Tuesday, July 14, 2026

राष्ट्रीय संकल्प की उदघोषणा है वंदे मातरम

   


महाराष्ट्र के मुंबई के विलेपार्ले में 1996 में राष्ट्रीय गीत वंदे मातरम की 150वीं जयंती के समारोह को संबोधित करते हुए श्री अटल बिहारी वाजपेयी ने वंदे मातरम के महत्व पर प्रकाश डाला. अपने संबोधन में उन्होंने कहा- सचमुच मैं महोत्सव समिति को बधाई देकर उनका अभिनंदन करना चाहता हूं. समिति ने वंदे मातरम को, लेखक श्री बंकिमचंद्र को- जिन्हें ऋषि के रूप में याद किया जाता है- वस्तुत: वह हमारी विश्व परंपरा में थे, उनकी स्मृति को  एक बार फिर से जन-जन तक पहुंचाने के लिए यह अनुष्ठान बड़ी सफलतापूर्वक संपन्न किया. वंदे मातरम एक शताब्दि से अधिक समय से इस देश को अनुप्राणित करता रहा है. लेकिन इतने दिनों बाद, उसे फिर से प्रस्तुत करने का जो प्रयत्न हुआ है, वह अपने में एक महनीय प्रयत्न है और मैं महोत्सव समिति को एक बार फिर बधाई देना चाहता हूं. मैं नहीं जानता, देश के किसी भाग में इस तरह का शताब्दि समारोह मनाया गया, कम से कम मुझे उसका निमंत्रण नहीं आया. इसलिए पहले जब इस कार्यक्रम का निमंत्रण मिला, तो सहज स्वाभाविक रूप से मेरी इच्छा हुई कि ऐसे कार्यक्रम में मुझे जाना चाहिए. लेकिन उस समय मेरे विदेश जाने की बात थी, न्यूयॊर्क में जनरल असेंबली का अधिवेशन चल रहा था, उसकी एक समिति के साथ मैं जुड़ा हुआ हूं. मैंने डॊ. लेले साहब को लिखा था कि अगर मैं विदेश नहीं गया तो आऊंगा. मगर संयोग देखिए कि मैं विदेश भी गया और यहां भी आ गया. यह समिति के सदस्यों के आत्मीयता के कारण हुआ है.

अभी जो मैंने विस्तृत विवरण सुना-किस किस तरह से विद्यालयों में, किस तरह से छात्रों के बीच, किस तरह से विविध प्रकार के कार्यक्रमों का आयोजन करके राष्ट्रीय गीत वंदेमातरम का शताब्दि का समारोह मनाया गया है, यह सचमुच में एक प्रेरणादायी प्रसंग है. मैं उन कार्यक्रमों के विस्तार में नहीं जाता, मैं तो उनके बारे में पढ़ रहा हूं, सुन रहा हूं- आपने तो उनको देखा होगा. मैं देखने से वंचित हो गया. मैंने डॊक्टर साहब को पूछा कि मेरे भाषण के अतिरिक्त और भी कोई कार्यक्रम है या नहीं ? कार्यक्रम होना चाहिए था. या शायद मुझे समय पर आना चाहिए, मैं देर से आया हूं- या कार्यक्रम पहले हो गया हो.  

वंदेमातरम के साथ हमारी राष्ट्रीय स्मृतियां जुड़ी हुई हैं. उसके साथ पराधीनता की पीड़ा जुड़ी हुई है, पराधीनता के पाश को काट कर फेंकने का वज्र संकल्प जुड़ा हुआ है. एक राष्ट्र के संघर्ष की कहानी जुड़ी हुई है. बलिदानों के प्रसंग जुड़े हुए हैं. काले पानी की काल कोठरियों में बेड़ियों की झंकार के बीच सुनाई देने वाली उसकी गूंज जुड़ी हुई है. हमें ऐसा राष्ट्र गीत उपलब्ध हुआ है, जो सचमुच में हमारे हृदय के तारों को झंकृत कर देता है. जो गीत फांसी के तख्ते पर चढ़ते हुए गाया जाता है, जो गीत बलिदान के रक्त से लिखा गया था, जो गीत संपूर्ण संघर्ष की कहानी कहता है. और इस धरती के प्रति- भारत मां के प्रति, जो श्रद्धा निवेदन में अपूर्व है, उस गीत की शताब्दि मनाकर आपने सचमुच में उस गीत का सम्मान नहीं किया- हमने अपनों को सम्मानित किया है. हमने अपनों को एक आदर्श दिया है.
 
