Sourabh Malviya डॉ.सौरभ मालवीय
विचारों की धरा पर शब्दों की अभिव्यक्ति...
Saturday, July 18, 2026
Friday, July 17, 2026
यह लोकतंत्र का युग है
नई दिल्ली में 17 अगस्त, 1994 को श्री अटल बिहारी वाजपेयी को सर्वश्रेष्ठ सांसद के सम्मान से सम्मानित गया. इस अवसर पर उन्होंने कहा कि मेरी समझ में नहीं आता कि मैं क्या कहूं. प्रसंग ही ऐसा है. कुछ कहना भी मुश्किल है, लेकिन बिना कहे रहना भी मुश्किल है. औरों के सम्मान समारोहों में बोलना सरल है, अपने कार्यक्रम में शब्दों को ढूंढना भी कठिन है. मैं आभारी हूं उप राष्ट्रपति महोदय आपका, प्रधानमंत्री जी का, लोकसभा अध्यक्ष का, निर्णायकों का, पंडित गोविंद वल्लभ पंत समारोह ट्रस्ट का, जिन्होंने मुझे इस सम्मान के लिए चुना है.
मैं अपनी सीमाओं से परिचित हूं. मुझे अपनी कमियों का अहसास है. निर्णायकों ने अवश्य ही मेरी न्यूनताओं को नजरअंदाज करके मुझे निर्वाचित किया है. सदभाव में अभाव दिखाई नहीं देता है. यह देश बड़ा अदभुत है, बड़ा अनूठा है. किसी भी पत्थर को सिंदूर लगाकर अभिवादन किया जा सकता है, अभिनंदन किया जा सकता है.
गत वर्ष यह सम्मान मेरे मित्र वरिष्ठ सांसद कामरेड इंद्रजीत जी गुप्त को दिया गया था. वे सब दृष्टियों से सम्मान के अधिकारी थे. मेरे बारे में यह बात नहीं कही जा सकती. अब उनके बाद मुझे सम्मान दिया जा रहा है. मुझे डर है कि कोई यह न समझे कि मैं उनके पीछे पड़ गया हूं.
स्वनामधन्य पंडित गोविंद वल्लभ पंत को मैंने निकट से देखा था. उनके संपर्क में आने का मुझे सौभाग्य मिला था, पहले लखनऊ में, फिर दिल्ली में. जब वे आधुनिक उत्तर प्रदेश के शिल्प का गठन कर रहे थे, तो मैं उनके शब्द-चित्रों का गठन किया करता था. उनका जैसा व्यक्तित्व था, वैसा ही कीर्तिमान स्थापित करने वाला कर्तृत्व था. उनका प्रकांड पांडित्य, उनकी वाग्मयी संसदपटुता, जिन गुणों का उल्लेख अध्यक्ष महोदय ने किया, व्यक्ति और घटना का सही मूल्यांकन करने की उनकी क्षमता, पैनी और दूर-दृष्टि परस्पर विरोधी विचारों में समन्वय, सामंजस्य स्थापित करने की वृत्ति, स्वाधीनता के समर में और पुनर्निमाण के यज्ञ में ’उनकी भूमिका सदैव स्मरण की जाएगी. उनके नाम से जुड़े हुए इस पुरस्कार को पाकर मैं अपने को गौरान्वित समझता हूं.
जब पंत जी केंद्र में आए, मैं संसद का सदस्य था, कभी राज्यसभा में और कभी लोकसभा में. वह काल बड़ा कठिन काल था, जब राज्यों के पुनर्गठन की विस्फोटक स्थिति थी, भाषा का विवाद खड़ा हो गया था. लेकिन पंत जी ने अपनी कुशलता, चतुरता और नीतिमत्ता से समस्याओं का समाधान किया. अगर मैं गलत नहीं हूं, तो जम्मू-कश्मीर के प्रश्न पर लोगों की राय लेने का प्रस्ताव रखने के कारण, हम जिस भंवर में फंस गए थे, उस भंवर में से अगर किसी ने दृढ़ता के साथ भारत को निकाला तो पंडित गोविंद वल्लभ पंत ने निकाला. उन्होंने स्पष्ट शब्दों में घोषणा की कि कश्मीर की जनता की राय ली जा चुकी है. उसकी जनता ने भारत में मिलने का फैसला किया है. इसलिए फिर से जनमत संग्रह की बात ही नहीं उठती है. पाकिस्तान ने प्रस्ताव नहीं माने और वक्त पाकिस्तान के लिए रुका नहीं रहेगा, कालचक्र थमा नहीं रहेगा.
जब मैं पहली बार 1957 में लोकसभा सदस्य बना, तो उस समय पंडित जवाहरलाल नेहरू प्रधानमंत्री थे. वे सदन के नेता भी थे. नियमित रूप से बैठकों में भाग लेते, उपस्थित रहते, चर्चा में योगदान देते, आवश्यकता होने पर हस्तक्षेप करते, प्रतिपक्ष का ध्यान रखते. स्पीकर को पूरा आदर करते. उनकी उपस्थिति मात्र से सदन की गरिमा बढ़ती थी. सब लोग रचनात्मक भूमिका निभाने के लिए प्रोत्साहित होते थे, प्रेरित होते थे. उस समय का एक प्रसंग मुझे याद है. मेरी स्मृति के आकाश में वह प्रसंग बिजली की तरह कौंध जाता है. पंडित जी के एक विश्वस्त सहायक थे श्री एम. ओ. मथाई. उन्होंने कुछ संसद सदस्यों के कुछ आचरण पर टिप्पणी की थी. स्वाभाविक है कि यह मामला सदन में उठाया जाता. सदन में सभी पक्षों ने इस पर आपत्ति की. विशेषाधिकार के उल्लंघन के प्रस्ताव दिए गए. सदन की अवमानना का मामला उठाया गया. मेरे प्रस्ताव को स्पीकर ने स्वीकार कर लिया. नेहरू जी सदन में थे. उन्होंने कहा, ’अध्यक्ष महोदय, यह विशेषाधिकार का मामला मालूम नहीं होता. यह एक इम्प्रोपरायटी है, अनौचित्य है, इस पहलू पर भी विचार कर लिया जाए.’ लेकिन सदन तैयार नहीं था. प्रतिपक्ष को भी यह बात पसंद नहीं आई. नेहरू जी ने सदन का मूड देखा, प्रतिपक्ष का तेवर देखा. नेहरू जी ने इस सुझाव को मान लिया कि सारा मामला विशेषाधिकार समिति को सौंप दिया जाए. उस समय पंडित नेहरू ने जो कुछ कहा था, मैं उसे उदधृत कर रहा हूं-
’जब सदन का एक महत्वपूर्ण सदस्य यह महसूस कर रहा हो कि कुछ न कुछ किया जाना चाहिए, तब बहुमत के लिए यह कतई उचित नहीं है कि सदन की इच्छा को दरकिनार कर दिया जाए. मेरे विचार से इस मामले को ताक पर रख देने का सुझाव उचित नहीं होगा, क्योंकि इससे यह साफ झलकेगा कि मामले को किसी न किसी प्रकार दबाने का अथवा तथ्यों को छुपाने का प्रयास किया गया है. यह अच्छी बात नहीं होगी कि इस प्रकार की भावना उत्पन्न की जाए.’
लोकतंत्र 51 और 49 का खेल नहीं है. लोकतंत्र मूल रूप में एक नैतिक व्यवस्था है. सदन या संसद यानी कानून की छोटी सी कचहरी नहीं है, जहां शब्दों की चीर-फाड़ की जाए. यह एक राजनीतिक मंच है. राजनीतिक शब्द का प्रयोग मैं संकुचित रूप में नहीं कर रहा हूं, बल्कि विराट अर्थ में कर रहा हूं, जिस मंच पर देश की 90 करोड़ जनता की आशाएं, अपेक्षाएं और कुंठाएं भी प्रतिबिम्बित होनी चाहिए, प्रतिध्वनि होनी चाहिए.
संविधान और कानून सबका अपना महत्व है, लेकिन अगर लोकतंत्र एक ढांचा मात्र बनकर रह जाए, एक कर्मकांड में बदल जाए, उसकी प्राणशक्ति घटती जाए, तो वहां कठिनाई पैदा हो जाती है. उस प्राणशक्ति को घटने न देना, यह हम सबकी जिम्मेदारी है.
अभी दो दिन पहले हमने स्वतंत्रता की वर्षगांठ मनाई. हमने स्वतंत्रता को अक्षुण्ण रखने की शपथ ली. हम देश को समृद्धि की ओर ले जाना चाहते हैं. बाहर की चुनौतियों का हम मिलकर सामना करते हैं, लेकिन घर के भीतर लोकतांत्रिक संस्थाओं का अवमूल्यन न होने पाए, उनका क्षरण न होने पाए, इसकी देखभाल की जरूरत है. जन प्रतिनिधियों की साख घटनी नहीं चाहिए. जन प्रतिनिधि संस्थाओं की विश्वसनीयता में कमी नहीं आनी चाहिए. हमारे लोकतंत्र का पौधा मजबूत है, लेकिन ऐसा न हो कि वह ऊपर-ऊपर तो बढ़ता जाए, पर उसकी जड़ें खोखली होती जाएं. यही कर्तव्य हमारे सामने है.
मैं आप सबको एक बार फिर हृदय से धन्यवाद देता हूं. प्रधानमंत्री के हाथों आज मैंने पुरस्कार स्वीकार किया है, इस पर जरूर टीका-टिप्पणी होगी. अब उससे बचा नहीं जा सकता, लेकिन मुझे याद है, जब पहली बार संसद आया, तो बोलने के लिए समय नहीं मिल पाता था. पीछे की बेंचों पर बैठता था. एक बार नेहरू जी द्वारा सदन में लाए गए विदेश नीति संबंधी प्रस्ताव पर बोलना चाहता था, वे प्रतिवर्ष प्रस्ताव लाते थे, लेकिन स्पीकर साहब ने कहा कि समय नहीं है, आपकी पार्टी बहुत छोटी है, आपको मौन धारण करना चाहिए. इसके विरोध में मैं वाक-आउट कर गया. वाक-आउट का सिलसिला अभी भी चल रहा है. यह बात अलग है कि इस बार ज्यादा लंबा हो गया है. लेकिन वाक-आउट एक लोकतांत्रिक तरीका है, संसदीय आचरण का हिस्सा है. अब हम भीतर जाकर सदन की कार्रवाई में विघ्न डालें, उससे तो अच्छा है कि बाहर ही रहें. यह बात अलग है कि ज्यादा दिन बाहर नहीं रहना चाहिए, लेकिन कभी-कभी असहयोग करना आवश्यक हो जाता है. असहयोग का रास्ता गांधी जी ने दिखाया था. उस पर चलने में कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए, लेकिन वह रास्ता संसद में जाकर समाप्त होना चाहिए.
यह लोकतंत्र का युग है. आज सारे संसार में एक लहर आई है. भारत संसार का सबसे बड़ा लोकतंत्र है. दुनिया हमारी तरफ देख रही है. परीक्षा की इस घड़ी में विफल होने की गलती हम नहीं कर सकते.
एक बार फिर मैं हृदय से आभार प्रकट करता हूं और मैं प्रयत्न करूंगा कि इस सम्मान के लायक अपने आचरण को बनाए रख सकूं. जब कभी मेरे पैर डगमगाएं, तो ’पंत सम्मान’ मुझे चेतावनी देता रहे, मुझे बताता रहे कि इस रास्ते पर डांवाडोल होने की गलती मैं न करूं.
