Saturday, November 7, 2026

अंधेरे पर प्रकाश की जीत का पर्व है दीपावली

डॊ. सौरभ मालवीय
असतो मा सद्गमय।
तमसो मा ज्योतिर्गमय।
मृत्योर्मा अमृतं गमय।
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
अर्थात्
असत्य से सत्य की ओर।
अंधकार से प्रकाश की ओर।
मृत्यु से अमरता की ओर।
ॐ शांति शांति शांति।।
अर्थात् इस प्रार्थना में अंधकार से प्रकाश की ओर जाने की कामना की गई है. दीपों का पावन पर्व दीपावली भी यही संदेश देता है. यह अंधकार पर प्रकाश की जीत का पर्व है. दीपावली का अर्थ है दीपों की श्रृंखला. दीपावली शब्द की उत्पत्ति संस्कृत के दो शब्दों 'दीप' एवं 'आवली' अर्थात 'श्रृंखला' के मिश्रण से हुई है. दीपावली का पर्व कार्तिक अमावस्या को मनाया जाता है. वास्तव में दीपावली एक दिवसीय पर्व नहीं है, अपितु यह कई त्यौहारों का समूह है, जिनमें धन त्रयोदशी अर्थात धनतेरस, नरक चतुर्दशी, दीपावली, गोवर्धन पूजा और भैया दूज सम्मिलित हैं. दीपावली महोत्सव कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी से शुक्ल पक्ष की दूज तक हर्षोल्लास से मनाया जाता है. धनतेरस के दिन बर्तन खरीदना शुभ माना जाता है. तुलसी या घर के द्वार पर दीप जलाया जाता है. नरक चतुर्दशी के दिन यम की पूजा के लिए दीप जलाए जाते हैं.  गोवर्धन पूजा के दिन लोग गाय-बैलों को सजाते हैं तथा गोबर का पर्वत बनाकर उसकी पूजा करते हैं. भैया दूज पर बहन अपने भाई के माथे पर तिलक लगाकर उसके लिए मंगल कामना करती है. इस दिन यमुना नदी में स्नान करने की भी परंपरा है.

प्राचीन हिंदू ग्रंथ रामायण के अनुसार दीपावली के दिन श्रीरामचंद्र अपने चौदह वर्ष के वनवास के पश्चात अयोध्या लौटे थे. अयोध्यावासियों ने श्रीराम के स्वागत में घी के दीप जलाए थे. प्राचीन हिन्दू महाकाव्य महाभारत के अनुसार दीपावली के दिन ही 12 वर्षों के वनवास एवं एक वर्ष के अज्ञातवास के बाद पांडवों की वापसी हुई थी. मान्यता यह भी है कि दीपावली का पर्व भगवान विष्णु की पत्नी देवी लक्ष्मी से संबंधित है. दीपावली का पांच दिवसीय महोत्सव देवताओं और राक्षसों द्वारा दूध के लौकिक सागर के मंथन से पैदा हुई लक्ष्मी के जन्म दिवस से प्रारंभ होता है. समुद्र मंथन से प्राप्त चौदह रत्नों में लक्ष्मी भी एक थीं, जिनका प्रादुर्भाव कार्तिक मास की अमावस्या को हुआ था. उस दिन से कार्तिक की अमावस्या लक्ष्मी-पूजन का त्यौहार बन गया. दीपावली की रात को लक्ष्मी ने अपने पति के रूप में विष्णु को चुना और फिर उनसे विवाह किया था. मान्यता है कि दीपावली के दिन विष्णु की बैकुंठ धाम में वापसी हुई थी.
कृष्ण भक्तों के अनुसार इस दिन भगवान श्रीकृष्ण ने अत्याचारी राजा नरकासुर का वध किया था. एक पौराणिक कथा के अनुसार भगवान विष्णु ने नरसिंह रूप धारणकर हिरण्यकश्यप का वध किया था. यह भी कहा जाता है कि इसी दिन समुद्र मंथन के पश्चात धन्वंतरि प्रकट हुए. मान्यता है कि इस दिन देवी लक्ष्मी प्रसन्न रहती हैं. जो लोग इस दिन देवी लक्ष्मी की पूजा करते हैं, उन पर देवी की विशेष कृपा होती है. लोग लक्ष्मी के साथ-साथ संकट विमोचक गणेश, विद्या की देवी सरस्वती और धन के देवता कुबेर की भी पूजा-अर्चना करते हैं.