मैंने कहा आपसे कि बंकिमचंद्र की गणना ऋषियों में होगी. कल्पना करिए उस सौ-सवा सौ वर्ष पहले के काल का- किस तरह से विदेशियों ने देश को पददलित किया था, किस तरह से देश को बांटने की साजिश की थी, किस तरह से अत्याचार और आतंक के साम्राज्य को स्थापित किया था. लेकिन उसी के साथ त्याग और बलिदान की एक परंपरा, एक के बाद एक फांसी के तख्ते पर चढ़ने के लायक भारतमाता के सुपुत्र, दमन और आतंक के खिलाफ छाती तानकर खड़े रहने की तैयारी में इस गीत ने देश में नये प्राण फूंके थे. वंदेमातरम एक मंत्र बन गया था. विदेशी उसे सुनकर चिढ़ते थे, वंदेमातरम का गीत गाकर, वंदेमातरम का नारा लगाकर, देश भक्तों के हृदय पुलकित हो जाते थे. जो फांसी के तख्तों पर नहीं चढ़ सकते थे. वे भी वंदेमातरम का गीत गाकर आनंदित अनुभव करते थे, अपने को गौरवांवित अनुभव करते थे. शायद ही संसार के किसी देश में त्याग और बलिदान से पवित्र ऐसा गीत, राष्ट्रगीत के रूप में स्वीकार किया गया हो.

यह दुर्भाग्य की बात है कि यह गीत भी विवाद का विषय बन गया था. अभी भी थोड़ा विवाद हो रहा है. यह दुर्भाग्यपूर्ण विवाद सामने आया, मुंबई के लोकसभा सदस्य श्री रामभाऊ नाईक के प्रयत्नों से. उनका अभिनंदन होना चाहिए. वह चुनकर गए, तो उन्होंने अपना प्रयत्न प्रारंभ किया कि संसद के सत्र का जब प्रारंभ होता है और जब सत्र समाप्त होता है, तो वह राष्ट्रगीत के साथ होना चाहिए. महाराष्ट्र के विधान मंडल में पहले से ऐसा हो रहा है.  लोकसभा के अध्यक्ष श्री शिवराज पाटील को यह विचार पसंद आया. मैं उनको भी श्रेय देना चाहता हूं. लेकिन सदस्यों में मतभेद है. क्या आवश्यकता है ? यहां से प्रश्न शुरू हुआ. अभी तक राष्ट्रगीत नहीं गाया जाता था. अब उसकी क्या जरूरत है ? जब देखा कि यह विरोध का तर्क चलता नहीं है, अच्छा काम है जब शुरू हो, तबसे उसका उदात्त स्वीकार करना चाहिए, फिर कहा गया कि एक हमारी राष्ट्रीय धुन है, वंदेमातरम राष्ट्रीय गीत है- जनगणमन क्यों नहीं ? वंदेमातरम क्यों ? संविधान सभा की कार्यवाही देखी गई. संविधान सभा के अध्यक्ष डॊ. राजेंद्र प्रसाद ने जो विरोध किया था, उसका उल्लेख किया गया. दोनों में से कौन पहला है, कौन बाद में है, इस तरह का सवाल नहीं है. यह राष्ट्रीय धुन है, यह राष्ट्र गीत है. वह भी विवाद हुआ था कि आरंभ किससे करें- अंत किससे करें- और एक दल के सदस्यों ने तो कहा कि यह गीत गाया जाए, इससे हम सहमत नहीं हैं. यह वही दल है, जिसने पहले विरोध किया था, पराधीनता के काल में- मनोवृत्ति बदली नहीं है. कांग्रेस के प्रथम अधिवेशन में वंदेमातरम गाया, तो उसका विरोध हुआ, मुस्लिम लीग के सदस्य नहीं, कांग्रेस का काम करने वाले मुस्लिम सदस्य विरोध करके चले गए. फिर गीत गाना रोक दिया गया- गीत गाना कम कर दिया गया. तुष्टिकरण की यह कहानी बहुत पुरानी है. इस तरह की बात को स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए. अगर कोई कहता है कि भारत को मां के रूप में वंदना करना मूर्तिपूजा है और हम मूर्तियों में विश्वास नहीं रखते, तो वह अपने विश्वास को अपने पास रख सकता है. उसके विश्वास को कोई ठेस नहीं पहुंचती. आखिर यह भारत मां है. हम मां के रूप में इसकी वंदना करते हैं. हम उसकी संतान हैं. हमने उसकी गोद में जन्म लिया है. हम इसके आंचल की छाया में बढ़ रहे हैं. और यह संस्कार कोई आज का संस्कार नहीं है. यह परकीय राज्य के विरोध में पैदा हुई भावना नहीं है.  

