Wednesday, July 1, 2026

ग़ालिब उर्दू और फ़ारसी के महान कवि हैं

   


उर्दू और फ़ारसी के महान शायर मिर्ज़ा ग़ालिब पर 13 दिसंबर, 1998 को आयोजित समारोह में श्री अटल बिहारी वाजपेयी ने उर्दू के महत्व पर प्रकाश डाला. अपने संबोधन में उन्होंने कहा कि मैं बड़ी मुश्किल में हूं. मुझे बोलने के लिए सिर्फ़ दस मिनट दिए गए हैं. ’उम्रे-दराज मांग कर लाए थे.’ कुल दस मिनट हैं. हम राजनेता बोलते हैं तो फिर रुकने का नाम नहीं लेते. फिर मिर्ज़ा ग़ालिब के बारे में बोलना. मैं उर्दूदां नहीं हूं. लेकिन मिर्ज़ा साहब को मैंने पढ़ा है. वे विश्व के महाकवियों में से एक हैं. उर्दू और फ़ारसी में उन्होंने जो कुछ लिखा है, वह विश्व साहित्य की एक धरोहर है. मैं उनके बारे में क्या कहूं ? जब मैं तकरीर की तैयारी कर रहा था और किताबें इधर-उधर फैली थीं, तो उनके एक शेर पर मेरी नजर पड़ी. 
पूछते हैं वो कि ग़ालिब कौन है
कोई बतलाओ कि हम बतलाएं क्या ?

मैं नहीं जानता कि यह शेर किस संदर्भ में कहा गया. लेकिन यह उन्हीं का शेर है. ग़ालिब कौन ? इसके जवाब में लंबी-चौड़ी तकरीरें की जा सकती हैं. किताबें लिखी गई हैं, शोध हुए हैं. और यह सिलसिला लगातार चलता रहेगा. 

मिर्ज़ा ग़ालिब एक बड़े योद्धा वंश के वंशधर थे. फ़ारसी के अप्रतिम विद्वान. मुगल साम्राज्य के इतिहास मंल अपने समय के प्रतिष्ठित स्वाभिमानी नागरिक. फ़ारसी और उर्दू के महान कवि या फिर मध्यकाल और आधुनिक काल की युग-संधि पर खड़े हुए एक संवेदनशील व्यक्ति. दो सौ साल पुरानी बात है. मुगल साम्राज्य खत्म हो रहा था, मगर पूरी तरह खत्म नहीं हुआ था. अंग्रेज हमारे मुल्क में पांव जमाने में लगे थे, मगर पूरी तरह पांव जमे नहीं थे. एक संक्रमण का काल था. अब उस संक्रमण के काल में मिर्ज़ा ग़ालिब ने लिखा- उन्होंने अपनी पीड़ा के बारे में लिखा. लेकिन सार्वजनिक पीड़ा भी उनकी वाणी में अभिव्यक्त हुई. खुद अपने बारे में उन्होंने लिखा था-
होगा कोई ऐसा भी कि ग़ालिब को न जाने
शायर तो वह बहुत अच्छा है, मगर बदनाम बहुत है

किस बांकपन से अपने को बदनाम करने वालों को निरुत्तर करते हुए उन्होंने अच्छे शायर के रूप में सर्वविदित होने का दावा किया है. इसी क्रम को बढ़ाया जाए, तो उन्हीं के शब्दों में कहा जा सकता है कि उनकी खास विशेषता अंदाजे-बयां या वर्णन का उनका अदभुत तेवर है-
हैं और भी दुनिया में सुखनवर बहुत अच्छे
कहते हैं कि ग़ालिब का है अंदाज़े-बयां और

इस शेर में उन्होंने अपने को बहुत अच्छा सुखनवर कहते हुए, सुखनवर कवि और काव्यमर्मज्ञ दोनों का समावेश किया है.  अपनी खासियत अंदाजे-बयां को बताया है, जो और शायरों से बहुत भिन्न है. मरने के बाद उनके किस गुण को याद करके उनके मित्र सिर धुनेंगे. इस सवाल का जवाब भी ग़ालिब खुद दे गए हैं-  
क्या बयां करके रोएंगे मेरे यार
मगर आशुफ़्ता-बयानी मेरी

साफ है कि ग़ालिब को दूसरों को विकल बनाने की अपनी जो क्षमता थी, उस पर भरोसा था. उस समय काव्य के विषय सीमित थे. ग़ालिब बड़ी पृष्ठभूमि में लिखना चाहते थे. व्यापक और विस्तृत उनका परिवेश था. लेकिन सबमें बात कहने की उनकी जो वक्रता है, वो उनको सब शायरों से अलग कर देती है. उनकी कविता से यह बात साफ झलकती है कि मध्य युग से जुड़े होते हुए भी वे आधुनिकता की ओर मुड़ना चाहते थे-
बकद्रे-शौक नहीं दर से तंग ना एक गजल
कुछ और चाहिए बुसत मेरे बयां के भी हैं

कुछ और चाहिए. यह स्पष्ट है कि ग़ालिब जिन भावों को अपने काव्यों में लाना चाहते थे, वे तत्कालीन काव्य के दायरे में नहीं समा पा रहे थे. अतत: वे काव्य के क्षेत्र के और विस्तार के पक्ष में थे.

ग़ालिब मुख्यत: इंसानी रिश्तों के कवि थे.  अपने जीवन की सार्थकता और विफलता, दोनों के लिए ही वे इश्क को जिम्मेदार मानते थे. उनका सुप्रसिद्ध शेर है-
इश्क से तबीयत से जिस्त मजा पाया
दर्द की दवा पाई और दर्द बेदवा पाया

उन्हें जीवन का आनंद प्रेम से ही मिला था, जो एक ही साथ उनके सभी दर्दों की दवा भी था और ऐसा दर्द भी था, जिसकी कोई दवा नहीं थी. कोई पूछ सकता है कि अगर यह दर्द बेदवा है, तो फिर इसे पालने की जरूरत क्या है ? ग़ालिब का मासूम उत्तर है-
इश्क पर जोर नहीं है, ये वो आतिश है ग़ालिब
कि लगाए न लगे, बुझाए न बुझे

मगर उन्होंने आगे यह भी कहा-
इश्क ने ग़ालिब निकम्मा कर दिया
वरना वो (हम) भी आदमी थे काम के

मैंने थोड़ा-सा बदल दिया है. हम की जगह वो. लेकिन मैं इतना कहना चाहूंगा कि उस युग के बहुत से काम के आदमी न जाने किधर बिला गए. पर प्रेम प्रकाश में प्रदीप्त ग़ालिब आज भी असंख्य लोगों के हृदय के हार बने हुए हैं. उन लोगों को लगता है कि ग़ालिब ने उन लोगों के दिल की बात कितने अच्छे ढंग से कितनी खूबसूरती से पेश की है. दुख में, सुख में, प्रेम के उल्लास में, प्रेमी की हताशा में, निराशा में ग़ालिब की पंक्तियों को दोहराकर लोग सुकून पाते हैं. ग़ालिब अपनी संभावना को समझ गए थे और उन्होंने इस बात को कहा भी था.
कवि की सबसे बड़ी सार्थकता यह है कि आम आदमी उसके साथ अपने को जोड़ सके और यह समझ सके कि उसके दिल का दर्द कहीं आवाज पा रहा है. किसी और के हृदय को झनझना रहा है. ग़ालिब की प्रेमानुभूति, इश्कमिजाजी और इश्क हकीकी के दोनों छोरों से जुड़ी हुई है, लेकिन मानवता को समर्पित है. उस युग के कवियों का एक तीसरा पहलू बड़ी मुश्किल से मिलता है.
इश्क मुझको नहीं वहशत ही सही
मेरी वहशत मेरी शोहरत ही सही
कता कीजे न ताल्लुक हमसे
कुछ नहीं है तो अदावत ही सही

यह सियासत पर बहुत फिट बैठता है.
-डॉ. सौरभ मालवीय

(पुस्तक- 'राष्ट्रवादी पत्रकारिता के शिखर पुरुष अटल बिहारी वाजपेयी' से)

भारतीय साहित्य की अनमोल निधि है गीत रामायण

   


महाराष्ट्र के पुणे में 1982 में आयोजित गीत रामायण के शातकोत्तर रजत जयंती समारोह को संबोधित करते हुए श्री अटल बिहारी वाजपेयी ने गीत रामायण पर प्रकाश डाला. अपने संबोधन में उन्होंने कहा- आज चैत्र सुदी का पवित्र और ऐतिहासिक प्रसंग है. नये संवत्सर का प्रारंभ हो रहा है. हमारी आंखों के सामने अतीत का एक चित्र उपस्थित होता है. परकीयों का पराभव करके राष्ट्रीय अस्मिता और राष्ट्रीय गौरव की स्थापना करने वाले महापुरुष हमें प्रेरणा देने के लिए वर्ष प्रतिपदा के मुहूर्त पर हमारी स्मृति के आकाश में ज्वलंत नक्षत्र के रूप में चमकते हैं. इस अवसर पर पुणे की नगरी में गीत रामायण का रजत महोत्सव एक महत्वपूर्ण घटना है. यह हमारे सांस्कृतिक जीवन में एक मील का पत्थर है. रामकथा हजारों वर्षॊं से लोकमानस को आंदोलित और  आप्लावित करती रही है. नवरसों का यह प्रवाह कभी न समाप्त होने वाला प्रवाह है, अनंत है, अगाध है.

किसी काल में कोई कवि किसी रंग को गाढ़ा या प्रगाढ़ कर देता था. किसी युग में कोई लेखक किसी रस को अधिक उभार कर रख देता था. कभी महाकाव्य के रूप में, कभी प्रबंधकाव्य के रूप में, कभी खंडकाव्य के रूप में. रामकथा इस देश की सभी दिशाओं में, सभी भाषाओं में, मानवजीवन की सभी आशाओं में, निराशाओं में, जयों में-पराजयों में हमारा संबल बनकर, हमारा पाथेय बनकर, संकट के समय संजीवनी बनकर, आनंद के समय इस आनंद को भौतिक धरातल से उठाकर आध्यात्मिकता की चोटी तक पहुंचाने का काम करती रही है.  विदेशों के बाहर भी रामकथा प्रचलित है, प्रवाहित है, अलंकृत है. हमारे सभी पड़ोसी देश भी किसी न किसी रूप में रामकथा से परिचित हैं, उसका अभिनय करते हैं.

जहां परिस्थितियों  के परिवर्तन के कारण इस्लाम का पदार्पण हुआ, वहां भी प्राचीन संस्कृति के एक अनमोल अंग के रूप में रामायण जानी जाती है. बर्मा की राजधानी रंगून में मुझे एक सांस्कृतिक कार्यक्रम देखने का अवसर मिला, जिसमें उन्होंने रामकथा के उस भाग को प्रस्तुत किया था, जहां सोने का मृग सीता का मन मोह कर चला गया और राम को पत्नी से हाथ धोना पड़ा. बर्मी भारतीय नहीं हैं, किंतु बर्मा के लोकमानस में रामायण की छाप है. इंडोनेशिया में एक महीने तक रामायण का अभिनय होता है. रामायण वहां की सांस्कृतिक चेतना का अभिन्न अंग है. लाओस में रामायण प्रचलित है. थाइलैंड में, कंबोडिया में में श्रीलंका के बारे में तो इतने निश्चय के साथ नहीं कह सकता, क्योंकि हम जो श्रीलंका समझते हैं, वह आज की श्रीलंका नहीं है. अभी उसकी खोज होनी बाकी है. हो सकता है वह सागर के तल में लुप्त हो गई हो या हो सकता है, हमारे भूतल कर कहीं अदृश्य हो गई हो. अनुसंधान हो रहा है. पुरातत्वेत्ता खोज कर रहे हैं. ये प्रयत्न चलते रहना चाहिए.

रामायण हमारे लिए एक महान भारत का चित्र उपस्थित करती है. राम अयोध्या में जन्मे. अयोध्या उत्तर में है. राम जनकपुर में विवाह के लिए गए थे. जनकपुरी मिथिला में है. मिथिला बिहार में है. भरत जी जब अपनी ननिहाल गए थे, तो कैकेय देश गए थे. कैकेय देश अब अफगानिस्तान के रूप में विद्यमान है. इस प्रकार के संकेत मिलते हैं और इसलिए जब भरत और शत्रुघ्न कैकेय देश गए, तो आज का हरियाणा, पंजाब, हिमाचल और जो पंजाब हमारा भाग नहीं है, उसकी सीमा को पार करके गए. ये तब हमारे भूखंड के भाग थे. सारा उत्तरी भाग इस रूप में हमारे सामने आ जाता है, लेकिन दक्षिण भी छूटा नहीं है.  राम को वनवास मिला. तब वन केवल दक्षिण में नहीं, उत्तर में भी थे. हिमालय के जंगलों में वे जा सकते थे, कश्मीर की यात्रा कर सकते थे. वहां गर्मी भी कम पड़ती है, प्रकृति का रूप भी बड़ा मनोहारी होता है. केदारनाथ नहीं गए, बद्रीनाथ नहीं गए, यद्यपि उनका वर्णन किया गया है. राम का वर्णन किया गया है, जिसमें कहा गया है कि वे हिमालय के समान जड़ और समुद्र के समान गंभीर थे, फिर भी वन-गमन के लिए उन्होंने दक्षिण चुना. चित्रकूट, पंचवटी, किष्किंधा, फिर पंचासर और रामेश्वर-सारा भारत मानो अपनी भुजाओं में भर लिया. सारी मेदिनी मानो अपने पुरुषार्थ से जीत ली.

दक्षिण में उस समय अनेक राज्य थे. केंद्रीय सत्ता दुर्बल हो गई थी. राष्ट्रीय शक्ति प्रचंड नहीं थी. समाज में संभ्रम था. ब्रह्मतेज  और क्षात्रतेज एक दूसरे के पूरक हैं, जिनका जन्म और जाति से कोई संबंध नहीं है, जो कर्म पर और तप पर आधारित थे, वे अलग-अलग थे. यहां तक कि विश्वामित्र और वशिष्ठ में भी मतभेद था. लेकिन जब शाश्वत जीवन मूल्यों पर संकट आया, जब अस्तित्व के लिए खतरा पैदा हुआ, जिस विशिष्ट प्रणाली के लिए हम संसार में अस्तित्व में आए थे, जब वह खतरे में पड़ गई, तो फिर विश्वामित्र-वशिष्ठ एक हुए. महराजा दशरथ से उनके पुत्रों को गुरु वशिष्ठ मांग लाए. लड़ने के लिए बेटों को मांग लाए. दशरथ पिता थे, अंत: करण वात्सल्य से परिपूर्ण था. कहने लगे, "मैं अपनी फौज दे सकता हूं, बेटे मत ले जाओ." मगर जब देश पर संकट होगा, तब बेटों की पुकार होगी और पिताओं को, माताओं को अपने बेटे दान करने पड़ेंगे. और वे राम-लक्ष्मण को लेकर चले गए.  

