Saturday, August 29, 2026

आयुष्मान भारत : अब महंगा उपचार भी संभव हुआ


देश में एक बड़ी जनसंख्या निवास करती है। जनसंख्या के अनुपात में अभी देश में स्वास्थ्य केंद्रों की कमी है। लोगों को समय पर पर्याप्त स्वास्थ्य सुविधाएं न मिल पाने के समाचार अकसर मिलते रहते हैं। रोगियों को समय पर स्वास्थ्य सुविधाएं मिलना अति आवश्यक है। इसके अभाव में उनका जीवन संकट में भी पड़ सकता है। ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी उतनी स्वास्थ्य सेवाएं नहीं पहुंच पाई हैं, जितनी होनी चाहिए। गंभीर रोग होने की स्थिति में गरीब लोग उपचार नहीं करा पाते। उपचार के अभाव में रोगी की मृत्यु तक हो जाती है। इस समस्या को ध्यान में रखते हुए केंद्र सरकार ने स्वास्थ्य आश्वासन कार्यक्रम आयुष्मान भारत प्रारंभ किया है। सरकार सभी को स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराने के लिए प्रतिबद्ध है। 

डॊ. भीमराव अम्बेडकर की जयंती पर 14 अप्रैल, 2018 को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने छत्तीसगढ़ के बीजापुर में स्वास्थ्य आश्वासन कार्यक्रम आयुष्मान भारत शुभारंभ किया और स्वास्थ्य एवं कल्याण केंद्र का उद्घाटन भी किया। इस अवसर पर प्रधानमंत्री ने कहा कि आयुष्मान भारत योजना सामाजिक असंतुलन को समाप्त करने एवं देश में सामाजिक न्याय सुनिश्चित करने में काफी प्रभावी साबित होगी। उन्होंने कहा कि आयुष्मान भारत का अगला लक्ष्य चिकित्सकीय इलाज के लिए गरीबों को पांच लाख रुपये तक की वित्तीय सहायता उपलब्ध कराना है।

केंद्र सरकर ने 1 फरवरी,  2018  को आयुष्मान कार्यक्रम के अंतर्गत स्वास्थ्य के क्षेत्र में दो महत्वपूर्ण पहलों की घोषणा की। केंद्रीय वित्त एवं कॉर्पोरेट मामलों के मंत्री अरुण जेटली ने संसद में आम बजट 2018-19 प्रस्तुत करते हुए कहा कि इस योजना का उद्देश्य स्वास्थ्य से जुड़ी चुनौतियों से समग्र रूप से निपटना हैं। इसके अंतर्गत प्राथमिक, द्वितीय और तृतीय क्षेत्रों में स्वास्थ्य को बेहतर बनाने पर ध्यान दिया जाएगा।

पहले कार्यक्रम स्वास्थ्य एवं देखभाल केंद्र के अंतर्गत राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति 2017 में देश की स्वास्थ्य प्रणाली की नींव के रूप में स्वास्थ्य और आरोग्य केंद्रों की परिकल्पना की गई है। ये डेढ़ लाख स्वास्थ्य केंद्र स्वास्थ्य देखरेख प्रणाली को लोगों के घरों के पास लाएंगे। ये स्वास्थ्य केंद्र असंचारी रोगों और मातृत्व तथा बाल स्वास्थ्य सेवाओं सहित व्यापक स्वास्थ्य देखरेख उपलब्ध कराएंगे। ये केंद्र आवश्यक दवाओं और नैदानिक सेवा भी नि:शुल्क उपलब्ध कराएंगे। इस महत्वपूर्ण कार्य के लिए 1200 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है। इन केंद्रों को अपनाने के लिए सीएसआर और लोकोपकारी संस्थाओं के माध्यम से निजी क्षेत्र को आमंत्रित किया गया है।

दूसरी राष्ट्रीय स्वास्थ्य संरक्षण योजना के अंतर्गत इन दूरगामी पहलों के तहत 10 करोड़ से अधिक गरीब एवं कमजोर परिवारों अर्थात लगभग 50 करोड़ लोगों को दायरे में लाने के लिए एक फ्लेगशिप राष्ट्रीय स्वास्थ्य संरक्षण योजना प्रारंभ की जाएगी। इसके अंतर्गत द्वितीय और तृतीय देखरेख अस्पताल में भर्ती होने के लिए प्रति परिवार पांच लाख रुपये प्रति वर्ष तक का कवरेज प्रदान किया जाएगा। यह विश्व का सबसे बड़ा सरकारी वित्त पोषित स्वास्थ्य देखरेख कार्यक्रम होगा। इस कार्यक्रम के सूचारू कार्यान्वयन के लिए पर्याप्त धन राशि उपलब्ध कराई जाएगी।

वित्त मंत्री के अनुसार आयुष्मान भारत के अंतर्गत ये दो स्वास्थ्य क्षेत्र की पहलें नये भारत वर्ष 2022 का निर्माण करेंगी और उनसे संवर्धित उत्पादकता, कल्याण में वृद्धि होगी और इनसे मजदूरी की हानि और गरीबी से बचा जा सकेगा। इन योजनाओं से विशेष कर महिलाओं के लिए रोजगार के लाखों अवसर सृजित होंगे। गुणवत्तापूर्ण चिकित्सा शिक्षा और स्वास्थ्य देखरेख की पहुंच में वृद्धि करने के उद्देश्य से देश में मौजूदा जिला अस्पतालों को अपग्रेड करके 24 नये सरकारी चिकित्सा कॉलेजों और अस्पतालों की स्थापना की जाएगी। इस कदम से सुनिश्चित होगा कि प्रत्येक तीन संसदीय क्षेत्रों के लिए कम से कम एक चिकित्सा कॉलेज और देश के प्रत्येक राज्य में कम से कम एक सरकारी चिकित्सा कॉलेज उपलब्ध हो।

उल्लेखनीय है कि इस योजना के अंतर्गत केवल वही लोग लाभ ले सकते हैं, जिनका नाम सामाजिक-आर्थिक एवं जाति पर आधारित जनगणना एसईसीसी-2011 के अंतर्गत पंजीकृत हो। इस योजना का लाभ लेने के लिए आधार कार्ड का होना अति आवश्यक है। इसके अतिरिक्त आधार कार्ड का बैंक खाते से लिंक होना भी आवश्यक है। इस बात का प्रमाण पत्र भी होना चाहिए कि इच्छुक व्यक्ति इस योजना का लाभ लेने का पात्र है। इसके साथ ही फोटो, पहचान पत्र, परिवार प्रमाण पत्र, आय प्रमाण पत्र,  आयु के लिए प्रमाण पत्र और पते का प्रमाण पत्र आदि जमा करना भी अनिवार्य होगा।

इस योजना के माध्यम से गरीब परिवारों को बीमारी की स्थिति में वित्तीय सहायता की जाएगी। यह एक प्रकार की बीमा योजना है। इस योजना का लाभ लेने के लिए व्यक्ति को इसके अंतर्गत पंजीकरण करवाना होगा। इसके साथ ही उसे 1100 से 1200 रुपये तक की प्रीमियम राशि जमा करनी होगी।  यह प्रीमियम राशि प्रत्येक वर्ष भरनी होगी। इस राशि को भरने के पश्चात ही योजना का लाभ लिया जा सकेगा।

नि:संदेह यह योजना स्वास्थ्य के क्षेत्र में बहुत लाभदायक साबित होगी। इसके कारण वे लोग भी अपना उपचार कराने में सक्षम होंगे, जो गंभीर रोगों से पीड़ित हैं और उनके उपचार में बहुत धनराशि खर्च होती है।



(डॉ सौरभ मालवीय की पुस्तक- 'विकास के पथ पर भारत' से)

राष्ट्रीय आयुष मिशन : एक पंथ, दो काज


भारत में औषधियों के भंडार हैं। ये औषधियां आयुर्वेदिक, सिद्ध, यूनानी और होम्योपैथी दवाएं बनाने के काम आती हैं। इन औषधियों की अनेक विशेषताएं हैं। ये सहज उपलब्ध होने के साथ-साथ सस्ती भी हैं। अनेक असाध्य रोगों में प्रभावी सिद्ध हुई हैं। प्राचीन काल से ही देश में इन औषधियों से उपचार किया जाता रहा है। इन भारतीय औषधि प्रणालियों में स्वास्थ्य सेवा प्रदाता बनाने की भी अपार संभावनाएं हैं, जिनकी लोगों को अत्यधिक आवश्यकता है।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अध्यक्षता वाले केंद्रीय मंत्रिमंडल ने सितम्बर, 2014 को राष्ट्रीय आयुष मिशन को उसके महत्वपूर्ण और लचीले घटकों के साथ शुभारम्भ करने की अनुमति प्रदान की थी। स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने 1995 में अलग विभाग बनाकर भारतीय चिकित्सा और होम्योपैथी पद्धति को स्वतंत्र पहचान दी थी। इसके बाद नवंबर 2003 में आयुर्वेद, योग, प्राकृतिक चिकित्सा, यूनानी, सिद्ध और होम्योपैथी (आयुष) नाम दिया गया। यह विभाग आयुर्वेद, योग, प्राकृतिक चिकित्सा, यूनानी और होम्योपैथी के विकास और प्रचार के लिए आधिकारिक रूप से कार्य कर रहा है। 

उल्लेखनीय है कि केंद्रीय अधिनियम शिक्षा और अभ्यास, दवाओं की बिक्री के लिए निर्माण और प्रवर्तन तंत्र को विनियमित करता है। आयुर्वेद, सिद्ध, यूनानी और होम्योपैथी दवाओं को औषधि और प्रसाधन सामग्री अधिनियम 1940 के दायरे में सम्मिलित किया गया है। आयुष क्षेत्र के अंतर्गत आने वाली अधिकांश दवाएं औषधीय पौधों से बनी होती हैं। विभाग ने औषधीय पौधों की खेती को बढ़ावा देने और गुणवत्ता के कच्चे माल की निरंतर उलब्धता सुनिश्चित करने के लिए राष्ट्रीय औषधीय पादप बोर्ड का गठन किया है। वर्ष 2002 के बाद से भारतीय होम्योपैथी चिकित्सा पद्धति पर अलग राष्ट्रीय नीति भी है।

आयुष मंत्रालय के अनुसार व्यापार में 90 प्रतिशत से अधिक प्रजातियां आज भी वनों से प्राप्त होती हैं, जिनके लगभग दो तिहाई भाग की प्राप्ति उन्मूलनात्मक साधनों से की जाती है। इसलिए औषधीय पादपों की कृषि उच्चतर आय के अवसर प्रदान करने, खेती में विविधता लाने और निर्यात में वृद्धि करने के अतिरिक्त आयुष उद्योग की कच्ची सामग्री की मांग को पूरा करने की कुंजी है। औषधीय पादपों और जड़ी-बूटियों का भारतीय निर्यात अधिकांशतः कच्ची जड़ी-बूटियों और अकों के रूप में होता है, जो इस समय की जड़ी-बूटियों/ आयुष उत्पादों के निर्यात का लगभग 60-70 प्रतिशत है। मूल्य वर्धित मदों के निर्यात को उत्पाद विकास, प्रसंस्करण सुविधाओं की स्थापना, गुणवत्ता आश्वासन और ब्रांड संवर्धन की आवश्यकता है। वनों से असंधारणीय संग्रहण की बढ़ती चिंता, एक ओर कुछ प्रजातियों का विलोप और दूसरी ओर गुणवत्ता एवं मानकीकरण की चिंताओं ने यह अनिवार्य बना दिया है कि उपयुक्त वित्तीय प्रोत्साहनों, नीति और सहक्रियात्मक ढंग से अवसंरचनात्मक एवं विपणन सहायता के माध्यम से आयुष चिकित्सा पद्धतियों के लिए अनिवार्य प्रजातियों की कृषि को बढ़ावा दिया जाए।

आयुष के 95 प्रतिशत से अधिक उत्पाद पादप आधारित होने के कारण इसकी कच्ची सामग्री के स्रोत को वनों से परिवर्तित कर कृषि आधारित करने की आवश्यकता है, ताकि यह लम्बे समय तक चलता रहे। विश्व व्यापार को भारी धातुओं तथा अन्य विषैली अशुद्धियों से मुक्त, मानक फाइटो रसायनों से युक्त और प्रमाणित जैविक या बेहतर कृषि अभ्यास की पूर्ति करने वाले उत्पादों की आवश्यकता है। यह केवल कृषि मार्ग के माध्यम से ही संभव है, जहां उसकी अभिरक्षा व्यवस्था की श्रृंखला को बनाए रखना संभव है। विश्व के हर्बल व्यापार में भारत का अंश लगभग 17 प्रतिशत है। यहां भी हर्बल उत्पादों का निर्यात प्राय- कच्ची जड़ी-बूटियों के रूप में ही है, क्योंकि निर्यात टोकरी का दो तिहाई भाग कच्ची सामग्री और अकों से भरा है। 120 बिलियन अमेरिकी डॊलर के हर्बल बाजार को देखते हुए इसे बदलने की आवश्यकता है। यही कारण है कि इस योजना में उन चयनित पौधों के मूल्य संवर्धन और संसाधन से जुड़ी समुदाय कृषि के लिए सहायता प्रदान करने का प्रावधान किया गया है, जिनकी आयुष उद्योगों तथा निर्यात के लिए मांग है।

