Wednesday, May 27, 2026

जीवन में अमृत है पानी : जल है तो कल है

 

डॉ. सौरभ मालवीय 
मनुष्य का शरीर पंचभूत से निर्मित है। पंचभूत में पांच तत्त्व आकाश, वायु, अग्नि, जल एवं पृथ्वी सम्मिलित है।  
सभी प्राणियों के लिए जल अति आवश्यक है। प्रत्येक प्राणी को जीवित रहने के लिए जल चाहिए। नि:संदेह जल ही जीवन है। जल के बिना जीवन की कल्पना करना असंभव है। जल के पश्चात मनुष्य को जीवित रहने के भोजन चाहिए। भोजन के लिए अन्न, फल एवं सब्जियां उगाने के लिए भी जल की ही आवश्यकता होती है।  कृषकों को अपनी फसल की सिंचाई के लिए वर्षा पर निर्भर रहना पड़ता है। पर्याप्त वर्षा न होने पर उनकी फसल सूख जाती है। अधिकांश क्षेत्र ऐसे हैं, जहां पर वर्षा नाममात्र की ही होती है। जलवायु परिवर्तन एवं जल के अत्यधिक दोहन के कारण भू-जल स्तर लगातार गिरता जा रहा है। इस गिरते भू-जल स्तर के कारण सिंचाई जल संकट उत्पन्न हो गया है। इसके अतिरिक्त जिन क्षेत्रों में जल की आपूर्ति नहीं है अथवा जल की पर्याप्त आपूर्ति नहीं है, वहां के निवासी भी पेयजल के लिए संकट में रह रहे हैं। देश के विभिन्न क्षेत्रों में जल संकट बना हुआ है। 
वास्तव में इस जल संकट के लिए मनुष्य स्वयं उत्तरदायी है। प्राचीन काल में लोग प्राकृतिक वस्तुओं का उतना ही उपयोग करते थे, जितनी उनकी आवश्यकता होती है। भारतीय संस्कृति के अनुसार ईश्वर कण-कण में विद्यमान है। इसलिए प्रत्येक वस्तु में भगवान का वास माना जाता है। हमारी प्राचीन गौरवमयी संस्कृति में जल को जीवन माना गया है-
जलमेव जीवनम्।
ऋग्वेद में भी जल के गुणों का वर्णन करते हुए कहा गया है-
अप्स्वन्तरमृतमप्सु भेषजम्।। 
अर्थात जल में अमृत है, जल में औषधि है।
महाभारत में भी जल के महत्त्व का वर्णन करते हुए इसे सर्वोत्तम दान कहा गया है-
अद्भिः सर्वाणि भूतानि जीवन्ति प्रभवन्ति च।
तस्मात् सर्वेषु दानेषु तयोदानं विशिष्यते।। 
अर्थात संसार के समस्त प्राणियों की उत्पत्ति जल से हुई है तथा इसी से वे जीवित रहते हैं। अत: सभी प्रकार के दानों में जल-दान सर्वोत्तम माना गया है। महाभारत में यह भी कहा गया है-
पानीयं परमं लोके जीवानां जीवनं समृतम्।
पानीयस्य प्रदानेन तृप्तिर्भवति पाण्डव।
पानीयस्य गुणा दिव्याः परलोके गुणावहाः।। 
अर्थात जल से ही संसार के समस्त प्राणियों को जीवन प्राप्त होता है। जल का दान करने से प्राणियों को तृप्ति प्राप्त होती है। जल में दिव्य गुण हैं, जो परलोक में भी लाभ प्रदान करते हैं।   
विष्णु पुराण में जल-चक्र का वर्णन किया गया है कि किस प्रकार वह वाष्प बनता है तथा वर्षा के रूप में भूमि को तृप्त करता है। इसी जल से कृषि होती है अर्थात अन्न उत्पन्न होता है- 
विवस्वानर्ष्टाभर्मासैरादायापां रसात्मिकाः।
वर्षत्युम्बु ततश्चान्नमन्नादर्प्याखिल जगत्।  
अर्थात सूर्य आठ मास तक अपनी किरणों से रस स्वरूप जल को ग्रहण करता है। तत्पश्चात चार मास में उसे वर्षा के माध्यम से बरसा देता है। इससे अन्न उत्पन्न होता है, जिससे संपूर्ण जगत का पोषण होता है।
वर्षा का जल अत्यंत उपयोगी है। अर्थवेद में भी इस विषय में कहा गया है- 
शिवा नः सन्तु वार्षिकीः।
अर्थात वर्षा का जल कल्याणकारी है।
प्राचीन ग्रन्थों में जल संरक्षण पर विशेष बल दिया गया है। ऋग्वेद के अनुसार- 
अप्स्वडन्तरमृतमप्सु भेषजमपामुत प्रशस्तये देवा भक्त वाजिनः।
अर्थात अमृत के समान एवं गुणकारी जल का उचित उपयोग करने वाले बनो। जल की प्रशंसा के लिए सदैव तत्पर रहो।   
प्राचीन काल में जल संरक्षण पर विशेष बल दिया जाता था। तालाब बनाए जाते थे एवं कुएं खोदे जाते थे। वर्षा का जल तालाबों आदि में एकत्रित हो जाता था। इन तालाबों से मनुष्य ही नहीं, जीव-जंतु भी लाभान्वित होते थे।      
किन्तु कालांतर में प्राकृतिक एवं मनुष्य निर्मित जल स्रोत समाप्त होते जा रहे हैं। ऋग्वेद में जल संरक्षण के विषय में यह भी कहा गया है-
आपो अस्मान्मातरः शुन्ध्यन्तु द्यृतेन ना द्यृत्प्वः पुनन्तु।