ऋषि तपोवन में थे, संस्कार भूमि चलाते थे, मानव तैयार करते थे, राजसत्ता से पृथक धर्म के आधार पर समाज की धारणा को बदलने के लिए यज्ञ करते थे. मगर राक्षस नहीं चाहते थे कि यज्ञ सफल हो. वे नहीं चाहते थे- निर्माण चले, वे नहीं चाहते थे कि संस्कारों की शृंख्ला आगे बढ़े. इसलिए यज्ञों का ध्वंस किया जाता था, तपोवन नष्ट किए जाते थे. राम-लक्ष्मण ने यज्ञों की रक्षा की, लेकिन अगर केवल यज्ञों की रक्षा के लिए विश्वामित्र उन्हें लाए होते, तो फिर अयोध्या वापस ले जाते, जनकपुरी ले जाने की जरूरत नहीं थी. वहां तो विवाह हो रहा था. विश्वामित्र को इसकी चिंता क्यों हुई कि अयोध्या और मिथिला का संबंध होना चाहिए, साथ होना चाहिए. लेकिन इसमें भी ऋषि की एक दूरदृष्टि थी. पृथ्वी कन्या के रूप में जानकी जनक की गोद में आई. राम की अर्द्धांगिनी बनी और फिर  राज्याभिषेक का प्रसंग- उसे दोहराने की आवश्यकता नहीं है.

राम पुत्र थे, भाई थे, सखा थे, पति थे, युवराज थे- अलग अलग कर्तव्यों में बंधे थे. पुत्र के नाते उन्होंने पिता की आज्ञा का पालन किया. अगर वह चाहते, तो राजगद्दी पर बैठने के लिए कुछ बहाना निकाल सकते थे. दशरथ जी ने उनसे आग्रह भी किया था कि तुम मत जाओ.  कौशल्या भी नहीं चाहती थी कि वह वन जाएं. राम कानून का भी सहारा ले सकते थे. राजा दशरथ ने उन्हें राज्याभिषेक करने का निर्णय सबकी सहमति से किया था. राम कह सकते थे कि आप अपना निर्णय बदल रहे हैं, इसलिए सारा मामला लोकसभा को रेफर बैक करना चाहिए.  ऐसा उन्होंने नहीं किया. वन गमन के लिए तैयार हो गए. पुत्र के आचरण का एक आदर्श रखा. भाई थे- सौतेले भाई. कैकेयी ने सारा प्रबंध किया था- अपने पुत्र की राज्य प्राप्ति के लिए. मां की ममता समझ में आ सकती है. अनर्थ करा सकती है. मैं कैकेयी को दोष नहीं दूंगा. मगर कैकेयी चतुर भी थी. उसने केवल पुत्र के लिए राज्य नहीं मांगा. मगर भरत का वह राज्य मजबूत न होता, इसलिए राम के लिए 14 वर्षों का वनवास भी मांगा. अगर राम अयोध्या में रहेंगे, राज्य से वंचित रहेंगे, उनका अधिकार छीन लिया जाएगा- प्रजा देखेगी- विद्रोह की अग्नि सुलग सकती है, इसलिए उन्हें अयोध्या से दूर भेजो- राजधानी से परे फेंको. लोगों की स्मृति कमजोर होती है, भूल जाएंगे लोग 14 साल में. तब तक भरत का राज्य मजबूत हो जाएगा और मैं राजमाता के रूप में अपना प्रभाव स्थापित करने में सफल हो जाऊंगी. लेकिन भरत ने सारा खेल बिगाड़ दिया. भरत जैसा भाई, उसने गद्दी नहीं ली. जो कुछ मां को कहा, शायद हृदय पर पत्थर रखकर कहा होगा. वह संभाषण पढ़ने लायक है. गीत रामयाण में भी एक गीत है- सुधीर फड़के के कंठ से सुनिए- ’माता नहीं, तू वैरिणी.’ माडगुलकर जी ने उस चित्र को सजीव कर दिया है. अब कैकेयी की कहां चलती थी? जिस भरत के लिए सब कुछ किया जा रहा था, वह भरत भी रामभक्त था. ऐसा भाइयों के प्रति स्नेह. सुमित्रा राजनीति में काफी निष्पात मालूम होती है. राजा राम हो या राजा भरत हो, एक बेटा राम के साथ है, दूसरा बेटा भरत के साथ है. आवश्यक नहीं है- यह सोच समझ कर किया होगा. मगर राजनीति में रहते-रहते मेरी दृष्टि से ऐसा दोष हो सकता है और जोड़ी अमर हो गई- राम-लक्ष्मण की, भरत और शत्रुघ्न की. 

राम वन में चले गए. चाहते तो लड़कर राज्य ले सकते थे. लेकिन उन्होंने भी इधर अयोध्या में रहना ठीक नहीं समझा. "न भीतो मरणादस्मि, केवल दूषितों  यश:" मुझे मृत्यु की चिंता नहीं है, आवश्यकता पड़े, तो मृत्यु का हंसते-हंसते आलिंगन करूंगा. अगर डर है, तो एक ही बात का कि मेरा नाम बदनाम न हो जाए. राजा के लिए इससे बढ़कर और बंधन कौन सा हो सकता है ? वे लोकोपवाद से बचते हुए- लोग बुरा न कहें- आलोचना न हो, निंदा का शिकार न हो जाऊं. इसलिए राजपाट छोड़कर वन चले गए. वन में मुसीबतों में फंसे. इस पर भी एक बड़ा सुंदर गीत है- कौन मुसीबत में नहीं फंसता ? मानव के किस पुत्र पर विपत्ति नहीं आती है ? गीत आप सुनेंगे. माडगुलकर जी ने उस गीत में ऐसा रस भरा है, कि आप अगर डूबें, तो पार हो जाएं और पार हो जाएं, तो डूब जाएं. मगर भगवान राम जंगलों में पशु- पक्षियों से, पेड़ों से  "सीता कहां  है, सीता कहां है ?" पूछते रहे. हमारे जैसा मनुष्य, मगर एक मर्यादा - और मन में एक वज्र संकल्प है और इसलिए वे जहां पहुंचे, वहां लोगों को इकट्ठा किया. संदेश भेजकर भरत से सेना नहीं मंगाई. भरत तो उनकी पादुकाएं रखकर राज चला रहे थे. उनको एक संदेश भेज देते- पत्नी चली गई है, फौज लेकर चले आना. तब राम क्या मुंह दिखाते ? आयोध्या वालों पर इसका क्या प्रभाव पड़ता ? पत्नी चली गई देखते-देखते, रक्षा नहीं कर सके. इसलिए अपने भुजबल से- अपने बाहुबल से- अपने पुरुषार्थ से- अपने प्रयत्नों से- लोकसंग्रह से- जनजातियों के संगठन से, फिर से प्राप्त करेंगे- खोयी हुई ’श्री’ को. यह निश्चय मन में जगाया.  

जब बाली का वध हुआ, तो बाली ने कहा, " हे राम, आप मेरे पास क्यों नहीं आए ? मैं रावण को ठीक कर देता. तुम्हारी पत्नी को मैं वापस लाकर देता. सुग्रीव के पास क्यों गए ? रावण से सभी आतंकित हैं, रावण मुझसे आतंकित है. मैं रावण को ठीक करने की शक्ति रखता था. मगर बाली भूल गया. राम जानते थे, अगर याचक बनकर बाली के दरबार में जाते तो, राम की स्थिति क्या होती ? प्रतिष्ठा कहां जाती ? जिनके हितसंबंधों के लिए मैत्री नहीं हो सकती वह सुग्रीव राज्यवंचित था, पीड़ित था. सुग्रीव को मित्र चाहिए थे और राम को ऐसे मित्र की तलाश थी. और  बाली सीता को छुड़ाकर ले आता, तो भगवान राम की क्या तारीफ होती ? ला सकता था बाली. बाली क्या, अगर चाहते तो हनुमान जी भी सीता को छुड़ाकर ला सकते थे. खुद लंका गए थे सीतामाई का संदेश लेने को और लंका को जला दिया. और अगर हनुमान पहाड़ उठाकर कंधे पर ले जा सकते हैं, तो जानकी जी को भी कंधे पर उठा कर लंका से ला सकते थे. लंका पर चढ़ाई की आवश्यकता ही न पड़ती. मगर राम ने कहा था, "सीता का संदेश लाना." वापस लाने का सवाल नहीं है. उद्देश्य केवल पत्नी को प्राप्त करना नहीं था. बाली और रावण के स्थान पर ऐसी सत्ता को प्रोत्साहित करना था, जो हमारे जीवन मूल्यों से न टकराती हो. जो शत्रुत्व का पालन न करती हो, जो हमारे  साथ मिलकर चलती हो. जिसके साथ हमारी संगति बैठती हो. जो मित्रशक्ति होती और जो भारत की समग्रता में अपनी पूर्णता समझती हो और इसीलिए बाली का वध किया. वह प्रसंग भी पढ़ने लायक है- रामायण का.

ये विचार अपने मन से निकाल दीजिए कि हनुमान जी बंदर थे. मूर्तियां ऐसी बनी हैं, चित्र ऐसे बने हैं, लेकिन सचमुच में वे हमारे जैसे मनुष्य थे. उनकी पूंछ नहीं थी, वे कमर में रस्सा बांधते थे और रस्से का थोड़ा हिस्सा लटका रहता था, जो आगे जाकर पूंछ के रूप में चित्रित होने लगा. भगवान राम ने लक्ष्मण से कहा, "सुनो ! कितना हनुमान शुद्ध संस्कृत बोल रहे हैं, व्याकरण की एक भी गलती नहीं है. अब वानर कितने भी चतुर हों, अगर वे सचमुच वानर हैं, तो ऐसा नहीं कर सकते. वह एक विशेष जाति थी, जनजाति थी. भगवान राम का संदेश लेकर जब हनुमान जी गए, तो वाल्मीकि रामायण में प्रसंग है कि उन्होंने सीता से संस्कृत में बात नहीं की- क्योंकि संस्कृत रावण भी जानता था, कुछ राक्षस भी संस्कृत जानते थे- तो मैथिली भाषा में बात की होगी. तब वह मैथिली कैसे जानते थे ? वे ’बुद्धिमतां वरिष्ठम’- बुद्धिमान थे.

इसलिए जब बाली का वध हुआ, तो बाली ने बहुत सुनाई राम को. "मुझे छुपकर मारा, पेड़ों की ओट लेकर मारा." और फिर कहा, इसका मैंने ऊपर पहले उल्लेख किया है कि, "मुझे मारने की क्या जरूरत थी ? मैं सीता को वापस लाकर दे सकता था." प्रभु राम ने उत्तर दिया. "जो जानवर है, उसको मारने में क्या आपत्ति है ? शिकारी पेड़ से छुपकर ही मारते हैं युद्ध में सब कुछ ठीक है." मगर बाली समझ गया था कि उसका अंत आ गया है. और बाद में बाली को चिंता हुई कि किसी तरह अंगद का अधिकार बन जाए और वह बच गया. बाली के बाद सुग्रीव. प्रभु राम ने अपना कोई सूबेदार नहीं बिठाया. अयोध्या से बुला सकते थे, "आओ भरत तुम्हें बाली का राज्य दे रहे हैं." राज्य जीतना- उद्देश्य नहीं था. विस्तारवाद की आकांक्षा नहीं थी. अधिकार क्षेत्र की वृद्धि का कोई इरादा नहीं था. मगर सत्ता ऐसी होनी चाहिए, जो हमारे जीवन मूल्यों के साथ बंधी हो, जो हमारी जीवन पद्धति के विकास में योग दे. और सुग्रीव ऐसा करने के लिए तैयार थे. इसी तरह विभीषण का राज्याभिषेक हुआ. लंका का राज्य विभीषण को सौंप दिया. अपने कब्जे में लंका को नहीं रखा. 

ये सारी बातें रामकथा को एक ऐसा रूप प्रदान करती है, जो अनूठा है- अनुपम है. इसलिए राम अवतार भी है. राम हमारे जीवन में बस गए. सोते, बैठते, उठते, जागते हम राम का नाम लेते हं. "राम राम पाहुणे". नमस्कार का स्थान ले लिया राम ने. किसी देश में ऐसा राम, जीवन में राम, मरण में राम, अंतिम समय में राम और आज भी ’आयाराम और गया राम.’ अब तो लियाराम और दियाराम भी है. राम नाम लोकमानस पर छा गया है. हमारे भाव जगत को उद्वेलित करने वाले राम, मगर एक आदर्श रखने वाले- ज्ञान देते राम. सीताजी पवित्र हैं उनके मन में कभी संदेह नहीं था. रावण की क्या हिम्मत थी, क्या साहस था- उस अग्निशिखा पर आंखें डाल सकता. लेकिन राजा थे, लोकनायक थे. पराये घर में रही हुई नारी के बारे में ’सौ मुंह हजार बातें.’ इसलिए सीता को अग्नि परीक्षा देनी पड़ी. अग्नि परीक्षा सती को ही देनी पड़ती है- वेश्या को नहीं देनी पड़ती. सीताजी के मन में भी कोई संदेह नहीं था. मैं सब कुछ छोड़ सकता  हूं- "स्नेहं, दयांच, सौख्यंच, यदि वा जानकी मपि.  आराधनाय लोकानाम मुश्चतो नास्ति." आराधनाय लोकानाम’-प्रजा की आराधना के लिए- लोकरंजन के लिए. राजा का अर्थ ’जो रंजन करे.’ और राम ने सीता को छोड़ा. हमारी पढ़े-लिखी बहनें कहती हैं, "सीता के साथ अन्याय हुआ." सचमुच में अन्याय हुआ, मगर अन्याय किया पति राम ने, किन्तु न्याय किया राजा राम ने. पत्नी के साथ अन्याय हुआ, परंतु प्रजा के साथ न्याय हुआ. आज तो यह ’आदर्श’ की बात दिखाई देती है. कौन इस तक पहुंच सकता है ? किंतु एक मर्यादा, आचरण का एक मानदंड, एक लक्ष्मण रेखा- व्यवहार की एक कसौटी. लोग प्रयत्न करें, आगे बढ़ें, वहां तक पहुंचे. वह आदर्श जो ध्रुव तारे की तरह चमक रहा है. वह केवल आदर्श नहीं हैं, बल्कि व्यवहार में आ चुका है, ऐसा आदर्श.  

फिर लव-कुश का जन्म और फिर रामायण के गीत और फिर ’गीत-रामायण’. माडगुलकर जी ने अयोध्या से प्रारंभ नहीं किया. राम जन्म से प्रारंभ नहीं किया. लव-कुश खड़े हो गए- ’रामायण गाते’- रामायण गा रहे हैं. 56 गीत. मैंने आज दोपहर में सुधीर जी से पूछा कि, "भाई ये 56 क्यों ? वर्ष में सप्ताह तो 52 होते हैं, फिर ये चार अतिरिक्त गीत कहां से आए?" तो कहने लगे, जिस वर्ष में उन्होंने गीत लिखे थे, उसमें एक अधिक मास था. तो इसलिए 56 गीत लिखने पड़े."  जैसे आज वर्ष प्रतिपदा है और राम नवमी तक ये समारोह चलेगा.  एक दिन का लोप है, मगर आठ गुने सात=छप्पन. उस समय एक महीना बढ़ गया, इस समय एक महीना- एक दिन घट गया. अब महर्षि वाल्मीकि की तरह माडगुलकर जी को तमसा के तीर रहने का मौका नहीं मिला. मिलेगा तो पूरा समय देने पर सब कामधाम छोड़ देना पड़ेगा. जीवन, व्यापार में लगा है- उदर भरण में लगा है- संसार में लगा है. मगर रामकथा का बीज भावों के जगत में- संस्कारों के रूप में- हृदय में पड़ा हुआ है. वह पुष्पित हो रहा है, पल्लवित हो रहा है. दिन भर की दौड़ में धूप में उसे खाद मिल रहा है, उसे पानी मिल रहा है. कभी गुनगुना रहा है, कभी सपने देख रहा है, कभी सुर में सुर बांध रहा है, शब्द से शब्द जोड़ रहा है. और किसी ने ठीक ही कहा कि ’गीत रामायण’ ’केलेंलं नाहीं-झालेंल. गीत रामायण गढ़ा नहीं- गीत रामायण यूं ही बन गई है. ’वियोगी होगा पहला कवि, आह से निकला होगा गान’. ’राम तुम्हारा चरित्र स्वयं ही काव्य है, कोई कवि बन जाए-सहज संभाव्य है.’ 

