Friday, August 7, 2026

आत्मीय मिलन





आज कुशीनगर के लोकप्रिय विधायक श्री पी. एन. पाठक जी के आवास पर पारिवारिक एवं आत्मीय वातावरण में मिलन का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
स्नेह, आत्मीयता और पारिवारिक अपनत्व से परिपूर्ण यह भेंट सदैव स्मरणीय रहेगी। ऐसे अवसर संबंधों को और अधिक सुदृढ़ बनाने पारस्परिक विश्वास को भी नई ऊर्जा प्रदान करते हैं।
आदरणीय पाठक जी एवं उनके समस्त परिवार के स्नेहपूर्ण आतिथ्य एवं आत्मीय स्वागत के लिए हृदय से आभार।
सादर।

पुस्तक भेंट



प्रख्यात खिस्सागो एवं लखनऊ की तहज़ीब और ज़ुबान के सशक्त संवाहक श्री हिमांशु वाजपेयी से आत्मीय भेंट हुआ। 
हिमांशु जी लखनऊ की सांस्कृतिक विरासत के जीवंत प्रतिनिधि हैं। अपनी विशिष्ट लखनवी शैली, अद्भुत खिस्सागोई और दास्तानगोई के माध्यम से वे देश-दुनिया को अवध की संस्कृति, भाषा और संवेदनाओं से परिचित करा रहे हैं। पत्रकारिता में लंबे समय तक सक्रिय रहने के बाद उन्होंने स्वयं को पूर्णतः खिस्सागोई की साधना के लिए समर्पित कर दिया है।
उनके उत्कृष्ट कार्यों की सराहना माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी ने भी मन की बात कार्यक्रम में की है। अनेक प्रतिष्ठित सम्मानों से अलंकृत हिमांशु जी आज अपनी कला से देश-विदेश में लखनऊ का गौरव बढ़ा रहे हैं।
कल लखनऊ विश्वविद्यालय स्थित मेरे कार्यालय में उनका आगमन हुआ। विभिन्न सामाजिक, सांस्कृतिक, साहित्यिक एवं मीडिया से जुड़े विषयों पर विस्तृत और सार्थक चर्चा हुई। यह आत्मीय संवाद लंबे समय तक स्मृतियों में संजोए रखने योग्य रहेगा।
इस अवसर पर उन्हें अपनी पुस्तक 'भारतीय संत परम्परा : धर्मदीप से राष्ट्रदीप' भेंट की। 
सप्रेम शुभकामनाएँ, हिमांशु जी।

Wednesday, August 5, 2026

पंडित नेहरू अटलजी से स्नेह करते थे

  


देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू अटलजी से बहुत स्नेह करते थे. उन्हें नेहरू जी का आशीष प्राप्त था. उस समय की बात है, जब पंडित जवाहरलाल नेहरू प्रधानमंत्री थे और अटल बिहारी वाजपेयी जी जनसंघ के सांसद थे. संसद में किसी बहस के दौरान अटलजी अधिक बोल रहे थे, तब नेहरू जी ने उन्हें डांटते हुए कहा कि तुम अभी बच्चे हो. संध्या के समय नेहरू जी अपने कार्यालय निकलकर अटलजी के निवास पर पहुंच गए. उस समय अटलजी स्टोव जला रहे थे. अटलजी ने उन्हें देखकर अभिवादन किया और कहा कि वे चाय बना रहे हैं. नेहरू जी ने पूछा कि कॊफी है ? अटलजी ने कहा कि हां, है. इस पर नेहरू जी ने कहा कि तुम बैठो, मैं कॊफी बनाता हूं. अटलजी नेहरू जी की सादगी देखकर अवाक रह गए.  कॊफी के कुछ घूंट लेने के बाद नेहरू जी ने कहा कि आज मैंने तुम्हें डांट दिया था, बुरा तो नहीं लगा. इस पर अटलजी ने कहा कि बिल्कुल नहीं. मैं नया तो हूं ही, किंतु अब मैं पूरी तैयारी से आया करूंगा, ताकि डांट न खानी पड़े. नेहरू जी जब जाने लगे, तो अटलजी उन्हें उनकी गाड़ी तक छोड़ने गए और उनके चरण स्पर्श कर आशीर्वाद भी लिया.

उनकी भाषा आकर्षित करती है : बिरजू महाराज
कला जगत के सभी लोग अटल बिहारी वाजपेयी जी का बहुत मान-सम्मान करते हैं. उनकी कविताओं में गहरे विचारों को जाना जा सकता है. उनकी भाषा में बड़ी मिठास है, जो हर व्यक्ति को अपनी ओर आकर्षित करती है. संगीतकारों लिए उनके मन में उच्च स्थान है. मुझे कई बार उनके साथ बैठने का सौभाग्य मिला. 