अर्थात जल हमारी माता के समान है। जल घृत के समान हमें शक्तिशाली एवं उत्तम बनाता है। इस प्रकार का जल जहां कहीं भी हो, उसका संरक्षण करना चाहिए।  
जल संकट के लिए प्रदूषण भी उत्तरदायी है, क्योंकि प्रदूषण के कारण जल अनुपयोगी हो जाता है। वह पीने योग्य नहीं रहता। अत: हमें जल को प्रदूषित होने से बचाना चाहिए। यजुर्वेद में भी जल संरक्षण पर बल दिया गया है-
मा आपो हिंसी। 
अर्थात जल को नष्ट मत करो।  
देश में नदियों की का अभाव नहीं है, परन्तु प्रदूषण के कारण उनका जल पीने योग्य नहीं है। स्थिति इतनी गंभीर है कि कारखानों से निकलने वाले घातक रसायनों एवं सीवर की गंदगी के कारण नदियों का पानी विषैला हो गया है। 
भारतीय संस्कॄति में गंगा को पवित्र नदी माना जाता है। इसे मोक्षदायिनी भी कहा जाता है। किन्तु दुख की बात यह है कि सबके पाप धोने वाली यह पवित्र नदी दिन-प्रतिदिन प्रदूषित होती जा रही है। नदियों में शव बहाने से भी यह प्रदूषित हो रही है। इस नदी को साफ करने के लिए सरकारी और गैर सरकारी स्तर पर प्रयास होते रहते है। समय-समय पर कई कार्यक्रम और योजनाएं भी चलाई गईं ऐसे कार्यक्रमों में समाज जीवन से जुड़े प्रत्येक व्यक्ति को लोकमंगल के कार्य मे सहयोगी होने की आवश्यकता है। 
भारतीय संस्कृति में जल को देवता माना गया है। अत: विभिन्न मांगलिक अवसरों पर जल की पूजा की जाती है अर्थात कुआं पूजन किया जाता है। महिलाएं गीत गाती हुई कुआं पूजने जाती हैं। महानगरों में अब कुएं नहीं हैं। अत: महानगरों से यह परम्परा भी समाप्त हो रही है। गांवों में अभी कुआं पूजन की परम्परा जीवित है। भारतीय संस्कृति में नदियों को देवी स्वरूप माना गया है। नदियों के तट पर धार्मिक कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है। 
प्रयागराज में कुम्भ मेले का आयोजन किया जाता है, क्योंकि यहां गंगा, यमुना और सरस्वती का अद्भुत संगम होता है, जिसे अत्यंत पवित्र माना जाता है। भारत में महाकुम्भ धार्मिक स्तर पर अत्यंत पवित्र एवं महत्वपूर्ण आयोजन है। खगोल गणनाओं के अनुसार कुम्भ मेला मकर संक्रान्ति के दिन प्रारम्भ होता है। उस समय सूर्य और चन्द्रमा, वृश्चिक राशि में और वृहस्पति, मेष राशि में प्रवेश करते हैं। इस दिवस को अति शुभ एवं मंगलकारी माना जाता है। मान्यता है कि इस दिन पृथ्वी से उच्च लोकों के द्वार खुलते हैं। इस दिन स्नान करने से आत्मा को उच्च लोकों की प्राप्ति होती है। पौराणिक कथाओं के अनुसार भगवान विष्णु अमृत से भरा कुम्भ लेकर जा रहे थे कि असुरों ने आक्रमण कर दिया। अमृत प्राप्ति के लिए देव एवं दानवों में परस्पर बारह दिन तक निरंतर युद्ध हुआ। देवताओं के बारह दिन मनुष्यों के बारह वर्ष के समान होते हैं। इसलिए कुम्भ भी बारह होते हैं। इनमें से चार कुम्भ पृथ्वी पर होते हैं तथा शेष आठ कुम्भ देवलोक में होते हैं। देव एवं दानवों के इस संघर्ष के दौरान अमृत की चार बूंदें गिर गईं। ये बूंदें प्रयाग, हरिद्वार, नासिक तथा उज्जैन में गिरीं, जहां पर तीर्थस्थान बना दिए गए। तीर्थ उस स्थान को कहा जाता है जहां मनुष्य को मोक्ष की प्राप्ति होती है। इस प्रकार जहां अमृत की बूंदें गिरीं, उन स्थानों पर तीन-तीन वर्ष के अंतराल पर बारी-बारी से कुम्भ मेले का आयोजन किया जाता है। इन तीर्थों में प्रयाग को तीर्थराज के नाम से जाना जाता है, क्योंकि यहां तीन पवित्र नदियों का संगम होता है। इसके अतिरिक कालिंदी, कावेरी, रामगंगा, कोसी, गगास, कृष्णा, गोदावरी, गंडक, घाघरा, चम्बल, चेनाब, झेलम, दामोदर, नर्मदा, ताप्ती, बेतवा, पद्मा, फल्गू, बागमती, ब्रह्मपुत्र, भागीरथी, महानदी, महानंदा, रावी, व्यास, सतलुज, सरयू, सिन्धु नदी, सुवर्णरेखा, हुगली, गोमती, माही आदि नदियों में भी श्रद्धालु स्नान करते हैं। छठ के अवसर पर नदियों के तटों पर श्रधालुओं का जमावड़ा लगा रहता है।
नदी, तालाब एवं कुएं आदि अथाह जल के स्रोत हैं। ये अमूल्य हैं। हमें इनका संरक्षण करना चाहिए। यदि वर्षा के जल को तालाबों आदि में एकत्रित किया जाए, तो जल संकट से उबरा जा सकता है। इसके साथ ही हमें जल को व्यर्थ न बहाकर इसका सदुपयोग करना चाहिए।

