदायों अथवा जनसमूहों का समुच्चय मात्र नहीं, अपितु एक जीवमान इकाई है, जिसे जोड़-तोड़कर नहीं बनाया जा सकता.  इसका अपना व्यक्तित्व होता है, जो उसकी प्रकृति के आधार पर कालक्रम का परिणाम है. उसके घटकों में राष्ट्रीयता की यह अनुभूति, मातृभूमि के प्रति भक्ति, उसके जन के प्रति आत्मीयता और उसकी संस्कृति के प्रति गौरव के भाव में प्रकट होती है. इसी आधार पर अपने-पराये का, शत्रु-मित्र, अच्छे-बुरे और योग्य-अयोग्य का निर्णय होता है. जीवन की इन निष्ठाओं तथा मूल्यों के चारों ओर विकसित इतिहास, राष्ट्रीयता की भावना घनीभूत करता हुआ उसे बल प्रदान करता है. उसी से व्यक्ति को त्याग और समर्पण की, पराक्रम और पुरुषार्थ की, सेवा और बलिदान की प्रेरणा मिलती है.

भारत एक प्राचीन राष्ट्र है. स्वतंत्रता की प्राप्ति से, इसके चिरकालीन इतिहास में एक नया अध्याय का प्रारंभ हुआ. किसी नवीन राष्ट्र का जन्म नहीं. नया राष्ट्र बनाने की चर्चा का परिणाम जीवन-मूल्यों की अवहेलना और आत्म-विस्मृति में हुआ है. फलत: हमारे राष्ट्रीय मानस में एक गांठ पड़ गई है और द्वैत भाव की सृष्टि हुई है. घर और बाहर के राजनीतिक और सांस्कृतिक जीवन के अलग-अलग आदर्श बन गए हैं. भारत के ऋषि-महर्षियों , स्मृतिकारों, पुराण-निर्माताओं, साधु-संन्यासियों. कवि-कलाकारों, सम्राटों-सेनापतियों और संतों तथा सुधारकों ने जिस एकात्मक जीवन के ताने-बाने को बुना था, आज वह उपेक्षा तथा उपहास का विषय बनाया जा रहा है. जिन उपादानों ने हमें हजारों साल तक एक  बनाए रखा, जिनके कारण हम बाहरी आक्रमण और आंतरिक विघटन के बावजूद अपने अस्तित्व को कायम रख सके, उन्हें आज तिरस्कृत किया जा रहा है. यह एकता की प्राप्ति का नहीं, बची-खुची एकता को भी खतरे में डालने का मार्ग रहा है. आवश्यकता है कि हम राष्ट्र की प्राचीनता को मान्य करें और उसके सही स्वरूप को समझें.

भारतीय राष्ट्र का मूल स्वरूप राजनीतिक नहीं, सांस्कृतिक है. सांस्कृतिक एकता की अनुभूति ही राजनीतिक एकता के पक्ष की प्रेरक शक्ति रही है. राजनीतिक एकता के अभाव ने देश की सांस्कृतिक धारा को कभी खंडित नहीं होने दिया. जहां एक ओर हम भारत की संस्कृति से अभिन्न रूप से संबद्ध अनेक राजनीतिक इकाइयों के प्रति उदासीन तथा सहिष्णु रहे हैं, वहां दूसरी ओर भारतीय संस्कृति से भिन्न उसके विकृत अथवा विरोधी भाव पर आधारित, कोई भी राजनीतिक सत्ता हमें मान्य नहीं हुई. हम सदैव उसके विरुद्ध संघर्ष कर रहे हैं.

विविधता में एकता भारतीय संस्कृति की विशेषता रही है. हमने एकरूपता की नहीं, अपितु एकता की कामना की है. फलत: देश में अनेक उपासना पद्धतियों, पंथों, दर्शनों, जीवन-प्रणालियों, भाषाओं, साहित्यों और कलाओं का विकास हुआ, जो संपन्नता की द्योतक हैं. हमें उनके प्रति अपनत्व और गौरव का भाव लेकर चलना होगा. किंतु विविधता के नाम पर विभाजन को प्रोत्साहन देना भूल होगी. भारतीय संस्कृति कभी किसी एक उपासना पद्धति से बंधी नहीं रही और न उसका आधार प्रादेशिक ही रहा है. मजहब अथवा क्षेत्र के आधार पृथक संस्कृति की चर्चा तर्क विरुद्ध ही नहीं, भयावह भी है, क्योंकि वह राष्ट्रीय एकता की जड़ पर ही कुठाराघात करती है. 

क्षेत्र, प्रदेश, जाति, पंथ, भाषा, भूषा आदि के आधार पर भारतीय जन की पृथकता की कल्पना भ्रामक है. उनके आधार पर भारत में अनेक राष्ट्रों अथवा राष्ट्रीयताओं के अस्तित्व का विचार भी मूलत: अशुद्ध है. हम एक राज्य में रहने के कारण एक नहीं हैं, अपितु हम एक हैं, इसलिए भारत एक राष्ट्र है.

राष्ट्र के प्रति अनन्य निष्ठा ही राष्ट्रीयता का निकष होने के कारण भारत के सभी जनों को अपनी निष्ठाओं को इसके अधीन बनाना होगा. इसके लिए दोहरा प्रयत्न आवश्यक है. एक ओर जहां अपने प्रदेश, पंथ अथवा जाति के प्रति निष्ठा रखने वालों को राष्ट्रनिष्ठ बनाना होगा, वहां दूसरी ओर भारत से बाहर निष्ठा रखने वालों को फिर से, चाहे वे पाकिस्तानपरस्त हों, अथवा रूस और चीन के भक्त, उन्हें उससे विरत करना होगा.