अटलजी मधुर भाषी हैं : आशा भोंसले
अटल बिहारी वाजपेयी जी की बहुत साफ छवि है. मैं उनसे केवल एक बार मिली हूं. सी.बी.एस. के श्री पंडित जी के साथ उनसे मिलने गई. उस समय वे ताज होटल में ठहरे हुए थे. वे सफेद लुंगी-कुर्ता पहने हुए थे. उनके चेहरे पर मुस्कान थी. वे बहुत मधुर भाषी हैं. वे कम बोलते हैं. उनकी स्मरण शक्ति अच्छी है. उन्होंने बताया कि प्रधानमंत्री बनने के बाद मिलने वाले बधाई संदेशों में मेरा टेलीग्राम उन्हें सबसे पहले मिला था. वे अध्ययनशील व्यक्ति हैं. हमने साहित्य और संगीत पर खूब बातें कीं. साहित्य विशेषकर कविताओं में उन्हें गहरी रुचि है. मैंने उनकी जितनी कविताएं सुनीं, मुझे सब बहुत अच्छी लगीं. उन्होंने मुझे देशभक्ति गीत गाने का सुझाव दिया. मैंने कहा कि मैं देशभक्ति गीतों के अलावा उनकी कविताएं भी गाना चाहूंगी. मैं उनका बहुत मान-सम्मान करती हूं. हमें राजनीति में उन जैसे लोगों की जरूरत है.

हेमा मालिनी के प्रसंशक हैं अटल बिहारी वाजपेयी
अटल बिहारी वाजपेयी को फिल्मों में भी रुचि रही है. वह अपने समय की प्रसिद्ध सिने अभिनेत्री के प्रशंसक रहे हैं.  सिने अभिनेत्री एवं भारतीय जनता पार्टी की सांसद हेमा मालिनी ने भारतीय जनता पार्टी के स्थापना दिवस समारोह में स्वयं यह बात बताई थी. उन्होंने बताया था कि पूर्व प्रधानमंत्री एवं भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठतम नेता अटल बिहारी वाजपेयी को उनकी एक फिल्म इतनी अधिक पसंद आई कि उन्होंने 25 बार देखी थी. उन्होंने यह भी बताया, मुझे राजनीति में, वह भी विशेषकर भारतीय जनता पार्टी में लाने का श्रेय एक प्रकार से मेरे पूर्व सहकर्मी अभिनेता एवं गुरुदासपुर से सांसद रहे विनोद खन्ना को जाता है, क्योंकि 1999 में गुरुदासपुर से दूसरी बार लोकसभा का चुनाव लड़ रहे खन्ना ने अपने यहां प्रचार के लिए बुलाया था. 
तब तत्कालीन पार्टी अध्यक्ष लालकृष्ण आडवाणी ने उनके लिए प्रचार के लिए कहा था. मां ने भी उनका नाम सुनकर प्रचार करने की अनुमति दे दी थी. तब पहला भाषण मां ने लिखकर दिया था. सभा में बहुत भीड़ थी, जिससे प्रसन्न होकर आडवाणी ने बिहार में प्रचार का न्यौता दे दिया.
उसके बाद तो भारतीय जनता पार्टी के प्रचार में अकसर जाने लगी. वर्ष 2003 में उन्होंने राज्यसभा सदस्य बनाकर एक बड़ा दायित्व भी दे दिया. उन्होंने बताया, मुझे याद है एक बार मैंने पदाधिकारियों से कहा कि मैं भाषणों में अटल बिहारी वाजपेयी का उल्लेख करती हूं, परंतु उनसे कभी मिली नहीं, मिलवाइए. तब वे मुझे उनसे मिलाने ले गए, परंतु मैंने अनुभव किया कि अटल बिहारी वाजपेयी बात करने में कुछ हिचकिचा रहे हैं. इस पर मैंने वहां उपस्थित एक महिला से पूछा, क्या बात है. अटल जी, ठीक से बात क्यों नहीं कर रहे. उन्होंने बताया, वास्तव में ये आपके बहुत बड़े प्रशंसक रहे हैं. उन्होंने 1972 में आई आपकी फिल्म 'सीता और गीता' 25 बार देखी थी. आज अचानक आपको सामने पाकर हिचकिचा रहे हैं'.