अन्य हिन्दू त्यौहारों की भांति दीपावली भी देश के अन्य राज्यों में विभिन्न रूपों में मनाई जाती है. बंगाल और ओडिशा में दीपावली काली पूजा के रूप में मनाई जाती है. इस दिन यहां के हिन्दू देवी लक्ष्मी के स्थान पर काली की पूजा-अर्चना करते हैं. उत्तर प्रदेश के मथुरा और उत्तर मध्य क्षेत्रों में इसे भगवान श्री कृष्ण से जुड़ा पर्व माना जाता है. गोवर्धन पूजा या अन्नकूट पर श्रीकृष्ण के लिए 56 या 108 विभिन्न व्यंजनों का भोग लगाया जाता है.

दीपावली का ऐतिहासिक महत्व भी है. हिन्दू राजाओं की भांति मुगल सम्राट भी दीपावली का पर्व बड़ी धूमधाम से मनाया करते थे. सम्राट अकबर के शासनकाल में दीपावली के दिन दौलतखाने के सामने ऊंचे बांस पर एक बड़ा आकाशदीप लटकाया जाता था. बादशाह जहांगीर और मुगल वंश के अंतिम सम्राट बहादुर शाह जफर ने भी इस परंपरा को बनाए रखा. दीपावली के अवसर पर वे कई समारोह आयोजित किया करते थे. शाह आलम द्वितीय के समय में भी पूरे महल को दीपों से सुसज्जित किया जाता था. कई महापुरुषों से भी दीपावली का संबंध है. स्वामी रामतीर्थ का जन्म एवं महाप्रयाण दोनों दीपावली के दिन ही हुआ था. उन्होंने दीपावली के दिन गंगातट पर स्नान करते समय समाधि ले ली थी. आर्य समाज के संस्थापाक महर्षि दयानंद ने दीपावली के दिन अवसान लिया था.

जैन और सिख समुदाय के लोगों के लिए भी दीपावली महत्वपूर्ण है. जैन समाज के लोग दीपावली को महावीर स्वामी के निर्वाण दिवस के रूप में मनाते हैं. जैन मतावलंबियों के अनुसार चौबीसवें तीर्थकर महावीर स्वामी को इस दिन मोक्ष की प्राप्ति हुई थी.  इसी दिन संध्याकाल में उनके प्रथम शिष्य गौतम गणधर को केवल ज्ञान की प्राप्ति हुई थी. जैन धर्म के मतानुसार लक्ष्मी का अर्थ है निर्वाण और सरस्वती का अर्थ है ज्ञान. इसलिए प्रातःकाल जैन मंदिरों में भगवान महावीर स्वामी का निर्वाण उत्सव मनाया जाता है और लड्डू का भोग लगाया जाता है. सिख समुदाय के लिए दीपावली का दिन इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसी दिन अमृतसर में वर्ष 1577 में स्वर्ण मंदिर का शिलान्यास हुआ था. वर्ष 1619 में दीपावली के दिन ही सिखों के छठे गुरु हरगोबिन्द सिंह जी को जेल से रिहा किया गया था.

दीपावली से पूर्व लोग अपने घरों, दुकानों आदि की सफाई करते हैं. घरों में मरम्मत, रंग-रोगन, सफ़ेदी आदि का कार्य कराते हैं. दीपावली पर लोग नये वस्त्र पहनते हैं. एक-दूसरे को मिष्ठान और उपहार देकर उनकी सुख-समृद्धि की कामना करते हैं. घरों में रंगोली बनाई जाती है, दीप जलाए जाते हैं. मोमबत्तियां जलाई जाती हैं. घरों व अन्य इमारतों को बिजली के रंग-बिरंगे बल्बों की झालरों से सजाया जाता है. रात में चहुंओर प्रकाश ही प्रकाश दिखाई देता है. आतिशबाज़ी भी की जाती है. अमावस की रात में आकाश में आतिशबाज़ी का प्रकाश बहुत ही मनोहारी दृश्य बनाता है.