-डॉ. सौरभ मालवीय
(पुस्तक- 'राष्ट्रवादी पत्रकारिता के शिखर पुरुष अटल बिहारी वाजपेयी' से)
राजनीति में मर्यादा होनी चाहिए
महाराष्ट्र की पुणे नगरपालिका द्वारा 23 जनवरी, 1982 को आयोजित गौरव सम्मान समारोह में श्री अटल बिहारी वाजपेयी को सम्मानित किया गया. इस अवसर पर समारोह को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा- किन शब्दों में मैं अपने भावों को व्यक्त करूं. व्यक्त न करने का कारण या न कर पाने का कारण ये नहीं है कि मैं भावों से गदगद हो गया हूं. कारण ये है कि मैं समझ नहीं पा रहा हूं कि मेरा यह सम्मान किसलिए किया जा रहा है. मैं साठ वर्ष का हो गया हूं- क्या इसीलिए सम्मान हो रहा है? साठी बुद्धि नाठी. ये मराठी की म्हण (कहावत) है. हिंदी में इसका दूसरा चरण है साठा सो पाठा. लेकिन अगर मैं जीवित हूं, तो साठ साल का होने वाला हूं. और जीवन तो किसी के हाथ में नहीं है. पता नहीं, उमर बढ़ती है या घटती है. नाना साहब यहां बैठे हैं- वे अस्सी साल के हो गए हैं, उन्होंने स्वयं आपको बताया है. वे सम्मान के अधिकारी हैं. खरात साहब लेखनी के धनी हैं. उनका अभिनंदन किया जाए, तो स्वाभाविक है. मोरे साहब से तो मेरी मुलाकात हाल में ही हुई है. वे लोकसभा में हैं और मैं परलोक सभा में हूं. राज्यसभा को लोग पार्लियामेंट नहीं मानते. मुझसे मिलने आते हैं- कहते हैं हमें पार्लियामेंट देखनी है. मैं कहता हूं, मैं राज्यसभा देखने का प्रबंध कर सकता हूं. तो राज्यसभा नहीं, लोकसभा देखनी है. तो मैं उन्हें पूछता हूं कि मैं यहां क्या कर रहा हूं ? लेकिन यहां सबका भाषण सुनकर मुझे आनंद हुआ. सब दलों के प्रतिनिधियों ने भिन्न-भिन्न विचारधाराओं के प्रवक्ताओं ने मुझे अपने स्नेह का पात्र समझा, ये मेरे लिए कुछ नहीं तो जीवन का पाथेय है. मैं इसे स्नेह कहूंगा- क्योंकि जब स्नेह होता, तो दोष छिप जाते हैं और जो गुण नहीं होते हैं, उनका आविष्कार भी किया जाता है. अब नानासाहब मेरी तारीफ में कुछ कहें यह अच्छा नहीं. मुझे अब उनकी जितनी उम्र पाने के लिए बीस साल और जीना पड़ेगा. और आने वाला कल क्या लेकर आएगा कोई नहीं जानता. सचमुच में व्यक्ति तब तक सम्मान का अधिकारी नहीं होता, जब तक कि जीवन की कथा का अंतिम परिच्छेद नहीं लिखा जाता. कब, कहां, कौन फिसल जाए ? जिंदगी की सफेद चादर पर कब, कहां, कौन सा दाग लग जाए. इसीलिए मैं इसे मानपत्र नहीं मानता. पुणे के नागरिकों को मुझसे आशाएं हैं, अपेक्षाएं हैं, मैं इसे उसकी अभिव्यक्ति मानता हूं. जब कभी मेरे पांव डगमगाने को होंगे, होंगे तो नहीं, अगर कर्तव्य के पथ पर कभी आकर्षण मुझे बांधकर कर्तव्य के पथ से हटाने की कोशिश करेगा, तो आपका मानपत्र मुझे ये चेतावनी देता रहेगा. यह चेतावनी देता रहेगा कि पुणे नगर के निवासियों की आशा और अपेक्षाओं पर पानी फेरने का काम कभी मत करना.
मेरे लिए राजनीति सेवा का एक साधन है. परिवर्तन का माध्यम है. सत्ता सत्ता के लिए नहीं है. विरोध विरोध के लिए नहीं है. सत्ता सेवा के लिए है और विरोध सुधार के लिए- परिष्कार के लिए है. लोकशाही एक ऐसी व्यवस्था है, जिसमें बिना हिंसा के परिवर्तन लाया जा सकता है. आज सार्वजनिक जीवन में अस्पृश्यता बढ़ रही है, यह खेद का विषय है. लेकिन आज का समारोह मेरे मन में कुछ आशा जगाता है. मतभेद के बावजूद हम इकट्ठे हो सकते हैं. प्रामाणिक मतभेद रहेंगे. ’पिण्डे पिण्डे मतिर्भिन्ना’. और मतों की टक्कर में ही भविष्य का पथ प्रशस्त होगा, लेकिन मतभेद एक बात है और मनभेद दूसरी बात है. मतभेद होना चाहिए, मनभेद नहीं होना चाहिए. आखिर तो इस देश का हृदय एक होना चाहिए.
उस दिन संसद में खड़ा था भारत के संविधान की चर्चा करने के लिए. We the people of India. संविधान में दलों का उल्लेख नहीं है. वैसे संसदीय लोकतंत्र में दल आवश्यक है, अनिवार्य है. संविधान के प्रथम पृष्ठ पर अगर किसी का उल्लेख है- We the people of India. We the citizens नहीं है. हम इस देश के लोग, भारत के जन. अलग-अलग प्रदेशों में रहने वाले, अलग-अलग भाषाएं बोलने वाले, अलग-अलग उपासना पद्धतियों का अवलम्बन करने वाले, मगर देश की मिट्टी के साथ अनन्य रूप से जुड़े हुए लोग. यहां की संस्कृति के उत्तराधिकारी और उसके संदेश वाहक हैं. कोई फॊर्म भर कर नागरिकता प्राप्त कर सकता है, मगर देश का आत्मीय बनने के लिए, देश का जन बनने के लिए संस्कारों की आवश्यकता है- मिट्टी की अनन्य संपत्ति आवश्यक है. मैं अमेरिका जाकर अमेरिका का नागरिक बन सकता हूं, मगर अमेरिकन नहीं बन सकता. इस राष्ट्रीयता का आधार संकुचित नहीं है, संकीर्ण है. स्मृतियां बदलती नहीं हैं. कुछ व्यवस्थाएं कालबाह्या जरूर हो जाती हैं. वे त्याज्य बन जाती हैं. उन्हें छोड़ देना चाहिए. दिल्ली से हम पुणे आते हैं, तो गरम कपड़े छोड़ आते हैं. समय आने पर काया भी बदली जा सकती है, मगर जीवन मूल्यों की आत्मा परिवर्तित नहीं होनी चाहिए.
हम स्वाधीन हुए, हमने अपना संविधान बनाया. उसमें संशोधन की गुंजाइश है और संशोधन की व्यवस्था संविधान में ही है. उसमें व्यक्ति की स्वाधीनता की धारणा है. धार्मिक स्वतंत्रता है. व्यक्ति की महत्ता है. हमें लोकशाही चाहिए. लोकशाही को हम अक्षुण्ण रखेंगे. मगर स्वतंत्रता के साथ हमें संयम भी चाहिए. समता के साथ हमें ममता भी चाहिए. अधिकार के साथ कर्तव्य भी चाहिए. और जैसा कि मैंने पहले कहा कि सत्ता के साथ सेवा भी चाहिए. संविधान में हमारे कर्तव्यों का भी उल्लेख है. वह बाद में किया गया था. जिस पृष्ठभूमि में किया गया था, वह ठीक नहीं था. लेकिन अधिकार के साथ कर्तव्य जुड़ा हुआ है. दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं. अगर हमारे कुछ अधिकार हैं, तो इस देश के प्रति कुछ कर्तव्य भी हैं. अभी 26 जनवरी का त्यौहार आने वाला है. आज 23 जनवरी है. नेताजी सुभाषचंद्र बोस का जन्मदिन है. मैं उनको अपनी श्रद्धांजलि देना चाहता हूं. स्वतंत्रता संग्राम के सभी सेनानियों को हम श्रद्धा निवेदन करें. उनमें से जो जीवित हैं, हम उनका सम्मान करें.
महापौर महोदय, मैं आप से और आपके साथियों से कहना चाहूंगा- राजनीतिक नेताओं का ज्यादा सम्मान मत करिए. पहले ही वे जरूरत से ज्यादा रोशनी में रहते हैं. अब देखिए सारी रोशनी यहां जुटी हुई है और आप अंधेरे में बैठे हैं. राजनीति जीवन पर हावी हो गई है. सम्मान होना चाहिए काश्तकारों का, कलाकारों का, वैज्ञानिकों का, रचनात्मक कार्यकर्ताओं का, जो उपेक्षित हैं उनका. कुष्ठ रोगियों के लिए जो आश्रम चला रहे हैं, उनका अभिनंदन होना चाहिए. उनका वंदन होना चाहिए. जनरल वैद्य रिटायर होकर आए. मैं नहीं जानता पुणे महानगरपालिका ने उनका अभिनंदन किया था या नहीं. उनका अभिनंदन होना चाहिए. कैसा विचित्र संयोग है. घटनाचक्र किस तरह से वक्र हो सकता है. जो सेनापति रणभूमि में शत्रुओं के टैंको को भेदकर जीवित वापस चला आया, वह अपने देश में, अपने ही घर में, देश के कुछ गद्दारों के हाथों शहीद हुआ. मित्रों, हम परकीयों से परास्त नहीं हुए. हम तो अपनों से ही मार खाते रहे, मार खाते रहे. स्वर्गीय वैद्य का मरणोपरांत भी सत्कार हो सकता है- समारोह हो सकता है. आज मैंने अपनी सुरक्षा का काफी प्रबंध पाया. मगर कहीं यह सुरक्षा पर्याप्त नहीं है. आज ये नौबत क्यों आ गई ? आम आदमी की सुरक्षा कहां है ? मैं पंजाब जाता हूं. अनेक दलों के कार्यकर्ता मारे गए. और सचमुच मैंने साठ वर्ष पूरे कर लिए, इसके लिए पंजाब के आतंकवादियों को भी धन्यवाद देता हूं. जिनकी लिस्ट में मेरा भी नाम है. और वे कहीं भी, किसी पर भी हमला करने में समर्थ हैं. आम आदमी सुरक्षा का अनुभव कैसे करता है ?
मित्रों, राजनीति को मूल्यों से नहीं जोड़ना चाहिए. यह मात्र सत्ता का खेल नहीं है. आज सचमुच में स्वस्थ परंपराएं डालने का अवसर है, जो दल केंद्र में सत्तारूढ़ है, वह अनेक प्रदेशों में प्रतिपक्ष में बैठा है. इससे वह प्रतिपक्ष के तकाजे को भी समझ सकता है और सत्ता के दायित्व को भी ठीक तरह से अनुभव कर सकता है. राजनीति में तो प्रतिस्पर्धा चलेगी. लेकिन एक मर्यादा होनी चाहिए, एक लक्ष्मण रेखा होनी चाहिए. इस लक्ष्मण रेखा का अगर उल्लंघन किया जाए, हर प्रश्न को अगर वोट से जोड़ा जाएगा, हर समस्या का विचार अगर चुनाव में हानि या लाभ की दृष्टि से किया जाएगा, तो कहीं ऐसा न हो, सारे पुरखों के बलिदानों पर पानी फिर जाए और एक दूसरे को मानपत्र देने की बजाय इतिहास कहीं हमारे लिए अपमान का पत्र छोड़कर न चला जाए. सचमुच में हम किसका सम्मान करें, किसे मानपत्र दें, कौन अधिकारी है.
किसी की आलोचना या दोषारोपण पर मैं भावुक होना नहीं चाहता. दो साल पहले सारे राष्ट्र में संताप की लहर जगी थी. हम चुनाव में परास्त हुए थे. हमने अपनी पराजय को स्वीकार किया था. आज निराशा क्यों मन में डेरा डाल रही है ? समस्याओं को मिलकर हल करना होगा. एक दूसरे की प्रामाणिकता पर संदेह नहीं करना चाहिए. मतभेद रहेंगे. लेकिन ऐसी दीवार नहीं खड़ी होनी चाहिए, जो हमारे राष्ट्र जीवन का सारा तानाबाना तोड़ दे. जो सार्वजनिक जीवन में हैं उनके सामने निरंतर ये द्वंद्व चलता रहता है, यह श्रेय की साधना करें या प्रेय के पीछे दौड़ें ? कभी-कभी जो हितकर है, वह लोकप्रिय नहीं होता. बीमार को कड़वी दवा अच्छी नहीं लगती. लेकिन मरीज का भला चाहने वाला उसको मिठाई नहीं खिलाता. अगर हम लोकप्रियता के पीछे दौड़ें और चुनौतियों का विस्मरण करें, तात्कालिक लाभ के लिए दूरगामी लाभ की बलि चढ़ा दें, और व्यक्ति या दल का विचार करते हुए हम राष्ट्र के तकाजों को, आवश्यकताओं को भूल जाएं, तो आने वाला समय हमें कभी क्षमा नहीं करेगा.