’गीत रामायण’ भारतीय साहित्य की धरोहर है, अनमोल निधि है. आकाशवाणी ने उसे घर-घर तक पहुंचाया है और कानों के रास्ते वह हृदय में उतर आई है. केवल मराठी में नहीं, भारत की अन्य भाषाओं  में भी उसका रूपान्तर हुआ है. ’रामकथा’ जैसा उदात्त विषय, माडगुलकर जैसा रससिद्ध कवि और सुधीर फडके जैसा कुशल गायक. ये त्रिवेणी जहां मिल गई, वहां फिर तन और मन पवित्र हो जाएंगे, इसमें किंचित मात्र भी संदेह नहीं है. रजत जयंती समारोह है- पच्चीस वर्ष हो गए. माडगुलकर जी हमारे बीच में नहीं हैं. नागपुर में मुझे उनके दर्शन का सौभाग्य मिला था. भारतीय जनसंघ का अधिवेशन था- कवि सम्मेलन का आयोजन था.  अध्यक्ष स्थान पर वे विराजमान थे. बाद में उनके लेख पढ़े. और उनके गीत आज हमें आगे बढ़ने की प्रेरणा देते हैं, मन पर संस्कार डालते हैं. संगीत में भीगे हुए-पगे हुए. इसलिए सुलभ-सहज हैं, जब तस्वीर का एक पहलू पेश करते हैं, तो पूरी तस्वीर सामने आ जाती है. राम का चरित- यह हमारे मानस में पूरी तरह से प्रतिबंबित है, आलोकित है. मैं बधाई देना चाहता हूं रजत जयंती समारोह के संयोजकों को जिनके प्रयास से यह पर्व मनाया गया.  यह पियूष वर्षा का पर्व है. मैं तो कल सुबह चला जाऊंगा, मगर पुणे के निवासियों को रोज रात में इसका आनंद प्राप्त करने का मौका मिलेगा.  इसे सभी भारतीय भाषाओं में सुनेंगे- जिन भाषाओं में गीत रामायण का अनुवाद हुआ है, रूपान्तर हुआ है- उनके भी कलाकार आएंगे. रूपान्तर का आपसे परिचय होगा. आज अध्यक्ष के स्थान पर श्री भीमसेन जोशी विद्यमान हैं, प्रमुख अतिथि शरद यादव और उदघाटक के रूप में मुझे यहां लाया गया है. मैं अपने को धन्य समझता हूं. 

मैं एक बार फिर से बधाई देता हूं समारोह के संयोजकों को. और आग्रह करता हूं कि यह समारोह केवल एक नगरी तक सीमित न रहे, एक प्रदेश तक इसे न रखें.  इस तरह का आयोजन पूरे भारत में होना चाहिए तथा यह भी आशा करता हूं कि इससे कई नये गीतकार निकलेंगे, जो अमर गीत की विधा में नहीं तो किसी और शैली में रामचरित मानस के कुछ उपेक्षित पहलुओं को उजागर करेंगे. बार बार मुझे भरत का स्मरण आता है. राज्य त्यागने वाले भरत का स्मरण. राज्य के लिए लड़ने वाले भरत का स्मरण नहीं.  मगर भरत का मंदिर नहीं है. कभी-कभी मैं सोचता हूं कि हमारे यहां राज्य के लिए लड़ाई होती है, इसका कारण है कि हमने भरत की पूजा नहीं की- राम की पूजा की. ’उर्मिला’- सीताजी तो चली गईं राम के साथ, मगर उर्मिला का दर्द कौन जानेगा ? उसकी व्यथा को कौन मापेगा ? रह गई घर के द्वार पर खड़ी हुई,  चौखट पे, आंखों में आंसू लिए हुए. चौदह वर्ष का वनवास. पति को तो वनवास नहीं मिला था. पिता ने लक्ष्मण को आज्ञा नहीं दी थी, मगर लक्ष्मण भाई की प्रीति में चले गए. मगर- उर्मिला की व्यथा का, भरत का प्रभुत्व और भी ऐसे प्रसंग, जिनमें मैं जाना नहीं चाहता. जो उपेक्षित हैं- कैकेयी ने उन्हें उजागर किया है, उभारा है. उन्हें और भी गहरे रंगों में- प्रगाढ़ रसों में प्रस्तुत करने की आवश्यकता है. मुझे विश्वास है कि ऐसे समारोह कवियों को भी प्रेरणा देंगे. जन-जन के लिए मांगलिक प्रसंग बनेंगे. और मैं विश्वास के साथ कहता हूं कि यह समारोह सफल होगा. आपने मुझे बुलाया. इसके लिए मैं आप सभी का आभारी हूं. और आज विधिवत इस कार्यक्रम का उदघाटन करता हूं.
-डॉ. सौरभ मालवीय

(पुस्तक- 'राष्ट्रवादी पत्रकारिता के शिखर पुरुष अटल बिहारी वाजपेयी' से)

दरिद्रता मिटाकर रहेंगे

   


जब ’पांचजन्य’ के संपादक ने मुझे सूचित किया कि पत्र का ’दरिद्रनारायण अंक’ प्रकाशित हो रहा है, तो मेरे मन में प्रश्न उठा कि दरिद्रनारायण अंक क्यों, लक्ष्मीनारायण अंक क्यों नहीं ? दरिद्रनारायण की सेवा तथा साधना हम बहुत दिन कर चुके. अब समय लक्ष्मीनारायण का आवाहन करने का है. किंतु फिर ख्याल आया कि लक्ष्मीनारायण की आराधना भी हम सदियों से करते आए हैं. जगह-जगह लक्ष्मीनारायण के मंदिर भी स्थापित किए गए हैं. फिर भी देश दरिद्र है. अधिकांश भारतीय निर्धन हैं. आवश्यक वस्तुओं का अभाव है. यहां तक कि हम अन्न की दृष्टि से भी आत्मनिर्भर नहीं हैं. 

दरिद्रता में जिन्होंने नारायण के दर्शन किए और उस नारायण की उपासना का उपदेश दिया, उनका अंत:करण करुणा से भरा हुआ था. रामकृष्ण परमहंस के संबंध में तो यहां तक कहा जाता था कि ’दूब को पैरों तले रौंदे जाते देखकर वह पीड़ा से सिहर उठते थे.’ दूसरों के दुख से दवित होना मानव का गुण है. यह इस बात का भी प्रमाण है कि सब में एक ही आत्मतत्त्व विद्यमान है. किंतु ऐसा भी होता है कि निरंतर पीड़ा देखते-देखते मानव का मन उसके प्रति संवेदनहीन हो जाता है. हृदय को संवेदनशील रखने के लिए पीड़ित के प्रति केवल दया का नहीं, करुणा का भाव जगाना आवश्यक है. दरिद्रनारायण के संपूर्ण दर्शन के मूल में करुणा का अजस्र स्रोत्र प्रवहमान है.

यह धारणा सही नहीं है कि भारतीय संस्कृति दरिद्रता का पुरस्कार और समृद्धि का तिरस्कार करती है. अस्तेय और अपरिग्रह का दरिद्रता से दूर का भी संबंध नहीं था. त्याग वही कर सकता है, जिसके पास भोग की क्षमता और उसके साधन हैं. बिखारी का अपरिग्रह उपहास का विषय बनेगा. विवशता की नाम संतोष नहीं हो सकता. 

वस्तुत: यह एक रहस्य का विषय है कि पुरुषार्थ-चतुष्टय के आधार पर जीवन का प्रासाद खड़ा करने वाले देश में दरिद्रता को ईश्वरीय देन समझने की भ्रामक भावना कैसे फैल गई ? क्या इसका कर्मफल के सिद्धांत से कोई संबंध है ? होना तो नहीं चाहिए. किंतु जिन्होंने कर्म पर बल न देकर, केवल फल की लालसा की. वे भाग्यवाद का शिकार अवश्य हो गये. अपनी अकर्मण्यता, पुरुषार्थहीनता, आलस्यप्रियता पर पर्दा डालने के लिए उन्होंने ’हुई है वही जो राम रचि राखा’ की रट लगाना आरंभ कर दिया. 

यह बात स्पष्ट समझ लेनी चाहिए कि गरीबी, बेकारी, भुखमरी ईश्वर का विधान नहीं, मानवीय व्यवस्था की विफलता का परिणाम है. ऐसे समाज की रचना संभव ही नहीं आवश्यक भी है, जिसमें अभाव न हो, शोषण न हो, भय न हो, भूख न हो. ’सर्वे सुखिन: सन्तु’ की हमारी कामना कोरी कल्पना की उड़ान नहीं, आदर्श समाज व्यवस्था का चित्र है. यहां यह भी स्मरणीय है कि हमने केवल बहुसंख्यक के सुख की बात नहीं कही. हमने स्वयं में सबको समाहित करने वाले सुख का मुख देखा है. स्पष्ट: हमारा लक्ष्य सर्वोदय है, मात्र एक वर्ग अथवा बहुसंख्यक वर्ग का उदय अथवा उत्कर्ष नहीं. 

यहां यह प्रश्न पूछा जा सकता है कि जो वैभव संपन्न हैं, उनके उत्कर्ष की क्या आवश्यकता है. इसका उत्तर यह है कि जो धन से संपन्न हैं, वह मानवीय गुणों से भी संपन्न हों, यह आवश्यक नहीं है. पूंजी के अभाव की भांति पूंजी का प्रभाव भी दुर्गुणों का जनक होता है. धन से भोग-विलास की सामग्री जुटाई जा सकती है, मन की शांति नहीं प्राप्त की जा सकती.

दरिद्रता के निर्मूलन के लिए सबसे पहली चीज़ यह है कि हम भाग्यवाद के स्थान पर कर्मवाद की प्रतिष्ठापना करें. विज्ञान और टेक्नोलॊजी के इस युग में गरीबी पर पूर्ण विजय पाई जा सकती है. विश्व में ऐसे देश हैं, जिनमें हर व्यक्ति के भोजन, वस्त्र, निवास, चिकित्सा तथा शिक्षा के लिए समाज उत्तरदायी है. ऐसे भी देश हैं, जहां उत्पादन में कमी किए बिना मजदूरों के काम के घंटे घटाए जा रहे हैं, जिससे वे खाली समय में साहित्य, कला, मनोरंजन आदि का लाभ उठा सकें और इन क्षेत्रों में भी योगदान दे सकें. जो अन्य देशों में संभव है, वह हमारे देश में असंभव नहीं होना चाहिए.

यह ठीक है कि भौतिक समृद्धि के बाद भी नैतिक और आध्यात्मिक उत्कर्ष की आवश्यकता बनी रहेगी. किंतु इसके लिए भौतिकता की उपेक्षा करना उचित नहीं होगा. हमारे इतिहास में स्वर्ण-युग उसी काल को कहा गया, जब यहां ऐश्वर्य का साम्राज्य था. भारत को वैभव के शिखर पर ले जाने की हमारी कामना इसी राष्ट्रीय लक्ष्य के अनुरूप है.

नर को नारायण का रूप देने वाले भारत में दरिद्र और लक्ष्मीवान, दोनों में एक ही परम तत्त्व का दर्शन किया गया है. अध्यात्म-जगत की एकता को भौतिक जगत में लाने की महती आवश्यकता है. दरिद्रता का सर्वथा उन्मूलन कर हमें प्रत्येक व्यक्ति से उसकी क्षमता के अनुसार उससे कार्य लेना है और उसकी आवश्यकता के अनुसार उसे देना है. संयुक्त परिवार की प्रणाली, सामाजिक सुरक्षा का ऐसा ही प्रबंध था, जिसने मार्क्स को भी मात कर दिया था. समता के साथ ममता, अधिकार के साथ आत्मीयता, वैभव के साथ सादगी- नवनिर्माण के प्राचीन आधार स्तंभ हैं.इन्हीं स्तंभों पर हमें भावी भारत का भवन खड़ा करना है.
-डॉ. सौरभ मालवीय

(पुस्तक- 'राष्ट्रवादी पत्रकारिता के शिखर पुरुष अटल बिहारी वाजपेयी' से)

पुस्तकों जैसा कोई साथी नहीं है

   


महाराष्ट्र के नासिक में 17 मार्च, 1991 को गढ़ी-पाड़वा-चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को आयोजित सार्वजनिक वाचनालय के स्वर्ण जयंती महोत्सव को संबोधित करते हुए श्री अटल बिहारी वाजपेयी ने पुस्तकालयों और वाचनालयों के महत्व पर प्रकाश डाला. अपने संबोधन में उन्होंने कहा- गुढ़ीपाड़वा के पावन पर्व पर आयोजित यह सांस्कृतिक समारोह, अब अपनी समाप्ति की ओर बढ़ रहा है. आपने इस वाचनालय के डेढ़ सौ वर्ष के संघर्षपूर्ण गौरवशाली इतिहास का वर्णन सुना. भविष्य की योजना भी आपके सामने आ गई. जिन विशिष्ट व्यक्तियों का सम्मान होना था, वह सम्मान भी कर दिया गया. मुझे भी केवल मंगल कलश नहीं दिया गया, साथ-साथ धन्यवाद भी दिया गया. अब तो एक ही कार्यक्रम बचा है कि सभा समाप्त कर दी जाए और हम लोग अपने-अपने घर जाएं.