राष्ट्रीय औषधीय पादप बोर्ड की स्थापना केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री की अध्यक्षता में 24 नवम्बर, 2000 को अधिसूचित राजकीय संकल्प के माध्यम से की गई थी। इस बोर्ड की स्थापना का उद्देश्य किसी ऐसी एजेंसी की स्थापना करना था, जो औषधीय पादपों के समन्वय से संबंधित सभी मामलों के साथ इस क्षेत्र के प्रोत्साहन एवं विकास के उद्देश्य से नीतियों का निर्धारण एवं कच्चे माल के संरक्षण, उचित पैदावार, लागत प्रभावी कृषि, अनुसंधान एवं विकास, प्रसंस्करण, विपणन की रणनीति तैयार करने के दायित्वों का निर्वहन कर सके। इसे अनिवार्य इसलिए माना गया, क्योंकि एक विषय के रूप में औषधीय पादपों का संबंध पर्यावरण एवं वन, कृषि, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी और वाणिज्य जैसे विभिन्न मंत्रालयों/ विभागों से रहता है। इसलिए यह बोर्ड सामान्यत औषधीय पादपों और विशेषकर कई क्षेत्रों के विकास के लिए अन्य मंत्रालयों/ विभागों/ संगठनों/ राज्य/ संघ राज्य क्षेत्र सरकारों के साथ समन्वय का कार्य करता है। इसके कार्यों में देश एवं विदेश दोनों में औषधीय पादपों से संबंधित मांग/ आपूर्ति का आंकलन, औषधीय पादपों के विकास कार्यक्रमों एवं योजनाओं से संबंधित नीतिगत विषयों पर संबंधित मंत्रालयों/ विभागों/ संगठनों/ राज्य/ संघ राज्य क्षेत्र सरकारों को सलाह देना, कृषि के लिए भूमि एवं औषधीय पौधों के संग्रहण, भंडारण, परिवहन के लिए अवसंरचना वाली एजेंसियों द्वारा प्रस्तावों, योजनाओं एवं कार्यक्रमों को तैयार करने के लिए मार्गदर्शन देना सम्मिलित है। इसमें औषधीय पौधों की पहचान, सूचीबद्ध करना तथा उनकी गणना करना, औषधीय पौधों के बाह्य स्थलीय एवं अंत-स्थलीय कृषि एवं संरक्षण को प्रोत्साहित करना, संग्राहकों एवं उत्पादकों के मध्य सहकारिता को प्रोत्साहित करना तथा उन्हें उनके उत्पादों के प्रभावी तौर पर भंडारण, परिवहन एवं विपणन के लिए सहायता करना, सम्मिलित है। इसके अतिरिक्त इसके कार्यों में औषधीय पौधों की सांख्यिकीय आधार सामग्री की स्थापना, सूचीकरण, सूचना प्रसारण और सार्वजनिक क्षेत्र के पादपों के औषधीय प्रयोग के लिए प्राप्त किए जाने वाले पादपों के पेटेंट को रोकने में सहायता करना, कच्चे माल के साथ-साथ मूल्य वर्द्धित उत्पादों, चाहे वे औषधियों, खाद्य-पूरकों अथवा हर्बल सौंदर्य प्रसाधन सामग्री के रूप में हों, देश व विदेश में उनकी गुणवत्ता एवं विश्वसनीयता संबंधी ख्याति में वृद्धि के लिए उत्पादों की बेहतर विपणन तकनीक को अपना लेने सहित उनके आयात/ निर्यात संबंधी मामले, वैज्ञानिक, तकनीकी अनुसंधान एवं लागत-प्रभावी अध्ययन करना और सौंपना, कृषि एवं गुणवत्ता नियंत्रण के लिए संलेखों का विकास और पेटेंट अधिकारों एवं बौद्धिक संपदा अधिकारों के संरक्षण को प्रोत्साहित करना भी सम्मिलित है।

दसवीं योजना के दौरान राष्ट्रीय औषधीय पादप बोर्ड ने ’औषधीय पादप बोर्ड की स्थापना’ कर एक केंद्रीय क्षेत्रक योजना का कार्यान्वयन किया। ग्यारहवीं योजना के दौरान इस केंद्रीय क्षेत्रक योजना में संशोधन किया गया, ताकि संसाधनों की वृद्धि, आंतरिक संरक्षण, अनुसंधान एवं विकास, दुर्लभ एवं संकटापन्न प्रजातियों के बाह्य संरक्षण, मूल्य वर्धन, माल गोदाम बनाने के लिए संयुक्त वन प्रबंधन समिति को सहायता, क्षमता निर्माण तथा अच्छे संग्रहण एवं संधारणीय फसल अभ्यासों जैसे संवर्धनात्मक कार्यकलापों पर अधिक ध्यान केंद्रित किया जा सके। इस योजना का नाम तथा उसे 32130 करोड़ रुपये की ग्यारहवीं योजना के परिव्यय के साथ अनुमोदित किया गया। वाणिज्यिक कृषि संबंधी संघटक को संशोधन पूर्व की केंद्रीय क्षेत्रक योजना में से निकाल लिया गया और उससे एक नई योजना बनाई गई। इसमें कृषि को फसल से पूर्व और पश्चात के कार्यकलापों के साथ मिलाने का प्रयास किया गया अर्थात गुणवत्तायुक्त पादप रोपण सामग्री के लिए पौधशालाओं का विकास, एएसयू उद्योग आवश्यकता की प्रजातियों की कृषि, फसल के उपरांत प्रबंधन के लिए सहायता, विपणन, विपणन अवसंरचना का सुधार, जैव/ जीएपी प्रमाणन, गुणवत्ता आश्वासन एवं फसल बीमा आदि संघटकों को राष्ट्रीय औषध पादप मिशन की नई केंद्रीय प्रायोजित योजना में शामिल किया गया, जो ग्यारहवीं योजना के लिए 630 करोड़ रुपये के परिव्यय सहित वर्ष 2008-09 के दौरान स्वीकृत की गई। 

योजना के कार्यान्वयन के दौरान हुए अनुभवों और तृतीय पक्ष के स्वतंत्र मूल्यांकन से प्राप्त अनुभवों के आधार पर इस योजना को बारहवीं योजना में भी चालू रखा गया है। राष्ट्रीय आयुष मिशन की केंद्रीय प्रायोजित योजना के अधीन औषधीय पादपों का विकास एवं कृषि इस संघटक को राष्ट्रीय आयुष मिशन के अधीन, बारहवीं योजना के दौरान कार्यान्वयन के लिए 822 करोड़ रुपये के कुल परिव्यय के साथ अनुमोदित किया गया है। पूर्वोत्तर और पहाड़ी राज्यों में केंद्र सरकार का अंशदान 100 प्रतिशत होगा, जबकि अन्य राज्यों में केंद्र सरकार का अंशदान 90:10 होगा।

उल्लेखनीय है कि औषधीय न केवल चिकित्सा क्षेत्र के लिए उपयोगी हैं, अपितु कृषि की दृष्टि से भी बहुत ही लाभदायक हैं। ये चिकित्सा पद्धतियों की अखंडता, गुणवत्ता, प्रभावोत्पादकता और सुरक्षा की होने के साथ-साथ किसानों के लिए आय का एक बड़ा साधन हैं। राष्ट्रीय आयुष मिशन के अंतर्गत औषधीय पादप को कृषि प्रणालियों में सम्मिलित करके, उनकी कृषि को बढ़ावा देना है, जिससे कृषि किसानों को फसल विविधता का एक विकल्प मिलेगा और उनकी आमदनी बढ़ेगी। मानकीकरण तथा गुणवत्ता आश्वासन को बढ़ावा देने के लिए अच्छी कृषि एवं संग्रहण अभ्यासों का अनुकरण करते हुए कृषि करना, जिससे आयुष पद्धतियों की वैश्विक स्तर पर स्वीकार्यता में वृद्धि होगी और जड़ी-बूटियों अर्कों, फाइटो-रासायनिकों, आहार पूरकों, सौंदर्य प्रसाधनों और आयुष उत्पादों जैसी मूल्य वर्धित वस्तुओं के निर्यात में बढ़ोत्तरी होगी। कृषि अभिसरण, भंडारण, मूल्यवर्धन एवं विपणन के माध्यम से प्रसंस्करण समूहों की स्थापना को सहायता देना और उद्यमियों के लिए अवसंरचना का विकास, ताकि ऐसे समूहों में इकाई स्थापित की जा सके। गुणवत्ता मानकों, अच्छे कृषि अभ्यासों, अच्छे संग्रहण अभ्यासों और अच्छे भंडारण अभ्यासों के लिए प्रमाणन क्रियाविधि को लागू करना तथा उसका समर्थन करना। राष्ट्रीय, क्षेत्रीय राज्यीय और उप राज्यीय स्तर पर सार्वजनिक निजी क्षेत्र में अनुसंधान एंव विकास, प्रसंस्करण तथा विपणन में जुटे हुए पणधारियों के बीच भागीदारी, अभिसरण और सहक्रिया को बढ़ावा देना।
 
उत्पादन, फसल के उपरांत प्रबंधन, प्रसंस्करण और विपणन शामिल करके सम्पूर्ण दृष्टिकोण को अपनाना इसकी कार्यनीति में सम्मिलित है। औषधीय पादपों की कृषि की संभावना वाले राज्यों के चुनिन्दा जिलों मंे चिन्हित समूहों में औषधीय पादपों की कृषि को बढ़ावा देकर ही इसे प्राप्त किया जा सकता है। इस प्रकार की कृषि को बढ़ावा देने के लिए गुणवत्तायुक्त पौध-रोपण सामग्री का उत्पादन एवं आपूर्ति, प्रसंस्करण, गुणवत्ता परीक्षण, प्रमाणन, भंडारण और आयुष उदयोग की मांगों को पूरा करने तथा मूल्यवर्धित वस्तुओं के निर्यात के लिए सहक्रियात्मक अनुबंध के माध्यम से अच्छे कृषि एवं संग्रहण अभ्यासों को अपनाना आवश्यक है। औषधीय पादपों को इस प्रकार बढ़ावा देना कि वह कृषकों के लिए फसल का एक विकल्प बन जाएं। औषधीय पादपों की बढ़ी हुई फसल तथा प्रसस्करण, विपणन तथा परीक्षण के लिए अनुबंधों से फसल उत्पादकों, कृषकों को पारिश्रमिक मूल्य मिलेंगे। इससे वन संग्रहण के कारण जंगलों पर बढ़ता दबाव भी कम होगा। 
प्रिंट और इलेक्ट्रॊनिक मीडिया के माध्यम से संचार को अपनी कार्यनीति के एक सुदृढ़ संघटक के रूप में अपनाना, ताकि फसल से पूर्व और उसके पश्चात के उपयुक्त अनुबंधों के माध्यम से गुणवत्ता तथा मानकीकरण पर जोर देते हुए कृषि/ उद्यनिकी प्रणालियों में औषधीय पादपों के एकीकरण को बढ़ावा दिया जा सके। स्व-सहायता दलों, पादप उगाने वाली सहकारिताओं/ एसोसिएशनों/ उत्पादक कंपनियों और अन्य के माध्यम से समूहों में कृषि और प्रसंस्करण के सामूहिक प्रयासों को बढ़ावा देना और उनको समर्थन देना।

राज्यों में संघटक को लागू करने के लिए एजेंसी का चयन किया जाता है। राज्य उद्यानिकी मिशन के निदेशक को राज्य सरकार राज्य कार्यान्वयन एजेंसी के रूप में नामित कर सकती है। जो राज्य राष्ट्रीय उद्यानिकी मिशन के तहत नहीं आते, उनकी राज्य सरकारें राज्य कृषि विभाग को नोडल विभाग के रूप में कार्यान्वयन के लिए नामित कर सकती हैं। निधियां आयुष सोसायटियों के माध्यम से निर्मुक्त की जाएंगी, ताकि परियोजनाओं के कार्यान्वयन के लिए निधियां समय से मिलती रहें। एक विकल्प यह भी है कि राज्य सरकारें राज्य औषधीय पादप बोर्ड को कार्यान्वयन एजेंसी के रूप में चुन सकती हैं। ऐसी स्थिति में निधियां राज्य आयुष सोसायटी के माध्यम से राज्य औषधीय पादप बोर्डों को दी जाएंगी। राज्य इस संघटक को लागू करने के लिए राज्य में उपलब्ध सबसे दक्ष और प्रभावशाली एजेंसी का चयन करेगा।

यदि राज्य सरकार द्वारा राज्य उद्यानिकी मिशन को राज्य कार्यान्वयन एजेंसी के रूप में नामित कर दिया जाता है, तो वह इस संघटक का कार्यान्वयन कृषि, आयुष, उद्योग विभाग और राज्य औषधीय पादप बोर्ड के समन्वय से करेगा और उसे एक सोसायटी के रूप में पंजीकृत करना होगा। इसे निधियां प्राप्त करने और संघटक को लागू करने के लिए कार्यात्मक स्वायतता भी होनी चाहिए। 
जिला स्तर पर एजेंसियों की पहचान करने और समूहों की पहचान करने तथा पादप उगाने वालों को एसएचजी/ सहकारिताओं/  एसोसिएशनों तथा उत्पादक कंपनियों को संगठित करने के लिए पंचायती राज संस्थाओं को भी पूर्णतया शामिल किया जाएगा। कार्यान्वयन एजेंसी राज्य आयुष सोसायटी अथवा राज्य दवारा निश्चित किए गए किसी अन्य उपयुक्त तंत्र के माध्यम से कार्य करेंगी।
राज्य स्तर पर एक तकनीकी छानबीन समिति भी होगी, जिसमें प्रस्तावों का मूल्यांकन करने के लिए क्षेत्र विशेष के विशेषज्ञ भी होंगे। प्रसंस्करण, भंडारण, विपणन इत्यादि के लिए राज्यों के पास उपयुक्त मॉडल अर्थात सहकारिताएं, परिसंघ, वन विकास निगम, संयुक्त क्षेत्र कंपनियां को अपनाने का विकल्प होगा। जहां भी संभव हो, कृषि के लिए समूहों की पहचान के लिए राज्य उद्यानिकी मिशन के साथ अनुबंध विकसित किया जाएगा और फसल के उपरांत प्रबंध सुविधाओं यथा माल गोदाम, विपणन यार्ड, सुखाने के शेड, परीक्षण प्रयोगशाला और प्रसंस्करण उद्योग की स्थापना के लिए अवसंरचना का विकास किया जाएगा।
राज्य स्तर की कार्यान्वयन एजेंसी के कई कार्य होंगे। इनमें राज्य स्तर पर तकनीकी सहायता ग्रुप से तकनीकी सहायता प्राप्त करके परिदृश्य और वार्षिक कार्ययोजना बनाई जाएगी, जिसमें राज्य कृषि विश्वविद्यालयों, सुविधा केंद्रों, आईसीएआर, आईसीएफआरई, सीएसआईआर संस्थाओं और उस क्षेत्र के अन्य विशेषज्ञ इसके कार्यान्वयन को देखेंगे। 
कार्यकलापों को चालू रखने, उसका उपयुक्त हिसाब रखने और संबंधित एजेंसियों को उपयोगिता प्रमाण पत्र प्रस्तुत करने के लिए राज्य सरकार से निधियां प्राप्त करना होगा।
विभिन्न समूहों के लिए उत्तरदायी एसएचजी, पादप उगाने वालों की सहकारिताओं, पादप उगाने वालों की एसोसिएशनों, उत्पादक कंपनियों जैसे कार्यान्वयन संगठनों को निधियां निर्मुक्त करना और कार्यक्रमों के कार्यान्वयन का निरीक्षण, अनुवीक्षण और पुनरीक्षण करना होगा।
औषधीय पादपों की स्थिति का निश्चय करने के लिए विभिन्न भागों (जिला, उप जिला, अथवा जिलों के ग्रुप) में आधार-रेखा सर्वेक्षण और व्यवहार्यता अध्ययनों का आयोजन करना होगा। इसकी संभाव्यता और मांग का पता लगाना और तदनुकूल सहायता प्रदान करनी होगी। इसी प्रकार के अध्ययन अन्य कार्यक्रमों के अन्य संघटकों के लिए भी चलाए जाएंगे।