वाल्मीकि ने जब रामायण लिखी और उसमें लंका विजय वर्णन के बाद उन्होंने एक प्रसंग का उल्लेख किया. प्रभु रामचंद्र ने, वन में निवास करने वाले लोगों को इकट्ठा करके रावण पर विजय पाई. सोने की लंका पर अधिकार कर लिया. लेकिन उन्होंने लंका को अपने राज्य में नहीं मिलाया. लंका का शासन विभीषण को दे दिया. हमारे बहुत से राजनेताओं को यह पता नहीं है कि विभीषण कौन था ? मैं नाम नहीं ले रहा हूं, मैं इशारा कर रहा हूं, आप समझ जाएंगे- श्री वी.पी. सिंह का जब कांग्रेस से झगड़ा हो गया और वह कांग्रेस से निकल आए- तो उस समय कांग्रेस के जो सर्वेसर्वा थे- वह एक दिन अपने मित्रों के साथ बैठे हुए थे- और मित्रों में से किसी ने कहा कि वी. पी. सिंह तो विभीषण बन गए. तो उस नेता ने पूछा कि यह विभीषण कौन है ? उन्हें पता नहीं था. मैं उन्हें दोष नहीं देता. लेकिन भगवान राम ने विभीषण को राज्य सौंप दिया. और वापस अयोध्या चलने की तैयारी करने लगे, तो वानरों ने कहा, प्रभु सोने की लंका छोड़कर कहां जा रहे हो. चौदह साल भटकते हो गए. आपके साथ जंगलों की ख़ाक छानी, और बलशाली रावण से लड़े, अब तो अपना राज है, अब अयोध्या एक तो बहुत दूर है फिर वहां क्या परिस्थिति होगी, पता नहीं, स्वागत होगा कि नहीं होगा ? चौदह वर्ष का काल बड़ा लंबा काल होता है. और लंका सुनिश्चित है, अयोध्या की स्थिति अनिश्चित है. क्यों जाएं वहां ? यहीं बस जाते, उचित है, पर ऐसा था नहीं. अब प्रभु रामचंद्र ने लक्ष्मण से कहा- अपी स्वर्णमयी लंका, नमे लक्ष्मण रोचते जननी जन्मभूमी़श्च स्वर्गादपि गरियसी. सोने की लंका मेरे मन को नहीं भायी. यह मुझे पसंद नहीं है. जननी जन्मभूमि- स्वर्ग से भी मुझे प्रिय है. पृथ्वी को माता के रूप में देखना अर्थवेद का वचन है. पृथ्वी हमारी माता है. हम उसके पुत्र हैं. और अगर वंदेमातरम के रूप में हम उसी मां का वंदन करते हैं- वंदेमातरम- उसमें मूर्ति पूजा कहां से आती है ? इस्लाम भी अपने ढंग से आदर व्यक्त करता है. जो हज के लिए जाते हैं, वहां जो पवित्र पत्थर है, उसे चूमते हैं, माथा टेकते हैं. नमाज़ पढ़ने के लिए भी धरती चाहिए. नमाज़ धरती पर ही पढ़ी जा सकती है. आसमान में नहीं, धरती पर माथा रखकर- मुझे ऐसे बहुत मुस्लिम लोग मिले हैं, जो इतनी बार नमाज़ पढ़ते हैं कि माथे पर निशान बन गया. हम उनकी भावना को समझते हैं. उन्हें हमारी भावना समझनी चाहिए. यह मूर्ति पूजा नहीं है. आखिर मजारों पर चादर चढ़ाई जाती है, क्या वह एक ढंग की पूजा नहीं होती. आदर का प्रकटीकरण नहीं है ? मुस्लिम देशों में और तरह की रीतियां प्रचलित हैं. हम उसकी आलोचना नहीं करते, हम सर्व-धर्म-समभाव में विश्वास करते हैं. कोई अगर अपने मार्ग से ईश्वर तक पहुंचना चाहता है, तो उसका स्वागत है. यह बात अलग है कि मार्ग के बारे में प्रामाणिकता चाहिए, उत्सर्ग चाहिए. लोगों का हृदय जीतने का प्रयास चाहिए. बल प्रयोग से नहीं, जोर जबरदस्ती से नहीं. लेकिन वंदेमातरम में मूर्ति पूजा है, इसलिए हम उसका गायन नहीं कर सकते, यह हास्यास्पद है. इस तर्क को स्वीकार नहीं किया जा सकता. उस समय स्वीकार किया गया, वह गलती की गई थी. अब हम उस गलती का परिमार्जन कर रहे हैं. लेकिन आपको सुनकर ताज्जुब होगा, मुस्लिम लीग ने अंतत: लोकसभा में अपने विरोध को वापस ले लिया. बाद में सबने स्वीकार किया. मैं और दलों की चर्चा नहीं करता, वह निर्णय कर रहे थे- उधर ही देखकर. वह टालना चाहते थे. यह भी राजनीति का मुद्दा बन गया. दोस्तों कभी-कभी इस स्थिति पर बड़ा दुख होता है. देशभक्ति राजनीति का मुद्दा हो जाए, भारत माता के प्रति आदर व्यक्त करना, यह संकुचित स्वार्थ से जुड़ जाए, शायद इस तरह की वृत्ति अपनाने का यह हम दुष्परिणाम भुगत रहे हैं. लेकिन अंत में हुआ, अब वंदेमातरम से संसद के सत्र की समाप्ति होती है. सामूहिक रूप से वंदेमातरम का गान.