लेकिन मेरे जैसे एक राजनीतिक प्राणी के लिए बोलने के लोभ का संवरण करना, जरा कठिन काम है. और श्रोता आप जैसे हों तो और भी कठिन. मैं अपना सौभाग्य समझता हूं कि मैं इस समारोह में शामिल हो सका. यह वाचनालय डेढ़ सौ वर्षों का है, इसमें स्वातंत्र्यवीर सावरकर, डॊ. आंबेडकर जैसे मनीषी आ चुके हैं, तो मैंने भी आना स्वीकार कर लिया. तब मुझे पता नहीं था कि दिल्ली का राजनीतिक मौसम अचानक इतना बदल जाएगा. बिना बादलों के भी बरखा होती है कभी-कभी. कभी-कभी तो अनवरत वज्रपात भी होता है. बिना बादलों के बिजली गिर जाती है. राजनीतिक अस्थिरता जरूर थी दिल्ली की हवा में, लेकिन वह आंधी बनकर दूसरी बार दिल्ली के तख्त को उखाड़ फेंकेगी, इसकी निकट भविष्य में आशंका नहीं थी. नाशिक के हमारे मित्रों को अवश्य चिंता रही होगी, कि मैं आ पाऊंगा या नहीं. भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॊ. जोशी जी ने चुनाव की रणनीति पर विचार करने के लिए राष्ट्रीय कार्य समिति की बैठक बुलाई है. आज मैं उस बैठक में भाग नहीं ले सका. कारण स्पष्ट है. मैं राजनीति में जरूर हूं, लेकिन राजनीति मेरा पहला आकर्षण नहीं है. राजनीति ने मुझे प्रतिष्ठा दी है, पद दिया है, संसद की सदस्यता दी है, जनता जनार्दन की सेवा का अवसर दिया है, लेकिन राजनीति एक ऐसा खेल है, जो व्यक्तियों को खाली करता है. अभ्यंतर में एक रिक्तता रहती है. यदि संतोष के क्षण आते हैं,  तो असंतोष के प्रहर भी आते हैं. एक संवेदनशील व्यक्ति के लिए आज की राजनीति असहनीय बनती जा रही है. पिछले दिनों दिल्ली में एक परिचर्चा का आयोजन किया गया था, जिसका विषय था ’राजनीति का अपराधीकरण.’ उस परिचर्चा में यह कहा गया कि केवल राजनीति का अपराधीकरण नहीं हुआ है. अपराध का भी राजनीतिकरण हुआ है. उसमें मैंने एक बात कही थी और उस बात को मैं यहां दोहराना चाहता हूं- सारी प्रामाणिकता के साथ- कि राजनीति का अपराधीकरण और अपराध का राजनीतिकरण सभी सीमाओं को लांघकर भारत की राजनीति अपने में एक अपराध बनती जा रही है. आप पूछ सकते हैं कि अगर यह अपराध बनती जा रही है, तो आप इस अपराध में क्यों संलग्न हैं ? क्योंकि हृदय के कोने में कहीं न कहीं यह आशा विद्यमान है कि इस आदर्शविहीन-सिद्धांतविहीन राजनीति में मूल्यों की प्रतिष्ठा जरूर हो सकेगी. 

जब मैं कॊलेज का विद्यार्थी था, तो पत्रकार बनना चाहता. वाचनालय से मेरा गहरा संबंध है. ग्वालियर में इसी तरह का एक वाचनालय है- ’सार्वजनिक पुस्तकालय और वाचनालय.’ जब मैं समारोह के लिए आया और द्वार पर उतरा तो मैंने देखा कि केवल वाचनालय है- पुस्तकालय नहीं है. तो मैंने अपने मित्र से पूछा कि केवल वाचनालय है कि पुस्तकालय भी है ? तो उन्होंने मुझे बताया कि पुस्तकालय भी है- वाचनालय भी है. मुझे घर में पढ़ने की सुविधा नहीं थी और कॊलेज का मेरा पठन-पाठन पुस्तकालय में हुआ है. वहां उस कोर्स की किताबें उपलब्ध हुआ करती थीं, जिन्हें कुछ छात्र-छात्राएं खरीद नहीं सकते थे. पढ़ने के लिए एकांत भी था. संदर्भ की पुस्तकें भी थीं. लेकिन आपके इस वाचनालय ने तो सचमुच में एक इतिहास बना दिया है. डेढ़ सौ साल ! ये इतिहास की एक ऐसी घटना है, जो केवल अतीत को समेटे हुए नहीं है, जो वर्तमान के लिए भूषणभूत है और हमारे लिए भविष्य की दिशा का भी संकेत करती है. 

किसी देश में साहित्य का- संस्कृति का स्थान क्या है, इसे परखने के लिए उस देश में कितने पुस्तकालय हैं- वाचनालय हैं, वे किस तरह से चलते हैं, इनको देखना पर्याप्त होना चाहिए. नई बस्तियां बस रही हैं, नये भवन बन रहे हैं, गृहनिर्माण का एक विशाल राष्ट्रीय कार्यक्रम चल रहा है. सरकार चिंता करती है- वहां डाकखाना होना चाहिए, सरकार चिंता करती है- वहां पुलिस स्टेशन होना चाहिए. ये चिंता नहीं होती कि पुस्तकालय भी चाहिए- वाचनालय भी होना चाहिए. मैं डॊ. आंबेडकर का अभिप्राय पढ़ रहा था, उन्होंने उस समय शिकायत की थी कि इस वाचनालय को जो सरकारी सहायता मिलती है, वह पर्याप्त नहीं है. वह शिकायत अभी भी बाकी है. ये तो सभासदों का योगदान है और संचालकों की प्रबंधकुशलता है तथा वाचनालय के प्रति उनकी निष्ठा है कि यह वाचनालय उत्तरोत्तर प्रगति कर रहा है. लेकिन शासन को इसमें अधिक रुचि लेनी चाहिए. पुस्तकें इतनी महंगी हो गई हैं. उनकी कीमतें इतनी बढ़ती जा रही हैं कि सामान्य आय वाला व्यक्ति इच्छा होते हुए भी बड़ी संख्या में पुस्तकें नहीं खरीद सकता.

वैसे खरीद कर पढ़ने की हमारी आदत भी कम है. हम उधार लेकर ज्यादा पढ़ते हैं. वर्ष में एक पुस्तक खरीदने का तो सबको संकल्प करना चाहिए. कम से कम एक- अब एक से तो कम नहीं हो सकती, आधी किताब भी आप खरीद नहीं सकते. हम घर का सामान खरीदते हैं, घर को सजाने के लिए वस्तुएं लाते हैं. क्या घर में कुछ पुस्तकें नहीं होनी चाहिए ? पुस्तकों जैसा कोई साथी नहीं है- कोई मित्र नहीं है. पुस्तकें जड़ नहीं होतीं- चेतन होती हैं. पुस्तकें बोलती हैं, पुस्तकें गाती हैं, पुस्तकें पाठक को गुदगुदाती हैं. पुस्तकों में नवरस है. पुस्तकों में षडरिपु है. जब चाहें, आप तब उस रस का पान कर सकते हैं. आप जब चाहें, उस लोक में पहुंच सकते हैं. इसके लिए केवल उस लोक से संबंधित पुस्तक खोलने की आवश्यकता है और पुस्तकें ऐसी मित्र हैं, जो बोर नहीं करती हैं, क्योंकि आप जब चाहें उनको बंद कर सकते हैं- मित्र का मुंह बंद करना मुश्किल है. वे साथ देती हैं, साहस देते हैं. धरती का- आसमान का- अंतरिक्ष का- भूत का- वर्तमान का, भविष्य का परिचय देती हैं.  मगर पुस्तकों से मित्रता करना आना चाहिए. कठिनाई यह होती है कि जब छात्र-छात्राएं पढ़ते हैं, तो उन पर पाठ्य पुस्तकों का ऐसा भार होता है कि पुस्तकों के बारे में उनमें अरुचि पैदा हो जाती है. वैसे पुराने जमाने की तुलना में आजकल के बच्चे- आज के छात्र-छात्राएं बहुत पढ़ रहे हैं. उन्हें बहुत ज्यादा जानकारी है, क्योंकि विश्व में जो परिवर्तन हो रहे हैं, वह सूचना को, ज्ञान को इतना निकट ला रहे हैं- जिसकी पहले कभी कल्पना नहीं की गई थी. अब तो पुस्तकों के साथ कैसेट चल गए हैं. आवाज को सुरक्षित रखा जा सकता है. पहले ये सुविधाएं उपलब्ध नहीं थीं. हम लोकमान्य तिलक का भाषण उनकी आवाज में सुनना चाहें, पर मुश्किल है. अभी दिल्ली में केंद्रीय समिति बनी है- लाला लाजपतराय के जीवन के संबंध में एक आयोजन सारे देश में कर रही है, जिसमें बाल और पाल का भी समावेश है. उस समय लाऊड स्पीकर नहीं थे, मगर हमारे नेता- राष्ट्रीय नेता हजारों की भीड़ में बोलते थे. कैसी भाषा थी, कैसा स्वर था, देश को अनुप्राणित करने वाली कौन सी वाणी थी, इसका अब रिकॊर्ड नहीं है. तब ये सुविधा नहीं थी- आज ये सुविधा है. ये काम ग्रंथालय कर सकते हैं, लेकिन उनके पास साधन चाहिए, पैसे चाहिए. इस बारे में शासन का भी दायित्व बनता है. पुरानी किताबों को दीमक खा रही है, मिट्टी निगल रही है. कांच की या लकड़ी की अलमारियां उन्हें सुरक्षित नहीं रख सकतीं. उनकी माइक्रोफिल्म बनाई जा सकती है. मैंने इसकी चर्चा की थी, अपने मित्रों से. अर्थाभाव फिर से एक बड़ी बाधा है.  हमें इस बात के लिए अनेक पीढ़ियों तक पश्चाताप करना होगा कि स्वाधीनता के बाद हमने विद्याभ्यास को अनिवार्य नहीं किया, प्राथमिक शिक्षण को अनिवार्य नहीं किया, हमने देश की निरक्षरता का निर्मूलन करने के लिए राष्ट्रीय अभियान नहीं चलाया. हम सरस्वती की पूजा करते हैं, हर समारोह के पहले सरस्वती की वंदना होती है, लेकिन इस अभागे देश में जितने निरक्षर हैं, उतने शायद संसार के किसी देश में नहीं होंगे. कहीं इसका कारण ये तो नहीं है कि प्रयाग में गंगा-यमुना तो है, लेकिन सरस्वती लुप्त हो गई है. क्या हमारे देश को प्रयाग का कुंभ बना दिया है ?

अंग्रेजी राज आने से पहले इस देश में शिक्षा का व्यापक प्रसार था. विद्यालय थे, पाठशालाएं थीं, गुरुकुल थे और उस समय के आंकड़ें उपलब्ध हैं. शिक्षित व्यक्तियों का प्रतिशत बहुत ज्यादा है था. पर योजनाबद्ध तरीके से लोगों को शिक्षण से वंचित किया गया. हमारा संविधान बना और डॊ. आंबेडकर हमारे संविधान के शिल्पी थे. मैं संविधान को नई स्मृति कहता हूं. इस देश में स्मृतियां बनती रही हैं, मगर बदलती रही हैं. काल के अनुसार, समाज में परिवर्तन हुए. ये ठीक है कि उन परिवर्तनों पर कानून की मुहर बाद में लगी, लेकिन उन परिवर्तनों को समाज की मान्यता थी. स्वाधीनता के बाद हमने इस काल के लिए स्मृति बनाई है. उसमें हमने कहा था कि पंद्रह साल में प्राथमिक शिक्षा अनिवार्य कर देंगे, तो चालीस साल से ऊपर बीत गए. क्या ये प्राथमिकता का काम नहीं है ? क्या ज्ञान के बिना, विद्या के बिना, साक्षरता के बिना प्रगति हो सकती है ? अगर विकास कार्य में लोगों को जुटाना है, तो क्या ये आवश्यक नहीं है कि उन्हें उस विकास के बारे में समझाया जाए ? क्यूबा जैसा देश अगर निन्यानवे फीसद साक्षरता प्राप्त कर सकता है, तो हम क्यों नहीं प्राप्त कर सकते ? इसमें भी, राजनीति बाधक हो जाती है. 

एक तो हमारी प्राथमिकताएं गलत हैं. जिसे अंग्रेजी में कहते हैं Investment in Men. केवल कारखानों में नहीं, केवल उद्योगों में नहीं, केवल भौतिक विकास के साधनों में नहीं, बल्कि मनुष्य में पूंजी लगाना आवश्यक है. इसका प्रारंभ तो साक्षरता से होगा, शिक्षा से होगा. मैं ’शिक्षा’ कह रहा हूं. मुझे मालूम है मराठी में ’शिक्षा’ का अर्थ अलग होता है. शिक्षा माने दंड. ’भला माहीत आहे. मी ग्वाल्हेरचा आहे’. मैंने कुसुमाग्र्ज जी की एक मराठी कविता का बहुत साल पहले हिंदी में अनुवाद किया था. मैं शिक्षण की बात कर रहा था. अर्थशास्त्र के कारण कितने बच्चे स्कूल में प्रवेश करके बीच में छोड़ जाते हैं. इसे Drop Out कहते हैं.  अब ये ठीक है कि विद्या को जीविका के साथ जोड़ना पड़ेगा, जीवन के साथ जोड़ना पड़ेगा. लेकिन बच्चों की शिक्षा का प्रबंध करना पड़ेगा. ये हम नहीं कर पाए. ये बात अलग है कि शिक्षा के अभाव में भारत का नागरिक जैसे-तैसे अपना जीवन जीने में सफल हो रहा है, क्योंकि उसे विरासत में ऐसी संस्कृति मिली है, उसे उत्तराधिकार में ऐसी पूंजी मिली है, जो संकट में उसे साहस देती है, जो भविष्य से लड़ने का सामर्थ्य देती है. कभी-कभी देश की वर्तमान दशा देखकर दुख होता है, उस दुख में से निराशा पैदा नहीं होनी चाहिए. अगर अच्छे दिन नहीं रहे, तो बुरे दिन भी नहीं रहेंगे.

आज गढ़ी पाड़वा है- नया साल है. हमें कामना करनी चाहिए कि नया साल बीते हुए पुराने साल से अच्छा होगा. राजनीतिक अस्थिरता का इलाज लोगों के पास है. लोकतंत्र के कारण जो समस्याएं पैदा होती हैं, उनका निराकरण लोकतंत्र से ही हो सकता है- लोकतंत्र को संकुचित करने से नहीं, हम धरती पर गिरते हैं, तो धरती को ही हाथ लगाकर उठते हैं. कोई कहेगा कि नहीं-नहीं मैं धरती को हाथ नहीं लगाता- मुझे उठाओ-मुझे उठाओ. कोई गोदी में उठा सकता है, मगर पैरों पर खड़ा नहीं कर सकता. और अगर व्यक्ति पैरों पर खड़ा हो भी जाएगा- दूसरों के सहारे, तो वह फिर गिरेगा. हमें गिरकर उठना सीखना है. और अगर फिर गिरे, तो फिर उठना है. हजारों साल का इतिहास उत्थान और पतन की हमारी कहानी है, मगर कभी हमने हिम्मत नहीं हारी और आज तो हिम्मत हारने का कोई कारण नहीं है. इस समय जो संकट है, वह हल हो जाएगा. संकट गंभीर है, इसमें कोई संदेह नहीं. और उसके लिए कोई प्रणाली दोषी नहीं है. प्रणाली में कमियां हो सकती हैं. मनुष्य प्रणाली को बनाता है. कोई व्यवस्था पूर्ण नहीं कही जा सकती. संसदीय प्रणाली में भी अपनी कमियां हैं- खामियां हैं. मगर ये सोचने का कारण नहीं है कि अगर संसदीय प्रणाली छोड़कर हमने राष्ट्रपति की प्रणाली अपना ली, तो सारी समस्याएं हल हो जाएंगी. राष्ट्रपति प्रणाली अपनाने पर विचार हो सकता है- होना चाहिए. 