हेमा मालिनी ने बताया, इसके बाद तो मैं गुजरात में नरेंद्र मोदी के लिए, तो छत्तीसगढ़ में डॉ. रमण सिंह के लिए, जहां भी पार्टी ने बुलाया प्रचार के लिए जाती रही. परिणाम भी अच्छे ही रहे. संयोग ही था कि सभी जगह भारतीय जनता पार्टी विजयी हुई. लेकिन बिहार में ऐसा न हो सका. उन्होंने कहा, 'कोई बात नहीं अब यूपी में जीते हैं.
-डॉ. सौरभ मालवीय

(पुस्तक- 'राष्ट्रवादी पत्रकारिता के शिखर पुरुष अटल बिहारी वाजपेयी' से)

कटी अंगुली

   


बहुत दिन हुए किसी देश में एक राजा राज्य करता था. उसका मंत्री बड़ा चतुर था. वह राजा को समझाया करता था कि हर व्यक्ति को बिना किसी इच्छा के काम करना चाहिए. फल भगवान पर छोड़ देना चाहिए. मंत्री यह भी कहा करता था कि भगवान जो कुछ करता है, भले के लिए करता है. राजा उसकी बात चुपचाप सुन लेता. जो कुछ होता है, अच्छे के लिए होता है- यह बात राजा के गले से नीचे नहीं उतरती थी.

एक दिन किसी ने मखमली म्यान में लिपटी हुई सोने की तलवार राजा को भेंट की. राजा बड़ा प्रसन्न हुआ. उसने तलवार को म्यान से निकालने की कोशिश की. जल्दबाजी में राजा की एक अंगुली कट गई. राजा बड़ा नाराज हुआ.  मंत्री से पूछने लगा- "बताओ, मेरी अंगुली कटने में कौन-सी भलाई है ?"
मंत्री पहले कुछ बोला नहीं. बाद में उसने कहा कि भगवान जो करता है, अच्छा ही करता है. राजा और भी नाराज हो गया. उसने मंत्री को कारागार में डलवा दिया.

कुछ दिन बाद राजा शिकार खेलने गया. वहां वह रास्ता भूल गया. अपने साथियों से बिछड़कर जंगल में भटक गया. वहां उसे किसी देवता का मंदिर दिखाई दिया. राजा मंदिर के अंदर चला गया. देखा, पुजारी लोग यज्ञ की तैयारी कर रहे थे. पुजारियों ने राजा का बड़ा आदर-सत्कार किया. कहने लगे- "पूजा समाप्त हो गई है. हमें देवता को संतुष्ट करने के लिए किसी मनुष्य की बलि चढ़ानी है. यह आपका सौभाग्य है कि आप यहां पहुंच गए. आपकी बलि पाकर देवता अत्यंत प्रसन्न होंगे."

बलि की बात सुन राजा घबरा गया. इतने में पुजारी की दृष्टि राजा की अंगुली पर पड़ गई. उसने कहा- "राजा के सभी अंग अखंड नहीं हैं. अंगुली कटी है. उसकी बलि नहीं चढ़ाई जा सकती."

राजा ने राहत की सांस ली. कपड़े पहने और घोड़े पर बैठ राजधानी वापस आ गया. कारागार से मंत्री को लाया गया. राजा ने उससे पूछा- मेरी अंगुली कटने में क्या भलाई थी, यह बात तो मेरी समझ में आ गई है. अब यह बताओ कि तुम्हारे कारागार जाने में क्या भलाई थी ?"

मंत्री ने उत्तर दिया- " महाराज, यदि आप मुझे जेल नहीं भेजते, तो शिकार पर मैं आपके साथ जरूर जाता. अंगुली कटे होने के कारण पुजारी आपको तो छोड़ देते, मुझे बलि चढ़ा देते. आपने मुझे कारागार में भेज दिया, इससे मेरी जान बच गई."

उत्तर सुनकर राजा संतुष्ट हो गया. उसने मंत्री को पुरस्कार दिया. यह बात गांठ बांध ली कि भगवान जो कुछ करता है, वह भलाई के लिए ही करता है.
-डॉ. सौरभ मालवीय

(पुस्तक- 'राष्ट्रवादी पत्रकारिता के शिखर पुरुष अटल बिहारी वाजपेयी' से)

संत-असंत

   