आनंदमठ में जिस तरह से उसका उल्लेख है- आनंदमठ संन्यासियों के विद्रोह की कहानी है. प्राय: सभी देशों में और विशेष करके भारत जैसे देश में राजनीतिक परिवर्तन से पहले, एक सांस्कृतिक पुनर्जागरण होता है. राजनीतिक परिवर्तन के पहले समाज की मानसिकता को तैयार करने के लिए साधु, संत, संन्यासी निकल पड़ते हैं. उस समय हथियार उठाकर जो लोग अंग्रेजों से लड़ना चाहते थे, उनके लिए भी रास्ता खुला हुआ था. आनंदमठ की कहानी भी बड़ी रोमांचक कहानी है. मैं आपसे कहूंगा कि आनंदमठ अवसर मिले तो पढ़िए. भारत की सभी भाषाओं में उसका अनुवाद हुआ है. उससे परिस्थिति का थोड़ा सा परिचय मिलता है. आज वंदेमातरम को बड़े प्रभावशाली ढंग से गाया जाता है. एक अल्प गायन भी होता है. सामूहिक गायन भी होता है, मगर हमें सामूहिक गायन को अपने देश में प्रोत्साहन देने की आवश्यकता है- मिलकर गाएं. केवल वंदेमातरम नहीं, वंदेमातरम तो गाना ही चाहिए, बल्कि अन्य गीत भी गाने चाहिए. हम मिलकर गीत गाने में कुछ पीछे हैं. और देशों में जब भीड़ इकट्ठी होती है- लोग गाना शुरू कर देते हैं. वे गीत उनके जीवन से, उनकी धरती से, उनकी प्रकृति से, उनकी संस्कृति से जुड़े होते हैं. लाखों लोग एक साथ गाना शुरू कर देते हैं. हमें भी कुछ गीतों को प्रचलित करना चाहिए, लोकप्रिय बनाना चाहिए. एक कंठ से गीत गूंजे. हमारे राष्ट्रीय संकल्प को प्रकट करें. वंदेमातरम मन:स्पर्शी गीत है- मातृभूमि की वंदना- किस तरह से वह हरी-भरे रहनी चाहिए, किस तरह से यह दुष्टों का दमन करने में समर्थ है, किस तरह से यह भूमि हमारे लिए धर्म है, विद्या है, सब कुछ है- स्वामी विवेकानंद ने इसी बात को अपने भाषण में प्रकट किया था, जब उन्होंने कहा था-थोड़े समय के लिए हम और देवी-देवताओं को भूल जाएं और भारत माता को याद रखें- भारत माता को. इससे बड़ा देवता कोई नहीं है. इससे बड़ा आराध्य कोई नहीं है. और जब भारत माता की चर्चा करते हैं, उसमें धरती आती है, वह हमें धारण करती है. यह धरित्री है. यह वसुंधरा है. कभी हम प्रकृति के साथ ज्यादती करते हैं, तो प्रकोप भी हमें देखने को मिलता है. लेकिन इस पर टिके हुए हैं- वह हमारा पालन पोषण करती है- यह आधार है- इसलिए यह धरती की रक्षा- यह धरती पवित्र है, यह धरती पावन है. सवेरे उठ कर हम धरती पर पांव रखते हैं- पादेन स्पर्शम- क्षमा करना मैंने पैर रख दिया, मां मुझे क्षमा करना. धरती के बारे में ऐसी पवित्र भावना और इसलिए धरती का पूरा संरक्षण, उसे समृद्ध बनाना, हरी-भरी बनाना. धरती के बांटने का सवाल ही पैदा नहीं होता. और होना नहीं चाहिए. वह ऐसी एक मूल है, पता नहीं कब तक वह हमसे अपनी कीमत चुकाने के लिए कहती रहेगी. धरती मां और उस पर निवास करने वाली उसकी संतति, विशाल परिवार, अलग-अलग भाषाओं में अपने को अभिव्यक्त करता हुआ- अलग-अलग रहन-सहन की पद्धति अपनाता हुआ, अलग-अलग प्रकार के मौसमों में जीवन-यापन के तरीके ढूंढता हुआ, हजारों साल से इस देश में, इस मां की संतति के रूप में जो विद्यमान समाज है, उसका भी स्मरण करना है. उसके विकास का उसकी रक्षा का, उसके अच्छे दिनों की कल्पना करते हैं. धरती और धरती पर निवास करने वाला जन्म और जन्म के साथ-साथ रहते-रहते, सहते-सहते, जीवन के मीठे और कड़वे फल साथ-साथ चखते-चखते, प्रकृति से लड़ते-लड़ते, परकीयों का सामना करते-करते, सृष्टि के सारे रहस्यों को भेदने की दिशा में निरंतर अन्वेषण करते-करते, भारत माता की संतति ने एक संस्कृति का निर्माण किया है. और जब हम मां की वंदना करते हैं, इस धरती की वंदना करते हैं, इस धरती पर निवास करने वाली उसकी संतति की वंदना करते हैं, और उस संतति ने जीवन की जो पद्धति विस्तृत की है, हम उसकी रक्षा करने का भी अभिवचन देते हैं, हम उस संस्कृति से लाभान्वित होने की एक तरह की घोषणा करते हैं.