लेकिन उसमें भी मूल में जाकर इस बात पर विचार होना चाहिए कि सार्वजनिक जीवन में हमारे आचार और व्यवहार का मानदंड क्या हो ? हम कुछ मूल्यों के साथ बंधे हुए हों या न हों. चाहे इस देश के प्रति, इस देश में निवास करने वाले बयासी करोड़ लोगों के प्रति हमारी कोई निष्ठा हो या न हो, राजनीति सत्ता साधन हो या न हो, राजनीति साधन हो या साध्य हो. क्या राजनीति सत्ता के लिए है ? सत्ता किसलिए ? पैसा इकट्ठा करने के लिए. देश-विदेश में जिसका पता न लगे. या कालपात्र में अपना नाम लिखवाने के लिए? वित्तेषण होती है, लोकेषण होती है. मैं भी राज्यसभा में बोलता हूं, तो दूसरे दिन अखबार देखता हूं- मेरा कुछ आया कि नहीं आया. और टेलीविजन अगर किसी को छोड़ दे, तो मेंबर खड़े होकर शिकायत करते हैं- अध्यक्ष महोदय, मैंने कल भाषण दिया था, मगर मेरा नाम नहीं आया. अब ये बात अलग है कि टेलीविजन को नाम देना चाहिए-रेडियो को नामोल्लेख तो करना चाहिए. नामोच्चार ही सही. मगर इसके लिए गलत काम करना ? क्या हम सबके जीवन में कोई ’लक्ष्मण रेखा’ नहीं ? केवल राजनेताओं के जीवन में नहीं, बल्कि साहित्यकार के जीवन में, पत्रकार के जीवन में, उद्योगपति के जीवन में. कहीं न कहीं लक्ष्मण रेखा होनी चाहिए कि मैं यहां तक जाऊंगा- इसके आगे नहीं. आज लक्ष्मण रेखा मिट रही है. इसीलिए लोकतंत्र की सीता का आतंकवाद-अराजकतावाद कहीं अपहरण करके न ले जाएं, यह आशंका पैदा हो गई है- ये भय पैदा हो गया है. हमें इसे रोकना है. जब सब कुछ जाता हुआ दिखाई देता है, तो बीज को बचाने की कोशिश होनी चाहिए.  प्रलय का काल आया और सारी सृष्टि के डूबने का प्रसंग पैदा हो गया, तो मनु ने अपनी छोटी सी नौका में सृष्टि के बीजों की रक्षा करने का प्रयत्न किया और उस प्रयत्न में वे सफल हुए. और एक बार बीजों की रक्षा हो गई, तो पूरी सृष्टि फिर से खड़ी हो सकती है, इसमें कोई संदेह नहीं. मूल्यों के बीज को आदर्शों के दीपक से जलाए रखना चाहिए. यही ठीक है. देखिए आज हमने दिया जलाया था- बुझ गया. नासिक की हवा तेज है. "है अंधेरी रात, पर दीपक जलाना कब मना है ?" रात तो आएगी. और अगर वह पूर्णिमा की रात है, तब भी प्रकाश की आवश्यकता होगी. लेकिन दिया जलाने के लिए किसी को जलना पड़ेगा. अंतरतम का स्नेह निचोड़ना पड़ेगा. रात भर जलने का प्रण लेना पड़ेगा. और ऐसे छोटे-छोटे दिये असंख्य चाहिए. किसी दूसरे का दिया बनने की जरूरत नहीं है- ’आत्मदीपो भव:’- अपना दिया आप बनो. अंधेरे में रास्ता निकालना है. 

वाचनालय जैसी संस्थाएं चाहिए. इनका अधिकारिक उपयोग हो, ऐसी परिस्थिति चाहिए. ये सांस्कृतिक जीवन का केंद्र बन सकें- इसके लिए साधन चाहिए, ऐसी व्यवस्था चाहिए. हमने देश के सांस्कृतिक पक्ष की उपेक्षा की है. लेकिन एक बात निश्चित है- जब तक राजनीति ठीक नहीं होगी, राजनीति शुद्ध नहीं होगी- और क्षेत्रों के अभाव दूर नहीं होंगे, इसे ठीक करना मतदाताओं के हाथ में है. उसका अवसर मिलेगा. मैं उसकी चर्चा करना नहीं चाहता. कार्यक्रम के प्रारंभ में मेरी एक कविता पढ़ी गई थी, बल्कि गायी गई थी. पहले तो मुझे लगा कि- ये मेरी कविता नहीं है. फिर लगा कि है तो मेरी ही, पर इसमें कुछ जोड़ दिया गया है- संशोधन कर दिया गया है. परिवर्तित संस्करण है मेरी कविता का. मैं इस कार्यक्रम में लंबा भाषण नहीं देना चाहता, इसलिए मैं आपको अपनी कुछ कविताएं सुनाना चाहता हूं. मेरी हिंदी कविताएं हैं- आप को कठिनाई जरूर होगी और में कुसुमग्रज जी का मुकाबला नहीं कर सकता. मैं कविता लिखता था, लेकिन राजनीति में आकर काव्य की सारी धारा सूख गई है. कभी-कभी उससे लौटने की कोशिश करता हूं.

परिस्थिति और मन:स्थिति- तीन कविताएं छोटी-छोटी. शायद आप पसंद करेंगे. मैं समझाने के लिए कहना चाहूंगा कि मान लीजिए- 1977 में प्रयोग हुआ था- राजनीतिक प्रयोग. जनता पार्टी टूट गई. हमारा दिल टूट गया. तब कवि की प्रतिक्रिया है. सचमुच में जनता पार्टी को लेकर तो नहीं है, मगर परिस्थिति को लेकर जरूर है.

गीत नहीं गाता हूं
गीत नहीं गाता हूं
बेनकाब चेहरे हैं
दाग बड़े गहरे हैं

टूटता तिलिस्म आज
सच से भय खाता हूं
गीत नहीं गाता हूं
गीत नहीं गाता हूं

बेनकाब चेहरे हैं
दाग बड़े गहरे हैं
टूटता तिलिस्म
तिलिस्म माने जादू
टूटता तिलिस्म
आज सच में भय खाता हूं
गीत नहीं गाता हूं.

लगी कुछ ऐसी नजर
बिखरा शीशे सा शहर
लगी कुछ ऐसी नजर
बिखरा शीशे सा शहर
अपनों के मेले में
मीत नहीं गाता हूं

गीत नहीं गाता हूं
अपनों का मेला है, मगर मित्र कोई नहीं है
अपनों के मेले में
मीत नहीं गाता हूं

अब इसके अंत में एक कल्पना है- चंद्रग्रहण की, विश्वासघात की- पीठ में छुरी सा चांद. जब पीठ में छुरा घोंपा जाता है, तो वह छुरा टेढ़े चंद्रमा जैसा लगता है.

पीठ में छुरी सा चांद
राहु गया रेखा फांद

चंद्रग्रहण पूर्णिमा को लगता है- द्वितीय को नहीं. मगर लग गया चंद्रग्रहण-

पीठ में छुरी सा चांद
राहु गया रेखा फांद
मुक्ति के क्षणों में
बार-बार बंध जाता हूं
गीत नहीं गाता हूं

फिर परिस्थिति बदली, तो मन:स्थिति भी बदली. आपको समझाने के लिए कह दूं- मान लीजिए भारतीय जनता पार्टी बन गई, जनता पार्टी टूटने के बाद भारतीय जनता पार्टी बन गई, तो कवि ने लिखा-

गीत नया गाता हूं
गीत नया गाता हूं
टूटे हुए तारों से, फूटे वासंती स्वर
पत्थर की छाती में उग आया नवअंकुर
झरे सब पीले पात
कोयल की कुहुक रात
प्राची में अरुणिमा की, रेख देख पाता हूं
गीत नया गाता हूं, गीत नया गाता हूं

इसको फिर से सुनिए-
गीत नया गाता हूं
गीत नया गाता हूं
टूटे हुए तारों से, फूटे वासंती स्वर
पत्थर की छाती में उग आया नवअंकुर
झरे सब पीले पात
कोयल की कुहुक रात
प्राची में अरुणिमा की, रेख देख पाता हूं
गीत नया गाता हूं, गीत नया गाता हूं

इसका दूसरा पद है-
टूटे हुए सपनों की सुने कौन सिसकी ? व्यक्ति की सिसकी सुनाई देती है- बल्कि जब रोता है, मगर जब सपना टूटता है, तो कितने सपने टूटे हैं ?

टूटे हुए सपनों की सुने कौन सिसकी ?
अंतर को चीर व्यथा, पलकों पर ठिठकी
हार नहीं मानूंगा
रार नहीं ठानूंगा
काल के कपाल पर लिखता-मिटाता हूं
गीत नया गाता हूं- गीत नया गाता हूं

अब इसकी तीसरी कड़ी और है. मैंने कश्मीर में लिखी दो साल पहले, तब पता नहीं था- कश्मीर का नंदनवन इस तरह से जल जाएगा. लेकिन शायद इसमें उसकी छाया है-

न मैं चुप हूं न गाता हूं
न मैं चुप हूं न गाता हूं
पहला था कि गीत नहीं गाता हूं और अब न मैं चुप हूं न गाता हूं.

सवेरा है, मगर पूरब दिशा में
घिर रहे बादल
सवेरा है, मगर पूरब दिशा में
घिर रहे बादल

रूई से धुंधलके में
मील के पत्थर पड़े घायल
ठिठके पांव
ओझल गांव
जड़ता है न गतिमयता

रूई से धुंधलके में
मील के पत्थर पड़े घायल
ठिठके पांव
ओझल गांव
जड़ता है न गतिमयता

स्वयं को दूसरों की दृष्टि से
मैं देख पाता हूं
न मैं चुप हूं न गाता हूं


कश्मीर की घाटी में चिनार का पेड़ होता है और चीड़ का भी पेड़ होता है. जब बर्फ गिरती है, तो चिनार में जैसे आग लग जाती है- चिनार झुलस जाता है. मगर चीड़ खड़ा रहता है. इसको मैंने चित्रित करने की कोशिश की है-
समय की सर्द सांसों ने
चिनारों को झुलसा डाला
समय की सर्द सांसों ने
चिनारों को झुलसा डाला

मगर हिमपात को देती
चुनौती एक दुर्ममाला

बिखरे नीड़
विहंसे चीड़
आंसू हैं न मुस्कानें
हिमानी झील के तट पर
अकेला गुनगुनाता हूं
न मैं चुप हूं न गाता हूं

मित्रो ! मैं आभारी हूं इस समारोह के संयोजकों का, जिन्होंने मुझे यहां उपस्थित होने का और स्वर्ण महोत्सव में भाग लेने का अवसर दिया. मैं आपका भी अनुगृहित हूं कि आपने बिना बीच में ताली बजाय मुझे सुना. मैंने इस अवसर पर प्रसंग के अनुकूल कुछ कहने का प्रयत्न किया है. अगर आप राजनीति में रुचि रखते हैं, तो जो रात को सभा है, उसमें आ सकते हैं. 
-डॉ. सौरभ मालवीय

(पुस्तक- 'राष्ट्रवादी पत्रकारिता के शिखर पुरुष अटल बिहारी वाजपेयी' से)

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता

   


भारत ज्योति द्वारा 23 अक्टूबर, 1994 को आयोजित ’प्रेस की स्वतंत्रता’ कार्यक्रम को संबोधित करते हुए श्री अटल बिहारी वाजपेयी ने प्रेस की स्वतंत्रता पर प्रकाश डाला. उन्होंने कहा कि विषय गंभीर है. किसी भी राष्ट्र की उन्नति में, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बहुत बड़ा योगदान देती है. यह एक प्रकार की जागरुकता उत्पन्न करती है. नागरिकों में अधिकार-बोध और कर्तव्य-बोध का भाव जागृत करती है. हमारे संविधान ने देश के सभी नागरिकों को अभिव्यति की स्वतंत्रता प्रदान की है. उसे यदि कोई रोकता है, तो संविधान के प्रतिकूल आचरण करता है. मनुष्य बुद्धि और विवेक का प्राणी है. उसकी अभिव्यक्ति पर प्रतिबंध लगाना सर्वथा अनुचित है. प्रेस को स्वतंत्रता दी गई है कि वह निर्भीकतापूर्वक अपनी बात कहे.

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता हमें क्यों चाहिए ? हम कुछ कहना चाहते हैं. मानस को खोलना चाहते हैं.पर कहने के अधिकार को जब सरकार छीनती है, तो वही लोकोक्ति चरितार्थ होती है- जबरा मारे और रोने न दे. आज रोने पर भी पाबंदी लगाई जा रही है. यह बात शान के खिलाफ है. यदि हमारी आलोचना होती है, तो हमें अपने गिरेबान में झांककर देखना होगा, अन्यथा जनहित खतरे में पड़ जाएगा.

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री ने ’हल्ला बोल’ की घोषणा कर अपने कार्यकर्ताओं को दो समाचार-पत्रों को बांटने न देने का खुला निर्देश देकर जनतंत्र के साथ अन्याय किया है. यदि उन्हें, उन समाचार-पत्रों से कोई शिकायत थी, तो अदालत का द्वार खुला था. पर कानून को अपने हाथ में लेना जनतंत्र की मान्यताओं के प्रतिकूल है. प्रेस कौंसिल इसीलिए तो है. पर इससे शिकायत न करके हल्ला बोल दिया. सरकार विज्ञापन देना बंद कर सकती है. किंतु ये ’हल्ला बोल’ क्या है ?

समाचार-पत्र पढ़ने न पढ़ने का निर्णय पाठक करता है, न कि सरकार. पर पाठक को अपनी मर्जी से समाचार-पत्र न पढ़ने देना, यह कहां का न्याय है ? बरेली के 80 पत्रकारों को क्यों नहीं जाने दिया गया ? शासन में निरंकुशता बढ़ना जनतंत्र के लिए खतरा है. इस समय उत्तर प्रदेश घोर अराजकता की ओर जा रहा है. मुख्यमंत्री जी को इसका कोई पश्चाताप और खेद नहीं है, उल्टे अपने कार्यकर्ताओं की पीठ ठोक रहे हैं. हम लोगों ने अयोध्या में गलती की थी, खेद प्रकट किया. इस समय लोकतंत्र, भीड़तंत्र में बदल गया है. इसके विरुद्ध आवाज उठाने की जरूरत है. किंतु मर्यादा का ध्यान रखना होगा. हम प्रतिपक्ष हैं, वे तो शासन में हैं, पर वे मर्यादा को त्याग चुके हैं. यह प्रवृत्ति रुकनी चाहिए. यह एक संक्रमण रोग है. क्या शासन में रहने वालों को ये सब शोभा देता है ? सड़क पर हल्ला बोल, विधानसभा में सदस्यों की पिटाई, सत्तापक्ष के संयम की कहानी बता रही है. वह खुलेआम लोकतंत्र पर कुठाराघात है.
-डॉ. सौरभ मालवीय

(पुस्तक- 'राष्ट्रवादी पत्रकारिता के शिखर पुरुष अटल बिहारी वाजपेयी' से)

Tuesday, June 30, 2026

चिंतन-मंथन

 




श्री माता वैष्णो देवी के पावन धाम कटरा में विद्या भारती के देशभर से आए 35 शिक्षाविदों ने शिक्षा के विविध आयामों पर गहन चिंतन-मंथन किया।
बैठक में विद्या भारती के शिक्षा मॉडल के 75 वर्ष पूर्ण होने के उपलक्ष्य में आयोजित होने वाले राष्ट्रव्यापी कार्यक्रमों, संत शिरोमणि गुरु रविदास जी के 650वें प्रकटोत्सव, राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP-2020) के प्रभावी क्रियान्वयन, वंदे मातरम् के 150वें वर्ष, परीक्षा परिणामों की गुणवत्ता वृद्धि, आचार्य प्रशिक्षण, शैक्षिक नवाचार, संस्कार एवं मूल्याधारित शिक्षा, विद्यालयों में तकनीक के प्रभावी उपयोग, कौशल शिक्षा, छात्र विकास, संगठन विस्तार तथा आगामी शैक्षणिक सत्र की कार्ययोजना जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर विस्तृत विचार-विमर्श हुआ।
बैठक के समापन पर सभी शिक्षाविदों ने माता रानी के श्रीचरणों में प्रार्थना की कि विद्या भारती का सेवा, संस्कार और शिक्षा का यह महायज्ञ निरंतर राष्ट्र निर्माण की दिशा में नई ऊँचाइयों को प्राप्त करता रहे।
"सा विद्या या विमुक्तये" के पावन आदर्श को साकार करते हुए विद्या भारती शिक्षा के माध्यम से संस्कारित, सशक्त, आत्मनिर्भर एवं राष्ट्रनिष्ठ भारत के निर्माण हेतु निरंतर अग्रसर है। 
इस अवसर पर पूर्वी उत्तर प्रदेश क्षेत्र से संगठन मंत्री श्री हेमचंद्र जी एवं क्षेत्रीय मंत्री के रूप में डॉ. सौरभ मालवीय की उपस्थिति रही.
26 जून से 28 जून 2026