Tuesday, May 26, 2026

समाचार पत्रों में

 









नवचयनित आचार्य प्रशिक्षण वर्ग














विद्या भारती द्वारा संचालित ज्वाला देवी सरस्वती विद्या मंदिर प्रयागराज में आयोजित पंद्रह दिवसीय नवचयनित आचार्य प्रशिक्षण वर्ग में शिक्षण, संस्कार एवं भारतीय जीवन मूल्यों पर आधारित विविध सत्रों का आयोजन किया जा रहा है।

इस अवसर पर मुख्य वक्ता डॉ. सौरभ मालवीय (क्षेत्रीय मंत्री, विद्या भारती) ने “भारतीय ज्ञान परम्परा” विषय पर प्रेरक एवं विचारोत्तेजक मार्गदर्शन प्रदान किया। उन्होंने कहा कि भारतीय ज्ञान परम्परा केवल शिक्षा का माध्यम नहीं, बल्कि जीवन को संस्कारित करने वाली समग्र दृष्टि है, जो मानवता, कर्तव्यबोध, राष्ट्रचेतना एवं विश्वकल्याण का मार्ग प्रशस्त करती है।

उन्होंने आचार्यों से आह्वान किया कि वे शिक्षा को केवल जानकारी तक सीमित न रखकर संस्कार, संवेदना और चरित्र निर्माण का माध्यम बनाएं। भारतीय संस्कृति, वेद-उपनिषद, गुरु-शिष्य परम्परा तथा राष्ट्रनिष्ठ शिक्षा व्यवस्था को वर्तमान समय की आवश्यकता बताते हुए उन्होंने नवचयनित आचार्यों को विद्यार्थियों के समग्र व्यक्तित्व निर्माण हेतु समर्पित भाव से कार्य करने की प्रेरणा दी।