उपासना मत और ईश्वर संबंधी विश्वास की स्वतंत्रता भारतीय संस्कृति की परंपरा रही है. भारतीय संविधान ने भी इसे स्वीकार किया है. किंतु मजहब के आधार पर किसी को ’अल्पमत’ अथवा ’बहुमत’ वाला मानना न तो राष्ट्रीय एकात्मकता के लिए हितावह है और न सत्यसंगत ही. मुसलमान अथवा ईसाई कहीं बाहर से नहीं आए. उनके पूर्वज हिंदू ही थे. मजहब बदलने से राष्ट्रीयता बदलती है और न संस्कृति में परिवर्तन होता है. मुसलमानों अथवा ईसाइयों को अल्पमत मानने का अर्थ होगा मजहब को राजनीतिक, आर्थिक, समाज-जीवन के सभी क्षेत्रों में विभाजक रखा स्वीकार करना. यह तो प्रच्छन्न रूप से द्विराष्ट्रवाद अथवा बहुराष्ट्रवाद को मान्यता देनी होगी.

सुखेद कहना पड़ता है कि भारतीय राष्ट्रवाद की साधना में मुस्लिम मतावलंबियों का व्यापक सहयोग नहीं मिल पाया. उन्होंने राजनीति और मजहब को एक मानकर ही अधिकांश प्रयत्न किए. परकीय सत्ता के साथ अपने को एकरूप करने के कारण मुस्लिम  समाज के जीवन में अनेक ऐसी विकृतियां आ गईं, जिनका इस्लाम के साथ कोई संबंध नहीं है. यहां के समाज से अपने-आपको पृथक सिद्ध करने की लालसा में धीरे-धीरे उन्होंने, उन सब प्रथाओं, रहन-सहन की पद्धतियों एवं रीति-नीतियों से अपने को अलग कर लिया, जो यहां के जन को इस भूमि से जोड़े हुए हैं.

इतना ही नहीं, उन्होंने राम और कृष्ण को अपना पूर्वज मानने से भी इंकार कर दिया. यहां के परंपरागत त्यौहारों से, जिनका संबंध किसी मजहब से न होकर यहां की मिट्टी और मौसम से है, अपने को दूर रखा. इस प्रसंग में पारसियों का उल्लेख करना आवश्यक है. अपने मजहब को सुरक्षित रखते हुए भी, उन्होंने न तो कभी भेदभाव की शिकायत की और न कभी संरक्षण ही मांगा है. अपनी योग्यता और समाजनिष्ठा के बल पर उन्होंने देश का सभी क्षेत्रों में नेतृत्व किया है. उनका उदाहरण अनुकरणीय है.
-डॉ. सौरभ मालवीय

(पुस्तक- 'राष्ट्रवादी पत्रकारिता के शिखर पुरुष अटल बिहारी वाजपेयी' से)

मेले ग्रामीण परंपरा के अंग हैं

   


श्री अटल बिहारी वाजपेयी ने 11 जनवरी, 1999 को स्वदेशी मेले का उदघाटन करते हुए मेलों की उपयोगिता पर प्रकाश डाला. उन्होंने कहा कि मुझे उदघाटन के लिए बुलाया गया है या समापन के लिए ? मेरे बोलने के बाद क्या कार्यक्रम समाप्त होने वाला है ? मैं आभारी हूं, मुझे स्वदेशी मेले में आमंत्रित किया गया. मेला शब्द मुझे प्रिय है. मेले में मिठास है, मेले में सुगंध है. एक शब्द अंग्रेजी का प्रयोग करते हुए मैं पूछूंगा एग्जीबिशन तो खुला प्रदर्शन है. उसके बारे में तो कहने की भी आवश्यकता नहीं पड़ती. लेकिन गांवों में जो मेले होते हैं, ग्रामीण परंपरा के अंग हैं. उनमें समाज के सभी वर्गों का और जीवन के सभी विभिन्न क्षेत्रों का बड़ा सरस रूप होता है. मेले में खरीद-बिक्री तो होनी ही है. लेकिन कथा-वार्ता भी होती है, खेल-तमाशों का आयोजन भी किया जाता है. पहलवानों के लिए दंगल की भी व्यवस्था होती है. हरेक मेले का अलग-अलग रूप होता है. मेला नदी के किनारे जलाशय के तट पर या किसी पूजा स्थल के आसपास आयोजित किया जाता है.

मैं समझता हूं कि स्वदेशी मेला भी इस ध्येय का पालक होगा. भारत माता को निरंतर सौभाग्य से मंडित करने के लिए हम लोग प्रयत्नशील हैं. भारत को सोने की चिड़िया कहा जाता था, संयोजकों ने जो दस्तावेज प्रकाशित किया है, उसमें इस बात का उल्लेख है. भारत फिर से सोने की चिड़िया बने, यह हमारी महत्वाकांक्षा है. मेले का आयोजन कर भारत के औद्योगिक क्षेत्र में अब तक जो उपलब्धियां हुई हैं, उनका और भारत की जो क्षमता है औद्योगिक क्षेत्र में उनका, प्रभावशाली प्रस्तुतिकरण करने का प्रयास किया गया है. हम सबकी इच्छा है कि भारत एक महान शक्तिशाली और समृद्ध राष्ट्र बने. इसके लिए स्वदेशी की भावना को निरंतर जागृत करना आवश्यक है.