Monday, June 29, 2026

समाचार पत्र खरीद कर पढ़ें, मांग कर नहीं

   


महाराष्ट्र के पुणे में 20 जनवरी, 1982 को ’तरुण भारत’ की रजत जयंती समारोह को संबोधित करते हुए श्री अटल बिहारी वाजपेयी ने समाचार पत्रों से जुड़ी समस्याओं पर प्रकाश डाला था. अपने संबोधन में श्री वाजपेयी ने कहा- सबसे पहले मैं ’तरुण भारत’ के संपादकों, संस्थापकों, संचालकों, संपादक मंडल और कर्मचारियों को बधाई देना चाहता हूं, जिनके परिश्रम और प्रयत्नों से आज ’तरुण भारत’ संघर्ष के पच्चीस वर्ष पूर्ण करके यह रौम्य महोत्सव मना रहा है. मुझे समाचार पत्र में काम करने का मौका मिला था. शायद इसलिए इस समारोह में मुझे बुलाया गया है. विश्वविद्यालय की शिक्षा समाप्त करने के बाद मैंने एक मासिक पत्र में काम करना शुरू किया था. बाद में एक साप्ताहिक पत्र में संपादन का कार्य करने लगा. फिर दैनिक पत्र में जिम्मेदारी मेरे ऊपर आ गई. मैं जानता हूं- पत्र निकालना और  निकालते रहना कितना कठिन होता है. मैंने पत्र निकाले भी हैं और बंद भी किए हैं. पत्र बंद करते समय मैं संपादकीय लिखा करता था, उसकी बड़ी चर्चा होती थी.

’तरुण भारत’ पच्चीस वर्ष पूर्ण कर चुका है. यह सचमुच में, अपने आप में एक महत्वपूर्ण घटना है. वैसे तो पुणे की नगरी में अभी ’केसरी’ का समारोह हुआ था, जिसने सौ वर्ष पूरे किए. ’सकाल’ ने पचास वर्ष पूरे किए. मैं इन दोनों पत्रों का इस अवसर पर अभिनंदन करना चाहता हूं. ’तरुण भारत’ तरुण है, इसलिए पच्चीस वर्ष का है. किसी ने शुभकामनाएं भेजी हैं चिरतारुण्य की. ’तरुण भारत’ सिर्फ तरुण हो. आयु बढ़ती जाए. लेकिन प्रखरता में कमी न आए. समाचार पत्र के ऊपर एक बड़ा राष्ट्रीय दायित्व है. भले हम समाचार पत्रों की गणना उद्योग में करें, कर्मचारियों के साथ न्याय करने की दृष्टि से आज यह आवश्यक भी होगा, लेकिन समाचार पत्र केवल उद्योग नहीं है, उससे भी कुछ अधिक है. यह व्यवसाय भी है. धंधा नहीं है. पत्रकारिता एक मिशन है. बिना ध्येयवाद के, बिना निष्ठा के, बिना सत्य के, और सत्य के आग्रह को निभाने के लिए कष्ट झेलने की तैयारी के बिना कोई पत्रकार अपने धर्म का पालन नहीं कर सकता. शब्द का महत्व है. लेकिन बोला हुआ शब्द दूर तक नहीं पहुंचता. लिखा हुआ शब्द दूर-दूर तक जाता है. बोला हुआ शब्द हवा में उड़ जाता है, लिखा हुआ शब्द टिकता है. ये ठीक है कि देश में दुर्भाग्य से चालीस फीसद से अधिक लोग साक्षर नहीं हैं. इसलिए समाचार पत्रों का महत्व अनायास बढ़ जाता है, क्योंकि जो पढ़ते हैं- पढ़ सकते हैं, वे लोकतंत्र को बनाने में अपनी भूमिका निभाते हैं.  
 
आज अपने मित्रों से एक बात कहना चाहूंगा, हमारे देश में अभी भी अखबार मांग कर पढ़ने की पद्धति चल रही है. हम मांग कर खाना पसंद नहीं करते, हम मांगा हुआ कपड़ा पहनना पसंद नहीं करते, तो हम मांगा हुआ अखबार पढ़ने से संकोच क्यों नहीं करते ?  कारण धनाभाव नहीं है. अच्छे-अच्छे लोगों को मैं देखता हूं. पत्र खरीदते नहीं हैं, लेकिन पढ़ना चाहते हैं. पढ़ने के लिए इतने उतावले रहते हैं कि अगर किसी ने अखबार पढ़ना शुरू किया हो, तो वह पढ़ने की अपनी इच्छा को रोक नहीं सकते. कहते हैं- क्या एक पन्ना मुझे दे सकते हैं ? ऐसे मांग कर पढ़ने वाले आपको विमान में मिलेंगे, रेलगाड़ी में मिलेंगे. विमान में तो अखबार बेचा नहीं जाता, मगर रेलगाड़ी में- स्टेशन पर समाचार पत्र उपलब्ध रहते हैं. शायद उन्हें मांग कर पढ़ने में मज़ा आता है. कभी-कभी तो ऐसे अवसर पर मांगते हैं कि देने की इच्छा नहीं होती. पहले पृष्ठ का आधा समाचार पांचवें पृष्ठ पर, पहला पृष्ठ हमारे हाथ में, पांचवां पृष्ठ किसी और के हाथ में. अब पत्र पढ़ने का कार्यक्रम कैसे बनेगा ?  मगर वे इसकी चिंता नहीं करते. आज हम निश्चय करें कि कि पत्र खरीद कर पढ़ेंगे, मांगकर नहीं पढ़ेंगे. परिवार में एक ही पत्र आए, यह आवश्यक नहीं है. जो समृद्ध परिवार हैं पति की मोटर अलग है, पत्नी की अलग है. लड़का अलग मोटर रखना चाहता है, लड़की अलग मोटर रखना चाहती है. काश ! समाचार पत्र के बारे में भी ऐसा ही हो सकता. पढ़ने के लिए अलग-अलग टेबल चाहिए, उसी तरह अपनी रुचि का पत्र भी खरीदने की हमें आदत डालनी चाहिए. 

समाचार पत्रों की बिक्री बढ़ना जरूरी है. लेकिन मैं जानता हूं- मैं समाचार पत्र चला चुका हूं. अगर समाचार पत्र घाटे में चलता है, तो बिक्री से घाटा और बढ़ता है. समाचार पत्र घाटे में न चले, इसका प्रबंधन भी बहुत आवश्यक है. कागज महंगा हो रहा है. सरकार न्यूज प्रिंट का दाम बढ़ाती जा रही है. वर्तमान पत्र निकलेंगे कैसे ? अपने पैरों पर कैसे खड़े होंगे ? न्यूज प्रिंट तो समाचार पत्र के काम आता है. उस पर शुल्क नहीं बढ़ना चाहिए. जो शुल्क बढ़ाया उसका कोई औचित्य नहीं है. सरकार की आमदनी बढ़ाने के और भी साधन हो सकते हैं. विद्या पर, लोक शिक्षण पर, कर लगाना न्याय संगत नहीं माना जा सकता. दूसरी बात है- समाचार पत्र को विज्ञापन चाहिए. उन्हें विज्ञापन की आवश्यकता है. केवल सर्कुलेशन के दम पर समाचार पत्र विफल है. सबसे अधिक विज्ञापन देने वाली संस्था है सरकार. पब्लिक अंडर्टेकिंग्ज है. यूनियन पब्लिक सर्विस कमीशन है. स्टेट का पब्लिक सर्विस कमीशन है. रेलवे के विज्ञापन आते हैं. और अगर विज्ञापन देने में सरकार कंजूसी करेगी या भेदभाव करेगी, तो देश में स्वतंत्र पत्रकारिता का विकास बड़ा मुश्किल हो जाएगा. आदर्श व्यवस्था तो ये होगी कि सरकारी विज्ञापनों को वर्तमान पत्रों के सर्कुलेशन के साथ जोड़ दिया जाए. पत्र अपनी विचारधारा का प्रतिपादन करेंगे. लोकतंत्र में मतभिन्नता होगी. मतभिन्नता का हमें समादर करना चाहिए. लेकिन विज्ञापन के लिए जो धन आता है, वह जनता से वसूल किया जाता है. उस धन से अगर स्वतंत्र पत्रकारिता में बाधा पैदा होती है, तो समझना चाहिए कि शासन अपने कर्तव्य का पालन नहीं कर पा रहा है. ऐसी शिकायतें मिली हैं. आप प्रेस कौंसिल की रिपोर्ट देखिए. पत्रकारों के संगठन इस सवाल को उठाते हैं. संपादक के नाते मुझे भी इस बात का अनुभव है. लेकिन मैं किसी विशेष सरकार की आलोचना नहीं कर रहा हूं. सरकारें सब एक तरह की होती हैं. 

सत्ता का अपना एक चरित्र होता है. लेकिन अगर लोकशाही को मजबूत करना है, तो कुछ संस्थाओं का विकास करना होगा. नई संस्थाओं का विकास करना होगा. कुछ मर्यादाओं का विकास करना होगा. कुछ मर्यादाओं का पालन करना होगा. कुछ नये मानदंड कायम करने होंगे. विज्ञापन का अधिकार बड़ा अधिकार है. लेकिन अगर इस अधिकार के दुरुपयोग की संभावना है, तो दुरुपयोग होता भी है. ऐसी व्यवस्था का विकास जरूरी है कि जिसमें समाचार पत्र अपने प्रसार के अनुसार विज्ञापन पा सके. हां, अगर कोई समाचार पत्र निर्धारित आचार संहिता का उल्लंघन करता है, तो कुछ महीनों के लिए उसका विज्ञापन रोका जा सकता है. प्रेस कौंसिल ने भी इस आशय की सिफारिश की है. कोई वर्तमान पत्र अगर कानून का उल्लंघन करता है, तो अदालत उसे दंडित कर दे, तो वह थोड़े समय के लिए विज्ञापन पाने का अधिकार खो देता है.  जिसके बारे में कोई शिकायत ही नहीं है, आचार संहिता का उल्लंघन नहीं है, कानून के दायरे के भीतर वर्तमान पत्र चल रहा है, उसके साथ सचमुच में विज्ञापन में भेदभाव नहीं किया जाना चाहिए. ये भी जरूरी है कि हम समाचार पत्रों को जानकारी इकट्ठी करने का कानूनी अधिकार प्रदान करें. दुनिया भर के लोकतांत्रिक देशों में ऐसे कानून हैं. प्रेस को अधिकार है. जो सरकार के पास जाकर सरकार के किसी अधिकारी के पास जाकर जानकारी की मांग कर सके, इस घटना के बारे में-अमुक घटना के बारे में मुझे तथ्यों की जानकारी चाहिए, आप वह दीजिए. पत्रकार यह मांग कर सकते हैं कि हमें दस्तावेज दिखाएं. राइट टू हैव इंफोर्मेशन जानकारी प्राप्त करने का अधिकार. इसके बिना पत्रकार अपने कर्तव्य का पालन कैसे करे ? अगर सही जानकारी नहीं है, तो अफवाहों पर जाएंगे, सुनी-सुनाई बातों पर भरोसा करने के लिए विवश होंगे. या येन-केन-प्रकारेण वे जानकारी प्राप्त करने की कोशिश करेंगे. इस संबंध में कानून बनाना जरूरी है. प्रेस को कानून से ये अधिकार होना चाहिए कि वह शासन से, या शासन के अधिकारियों से जानकारी प्राप्त कर सके. दस्तावेजों को देख सके. हमें प्रेस के इस अधिकार का समादर करना होगा कि वे अपनी जानकारी का उदघाटन न करें.

जनहित के नाम पर आज इस देश में बहुत सी बातें पार्लियामेंट को, प्रेस को बताई नहीं जातीं. जनहित की अंतिम कसौटी कौन तय करेगा ? कोई चीज जनहित में है या नहीं, इसका निर्धारण कौन करेगा ? मैं संसद में देखता हूं, कोई जानकारी अगर मांगी जाती है, सरकार कहती है- ये जानकारी देना जनहित में नहीं है. और उसके आगे कोई तर्क काम नहीं करता. अगर हम लोकसभा के अध्यक्ष से कहेंगे कि अध्यक्ष महोदय, आप हस्तक्षेप करिए. जनहित का तकाजा है कि ये जानकारी सदन के सामने रखी जाए, देश के सामने रखी जाए. अध्यक्ष महोदय कहते हैं कि जहां जनहित की तलवार टांग दी गई, वहां मेरे अधिकार निष्प्रभावी हो जाते हैं. अब अगर राष्ट्र की सुरक्षा के संबंध में कोई मामला है, तो जनहित की बात समझ में आ सकती है. कोई नहीं चाहेगा कि हमारे देश के रक्षा के रहस्य किसी को भी पता लगें. लेकिन रक्षा के मामले में मैं जहां देखता हूं, जो जानकारी लंदन में उपलब्ध है, वह नई दिल्ली में नहीं दी जाती. जो जानकारी पत्रों में छपती है, वह संसद के सदस्यों को प्राप्त नहीं कराई जाती. आप ऐसा मत समझिए कि जब जनता सरकार थी, तब इस संबंध में कोई अलग पक्रिया थी. मैंने आपसे कहा कि ढंग एक ही था, ढर्रा एक ही था. मगर विचित्र बात है कि हमारे कांग्रेसी मित्र भी ये शिकायत करते थे कि जनमत जनहित का बहाना बनाया जा रहा है. तथ्यों को छिपाने के लिए और आज हम बहाना कर रहे हैं. कहीं न कहीं इस स्थिति को रोकना पड़ेगा. जनहित का अंतिम निर्णय सरकार पर नहीं छोड़ना चाहिए. नाजुक मामलों में मैं समझ सकता हूं. आप जानते हैं मुझे पूरे पच्चीस साल हो गए संसद में. मंत्री भी मैं बहुत थोड़े दिनों के लिए था.  जरूर जन्मपत्री में कई ढाई साल का राजयोग होगा. मेरा विश्वास नहीं है जन्मपत्री पर, मगर आजकल जन्मपत्री का बड़ा जोर है, कर्म पत्री की किसी को चिंता नहीं है. सतहत्तर में लोगों ने बनाया, तो बन गए, अस्सी में हटाया तो हट गए. मन में कोई मलाल नहीं है. विरोधी दल में रहकर देश की सेवा हो सकती है. ऐसी मेरी मान्यता है. लेकिन मैं अनुभव से बता रहा हूं संसद सदस्य के नाते, कि अगर संसद का इसी तरह से अवमूल्यन होता रहा, जैसा कुछ  वर्षों से हो रहा है, तो संसदीय लोकतंत्र से लोगों की आस्था उठ जाएगी. 