कृषकों, सोसायटियों, गैर-सरकारी संगठनों, पादप उगाने वालों, एसोसिएशनों, स्व-सहायता दलों, राज्य संस्थाओं और ऐसी ही अन्य संस्थाओं के माध्यम से औषधीय पादपों को उगाने के लिए अनुकूल कृषि जलवायु के संदर्भ में चुने गए विभिन्न समूहों में इस संघटक के कार्यान्वयन में सहायता करना और निरीक्षण करना होगा। राज्य कार्यान्वयन एजेंसी पादप उगाने वालों को स्व-सहायता दल/ सहकारिताएं/ परिसंघ, उत्पादक कंपनियां बनाने के लिए प्रेरित करने के लिए भी उत्तरदायी होगी। इन जमीनी स्तर के संगठनों को बढ़ावा देने के लिए वित्तीय सहायता उपलब्ध होगी, जिसमें प्रशिक्षण और एनीमेटर्स इत्यादि जैसे अन्य आकस्मिक खर्च आदि भी शामिल होंगे।

राज्य कृषि विश्वविद्यालयों और आईसीएआर/ आईसीएफआरई/ सीएसआईआर संस्थाओं और तकनीकी विशेषज्ञता प्राप्त अन्य संगठनों में स्थापित सुविधा केंद्रों की सहायता से राज्य स्तर के सभी इच्छुक दलों/ एसोसिएशनों के लिए कार्यशालाओं, संगोष्ठियों और प्रशिक्षण कार्यक्रमों का आयोजन करना होगा।
जिन राज्यों में कार्यान्वयन उदयानिकी विभाग के माध्यम से किया जाता है, उनमें जिले स्तर पर इस संघटक का समन्वय राष्ट्रीय उद्यानिकी मिशन की जिला मिशन समिति द्वारा किया जाएगा। यदि कृषि विभाग के माध्यम से कार्यान्वयन किया जाता हो, तो जिला मिशन निदेशालय को एक सोसायटी के रूप में पंजीकृत किया जाएगा, जिसमें उप निदेशक (कृषि)/ जिला कृषि अधिकारी उसका अध्यक्ष होगा। जिला मिशन समिति परियोजना के निरूपण और अनुवीक्षण के लिए उत्तरदायी होगी। जिला मिशन समिति में संबंधित विभागों, पादप उगाने वालों की एसोसिएशनों, विपणन बोर्डों, उद्योगों, विभागों, स्व-सहायता दलों (एसएचबी) और अन्य गैर-सरकारी संगठनों के प्रतिनिधि इसके सदस्यों के रूप में होंगे। जिला योजना समिति और पंचायती राज संस्थाओं को राज्य सरकारों की पसंद और विवेकानुसार इस कार्यक्रम के कार्यान्वयन में एकीकृत/ सम्मिलित किया जाएगा।

राज्य कार्यान्वयन एजेंसी प्रस्तावों को जिला स्तरीय कार्यान्वयन एजेंसी के माध्यम से भेजने की आवश्यकता को पूरा किए बिना भी ख्याति प्राप्त गैर सरकारी संगठनों, सहकारिताओं, राज्य सरकार उपक्रमों, पादप उगाने वालों की एसोसिएशनों, उत्पादक कंपनियों, स्व-सहायता दलों को सीधे शामिल करके चुनिंदा समूहों में इस योजना को लागू करने पर भी विचार कर सकती है। ऐसे मामले में विभिन्न संगठनों/ समूहों की रिपोर्ट राज्य कार्य योजना में समेकित की जाएगी और राष्ट्रीय औषधीय पादप बोर्ड के विचारार्थ प्रस्तुत की जाएगी। कृषि विज्ञान केंद्र और कृषि प्रौद्योगिकी प्रबंधन एजेंसियों जैसे संगठनों को चुनिंदा समूहों में जिला और निम्नतर स्तर पर योजना, कार्यान्वयन और अनुवीक्षण में शामिल किया जा सकता है। ऐसे मामलों में निधियां भी जिला स्तर एजेंसी के माध्यम से भेजे बिना सीधे समूह स्तर की कार्यान्वयन एजेंसियों को निर्मुक्त की जा सकती हैं।
इस संघटक के अधीन समूह/ अंचल स्तर पर मुख्य कार्यकलापों को लागू करने के लिए सांस्थानिक और विपणन इस कार्यक्रम के अधीन आने वाले राज्य में विद्यमान संगठनों/ संस्थानों के अनुसार भिन्न-भिन्न होंगे। विभिन्न समूहों में कृषि, प्रसंस्करण, विपणन, गुणवत्ता आश्वासन और प्रमाणन संबंधी सभी कार्यकलापों को राज्य स्तर पर समेकित किया जाएगा, ताकि मिशन कार्यकलापों के बीच बेहतर सहक्रिया रहे। राज्य सरकारें मिशन के उद्देश्यों को समग्र रूप में आगे ले जाने के लिए अपने मॉडल चुनने, वर्तमान संस्थाओं का सृजन करने अथवा उन्हें दिशा देने के लिए स्वतंत्र हैं।

यद्यपि इस योजना में वे सभी कार्यकलाप आते हैं, जिनकी सहायता औषधीय पादप पर आधारित कृषि व्यापार को पूर्णत- सफल बनाने के लिए आवश्यक होती है, फिर भी कुछ संघटक ऐसे हो सकते हैं जिनका सामंजस्य अनन्य मंत्रालयों/ विभागों तथा राज्य सरकारों की अन्य योजनाओं के साथ स्थापित किया जा सकता है। उदाहरण के लिए, सूक्ष्म सिंचाई, उर्वरकों का प्रयोग, सिंचाई तालाबों का निर्माण, संदर्शी प्लॉटों की स्थापना जैसे कुछ संघटक जो इस योजना का हिस्सा नहीं हैं, उन्हें संबंधित मंत्रालयों/ विभागों की योजनाओं के अनुरूप बनाया जा सकता है। इससे फसल के पूर्व और पश्चात के प्रबंधन कार्यकलापों के साथ कृषि का संपूर्ण अभिसरण सुनिश्चित होगा।

देश में औषधीय पौधों की कृषि समाप्त नहीं हुई है, यहां तक कि वनों से कच्चे माल की उपलब्धता सस्ती दरों पर है और वनों में उपलब्धता पर इसका हानि युक्त प्रभाव है। कृषि को आकर्षक बनाने के लिए आवश्यक है कि दोनों तकनीकी एवं वित्तीय प्रयासों को समर्थन दिया जाए। दसवीं पंचवर्षीय योजना में अनुदान सहायता से कृषि समर्थन का कार्यक्रम कार्यान्वित किया गया है। यद्यपि कार्यक्रम के साधारणतः परिणाम संरक्षण योग्य अनेक प्रजातियों की कृषि, आयुष उद्योग की उच्च मांग तथा वनों से एकत्र की जाने वाली आयुष औषधियों के लिए उत्साहवर्धक रहे हैं। यह योजना आयुष चिकित्सा पद्धति में संकटमय मोड़ पर अधिक से अधिक प्रजातियों की कृषि के लिए समर्थित होनी चाहिए। यह भी प्रस्तावित है कि विभिन्न औषधीय पौधों के लिए उपलब्ध अनुदान सहायता में संशोधन किया जाना चाहिए, ताकि आयुष पद्धति की आवश्यकता के अनुरूप कृषि योग्य प्रजातियों एवं उनके संरक्षण से संबंधित मामलों में सीधी अनुदान सहायता प्रदान की जा सके।
औषधीय पादपों के लिए प्रसंस्करण सुविधाओं और उपलब्ध बाजार के साथ सुविधाजनक तरीके से कृषि को प्रस्तावित किया जाए। यह भी प्रस्तावित किया जाता है कि राज्य शासन द्वारा औषधीय पौधों के उत्पादन से संबद्ध व्यक्ति, स्व-सहायता समूह, सहकारी समितियों के माध्यम से समूहों की पहचान की जाए। औषधीय पादपों के उत्पादक लघु एवं सीमांत कृषकों को स्वःसहायता समूहों एवं सहकारी समितियों में नियोजित कर यह सुनिश्चित करेंगे कि लघु एवं सीमांत कृषक औषधीय पादपों की कृषि कर रहे हैं, जो वर्तमान में वे करने में असमर्थ हैं। उत्पादकों के सहकारी संस्थानों/ संघों को सक्रिय करने तथा अंतत: राज्य कार्य योजना में समेकित की जाने वाली समूह विशेष की परियोजना रिपोर्टो/ व्यवसाय योजनाओं को तैयार करने के लिए राज्य कार्यान्वयन एजेंसी को परियोजनाओं के आधार पर वित्तीय सहायता उपलब्ध कराई जाएगी।

कृषि के लिए योजना में रोपण सामग्री/ बीज प्राप्त करने का स्रोत भी स्पष्ट रूप से अंकित किया जाना होगा। योजना के अंतर्गत सहायता राशि की अर्हता उन्हीं उत्पादकों को होगी, जो कि केवल पहचान किए हुए बीज स्रोत या प्रमाणित रोपण सामग्री प्रदाय करने वाली रोपणियों से करेंगे। राज्य को प्रत्येक समूह के लिए एक व्यापार योजना/ परियोजना रिपोर्ट की रूपरेखा बनाने का प्रयास करना चाहिए। राज्य के लिए बनी कार्ययोजना में उनकी क्षमता, अवसंरचना, उपलब्ध और विकसित की जा रही प्रजाति, उनके स्थान के विवरण के साथ अच्छी गुणवत्ता वाली रोपण सामग्री के लिए सूची (सार्वजनिक क्षेत्र और निजी क्षेत्र) में शामिल होनी चाहिए। रोपण सामग्री की उपलब्धता के लिए योजना की रूपरेखा तैयार करते समय राज्यों को विभिन्न विभागों (अर्थात उद्यानिकी, कृषि, वन विभाग, आयुष/ पारंपरिक चिकित्सा के लिए राज्य निदेशालय, राज्य कृषि विश्वविद्यालय, कृषि विज्ञान केंद्र और सीएसआईआर, आईसीएआर, आईसीएफआरई इत्यादि की केंद्रीय सुविधाओ) की पौधशाला सुविधाओं को भी ध्यान में रखना चाहिए। यदि कुछ रोपण सामग्री राज्य से बाहर से प्राप्त की जानी प्रस्तावित हो, तो उसका उल्लेख स्पष्ट रूप से किया जाना चाहिए। वार्षिक कार्ययोजनाओं में औषधीय पादपों के जीन पूल/ सर्वश्रेष्ठ रोपण सामग्री/ क्लोनल और पौध बीज फल उद्यानों/ बाड़ा उद्यानों/ जीन बैंक बनाने के लिए विशेष प्रावधान भी शामिल किए जा सकते हैं। इस प्रकार के प्रस्ताव संबंधित राज्य विभागों और राज्य तथा केन्द्र सरकारों के अनुसंधान एवं विस्तार खंड संगठनों से लिए जाएंगे। इन प्रस्तावों को वार्षिक कार्य योजना में विशिष्ट संघटकों के रूप में शामिल किया जाना चाहिए, जिनमें संक्रिया से संबद्ध आवर्तता और उसकी समय-सीमा का स्पष्ट उल्लेख होना चाहिए और उनके परिणाम भी दिए जाने चाहिए। सर्वश्रेष्ठ जर्मप्लाज्म अनुरक्षण के लिए संघटक और उसका मूल्यांकन केवल एक बार के प्रस्ताव के लिए तदर्थ नहीं हो सकता और इसलिए राज्य द्वारा बनाई गई भावी योजना का हिस्सा हो सकता है तथा दो योजना अवधियों के अंदर परिवर्तनशील प्रकृति का हो सकता है। यह समझ लेना जरूरी है कि इस संघटक में केवल ऐसे संगठनों को शामिल किया जाना चाहिए, जिनमें ऐसा कार्यकलाप उनके मूल अधिदेश का एक अभिन्न अंग हो, ताकि वे लंबे समय में केवल अपने संसाधनों से ही इस प्रकार की पहलों को बनाए रख सकें।

यह कृषि ऐसे क्षेत्रों में करना प्रस्तावित है, जहां प्रसंस्करण समूह स्थापित किए जाएंगे और ऐसे अन्य क्षेत्रों में भी जहां कृषि के लिए ऐसे समूहों की पहचान की जाती है, जिनके निर्माताओं और विपणन के साथ उपयुक्त अनुबंध हों। इन्हें भी पादप उगाने वालों, एसएचवीजी और औषधीय पादप उगाने वालों की सहकारी समितियों, उत्पादक कंपनियों और कॊर्पोरेट्स के माध्यम से कृषि के लिए सहायता दी जाएगी।
वह प्रजाति जिसके लिए कृषि लागत के 20 प्रतिशत की दर से सहायिकी दी गई थी, वह अब 30 प्रतिशत हो जाएगी और वे प्रजातियां जिनको ग्यारहवीं योजना के दौरान कृषि लागत के 50 प्रतिशत अथवा 75 प्रतिशत तक की रेंज में सहायिकी देय थी, वह जारी रहेगी। तथापि, महंगाई के दबाव के कारण कृषि लागत में हुई वृद्धि की पूर्ति के लिए सहायिकी की गणना के लिए बनाए गए मूल लागत के मानदंड वही रहेंगे, जो इस प्रजाति के लिए ग्यारहवीं योजना में दी गई व्यवस्था के अनुसार बने रहेंगे, केवल उनके लागत मानदंडों में प्रत्येक आगामी वर्ष की कार्य योजना लिए 10 प्रतिशत की वृद्धि की जाएगी, बशर्ते कि स्थाई वित्त समिति की सहमति मिल जाए। इस कार्यक्रम को राज्यों के लिए और प्रभावशाली तथा आवश्यकता जनित बनाने की दृष्टि से इसके परिधि और कार्यक्षेत्र में और अधिक सुधार करने के लिए औषधीय गुणों वाले औषधीय और सुगंधित पादपों को इस योजना के अधीन 30 प्रतिशत, 50 प्रतिशत और 75 प्रतिशत की सहायिकी समर्थन श्रेणियों में रखा जा सकता है। इस योजना के अधीन सहायिकी समर्थन के लिए नई प्रजातियां स्थाई वित्त समिति के विधिवत अनुमोदन के पश्चात ही शामिल की जाएगी। समिति अपना अनुमोदन देने से पूर्व औचित्य और प्रदत्त लागत मानदंडों पर ध्यानपूर्वक विचार करेगी। एक बार प्रजातियों को शामिल करने का निर्णय ले लिए जाने पर स्थाई वित्त समिति आगामी वर्षों के लिए लागत मानदंडों में 10 प्रतिशत वृद्धि पर विचार कर सकती है, बशर्तें पिछले वित्तीय वर्ष में राज्यों को प्रजातियों के विकास के निमित्त दी गई निधियां अप्रयुक्त न रखी गई हों। ऐसा होने पर कृषकों को महंगाई की मार से बचने के लिए परिवर्धित समर्थन देने पर विचार करना पूर्णतया संबंधित राज्य का दायित्व होगा। यह राज्यों में दोनों प्रयोजनों अर्थात ग्यारहवीं योजना के दौरान कृषि के लिए पहले से शामिल की गई प्रजातियों की कृषि अथवा बारहवीं योजना के दौरान शामिल की जाने वाली नई प्रजातियों की कृषि के लिए निधियों के उपयोग के लिए एक प्रोत्साहन का कार्य करेगा। यदि यह पता चले कि इस प्रजाति की कृषि को और समर्थन देने की आवश्यकता नहीं है अथवा इसकी कृषि विशेष कारकों के कारण सफल नहीं है, तो स्थाई वित्त समिति वित्तीय सहायता के लिए पहले से सम्मिलित किसी प्रजाति को छोड़ भी सकती है।