स्वदेशी के आधार पर स्वावलंबी भारत बनाना, अपने पैरों पर खड़ा करना है. शक्ति हमें स्वयं प्रकट करनी होगी. समृद्धि भी अपने प्रयासों से लानी होगी. हम परावलंबी बनने की भूल नहीं कर सकते. हम परावलंबी होकर विकृत जीवन नहीं जी सकते. हमें अपने पैरों पर खड़ा होना है. हम अपने परिश्रम से, अपनी प्रतिभा से, अपने सहयोग से, अपनी आस्था से, राष्ट्रहित की निष्ठा से जिस शक्ति का अर्जन करेंगे, वह शक्ति टिकाऊ होगी. वही हमें शक्तिशाली बनाएगी. उधार की शक्ति से कोई शक्तिशाली नहीं होता. ये सदी समृद्धि की है. बाहर वाले हमें मदद दें. लेकिन जितना बड़ा महान कार्य हमारे सामने है, वह केवल बाहर की मदद से नहीं हो सकता. उसके लिए संसाधन जुटाने पड़ेंगे. इसके लिए परिश्रम भी बड़ा करना होगा. पारदर्शी प्रामाणिकता का परिचय देना होगा. 

हमारे यहां उद्योगों की अलग-अलग श्रेणियां हैं. मुझे बताया गया है कि मेले की विशेषता यह है कि इसमें सभी तरह के उद्योगों का प्रतिनिधित्व है. खासकर जो नॊन-कॊर्पोरेट सेक्टर है, उसको और अधिक सहायता की आवश्यकता है, प्रचार की आवश्यकता है. हमारे पास अच्छी सामग्री है. सेवाएं भी उपलब्ध हैं. लेकिन प्रचार के मैदान में हम मात खा गए हैं. इसका कोई उपाय निकालना पड़ेगा. हमारे छोटे और लघु उद्योगों के बारे में दुनिया कितना जानती है. वे सबसे अधिक रोजगार देते हैं, सबसे अधिक विदेशी मुद्रा कमाते हैं. लेकिन उनके सामने बाजार की समस्या है. इसलिए उन्हें संरक्षण देने का फैसला किया गया है. लेकिन उस संरक्षण को भी कुतरने की कोशिश होती रहती है. देश में एक ऐसी मानसिकता का विकास हुआ है और वह मानसिकता केवल आज की देन नहीं है, हमें वह उत्तराधिकार में मिली है, विरासत में मिली है. इस मानसिकता में केवल बड़े उद्योगों की प्रशंसा की जाती है और छोटे उद्योग उपेक्षित रह जाते हैं हम इस संस्कृति को बदलने का प्रयास कर रहे हैं. और अगर समय मिला, सहयोग मिला, तो हम इसे बदलकर दिखा देंगे. आज हम आपको आश्वासन देना चाहते हैं.

स्वदेशी एक साधना है. इस भावना को हमें बनाए रखना पड़ेगा. इसके लिए यह जरूरी है कि हम सब राष्ट्र का सही निर्माण करने का बीड़ा उठाएं. सचमुच में, पचास साल में जिन समस्याओं का समाधान हो जाना चाहिए था और वो समस्याएं पैदा ही नहीं होनी चाहिए थीं, गलत नीतियों के कारण आज पैदा हो गई हैं. हमारे पास लिखने के लिए साफ पट्टी नहीं है, ठीक स्लेट नहीं है, टेढ़ी-मेढ़ी इबारत से लिखी पट्टी हमें मिली है. अब हमें फिर से उसमें अक्षर लिखना है. सरकार की सीमाएं हैं. आर्थिक संकट भी है. वह संकट केवल भारत तक ही सीमित नहीं है, और देश भी उसकी चपेट में आ रहे हैं. सबको मिलकर यह सोचना पड़ेगा कि हमने किस तरह का प्रयास किया. हमें किस तरह से करना था. आर्थिक संकट, जिसके कारण आज देश संकट में है, एक के बाद एक पड़ते जा रहे हैं. हमें अनगिनत समस्याओं का समाधान करना पड़ रहा है. वे समस्याएं क्यों उत्पन्न हुईं ? बेरोजगारी बढ़ रही है, विषमता बढ़ रही है. और दूसरी ओर हमें मतभेदों को समाप्त करना है. सरकारी कारखाने बड़े उत्साह से चलाए गए थे. वे राष्ट्र की संपत्ति हैं. यह मानकर उन्हें प्रश्रय दिया गया, प्रोत्साहन दिया गया. आज उनमें से अनेक सरकारी फर्मों की हालत खराब है, बंद हो रहे हैं, या बंद होने की कगार पर हैं. यह स्थिति क्यों पैदा हुई ? बड़े उद्योगों की ओर ध्यान दिया हमने. लेकिन फिर भी बड़े उद्योगों को राष्ट्र के निर्माण में जैसा योगदान देना चाहिए था, नहीं दे पाए. इस पर गहराई से विचार करना होगा.

मैं इस सुझाव का स्वागत करता हूं कि प्राइवेट सेक्टर के अलावा भी जिन क्षेत्रों में आर्थिक गतिविधियां चलती हैं, जिनका योगदान है, उत्पादन में, सेवा में, उनसे सरकार का वार्तालाप होना चाहिए. विचार-विनिमय होना चाहिए. यह भ्रम पैदा किया गया है कि सरकार विदेशी दबाव में आकर काम कर रही है. इस आरोप में कोई सच्चाई नहीं है. हम किसी दबाव में आने वाले नहीं हैं. भारत अनेक दबाव के सामने दृढ़ रहने की शक्ति रखता है. अगर हम दबाव में होते, तो पोखरण का परमाणु परीक्षण कभी नहीं करते. हमें पता था कि आर्थिक संकट का सामना करना होगा. हम जानते थे कि प्रतिबंध लगेंगे. हम जानते थे कि बाहर से पूंजी लेने का मार्ग कठिन होगा. लेकिन हमने राष्ट्रीय सुरक्षा को सर्वोपरि समझा और सब दबावों का सामना करते हुए भी सुरक्षा के प्रति अपने कर्तव्य का पालन किया. आर्थिक क्षेत्र में हम किसी दबाव में आने वाले नहीं हैं. दबाव डाले जाते हैं, दबाव डाले जाएंगे.