वंदेमातरम मात्र गीत नहीं है. यह तो एक राष्ट्रीय संकल्प की उदघोषणा है. यह पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलेगी. यह राजनीतिक परिवर्तन से परे है. इसे सत्ता के संघर्ष के कारण खंडित नहीं होने देना चाहिए.  यह एक यथार्थ है, एक सपना भी है. अगर आने वाली पीढ़ी को हम उसकी कल्पना का और हमारे सपनों का भारत नहीं दे सके. तो भी हम वंदेमातरम के रूप में एक ऐसा मंत्र दे जाएंगे. वंदेमातरम के रूप में एक ऐसा देश दे जाएंगे, एक ऐसी पद्धति दे जाएंगे, जिसके बल पर खड़े होकर वह सैकड़ों साल के संकल्प को साकार करेंगे. मित्रों, मैं तो आनंदमठ का पाठक हूं. आनंदमठ और उस समय लिखे गए अन्य उपन्यास, संघर्ष के काम में किस तरह से उपन्यास, कविता, गीत एक नये जीवन से भर जाते. लोगों में जूझने की प्रेरणा देते. उस समय अंग्रेज बंगाल को नहीं बांट सके और बाद में उन्होंने भारत को बांट दिया. यह हृदय को चुभने वाला घाव है. आज राष्ट्रीय एकता और अखंडाता के लिए जो समस्या पैदा हो रही है, कहीं ना कहीं उनके मूल में वह देश का दुर्भाग्यपूर्ण विभाजन है. हमारी सुरक्षा अगर संकट में है, तो वंदेमातरम का गीत हमें प्रेरणा देता है. हमारे मन में यह विश्वास पैदा करता है कि अगर विभाजित जर्मनी एक हो सकते हैं, अगर दो कोरिया को मिलाकर एक कोरिया बनाने की फिर से बात हो सकती है, तो आज नहीं तो कल, कल नहीं तो परसों, परसों नहीं तो नरसों, ऐसा वक्त जरूर आने वाला है कि भारत फिर से एक होगा. जो हमसे अलग-अलग चले गए हैं, उनकी भी समझ में आएगा. थोड़ा समय लगेगा.