गुणवत्तायुक्त पादप रोपण सामग्री की आपूर्ति हेतु बीज/ जर्मपलाज्म केन्द्रों तथा पौधशालाओं की स्थापना औषधीय पादपों की कृषि और इस प्रकार की कृषि से होने वाली पैदावार मुख्यत- प्रयुक्त पादप रोपण सामग्री की गुणवत्ता पर निर्भर होती है। आज तक वाणिज्यिक पैमाने पर गुणवत्तायुक्त जर्मप्लाज्म प्रदान करने और गुणवत्तायुक्त पादपरोपण सामग्री का उत्पाद करने का कोई तरीका नहीं है।
कृषि के लिए अग्रताप्राप्त औषधीय पादप प्रजातियों के प्रमाणित जर्मप्लाज्म के भंडारण और आपूर्ति के लिए राज्य वन विभागों/ अनुसंधान संगठनों/ राज्य कृषि विश्वविद्यालयों के अनुसंधान खंड के साथ बीज केन्द्रों को स्थापित करने का प्रस्ताव है। गैर-सरकारी संगठनों और कॊर्पोरेट्स के माध्यम से बीजों के उत्पादन और आपूर्ति को भी अनुमति दी जाएगी, बशर्तें उनकी गुणवत्ता किसी प्रत्यायित प्रमाणन एजेंसी के माध्यम से की जा सके। ऐसे केन्द्र आईसीएआर संस्थाओं में स्थापित नहीं किए जाएंगे, क्योंकि इन संस्थाओं में उनकी अपनी योजनाओं के अधीन इस प्रकार के संघटक हेतु प्रावधान होता है, जिसका उपयोग औषधीय पादपों से संबंधित जर्मप्लाज्म के भंडारण के लिए किया जा सकता है।

कृषि के लिए गुणवत्तायुक्त पादप रोपण सामग्री की मांग को पूरा करने के लिए सार्वजनिक और निजी क्षेत्र के अधीन नई पौधशालाओं के लिए सहायता दी जाएगी। निजी क्षेत्र में पौधशालाओं की स्थापना पर्याप्त तथा ऐसी प्रायोगिक परियोजनाओं को शुरू करने के लिए कार्य नीति बनाने के बाद ही की जाएगी। आदर्श पौधशालाओं की अवसंरचना में अनेक बातें शामिल होंगी जैसे मौसम की प्रतिकूल स्थितियों से बचाने के लिए मदर स्टॉक्स ब्लॉक का अनुरक्षण, जालीदार गृह दशाओं के अंतर्गत मूल स्टाक पौध तैयार करना, हवादार घरों का प्रसारण करना, जिनकी साइडों में कीट-पतंगों को रोकने की जाली लगी हो और कोहरे एवं छिड़काव की प्रणाली से सिंचाई की व्यवस्था हो, कीट-पतंगों को रोकने वाले ऐसे जालीदार गृहों का कठोरीकरण/ अनुरक्षण, जिनमें से प्रकाश गुजर सके और छिड़काव की प्रणाली से सिंचाई की व्यवस्था हो, पर्याप्त सिंचाई करने तथा जल भंडारण की व्यवस्था करने के लिए पम्प हाउस।
एक आदर्श पौधशाला में औसतन 4 हेक्टेयर का क्षेत्र होना चाहिए और प्रति एकांश 25 लाख रुपये की लागत आएगी। निजी क्षेत्र/ स्व-सहायता दलों के अधीन स्थापित की जाने वाली आदर्श पौधशालाएं 100 प्रतिशत सहायता की पात्र होंगी, जो अधिकतम प्रति एकांश 25 लाख रुपये हो सकती है। आदर्श पौधशालाएं दो-तीन लाख पौधे पैदा करेंगी, जो इस बात पर निर्भर करेगा कि कितनी लागत लगाई गई है और पौध को रोपण योग्य बनाने में कितना समय लगेगा। रोपण सामग्री की गुणवत्ता सुनिश्चित करना पौधशालाओं का दायित्व होगा। निजी क्षेत्र में स्थापित आदर्श पौधशालाओं के लिए सहायता लागत की 50 प्रतिशत  होगी, बशर्त वह प्रति एकांश अधिकतम 12।50 लाख रुपये हो। यह सहायता सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के माध्यम से दी जाएगी।

लगभग एक हेक्टेयर क्षेत्र वाली लघु पौधशालाओं के पास अवसंरचना सुविधाएं ऐसी होंगी, जिनमें 60 हजार से 70 हजार तक पौधे आ जाएं। ये पादप लगभग 9-12 महीनों के लिए रखे जाएंगे। लघु पौधशाला की अवसंरचना में एक जालीदार गृह होगा। उस जालीदार गृह में छिड़काव के माध्यम से सिंचाई का साधन दिया जाएगा। डिब्बों की आकस्मिक आवश्यकता को पूरा करने/ छोटे से बड़े डिब्बों में स्थानांतरित करने के लिए इन पौधशालाओं में मिट्टी को सूर्य प्रकाश के माध्यम से रोगाणुहीन करने का भी प्रावधान होगा। 
लघु पौधशालाओं में प्रति एकांश 6।25 लाख रुपये की लागत आएगी। सार्वजनिक क्षेत्रों/ स्व-सहायता दलों के लिए यह सहायता 100 प्रतिशत होगी और निजी क्षेत्र में यह लागत 50 प्रतिशत होगी, किंतु अधिकतम राशि 3।125 लाख तक ही रहेगी, जो सार्वजनिक क्षेत्रों के माध्यम से दी जाएगी। ये लघु पौधाशालाएं प्रतिवर्ष कम से कम 60 हजार पौंध उगाएंगी।

पौध रोपण सामग्री की गुणवत्ता सुनिश्चित करना पौधशालाओं की जिम्मेदारी होगी। जो निजी पौधशालाएं प्रारंभ में प्रायोगिक आधार पर होंगी, उन्हें स्व-प्रत्यायन की ओर बढ़ने के लिए भी प्रोत्साहित किया जाएगा। ये पौधशालाएं विविध फसलों अथवा किसी विशेष फसल के लिए हो सकती हैं, जो उस क्षेत्र/ परियोजना क्षेत्र में पौध सामग्री की मांग पर आश्रित है। इसलिए कार्य योजना में यह स्पष्ट रूप से उल्लेख किया जाना चाहिए कि किस प्रकार की पौधशाला की स्थापना का प्रस्ताव है। इस कार्य योजना में वर्तमान पौधशालाओं का मूल्यांकन, उपजाई जाने वाली पौधों की फसलवार संख्या और पौधशालाओं की अतिरिक्त मांग भी दी जानी चाहिए।

अनुमान लगाया गया है कि निर्माताओं के पास पहुंचने वाली 30 प्रतिशत कच्ची सामग्री घटिया किस्म की होती है। इसलिए इसे अस्वीकार कर दिया जाता है। अतः औषधीय पादपों की कृषि के लिए माल गोदाम बनाने, सुखाने, ग्रेडिंग करने, भंडारण करने और यातायात के लिए अवसंरचना की सहायता दिए जाने की जरूरत है। ये सुविधाएं औषधीय पादपों की विपणन क्षमता बढ़ाने, उत्पादों का मूल्य बढ़ाने, लाभ बढ़ाने और हानियों को कम करने के लिए अनिवार्य हैं। एपीईडीए ने केरल और उत्तराखंड राज्यों में औषधीय और सुगंधित पादपों के लिए कृषि निर्यात आंचल स्थापित किए हैं। इन राज्यों में औषधीय पादपों पर कृषि निर्यात आंचल के कार्यान्वयन से हुए अनुभव के आधार पर यह योजना देश के विभिन्न क्षेत्रों में स्थित उन चिन्हित समूहों/ आंचलों में प्रसंस्करण तथा फसल के उपरांत प्रबंधन के लिए अवसंरचना को सहायता देने का प्रयास करती है, जो विपणन की अवसंरचना/ व्यापर के केंद्रों से सुसंपन्न हैं तथा औषधीय पादपों की कृषि परंपरा को कृषि विकल्प के रूप में रखते हैं और प्रौद्योगिकी प्रसारण एवं क्षमता निर्माण के लिए जिनके पास अनुसंधान एवं विकास संस्थाएं/ एएसयू हैं, जबकि एपीईडीए द्वारा कार्यान्वित की जाने वाली एईजैड योजनाओं का मुख्य केंद्रबिंदु निर्यात पर है, किंतु वर्तमान योजना का प्रयास है कि कृषि के लिए एकत्रित किए गए औषधीय पादपों का मूल्यवर्धन किया जाए और आयुष उद्योग की बृहद घरेलू मांग को पूरा किया जाए। इसके अतिरिक्त जड़ी-बूटी/ आयुष उत्पादों के निर्यात में मूल्यवर्धित मदों के हिस्से में वृद्धि करने की दृष्टि से निर्यात विपणन वाली प्रजातियों को भी शामिल किया जाएगा। निर्यात के लिए लक्षित की गई प्रजातियों को अंतिम रूप उनके निर्यात विपणन का मूल्यांकन करने के बाद ही दिया जाए। समूहों में स्थित एकांश भौगोलिक रूप में एक दूसरे के निकटस्थ होने चाहिए, ताकि समूह के सभी सदस्य साझी सुविधाओं का उपयोग सुगमता से कर सकें। सृजित की जाने वाली सुविधाओं का हिस्सा सभी पणधारियों द्वारा प्राप्त किया जाएगा और अन्य भुगतान के आधार पर प्राप्त करने के लिए मुक्त हैं। 

उत्पादों को स्वास्थ्यकर दशाओं में सुखाने के प्रारंभिक कार्य को पूरा करने के लिए सुखाने के यार्ड होते हैं। इसके अतिरिक्त सुखाने और श्रेणीबद्ध करने की अवसंरचना जड़ी-बूटियों की उपयोगिता अवधि और बाजार मूल्य में वृद्धि करने के लिए एक ऐसा अनिवार्य कार्यकलाप है, जिसे सुखाने से जोड़ा जाता है। चूंकि जड़ी-बूटियों को छाया में सुखाना पड़ता है, इसलिए सुखाने के ऐसे यार्ड बनाने की जरूरत है, जिनमें छाया व जाली का प्रावधान हो या न्यून तापमान पर सुखाने की सुविधाएं हों। भंडारण गोदामों में उत्पाद आसपास के सुखाने के यार्डों से प्राप्त होने अपेक्षित होते हैं। ये भंडारण गोदाम सुखाने के यार्डों और प्रसंस्करण एकांशों के बीच कड़ी का काम करते हैं। भंडारण गोदाम पर्याप्त रूप से हवादार और अनुकूल जगहों पर होने चाहिएं। भंडार गोदाम और सुखाने के यार्ड इस तरह से बनाए जाने चाहिएं कि वे कृषि फार्मों से बहुत दूर न हों और कृषि के चिन्हित समूहों के अनुकूल हों।

समूहों में उगाए जाने वाले औषधीय पादपों पर आधारित प्रसंस्करण एकांश स्थापित करने होंगे, जिनमें से कुछ तो पादप विशेष के लिए होंगे। ये प्रसंस्करण एकांश अधिमानत विद्यमान औद्योगिक संपदाओं के अंदर ही स्थापित होने चाहिएं, जिनमें बिजली, सड़क जाल और रेलवे स्टेशनों/ समुद्री बंदरगाहों से संबंधित आवश्यक अवसंरचना होती है। कच्ची सामग्री और मूल्यवर्धित मर्दी का परीक्षण तथा घरेलू खपत एवं निर्यात के लिए उनका प्रमाणन वर्तमान प्रत्यायित प्रयोगशालाओं के माध्यम से किया जाएगा। यदि आंचल/ समूहों में इस प्रकार की प्रयोगशालाएं नहीं हों, तो नई प्रयोगशालाएं अधिमानत- पीपीपी मोड में स्थापित की जाएंगी।

इस संघटक के अंतर्गत सहायता प्रदान करने के कई उद्देश्य हैं जैसे औषधीय पादपों के विपणन के लिए थोक बाजारों एवं कृषि मंडियों की अवसंरचना को सुदृढ़ करना, जहां जड़ी-बूटी संग्रहण एवं खुदरा बाजार नहीं हैं, वहां उनकी स्थापना करना। इसके अतिरिक्त कृषकों और उद्योग/ व्यापारियों के बीच संबंधों को सुदृढ़ करना और विपणन, मूल्यों, विपणन रूड़ान पर सूचना का प्रसारण, ताकि कृषक उपयुक्त औषधीय फसलों का चयन कर सके। 
मीडिया संवर्धन, प्रदर्शनियों में भागीदारी, व्यापार मेले, प्रदर्शन सुविधाओं को किराये पर लेने जैसे विपणन संवर्धन के कार्यक्रम परियोजना पर आधारित होते हैं, किंतु प्रत्येक समूह के लिए 10 लाख रुपये तक सीमित होते हैं, परंतु समूहों द्वारा उत्पादित जड़ी-बूटियों/ कच्ची सामग्री के लिए विपणन संवर्धन के अधीन 50 प्रतिशत सहायता के पात्र होंगे।

कार्य योजना में उगाने वालों के लिए विपणन आसूचना के संग्रहण, समेकन और प्रसारण को भी शामिल किया जाना चाहिए। विपणन आसूचना से संबंधित कोई अन्य नव प्रवर्तनकारी कार्यकलाप भी इस संघटक के अधीन संगठित किया जाए। इस संघटक के लिए सहायता परियोजना पर आधारित होगी। योजना के इस संघटक के अधीन क्रेता-विक्रेता बैठकों के रूप में पुनः खरीद हस्तक्षेप, लचीले तथा नवप्रवर्तनकारी, विपणन व्यवस्थाओं, औषधीय पादपों के विपणन के लिए समूह स्तर पर परिक्रामी निधी का सूजन और स्व-सहायता दलों, सहकारिताओं, उत्पादक कंपनियों को प्रेरक सहायता दी जा सकती है। क्रेता और विक्रेता के बीच विपणन और सांस्थानिक अनुबंध को सुदृढ़ बनाने के लिए अन्य कोई कार्यकलाप भी इस संघटक में शामिल किया जा सकता है। यह सहायता परियोजना पर आधारित होगी। 