दुनिया की नजर हमारे बड़े बाजार पर है. इतना बड़ा देश. इतना बड़ा लोकतंत्र, चलो चलते हैं, माल बेचें. उनकी यह सहज स्वाभाविक लालसा समझ में आ सकती है. लेकिन हमें तो अपने हितों का रक्षण करना पड़ेगा. कोई भी ऐसी नीति बनाई जाएगी, कोई भी कदम उठाए जाएंगे, वे राष्ट्र की कसौटी पर खरे उतरने के बाद ही उठाए जाएंगे. इसमें सबके विचारों का आदान-प्रदान होते रहना चाहिए, यह मैं मानता हूं. इसमें अगर कोई कमी रह गई, तो उसे ठीक किया जाएगा. लेकिन अब इस भ्रामक प्रचार में न आएं. क्या इस क्षेत्र में सरकार जो कदम उठाती है, वो किसी के दबाव में आकर उठाती है ? नीतियों के बारे मे प्रामाणिक मतभेद हो सकता है. प्रामाणिक मतभेद के लिए हमेशा गुंजाइश रहती है. लेकिन किसी की प्रामाणिकता पर संदेह नहीं किया जाना चाहिए. भारत को खरीदने वाला कोई माई का लाल पैदा नहीं हुआ है. और भारत को बेचने वाला कोई कपूत भी भारत माता की कोख से कभी पैदा नहीं होगा. कौन इस महान देश को खरीद सकता है ? यह बहुत प्रचार किया जा रहा है कि ईस्ट इंडिया कंपनी के दिन आने वाले हैं. कोई सच्चाई नहीं है इसमें. ईस्ट इंडिया कंपनी के दिन आएं, इसका प्रश्न ही पैदा नहीं होता. उस समय तराजू की डंडी, राजदंड में बदल गई, तब देश बिखरा हुआ था, बंटा हुआ था. आज देश एक है. सौ करोड़ की जनसंख्या एक झंडे के नीचे खड़ी है. चुनौतियों का जवाब देने के लिए तैयार है.

आज हम अनाज के क्षेत्र में आत्मनिर्भर हैं. कुछ फसलें ऐसी हैं, जिनके साथ संकट पैदा हो जाता है. कभी मौसम साथ नहीं देता है, तो प्यास मुद्दा बन जाता है. पहले प्याज इसलिए संकट पैदा कर रहा था कि उसका दाम ज्यादा था, आजकल प्याज कुछ क्षेत्रों में इसलिए संकट पैदा कर रहा है कि उसका दाम गिर रहा है. प्याज कम हो तो संकट, प्याज ज्यादा हो तो संकट. लेकिन आत्मनिर्भरता की ओर हम बढ़ रहे हैं. और भी बढ़ेंगे. भारत का विकास स्वगुणों से होना चाहिए. विकासशील देश भारत की ओर देख रहे हैं. उनके प्रति भी हमारा कुछ कर्तव्य है. हम पड़ौसियों के साथ अच्छे संबंध स्थापित करना चाहते हैं. इसीलिए आर्थिक आजादी प्राप्त करना चाहते हैं. आर्थिक सहयोग बढ़ाना चाहते हैं. क्योंकि इस देश की अर्थव्यवस्था अगर ठीक हो जाए, तो अनेक समस्याएं हल हो सकती हैं. इस कारण सभी को सहयोग देना चाहिए. इस कारण सभी को सहायता देनी चाहिए.

मैं स्वदेशी मंच के कार्यक्रम में जा रहा हूं. इस बात को लेकर काफी हलचल है. पता नहीं क्यों हलचल है. स्वदेशी मंच जो चला रहे हैं, वे भी मेरे मित्र हैं. मैं सरकार में हूं, कोई फर्क नहीं पड़ता, स्वदेशी मंच अपना काम करे. हमें सलाह देता रहे. वह सलाह हमें जंची, तो अपनाएंगे. नहीं जंची, तो माफी मांग लेंगे कि क्षमा कीजिए, हम आपके विचार से सहमत नहीं हैं.  विचारों में विभिन्नता है. लेकिन लक्ष्य एक है. और वह एक लक्ष्य है महान शक्तिशाली, समुद्धशाली भारत की रचना. हमारे आदर्श समान हैं. उन आदर्शों से प्रेरणा लेते हुए और भारत के प्रति अपने सपनों को साकार करने का संकल्प लेते हुए हम आगे बढ़ें. स्वदेशी मेला उस यात्रा में सहायक बने, यही कामना है.
-डॉ. सौरभ मालवीय

(पुस्तक- 'राष्ट्रवादी पत्रकारिता के शिखर पुरुष अटल बिहारी वाजपेयी' से)

संगीत में बड़ी शक्ति है

   