इस सघन प्रशिक्षण वर्ग में नवचयनित आचार्य बंधु-भगिनी उत्साहपूर्वक सहभागिता कर रहे हैं तथा विविध शैक्षिक, सांस्कृतिक एवं व्यवहारिक गतिविधियों के माध्यम से अपने व्यक्तित्व एवं शिक्षण कौशल का विकास कर रहे हैं।

Monday, May 25, 2026

आचार्य संवाद

 






आचार्य संवाद - प्रयागराज 
विद्या भारती

टीवी पर लाइव




प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी के 12 वर्षों के कार्यकाल में ऐसे अनेक गुमनाम सामाजिक कार्यकर्ताओं, लोक कलाकारों, जनजातीय परंपराओं के संवाहकों, पर्यावरण रक्षकों, दिव्यांग सेवकों, ग्रामीण चिकित्सकों और समाजसेवियों को राष्ट्रीय स्तर पर सम्मानित किया गया, जिन्हें पहले मुख्यधारा में बहुत कम पहचान मिलती थी। विशेष रूप से Padma Awards को “पीपुल्स पद्म” के रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया, ताकि देश के दूरस्थ क्षेत्रों में सेवा कर रहे लोगों को भी राष्ट्रीय सम्मान मिल सके।
समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचने का प्रयास है.

मेधावी छात्र-छात्राएं हुए सम्मानित











भारतीय शिक्षा समिति पूर्वी उत्तर प्रदेश, काशी प्रान्त के तत्वावधान में आज ’’ज्वाला देवी सरस्वती विद्या मन्दिर इण्टर कॉलेज’’ के विशाल सभागार में ’’प्रान्तीय मेधा अलंकरण समारोह’’ का भव्य आयोजन किया गया। कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में उत्तर प्रदेश सरकार की माध्यमिक शिक्षा मंत्री श्रीमती गुलाब देवी उपस्थित रहीं। कार्यक्रम की अध्यक्षता विद्या भारती पूर्वी उ.प्र. के क्षेत्रीय मंत्री डॉ. सौरभ मालवीय ने की। विशिष्ट अतिथि के रूप में प्रयागराज के महापौर श्री गणेश केसरवानी, विद्या भारती पूर्वी उ.प्र. के क्षेत्रीय सह संगठन मंत्री डॉ. राम मनोहर एवं काशी प्रान्त के प्रदेश निरीक्षक श्री शेषधर द्विवेदी उपस्थित रहे। कार्यक्रम का विधि-विधान से शुभारम्भ माँ सरस्वती के सम्मुख दीप प्रज्ज्वलन एवं पुष्पार्चन के साथ हुआ। इसके बाद प्रदेश निरीक्षक श्री शेषधर द्विवेदी ने नवागंतुक अतिथियों का परिचय कराया तथा स्मृति चिन्ह एवं अंगवस्त्रम भेंट कर उनका आदर-सत्कार किया।

कार्यक्रम की प्रस्ताविकी प्रस्तुत करते हुए डॉ. सौरभ मालवीय ने विद्या भारती के वैश्विक और राष्ट्रीय योगदान पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा आज देश में विद्या भारती ही एकमात्र ऐसी संस्था है जो बालकों को मूल्य आधारित एवं संस्कारयुक्त शिक्षा देने का महती कार्य कर रही है। वर्तमान में विद्या भारती के विद्यालय देश के 684 जनपदों में संचालित हैं, जिनमें लगभग 43 लाख छात्र-छात्राएं अध्ययनरत हैं। हमारा उद्देश्य केवल किताबी ज्ञान देना नहीं, बल्कि विद्यार्थियों में राष्ट्रप्रेम की भावना जागृत करना है। आज जहाँ विश्व में युद्ध और अशांति का माहौल है, वहीं विद्या भारती मातृ सम्मेलन और कुटुम्ब प्रबोधन जैसे रचनात्मक कार्यक्रमों के माध्यम से समाज और राष्ट्र में प्रेम व समरसता का भाव भर रही है।

