आज का दिन शुभ रहा।
लखनऊ में तीन सुन्दर मंदिरों में जाने का अवसर मिला- हनुमत धाम, हनुमान सेतु और लखनऊ विश्वविद्यालय।
लखनऊ विश्वविद्यालय में अपनी पत्रकारिता की दुनिया के पहले गुरु, विभागाध्यक्ष डॉ. सौरभ मालवीय सर से मिलने का मौका बना। बैचलर्स की पढ़ाई पूरी होने के इतने लंबे समय बाद यह पहली मुलाकात थी।
बातों-बातों में सर ने याद दिलाया कि समय का चक्र कैसे घूमता है। जीवन हमें कई बार उन्हीं लोगों और उन्हीं परिस्थितियों के सामने फिर से लाकर खड़ा कर देता है, बस किरदार और समय बदल जाते हैं।
सर के मार्गदर्शन में नोएडा कैंपस से पत्रकारिता की पढ़ाई पूरी की। फिर सर भोपाल चले गए। कुछ समय बाद मेरा सफर भी भोपाल तक पहुंचा। अब नियति दोनों को लखनऊ ले आई है।
सर ने अपनी सुंदर कृति 'भारतीय पत्रकारिता के स्वर्णिम हस्ताक्षर' भेंट की। यह पुस्तक मेरे लिए गुरु के स्नेह और आशीर्वाद का प्रतीक है।
अब लखनऊ में समय-समय पर सर का सानिध्य और मार्गदर्शन मिलता रहेगा। गुरु का साथ जीवन की सबसे बड़ी पूंजी होता है।






































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