महाराष्ट्र के पुणे में 7 जनवरी, 2003 को सवाई गंधर्व स्मारक के उदघाटन समारोह को संबोधित करते हुए श्री अटल बिहारी वाजपेयी ने संगीत के महत्व और इसकी परंपरा पर प्रकाश डाला. अपने संबोधन में उन्होंने कहा कि गत सितंबर माह में जब मुझे डॊक्टर जोशी ने- पंडित भीमसेन जोशी ने यहां आने का निमंत्रण दिया, तो उसमें, दिसंबर की तारीख दी हुई थी. मैंने कहा कि आपको भरोसा है कि मैं दिसंबर तक प्रधानमंत्री रहने वाला हूं, तो मैं निमंत्रण जरूर स्वीकार करूंगा, लेकिन अगर मान लीजिए मैं नहीं रहा, भारतीय राजनीति का कोई भरोसा नहीं- चलायमान है, दोलायमान हो सकती है, क्यों विलासराव जी ? तो कठिनाई हो सकती है. अगर मैं प्रधानमंत्री न रहा, क्या तब भी आप मुझे बुलाएंगे ? ऐसे प्रसंगों की मुझे याद है कि दिए गए निमंत्रण वापस ले लिए जाते हैं. पंडित भीमसेन जोशी ने कहा, "अगर आप प्रधानमंत्री न रहे, तो भी मैं आपको बुलाऊंगा." तो हो सकता है कि उनके आशीर्वाद के कारण ही मैं प्रधानमंत्री बना हुआ हूं. पर मैंने सोचा कि शायद मुझे बुलाने का कारण ये भी है कि मैं ग्वालियर का हूं. ग्वालियर संगीत का गढ़ रहा है. भीमसेन जोशी जी ने भी ग्वालियर से शिक्षा प्राप्त की. किन परिस्थितियों में की थी, वह वर्णन रोमांचक है. लेकिन संगीत की साधना करनी थी, इसलिए कष्ट झेल कर उन्होंने संगीत साधना को पूरा किया. किराना घराने का उल्लेख होता है. ग्वालियर उसकी नींव जाना जाता है. मैंने सोचा कि शायद मैंने ग्वालियर में जन्म लिया है, शायद इसलिए पंडित जी मुझे बुला रहे हैं. ग्वालियर वाले ऐसा समझते हैं कि अगर बच्चा भी पैदा होता है, तो वह भी रोना, गाने से ही शुरू करता है.

पचास साल की संगीत साधना की यह परंपरा है. महोत्सव की आधी शती. अगर मैं गलत नहीं हूं, तो सवाई गंधर्व महोत्सव का आयोजन 1953 में शुरू हुआ था.  यह एक महान शिष्य द्वारा एक महान गुरु का स्मरण है. गुरु-शिष्य परंपरा हमारे संगीत का आधार है. क्या गुरुकुल परंपरा के अनुसार संगीत चलता है ? गुरु-शिष्य परंपरा के अनुसार भीमसेन जी जोशी लगातार इस महोत्सव का आयोजन करते रहे, और आज जब ये भव्य भवन बनकर तैयार है, तो मैं कहना चाहूंगा, आज मानो शिष्य ने अपने गुरु को गुरु दक्षिणा दे दी है इस भवन को बनाकर.  संगीत में बड़ी शक्ति है. जोड़ने की शक्ति. भाषा भेद भी बीच में नहीं आता. संगीत पंथ निरपेक्ष है. देश के सभी क्षेत्रों में इसका प्रभाव है और उसमें सदैव कुछ होने की क्षमता है. पंडित भीमसेन जी जोशी जैसे संगीतज्ञ आज हमारे बीच में हैं और अपनी परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं, ये बड़ी प्रसन्नता की बात है. मैं यही सोचता रहा हूं कि कार्यक्रम दोपहर में क्यों आयोजित किया गया ? दोपहर का संबंध संगीत से कम है. संगीत के लिए तो चांदनी चाहिए. लेकिन शायद कोई मजबूरी रही होगी और मुझे डर है कि मेरी वजह से यह न हो रहा हो. आते-जाते जब मैं देखता हूं, सड़क पर लोगों को चलने से रोका जाता है, तो मुझे अच्छा नहीं लगता. लेकिन आज शायद इसीलिए इस कार्यक्रम को दोपहर में रखा गया है. भारतीय संगीत को नई चुनौती से डरना नहीं है. देश के जीवन का चक्र बार-बार बदलता रहता है. और फिर एक पहलू को देखकर ऐसा लगता है, जो कुछ हुआ या होने वाला है, वह फिर बड़ी शक्ति के साथ उभरकर आता है. तो यह प्राणवान होता है, सभी को खुशी होती है. और साधना का परिणाम मिलता है.  उसके मूल में अर्थ की भावना नहीं होती. भावना होती है, तो धर्म की. जो स्थायी होता है. डॊक्टर पंडित जोशी जी हमारे बीच में हैं, हम उनका अभिनंदन करते हैं. उन्होंने शिष्य परंपरा का पालन किया है,  हम उनके आभारी हैं. उन्होंने मुझे यहां आने का अवसर दिया, इसके लिए मैं उन्हें हृदय से धन्यवाद देता हूं. मैं चाहता हूं कि उनका आशीर्वाद मुझे आगे भी प्राप्त होता रहे. और हम शास्त्रीय संगीत के रास्ते पर प्रेम के साथ, स्नेह के साथ, आगे बढ़ते रहें.
-डॉ. सौरभ मालवीय

(पुस्तक- 'राष्ट्रवादी पत्रकारिता के शिखर पुरुष अटल बिहारी वाजपेयी' से)

विजय पर्व

   


विजय का पर्व ! जीवन-मरण के संग्राम की काली घड़ियों में क्षणिक पराजय के छोटे-छोटे क्षण, अतीत के गौरव की स्वर्णिम गाथाओं के पुण्य स्मरण मात्र से प्रकाशित होकर विजयोन्मुख भविष्य का पथ प्रशस्त करते हैं. अमावस के अभेद्य अंधकार का अंत:करण पूर्णिमा की उज्ज्वलता का स्मरण कर थर्रा उठता है.