संत एकनाथ के पिताजी का श्राद्ध था. उन्होंने ब्राह्मणों को आमंत्रित किया. तरह-तरह की मिठाइयां एवं पकवान तैयार कराए. ब्राह्मणों के आने की प्रतीक्षा करने लगे.
तभी एकनाथ ने देखा- एक महार, उसकी पत्नी तथा बच्चे दरवाजे पर खड़े कह रहे हैं- "महाराज, हम कई दिन से भूखे हैं. कुछ खाना देकर हमारे प्राण बचाइए."
"आइए दरिद्रनारायण, अंदर आइए." संत उन्हें देखते ही खड़े हो गए.
"बैठिए, भोजन कीजिए." उन्होंने उनके सामने भोजन परोसवा दिया. सभी आनंदपूर्वक भोजन करने लगे. 
वे लोग भोजन कर ही रहे थे कि ब्राह्मण आ गए. संत एकनाथ ने आदर के साथ उनका भी स्वागत किया. ब्राह्मण यह देखकर बुरी तरह बिगड़ गए. सोचने लगे- ’ श्राद्ध के लिए बनाया भोजन हमसे पहले ही नीची जाति के लोग जीम रहे हैं.’
"तू संत है या ढोंगी ? हमारा अपमान करने के लिए बुलाया था या अपने पितरों की तृप्ति के लिए ?" पंडित बड़बड़ाने लगे.
एकनाथ हाथ जोड़कर बोले- "महाराज, ये भूख से व्याकुल थे. इन्हें भोजन न कराता, तो महापाप का भागी बनता. आप आदर के साथ भोजन करें."
"नहीं, हम भूखे ही जा रहे हैं. अब तेरे पितर भी भूखे रहेंगे. तू नरक में जाएगा." ब्राह्मण क्रोध में भरकर वहां से चल दिए.
अचानक महार परिवार के बीच एक आकृति उभर आई. सबने देखा, वह संत एकनाथ के स्वर्गवासी पिता की आकृति थी. उन्होंने लौटते हुए पंडितों से कहा- "ब्राह्मणों, मैं पूरी तरह से तृप्त हूं इन भूखों को खाना खिलाने से मैं जितना प्रसन्न हूं, उतना तुम जैसे घमंडियों को खाना खिलाकर कभी न होता.
यह सुनते ही ब्राह्मणों का घमंड चूर-चूर हो गया. उनका सिर भी झुका और भूखा अलग से रहना पड़ा.
-डॉ. सौरभ मालवीय

(पुस्तक- 'राष्ट्रवादी पत्रकारिता के शिखर पुरुष अटल बिहारी वाजपेयी' से)

Tuesday, August 4, 2026

पुस्तक भेंट

 

आज का दिन शुभ रहा।
लखनऊ में तीन सुन्दर मंदिरों में जाने का अवसर मिला- हनुमत धाम, हनुमान सेतु और लखनऊ विश्वविद्यालय।
लखनऊ विश्वविद्यालय में अपनी पत्रकारिता की दुनिया के पहले गुरु, विभागाध्यक्ष डॉ. सौरभ मालवीय सर से मिलने का मौका बना। बैचलर्स की पढ़ाई पूरी होने के इतने लंबे समय बाद यह पहली मुलाकात थी।
बातों-बातों में सर ने याद दिलाया कि समय का चक्र कैसे घूमता है। जीवन हमें कई बार उन्हीं लोगों और उन्हीं परिस्थितियों के सामने फिर से लाकर खड़ा कर देता है, बस किरदार और समय बदल जाते हैं।
सर के मार्गदर्शन में नोएडा कैंपस से पत्रकारिता की पढ़ाई पूरी की। फिर सर भोपाल चले गए। कुछ समय बाद मेरा सफर भी भोपाल तक पहुंचा। अब नियति दोनों को लखनऊ ले आई है।
सर ने अपनी सुंदर कृति 'भारतीय पत्रकारिता के स्वर्णिम हस्ताक्षर' भेंट की। यह पुस्तक मेरे लिए गुरु के स्नेह और आशीर्वाद का प्रतीक है।
अब लखनऊ में समय-समय पर सर का सानिध्य और मार्गदर्शन मिलता रहेगा। गुरु का साथ जीवन की सबसे बड़ी पूंजी होता है।
-गौरव तिवारी 

टीवी पर लाइव

 




युवा वर्ग से संवाद का उद्देश्य नई पीढ़ी की सोच को समझना और उनके साथ खुला संवाद स्थापित करना है। सरसंघचालक मोहन भागवत जी ने कहा है कि आज का युवा केवल आदेश नहीं मानता, बल्कि हर बात का तर्क और कारण जानना चाहता है। इसलिए समाज के वरिष्ठों को युवाओं के साथ समय बिताना चाहिए, स्नेहपूर्वक संवाद करना चाहिए और उनकी जिज्ञासाओं का उत्तर देना चाहिए.

आत्मीय मिलन

आज कुशीनगर के लोकप्रिय विधायक श्री पी. एन. पाठक जी के आवास पर पारिवारिक एवं आत्मीय वातावरण में मिलन का सौभाग्य प्राप्त हुआ। स्नेह, आत्मीयता ...