महानगरपालिका हमारी स्वराज्य संस्थाओं का एक महत्वपूर्ण अंग है. हमारा सामाजिक जीवन पांच स्तंभों पर खड़ा है. एक है परिवार, दूसरी पाठशाला, तीसरा पूजा गृह, चौथा धर्म और पांचवां पंचायत. ये पांच स्तंभ हैं. पंचदीप हैं, जो व्यक्ति के निर्माण में, व्यक्ति के विकास में, समाज के गठन में, समाज को धारण करने में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन करते हैं. महानगरपालिका इसी महत्वपूर्ण पंचायत का एक महत्वपूर्ण स्थान है. अच्छा होता अगर हम कॊर्पोरेशन की जगह नगर पंचायत कहते, महानगर पंचायत कहते. ग्राम पंचायत, तालुका पंचायत, जिला पंचायत, महानगर पंचायत. और असेम्बली को भी प्रदेश पंचायत कहा जा सकता था और पार्लियामेंट को राष्ट्रीय पंचायत.
महापौर महोदय, मुझे क्षमा करें, कॊर्पोरेशन को तो लोग अंग्रेजी में सही सही कह भी नहीं सकते. वे कभी कभी कह जाते हैं- करप्शन. एक जगह मैंने देखा वे कॊर्पोरेशन को कह रहे थे चोरपोरेशन-चोर्पोरेशन. मैंने कहा नहीं-नहीं, ये शुद्ध उच्चारण नहीं हैं, क्योंकि उच्चारण तो हम जानते हैं, पर हम कुछ और कहना चाहते हैं. पंचायत नाम अगर होता, तो इस तरह का भ्रम नहीं पैदा होता. हमारे जीवन से ज्यादा जुड़ जाता. हमने अपने संविधान में केंद्र और प्रदेशों के बीच अधिकारों का, साधनों का बंटवारा नहीं किया. ये काम होना चाहिए- ये काम संविधान में छूट गया है. पंचायत का चलते-चलते उल्लेख काफी है. क्या म्युनिसिपल कॊर्पोरेशन, म्युनिसिपलिटी और अन्य स्थानीय स्वराज्य संस्थाएं प्रदेश सरकार की दया पर होनी चाहिए ? वह जब चाहे चुनाव करें, जब चाहें, चुनाव न करें. जब चाहे भंग कर दें, जब चाहे बहाल कर दें.
चुनाव का समय निश्चित होना चाहिए, अवधि तय होनी चाहिए. अधिकारों की व्याख्या होनी चाहिए, साधनों का ठीक तरह से बंटवारा होना चाहिए. शहर बढ़ रहे हैं, शहर फैल रहे हैं. रोजगार की तलाश में, औद्योगीकरण के परिणाम स्वरूप शहरीकरण हो रहा है-शहरों में लोग बड़ी संख्या में आ रहे हैं. नगर की सड़कें छोटी पड़ रही हैं, विद्यालयों में स्थान नहीं है, अस्पतालों में जगह नहीं है. पीने का पानी एक बड़ी समस्या बनने वाला है. क्या इसका दीर्घकालिक नियोजन आवश्यक नहीं ? पंचायत कहां से पूंजी लाए ?
अभी महापौर महोदय कह रहे थे, हमने कॊर्पोरेशन की तरफ से कुछ इमारतें बनाई हैं, दुकानें बनाई हैं. उनसे रुपया आने वाला है, कुछ किराया आएगा. तो मैंने उन्हें बधाई दी कि आप और ऐसे काम करिए. तब वे मुझसे कहने लगे कि इस बारे में थोड़ा सरकार से हमारी तरफ से कहिए. मैंने कहा- मेरे कहने की क्या जरूरत है ? अब तो आप स्वयं सरकार हैं. मगर एक बात मैं जानता हूं- सरकार के दरबार में महापौर की बात बड़ी मुश्किल से सुनी जाएगी, क्योंकि व्यवस्था ऐसी है, जो साधनों का ठीक तरह से बंटवारा नहीं करती. मध्य प्रदेश में ऒक्ट्रॊय खत्म हो गया. प्रदेश सरकार ने टैक्स लगा दिया, जो स्वयं इकट्ठा करती है और प्रदेश सरकार की जिम्मेदारी है कि कॊर्पोरेशन को- म्युनिसिपलिटीज को उसमें से उचित हिस्सा दे. मगर नहीं दे रही है. ग्वालियर का हमारा कॊर्पोरेशन मुश्किल में है. इंदौर में कठिनाई हो रही है. इसलिए मांग हो रही है कि ऒक्ट्रॊय खत्म मत करो. मैंने सुना है कि महाराष्ट्र में तो ऒक्ट्रॊय भी चल रहा है और टर्नओवर टैक्स भी चल रहा है. ऒक्ट्रॊय अगर खत्म कर दिया जाए, तो कॊर्पोरेशन का काम कैसे चलेगा ? क्या आमदनी के और साधन बढ़ने नहीं चाहिए ? कैसे बढ़ें ? सत्ता का विकेंद्रीकरण कीजिए. शक्तिशाली केंद्र मगर सत्ता का विकेंद्रीकरण. सुनने में अंतर्विरोध दिखाई देता है, मगर अंतर्विरोध नहीं है. और विकेंद्रीकरण संविधान सम्मत है. प्रशासन में नागरिकों की भागीदारी जरूरी है. केवल पांच साल में एक बार वोट देना पर्याप्त नहीं है. हर नागरिक प्रशासन में कैसे भागीदार बनेगा. इस पर विचार किया जा सकता है.
स्थानीय स्वराज्य संस्थाओं में, स्वायत्त संस्थाओं में जो चुनाव की पद्धति है, उसमें कुछ परिवर्तन की अपेक्षा है. अभी क्षेत्र के अनुसार प्रतिनिधि चुने जाते हैं. क्या इसमें धंधा लाया जा सकता है, व्यवसाय लाया जा सकता है ? क्या मजदूरों को अलग से प्रतिनिधित्व दिया जा सकता है ? क्या किसानों के प्रतिनिधि के रूप में कोई आ सकते हैं ? सोशलिज्म के साथ क्या हम गिल्ड सोशलिज्म पर विचार कर सकते हैं ? ये विविधता से भरा हुआ समाज-बहुरंगी समाज, इसका कोई वर्ग अपने को उपेक्षित न समझे. शासन में भागीदार बनकर वह परिवर्तन प्रक्रिया में हिस्सा ले. सरकारिया कमीशन के सामने हमने इस तरह के विचार रखे. सारा विवाद खत्म हो गया मध्य प्रदेश और केंद्र के बीच. प्रदेशों को भी अधिक वित्तीय साधन मिलना चाहिए, लेकिन सबसे बड़ी समस्या ये है कि राष्ट्र जीवन के कार्यों में, विकास के कार्यों में, नगर को स्वच्छ रखने के काम में, इसको हरित रखने के काम में, नागरिकों का सक्रिय सहयोग कैसे प्राप्त होगा ? नागरिक चेतना कैसे जगाएं ? नगर को स्वच्छ, नगर को सुंदर बनाने का काम देकर जन अभियान का रूप कैसे दें ? हर चीज प्रशासन पर छोड़ दी जाती है. प्रशासन भी पंगु हो रहा है. क्या लोकशक्ति को जगाकर प्रशासन पर नियंत्रण नहीं रखा जा सकता है ? क्या ये संभव है कि प्रशासन को सबल भी किया जाए ? नागरिक मूक दर्शक न बनें, बल्कि नागरिक इस खंभे को टिकाने में भागीदार बनें, इस दृष्टि से विचार होना चाहिए.
मित्रों, हमारे राष्ट्र जीवन में उतार-चढ़ाव आते रहते हैं. नाना साहब अभी मुझसे बातचीत कर रहे थे और आपने उनके भाषण में भी सुना होगा, जो उनके मन में एक दर्द है, एक पीड़ा है. एक टीस है. ये दर्द उन सबके दिल में है, जो देश का भला चाहते हैं. स्वतंत्रता के बाद हमारी उपलब्धियां कम नहीं हैं. मैं उन लोगों में से नहीं हूं, जो आलोचना के लिए आलोचना करूं. मैं प्रतिपक्ष में हूं, पहले भी पुणे में कह चुका हूं, स्वतंत्रता के बाद हमने कुछ नहीं किया, ये कहना गलत होगा. लेकिन हम जितना कर सकते थे, उतना नहीं कर पाए. जिस तरह से करना चाहिए, उस तरह से नहीं कर पाए. तो क्या हिम्मत हार जाएं ? निराश हो जाएं ? हमने सपने देखे थे, आज सपने टूट गए तो क्या हुआ ? हमें सपनों को उत्तराधिकार के रूप में नई पीढ़ी को सौंपकर जाना है. सपने भंग होने के बाद भी साबुत रहते हैं. सपने टूट जाने के बाद भी जुड़ जाते हैं. आने वाली पीढ़ी को हम कौन से सपने उत्तराधिकार के रूप में सौंप कर जाएं ? आज भी देश में नौजवानों का बहुमत है. उनमें कुछ करने की उमंग है, उत्साह है. वे कुछ करें. हमारा सहयोग उन्हें होगा, हमारा समर्थन उन्हें मिलेगा. हमारा आशीर्वाद उन्हें मिलेगा. लेकिन क्रिया ऐसी होनी चाहिए, जो कल्याणकारी हो. हमारा चिंतन ऐसा होना चाहिए, जो उदात्त हो. राजकारण ऐसा होना चाहिए, जो हमारे राष्ट्र जीवन के शाश्वत मूल्यों की वृद्धि कर सके. खरात साहब ने ठीक कहा, " अभी सामाजिक क्षेत्र में बहुत परिवर्तन की आवश्यकता है." वे अभी सालूपुर का उल्लेख कर कहे थे. शायद आपको मालूम नहीं है कि सालूपुर में जो हत्याकांड हुआ था, उसमें जो अभियुक्त पकड़े गए, उन पर अभी तक मुकदमा नहीं चलाया गया है, क्योंकि प्रशासन गवाह ढूंढने में असमर्थ है. किसी को सजा नहीं मिली.
मैं उस दिन दिल्ली पहुंच गया था. हरिजन भाइयों का सामूहिक चिता में स्नान हो रहा था. एक ओर सूरज छुप रहा था, मानो सूरज शर्म से लाल मुंह करके भाग जाना चाहता था और दूसरी ओर सामूहिक चिता जल रही थी. क्या जन्म के कारण व्यक्ति को जीने का अधिकार नहीं होगा ? सम्मान का अधिकार नहीं होगा ? किस मुंह से हम दक्षिण अफ्रीका में होने वाले रंगभेद के खिलाफ आवाज उठाएं ? फिर भी उठा रहे हैं, उठाना चाहिए. लेकिन यहां तो रंग भी एक है, चमड़ी का रंग भी एक है, रक्त का रंग भी एक है. समाज को टुकड़ों में बांटकर, अलग-अलग खेमों में विभाजित करके, हम सारे संसार को एक परिवार मानते हैं. ऐसी ऊंची-ऊंची बातें नहीं कर सकते. और अगर करेंगे, तो इनका कोई असर नहीं होगा.
भगवान बुद्ध, महावीर, गांधी ने चाहे अहिंसा को परम धर्म माना हो. मनुष्य के जीवन में हिंसा का कोई मूल्य नहीं. पंजाब लहूलुहान पड़ा है. मैं मानने के लिए तैयार नहीं हूं कि वे पराये हैं. जो आतंकवादी हैं, उन्हें सजा मिलनी चाहिए. उनको अलग-थलग किया जाना चाहिए. इसीलिए मैंने शब्द प्रयोग किया- समता पर आधारित ममत्व. ममतायुक्त समता. कथनी और करनी में बढ़ता हुआ अंतर विश्व में भी हमारी विश्वसनीयता को कम कर रहा है. और देश के भीतर कदम-कदम पर कठिनाइयां पैदा कर रहा है. आवश्यकता इस बात की है कि हम समय की चुनौतियों को समझें और उन चुनौतियों का सफलतापूर्वक सामना करने के लिए साहस जुटाएं, विवेक जुटाएं, शक्ति जुटाएं और छोटे-छोटे मतभेदों को ताक पर रखकर, ये गणतंत्र चिरंजीवी हो इस तरह की व्यवस्था का विकास हो, इस तरह का प्रबंध करने की तैयारी हो.