आज फिर से वे धमकियां दे रहे हैं,  हथियारों से लड़ाई का खाका खींचा जा रहा है, एक दिन भाषण दिया जाता है हथियारों का, दूसरे दिन उसका खंडन कर दिया जाता है. किसी देश की सरकार को इतना झूठ नहीं बोलना चाहिए. बेनजीर तेरे मन में क्या है ? बेनजीर का मतलब है, जिसकी नजीर नहीं, जिसका कोई उदाहरण नहीं हो, जो अनुपम है, जो बेमिसाल है. वे एक बार दिल्ली में मुझसे मिलने आई थीं, तब विरोधी दल के नेता के नाते आई थीं और कहने लगीं- ’हमने सोचा वाजपेयी साहब चलो आपसे भी मिलते चलें, आप भी अपोजिशन में हैं और इस समय मैं भी अपोजिशन में हूं. बातें और भी हुईं, उनका मैं उल्लेख नहीं करता. फिर आडवाणी जी आ गए. फिर उनके बीच सिंधी में क्या बातें हुईं, ये तो मैं नहीं जानता. सचमुच में यह बड़ी दुर्भाग्य की बात है, दुनिया बदल गई, शीतयुद्ध समाप्त हो गया, साम्यवाद बिखर गया, और हम आपस में झगड़ों में उलझे हुए हैं, हथियारों पर ख़र्च कर रहे हैं, इसकी होड़ लगी है.