संसद को समाज का दर्पण होना चाहिए. समाचार पत्रों को भी समाज का दर्पण होना चाहिए. लेकिन अगर संसद से तथ्य छिपाए जाएंगे, अगर उन्मुक्त वाद-विवाद के लिए वातावरण नहीं होगा, अगर संख्या के बल पर बात गले के नीचे उतरवाने की कोशिश की जाएगी, तो संसद राष्ट्र के हृदय का एक स्पंदन नहीं रहेगी. अन्य संस्थाओं की तरह ही एक संस्था मात्र रह जाएगी, वह कानूनों को मुहर लगाएगी. मगर देश में न तो कोई बुनियादी परिवर्तन ला सकेगी और न तो देश को अराजकता की ओर जाने से रोक सकेगी. इस अवमूल्यन को देखते हुए समाचार पत्रों की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाती है. लोकसभा में बैठकर कभी-कभी मुझे लगता है कि मैं अपने दायित्व का पालन नहीं कर पाता. क्या बोलें ? किसके सामने बोलें ? जिन्हें सुनाना चाहते हैं, वे सुनते नहीं. जो सुनते हैं, वे समझ नहीं पा रहे हैं. जो समझ रहे हैं, वे जवाब नहीं दे रहे हैं. संसद में वार्तालाप कम हो गया है. अपनी बात कहने की रस्म अदायगी ज्यादा हो रही है. ये खतरे की घंटी है. विधानसभाओं का तो और भी बुरा हाल है. उनका कार्यकाल घटाया जा रहा है. बिहार की विधानसभा चार घंटे ही चलती है. जितने अध्यादेश निकाले गए, ऒर्डिनन्स निकाले गए हैं. उनको भी पास नहीं करते. ये अध्यादेश टेबल पर रखे जाते हैं, स्वीकृत नहीं होते. अध्यादेश रद्द होते हैं, विधानसभा स्थगित हो जाती है, फिर अध्यादेश जारी किए जाते हैं. पैंतालीस-चालीस अध्यादेश ऐसे हैं कि जिन्हें विधानसभा ने स्वीकृति नहीं दी, मगर चल रहे हैं. लोकसभा की बैठकें कम कर दी गई  हैं. अन्य विधानसभाएं भी इसी तरह काम कर रही हैं. ऐसे में देश के मानस का प्रतिबिंबीकरण कैसे होगा ? शासन पर अंकुश लगाने का काम कैसे होगा ? नीति निर्धारण में जन प्रतिनिधियों को शामिल करने की प्रक्रिया कैसे चलेगी ? इसके साथ-साथ न्यायपालिका का अवमूल्यन व उस पर हो रहे प्रहारों से इसकी भी प्रतिष्ठा पर आंच आ रही है. मैं इसके विस्तार में नहीं जाना चाहता, अब लोकतंत्र के स्तंभ संसद व न्यायपालिका अगर दुर्बल होते हैं, और कमजोर होते हैं, तो फिर आशा का एक ही स्थान रह जाता है- निर्भीक और स्वतंत्र प्रेस.  निर्भीकता के साथ लिखने वाला पत्रकार, दबाव से मुक्त, सत्ता के प्रभाव से दूर, भीड़ के प्रभाव से दूर, उन्माद के असर से दूर, कलम को पैना करके जो आलोचना करते हैं वैसे समाचार पत्र. लेकिन उन आलोचनाओं के प्रति भी असहिष्णुता की भावना पैदा होती है.  

इस देश में शास्त्रार्थ की पुरानी परंपरा है. शास्त्रार्थ में हारने वाला अपने को पराजित नहीं समझता, अपमानित नहीं मानता, मगर तर्क के द्वारा, तथ्य के द्वारा हम किसी निर्णय पर पहुंच सकते हैं, यह निर्णय सर्वमान्य होगा. इस परंपरा से देश हट रहा है. ’निंदकाचे घर असावे शेजारी’ निंदा करने वाले को पड़ोस में रखो. ये भी पुरानी भावना है. आजकल निंदा करने वाले को कहा जाता है-  जरा दूर हटो. कौन निंदा सुनना चाहता है ?  कौन आलोचना पसंद करता है ? एक देश के नाते हम अपने पर हंसना भी भूल गए. व्यंग्य अच्छा नहीं लगता. विनोद का आनंद नहीं ले सकते. अभी उत्तर प्रदेश में एक घटना हुई. कवि सम्मेलन था. कवियों ने कुछ व्यंग्य कसे होंगे. उत्तर प्रदेश के एक मंत्री महोदय वहां उपस्थित थे. उन्हें पसंद नहीं आया. उन्होंने कहा, "इन कवियों को ठीक करो". फिर उस कवि सम्मेलन में मारपीट हुई. कवियों की ठुकाई की गई. लोग भाग खड़े हुए. कवि मार खाकर वापस आ गए. ऐसा नहीं होना चाहिए.  मैंने कहा, " मैं भी मंत्री रह चुका हूं. उस समय हमें भी सुननी पड़ती थी.  लेकिन हमें इसके लिए तैयार रहना चाहिए.  मगर हम जरूरत से ज्यादा सेंसटिव हो गए हैं. या तो मन में अपराध की भावना है. या हम समझ नहीं पा रहे कि तर्क-वितर्क में से एक समन्वित विचार कैसे निकाला जाए ? इस देश में खंडन होगा, मंडन होगा, मान्यता पर प्रहार किए जाएंगे, मूल्यों को चुनौती दी जाएगी. 
 
इस देश में भगवान के अस्तित्व को नकारने वाले लोग भी पैदा हुए. उन्हें सूली पर नहीं चढ़ाया गया. उन्हें विश्वास के लिए भी मजबूर नहीं किया गया. उनके मत का खंडन किया गया. क्या हम अपनी यह परंपरा या धरोहर छोड़ देंगे ? क्या देश में असहिष्णुता की ऐसी ही लहर चलेगी, जो सारे दिमाग की, चर्चा को, विवेक को, बुद्धि को झुठला देगी ? मैं समाचार पत्रों को बधाई देना चाहता हूं. जो काम संसद नहीं कर पा रही, जो काम विधानसभाएं नहीं कर पा रहीं, वह प्रेस कर रहा है- समाचार पत्र कर रहे हैं. अगर पत्र न हो, तो संसद में जो हम बोलें और वह न छपे, तो किसे पता लगेगा कि हम क्या बोले ? मगर संसद में बोलने के लिए हमें मसाला कहां से आता है ?  समय तो नहीं है, वह अगर है, तो धैर्य नहीं है. किसी बात के पीछे पड़ने की लगन नहीं है. साधन भी नहीं है. योग्यता भी नहीं है. ट्रेनिंग भी नहीं है. मैं आज इस मंच से अरुण शौरी का अभिनंदन करना चाहता हूं. यह बात प्रकाश में न आती, अगर कोई एक पत्रकार खतरों से खेलते हुए भी, सच्चाई की खोज में जुटा न रहता. बिहार में लोग अंधे कर दिए गए, हवालात में अंधे कर दिए गए. अगर जागरूक पत्रकार न होते, अगर वहां जाकर लोगों से बातें न करते, पुलिस के हमले का डर होते हुए भी अपने को खतरे में डालने को तैयार न होते. तो बिहार का वह ’अंधा युग’ प्रकरण कभी रोशनी में न आता. लोक प्रतिनिधि अपना काम नहीं कर पा रहे हैं. सुविधाएं जुटाने में लगे हैं.  इस समय पत्रकार जागरूक हैं, सचेत हैं, हर हालात में हमें पत्रकारों की स्वतंत्रता-प्रेस की स्वतंत्रता की रक्षा करनी है. वे ठीक है कि पत्रकारों का भी अपना दायित्व है. मैंने आपसे निवेदन किया. लिखे हुए शब्द का महत्व है. देश में बहुत से लोग ऐसे हैं, जो कहते हैं- " साब, ये बात सच है, क्योंकि अखबार में लिखी हुई है". मैंने कहा, "अखबार में तो बहुत सी गलत बातें भी छपती हैं." मगर कुछ लोगों को भरोसा है. 

अब पत्रकारों और प्रेस की जिम्मेदारी है कि वे जो कुछ भी छापें, सोच समझकर छापें. छापने से पहले सोचें. मैं दैनिक पत्रों की कठिनाइयों को जानता हूं. ये ’तरुण भारत’  का विशेषांक निकला है, उसको मैं पढ़ रहा था. कोई वार्ताहर थे, उन्होंने गांव से खबर भेजी, कि मारकर जला दिया. टेलीफोन से जो खबर आई, उसमें शब्द ऐसे होते- जलाकर मार दिया. भाव बदल गया. मगर गनीमत है- उन्हें टेलीफोन तो मिल गया. पर कहीं कहीं तो आजकल टेलीफोन भी नहीं मिलते. मेरे साथ दिल्ली से पत्रकार गए थे, एक पदयात्रा में. पहले दिन हमारी पदयात्रा प्रारंभ हुई. हमने कहां जाकर विश्राम किया, यह जानने के लिए पत्रकार आगे-आगे भागे. दिल्ली जल्दी से जल्दी खबर जानी चाहिए. खबर कहां से जाएगी ? टेलीफोन काम नहीं कर रहा है. पत्रकार के लिए बाधा है. रात में अगर समाचार नहीं पहुंचा, तो नहीं छपेगा. दूसरे दिन बासी हो जाएगा. पत्रकार के परिश्रम पर पानी फिर जाएगा. कभी-कभी तार से भेजते हैं. तार की हालत ऐसी है कि चिट्ठी पहले मिलती है- तार बाद में. प्रेस टेलीग्राम अलग कैटेगरी में आते हैं. कितनी कठिनाइयां हैं. और दैनिक पत्र में तो रात में समाचार चाहिए. अब जो मशीनें हैं, जो ज्यादा छाप सकती हैं, वहां देरी से भी समाचार आए,  तो भी आप ले सकते हैं. नहीं तो पहले ही छापना शुरू करना पड़ेगा. 

मैं समाचार पत्रों के इस अधिकार का सम्मान करता हूं, कि उन्हें ये बताने के लिए विवश नहीं किया जाना चाहिए कि उन्हें समाचार कहां से मिला. इंग्लैंड में इस मामले को लेकर सजाएं नहीं होतीं. पत्रकार को तकलीफ उठाने के लिए जेल जाने के लिए तैयार रहना पड़ेगा, अगर उसे धोखा देने के लिए विवश किया जाएगा. इस मामले में एक रोचक घटना मुझे याद है. वहां एक पुलिस अफसर थे, जो अच्छी हिंदी नहीं जानते थे. वे इंटेलिजेंस का भी काम देखते थे. उनके नीचे एक कर्मचारी थी. उस कर्मचारी ने एक दिन रिपोर्ट की, कि विश्वस्त सूत्रों से ऐसा ज्ञात हुआ है कि नगर में कुछ गड़बड़ करने की तैयारी हो रही है. अधिकारी ने वह रिपोर्ट पढ़ी. वे समझे नहीं कि ’विश्वस्त सूत्र’ का क्या मतलब है, उन्होंने फाइल पर लिख दिया- विश्वस्त सूत्रों को मेरे सामने पेश किया जाए. अब इंटेलिजेंस का ऒफिसर बड़ा मुसीबत में पड़ा. विश्वस्त सूत्रों को कैसे आगे करूं ? हैं भी या नहीं ? और अगर हैं, और उन्हें हाजिर किया जाएगा, तो आगे से वह समाचार नहीं देगा. उसने चतुराई से काम लिया. उसने फाइल पर कुछ नहीं लिखा. उसके घर जाकर सलाम किया और कहा. " आपका आदेश तो सर आंखों पर है, मगर वह विश्वस्त सूत्र इस समय शहर से बाहर चला गया है, इसलिए मैं हाजिर नहीं कर सकता. अफसर का समाधान हो गया. अगर समाचार पत्रों को अधिकृत जानकारी नहीं मिल्गी, तो वह इसी तरह सूत्रों से मिलेगी. हालांकि इसके बारे में कोई सीक्रेसी नहीं है. हर किसी को मालूम है और सबसे पहले मालूम है. लेकिन अगर कोई समाचार पत्र इसका उल्लेख कर दे और सरकार को पसंद न आए, तो सरकार अदालत में जा सकती है. इस कारण अगर कोई खबर देता है, तो देना बंद कर देगा. पत्रकार के लिए सत्य का उदघाटन करना जरूरी है. यह पत्रकार के लिए एक चुनौती भी है. और कुछ वर्षों से हमारे देश में ऐसी पत्रकारिता, जांच-पड़ताल करने वाली पत्रकारिता का चलन चल गया है. बहादुरगढ़ कांड का उदघाटन न होता, अगर पत्रकार पीछे न पड़ जाते. ये हमने महाराष्ट्र में भी देखा है. इस पत्रकारिता को प्रोत्साहन देना चाहिए. मगर इसके लिए दृढ़ आर्थिक आधार जरूरी है. उसके बारे में एक आम सहमति बनाई जा सकती है. केवल दल का प्रश्न नहीं. दल तो बदल जाएंगे. सत्ता बदल जाएगी. लेकिन हम ऐसी परंपराएं डालें, ऐसी संस्थाओं का निर्माण करें कि जीवन जगता रहे, जीवन चलता रहे. 

ऒल इंडिया रेडियो व टेलीविजन सरकार के अंग के रूप में चल रहे हैं. इसलिए भारत में पत्रों के ऊपर और भी जिम्मेदारी बढ़ जाती है.  आप कह सकते हैं कि, जब आपकी सरकार थी, तब आपने ऒटोनॊमस कॊर्पोरेशन क्यों नहीं बनाया ? वादा तो हमने किया था, पूरा नहीं कर पाए, अगर कोई काम हमने नहीं किया, इसलिए वह काम अब नहीं होना चाहिए, तो ये बात मेरी समझ में नहीं आती. ऒल इंडिया रेडियो-टेलीविजन का ऒटोनॊमस कॊर्पोरेशन जरूरी है. बीबीसी अपने कर्तव्य का पालन कर रहा है. मगर ऒल इंडिया रेडियो अगर 19 तारीख को सवेरे से यह कहना शुरू कर देती है, "आम हड़ताल विफल हो गई, आम हडताल विफल हो गई.’ यदि हड़ताल शुरू नहीं हुई, तो विफल कहां से हुई ? अगर ऒल इंडिया रेडियो ये कहे कि हड़ताल सफल हुई या विफल हुई- इसके बारे में अलग-अलग दावे किए जा रहे हैं, तो लोग थोड़ा सा सुनेंगे भी, थोड़ा सा उससे प्रभावित भी होंगे. इसलिए प्रचार के साधनों की विश्वसनीयता जरूरी है. कैसी विचित्र स्थिति हो जाती है, मैं आपको एक उदाहरण देना चाहता हूं. असम की सरकार ने समाचार पत्रों पर सेंसर लगा दिया. आवश्यकता नहीं थी, फिर भी लगा दिया. लोकतांत्रिक देश में जन-आंदोलनों से निपटने का ये तरीका नहीं होता. लेकिन वह सेंसरशिप किस सीमा तक चली गई, इसका उदाहरण सामने आया.  जब मैंने भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष के नाते ग्यारह जनवरी को सारे देश में ’असम दिवस’ मनाने का आवाहन किया, तो असम के पत्रों में वे समाचार छपने नहीं दिया गया. छप जाता, तो असम वालों पर अच्छा प्रभाव होता. असम की समस्या के प्रति शेष भारत में भी चेतना है, वे अलग-थलग नहीं हैं, वह अकेला नहीं है. शेष भारत उसके साथ खड़ा है. क्या इसका असर वहां अच्छा नहीं होता ?  मगर ऐसा होने से रोक दिया गया. ऒल इंडिया रेडियो पर ’असम दिवस’ की बात नहीं कहने दी गई. मगर हम दिवस मना रहे हैं, इसकी आलोचना में जो वक्तव्य आए, वे वक्तव्य प्रसारित किए गए. ’असम दिवस’ मनाना ठीक नहीं है, भारतीय जनता पार्टी वाले राजनीतिक लाभ उठाना चाहते हैं, और हम ’असम दिवस’ मना रहे हैं, ये बताया नहीं श्रोताओं को. असम के संबंध में एक दूसरी घटना हुई, जब मैंने सात सूत्री फार्मूला रखा. रेडियो पर फार्मूला नहीं बताया गया. जब मैंने लोकसभा में श्री वसंतराव साठे से पूछा, "आपने रेडियो पर फार्मूला क्यों नहीं बताया?’ कहने लगे, "हमने बताया था,"  मैंने कहा "समय ?" कहने लगे, "सवेरे आठ बजे." हमने कहा, "रात में नौ बजे क्यों नहीं ?" कहने लगे. "नहीं, सवेरे-सवेरे समाचार- ताज़ा समाचार था." और समाचार था एक दिन पहले का. तब प्रेस कांफ्रेंस में मैंने बताया कि किस तरह सरकार ने विपक्ष के विचारों को चालाकी से दबा दिया.