आपने मुझे सम्मान का अधिकारी समझा, इसके लिए मैं आपको हृदय से धन्यवाद देना चाहता हूं. मैंने प्रयत्न किया है कि सारे देश का चित्र अपने सामने रख कर काम करूं. मैं जनता सरकार में विदेश मंत्री बना, तब मैंने दो राजदूत प्रधानमंत्री की सलाह से नियुक्त किए. एक नाना साहब और दूसरे थे नानी पालखीवाला. दोनों किसी पार्टी के नहीं थे. श्री कैलाशचंद्र हमारे हाई-कमीश्नर होकर मॊरिशस में गए. मैंने ये कभी नहीं सोचा- ’ये वेगले आहेत, ये वेगले आहेत. आपल्याच पैकी नाही.’ ये आपल्याच पैकी काय ? और मैं उस दिन कश्मीरियों में बैठा था- तो कहने लगे, ये हमारी जाति वाले नहीं हैं- गैर जाति वाले हैं. अरे सब की एक ही जाति है. मनुष्य की एक ही जाति है. जाति जन्म से है. जन्म लेने की प्रक्रिया से है. सारे मनुष्य एक तरह से पैदा होते हैं और गधे दूसरी तरह से पैदा होते हैं. इसलिए जानवरों की अलग जाति है. और कहां मानव जाति का सपना. ’वसुधैव कुटुम्बकम’ और कहां दल, और दल में भी गुट. जनता पार्टी टूट गई- बड़ा दुख हुआ. मैं जानता हूं, हमारे कुछ मित्र इस दुख में सहभागी नहीं होंगे. वे सोचते हैं- टूट गया, तो अच्छा हुआ. मगर आप अपने को संभाल कर रखिए. ये टूटना इस देश की नियति हो गई है. बिखरना हमारा स्वभाव बन गया है. अकारण झगड़ा करना, ऐसा लगता है कि हमारे खून में घुस गया है.
आज भारत अगर चाहे, तो संसार में प्रथम पंक्ति का राष्ट्र बन सकता है. फिर मैं कहना चाहूंगा कि परकीय हमारे पैर नहीं खींच रहे. हम अपने ही पैरों में बेड़ियां डाले हैं. इन्हें हम तोड़ने का संकल्प करें. राष्ट्र को मिलन भूमि मानकर व्यक्ति से ऊपर उठकर जरूरत हो तो दल से ऊपर उठकर- ’तेरा वैभव अमर रहे मां, हम दिन चार रहें न रहें.’ व्यक्ति तो नहीं रहेगा. किसी ने मुझ से पूछा था- आपका सपना क्या है ? मैंने कहा- एक महान भारत की रचना. कहने लगे कि आपका सपना, क्या आपको भरोसा है कि आपके जीवन में पूरा हो पाएगा ? मैंने कहा- नहीं होगा, लेकिन सपना पूरा करने के लिए फिर से इस देश में जन्म लेना पड़ेगा. मैं जन्म-मरण के चक्र से छूटना चाहता हूं. लेकिन अगर मेरे देश की हालत सुधरती नहीं है, भारत एक महान-दिव्य-भव्य राष्ट्र नहीं बनता है, अगर हर व्यक्ति के लिए हम गरिमा की, स्वतंत्रता की गारंटी नहीं कर सकते, अगर विविधताओं को बनाए रखते हुए एकता की रक्षा नहीं कर सकते, तो फिर दूसरा जन्म लेकर भी जूझने के लिए तैयार रहना पड़ेगा.
मैं आपको हृदय से धन्यवाद देता हूं. परमात्मा मुझे शक्ति दे. आपने मुझ से जो आशाएं प्रकट की हैं, मैं उनको पूरा करने के लिए बल जुटा सकूं.
-डॉ. सौरभ मालवीय
(पुस्तक- 'राष्ट्रवादी पत्रकारिता के शिखर पुरुष अटल बिहारी वाजपेयी' से)
राजनीति में मर्यादा होनी चाहिए
महाराष्ट्र की पुणे नगरपालिका द्वारा 23 जनवरी, 1982 को आयोजित गौरव सम्मान समारोह में श्री अटल बिहारी वाजपेयी को सम्मानित किया गया. इस अवसर पर समारोह को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा- किन शब्दों में मैं अपने भावों को व्यक्त करूं. व्यक्त न करने का कारण या न कर पाने का कारण ये नहीं है कि मैं भावों से गदगद हो गया हूं. कारण ये है कि मैं समझ नहीं पा रहा हूं कि मेरा यह सम्मान किसलिए किया जा रहा है. मैं साठ वर्ष का हो गया हूं- क्या इसीलिए सम्मान हो रहा है? साठी बुद्धि नाठी. ये मराठी की म्हण (कहावत) है. हिंदी में इसका दूसरा चरण है साठा सो पाठा. लेकिन अगर मैं जीवित हूं, तो साठ साल का होने वाला हूं. और जीवन तो किसी के हाथ में नहीं है. पता नहीं, उमर बढ़ती है या घटती है. नाना साहब यहां बैठे हैं- वे अस्सी साल के हो गए हैं, उन्होंने स्वयं आपको बताया है. वे सम्मान के अधिकारी हैं. खरात साहब लेखनी के धनी हैं. उनका अभिनंदन किया जाए, तो स्वाभाविक है. मोरे साहब से तो मेरी मुलाकात हाल में ही हुई है. वे लोकसभा में हैं और मैं परलोक सभा में हूं. राज्यसभा को लोग पार्लियामेंट नहीं मानते. मुझसे मिलने आते हैं- कहते हैं हमें पार्लियामेंट देखनी है. मैं कहता हूं, मैं राज्यसभा देखने का प्रबंध कर सकता हूं. तो राज्यसभा नहीं, लोकसभा देखनी है. तो मैं उन्हें पूछता हूं कि मैं यहां क्या कर रहा हूं ? लेकिन यहां सबका भाषण सुनकर मुझे आनंद हुआ. सब दलों के प्रतिनिधियों ने भिन्न-भिन्न विचारधाराओं के प्रवक्ताओं ने मुझे अपने स्नेह का पात्र समझा, ये मेरे लिए कुछ नहीं तो जीवन का पाथेय है. मैं इसे स्नेह कहूंगा- क्योंकि जब स्नेह होता, तो दोष छिप जाते हैं और जो गुण नहीं होते हैं, उनका आविष्कार भी किया जाता है. अब नानासाहब मेरी तारीफ में कुछ कहें यह अच्छा नहीं. मुझे अब उनकी जितनी उम्र पाने के लिए बीस साल और जीना पड़ेगा. और आने वाला कल क्या लेकर आएगा कोई नहीं जानता. सचमुच में व्यक्ति तब तक सम्मान का अधिकारी नहीं होता, जब तक कि जीवन की कथा का अंतिम परिच्छेद नहीं लिखा जाता. कब, कहां, कौन फिसल जाए ? जिंदगी की सफेद चादर पर कब, कहां, कौन सा दाग लग जाए. इसीलिए मैं इसे मानपत्र नहीं मानता. पुणे के नागरिकों को मुझसे आशाएं हैं, अपेक्षाएं हैं, मैं इसे उसकी अभिव्यक्ति मानता हूं. जब कभी मेरे पांव डगमगाने को होंगे, होंगे तो नहीं, अगर कर्तव्य के पथ पर कभी आकर्षण मुझे बांधकर कर्तव्य के पथ से हटाने की कोशिश करेगा, तो आपका मानपत्र मुझे ये चेतावनी देता रहेगा. यह चेतावनी देता रहेगा कि पुणे नगर के निवासियों की आशा और अपेक्षाओं पर पानी फेरने का काम कभी मत करना.
मेरे लिए राजनीति सेवा का एक साधन है. परिवर्तन का माध्यम है. सत्ता सत्ता के लिए नहीं है. विरोध विरोध के लिए नहीं है. सत्ता सेवा के लिए है और विरोध सुधार के लिए- परिष्कार के लिए है. लोकशाही एक ऐसी व्यवस्था है, जिसमें बिना हिंसा के परिवर्तन लाया जा सकता है. आज सार्वजनिक जीवन में अस्पृश्यता बढ़ रही है, यह खेद का विषय है. लेकिन आज का समारोह मेरे मन में कुछ आशा जगाता है. मतभेद के बावजूद हम इकट्ठे हो सकते हैं. प्रामाणिक मतभेद रहेंगे. ’पिण्डे पिण्डे मतिर्भिन्ना’. और मतों की टक्कर में ही भविष्य का पथ प्रशस्त होगा, लेकिन मतभेद एक बात है और मनभेद दूसरी बात है. मतभेद होना चाहिए, मनभेद नहीं होना चाहिए. आखिर तो इस देश का हृदय एक होना चाहिए.
उस दिन संसद में खड़ा था भारत के संविधान की चर्चा करने के लिए. We the people of India. संविधान में दलों का उल्लेख नहीं है. वैसे संसदीय लोकतंत्र में दल आवश्यक है, अनिवार्य है. संविधान के प्रथम पृष्ठ पर अगर किसी का उल्लेख है- We the people of India. We the citizens नहीं है. हम इस देश के लोग, भारत के जन. अलग-अलग प्रदेशों में रहने वाले, अलग-अलग भाषाएं बोलने वाले, अलग-अलग उपासना पद्धतियों का अवलम्बन करने वाले, मगर देश की मिट्टी के साथ अनन्य रूप से जुड़े हुए लोग. यहां की संस्कृति के उत्तराधिकारी और उसके संदेश वाहक हैं. कोई फॊर्म भर कर नागरिकता प्राप्त कर सकता है, मगर देश का आत्मीय बनने के लिए, देश का जन बनने के लिए संस्कारों की आवश्यकता है- मिट्टी की अनन्य संपत्ति आवश्यक है. मैं अमेरिका जाकर अमेरिका का नागरिक बन सकता हूं, मगर अमेरिकन नहीं बन सकता. इस राष्ट्रीयता का आधार संकुचित नहीं है, संकीर्ण है. स्मृतियां बदलती नहीं हैं. कुछ व्यवस्थाएं कालबाह्या जरूर हो जाती हैं. वे त्याज्य बन जाती हैं. उन्हें छोड़ देना चाहिए. दिल्ली से हम पुणे आते हैं, तो गरम कपड़े छोड़ आते हैं. समय आने पर काया भी बदली जा सकती है, मगर जीवन मूल्यों की आत्मा परिवर्तित नहीं होनी चाहिए.
हम स्वाधीन हुए, हमने अपना संविधान बनाया. उसमें संशोधन की गुंजाइश है और संशोधन की व्यवस्था संविधान में ही है. उसमें व्यक्ति की स्वाधीनता की धारणा है. धार्मिक स्वतंत्रता है. व्यक्ति की महत्ता है. हमें लोकशाही चाहिए. लोकशाही को हम अक्षुण्ण रखेंगे. मगर स्वतंत्रता के साथ हमें संयम भी चाहिए. समता के साथ हमें ममता भी चाहिए. अधिकार के साथ कर्तव्य भी चाहिए. और जैसा कि मैंने पहले कहा कि सत्ता के साथ सेवा भी चाहिए. संविधान में हमारे कर्तव्यों का भी उल्लेख है. वह बाद में किया गया था. जिस पृष्ठभूमि में किया गया था, वह ठीक नहीं था. लेकिन अधिकार के साथ कर्तव्य जुड़ा हुआ है. दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं. अगर हमारे कुछ अधिकार हैं, तो इस देश के प्रति कुछ कर्तव्य भी हैं. अभी 26 जनवरी का त्यौहार आने वाला है. आज 23 जनवरी है. नेताजी सुभाषचंद्र बोस का जन्मदिन है. मैं उनको अपनी श्रद्धांजलि देना चाहता हूं. स्वतंत्रता संग्राम के सभी सेनानियों को हम श्रद्धा निवेदन करें. उनमें से जो जीवित हैं, हम उनका सम्मान करें.