सरिता की मंझधार में अपराजित पौरुष की संपूर्ण उमंगों के साथ, जीवन की उत्ताल तरंगों से हंस-हंसकर क्रीड़ा करने वाले नैराश्य के भीषण भंवर को कौतुक के साथ आलिंगन आनंद देता है. पर्वतप्राय लहरावलियां उसे भयभीत नहीं कर सकतीं, उसे चिंता क्या है ? कुछ क्षण पूर्व ही तो वह स्वेच्छा से कूल-कछार छोड़कर आया है. उसे भय क्या है? कुछ क्षण पश्चात ही तो वह संघर्ष की सरिता को पार कर, समृद्ध दृष्टि-पथ पर फैले हुए विस्तृत प्रदेश के विशाल वक्षस्थल पर वैभव के अमिट चरण-चिह्न अंकित करेगा.

हृदय-मंदिर में ध्येय-देवता की प्राण-प्रतिष्ठा करके, श्रद्धा के प्याले में विश्वास की वर्तिका बालते हुए शताब्दियों से संजोये स्वप्नों को साकार करने की दुर्दम्य आकांक्षा लेकर चलने वाले ही पराजय के कालिया नाग को वश में कर, विजय की वीणा से स्वधर्म और स्वराज्य के स्वर्गिक संगीत को गुंजरित कर, जन-जन के मन को झंकृत करने में समर्थ हो सकते हैं. बाधाओं के विन्ध्याचल ऐसे अगस्त्य के चरणों में शीश नवाकर साष्टांग प्रणिपात करते रहते हैं. भावी संतति उनके मार्ग का अनुसरण करती है. उनकी विजय के दिवस राष्ट्र के लिए पर्व बन जाते हैं.

विजयादशमी हमारे राष्ट्र की अगणित महान विजयों का पर्व है. हमारा राष्ट्र-जीवन केवल दो हजार वर्ष प्राचीन नहीं है. अनादिकाल से, असंख्य युगों के राष्ट्र-जीवन में हमने दो-चार-दस नहीं, असंख्य बार अराष्ट्रीय शक्तियों का मानमर्दन कर, विजयलक्ष्मी का वरण किया है. सृष्टि के प्रारंभ से लेकर आज तक धर्म के संगर में सतत रत रहकर हमने राष्ट्र-जीवन के उज्ज्वल इतिहास में विजय के अनेक कालखंड निर्माण किए हैं. विजयादशमी हमारी संपूर्ण विजयों का दिन है, अराष्ट्रीय शक्तियों के पराभव का दिन है. 

निराशा की अमावस की गहन निशा के अंधकार में हम अपना मस्तक आत्म-गौरव के साथ तनिक ऊंचा उठाकर देखें. विश्व के गगन-मंडल पर हमारी कलित कीर्ति के असंख्य दीपक जल रहे हैं. संस्कृति के गौरवपूर्ण इतिहास के प्रत्येक पृष्ठ पर- असंख्य युगों के वज्र कठोर हृदय पर हमारी विजय के स्तंभ अंकित हैं.  अनंत भूतकाल हमारी दिव्य विभा के आलोकित है. भावी की अगणित घड़ियां हमारे विजमालिका की लड़ियां बनने की प्रतीक्षा में मौन खड़ी हैं. 

हमारी विश्वविदित विजयों का इतिहास अधर्म पर धर्म की जय-गाथाओं से बना है. हमारे राष्ट्र-जीवन की कहानी विशुद्ध राष्ट्रीयता की विजय की कहानी है, प्रतिक्रियात्मक शक्तियों के पराभव की कहानी है, धर्म के सम्मुख अधर्म के आत्मसमर्पण की कहानी है.

वह सृष्टि का प्रारंभ था. साम गान के स्वर्गिक स्वर चराचर मात्र को व्याप्त कर, संसुति में सुखद शांति का संचार कर रहे थे. सर्वत्र आनंद का पारावार उमड़ रहा था. समग्र पृथ्वी पर हमारे प्रभाव की रश्मियां बिखरी हुई थीं. धर्म का डंका बज रहा था.

किंतु पूर्णिमा को. षोडश कलाधारी को, ग्रसने के लिए राहु सदैव तत्पर रहता है. धर्म के बाल-रवि को सदा-सर्वदा के लिए आच्छादित करने की विषाक्त भावना भरकर अधर्म के विषधर से काले-काले मेघ सदलबल घिर-घिरकर आए, अत्याचारों की झड़ी लग गई. अन्याओं ने सर्वत्र सरोष सर उठा लिया. धर्म की श्वास रुद्ध होने लगी. महिषासुर के आतंक से मेदिनी थर्रा उठी. 