इस संघटक के अधीन जिन जड़ी-बूदी संग्रहण एवं खुदरा बाजारों को ग्राम स्तर पर स्थापित किए जाने का प्रस्ताव है, उन्हें 20 लाख रुपये तक की सहायता दी जा सकती है। यह सहायता औषधीय पादपों के व्यापार के लिए गांवों में स्थित कृषि मंडियों में अवसंरचना के उन्नयन/ सूजन के लिए भी उपलब्ध है। इसी प्रकार की सहायता औषधीय पादपों के व्यापार अवसंरचना उन्नयन एवं सृजन के लिए जिला/ राज्य कृषि मंडियों को भी दी जाएगी। राज्य/ जिला स्तर पर जड़ी-बूटी मंडियों की स्थापना के लिए भी सहायता उपलब्ध होगी। गांव निकायों/ स्व-सहायता दलों/ सहकारिताओं के माध्यम से संग्रहण और खुदरा बाजार के लिए वित्तीय सहायता का स्तर 20 लाख रुपये होगा और राज्य/ जिला स्तर के संग्रहण एवं खुदरा बाजार के लिए अधिकतम दो करोड़ रुपये तक होगा।

पादप उगाने वालों द्वारा उत्पादित जड़ी-बूटी/ औषधीय पादपों की गुणवत्ता का परीक्षण पारिश्रमिक मूल्य वसूलने की कुंजी होती है। यदि जड़ी-बूटियां/ औषधीय पादप आयुष/ एनएबीएल प्रत्यायित प्रयोगशालाओं में परीक्षित किए जाते हैं, तो ये पादप उगाने वाले परीक्षण खचों के 50 प्रतिशत के हकदार होंगे, जिसकी अधिकतम सीमा पांच हजार रुपये होगी। जैव और जीएपी प्रमाणन औषधीय पादप/ जड़ी-बूटियों की गुणवत्ता सुनिश्चित करने की कुंजी है और वे कृषकों को उनके उत्पादों हेतु अच्छे मूल्यों के माध्यम से लाभ दिला सकते हैं और ग्राहकों को जड़ी-बूटी/ आयुष उत्पादों की बेहतर गुणवत्ता के माध्यम से लाभ पहुंचा सकते हैं। प्रमाणन प्रभार दलों/ समूहों में कृषि के 50 हेक्टेयर के लिए दल आधार पर पांच लाख रुपये की सीमा तक देय होंगे। कृषि के अंतर्गत औषधीय पादप एक नया कार्यकलाप हैं, इसलिए कृषकों को सकल बीमा में शामिल करने की आवश्यकता है। यह संघटक किसी विशेष फसल के लिए लाभ के 50 प्रतिशत भुगतान के लिए सहायता देने का प्रयास करता है। यह लाभ और योजना का विवरण कृषि बीमा निगम की सलाह से तय किया जाएगा।

प्रत्येक समूह के लिए विस्तृत परियोजना रिपोर्ट/ व्यापार योजना ऐसी परामर्शी फर्मों के माध्यम से कृषि के लिए तैयार की जाएगी, जो इस क्षेत्र में मौलिक योग्यता रखती हों, ताकि आयुष विभाग की अन्य योजनाओं और इस योजना के कार्यान्वयन से पूर्व अन्य मंत्रालयों की योजनाओं के बीच सहक्रिया स्थापित की जा सके। राज्य कार्यान्वयन एजेंसियों को इस योजना के अधीन समर्थन के लिए चुने गए समूहों के लिए व्यापार योजनाएं/ विस्तृत परियोजना रिपोर्ट तैयार करने के लिए परियोजना प्रबंध परामर्शदाताओं की नियुक्ति करने की अनुमति होगा अर्थात आंचलों/ समूहों से बाहर के क्षेत्रों में पैकिंग, शैडों, प्रसंस्करण एकांशों, परीक्षण प्रयोगशालाओं जैसी अवसंरचना सृजित करने के लिए समर्थन भी दिया जाएगा, बशर्ते वे कृषि समूहों से संबंधित हों। नामित समूहों से बाहर के केवल उन्हीं एकांशों के लिए सहायता दी जाएगी, जो सार्वजनिक क्षेत्र/ कृषक समूहों/ पंचायत/ कृषक सहकारिताओं/ उत्पादकों की कंपनी के होंगे। सभी परियोजनाएं उपयुक्त व्यापार योजना और विपणन सर्वेक्षणों के आधार पर उद्यमियों द्वारा संचालित होंगी। विभिन्न समूहों के लिए विस्तृत परियोजना/ व्यापार योजना राष्ट्रीय औषधीय पादप बोर्ड को प्रस्तुत की जाने वाली राज्य कार्य योजना में समेकित की जाएगी। राज्य कार्यान्वयन एजेंसी को भी परियोजना परामर्शदाता नियुक्त करने की अनुमति होगी। प्रारंभ में उन्हें केवल 50 प्रतिशत अनुदान प्रायोगिक आधार पर मिलेगा। पादप उगाने वालों की एसोसिएशनें, परिसंघ, स्व-सहायता दल, कॊरपोरेशन,  पादप उगाने वालों की सहकारिताएं केवल समूहों के मामले में कृषि को सहायता दी जाएगी। प्रत्येक कृषि समूह के पास कम से कम दो हेक्टेयर भूमि होगी। प्रत्येक कृषि समूह ऐसे कृषकों में से लिया जाना चाहिए, जिनके पास भूमि 15 किलोमीटर के दायरे में हों। सहायता उन इच्छुक कृषकों को उपलब्ध होगी, जो आगामी वर्षों में उसी भूमि पर औषधीय पादपों की कृषि करने के इच्छुक होंगे।

औषधीय पादपों के व्यापार में लगे कम से कम तीन उद्यमों/ कंपनी/ फर्मों/ भागीदार फर्मों/ उत्पादक कंपनी/ व्यापारियों/ पादप उगाने वालों/ सहकारिताओं द्वारा निर्मित एसपीवी और उनके उत्पाद इस योजना के अधीन निधियन के लिए पात्र होंगे। किसी एसपीवी के लिए कम से कम दो एकड़ भूमि चाहिए और वह भूमि राज्य के सक्षम प्राधिकारी द्वारा औद्योगिक संपदा/ आंचल/ पार्क समूह/ क्षेत्र के रूप में नामित होनी चाहिए। साझा सुविधा एकांश/ प्रयोगशाला भी रख सकता है। यदि कोई सार्वजनिक क्षेत्र का एकांश या राज्य सरकार प्रसंस्करण/ मूल्यवर्धन स्थापित करने की योजना बना ले, तो पृथक एसपीवी बनाने की आवश्यकता नही होगी।
बैंक खाता स्थाई वित्त समिति  के नाम से खोला जाना चाहिए और सदस्यों के परियोजना के प्रति अपनी प्रतिबद्धता प्रदर्शित करने के लिए कम से कम पांच लाख रुपये कायिक निधी के रूप में जमा करने चाहिए। बाह्य नामिति सहायता कृषि समूह से जुड़े केवल सार्वजनिक क्षेत्र/ कृषक समूह/ पंचायत/ किसानों की सहकारिताओं/ उत्पादक कंपनियों को ही दी जाएगी।

सार्वजनिक क्षेत्र के मामलों में प्रत्येक परियोजना को 400 लाख रुपये की सीमा तक निरूपण सुगमता के लिए अधिसूचित बैंक द्वारा किया जाएगा। कृषि अनुबंध के रूप में सुखाने के शेडों और भंडारण गोदामों के निर्माण के लिए 10 लाख रुपये की सीमा तक प्रत्येक को 100 प्रतिशत की वित्तीय सहायता देय होगी, बशर्ते उन्हें औषधीय पादप उगाने वाले स्व-सहायता दलों/ सहकारिताओं द्वारा स्थापित किया जाए। यह निमित्त सहायता 50% तक सीमित की जाएगी, बशर्तें उनकी स्थापना व्यक्तियों या उद्यमियों द्वारा की जाए।

कच्ची सामग्री और मूल्य वर्धित उत्पादों के परीक्षण के लिए गुणवत्ता परीक्षण प्रयोगशालाएं बनाने के लिए परियोजना लागत के 30 प्रतिशत की दर से अधिकतम 30 लाख रुपये दिए जा सकते हैं, जो संगठन, राज्य कार्यान्वयन एजेंसी और राष्ट्रीय औषधीय पादप बोर्ड के बीच समझौता ज्ञापन के आधार पर पीपीपी मोड में दिया जाएगा। इसके अतिरिक्त मीडिया के माध्यम से विपणन संवर्धन, प्रदर्शनियों, व्यापार मेलों में भाग लेने, प्रदर्शन सुविधाओं का विकास करने और उन्हें किराये पर देने के लिए वित्तीय सहायता परियोजना लागत के 50 प्रतिशत के हिसाब से 10 लाख रुपये की सीमा तक दी जा सकेगी।
मूल्य संवर्धन, प्रसंस्करण और परीक्षण सुविधाओं के लिए सहायिकी समाप्त की जा रही है। यदि संगठन, सहकारिताओं, नयासों, कॊर्पोरेट्स, सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों के पास बैंक प्रमाण पत्रों से समर्थित पर्याप्त निधियां हों और वे संगठन अन्यथा वित्तीय रूप से सक्षम हों तथा किसी वित्तीय संस्थान के ऋणी न हों, तो उनके लिए ऋण की आवशयकता अनिवार्य नहीं होगी।
राष्ट्रीय औषधीय पादप बोर्ड से मिलने वाली सहायता का उपयोग केवल भौतिक अवसंरचना, सिविल निर्माण कार्यों, भवन निर्माण, संयंत्र एवं मशीनरी और उपस्करों के लिए किया जाएगा। एसपीवी की भूमि की खरीद, समूह विकास अधिकारियों के वेतन, राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय प्रदर्शनियों में संयुक्त भागीदारी, विदेश में व्यापार प्रतिनिधि मंडल और ब्रांड विकास इत्यादि पर होने वाले शेष सभी खचों का वहन एसपीवी द्वारा किया जाएगा।

मिशन के औषधीय पादप संघटक के लिए राज्य कार्यान्वयन एजेंसी ऐसी हो चाहिए कि उसके पास जिला एवं निम्नतम स्तर पर अवसंरचना को इस उद्देश्य के लिए उद्यानिकी और कृषि विभाग जैसे विभागों को राज्य स्तर की कार्यान्यवन एजेंसी के रूप में उपयुक्त माना जाए। इसलिए राज्य उद्यानिकी मिशन को यदि राज्य सरकार उचित समझे, तो राज्य कार्यान्यवन एजेंसी नामित किया जा सकता है। यदि एसएमपी बीज को नोडल दायित्व दिया जाए, तो राज्यों को राज्य औषधि पादप बोर्डों के मुख्य कार्यकारी अधिकारी नियुक्त करने चाहिएं और जहां राज्य उदयानिकी मिशन नहीं हैं, उन राज्यों में निधियों को पहुंचाने के लिए एसएमपीबी को सोसायटियों के रूप में पंजीकृत कराया जाना अनिवार्य होगा।
राज्यों को क्षेत्र का विकास करने के लिए वार्षिक कार्य योजनाएं बनानी होंगी। सहायता केवल उन्हों राज्यों को देय होगी, जो राज्य कार्ययोजना बनाएंगे। जिन राज्यों में प्रसंस्करण अंचल/ समूह स्थापित किए जाएंगे, उनमें चिन्हित अंचलों/ समूह दलों के लिए विस्तृत परियोजना रिपोर्ट/ व्यापार योजनाएं तैयार करनी होंगी और राज्य कार्य योजना में विशेष व्यापार योजना/ परियोजना रिपोर्ट को शामिल करना होगा।
राष्ट्रीय औषधीय पादप बोर्ड ने राज्य कृषि विश्वविद्यालयों और विज्ञान तथा प्रौद्योगिकी मंत्रालय के अनुसंधान एवं विकास संस्थाओं में सुविधा केंद्र स्थापित किए हैं, ताकि वे औषधीय पादपों पर प्रौद्योगिकी हस्तांतरण, क्षमता निर्माण एवं प्रशिक्षण, विस्तार, विपणन सूचना पर पादप उगाने वालों/ कृषकों तथा उद्यमियों के लिए एक सेवा द्वार के रूप में कार्य कर सकें। राज्य कार्यान्वयन एजेंसी को इस मिशन के अधीन तकनीकी हैंड होल्डिंग के लिए सुविधा केंद्रों  के निकट समन्वय में काम करना चाहिए। 

राज्य सरकार इस योजना के अधीन विभिन्न कार्यकलापों के लिए एक वार्षिक कार्य योजना तैयार करेगी और राज्य मिशन स्तर पर अनुमोदन होने के पश्चात उसे राज्य वार्षिक कार्य योजना (एसएएपी) के संघटक के रूप में आयुष विभाग को अग्रेषित कर देगी। इस कार्य योजना में अन्य बातों के साथ-साथ पौधशाला, कृषि समूह और फसल उपरांत प्रबंधन एवं प्रसंस्करण के एकांशों तथा मूल्य संवर्धन का विवरण भी दिया जाना चाहिए। बोर्ड को इस कार्य योजना की सॉफट प्रति भी भेजी जाए।
राष्ट्रीय औषधीय पादप बोर्ड वार्षिक कार्य योजनाओं के औषधीय पादप संघटक को तकनीक छानबीन समिति के समक्ष रखेगा। तकनीकी छानबीन समिति द्वारा छानबीन किए जाने के उपरांत यह वार्षिक कार्य योजना राष्ट्रीय औषधीय पादप बोर्ड मूल्यांकन समिति और अनुमोदक निकाय के समक्ष रखी जाएगी, जो अपना अनुमोदन देकर उसे राज्य कार्यान्यवन एजेंसी को निधियां एक या एक से अधिक किस्तों में राज्य की समेकित निधि के माध्यम से वित्तीय सहायता निर्मुक्त करने की सिफारिश करेगी। इस उद्देश्य के लिए राज्य कार्यान्वयन एजेंसी को एनएएम के लिए सासायदी पंजीकरण अधिनियम के अधीन सोसायटी के रूप में पंजीकृत किया जाएगा, ताकि निधियां जिला एवं उप जिला स्तर या स्व-सहायता दलों, सहकारिता सोसायटियों या उत्पादक कंपनियों को, जैसा भी मामला हो, सीधे निर्मुक्त करने के लिए इसके माध्यम से भेजी जा सकें।

अनुमोदित कार्यकलापों और अलग-अलग किसानों/ कृषकों/ दलों के लिए निधियां विभिन्न समूहों में अलग-अलग कार्यकलापों के लिए छोटे लाभ भोगियों, दलों और उदमियों के आधार पर राज्य  कार्यान्यवन एजेंसियों द्वारा निर्मुक्त की जाएंगी। ऋण से संबद्ध सहायिकी उस क्षेत्र में किए गए कार्य का सत्यापन होने के बाद एक ही किस्त में निर्मुक्त की जाएं, परंतु इसके पूर्व क्षेत्र में की गई प्रगति के बारे में बैंक दवारा प्रमाणन किया जाना चाहिए। लंबी अवधि की फसलों और अन्य परियोजना कार्य कलापों के लिए तकनीकी छानबीन समिति किस्तों की उपयुक्त संख्या निश्चित करे, जो कार्य योजना को सुचारू रूप से लागू करने के लिए आवशयक हों। राज्य कार्यान्वयन एजेंसी दिशा-निर्देशों के अनुसार राष्ट्रीय आयुष मिशन के तहत विपणन के लिए योजना का निष्पादन करे और तकनीकी छानबीन समिति (टीएससी) तथा राज्य कार्यान्वयन एजेंसी के विचारार्थ भेजें।