महापौर महोदय, मैं आप से और आपके साथियों से कहना चाहूंगा- राजनीतिक नेताओं का ज्यादा सम्मान मत करिए. पहले ही वे जरूरत से ज्यादा रोशनी में रहते हैं. अब देखिए सारी रोशनी यहां जुटी हुई है और आप अंधेरे में बैठे हैं. राजनीति जीवन पर हावी हो गई है. सम्मान होना चाहिए काश्तकारों का, कलाकारों का, वैज्ञानिकों का, रचनात्मक कार्यकर्ताओं का, जो उपेक्षित हैं उनका. कुष्ठ रोगियों के लिए जो आश्रम चला रहे हैं, उनका अभिनंदन होना चाहिए. उनका वंदन होना चाहिए. जनरल वैद्य रिटायर होकर आए. मैं नहीं जानता पुणे महानगरपालिका ने उनका अभिनंदन किया था या नहीं. उनका अभिनंदन होना चाहिए. कैसा विचित्र संयोग है. घटनाचक्र किस तरह से वक्र हो सकता है. जो सेनापति रणभूमि में शत्रुओं के टैंको को भेदकर जीवित वापस चला आया, वह अपने देश में, अपने ही घर में, देश के कुछ गद्दारों के हाथों शहीद हुआ. मित्रों, हम परकीयों से परास्त नहीं हुए. हम तो अपनों से ही मार खाते रहे, मार खाते रहे. स्वर्गीय वैद्य का मरणोपरांत भी सत्कार हो सकता है- समारोह हो सकता है. आज मैंने अपनी सुरक्षा का काफी प्रबंध पाया. मगर कहीं यह सुरक्षा पर्याप्त नहीं है. आज ये नौबत क्यों आ गई ? आम आदमी की सुरक्षा कहां है ? मैं पंजाब जाता हूं. अनेक दलों के कार्यकर्ता मारे गए. और सचमुच मैंने साठ वर्ष पूरे कर लिए, इसके लिए पंजाब के आतंकवादियों को भी धन्यवाद देता हूं. जिनकी लिस्ट में मेरा भी नाम है. और वे कहीं भी, किसी पर भी हमला करने में समर्थ हैं. आम आदमी सुरक्षा का अनुभव कैसे करता है ?
मित्रों, राजनीति को मूल्यों से नहीं जोड़ना चाहिए. यह मात्र सत्ता का खेल नहीं है. आज सचमुच में स्वस्थ परंपराएं डालने का अवसर है, जो दल केंद्र में सत्तारूढ़ है, वह अनेक प्रदेशों में प्रतिपक्ष में बैठा है. इससे वह प्रतिपक्ष के तकाजे को भी समझ सकता है और सत्ता के दायित्व को भी ठीक तरह से अनुभव कर सकता है. राजनीति में तो प्रतिस्पर्धा चलेगी. लेकिन एक मर्यादा होनी चाहिए, एक लक्ष्मण रेखा होनी चाहिए. इस लक्ष्मण रेखा का अगर उल्लंघन किया जाए, हर प्रश्न को अगर वोट से जोड़ा जाएगा, हर समस्या का विचार अगर चुनाव में हानि या लाभ की दृष्टि से किया जाएगा, तो कहीं ऐसा न हो, सारे पुरखों के बलिदानों पर पानी फिर जाए और एक दूसरे को मानपत्र देने की बजाय इतिहास कहीं हमारे लिए अपमान का पत्र छोड़कर न चला जाए. सचमुच में हम किसका सम्मान करें, किसे मानपत्र दें, कौन अधिकारी है.
किसी की आलोचना या दोषारोपण पर मैं भावुक होना नहीं चाहता. दो साल पहले सारे राष्ट्र में संताप की लहर जगी थी. हम चुनाव में परास्त हुए थे. हमने अपनी पराजय को स्वीकार किया था. आज निराशा क्यों मन में डेरा डाल रही है ? समस्याओं को मिलकर हल करना होगा. एक दूसरे की प्रामाणिकता पर संदेह नहीं करना चाहिए. मतभेद रहेंगे. लेकिन ऐसी दीवार नहीं खड़ी होनी चाहिए, जो हमारे राष्ट्र जीवन का सारा तानाबाना तोड़ दे. जो सार्वजनिक जीवन में हैं उनके सामने निरंतर ये द्वंद्व चलता रहता है, यह श्रेय की साधना करें या प्रेय के पीछे दौड़ें ? कभी-कभी जो हितकर है, वह लोकप्रिय नहीं होता. बीमार को कड़वी दवा अच्छी नहीं लगती. लेकिन मरीज का भला चाहने वाला उसको मिठाई नहीं खिलाता. अगर हम लोकप्रियता के पीछे दौड़ें और चुनौतियों का विस्मरण करें, तात्कालिक लाभ के लिए दूरगामी लाभ की बलि चढ़ा दें, और व्यक्ति या दल का विचार करते हुए हम राष्ट्र के तकाजों को, आवश्यकताओं को भूल जाएं, तो आने वाला समय हमें कभी क्षमा नहीं करेगा.
महानगरपालिका हमारी स्वराज्य संस्थाओं का एक महत्वपूर्ण अंग है. हमारा सामाजिक जीवन पांच स्तंभों पर खड़ा है. एक है परिवार, दूसरी पाठशाला, तीसरा पूजा गृह, चौथा धर्म और पांचवां पंचायत. ये पांच स्तंभ हैं. पंचदीप हैं, जो व्यक्ति के निर्माण में, व्यक्ति के विकास में, समाज के गठन में, समाज को धारण करने में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन करते हैं. महानगरपालिका इसी महत्वपूर्ण पंचायत का एक महत्वपूर्ण स्थान है. अच्छा होता अगर हम कॊर्पोरेशन की जगह नगर पंचायत कहते, महानगर पंचायत कहते. ग्राम पंचायत, तालुका पंचायत, जिला पंचायत, महानगर पंचायत. और असेम्बली को भी प्रदेश पंचायत कहा जा सकता था और पार्लियामेंट को राष्ट्रीय पंचायत.
महापौर महोदय, मुझे क्षमा करें, कॊर्पोरेशन को तो लोग अंग्रेजी में सही सही कह भी नहीं सकते. वे कभी कभी कह जाते हैं- करप्शन. एक जगह मैंने देखा वे कॊर्पोरेशन को कह रहे थे चोरपोरेशन-चोर्पोरेशन. मैंने कहा नहीं-नहीं, ये शुद्ध उच्चारण नहीं हैं, क्योंकि उच्चारण तो हम जानते हैं, पर हम कुछ और कहना चाहते हैं. पंचायत नाम अगर होता, तो इस तरह का भ्रम नहीं पैदा होता. हमारे जीवन से ज्यादा जुड़ जाता. हमने अपने संविधान में केंद्र और प्रदेशों के बीच अधिकारों का, साधनों का बंटवारा नहीं किया. ये काम होना चाहिए- ये काम संविधान में छूट गया है. पंचायत का चलते-चलते उल्लेख काफी है. क्या म्युनिसिपल कॊर्पोरेशन, म्युनिसिपलिटी और अन्य स्थानीय स्वराज्य संस्थाएं प्रदेश सरकार की दया पर होनी चाहिए ? वह जब चाहे चुनाव करें, जब चाहें, चुनाव न करें. जब चाहे भंग कर दें, जब चाहे बहाल कर दें.
चुनाव का समय निश्चित होना चाहिए, अवधि तय होनी चाहिए. अधिकारों की व्याख्या होनी चाहिए, साधनों का ठीक तरह से बंटवारा होना चाहिए. शहर बढ़ रहे हैं, शहर फैल रहे हैं. रोजगार की तलाश में, औद्योगीकरण के परिणाम स्वरूप शहरीकरण हो रहा है-शहरों में लोग बड़ी संख्या में आ रहे हैं. नगर की सड़कें छोटी पड़ रही हैं, विद्यालयों में स्थान नहीं है, अस्पतालों में जगह नहीं है. पीने का पानी एक बड़ी समस्या बनने वाला है. क्या इसका दीर्घकालिक नियोजन आवश्यक नहीं ? पंचायत कहां से पूंजी लाए ?
अभी महापौर महोदय कह रहे थे, हमने कॊर्पोरेशन की तरफ से कुछ इमारतें बनाई हैं, दुकानें बनाई हैं. उनसे रुपया आने वाला है, कुछ किराया आएगा. तो मैंने उन्हें बधाई दी कि आप और ऐसे काम करिए. तब वे मुझसे कहने लगे कि इस बारे में थोड़ा सरकार से हमारी तरफ से कहिए. मैंने कहा- मेरे कहने की क्या जरूरत है ? अब तो आप स्वयं सरकार हैं. मगर एक बात मैं जानता हूं- सरकार के दरबार में महापौर की बात बड़ी मुश्किल से सुनी जाएगी, क्योंकि व्यवस्था ऐसी है, जो साधनों का ठीक तरह से बंटवारा नहीं करती. मध्य प्रदेश में ऒक्ट्रॊय खत्म हो गया. प्रदेश सरकार ने टैक्स लगा दिया, जो स्वयं इकट्ठा करती है और प्रदेश सरकार की जिम्मेदारी है कि कॊर्पोरेशन को- म्युनिसिपलिटीज को उसमें से उचित हिस्सा दे. मगर नहीं दे रही है. ग्वालियर का हमारा कॊर्पोरेशन मुश्किल में है. इंदौर में कठिनाई हो रही है. इसलिए मांग हो रही है कि ऒक्ट्रॊय खत्म मत करो. मैंने सुना है कि महाराष्ट्र में तो ऒक्ट्रॊय भी चल रहा है और टर्नओवर टैक्स भी चल रहा है. ऒक्ट्रॊय अगर खत्म कर दिया जाए, तो कॊर्पोरेशन का काम कैसे चलेगा ? क्या आमदनी के और साधन बढ़ने नहीं चाहिए ? कैसे बढ़ें ? सत्ता का विकेंद्रीकरण कीजिए. शक्तिशाली केंद्र मगर सत्ता का विकेंद्रीकरण. सुनने में अंतर्विरोध दिखाई देता है, मगर अंतर्विरोध नहीं है. और विकेंद्रीकरण संविधान सम्मत है. प्रशासन में नागरिकों की भागीदारी जरूरी है. केवल पांच साल में एक बार वोट देना पर्याप्त नहीं है. हर नागरिक प्रशासन में कैसे भागीदार बनेगा. इस पर विचार किया जा सकता है.
स्थानीय स्वराज्य संस्थाओं में, स्वायत्त संस्थाओं में जो चुनाव की पद्धति है, उसमें कुछ परिवर्तन की अपेक्षा है. अभी क्षेत्र के अनुसार प्रतिनिधि चुने जाते हैं. क्या इसमें धंधा लाया जा सकता है, व्यवसाय लाया जा सकता है ? क्या मजदूरों को अलग से प्रतिनिधित्व दिया जा सकता है ? क्या किसानों के प्रतिनिधि के रूप में कोई आ सकते हैं ? सोशलिज्म के साथ क्या हम गिल्ड सोशलिज्म पर विचार कर सकते हैं ? ये विविधता से भरा हुआ समाज-बहुरंगी समाज, इसका कोई वर्ग अपने को उपेक्षित न समझे. शासन में भागीदार बनकर वह परिवर्तन प्रक्रिया में हिस्सा ले. सरकारिया कमीशन के सामने हमने इस तरह के विचार रखे. सारा विवाद खत्म हो गया मध्य प्रदेश और केंद्र के बीच. प्रदेशों को भी अधिक वित्तीय साधन मिलना चाहिए, लेकिन सबसे बड़ी समस्या ये है कि राष्ट्र जीवन के कार्यों में, विकास के कार्यों में, नगर को स्वच्छ रखने के काम में, इसको हरित रखने के काम में, नागरिकों का सक्रिय सहयोग कैसे प्राप्त होगा ? नागरिक चेतना कैसे जगाएं ? नगर को स्वच्छ, नगर को सुंदर बनाने का काम देकर जन अभियान का रूप कैसे दें ? हर चीज प्रशासन पर छोड़ दी जाती है. प्रशासन भी पंगु हो रहा है. क्या लोकशक्ति को जगाकर प्रशासन पर नियंत्रण नहीं रखा जा सकता है ? क्या ये संभव है कि प्रशासन को सबल भी किया जाए ? नागरिक मूक दर्शक न बनें, बल्कि नागरिक इस खंभे को टिकाने में भागीदार बनें, इस दृष्टि से विचार होना चाहिए.