किंतु अधर्म के मेघ टिक नहीं सके, प्रबल समीर के सबल थपेड़े खाकर वे छिन्न-भिन्न हो गए. अराष्ट्रीय शक्तियों को विनष्ट करने के लिए राष्ट्र की सर्वशक्तियों का केंद्रीयकरण किया गया. ब्रह्मा की सृजन, विष्णु की सिंचन और शंकर की संहार शक्ति ने सम्मिलित होकर देवों के शरीरों से प्रकटित पुण्य प्रकोप द्वारा आदिशक्ति का निर्माण किया. समाज में प्राप्त समस्त शस्त्रों से सज्जित होकर, राष्ट्र-शक्ति ने महिषासुर को अराष्ट्रीय शक्ति को, युद्ध के लिए आह्वान किया. धर्म और अधर्म के बीच महाभयंकर युद्ध ठन गया. आश्विन शुक्ल प्रतिपदा से दशमी-पर्यंत वह संग्राम चला. अराष्ट्रीय शक्ति की पराजय हुई. उसके नेता महिषासुर का मान-मर्दन कर दिया गया. राष्ट्र की विजय के उपलक्ष्य में हम नवरात्र का उत्सव मनाते हैं. सहस्रों वर्ष पूर्व की विजय-स्मृति को हमने अंत:करण में संजोकर सुरक्षित रखा है. रूठी हुई विजय को लौटा लाने का हमारा यह दृढ़ निश्चय है.

विजय-पर्व के दो भाग हैं-शस्त्र-पूजन और सीमोल्लंघन. शक्ति की पूजा करते हुए अजेय सामर्थ्य संचित करने का मंगल प्रयास प्राचीन काल से होता आया है. जिन शस्त्रों की सहायता से धर्म की संस्थापना एवं अधर्म का नाश किया जाता है, उनका पूजन वीरोचित है, धार्मिक है, राष्ट्रीय पर्व की स्फूर्तिदायिनी विधि है. शक्ति-पूजन के पश्चात अस्त्र-शस्त्र अर्जित सैन्य सजाकर स्वराज की सीमाओं को समग्र भूमंडल पर चतुर्दिक विस्तृत करने का पुनीत प्रयत्न होता था. हमारी विराट वाहनियां विजय की लालसा से भरकर, धर्म की ध्वजाएं फहरातीं, चतुरंगिणियों में परिणित होकर सीमोल्लंघन के लिए प्रस्थान किया करती थीं. 

स्वदेश की रक्षा के निमित्त, संभावित आक्रमण का प्रतिकार करने के शत्रु के दुर्भावों के कार्यरूप में प्रकट होकर, युद्ध के कराल मेघ बन शस्य-श्यामला भूमि पर प्रलय का तांडव नृत्य करने के पूर्व ही समाप्त करने के लिए सीमा लांघकर सांप को उसकी बांबी में ही कुचल डालने की दृष्टि से इस प्रथा का पालन होता था. सीमोल्लंघन के मूल में साम्राज्य की भावना को प्रेश्र्य देकर समस्त संसार में शुद्ध सांस्कृतिक राज्य की स्थापना के ध्येय को सम्मुख रखा गया है. धर्म की नींव पर न्याय-सम्मत दिव्य तंत्र की रचना द्वारा आध्यात्मिक रूप से स्वतंत्र होने का मंगल मंत्र शताब्दियों पूर्व भारत ने विश्व के सम्मुख समुपस्थित किया था. स्वार्थ साधन को तिलांजलि देकर समाज के सामूहिक कल्याण की भावना से प्रेरित होकर किए गए सैन्य-संचालनों में प्राप्त विजय के लाभ का वितरण भी सामूहिक हुआ करता था. समानता और समाजवाद की बड़ी-बड़ी बातें करके गाल बजाने वाले हमारे व्यावहारिक समाजवाद का, आंखें खोलकर अवलोकन करें. विजय में हस्तगत किए गए संपूर्ण सुवर्ण का वितरण सर्व स्वजन-साधारण में करना विजयादशमी की महत्वपूर्ण धार्मिक विधि है.

समस्त संसार को जीतने के पश्चात विश्वजीत यज्ञ में सर्वस्व का दान करने वाले राजा रघु की कथा सर्वविदित है. रघु के राघव द्वारा अराष्ट्रीय शक्तियों को समूल नष्ट करने के लिए, समाज की अपहृत लजा के पुन: सम्मान प्राप्त्यर्थ लंका पर की गई चढ़ाई का वृतांत सर्वज्ञात है. आज ही के दिन, अराष्ट्रीय तत्वों के नेता, उपद्रव शक्ति का उपयोग कर आतंक प्रसारित करने की नीति के प्रणेता, जगत जननी के अपहरणकर्ता का राष्ट्र पुरुष द्वारा शिरच्छेद हुआ था. राष्ट्र शक्त्ति को अपमानित करने का मूल्य रावण को अपने दस शीशों के रूप में सब्याज चुकाना पड़ा. दशानन का वध हुआ, इसलिए दशहरा हुआ. असुरों की लंका, भारत के पावन चरणों में भक्तिभाव से भरकर कुंद कली-सी सुशोभित हुई. धर्म की स्थापना हुई, अधर्म का नाश हुआ. विजय का आनंद स्वजनों में सुवर्ण वितरित कर मनाया गया.

विजयादशमी राष्ट्रीय विजय का त्यौहार है. आज के दिन ही पांडव अपना अज्ञातवास समाप्त कर कर्मक्षेत्र में पुन: अवतरित हुए थे. वही कर्मक्षेत्र भविष्य में धर्मक्षेत्र में परिवर्तित हो गया. आज के दिन ही धर्मचक्र प्रवर्तक ने इस पुण्य भू पर धार्मिक साम्राज्य की संस्थापना के लिए जन्म लिया था. आज के शुभ मुहुर्त पर ही हिंदू पदपादशाही के प्रस्थापक छत्रपति शिवाजी की विजयिनी सेनाएं यवनों के असुरी राज्य की अंत्येष्टि करने के लिए ’भवनी’ का शुभाशीर्वाद ग्रहण कर प्रस्थान किया करती थीं. आज की शुभ घड़ी पर ही अरावली के शैल शिखरों पर दास्य के अभेद्य अंधकार को भेदते हुए, स्वराज्य के दीपक से, स्वधर्म के प्रकाश की दिव्य रश्मियां वितरित करने का पवित्र कार्य महाराणा के मतवाले अनुनायी किया करते थे.