ऒल इंडिया रेडियो जब तक कॊर्पोरेशन नहीं बनता, तब तक प्रेस की जिम्मेदारी और भी बढ़ेगी. सेंसरशिप का विरोध होना चाहिए. समाचार पत्रों के दफ्तरों को घेर लिया जाए, वह प्रवृत्ति खतरनाक है. समाचार पत्रों को धमकी दी जाए, ये लोकशाही की भावना के अनुकूल नहीं है. आलोचना का स्वागत होना चाहिए. मुझे याद है, पंडित नेहरू ने कहा था, "हो सकता है, प्रेस गलती करे, हो सकता है, प्रेस ऐसी बात लिख दे, जो मुझे पसंद न हो. प्रेस का गला घोंटने की बजाय मैं यह पसंद करूंगा कि प्रेस गलती करे और गलती से सीखे, मगर देश में प्रेस की स्वतंत्रता बरकरार रहे." स्पष्ट है कि प्रेस पर भी जिम्मेदारी है. और प्रेस के कागजी संविधान तैयार करके उसका पालन करें, यह आवश्यक है. प्रेस को सनसनी पैदा करने से बचना होगा. एक सांप्रदायिक दंगा हो जाए, इससे प्रेस की जिम्मेदारी बढ़ जाती है. हिंसा की निंदा होनी चाहिए. तनाव घटाने के लिए प्रेस को अपने प्रभाव का उपयोग करना होगा. प्रेस सामाजिक समता के लिए अपनी लेखनी का, अपने प्रभाव का उपयोग करे. 

मैंने वर्षों पहले जो कुछ देखा, उसे मैं जिंदगी भर नहीं भूलूंगा. अभी पिछले दिनों दो घटनाएं हुई हैं, वो मेरे हृदय पर गहरा घाव छोड़ गईं. एक घटना कुतुबमीनार के भीतर बच्चों के मरने की- जब मैं देखने गया, तो मैंने देखा कुतुबमीनार के नीचे बच्चों के कपड़ों के ढेर लगे है. छोटे-छोटे कपड़े खून से रंगे हुए, कुछ शर्ट, कुछ अंडरवियर भी, एक छोटा सा जूता भी पड़ा हुआ था. कहीं छोटा सा टिफिन कैरिअर उलट गया था. पता नहीं किस मां ने कितने प्यार से अपने बेटे को उस टिफिन कैरिअर में सुबह का नाश्ता देकर भेजा होगा. बेटा दिल्ली के दर्शन के लिए जाएगा- मगर वह वापस नहीं आया. मैं रात में जाग जाता हूं कभी-कभी और उन कपड़ों के ढेर को याद कर चौंक जाता हूं, डर जाता हूं. मगर सारूपुर में मैंने जो कुछ देखा, उसे भूलना मुश्किल है. हम लोग जब सारूपुर में पहुंचे, पश्चिम में सूरज अस्त हो रहा था. अंधेरा घिर रहा था. मगर गांव की दक्षिण दिशा में प्रकाश उठ रहा था. यह कैसा प्रकाश है ? यह रोशनी कहां से आ रही है ? जाकर देखा, सामूहिक चिताएं जल रही थीं. अलग-थलग नहीं, अंतिम संस्कार नहीं, मंत्र का पाठ नहीं, तर्पण नहीं, पर घरवाले रो रहे हैं. पुलिसवाले सामूहिक चिता जला रहे हैं. चिता के लिए लकड़ियां भी पूरी नहीं थीं. गृहमंत्री वापस चले गए थे. मुख्यमंत्री भी रुके नहीं थे. शायद उन्हें लखनऊ जाना होगा. आगे का प्रबंध करना होगा. वहां सामूहिक चिता के चारों ओर मुट्ठी भर हरिजन बैठे थे, जाट बैठे थे. दो क्षण के लिए मैं चिता के सामने खड़ा रहा, वह मानवता की चिता थी. 

सारूपुर, देहुली ये दो गांव नहीं हैं, भारत की आत्मा पर लगे हुए दो घाव हैं. पता नहीं कितने घाव लग रहे हैं भारत की आत्मा पर, आत्मा छलनी हो रही है. क्या अर्थ है धर्म की बड़ी-बड़ी बातें करने का ? कौन हमारे दर्शन का मूल्यांकन करेगा ? कौन वेदांत का अभिनंदन करेगा ? पश्चिम के देशों में चमड़े का रंग अलग होने के कारण भेदभाव होता है, तो सारी दुनिया में आवाज उठती है. उस आवाज में हम भी अपना स्वर मिलाते हैं. यहां तो चमड़े का रंग भी एक ही है. क्या फर्क है हममें ? दुश्मनी से नहीं मारे गए लोग, बदले की भावना से नहीं, बल्कि दलित हैं, हरिजन हैं, जाटव हैं, इसलिए मारे गए हैं. केवल समाचार पत्रों ने इस संबंध में अच्छी भूमिका निभाई है. वास्तव में उनका अभिनंदन करना चाहिए.  दो दिन पहले घटना हो गई. राजनीतिक कार्यकर्ताओं को पता नहीं, नेताओं को पता नहीं. उत्तर प्रदेश के दूर गांव में डाकू ग्रस्त गांव में कौन मरता है ? कौन जीता है ? कौन है उनका सुख-दुख बताने वाला ? मगर पत्रकारों को पता लग गया. पहले अंग्रेजी में बात छपी, फिर लखनऊ में, फिर दिल्ली में- सारे देश का ध्यान गया. लेकिन पत्रकार का दायित्व केवल घटना का विवरण देना नहीं है. जो कुछ हो रहा है, हमें प्रकट करना होगा, उसकी सही रिपोर्टिंग करनी होगी निर्भीकता के साथ. बिना इसकी चिंता किए कि कौन नाराज होता है, कौन खुश होता है.

सत्य की रक्षा होनी चाहिए. सत्यमेव जयते, सत्य का उदघाटन, मगर पत्रकारों का दायित्व थोड़ा और भी है. ऐसा मानस बनाना होगा, ऐसी मानसिकता जगानी होगी कि प्रदेश में ऐसी दुर्भाग्यपूर्ण घटनाएं फिर नहीं होने पाए. आर्थिक शोषण के खिलाफ, सामाजिक विषमता के खिलाफ- हमें राष्ट्रीय भावना जगानी है. संकल्प जगाना है. पत्रकारों को उसमें भी अपनी भूमिका निभानी है. यह ठीक है- पत्रकारॊं की जीविका का प्रश्न है. पत्रकारों के सामने वेतन की समस्या है. पालेकर एवार्ड का स्वागत होना चाहिए. लेकिन मैं देख रहा हूं, पालेकर एवार्ड का कार्यान्वयन हुआ और छोटे-छोटे पत्र बंद हो गए. अर्थाभाव है. क्या वे किसी उद्योगपति की शरण में जाएं ? या जो पक्ष की सरकार है, उसकी हां में हां मिलाएं ? अपने पैरों पर कैसे खड़े रहेंगे छोटे पत्र ? उन्हें विशेष सहायता देनी होगी, विज्ञापनों की दृष्टि से उनकी मदद करनी होगी. न्यूज प्रिंट की बढ़ी कीमत वापस लेनी होगी. भाषाई पत्रों की अलग समस्या है. मैं ज्यादा विस्तार में जाना नहीं चाहता. आज भी हमारे देश में अंग्रेजी पत्रकारिता अधिक विकसित है. उनके पास अधिक बिक्री साधन हैं, सुविधाएं हैं. भाषाई पत्र अनुवाद के आधार पर चलते हैं. जो हैं, उन्हें पूरी सहायता नहीं मिल रही है. संवाद समिति में भी भेदभाव हो रहा है. अनुवाद की समस्या है. अंग्रेजी से प्रतियोगिता कैसे हो ? भाषाई पत्र अंगेजी पत्र के टक्कर में अधिक कैसे बिकें ? आधा समय अनुवाद में चला जाता है, समय जाता है, शक्ति जाती है, गलतियां हो जाती हैं.

मुझे याद है इलाहाबाद से एक पत्र निकलता था. उसमें काम करने वाले कई नये लोग थे, कोई तरुण थे. सवेरे पत्र निकलना है, रात के बारह बजे हैं, कोई खबर आ जाए- और चटपटी खबर चाहिए. पत्रों को इसलिए दोष देने की जरूरत नहीं है. थोड़ी सनसनी जरूरी है. फिर हेडलाइन कैसे बनेगी? अगर सब कुछ ठीक है तो अखबार नहीं बनता. मगर हमारे देश में तो सबकुछ कभी ठीक रहने वाला है नहीं. इसलिए हेडलाइन बनती रहती है. मैं इलाहाबाद की उस घटना का उल्लेख कर रहा हूं, उसमें ऐसा हुआ कि रात में खबर आई- पुलिस ओपन्ड फायर- फिर आगे वर्णन था- कोई नया पत्रकार था, उसने डिक्शनरी देखी- ओपन फायर के बदले उसने लिखा-  पुलिस ने आग खोल दी. उस दैनिक पत्र का शीर्षक था पुलिस ने आग खोल दी. नीचे लिखा था इतने मरे- इतने घायल. (अब यह आग खोल दी क्या हो गया ? आग बंद थी जो खो दी? ओपनफायर- पुलिस ने आग खोल दी.) अंग्रेजी पत्र ऐसी गलतियां नहीं कर सकते. भाषाई अखबार के सामने समस्या है. इसलिए उन्हें विशेष सहायता देने की जरूरत है. लेकिन इसके लिए दृष्टिकोण बदलना पड़ेगा. विविध समाचार पत्रों को हम पढ़ते हैं. वह और अच्छा निकलें. अपनी प्रतिक्रिया से उन्हें अवगत कराएं. हमारे पत्रों पर राजनीति ज्यादा छाई है. राजनीति जीवन का एक महत्वपूर्ण अंग है. मगर राजनीति जीवन का सर्वस्व नहीं है. राजनीति सारा जीवन नहीं है. राजनेता क्या करते हैं ? यह खबर है. मगर एक रचनात्मक कार्यकर्ता किस तरह से अपने को मिटाकर, जूझकर, अंधेरे में रहकर, तिल तिल जलाकर-स्वावलंबन की, स्वदेशी की भावना जगा रहा है. लोगों को अपने पैरों पर खड़े रहने का संस्कार दे रहा है, समाचार पत्रों में उनका भी उल्लेख होना चाहिए. मानवीय संवेदनाओं का उदघाटन- जो लाइम लाइट में नहीं रहते- उन्हें प्रकाश में लाना और दोनों का मेल बिठाया जा सकता है. यह ठीक है कि समाचार पत्रों को रुचि का भी ध्यान रखना पड़ता है. लेकिन रुचि बढ़ाने की भी जिम्मेदारी है, काफी स्थान रहता है. बुद्धिजीवी, रचनात्मक कार्यकर्ता, अन्याय के खिलाफ लड़ने वाले लोग, कहीं गरीब महिलाओं में- कोई बुनाई, सिलाई का केंद्र चलाकर उन्हें कमाई में थोड़ी सी सहायता देने वाली महिला, कोई अच्छा खिलाड़ी, अपने परिश्रम से अपना भविष्य बनाने वाले नौजवान, साहित्यकार, शिल्पकार- धीरे-धीरे हमारे समाचार पत्रों में आने लगे हैं. लेकिन फिर भी जितना आना चाहिए, उतना नहीं आ रहा है.  

हर समस्या का एक मानवीय पक्ष है. मानवीय पक्ष को ध्यान में लाना, उसे उदघाटित करना- यह खबर है, मगर दंगे के साथ यह खबर भी होनी चाहिए कि एक मोहल्ले में दंगा हो रहा था, तो दूसरे मोहल्ले में सब लोग मिलजुल कर सामान खरीद रहे थे, आपस में व्यवहार कर रहे थे. यह मैंने सारूपुर में देखा है. यह नहीं कि आसपास के गांव को पता नहीं- चेतना नहीं- मगर रिश्ते अभी मजबूत हैं, इसलिए देश के बारे में आशा है. कभी-कभी आशंका जरूर होती है. मगर आशा साथ नहीं छॊड़ती. संतुलित दृष्टिकोण लेकर अगर समाचार पत्र चलें, जहां प्रहार करना है, वहां प्रहार करने में कसर नहीं, लेकिन जहां मर्यादा का पालन करना चाहिए, वहां मर्यादा का उल्लंघन का कोई विचार नहीं. स्वदेश में पत्रकारिता अपने दायित्व को और भी अच्छी तरह से पूरा करेगी, लोकशाही को बल मिलेगा, संसद और न्यायपालिका के अवमूल्यन के कारण कमी पैदा हो रही है, उसे समाप्त करने में, स्वतंत्र और निर्भीक प्रेस हमारी सहायता करेंगे. मैं ’तरुण भारत’ को उज्जवल भविष्य के लिए अपनी मंगल कामनाएं देता हूं, उसका अभिनंदन करता हूं, और सब श्रोताओं से एक बार फिर अपील करना चाहता हूं, समाचार पत्र पढ़े, मगर खरीद कर पढ़ें, मांग कर न पढ़ें. 
-डॉ. सौरभ मालवीय

(पुस्तक- 'राष्ट्रवादी पत्रकारिता के शिखर पुरुष अटल बिहारी वाजपेयी' से)

ग़ालिब उर्दू और फ़ारसी के महान कवि हैं

    उर्दू और फ़ारसी के महान शायर मिर्ज़ा ग़ालिब पर 13 दिसंबर, 1998 को आयोजित समारोह में श्री अटल बिहारी वाजपेयी ने उर्दू के महत्व पर प्रकाश डाल...