मित्रों, हमारे राष्ट्र जीवन में उतार-चढ़ाव आते रहते हैं. नाना साहब अभी मुझसे बातचीत कर रहे थे और आपने उनके भाषण में भी सुना होगा, जो उनके मन में एक दर्द है, एक पीड़ा है. एक टीस है. ये दर्द उन सबके दिल में है, जो देश का भला चाहते हैं. स्वतंत्रता के बाद हमारी उपलब्धियां कम नहीं हैं. मैं उन लोगों में से नहीं हूं, जो आलोचना के लिए आलोचना करूं. मैं प्रतिपक्ष में हूं, पहले भी पुणे में कह चुका हूं, स्वतंत्रता के बाद हमने कुछ नहीं किया, ये कहना गलत होगा. लेकिन हम जितना कर सकते थे, उतना नहीं कर पाए. जिस तरह से करना चाहिए, उस तरह से नहीं कर पाए. तो क्या हिम्मत हार जाएं ? निराश हो जाएं ? हमने सपने देखे थे, आज सपने टूट गए तो क्या हुआ ? हमें सपनों को उत्तराधिकार के रूप में नई पीढ़ी को सौंपकर जाना है. सपने भंग होने के बाद भी साबुत रहते हैं. सपने टूट जाने के बाद भी जुड़ जाते हैं. आने वाली पीढ़ी को हम कौन से सपने उत्तराधिकार के रूप में सौंप कर जाएं ? आज भी देश में नौजवानों का बहुमत है. उनमें कुछ करने की उमंग है, उत्साह है. वे कुछ करें. हमारा सहयोग उन्हें होगा, हमारा समर्थन उन्हें मिलेगा. हमारा आशीर्वाद उन्हें मिलेगा. लेकिन क्रिया ऐसी होनी चाहिए, जो कल्याणकारी हो. हमारा चिंतन ऐसा होना चाहिए, जो उदात्त हो. राजकारण ऐसा होना चाहिए, जो हमारे राष्ट्र जीवन के शाश्वत मूल्यों की वृद्धि कर सके. खरात साहब ने ठीक कहा, " अभी सामाजिक क्षेत्र में बहुत परिवर्तन की आवश्यकता है." वे अभी सालूपुर का उल्लेख कर कहे थे. शायद आपको मालूम नहीं है कि सालूपुर में जो हत्याकांड हुआ था, उसमें जो अभियुक्त पकड़े गए, उन पर अभी तक मुकदमा नहीं चलाया गया है, क्योंकि प्रशासन गवाह ढूंढने में असमर्थ है. किसी को सजा नहीं मिली.
मैं उस दिन दिल्ली पहुंच गया था. हरिजन भाइयों का सामूहिक चिता में स्नान हो रहा था. एक ओर सूरज छुप रहा था, मानो सूरज शर्म से लाल मुंह करके भाग जाना चाहता था और दूसरी ओर सामूहिक चिता जल रही थी. क्या जन्म के कारण व्यक्ति को जीने का अधिकार नहीं होगा ? सम्मान का अधिकार नहीं होगा ? किस मुंह से हम दक्षिण अफ्रीका में होने वाले रंगभेद के खिलाफ आवाज उठाएं ? फिर भी उठा रहे हैं, उठाना चाहिए. लेकिन यहां तो रंग भी एक है, चमड़ी का रंग भी एक है, रक्त का रंग भी एक है. समाज को टुकड़ों में बांटकर, अलग-अलग खेमों में विभाजित करके, हम सारे संसार को एक परिवार मानते हैं. ऐसी ऊंची-ऊंची बातें नहीं कर सकते. और अगर करेंगे, तो इनका कोई असर नहीं होगा.
भगवान बुद्ध, महावीर, गांधी ने चाहे अहिंसा को परम धर्म माना हो. मनुष्य के जीवन में हिंसा का कोई मूल्य नहीं. पंजाब लहूलुहान पड़ा है. मैं मानने के लिए तैयार नहीं हूं कि वे पराये हैं. जो आतंकवादी हैं, उन्हें सजा मिलनी चाहिए. उनको अलग-थलग किया जाना चाहिए. इसीलिए मैंने शब्द प्रयोग किया- समता पर आधारित ममत्व. ममतायुक्त समता. कथनी और करनी में बढ़ता हुआ अंतर विश्व में भी हमारी विश्वसनीयता को कम कर रहा है. और देश के भीतर कदम-कदम पर कठिनाइयां पैदा कर रहा है. आवश्यकता इस बात की है कि हम समय की चुनौतियों को समझें और उन चुनौतियों का सफलतापूर्वक सामना करने के लिए साहस जुटाएं, विवेक जुटाएं, शक्ति जुटाएं और छोटे-छोटे मतभेदों को ताक पर रखकर, ये गणतंत्र चिरंजीवी हो इस तरह की व्यवस्था का विकास हो, इस तरह का प्रबंध करने की तैयारी हो.
आपने मुझे सम्मान का अधिकारी समझा, इसके लिए मैं आपको हृदय से धन्यवाद देना चाहता हूं. मैंने प्रयत्न किया है कि सारे देश का चित्र अपने सामने रख कर काम करूं. मैं जनता सरकार में विदेश मंत्री बना, तब मैंने दो राजदूत प्रधानमंत्री की सलाह से नियुक्त किए. एक नाना साहब और दूसरे थे नानी पालखीवाला. दोनों किसी पार्टी के नहीं थे. श्री कैलाशचंद्र हमारे हाई-कमीश्नर होकर मॊरिशस में गए. मैंने ये कभी नहीं सोचा- ’ये वेगले आहेत, ये वेगले आहेत. आपल्याच पैकी नाही.’ ये आपल्याच पैकी काय ? और मैं उस दिन कश्मीरियों में बैठा था- तो कहने लगे, ये हमारी जाति वाले नहीं हैं- गैर जाति वाले हैं. अरे सब की एक ही जाति है. मनुष्य की एक ही जाति है. जाति जन्म से है. जन्म लेने की प्रक्रिया से है. सारे मनुष्य एक तरह से पैदा होते हैं और गधे दूसरी तरह से पैदा होते हैं. इसलिए जानवरों की अलग जाति है. और कहां मानव जाति का सपना. ’वसुधैव कुटुम्बकम’ और कहां दल, और दल में भी गुट. जनता पार्टी टूट गई- बड़ा दुख हुआ. मैं जानता हूं, हमारे कुछ मित्र इस दुख में सहभागी नहीं होंगे. वे सोचते हैं- टूट गया, तो अच्छा हुआ. मगर आप अपने को संभाल कर रखिए. ये टूटना इस देश की नियति हो गई है. बिखरना हमारा स्वभाव बन गया है. अकारण झगड़ा करना, ऐसा लगता है कि हमारे खून में घुस गया है.
आज भारत अगर चाहे, तो संसार में प्रथम पंक्ति का राष्ट्र बन सकता है. फिर मैं कहना चाहूंगा कि परकीय हमारे पैर नहीं खींच रहे. हम अपने ही पैरों में बेड़ियां डाले हैं. इन्हें हम तोड़ने का संकल्प करें. राष्ट्र को मिलन भूमि मानकर व्यक्ति से ऊपर उठकर जरूरत हो तो दल से ऊपर उठकर- ’तेरा वैभव अमर रहे मां, हम दिन चार रहें न रहें.’ व्यक्ति तो नहीं रहेगा. किसी ने मुझ से पूछा था- आपका सपना क्या है ? मैंने कहा- एक महान भारत की रचना. कहने लगे कि आपका सपना, क्या आपको भरोसा है कि आपके जीवन में पूरा हो पाएगा ? मैंने कहा- नहीं होगा, लेकिन सपना पूरा करने के लिए फिर से इस देश में जन्म लेना पड़ेगा. मैं जन्म-मरण के चक्र से छूटना चाहता हूं. लेकिन अगर मेरे देश की हालत सुधरती नहीं है, भारत एक महान-दिव्य-भव्य राष्ट्र नहीं बनता है, अगर हर व्यक्ति के लिए हम गरिमा की, स्वतंत्रता की गारंटी नहीं कर सकते, अगर विविधताओं को बनाए रखते हुए एकता की रक्षा नहीं कर सकते, तो फिर दूसरा जन्म लेकर भी जूझने के लिए तैयार रहना पड़ेगा.
मैं आपको हृदय से धन्यवाद देता हूं. परमात्मा मुझे शक्ति दे. आपने मुझ से जो आशाएं प्रकट की हैं, मैं उनको पूरा करने के लिए बल जुटा सकूं.
-डॉ. सौरभ मालवीय
(पुस्तक- 'राष्ट्रवादी पत्रकारिता के शिखर पुरुष अटल बिहारी वाजपेयी' से)
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20 जुलाई से प्रारंभ होने वाला संसद का मानसून सत्र कई महत्वपूर्ण मुद्दों के कारण चर्चा का केंद्र रहने की संभावना है। सरकार विभिन्न विधायी और नीतिगत विषयों पर अपना पक्ष रख सकती है। वहीं, यदि परिसीमन (Delimitation) का मुद्दा प्रमुखता से उठता है, तो उस पर सत्ता पक्ष और विपक्ष—दोनों के रुख पर देश की निगाहें रहेंगी।
यह देखना दिलचस्प होगा कि परिसीमन जैसे संवेदनशील और दूरगामी प्रभाव वाले विषय पर विपक्ष की रणनीति क्या रहती है और संसद में किस प्रकार की बहस देखने को मिलती है।
लोकतंत्र में ऐसे महत्वपूर्ण विषयों पर सार्थक और तथ्याधारित चर्चा ही देशहित में होती है।
Wednesday, July 15, 2026
जनप्रतिनिधि शासन का प्रशिक्षण लें
महाराष्ट्र के मुंबई के समीप 7 जनवरी, 2003 को केशव सृष्टि म्हालगी प्रबोधिनी के प्रशिक्षण केंद्र के लोकार्पण समारोह को संबोधित करते हुए श्री अटल बिहारी वाजपेयी ने इस बात पर बल दिया कि जनप्रतिनिधियों को शासन चलाने से संबंधित प्रशिक्षण लेना चाहिए. उन्होंने कहा कि रामभाऊ म्हालगी के संबंध में एक प्रसंग याद आ रहा है. उन्होंने जब लोकसभा में पंचवर्षीय योजना के संबंध में भाषण दिया, उस पर तत्कालीन केंद्रीय मंत्री यशवंत चव्हाण ने बहस का उत्तर देते हुए एक वाक्य में सारी चर्चा को समाप्त करने का प्रयास किया था. तब उन्होंने रामभाऊ के भाषण की ओर संकेत करते हुए कहा था- उनके वे शब्द मुझे अभी तक याद हैं, मैं दोहराता हूं कि ’नियोजन ह्या मंडलींचा विषय नाहीं.’ नियोजन से जनसंघ वालों का कोई संबंध नहीं है. उस दिन मुझे लगा और रामभाऊ ने भी अनुरोध किया, हम राजनीति में आ गए हैं, राष्ट्र की सेवा हमारा लक्ष्य है, अगर हम चुनाव लड़ेंगे, सत्ता में आने का प्रयास करेंगे, इसके लिए हमें सभी विषयों की जानकारी प्राप्त करनी होगी, शासन चलाने का एक तरह से प्रशिक्षण लेना होगा.
राजनीतिक नेतृत्व और प्रशासन चलाने वाली सरकारी यंत्रणा, जिसे आप ’ब्यूरोक्रेसी’ कह सकते हैं, उसमें खाई बढ़ती जा रही है. लोकप्रियता एकमात्र निष्कर्ष है. मतदाता किसका समर्थन करेंगे, यह कह नहीं सकते. लेकिन जो भी चुनकर आएगा, वह अगर शासन चलाने के मामले में, राजकाज चलाने के मामले में बिल्कुल अनभिज्ञ होगा, तो लोकतंत्र, जड़ शासनतंत्र में बदल जाएगा. शासन चलाने की जो पद्धति है, उसमें अगर परिवर्तन किया जाए, तो बात अलग है, लेकिन बड़ी मात्रा में आज चुने हुए राजनीतिक नेताओं को ब्यूरोक्रेसी पर निर्भर रहना पड़ता है. ब्यूरोक्रेसी का काम है कि वह सहायक हो, जानकारी दे, अपनी सलाह भी दे, लेकिन उस सलाह को नाप तौलकर व्यवहार में लाने की जिम्मेदारी राजनीतिक नेताओं की है. मैं देखता हूं कि यह जिम्मेदारी घट रही है. जो लोग राजनीति में जाना चाहते हैं या जो उसके लिए तैयार हो रहे हैं, वे बौद्धिक दृष्टि से अपने को समृद्ध कर रहे हैं, तैयार कर रहे हैं, ऐसा दृश्य हमें दिखाई नहीं देता. शायद ’प्रबोधिनी’ ये पहला प्रयास है अपने ढंग का. और इसलिए मैं इसका स्वागत करता हूं. प्रशिक्षण का रूप क्या हो, उसका विवरण क्या हो, ये प्रबोधिनी तय करेगी. ये निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है. शासन भी निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है.