दीपावली का धार्मिक ही नहीं, सांस्कृतिक और सामाजिक महत्व भी है. दीपावली पर खेतों में खड़ी खरीफ़ की फसल पकने लगती है, जिसे देखकर किसान फूला नहीं समाता. इस दिन व्यापारी अपना पुराना हिसाब-किताब निपटाकर नये बही-खाते तैयार करते हैं.

दीपावली बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है, लेकिन कुछ लोग इस दिन दुआ खेलते हैं और शराब पीते हैं. अत्यधिक आतिशबाज़ी के कारण ध्वनि और वायु प्रदूषण भी बढ़ता है. इसलिए इस बात की आवश्यकता है कि दीपों के इस पावन पर्व के संदेश को समझते हुए इसे पूरी श्रद्धा और आस्था के साथ मनाया जाए.

Wednesday, November 4, 2026

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प्रधानमंत्री पद की गरिमा और संसदीय परंपराओं को समझना आवश्यक है। राहुल गांधी द्वारा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को सार्वजनिक बहस की चुनौती देना, विपक्ष के नेता की भूमिका और संसदीय जिम्मेदारियों को लेकर अपरिपक्व राजनीतिक दृष्टिकोण के रूप में देखा जा सकता है। विपक्ष का दायित्व केवल चुनौती देना नहीं, बल्कि सदन में तथ्यों, तर्कों और नीतिगत विकल्पों के आधार पर सरकार को जवाबदेह बनाना भी है। लोकतंत्र में संवाद का सबसे प्रभावी मंच संसद है। 

Tuesday, November 3, 2026

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जो देश का नागरिक है, उसे मतदान का अधिकार और अवसर मिलना चाहिए। चुनाव आयोग मतदाता हितैषी संस्था है। उसका उद्देश्य किसी का नाम हटाना नहीं, बल्कि मतदाता सूची को पारदर्शी, शुद्ध और त्रुटिरहित बनाना है। हर पात्र नागरिक का नाम मतदाता सूची में रहे और कोई भी अपात्र व्यक्ति सूची में न रहे। लोकतंत्र की मजबूती निष्पक्ष चुनाव और शत-प्रतिशत पात्र मतदाताओं की भागीदारी में ही निहित है।

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बागेश्वर धाम के पीठाधीश्वर का बयान किसी राजनीतिक दृष्टिकोण से नहीं, बल्कि एक संत के भाव, आस्था और सामाजिक सरोकारों के रूप में समझा जाना चाहिए। संतों की वाणी में समाज के प्रति चिंता और अपनी सांस्कृतिक मान्यताओं को व्यक्त करने का भाव होता है।

इसे राजनीतिक चश्मे से देखने के बजाय उसके मूल भाव और संदर्भ को समझना चाहिए। किसी बयान के एक अंश को लेकर अनावश्यक विवाद खड़ा करना उचित नहीं है।

Sunday, November 1, 2026

संस्कार से व्यक्ति, व्यक्ति से समाज और समाज से राष्ट्र का निर्माण : डॉ. सौरभ मालवीय










दो दिवसीय 24वें प्रांतीय संस्कृति महोत्सव एवं गणित-विज्ञान मेले का भव्य समापन, विभिन्न प्रतियोगिताओं के विजेता हुए सम्मानित