बारहवीं योजना के अंत में पूरी अवधि का मूल्यांकन किया जाएगा। इस योजना के अधीन कार्यकलापों की प्रभावशाली आयोजना और कार्यान्वयन के लिए उस योजना की अवधि के लिए केन्द्र और राज्य दोनों स्तरों पर कार्यक्रम प्रबंधन परामर्शदाताओं की नियुक्ति की अनुमति दी जाएगी। परियोजना प्रबंध एकांश में कितने परामर्शदाता और डाटा इंट्रो ऑपरेटरों का सहायक स्टाफ होगा, जो उस योजना के प्रभावशाली कार्यान्वयन और अनुवीक्षण के लिए आवश्यक समझा जाएगा। इस क्षेत्र में विशेषज्ञता प्राप्त व्यावसायिक एजेंसियों का नियोजन करके स्वतंत्र समवर्तीअनुवीक्षण और मूल्यांकन भी किया जाएगा। यह योजना अपने कार्यान्वयन के तीन वर्षों के उपरांत मध्यावधि मूल्यांकन के अध्यधीन भी होगी।
राज्य -वार भौतिक लक्षय और परिवयय राज्य सरकारों से प्राप्त इस आशय के लिए प्रस्तावों और निधियों की उपलब्धता पर आश्रित होंगे। तकनीकी छानबीन समिति को इस योजना के अधीन उपलब्ध समग्र परिवयय के अंतर्गत विभिन्न कार्यकलापों में लक्ष्यों और परिव्यय को संशोधित करने का अधिकार होगा। डेढ़ लाख हेक्टेयर में फैली कृषि के लिए वित्तीय सहायता देने के लिए समग्र लक्ष्य औषधीय पादपों के उत्पादन को तीन लाख टनों तक बढ़ाना, लगभग 50 प्रतिशत वन संग्रहण पर आश्रितता को घटाना और निर्यात में मूल्यवर्धित मदों के अंश को बढ़ाना है।

चूंकि कार्य योजना/परियोजना का वास्तविक कार्यान्यवन राज्य मिशनों द्वारा किया जा रहा है, इसलिए यह सलाह देना उचित है कि राज्य मिशनों को अपने विशेषज्ञों के माध्यम से जमीनी सतह पर अपने कार्यकलापों में परामर्श दें और तदनुसार उन्हें ठीक करने के उपाय करें। इसलिए अलग-अलग किसानों द्वारा कृषि सहित उनके सभी कार्यकलापों का परामर्श और अनुवीक्षण उनकी अपनी कार्यान्यवन एजेंसियों द्वारा किया जाए और उनकी सहायिकियां इस प्रकार की परामर्श पद्धतियों के साथ जोड़ी जाएं। इस आशय के लिए राज्य मिशनों द्वारा वन/ उद्यानिकी/ कृषि विभागों के सेवानिवृत्त अधिकारियों एवं वैज्ञानिकों की सेवाएं किराए पर ली जानी चाहिए। राज्य मिशनों को औषधीय पादपों के बारे में कार्यक्रमों के अनुवीक्षण तथा परामर्श हेतु राज्य जिला/ ब्लॉक स्तर पर समितियां स्थापित करनी चाहिएं। राज्य सरकार इस योजना संघटक के संयुक्त परामर्श में राज्य औषधीय पादप बोर्डों को शामिल करने का निर्णय भी ले सकती है। ऐसा करने पर राज्य औषधीय पादप बोर्डों को सुदृढ़ बनाने के लिए कार्य योजना का एक प्रतिशत संबंधित राज्य को मंजूर किया जा सकता है, ताकि संयुक्त परामर्श तंत्र स्थापित किया जा सके।

राष्ट्रीय स्तर पर लागू की जाने वाली योजना की सफलता के लिए व्यापक तृतीय पक्ष अनुवीक्षण महत्वपूर्ण होता है। दो प्रकार की व्यवस्थाएं हो सकती हैं या तो विशेषज्ञों की प्रणाली के माध्यम से या किसी एजेंसी को किराये पर लेकर। किसी एजेंसी को किराए पर लेना एक बेहतर विकल्प है, क्योंकि सभी राज्यों में अनुवीक्षण में समानता रहेगी। राष्ट्रीय औषधीय पादप बोर्ड ने केंद्रीय क्षेत्रक योजना के अनुवीक्षण के लिए कृषि वित्त निगम को किराये पर लेने का अनुभव पहले ही कर लिया है। अनुवीक्षण में और उन्नयन करने की आवश्यकता है और अब तो अनुवीक्षण राष्ट्रीय स्तर की ऐसी एजेंसी द्वारा किया जाना चाहिए, जिसके पास पर्याप्त जनशक्ति और अवसंरचना हो। इस योजना के अधीन अलग-अलग किसानों द्वारा कृषि सहित स्थान और क्षेत्रों के बारे में आंकड़े भी जीपीएस प्रणाली के माध्यम से उठाए जाने चाहिएं, ताकि उन्हें आईएस पर आधारित प्रणालियों में प्रयुक्त किया जा सके। जीआईएस पर आधारित प्रणाली में दिए गए आंकड़ों का प्रयोग संबंधित कंपनी  द्वारा किया जाएगा और अस्थाई तथा स्थानिक विश्लेषण के लिए राष्ट्रीय औषधीय पादप बोर्ड को दिए जाने के लिए किया जाएगा। ये कंपनी निविदा प्रक्रिया के माध्यम से चुनी जाती है।

राष्ट्रीय औषधीय पादप बोर्ड औषधीय पादपों के विभिन्न क्षेत्रों में विशेषज्ञों की एक सूची विकसित करे और उन्हें विषय-वार/ प्रजाति-वार विशेषज्ञों को मुख्य तकनीकी सलाहकार के रूप में नामित करे और संस्थानों की पहचान उत्कृष्टता केंद्रों के रूप में करे। राज्य मिशनों की सलाह से छह महीने में एक बार संकेंद्रित अनुवीक्षण और परामर्शी दौरों का आयोजन किया जाए। संबंधित राज्यों के लिए आवश्यक विशेषज्ञों के दौरे से उनके महत्वपूर्ण कार्यकलापों के बारे में परामर्श के माध्यम से राज्य मिशनों को सहायता मिलेगी। यह भी प्रस्ताव दिया जाता है कि विशेषज्ञों का वही दल राष्ट्रीय औषधीय पादप बोर्ड की दोनों योजनाओं का अनुवीक्षण करे। राष्ट्रीय औषधीय पादप बोर्ड और सुविधा केंद्रों की स्थापना करके राज्य में क्षमता निर्माण करके राज्य में क्षमता निर्माण के माध्यम से संकेंद्रित अनुवीक्षण और हस्त संचालन के लिए वर्तमान सुविधा केंद्रों को मजबूत बनाएं।



(डॉ सौरभ मालवीय की पुस्तक- 'विकास के पथ पर भारत' से)

Friday, August 28, 2026

टीवी पर लाइव

 




सामाजिक न्याय का आधार—हर जरूरतमंद को अधिकार
आरक्षण का उद्देश्य समाज में समान अवसर और सामाजिक न्याय सुनिश्चित करना है। इसका लाभ उन जरूरतमंद और वंचित लोगों तक पहुँचना चाहिए, जिन्हें वास्तव में इसकी आवश्यकता है। जाति से ऊपर उठकर जरूरत, वंचित और सामाजिक-आर्थिक पिछड़ेपन को ध्यान में रखते हुए अधिकारों की व्यवस्था मजबूत हो.
सबका सम्मान, सबको अवसर और हर जरूरतमंद को अधिकार—यही सामाजिक न्याय का मूल मंत्र होना चाहिए

Thursday, August 27, 2026

राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन : ग्रामीणों के लिए हितकारी


देश में स्वास्थ्य सेवाओं का अभाव है। ग्रामीण क्षेत्रों की स्थिति तो बहुत दयनीय है। उपचार के अभाव में रोगियों की मृत्यु होने के समाचार भी सुनने को मिलते रहते हैं। देश की जनसंख्या की दृष्टि से देखें, तो उपलब्ध स्वास्थ्य सुविधाएं अपर्याप्त हैं। ग्रामीणों को स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराने के लिए सरकार ने 12 अप्रैल 2005 को राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन का शुभारंभ किया। यह केन्द्र सरकार की एक महत्वपूर्ण योजना है, जो स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा चलाई जा रही है।आरंभ में यह मिशन केवल सात वर्ष अर्थात 2005 से 2012 तक के लिए रखा गया था, परंतु बाद में इसे आगे बढ़ा दिया गया। 

इसका प्रमुख उद्देश्य सामुदायिक स्वामित्व की विकेंद्रित स्वास्थ्य प्रदान करने वाली प्रणाली विकसित करना है। यह ग्रामीण क्षेत्रों में सुगमता से वहनीय और जवाबदेही वाली गुणवत्तायुक्त स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराना है। यह योजना विभिन्न स्तरों पर चल रही लोक स्वास्थ्य सुपुर्दगी प्रणाली को मजबूत बनाने के साथ-साथ विद्यमान सभी कार्यक्रमों जैसे प्रजनन बाल स्वास्थ्य परियोजना, एकीकृत रोग निगरानी, मलेरिया, कालाज़ार, तपेदिक तथा कुष्ठ आदि के लिए एक ही स्थान पर सभी सुविधाएं प्रदान कराना है।संचारी और असंचारी रोगों की रोकथाम व नियंत्रण के कार्य करना, जनसंख्या नियंत्रण के साथ-साथ लिंग व जन सांख्यिकीय संतुलन सुनिश्चित करना, अन्य वैकल्पिक औषधी पद्धतियों आयुर्वेद, यूनानी एवं होम्योपैथी आदि को प्रोत्साहित करना भी इसमें सम्मिलित है। 
इसके अंतर्गत जन स्वास्थ्य को बेहतर बनाने के साथ-साथ बाल मृत्यु और मातृ दर को घटाना है। इसके लिए केवल स्वास्थ्य सेवाओं की ही नहीं, साथ में अन्य मूलभूत आवश्यकताओं जैसे पीने का पानी, सफाई व शौचालय, टीकाकरण और पर्याप्त पोषण का भी प्रबंध करना भी है। 
इस योजना को पूरे देश में विशेषकर उन 18 राज्यों में लागू किया गया, जिनमें स्वास्थ्य अवसंरचना अत्यंत दयनीय तथा स्वास्थ्य संकेतक निम्न हैं। इन राज्यों में अरुणाचल प्रदेश, असम, बिहार, छत्तीसगढ़, हिमाचल प्रदेश, झारखंड, जम्मू और कश्मीर, मणिपुर, मिज़ोरम, मेघालय, मध्य प्रदेश, नागालैंड, उड़ीसा, राजस्थान, सिक्किम, त्रिपुरा, उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश सम्मिलित हैं। इसके द्वारा वर्तमान प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों, सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों और जिला स्वास्थ्य केन्दों को सुदृढ़ बनाने और गैर सरकारी संगठनों का अधिकतम उपयोग करने की योजना है। इस मिशन के अंतर्गत किए जाने वाले कार्यों में स्वास्थ्य पर सरकारी खर्च में बढोत्तरी, स्वास्थ्य सेवाओं के ढांचा का सुधार, ग्रामीण स्वास्थ्य केंद्रों को मजबूत बनाना, देशी याब्नी परंपरागत आरोग्य प्रणालियों को बढावा देना, उन्हें स्वास्थ्य सेवाओं का मुख्य अंग बनाना, निजी स्वास्थ्य क्षेत्र का नियमीकरण, इसके लिए मापदंड और अधिनियम बनाना, निजी स्वास्थ्य क्षेत्र के साथ साझेदारी बनाना, लोगों को इलाज प्राप्त करने के लिए जो खर्च करना पड़ता है, उसके लिए उचित बीमा-योजनाओं का प्रबंध करना, जिला कार्यक्रमों का विकेंद्रीकरण करना ताकि ये जिला स्तर पर चला जा सकें, स्वास्थ्य के प्रबंधन में पंचायती राज संस्थाओं/ समुदाय की भागीदारी को बढाना, समयबद्ध लक्ष्य और कार्य की प्रगति पर जनता के सामने रिपोर्ट पेश करना आदि सम्मिलित है।
इस योजना के क्रियान्वयन में लगीं प्रशिक्षित आशा की भूमिका बहुत ही महत्वपूर्ण है। लगभग प्रति एक हजार ग्रामीण जनसंख्या पर एक आशा कार्यरत है। 

उप केंद्रों की क्षमताओं के विकास के लिए आवश्यकता के अनुसार नये उपकेंद्र उपकेंद्र के भवन का निर्माण करना, आवश्यकतानुसार एक और महिला स्वास्थ्य कार्यकर्ता एएनएम की नियुक्ति की जाएगा, जो उसी क्षेत्र की होगी। हर उप-केंद्र को 10 हजार रुपये की गैर मद निर्धारित अनुदान राशि दी जाएगी, जो सरपंच और महिला स्वास्थ्य कार्यकर्ता एएनएम के नाम से बैंक में जमा होगी। महिला स्वास्थ्य कार्यकर्ता इसका इस्तेमाल ग्राम स्वास्थ्य समिति से चर्चा करके कर सकती है। प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में सभी आवश्यक दवाइयां उपलब्ध होंगी। प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र के क्रियान्वयन के लिए कई महत्वपूर्ण कार्य कि जाएंगे, जैसे आवश्यकतानुसार भवन का निर्माण, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र 24 घंटे खुले रहेंगे और नर्सिंग की सुविधा उपलब्ध होगी। कुछ चुनिंदा प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र को 24 घंटे का अस्पताल बनाया जाएगा, जिसमें आपातकालीन सेवाएं प्राप्त हो सकें। प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में दो और नर्स की नियुक्ति की जाएगी, यानी कुल तीन नर्स आवश्यकता के अनुसार एक और चिकित्सक  आयुष चिकित्सक आयुर्वेदिक, यूनानी, होमियोपैथी की नियुक्ति की जाएगी।हर प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र को 10 हजार का अनुदान मिलेगा, जिसे स्थानीय स्वास्थ्य संबंधी कार्य के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र के रख-रखाव के लिए 50 हजार रुपये दिए जाएंगे।