लोकतंत्र में सत्ता का विभाजन होगा. एक्जक्यूटिव हैं, लेजिस्लेचर हैं और ज्यूडिशियरी की एक अलग भूमिका है. अब जिन्होंने अपने को उसके लिए तैयार नहीं किया है, उनसे यह आशा तो की ही जाती है कि राजनीतिज्ञ सत्ता में आने के बाद जल्दी से जल्दी अपने को तैयार करें. लेकिन तैयारी की कोई पृष्ठभूमि चाहिए. यही कठिनाई होती है. शासन जीवन के सभी क्षेत्रों में फैल रहा है. और भले ही हम कहें कि शासन में विकार कम होना चाहिए, लेकिन व्यवहार में निर्णय लेने की प्रक्रिया सीमित होती जा रही है, संकुचित होती जा रही है. और आख़िर में वह थोड़े से चोटी के लोगों पर निर्भर करती है. उसमें जिन्होंने ट्रेनिंग ली है, इस अर्थ में उन्होंने नौकरी करने के लिए वह रास्ता चुना, उनमें और जब जनता के चुने हुए प्रतिनिधियों में आमना-सामना होता है, तो फिर ये अनुभव होता है कि जनप्रतिनिधि जितने तैयार होने चाहिए, उतने नहीं हैं. अभी तक ऐसा प्रयास नहीं हुआ था, वह हो रहा है और बड़ी अच्छी बात है.
लोकसभा की आप डिबेट कभी सुनें जाकर. सदस्यों को समय नहीं मिलता, ये शिकायत होती रहती है, लेकिन उन्हें जब समय मिलता है तब वे क्या बोलते हैं मालूम नहीं. वे इसकी तरफ ध्यान नहीं देते, तैयारी नहीं करते. अब काम, कमीटियों में होता है, कमीटियों में उपस्थिति नहीं होती. तैयार होकर सदस्य नहीं आते. उनकी रुचि भी नहीं होती. जब तैयार होने की पृष्ठभूमि नहीं होती, इसलिए ऐसी ट्रेनिंग के लिए जनप्रतिनिधियों में रुचि पैदा होना भी जरूरी है. उनमें विषय को समझने की तैयारी हो, और फिर उसके अनुसार काम लेने की तैयारी हो. मैं समझता हूं कि प्रबोधिनी इस संबंध में महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर सकती है. यहीं कहीं केशव सृष्टि है. मुझे इस नई सृष्टि को देखकर बड़ा आनंद हुआ है. यहां आने तक मुझे यह कल्पना नहीं थी कि इस सृष्टि का रूप क्या है ? जो कुछ आज मैंने देखा, मुझे आश्चर्य है, सुखद आश्चर्य है. अब कोई यह नहीं कहेगा कि नियोजन या मंडलींचा विषय नाही. उस विश्वास के अनुरूप हम शासन के हर एक अंग को किस तरह से चला सकते हैं, किस तरह से सही परिणाम पा सकते हैं, इस दृष्टि से विचार करने की जरूरत है. और मैं समझ रहा हूं कि जो भी इस दिशा में प्रयास हुआ है, वह प्रशंसनीय है. बड़ी संख्या में हमारे कार्यकर्ता इसका लाभ उठाएं, प्रशिक्षित हों. पहले शिक्षित हों, फिर प्रशिक्षित हों, परंतु अभी तो ’शिक्षा’ ही शुरू नहीं हुई है. ये शिक्षा मराठी वाली शिक्षा नहीं है. ’शिक्षण’ अभी तो शिक्षण ही शुरू नहीं हुआ है. इसकी आवश्यकता ही नहीं समझी गई है. लेकिन अब आवश्यकता का अनुभव हो रहा है. यह अभाव था. जो खल रहा है. और जो सत्ता में बैठे हैं, उनको तो ये अभाव ज्यादा खलेगा.
जो सत्ता में हैं, जो बाद में सत्ता में जाएंगे, उन्हें यह अभाव न खले, इसके लिए उन्हें अपने आप को अभी से तैयार करने की जरूरत है. यही प्रयास हो रहा है, बड़ी प्रसन्नता है. मैं सफलता की कामना करता हूं.
-डॉ. सौरभ मालवीय
(पुस्तक- 'राष्ट्रवादी पत्रकारिता के शिखर पुरुष अटल बिहारी वाजपेयी' से)
कुछ दोस्ती को भी मौका मिलना चाहिए
प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी ने 20 फरवरी, 1999 को बस से लाहौर की यात्रा प्रारंभ की थी. वे 22 सदस्यों वाला एक प्रतिनिधिमंडल भी अपने साथ लेकर गए थे, जिनमें देश की सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक हस्तियां सम्मिलित थीं. लाहौर के ऐतिहासिक किले में अटलजी के सम्मान में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने भोज दिया था. इस अवसर पर उनका नागरिक अभिनंदन किया गया. समारोह को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि कल आए थे, आज जा रहे हैं, दुनिया का यही तरीका है. लेकिन मैं अकेला नहीं जा रहा हूं. आया भी अकेला नहीं था. मेरे साथ एक प्रतिनिधिमंडल आया है, एक डेलीगेशन आया है. भारत के चुने हुए लोग. अलग-अलग क्षेत्रों में नाम कमाने वाले मेरे साथ आए हैं. मुझे 24 घंटे मिले. लेकिन इन 24 घंटों में मुझे ऐसा लगता है कि दिल्ली और लाहौर की दूरी कुछ कम हो गई है. हम कुछ नजदीक आ गए हैं. कुछ भरोसा बढ़ गया है. साथ मिलकर चलने के लिए कदम में कुछ तेजी आ गई है.
जैसा मैंने कल कहा था, मैं जानबूझ कर बस से आना चाहता था. पहले इरादा बाघा की सीमा से मियां साहब से मिलकर वापस जाने का था. उन्होंने कहा ऐसा नहीं हो सकता, दरवाजे से लौट जाएं ये भी कोई बात हुई. घर के भीतर तक आना चाहिए. लाहौर की कई यादें मेरे दिमाग में हैं. मैं पहली बार नहीं आया हूं और आखिरी बार भी नहीं आया हूं. पहली दफा जब मैं आया. अंग्रेजों का राज था. मैं कोहाट बन्नू तक गया था. हाई स्कूल का विद्यार्थी था. उस समय अनारकली देखी थी. बाद में जब वजीरे-खारजा बनने के बाद आया, तो रात में पंजाब के गवर्नर साहब से मैंने कहा था कि मेरा जो ऒफिशियल प्रोग्राम है, उसमें अनारकली जाने की कोई सूरत नजर नहीं आती. मगर अनारकली जाए बिना मैं कैसे दिल्ली वापस जा सकता हूं. रात में मेरे लिए अनारकली जाने का खास इंतजाम किया गया था. इस बार मैं नहीं गया, क्योंकि और नई कलियां खिल गई हैं.
24 घंटे के भीतर हमने कुछ फैसले किए हैं, अच्छे फैसले किए हैं. मुझे भरोसा है आपको पसंद आएंगे. दुनिया हैरान है और हम भी कभी-कभी सोच-सोच कर संकोच में पड़ जाते हैं कि आखिर हम दौड़ क्यों रहे हैं ? कल मियां साहब ने भी यह सवाल उठाया था. यह सवाल हम सबको कुरेदता है. दुनिया कहां से कहां पहुंच गई है. साम्राज्यवाद समाप्त हो गया. कहते हैं वह ऐसा राज था, जिसमें सूरज नहीं डूबता था. मगर सूरज के देखते-देखते वह राज डूब गया. बेड़ियां टूट गईं. हथकड़ियां छूट गईं. जब तक हम पराधीन थे, गुलाम थे, यह कहकर अपना मन बहला लिया करते थे कि जब हम आजाद हो जाएंगे, तो ये करेंगे वो करेंगे. हर बात के लिए हम कोई न कोई बहाना ढूंढ लेते थे.
आज दुनिया कोई बहाना सुनने को तैयार नहीं है. आज हमारा मन भी नया बहाना गढ़ने को तैयार नहीं है. भगवान का दिया सबकुछ है. प्रकृति ने दौलत लुटाई है यहां. इतनी बड़ी आबादी है, जनबल है. मेहनती किसान है. पसीना बहाने वाला मजदूर है. थोड़ी-सी आमदनी में घर को कुशलता से चलाने वाली गृहणी है. विज्ञान और टेक्नोलॊजी पर प्रभुत्व जमाने वाले नौजवान हैं. फिर हम पिछड़ क्यों रहे हैं ? कल प्रधानमंत्री जी ने मेरी कविता की कुछ पंक्तियां, कुछ लाइनें उद्धृत कीं. ’जंग न होने देंगे.’ यह कविता वजीर बनने के बाद नहीं लिखी गई है, पहले लिखी गई थी.
भारत-पाकिस्तान पड़ौसी साथ-साथ रहना है
प्यार करें या वार करें, दोनों को ही सहना है
तीन बार लड़ चुके लड़ाई, कितना महंगा सौदा है
रूसी बम हो या अमरीकी, खून एक बहना है
जो हम पर गुजरी, बच्चों के संग न होने देंगे
जंग न होने देंगे
मगर इसके पहले एक छंद मैं आपके सामने रखना चाहता हूं.
क्यों हमें जंग रोकना है ?
क्यों हमें ऐसे हालात पैदा करने हैं
जिनमें जंग न हो, अमन हो
शांति बने रहे, हथियारों पर भी खर्चा न हो
जितनी जरूरत का है, उतना ही हो
उस समय मैंने लिखा था-
हमें चाहिए शांति, जिंदगी हमको प्यारी
इस दुनिया में जिंदगी से बढ़कर क्या नियामत हो सकती है, जिंदगी से बढ़कर और क्या वरदान हो सकता है. कभी-कभी हम जिंदा हैं, तो शायद यह नहीं समझते कि जिंदगी कितनी कीमती है. जिंदगी कितनी अनमोल है.
हमें चाहिए शांति, जिंदगी हमको प्यारी
हमें चाहिए शांति, सृजन की है तैयारी
सृजन माइने निर्माण
हमें चाहिए शांति, जिंदगी हमको प्यारी
हमें चाहिए शांति, सृजन की है तैयारी
हमने छेड़ी जंग, भूख से, बीमारी से
ऐसा नहीं कि हम निठल्ले बैठे हैं. निठल्ला बैठना भी नहीं चाहिए. हम जूझेंगे, लेकिन किससे जूझेंगे. पड़ौसी से नहीं, आपस में नहीं.
हमने छेड़ी जंग, भूख से, बीमारी से
आगे आकर हाथ बंटाए दुनिया सारी
हम दुनिया को दावत दे रहे हैं आइए, हमारी मदद करिए, साथ मिलकर चलिए. हम जानते हैं कि हमें अपना विकास करना होगा. अपने पैरों पर आप खड़े रहना पड़ेगा. मगर दुनिया इतनी छोटी हो गई है कि हम अपने को टापू नहीं बना सकते. एक-दूसरे की मदद लेनी चाहिए. एक-दूसरे की सहायता से आगे बढ़ने की कोशिश होनी चाहिए. हम दुनिया को दावत दे रहे हैं कि आइए.
हमें चाहिए शांति, जिंदगी हमको प्यारी
हमें चाहिए शांति, सृजन की है तैयारी
हमने छेड़ी जंग, भूख से, बीमारी से
आगे आकर हाथ बंटाए दुनिया सारी
हरी भरी धरती को खूनी रंग न लेने देंगे
जंग न होने देंगे
आप में से कोई पूछ सकता है जब आपने ऐसी कविता लिखी, जंग न होने देंगे, यह ऐलान कर दिया, तो फिर पोखरण विस्फोट करने की क्या जरूरत थी. यह सवाल उठ सकता है, उठना चाहिए. इस पर खुले दिल से बातें होनी चाहिए. हमने पोखरण विस्फोट हमले के लिए नहीं किया, बचाव के लिए किया है. हम तीन बार लड़ाइयों में फंस चुके हैं. हम हमेशा के लिए लड़ाई रोकना चाहते हैं. श्रीमती इंदिरा गांधी के जमाने में परमाणु विस्फोट हुआ था. उसके बाद भारत इंतजार करता रहा. हम उम्मीद कर रहे थे कि यह हथियार दुनिया में समाप्त कर दिया जाएगा. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. दुनिया न्यूक्लियर डिसआर्मामेंट की ओर नहीं बढ़ी. हथियार और संगीन होते गए. धारें और पैनी होती गईं. कुछ लोग इस काम में लगे रहे. हमारे वैज्ञानिकों ने कहा कि कुछ सोचने की जरूरत है. अणु शक्ति का शांति के लिए उपयोग हो यह बहुत जरूरी है. लेकिन विनाश के लिए इसका कोई उपयोग न कर पाए इसकी रोकथाम भी जरूरी है.