तिर्वा (कन्नौज)। सरस्वती विद्या मंदिर इंटर कॉलेज तिर्वा एवं श्रीमती राम दुलारी गहोई सरस्वती शिशु मंदिर तिर्वा में विद्या भारती अखिल भारतीय शिक्षा संस्थान, पूर्वी उत्तर प्रदेश क्षेत्र के तत्वावधान में आयोजित दो दिवसीय 24वें प्रांतीय संस्कृति महोत्सव एवं गणित-विज्ञान मेले का भव्य समापन हुआ। समापन समारोह में मुख्य अतिथि लखनऊ विश्वविद्यालय के पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग के अध्यक्ष तथा विद्या भारती पूर्वी उत्तर प्रदेश क्षेत्र के क्षेत्रीय मंत्री डॉ. सौरभ मालवीय रहे। विशिष्ट अतिथि के रूप में डॉ. भीमराव आंबेडकर राजकीय मेडिकल कॉलेज, तिर्वा के प्राचार्य डॉ. पुष्पेंद्र चहर उपस्थित रहे। 

इस अवसर पर विद्या भारती कानपुर प्रांत के प्रांत संगठन मंत्री श्री रजनीश पाठक, प्रदेश निरीक्षक श्री अयोध्या प्रसाद मिश्र, प्रांतीय विज्ञान संयोजक श्री ज्ञानेंद्र जी, सह संयोजक श्री राजीव जी, सरस्वती शिशु मंदिर के प्रबंधक श्री राजेंद्र प्रसाद गुप्त तथा सरस्वती विद्या मंदिर इंटर कॉलेज तिर्वा के प्रबंधक श्री त्रिलोकी नाथ चतुर्वेदी सहित अनेक गणमान्य अतिथि उपस्थित रहे।

कार्यक्रम का शुभारंभ अतिथियों द्वारा मां सरस्वती के समक्ष दीप प्रज्ज्वलन एवं सरस्वती वंदना के साथ हुआ। विद्यालय के प्रबंधक श्री राजेंद्र प्रसाद गुप्त, श्री त्रिलोकी नाथ चतुर्वेदी तथा प्रधानाचार्य श्री अनिल कुमार मिश्रा एवं श्री आशीष कुमार दीक्षित ने अतिथियों का अंगवस्त्र एवं मां अन्नपूर्णा का चित्र भेंटकर स्वागत एवं सम्मान किया।

समापन समारोह को संबोधित करते हुए मुख्य अतिथि डॉ. सौरभ मालवीय ने कहा कि संस्कार से व्यक्ति, व्यक्ति से समाज और समाज से राष्ट्र का निर्माण होता है। यही विद्या भारती की शिक्षा पद्धति का मूल उद्देश्य और विशिष्ट पहचान है। शिक्षा का उद्देश्य केवल ज्ञान और कौशल प्रदान करना नहीं, बल्कि विद्यार्थियों में संस्कार, संवेदना, सामाजिक दायित्व और राष्ट्र के प्रति समर्पण का भाव विकसित करना भी है।

उन्होंने कहा कि 'देश हमें देता है सबकुछ, हम भी तो कुछ देना सीखें' का भाव विद्या भारती के विद्यालयों में अध्ययनरत विद्यार्थियों के व्यक्तित्व का आधार बनता है। मानवता के कष्टों को दूर करने तथा समाज और राष्ट्र के कल्याण के लिए चिंतन करना ही हमारी शिक्षा की विशिष्टता है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण के साथ सामाजिक सरोकारों को जोड़ना समय की आवश्यकता है।

विद्यार्थियों को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि आप सभी भविष्य के वैज्ञानिक और अनुसंधानकर्ता हैं। इस विज्ञान मेले में आपकी सहभागिता, सफलता और अनुभव आपकी प्रतिभा को नई दिशा देंगे। यह मंच आपको नए प्रयोग करने, प्रश्न पूछने, जिज्ञासु बनने तथा अनुसंधान और नवाचार के क्षेत्र में आगे बढ़ने की प्रेरणा प्रदान करेगा।

डॉ. मालवीय ने कहा कि विज्ञान मेला एवं वैदिक गणित केवल प्रतियोगिताओं तक सीमित नहीं हैं, बल्कि भारतीय ज्ञान परंपरा, श्रुति परंपरा और ऋषि परंपरा के पुनरुत्थान के सशक्त माध्यम हैं। इनका उद्देश्य विद्यार्थियों में संस्कारों के साथ अंतर्निहित वैज्ञानिक प्रतिभा, तार्किक क्षमता, अनुसंधान कौशल और नवाचार की भावना विकसित करना है। भारतीय ज्ञान-विज्ञान की समृद्ध परंपरा को पुनर्जीवित कर नई पीढ़ी तक पहुंचाना आज की महत्वपूर्ण आवश्यकता है।