प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र को चलाने के लिए इनमें रोगी कल्याण समिति का गठन किया जाएगा। प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र को प्रोत्साहित करने के लिए एक लाख रुपये का अनुदान दिया जाएगा। शर्त यह है कि यह राशि राज्य को तभी दी जाए, जब राज्य यह वचन दे कि रोगी कल्याण समित जो पैसा इकट्ठा करती है उसे वह उसी के पास रहेगा, राज्य के खाते में नहीं जाएगा। प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र की तरह सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों की क्षमता का विकास किया जाएगा, जिनमें 24 घंटे चिकित्सा सेवाएं उपलब्ध होंगी। उनमें आयुर्वेदिक, यूनानी एवं होमियोपैथी के चिकित्सक की नियुक्ति की जाएगी। सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों के भवनों का निर्माण या पुननिर्माण किया जाएगा। इनमें भी रोगी कल्याण समिति का गठन किया जाएगा। आवश्यकतानुसार नये सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र शुरू किए जा सकेंगे। सारे राष्ट्रीय कार्यक्रमों जैसे मलेरिया, टीबी आदि और परिवार कल्याण कार्यक्रमों का राज्य और ज़िला स्तर पर समन्वयन किया जाएगा। राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन के लिए जो ज़िला स्तर पर टीम बनेगी, उसमें निजी क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया जाएगा। `आशा´ कार्यक्रम के निरीक्षण के लिए एक निगरानी समूह का गठन किया जाएगा। जननी सुरक्षा योजना के अंतर्गत सामाजिक निगरानी और जवाबदेही के लिए प्रबंध किया जाएगा। इसके लिए गांव, जिला और राज्य के स्तर पर समितियां होंगी। जिला स्तर पर जन संवाद, राज्य स्तर पर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के आदेशों का पालन हो रहा है या नहीं, यह सुनिश्चित कर सरकार, राज्य और जिला अपने स्तर पर जन स्वास्थ्य की रिपोर्ट पेश करेगी। राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन में तीन तरीकों से जवाबदेही प्रक्रिया के ढांचे का प्रस्ताव किया गया है। इसमें आंतरिक निगरानी, सामयिक अध्ययन एवं सर्वेक्षण तथा समुदाय आधारित निगरानी शामिल है। समुदाय आधारित निगरानी को स्वास्थ्य के क्षेत्र में सामुदायिक पहलकदमी के एक कदम के रूप में समझा जा सकता है। अत: निगरानी एवं नियोजन समितियों का प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र, प्रखंड, ज़िला एवं राज्य स्तर पर प्रावधान किया गया है। समुदाय आधारित निगरानी प्रक्रिया वस्तुत: स्वास्थ्य सेवाएं प्रदान करना एवं प्रबंधन करने वालों, समुदाय एवं समुदाय आधारित संगठनों यथा स्वयंसेवी संस्थाएं और पंचायती राज संस्थाओं की आपसी साझेदारी एवं समझदारी से ही विकसित एवं सफल हो पाएंगी। 

उल्लेखनीय है कि स्वास्थ्य सुविधाओं में सहयोग बढ़ाने के लिए भारत और मोरक्को ने दिसम्बर 2017 में एक समझौता किया है। स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री जे.पी.नड्डा के अनुसार दोनों देशों के बीच मजबूत और समृद्ध पारंपरिक संबंध हैं। भारत जेनेरिक दवाओं का दो सौ से अधिक देशों को निर्यात कर रहा है और हमारे यहां एक मजबूत जन स्वास्थ्य प्रणाली काम करती है। इस प्रणाली की निगरानी राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के माध्यम से की जाती है। दोनों देशों के बीच सहयोग के मुख्य क्षेत्रों में बाल हृदय रोग और कैंसर सहित गैर-संचारी रोग, औषधि नियमन एवं गुणवत्ता नियंत्रण, संचारी रोग, मातृत्व, बाल एवं पूर्व-प्रसव स्वास्थ्य, बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं के आदान-प्रदान के लिए अस्पतालों के बीच सहयोग, स्वास्थ्य सेवाओं और अस्पतालों के प्रबंधन और प्रशासन में प्रशिक्षण आदि सम्मिलित है। एक समझौता जवाहरलाल इंस्टीट्यूट ऑफ पोस्ट-ग्रेजुएट मेडिकल एजुकेशन एंड रिसर्च और और मराकेश मोहम्मद विश्व विद्यालय अस्पताल के बीच हुआ। दोनों देशों के संस्थानों ने टेली-मेडिसन के क्षेत्र में सहयोग पर सहमति वयक्त की।

उल्लेखनी है कि राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन, राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन का एक घटक है। इसके कारण ग्रामीण क्षेत्रों के लोगों को स्वास्थ्य सुविधाएं मिल पा रही है। इस योजना को अभी उन क्षेत्रों तक ले जाना है, जहां स्वास्थ्य सेवाओं का अभाव है।



(डॉ सौरभ मालवीय की पुस्तक- 'विकास के पथ पर भारत' से)

राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम : भरपेट भोजन देने का प्रयास


देश में बेरोजगारी और गरीबी के कारण एक बड़ी जनसंख्या दो भरपेट भोजन उपलब्ध नहीं हो पा रहा है। अंतर्राष्ट्रीय खाद्या नीति अनुसंधान संस्थान के ग्लोबल हंगर इंडेक्स में वर्ष 2017 में भारत 100वें स्थान पर पहुंच गया है। देशों के इस सूचकांक में भारत 97वें स्थान पर था, किन्तु एक वर्ष में यह तीन अंक और गिर गया है। भूखे देशों के मामले में भारत उत्तर कोरिया, बांग्लादेश से भी पीछे है। अंतर्राष्ट्रीय खाद्या नीति अनुसंधान संस्थान के अनुसार भारत के बच्चों में भुखमरी की समस्या सबसे अधिक कुपोषण के कारण और यहां सामाजिक क्षेत्र के प्रति दृढ़ प्रतिबद्धता दिखाने की आवश्यकता है। भुखमरी के मामले में भारत एशिया में तीसरे स्थान पर है। केवल अफगानिस्तान और पाकिस्तान उससे पीछे हैं। सूचकांक में भारत का स्कोर 31.4 है, जो भुखमरी की ‘गंभीर’ श्रेणी में आता है। सूचकांक में भारत के पड़ोसी देशों में से अधिकतर की रैंकिंग उससे बेहतर है. इनमें चीन सबसे आगे है जो 29वें स्थान पर हैग्लोबल हंगर इंडेक्स  उसके बाद नेपाल 72वें, म्यांमार 77वें, श्रीलंका 84वें, बांग्लादेश 88वें, पाकिस्तान 106 और अफगानिस्तान 107वें स्थान पर हैं। उत्तर कोरिया 93वें और ईराक 78वें स्थान पर हैं। इस बार ग्लोबल हंगर इंडेक्स की रैंकिंग के चार मानदंड अल्पपोषण, बच्चों की मृत्यु दर, वृद्धि में रुकावट थे. भारत में पांच वर्ष से कम आयु के हर पांचवें बच्चे का भार उसकी लंबाई के हिसाब से बहुत कम है। कुपोषण और भुखमरी के कारण मौत होने के भयावह मामले भी प्रकाश में आते रहते हैं, जो अत्यंत चिंता का विषय हैं।

भुखमरी की समस्या को देखते हुए केन्द्र सरकार ने 10 सितम्बर, 2013 को राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम-2013 लागू किया। जिसका उद्देश्य लोगों को सस्ती दर पर पर्याप्त मात्रा में उत्तम खाद्यान्न उपलब्ध कराना है ताकि उन्हें खाद्य एवं पोषण सुरक्षा मिले और वे सम्मान के साथ जीवन जी सकें। राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अध्यादेश एक ऐतिहासिक पहल है, जिसके माध्यम से जनता को पोषण खाद्य और पोषण सुरक्षा सुनिश्चित की जा रही है। इससे लोगों को प्रचुर मात्रा में खाद्यान्न उचित दरों पर पाने का अधिकार मिलेगा। खाद्य सुरक्षा विधेयक का विशेष बल गरीब से गरीब व्यक्ति, महिलाओं और बच्चों की आवश्यकताएं पूरी करने पर होगा। अगर लोगों को अनाज नहीं मिल पाया, तो उन्हें खाद्य सुरक्षा भत्ता दिया जाएगा। इसमें शिकायत निवारण तंत्र की भी व्यवस्था है। अगर कोई जन सेवक या अधिकृत व्यक्ति इसका अनुपालन नहीं करेगा, तो उसके विरुद्ध शिकायत की सुनवाई हो सकेगी। 

देश की 70 प्रतिशत ग्रामीण जनसंख्या और 50 प्रतिशत शहरी जनसंख्या को हर महीने बहुत ऊंची अनुदान वाली दरों पर यानी तीन रूपये, दो रूपये, एक रुपये प्रति किलो चावल, गेहूं और मोटा अनाज पाने का अधिकार होगा। इससे 1.2 अरब जनसंख्या के दो तिहाई भाग को लक्षित सार्वजनिक वितरण व्यवस्था के अंतर्गत अनुदान वाला खाद्यान्न पाने का अधिकार मिलेगा। समाज के अति गरीब वर्ग के हर परिवार को हर महीने अंत्योदय अन्न योजना के अंतर्गत तीन रुपये, दो रुपये, एक रूपये की दरों पर अनुदान वाले खाद्यान्न की आपूर्ति जारी रहेगी। राज्यों/ केंद्र शासित प्रदेशों को मौजूदा दर पर खाद्यान्न की आपूर्ति होती रहेगी और इसे तभी कम किया जाएगा, जब पिछले तीन वर्षों तक उनकी औसत उठान इससे कम हो।

अखिल भारतीय स्तर की शहरी जनसंख्या के 50 प्रतिशत और ग्रामीण जनसंख्या के 75 प्रतिशत को इस योजना के अंतर्गत लाभान्वित करने का निर्णय केंद्र सरकार द्वारा किया जाएगा। इस मामले में पात्र परिवारों की पहचान का दायित्व राज्यों/केंद्र शासित प्रदशों पर छोड़ दिया गया है, जो इसके लिए अगर चाहें तो सामाजिक आर्थिक और जाति जनगणना के आंकड़ों के आधार पर मापदंड बना सकते हैं।

इसमें महिलाओं और बच्चों के पोषण संबंधी समर्थन पर विशेष रूप से बल दिया जा रहा है। गर्भवती महिलाओं और दूध पिलाने वाली माताएं निर्धारित पोषण संबंधी मापदंडों के अनुरूप पोषक भोजन पाने की अधिकारी होंगी। उन्हें कम से कम 6 हजार रुपये मातृत्व लाभ भी मिलेगा। 6 महीने से 14 वर्ष तक की आयु वर्ग तक के बच्चे घर पर राशन पाने अथवा पोषण संबंधी मापदंडों के आधार पर गर्म पका भोजन पाने के अधिकारी होंगे।

केंद्र सरकार राज्यों/संघ शासित प्रदेशों को निधियां प्रदान करेंगी, जिसे वे अनाज की आपूर्ति कम होने पर उपयोग कर सकेंगे। अगर अनाज की आपूर्ति बिल्कुल नहीं की जाती, तो ये व्यक्ति भोजन पाने के अधिकारी होंगे और संबंधित राज्य/ संघ शासित सरकार को उन्हें ऐसा खाद्य सुरक्षा भत्ता देना होगा जैसा कि केंद्र सरकार लाभार्थियों के लिए निर्धारित करे। अतिरिक्त वित्तीय बोझ के संबंध में राज्यों की चिंता को दूर करने के लिए केंद्र सरकार खाद्यान्नों की राज्य से बाहर ढुलाई और रख-रखाव तथा उचित दर दुकानदारों के लाभ के बारे में राज्यों को सहायता उपलब्ध कराएगी। इसके लिए मानक विकसित किए जाएंगे। इससे खाद्यान्नों की समय पर ढुलाई और प्रभावी रख-रखाव सुनिश्चित हो जाएगा। इसमें खाद्यान्नों की घर-घर तक आपूर्ति, कंप्यूटरीकरण सहित सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी का अनुप्रयोग, लाभार्थियों की विशिष्ट पहचान के लिए 'आधार' का लाभ खाद्य सुरक्षा अधिनियम के प्रभावी कार्यान्वयन के लिए टीपीडीएस आदि के अधीन उपभोक्ता वस्तुओं की विविधता को सार्वजनिक वितरण प्रणाली में सुधार लाने के प्रावधान शामिल हैं।
 
18 साल या अधिक आयु की महिला राशन कार्ड जारी करने के लिए घर की मुखिया होगी। अगर ऐसा नहीं है, तो सबसे बड़ा पुरुष सदस्य घर का मुखिया होगा। राज्य और जिला स्तर पर शिकायत निवारण तंत्र स्थापित होगा, जिसमें नियत अधिकारी तैनात किए जाएंगे। राज्यों को नये निवारण तंत्र की स्थापना पर होने वाले वय्य को बचाने के लिए अगर वे चाहें, तो जिला शिकायत निवारण अधिकारी राज्य खाद्य आयोग के लिए वर्तमान तंत्र को प्रयोग करने की अनुमति होगी। निवारण तंत्र में कॉल सेंटर, हेल्पलाइन आदि भी शामिल किए जा सकते हैं।
 
पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए सार्वजनिक वितरण प्रणाली से संबंधित रिकॉर्ड सार्वजनिक करने के लिए सामाजिक लेखा परीक्षा और सतर्कता समितियां स्थापित करने के प्रावधान भी किए गए हैं। जिला शिकायत निवारण अधिकारी द्वारा सिफारिश की गई राहत का अनुपालन करने में असफल रहने के दोषी पाए जाने पर जनसेवक या नियत अधिकारी पर जुर्माना लगाने का भी इस विधेयक में प्रावधान है। सतर्कता समितियों का अस्तित्व राशन प्रणाली के प्रारंभ से ही है। केंद्रीय सरकार सार्वजनिक वितरण प्रणाली की निगरानी और राशन कार्ड धारकों, उपभोक्ता कार्यकर्ताओं और संसद सदस्यों को पुनर्गठन के लिए सदस्यों के रूप में जोड़कर इन समितियों को सक्रिय बनाने के उद्देश्य से समय-समय पर राज्य सरकारों से अनुरोध करती आ रही है। नवम्बर, 1997 में जारी आदर्श नागरिक अधिकार-पत्र में राज्य सरकारों द्वारा पंचायत/वार्ड, तालुक, जिला और राज्य/संघ राज्य क्षेत्र के स्तरों पर सतर्कता समितियों के गठन पर बल दिया गया था। टीपीडीएस के कार्यान्वयन में पंचायती राज संस्थाओं को शामिल करने के संबंध में जून, 1999 में जारी किए गए दिशा-निर्देशों में यह उल्लेख किया गया था कि ग्राम पंचायतों/ग्राम सभाओं को उचित दर दुकानों की समितियां गठित करने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। सतर्कता समितियों के प्रमुख कार्य सार्वजनिक वितरण प्रणाली के सुचारू कार्यकरण और उससे संबंधित समस्याओं के निपटान को सुनिश्चित करना है। सरकार ने राज्यों/संघ राज्य क्षेत्रों को उचित दर दुकानों/पंचायत, ब्लॊक, जिला और राज्यों/संघ राज्य क्षेत्रों के स्तर पर सतर्कता समितियां गठित करने के निर्देश जारी किए हैं, जिसमें सार्वजनिक वितरण प्रणाली के अंतर्गत योजनाओं/उचित दर दुकानों के कार्यकरण की आवधिक समीक्षा करने के लिए सरकार, सामाजिक संगठनों, उपभोक्ता संगठनों और स्थानीय निकायों के सदस्यों को शामिल किया है। ग्राम/उचित दर दुकान, ब्लॊक, जिला और राज्य स्तर पर सतर्कता समितियों के अध्यक्ष के रूप में क्रमश: सरपंच, प्रधान, प्रमुख और खाद्य मंत्री/खाद्य सचिवों को शामिल करने के लिए राज्यों/संघ राज्य क्षेत्रों को निर्देश जारी किए गए हैं। 
31 अगस्त, 2001 को अधिसूचित सार्वजनिक वितरण प्रणाली (नियंत्रण) आदेश, 2001 में राज्य सरकार द्वारा राज्य, जिला, ब्लॊक और उचित दर दुकान के स्तर पर सतर्कता समितियों की कम से कम तिमाही आधार पर बैठकें आयोजित करने का प्रावधान है। बैठकों की तिथि और अवधि राज्य सरकार द्वारा अधिसूचित की जानी है। सतर्कता समितियों के प्रावधानों को और अधिक सुदृढ़ करने के उद्देश्य से समितियों की स्थापना को राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम, 2013 के प्रावधानों के अंतर्गत लाया गया है। इन प्रावधानों की व्याख्या दिनांक 20 मार्च,2015 को अधिसूचित नये लक्षित सार्वजनिक वितरण व्यवस्था(नियंत्रण) आदेश, 2015 में और अधिक स्पष्ट की गई है। लक्षित सार्वजनिक वितरण प्रणाली (नियंत्रण) आदेश, 2015 को आवश्यक वस्तु अधिनियम 1955 की धारा 3 के अंतर्गत और राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम, 2013 के अनुरूप सार्वजनिक वितरण प्रणाली (नियंत्रण) आदेश, 2001 का अधिक्रमण करते हुए 20 मार्च, 2015 को अधिसूचित किया गया है। 

उल्लेखनीय है कि लक्षित सार्वजनिक वितरण प्रणाली वर्ष 1997 से शुरू की गई थी। पुनर्गठित सार्वजनिक वितरण प्रणाली सार्वजनिक वितरण प्रणाली को सुदृढ़ बनाने और सुप्रवाही बनाने और इसकी पहुंच दूर-दराज, पहाड़ी, सुदुरवर्ती और दुर्गम क्षेत्रों तक वृद्धि करने की दृष्टि से, जहां गरीबों की बड़ी आबादी रहती है, जून, 1992 में शुरू की गई थी। इसमें 1775 ब्लॉकों को कवर किया गया था, जहां सूखा प्रवण क्षेत्र कार्यक्रम, एकीकृत जनजातीय विकास परियोजना, मरूस्थल विकास कार्यक्रम और विशेष लक्ष्य हेतु राज्य सरकारों के परामर्श से पहचान किए गए कुछ पहाड़ी क्षेत्र जैसे क्षेत्र विशिष्ट कार्यक्रम कार्यान्वित किए गए थे। पुनर्गठित सार्वजनिक वितरण प्रणाली में वितरण के लिए खाद्यान्न केंद्रीय निर्गम मूल्य से 50 पैसे कम मूल्य पर जारी किए गए थे। निर्गम की मात्रा 20 किलोग्राम प्रति कार्ड तक थी। पुनर्गठित सार्वजनिक वितरण प्रणाली में सार्वजनिक वितरण प्रणाली की जिन्सों की प्रभावी पहुंच, राज्य सरकारों द्वारा पहचान किए गए क्षेत्रों में उचित दर दुकानों द्वार तक उनकी सुपुर्दगी, छोड़ दिए गए परिवारों को अतिरिक्त राशन कार्ड, अतिरिक्त उचित दर दुकान भंडारण क्षमता आदि जैसी इंफ्रास्ट्रक्चर संबंधी आवश्यकताओं और सार्वजनिक वितरण प्रणाली के दुकानों के जरिए वितरण हेतु चाय, नमक, दाल, साबुन आदि जैसे अतिरिक्त वस्तुओं की पहुंच सुनिश्चित करने के लिए क्षेत्र आधारित दृष्टिकोण शामिल थे।

सरकार ने गरीबों पर ध्यान केन्द्रित करते हुए जून, 1997 में लक्षित सार्वजनिक वितरण प्रणाली शुरू की थी। लक्षित सार्वजनिक वितरण प्रणाली के अधीन राज्यों के लिए यह अपेक्षित था कि वे खाद्यान्नों की सुपुर्दगी देने और उचित दर दुकान स्तर पर इनका पारदर्शी और जवाबदेह तरीके से वितरण करने के लिए गरीबों की पहचान करने की पुख्ता व्यवस्था बनाए और क्रियान्वित करें। लक्षित सार्वजनिक वितरण प्रणाली के अंतर्गत अंत्योदय अन्न योजना को लागू करना गरीबी रेखा से नीचे की आबादी के निर्धनतम वर्ग के बीच भुखमरी को कम करने की दिशा में उठाया गया एक कदम है। राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण ने इस तथ्य की ओर संकेत किया था कि देश में कुल जनसंख्या के लगभग 5 प्रतिशत भाग दो समय का भोजन भी नहीं मिल पाता। लक्षित सार्वजनिक वितरण प्रणाली को जनसंख्या के इस वर्ग के प्रति और अधिक केंद्रित और लक्षित करने के लिए एक करोड़ निर्धनतम परिवारों के लिए दिसम्बर, 2000 में अंत्योदय अन्न योजना' शुरू की गई थी। अंत्योदय अन्न योजना में राज्य में लक्षित सार्वजनिक वितरण प्रणाली के अधीन कवर किए गए गरीबी रेखा से नीचे के परिवारों में से एक करोड़ निर्धनतम परिवारों की पहचान करने और उन्हें दो रुंपये प्रति किलोग्राम गेहूं और तीन रुंपये प्रति किलोग्राम चावल की अत्यधिक राज सहायता प्राप्त दरों पर खाद्यान्न प्रदान करने की परिकल्पना की गई थी। निर्गम की मात्रा जो प्रारंभ में 25 किलोग्राम प्रति परिवार प्रति माह थी, उसे 1 अप्रैल, 2002 से बढ़ाकर 35 किलोग्राम प्रति परिवार प्रति माह कर दिया गया।

गरीबी रेखा से नीचे के 50 लाख अतिरिक्त परिवारों को शामिल करके वर्ष 2003-04 में अंत्योदय अन्न योजना का विस्तार किया गया। इसमें वे परिवार शामिल किए गए थे, जिनकी मुखिया विधवा अथवा असाध्यरोगी या अपंग व्यक्ति अथवा 60 वर्ष या उससे अधिक की आयु के व्यक्ति थे और जिनकी जीविका का सुनिश्चित साधन नहीं था या जिन्हें सामाजिक सहायता प्राप्त नहीं थी। इस वृद्धि के साथ अंत्योदय अन्न योजना में 1.5 करोड़ परिवार अर्थात गरीबी रेखा से नीचे के 23 प्रतिशत लोग शामिल किए गए।
केन्द्रीय बजट 2004-05 में की गई घोषणा के अनुसार इस योजना का और विस्तार किया गया, जिसमें अन्य बातों के साथ-साथ भुखमरी के खतरे वाले सभी परिवारों को शामिल करके गरीबी रेखा से नीचे 50 लाख के और परिवार इस योजना में शामिल किए गए। इस बारे में 3 अगस्त, 2004 को आदेश जारी किए गए। इन परिवारों की पहचान करने के लिए जारी दिशा-निर्देशों में निम्नलिखित मानदंड निर्धारित किए गए, उनमें ग्रामीण और शहरी, दोनों क्षेत्रों में भूमिहीन कृषि श्रमिक, सीमांत किसान,ग्रामीण दस्तकार, शिल्पी कुम्हार, मोची, बुनकर, लोहार,बढ़ई, झुग्गी-झोपड़ी में रहने वाले जैसे ग्रामीण दस्तकार और कुली, रिक्शाचालक, हथठेला चालक, फल और फूल विक्रेता, सपेरे, कबाड़ी, मोची जैसे अनौपचारिक क्षेत्र में दिहाड़ी आधार पर जीविका अर्जित करने वाले व्यक्ति, निराश्रित और इसी प्रकार की अन्य श्रेणियों के परिवार शामिल है। इनमें वे परिवार भी शामिल हैं, जिनकी मुखिया विधवा अथवा असाध्य रोग ग्रस्त व्यक्ति या अपंग व्यक्ति अथवा 60 वर्ष या उससे अधिक की आयु के व्यक्ति अथवा अकेली महिला या पुरुष हैं और जिनकी जीविका का कोई सुनिश्चित साधन नहीं है अथवा जिन्हें पारिवारिक अथवा सामाजिक सहायता प्राप्त नहीं है। इनमें विधवाएं अथवा असाध्य रोग ग्रस्त अथवा विकलांग व्यक्ति या 60 वर्ष अथवा उससे अधिक की आयु के व्यक्ति या अकेली महिला अथवा अकेला पुरुष जिन्हें कोई पारिवारिक अथवा सामाजिक समर्थन प्राप्त नहीं है या जिनकी जीविका का कोई सुनिश्चित साधन नहीं है, उन्हें भी शामिल किया गया है। सभी आदिम आदिवासी परिवारों को भी इसमें सम्मिलित किया गया है। इस वृद्धि के साथ अंत्योदय अन्न योजना परिवारों की संख्या बढ़कर दो करोड़ परिवार अर्थात् गरीबी रेखा से नीचे की 30.66 प्रतिशत आबादी हो गई। केन्द्रीय बजट 2005-06 में की गई घोषणा के अनुसार अंत्योदय अन्न योजना का और विस्तार किया गया, ताकि गरीबी रेखा से नीचे के और 50 लाख और परिवारों को कवर किया जा सके। इस प्रकार इसका क्षेत्र बढ़कर 2.5 करोड़ परिवार अर्थात् गरीबी रेखा से नीचे की 38 प्रतिशत जनसंख्या हो गई।

वर्ष 1997 से गरीबी रेखा से नीचे के परिवारों के लिए निर्गम की मात्रा को 10 किलोग्राम से धीरे-धीरे बढ़ाकर 35 किलोग्राम प्रति परिवार प्रति माह कर दिया गया है। पहली अप्रैल, 2000 से निर्गम की मात्रा को 10 किलोग्राम से बढ़ाकर 20 किलोग्राम प्रति परिवार प्रति माह कर दिया गया था। गरीबी रेखा से नीचे के परिवारों के लिए खाद्यान्नों के आवंटन को जुलाई, 2001 से 20 किलोग्राम प्रति परिवार प्रति माह से और बढ़ाकर 25 किलोग्राम प्रति परिवार प्रति माह कर दिया गया। पहले इस योजना की शुरुआत के समय अंत्योदय परिवारों को 25 किलोग्राम खाद्यान्न प्रति परिवार प्रति माह दिया जाता था। परिवार स्तर पर खाद्य सुरक्षा में वृद्धि करने की दृष्टि से गरीबी रेखा से ऊपर, गरीबी रेखा से नीचे और अंत्योदय अन्न योजना के अधीन निर्गम की मात्रा को पहली अप्रैल, 2000 से संशोधित कर 35 किलोग्राम प्रति परिवार प्रति माह कर दिया गया है।

सार्वजनिक वितरण प्रणाली अभाव की स्थिति में खाद्यान्नों के प्रबंधन करने और उचित मूल्यों पर वितरण करने के लिए तैयार की गई थी। सार्वजनिक वितरण प्रणाली देश में खाद्य अर्थव्यवस्था के प्रबंधन के लिए सरकार की नीति का एक महत्वपूर्ण अंग बन गई है। सार्वजनिक वितरण प्रणाली अनुपूरक स्वरूप की है और इसका उद्देश्य किसी परिवार अथवा समाज के किसी वर्ग को इसके अंतर्गत वितरित किसी वस्तु की समस्त आवश्यकता उपलब्ध कराना नहीं है।

खाद्यान्न वितरण में अकसर धांधली के समाचार मिलते रहते हैं। इस बारे में शासन-प्रशासन को दोषियों के विरुद्ध कड़ी कार्रवाई करनी चाहिए। यह एक कल्याणकारी योजना है,  इसका लाभ सभी पात्रों को मिले, यह सरकार को सुनिश्चत करना होगा।



(डॉ सौरभ मालवीय की पुस्तक- 'विकास के पथ पर भारत' से)

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न्यूयॉर्क में गूंजेगा ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ का संदेश
 राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक  का न्यूयॉर्क में भव्य कार्यक्रम होने जा रहा है। 29 अगस्त को मैडिसन स्क्वायर गार्डन में आयोजित ‘Universal Oneness Celebration’ में वे भारतीय मूल के लोगों और विभिन्न समुदायों के प्रतिनिधियों को संबोधित करेंगे।
अमेरिका में बसे हिंदू एवं भारतीय मूल के लोगों में इस कार्यक्रम को लेकर उत्साह है। यह आयोजन भारतीय संस्कृति, मानवीय एकता, सामाजिक समरसता और ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की भावना को वैश्विक मंच पर प्रस्तुत करने का अवसर है।
भारत की सांस्कृतिक चेतना अब वैश्विक संवाद का हिस्सा बन रही है।

विचार गोष्ठी



लखनऊ। राष्ट्रधर्म मासिक पत्रिका कार्यालय, राजेंद्र नगर में राजभाषा हिंदी की संवैधानिक एवं वर्तमान स्थिति विषय पर आयोजित विचार गोष्ठी में डॉ. दिनेश शर्मा जी ने अपने विचार व्यक्त किए।
 हिंदी के संवैधानिक महत्व, राजकीय कार्यों में इसके व्यापक प्रयोग तथा वर्तमान समय में हिंदी को और अधिक सशक्त एवं प्रभावी बनाने के विभिन्न पहलुओं पर सार्थक चर्चा हुई। हिंदी हमारी संस्कृति, विचार और राष्ट्रीय एकता की सशक्त अभिव्यक्ति है। इसे जन-जन की भाषा के साथ-साथ प्रशासन, शिक्षा, तकनीक एवं ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्रों में और व्यापक रूप से प्रतिष्ठित करना हम सभी का दायित्व है।
इस अवसर पर आ.डॉ. दिनेश शर्मा जी, सांसद एवं पूर्व उप मुख्यमंत्री उत्तर प्रदेश का विशेष सान्निध्य मिला।

आयुष्मान भारत : अब महंगा उपचार भी संभव हुआ

देश में एक बड़ी जनसंख्या निवास करती है। जनसंख्या के अनुपात में अभी देश में स्वास्थ्य केंद्रों की कमी है। लोगों को समय पर पर्याप्त स्वास्थ्य स...