समारोह के मुख्य चरण में यूपी बोर्ड की हाईस्कूल एवं इण्टरमीडिएट परीक्षा में प्रदेश तथा जनपद की मेरिट सूची में स्थान बनाने वाले मेधावी छात्र-छात्राओं को सम्मानित किया गया। इसके साथ ही, विगत दो वर्षों में प्रशासनिक सेवा, इंजीनियरिंग, चिकित्सा और खेल जगत में उत्कृष्ट प्रदर्शन कर काशी प्रान्त का नाम रोशन करने वाले पूर्व भैया-बहनों को भी स्मृति चिन्ह और पुरस्कार देकर उनका सम्मान किया गया। 

मुख्य अतिथि श्रीमती गुलाब देवी (माध्यमिक शिक्षा मंत्री, उ.प्र.) ने अपने ओजस्वी उद्बोधन में मेधावियों और शिक्षकों को बधाई देते हुए कहा कि किसी भी छात्र की सफलता के पीछे उसके शिक्षक का सबसे बड़ा योगदान होता है। उन्होंने विद्या भारती के कार्यपद्धति की सराहना करते हुए कहा बालक का सर्वांगीण विकास केवल विद्या भारती जैसे पवित्र शिक्षण संस्थानों में ही संभव है। आज के आधुनिक युग में समाज से जो मानवीय और नैतिक संस्कार लुप्त होते जा रहे हैं, उन्हें पुनर्जीवित करने का बीड़ा केवल विद्या भारती के विद्यालयों ने उठा रखा है। छात्र-छात्राओं को जीवन की हर चुनौती को सहर्ष स्वीकार करते हुए आगे बढ़ना चाहिए।

इस गरिमामयी समारोह में कंचन सिंह, भगवती सिंह, पी.एन. सिंह, शरद गुप्त, रघुराज सिंह, आर.एन. विश्वकर्मा सहित विद्या भारती के अनेक क्षेत्रीय एवं प्रान्तीय पदाधिकारीगण, प्रबन्ध समिति के सदस्य, प्रबुद्ध नागरिक, अभिभावक और मीडिया के बंधु भारी संख्या में उपस्थित रहे। 

Sunday, May 24, 2026

टीवी पर लाइव

 




26 मई 2014 को Narendra मोदी जी ने भारत के प्रधानमंत्री पद की शपथ लेकर एक नए राजनीतिक युग का आरम्भ किया।
इन 12 वर्षों में भारत ने विकास, सुशासन, राष्ट्रीय सुरक्षा, वैशिक प्रतिष्ठा, आधारभूत संरचना, डिजिटल क्रांति और आत्मनिर्भरता के अनेक आयामों को नई गति दी।
“12 साल बेमिसाल” केवल एक राजनीतिक नारा नहीं, बल्कि जनविश्वास, निर्णायक नेतृत्व और राष्ट्र प्रथम की कार्यशैली का प्रतीक बन चुका है।
इन वर्षों की प्रमुख विशेषताएँ —
गरीब कल्याण और जनधन योजनाएँ
डिजिटल इंडिया और स्टार्टअप संस्कृति का विस्तार
आतंकवाद एवं नक्सलवाद पर कठोर नीति
महिला सशक्तिकरण और उज्ज्वला जैसी योजनाएँ
विश्व मंच पर भारत की मजबूत पहचान
राम मंदिर निर्माण से सांस्कृतिक चेतना का पुनर्जागरण
आत्मनिर्भर भारत और मेक इन इंडिया का संकल्प
आधुनिक एक्सप्रेसवे, वंदे भारत ट्रेन और इंफ्रास्ट्रक्चर विकास
2014 Indian General Election के बाद प्रारम्भ हुई यह यात्रा आज विकसित भारत के संकल्प की दिशा में निरंतर आगे बढ़ रही है।
“सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास और सबका प्रयास” के मंत्र के साथ मोदी सरकार ने सेवा, सुशासन और गरीब कल्याण को अपनी प्राथमिकता बनाया।

जीवन में अमृत है पानी : जल है तो कल है

  डॉ. सौरभ मालवीय  मनुष्य का शरीर पंचभूत से निर्मित है। पंचभूत में पांच तत्त्व आकाश, वायु, अग्नि, जल एवं पृथ्वी सम्मिलित है।   सभी प्राणियों...