उन्होंने कहा कि वंदना सत्र, भोजन मंत्र और चित्र प्रदर्शनी जैसे माध्यम विद्यार्थियों में भारतीय संस्कृति के प्रति गौरव तथा अपनी ज्ञान परंपरा के प्रति सम्मान का भाव जागृत करते हैं। भारतीय परंपरा में ज्ञान, विज्ञान और जीवन मूल्यों का अद्भुत समन्वय रहा है। आवश्यकता है कि हम इस विरासत को आधुनिक वैज्ञानिक दृष्टिकोण के साथ आगे बढ़ाएं।

विज्ञान मेले में शिशु, बाल, किशोर एवं तरुण वर्ग के विद्यार्थियों ने विज्ञान प्रदर्श, प्रश्न मंच, पत्र वाचन, विज्ञान वार्ता एवं विज्ञान प्रयोग सहित विभिन्न प्रतियोगिताओं में अपनी वैज्ञानिक प्रतिभा, तार्किक क्षमता और सृजनात्मक सोच का परिचय दिया। विभिन्न विधाओं में प्रथम स्थान प्राप्त करने वाले भैया-बहिनों को अतिथियों द्वारा मेडल एवं शील्ड प्रदान कर सम्मानित किया गया।

कार्यक्रम के अंत में संभाग निरीक्षक श्री शिवकरन जी ने सभी अतिथियों, प्रतिभागियों, मार्गदर्शक आचार्यों एवं आयोजन को सफल बनाने में योगदान देने वाले कार्यकर्ताओं के प्रति आभार व्यक्त किया।

दो दिवसीय इस आयोजन ने विद्यार्थियों को अपनी वैज्ञानिक प्रतिभा प्रदर्शित करने, नए विचारों को अभिव्यक्त करने तथा अनुसंधान एवं नवाचार के क्षेत्र में आगे बढ़ने का प्रेरणादायी अवसर प्रदान किया।

Saturday, October 31, 2026

प्रांतीय ज्ञान-विज्ञान मेला एवं संस्कृति महोत्सव का भव्य शुभारंभ

 