आज के महामंगल पावन पुण्य क्षणों में ही महावीर की आत्मविस्मृति से भरे हुए राष्ट्र के पुनरुज्जीवन का दैवी कार्य पूजनीय डॊ. हेडगेवार द्वारा प्रारंभ हुआ था. सलस सुषुप्ति को जीवन जागृति में, ग्लानिजनक आत्मविस्मृति को दिव्य आत्म साक्षात्कार में और दयनीय शरणगति को प्रचंड आत्माभिमान में परिवर्तित करने की महत्ती आकांक्षा को कार्यरूप में परिणत करने के लिए राष्ट्र संघ का निर्माण किया गया. वर्षों से दैर्बल्य, कायरता, शैथिलता, निष्क्रियता और व्यामोह से समाज को सर्वदा के लिए मुक्त कर संगठन और शक्ति पूजन द्वारा राष्ट्र सांस्कृतिक पुनरुज्जीवन का व्यवस्थित प्रयत्न करते हुए स्वधर्म के अधिष्ठान पर, स्वराज्य की सीमाओं के विपुल विस्तार का कार्य अहर्निश हो रहा है. यह पावन प्रयास विजय के पर्व से प्रारंभ हुआ है, विजय की प्राप्ति में ही प्रयत्न की पूर्णता सन्निहित है.

आज अहिंसा के आवरण में नपुंसकता प्रश्रय पा रही है.  सीमोल्लंघन के स्थान पर स्वदेश की सीमाएं छोटी हो रही हैं. महिषासुर का आतंक बढ़ गया है. देश की देहली पर खड़ा शत्रु हमारे पुरुषत्व को चुनौती दे रहा है. राष्ट्र की समस्त शक्तियों का एकत्रीकरण ही असुर के अन्याय को समाप्त कर धर्म की संस्थापना कर सकता है.
-डॉ. सौरभ मालवीय

(पुस्तक- 'राष्ट्रवादी पत्रकारिता के शिखर पुरुष अटल बिहारी वाजपेयी' से)

Saturday, July 11, 2026

आज भोपाल में

 


विश्व रंग मंच में डिजिटल मीडिया और भारतीय ज्ञान परम्परा पर मंथन







रबीन्द्रनाथ टैगोर विश्वविद्यालय, भोपाल में 9 से 11 जुलाई 2026 तक आयोजित विश्व रंग मंच के अंतर्गत हिन्दी पत्रकारिता विषयक तीन दिवसीय कार्यक्रम सफलतापूर्वक सम्पन्न हुआ। इस आयोजन में देशभर से आए पत्रकारों, शिक्षाविदों, साहित्यकारों एवं शोधार्थियों ने हिन्दी पत्रकारिता की दो शताब्दियों की गौरवशाली यात्रा, वर्तमान चुनौतियों तथा भविष्य की संभावनाओं पर व्यापक विचार-विमर्श किया।

कार्यक्रम के समापन सत्र में डॉ. सौरभ मालवीय ने "डिजिटल मीडिया और भारतीय ज्ञान परम्परा" विषय पर वक्ता के रूप में अपने विचार व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि भारतीय ज्ञान परम्परा के मूल्यों को डिजिटल मीडिया के माध्यम से वैश्विक स्तर तक प्रभावी ढंग से पहुँचाया जा सकता है। उन्होंने तथ्यपरक, मूल्यनिष्ठ और समाजोन्मुख डिजिटल पत्रकारिता की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा कि तकनीक तभी सार्थक है, जब वह सत्य, संवेदना और सामाजिक उत्तरदायित्व के साथ जुड़ी हो।

इस सत्र की अध्यक्षता वरिष्ठ पत्रकार राजेश बादल ने की। उन्होंने पत्रकारिता को लोकतंत्र का सशक्त आधार बताते हुए बदलते मीडिया परिदृश्य में हिन्दी पत्रकारिता की भूमिका पर प्रकाश डाला। जयदीप करणीक अमर उजाला डिजिटल के संपादक, ने भी अपने विचार रखते हुए डिजिटल युग में विश्वसनीय पत्रकारिता, तथ्य-जांच और नई मीडिया तकनीकों के महत्व पर विस्तार से चर्चा की।

विश्व रंग, रबीन्द्रनाथ टैगोर विश्वविद्यालय की एक प्रमुख सांस्कृतिक एवं बौद्धिक पहल है, जो साहित्य, कला, संस्कृति, शिक्षा और मीडिया के विविध आयामों पर राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर संवाद का प्रभावी मंच प्रदान करती है।

समापन सत्र में वक्ताओं ने हिन्दी पत्रकारिता को नई तकनीकों के साथ जोड़ते हुए उसकी विश्वसनीयता, जनपक्षधरता और सामाजिक उत्तरदायित्व को और अधिक सुदृढ़ बनाने का आह्वान किया।

इस अवसर पर श्री संतोष चौबे का सान्निध्य मिला।

लोकतंत्र का ध्वजवाहक है भारत

    भाऊराव देवरस सेवा न्यास द्वारा 19 मई, 1995 को उत्तर प्रदेश के लखनऊ में आयोजित समारोह को अध्यक्ष के रूप में संबोधित करते हुए श्री अटल बिह...