हमने विस्फोट करने के बाद ऐलान कर दिया कि अब हम विस्फोट नहीं करेंगे. हमने यह भी ऐलान कर दिया कि हम एटमी हथियारों का उपयोग करने वाले पहले देश नहीं होंगे. खुद उपयोग नहीं करेंगे, शुरुआत नहीं करेंगे. हमने यह भी कहा कि जिनके पास एटमी हथियार नहीं हैं, उनके खिलाफ हम एटमी हथियार काम में नहीं लाएंगे. नैम (NAM) के सदस्य के नाते, जिसकी अभी दक्षिण अफ्रीका में बैठक हुई थी, हमने फिर इस बात को दोहराया है कि एक वक्त का ढांचा बनाकर सारी एटमी हथियारों को खत्म करने का काम शुरू होना चाहिए. जरूरत क्या है एटमी हथियारों की. किसी जमाने में इन हथियारों ने, एटमी हथियारों ने एक रोल अदा किया होगा. बैलेंस ऒफ टेरर का. अब इसकी कोई जरूरत नहीं है. कितना खर्चा हो रहा है. होड़ लगी है. आज इस सवाल पर पाकिस्तान के प्रधानमंत्री से भी बात हुई है. हमने तय किया है कि हम अपने ख्यालात का तबादला करते रहेंगे. भारत क्या कर रहा है, पाकिस्तान क्या कर रहा है. यह आपस में पता नहीं है. अगर पता लग रहा है, तो दूसरों से लग रहा है. दूसरे पूछते हैं कि क्या आपको मालूम नहीं है कि आपका पड़ौसी क्या कर रहा है. इस हालत को बदलने की जरूरत है.
विश्व में जनमत बनाना पड़ेगा. यह जरूरी है कि इस संबंध में भारत और पाकिस्तान मिलकर काम करें. दोनों की जिम्मेदारी बढ़ गई है. अब अमन के सिवा कोई रास्ता नहीं है. अब चिंगारी का खेल नहीं चलेगा. छोटी सी चिंगारी आग में बदल सकती है. आग सब कुछ जलाकर खाक कर सकती है. चिंगारी को रोकना होगा. ध्यान, गरीबी, बेरोजगारी, बीमारी, इनके निराकरण की ओर लगाना पड़ेगा. किस तरह से हम पिछड़ रहे हैं ? किस तरह से ? लोग, जिस तरह की जिंदगी जीना चाहिए, उस तरह की जिंदगी नहीं जी पा रहे हैं. इसके लिए शांति चाहिए. शांति के लिए जो मसले हैं, उनको हल करने की जरूरत है. मसले हल करने के लिए भरोसे की हवा पैदा करने की जरूरत है, विश्वास का वातावरण बनाने की जरूरत है.
सवेरे यह सवाल उठा कि मुझे मिनारे-पाकिस्तान जाना चाहिए या नहीं जाना चाहिए. प्रोग्राम बन गया था. लेकिन कुछ लोगों की राय थी कि अगर मैं वहां गया तो फिर पाकिस्तान के ऊपर मेरी मोहर लग जाएगी. मैंने कहा, क्या मतलब है इसका ? क्या पाकिस्तान मेरी मोहर से चलता है ? पाकिस्तान की अपनी मोहर है और वह चल रही है. लेकिन शक इतना गहरा है. हो सकता है कि मैं वापस जाऊं और मुझसे सवाल किए जाएं कि आप गए थे ऒफिश्यल विजिट पर, मिनारे-पाकिस्तान जाने की क्या जरूरत. मैं जवाब दूंगा. मेरे जवाब से लोग संतुष्ट होंगे, मैं यह भी जानता हूं. लेकिन कुछ नहीं होंगे, यह भी मैं जानता हूं. लेकिन मुझे मिनारे-पाकिस्तान पर जाना चाहिए या नहीं जाना चाहिए, यह भी बहस का एक मुद्दा बन गया है. यह ठीक है कि हम बंटवारा नहीं चाहते थे. मैंने आपसे कहा, जब मैं यहां आया तब सारा हिन्दुस्तान एक था, अंग्रेज राज कर रहे थे. मैं कोहाट बन्नू तक गया था. वह हिन्दुस्तान हमारी आंखों में है. देश का बंटवारा हुआ.
देश अलग-अलग राज्यों में बंटा, अलग-अलग राष्ट्रों में बंटा. हमारे दिल में घाव लगा. अब घाव भर गया है. दाग जरूर बाकी है. लेकिन वह दाग हमें इस बात की याद दिलाता है कि हमें मिलकर साथ रहना है. और साथ रहने के लिए मिलकर चलना जरूरी है.
पाकिस्तान फले-फूले हम चाहते हैं और हम फले-फूलें यह आप भी चाहते होंगे. इतिहास बदला जा सकता है, मगर भूगोल नहीं बदला जा सकता. ज्योग्राफी नहीं बदली जा सकती. आप दोस्त बदल सकते हैं, पड़ौसी नहीं बदल सकते. हम अच्छे पड़ोसी के नाते रहें. 1977-78 में भी हमने शुरुआत की थी, आपको याद होगा. दोनों देशों के बीच आना-जाना आसान कर दिया था. लोग अभी तक उस बात को याद करते हैं, हम फिर वह काम करने जा रहे हैं. आज कुछ फैसले हुए हैं. मैं एकतरफा उनका ऐलान नहीं करूंगा. वक्त आने पर उनका ऐलान होगा. लोग परिवार वालों से मिलने नहीं जा सकते. हाई कमीशन में भीड़ लगी है. दरवाजे वक्त पर खुलते हैं, वक्त पर बंद होते हैं. और अगर बेवक्त कोई मुसीबत आ जाए तो. और आती है मुसीबत. खबर देकर थोड़े ही आती है. लेकिन मिलने के लिए जा नहीं सकते हैं. अगर पहुंच भी गए, तो भी जिस शहर का वीजा बनाया गया है, उससे दूसरे शहर में जाना है तो पुलिस तस्वीर में आ जाती है और पुलिस के साथ क्या-क्या आ जाता है, यह बताने की जरूरत नहीं है. जो पुलिस वाले मेरी बात सुन रहे हों, बुरा न माने. जो यहां मौजूद हैं, मैं उनके लिए नहीं कह रहा. मैं एक सिस्टम की बात कह रहा हूं. पर इस चीज के बारे में भी सोचा जाना चाहिए.
लोग मछलियां पकड़ने के लिए आते हैं. समुद्र में भटक जाते हैं. हवालात में पहुंच जाते हैं. मछली पकड़ने की बजाय ख़ुद पकड़ में आ जाते हैं. हमने तय किया है कि ऐसे लोगों को तत्काल छोड़ देना चाहिए. लेकिन दोनों प्रधानमंत्रियों के तय करने से बात नहीं बनेगी. यह मैं साल भर प्रधानमंत्री बने रहने के बाद समझ गया हूं. इसके लिए कुछ और करना पड़ेगा. लेकिन हम करेंगे, हमने तय किया है. हमारा फैसला है. स्थिति बदलनी चाहिए. हवा में और तरह की रंगत आनी चाहिए. दोस्ती की जरूरत है. दोस्ती के साथ भरोसे की जरूरत है. मैं चाहता था कि सरदार जाफरी साहब मेरे साथ आते. मगर वह आ न सके. उनका एक शेर आज मैंने यहां के एक अंग्रेजी अखबार में देखा.
तुम आओ गुलशने-लाहौर से चमन बरदोश
हम आएं सुबह बनारस की रौशनी लेकर
फिर उसके बाद यह पूछें कि कौन दुश्मन है
बहुत दिन दुश्मनी हो ली. अब कुछ दोस्ती को भी मौका मिलना चाहिए. बहनो और भाइयो, हमने पाकिस्तान के साथ-साथ, सभी पड़ोसी देशों के साथ संबंध सुधारने की कोशिश की है. अभी श्रीलंका के साथ समझौता हुआ है फ्री ट्रेड के बारे में. बांग्लादेश के साथ भी हमने नहरी पानी का समझौता किया है. आपने यह भी पढ़ा होगा कि दिल्ली से लाहौर बस चल रही है, तो अब ढाका से कलकत्ता तक भी बस चलने वाली है. एक बस नहीं है. बस करो यह भी नहीं है. अभी तो शुरुआत करनी है. दोस्ती से कभी जी नहीं भरता. हां, दुश्मनी में ऐसा मुकाम जाता है कि जब दिल करता है कि अरे छोड़ो. दुनिया में आर्थिक संबंधों का विकास हो रहा है. हम पाकिस्तान के साथ भी व्यापार के आर्थिक संबंधों में विस्तार के कदम उठाना चाहते हैं. अगर आपके पास बिजली ज्यादा है, हम खरीदना चाहेंगे. जरा भाव ठीक होना चाहिए. बाढ़ और तूफान के बावजूद हमारी गेहूं की फसल अच्छी हुई है. हमने मियां साहब से कहा कि हमने सुना है कि आप बहुत दूर से गंदम ला रहे हैं. हम आपके दरवाजे पर गंदम पहुंचा देते हैं. और चीजें हैं, गिना नहीं रहा हूं.
मसले हल होंगे. मसले ठीक होने के लिए ठीक वातावरण बनाना चाहिए. कुछ कदम हिम्मत के साथ उठाने पड़ेंगे. और मैं आपसे वादा करना चाहता हूं. जहां तक हिम्मत के साथ कदम उठाने की जरूरत पड़ेगी, आप मुझे और मेरे साथियों को कमजोर नहीं पाएंगे. पीछे हटते हुए नहीं पाएंगे. जब पोखरण में एटमी विस्फोट करने का फैसला हुआ, तो मुझे लोगों ने मेरी ही कविता याद दिलाई थी. मैं हिरोशिमा गया था. मैंने नागासाकी का दृश्य देखा था. वहां बम चलाया जाता, उसकी जरूरत नहीं थी. वहां लड़ाई खत्म हो गई थी. मित्र देश जीत गए थे. वह आत्मरक्षा के लिए चलाया गया एटमी हथियार नहीं था. आज वे लोग भुगत रहे हैं.
मेरी कविता का शीर्षक था-हिरोशिमा की कविता. एक शायर के दिल की पीड़ा थी. और इसलिए जब एक गंभीर फैसला किया गया, तब भी मेरा दिमाग साफ था. हमें मिलकर एटमी वेपन फ्री वर्ल्ड का निर्माण करना है. हम अपने एटमी हथियारों को काम में लाएं, इसका तो सवाल ही पैदा नहीं होता. लेकिन इसके लिए दोस्ती का माहौल चाहिए. मैं उम्मीद करता हूं कि मेरी 24 घंटे की यात्रा इस तरह का माहौल बनाने में मदद करेगी. मैंने कहा कि दिल्ली और लाहौर की दूरी थोड़ी कम सी हो गई है. ये दूरी हमें और कम करनी है. और केवल लाहौर की ही नहीं, सारे पाकिस्तान और हिन्दुस्तान के बीच नजदीकी लानी है. मुझे विश्वास है कि इस सब में पाकिस्तान के वजीरे-आजम का सहयोग और उनके साथियों का सहयोग मिलेगा. पाकिस्तान के अवाम का सहयोग मिलेगा. और हम मिलकर कदम से कदम मिलाकर आगे बढ़ेंगे.
आपने मेरा और मेरे डेलीगेशन का जो स्वागत किया, उसके लिए मैं आपका बहुत-बहुत आभारी हूं. मैं कोशिश करूंगा कि मन में जो आशाएं जगी हैं, उन आशाओं को हम लोग मिलकर पूरा कर सकें और साउथ एशिया में एक नया वातावरण और नई हवा पैदा कर सकें. बहुत-बहुत शुक्रिया.
-डॉ. सौरभ मालवीय
(पुस्तक- 'राष्ट्रवादी पत्रकारिता के शिखर पुरुष अटल बिहारी वाजपेयी' से)
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