बाल वैज्ञानिकों की प्रतिभा, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और नवाचार ने अतिथियों को किया प्रभावित
चौखड़िया, मैगलगंज (खीरी), 31 अक्टूबर। जन शिक्षा समिति, अवध प्रांत द्वारा श्रीपाल सिंह सरस्वती विद्या मंदिर इंटर कॉलेज, चौखड़िया, मैगलगंज, खीरी में आयोजित प्रांतीय ज्ञान-विज्ञान मेला एवं संस्कृति महोत्सव का शनिवार को भव्य शुभारंभ हुआ। उत्साह, उमंग और उल्लास से परिपूर्ण वातावरण में आयोजित इस महोत्सव में विद्यार्थियों की वैज्ञानिक प्रतिभा, रचनात्मकता, नवाचार और सांस्कृतिक अभिव्यक्ति की आकर्षक झलक देखने को मिली।
कार्यक्रम का उद्घाटन विद्या भारती पूर्वी उत्तर प्रदेश के क्षेत्रीय मंत्री डॉ. सौरभ मालवीय, कस्ता विधानसभा क्षेत्र के विधायक श्री सौरभ सिंह सोनू तथा जन शिक्षा समिति, अवध प्रांत के अध्यक्ष डॉ. सत्येंद्र बहादुर सिंह ने मां सरस्वती के समक्ष दीप प्रज्ज्वलन एवं पुष्पार्चन कर संयुक्त रूप से किया।
इस अवसर पर प्रदेश निरीक्षक अवध प्रांत श्री मिथिलेश कुमार अवस्थी, विद्यालय के प्रधानाचार्य श्री उत्तम कुमार मिश्रा, प्रबंधक श्री राधेश्याम गुप्ता, अध्यक्ष श्री छविनाथ सिंह यादव, कोषाध्यक्ष श्री राम मोहन गुप्ता, श्री शैलेंद्र बाजपेयी एवं संभाग निरीक्षक श्री श्याम मनोहर शुक्ला सहित अनेक गणमान्य अतिथि उपस्थित रहे।
कार्यक्रम में दोनों विद्यालयों की प्रबंध समितियों के पदाधिकारियों एवं सदस्यों ने सहभागिता की। मैगलगंज से श्री विपिन गुप्ता, श्री पवन गुप्ता, श्री अमित मिश्रा, श्री शेर सिंह राठौड़ एवं श्री महेंद्र सिंह सहित अनेक गणमान्य नागरिक उपस्थित रहे। अवध प्रांत के विभिन्न विद्यालयों के प्रधानाचार्यों की भी गरिमामयी उपस्थिति रही।
इस प्रांतीय आयोजन में जन शिक्षा समिति, पूर्वी उत्तर प्रदेश क्षेत्र के लगभग 415 प्रतिभागियों ने उत्साहपूर्वक सहभागिता की। उद्घाटन के उपरांत अतिथियों ने विज्ञान प्रदर्शनी, गणित प्रदर्शनी एवं सांस्कृतिक प्रदर्शनी का अवलोकन किया। बाल वैज्ञानिकों द्वारा प्रस्तुत विभिन्न मॉडलों एवं परियोजनाओं की जानकारी लेते हुए अतिथियों ने विद्यार्थियों की वैज्ञानिक जिज्ञासा, तार्किक क्षमता, रचनात्मकता और नवाचार की सराहना की।
मंचीय कार्यक्रम का शुभारंभ मां सरस्वती के समक्ष दीप प्रज्ज्वलन एवं पुष्पार्चन के साथ हुआ। कार्यक्रम का कुशल संचालन संभाग निरीक्षक श्री कैलाश चंद्र ने किया तथा अतिथियों एवं उपस्थित गणमान्य जनों का परिचय संभाग निरीक्षक श्री श्याम मनोहर शुक्ला ने कराया।
अपने उद्बोधन में डॉ सौरभ मालवीय ने ज्ञान-विज्ञान, अनुसंधान, नवाचार और भारतीय संस्कृति के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि इस प्रकार के आयोजन विद्यार्थियों की अंतर्निहित प्रतिभा को निखारने तथा उनमें वैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित करने का सशक्त माध्यम हैं। विद्यार्थियों को जिज्ञासु बने रहने, निरंतर अध्ययन करने और अपनी प्रतिभा एवं परिश्रम से नए कीर्तिमान स्थापित करने के लिए प्रेरित किया गया।
प्रांतीय ज्ञान-विज्ञान मेला एवं संस्कृति महोत्सव केवल प्रतिभा प्रदर्शन का मंच नहीं, बल्कि विद्यार्थियों में वैज्ञानिक चेतना, तार्किक चिंतन, रचनात्मकता और सांस्कृतिक मूल्यों के समन्वय का महत्वपूर्ण प्रयास है। ऐसे आयोजन भारतीय ज्ञान परंपरा और आधुनिक विज्ञान के बीच सार्थक संवाद स्थापित करते हुए विद्यार्थियों को भविष्य की चुनौतियों के लिए तैयार करते हैं।
निश्चित रूप से यह महोत्सव प्रतिभागी भैया-बहनों को अपनी प्रतिभा प्रदर्शित करने, एक-दूसरे से सीखने, अनुभव साझा करने और नवाचार की नई संभावनाओं की ओर आगे बढ़ने का उत्कृष्ट अवसर प्रदान करेगा। 

अंधेरे पर प्रकाश की जीत का पर्व है दीपावली

डॊ. सौरभ मालवीय असतो मा सद्गमय। तमसो मा ज्योतिर्गमय। मृत्योर्मा अमृतं गमय। ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥ अर्थात् असत्य से सत्य की...