मुझे आदिवासी क्षेत्र में जाने का मौका मिला- पीने का पानी नहीं है, कुपोषण के कारण बच्चे मर रहे हैं. लेकिन हम अपनी सुरक्षा की उपेक्षा नहीं करेंगे. देश की सीमाओं की रक्षा सर्वोपरि है. लेकिन पड़ोसियों को समझना चाहिए- उन्हें भ्रम पैदा हो गया है कि हिंदुस्तान में लोकतंत्र लड़खड़ा रहा है. प्रधानमंत्री ऐसे हैं, जो निर्णय नहीं कर सकते- अगर हमने हमला किया तो वह थोड़ी देर निर्णय नहीं कर पाएंगे, हमले का विरोध करना या क्या करना है, नरसिंह राव जी के बारे में मेरी ऐसी राय नहीं है. अगर सीमा पर रणभेदी बजेगी, तो सारा देश सारे मतभेद भूलकर, साथ मिलकर, पड़ोसियों को ऐसा पाठ पढ़ाने के लिए तैयार होगा कि वह अगली बार हमला करने लायक न रहे. अभी कुछ लोग गए थे, पाकिस्तान से लौटकर आए हैं, वहां जिस तरह की बातें हो रही हैं, वह चिंता पैदा करने वाली हैं. कोई दु:स्साहसपूर्ण कदम उठाया जा सकता है. वे समझ रहे हैं कि इस देश का मनोबल टूट जाएगा, भारत में से आवाज उठेगी- कश्मीर के लिए कब तक लड़ते रहोगे, कब तक खून बहाते रहोगे- ले-देकर समझौता करो- यह गलतफहमी है- यह होगा नहीं, यह हम होने नहीं देंगे. एक बार देश का बंटवारा हो गया. हम लोग राजनीति में नहीं थे- अब हम हैं- और दृढ़ता के साथ खड़े हैं. और केवल हम नहीं, अब सारे देश ने पाठ पढ़ लिया है, सारे देशवासी इकट्ठे हो जाएंगे, सरकार को प्रेरित करेंगे, सरकार को विवश करेंगे- देश की प्रादेशिक अखंडता के साथ और समझौता नहीं होगा. अब और भूदान नहीं होगा. और यह मानसिकता बनाने में  वंदेमातरम हमारा पथ प्रदर्शक है. हमें अनुप्राणित करने वाला संदेश है, मैं बधाई देता हूं एक बार फिर से महोत्सव समिति को, डॊक्टर साहब को- वह तो हृदय की चिकित्सा करते हैं, अगर कहा जाए तो वंदेमातरम हमारे राष्ट्र के हृदय की धड़कन को व्यक्त करता है. और यह ऐसा हृदय है, जिसके ऒपरेशन की कभी आवश्यकता नहीं है. यह चिंतन हृदय है. और यह धड़कन शाश्वत है. यह धड़कन काल की सीमाओं को पार कर चलेगी. यह भविष्य को रूप देगी. यह गीत हमारी आने वाली पीढ़ियों को भी प्रेरणा देता रहेगा. आपने इस गीत की शताब्दि समारोह का आयोजन किया, ऋषि बंकिमचंद्र को याद किया. मैं आपको बधाई देना चाहता हूं. सचमुच विलेपार्ले के लोग विलक्षण हैं- बहुत अच्छा काम आपने किया है. देश के अन्य भागों में भी इस तरह का अनुष्ठान होना चाहिए- साल भर यह कार्यक्रम चल सकता है. यह हृदय पर संस्कार डालने वाला कार्यक्रम है. और संस्कार सगर सही होते हैं, तो देश थोड़े दिन के लिए भले ही रास्ता भटक जाए, लेकिन अंत में अपना लक्ष्य पाने में जरूर सफल होता है.
-डॉ. सौरभ मालवीय

(पुस्तक- 'राष्ट्रवादी पत्रकारिता के शिखर पुरुष अटल बिहारी वाजपेयी' से)

बलिदान की बेला में पीछे नहीं हटेंगे

   


श्री अटल बिहारी वाजपेयी ने भारत के विदेशमंत्री के रूप में 3 से 4 अक्टूबर, 1977 को आयोजित संयुक्त राष्ट्र संघ के बत्तीसवें अधिवेशन को संबोधित किया. इस अवसर पर उन्होंने कहा- 
अध्यक्ष महोदय, प्रतिनिधिगण
भारतवर्ष में हाल ही में एक ऐतिहासिक और अहिंसात्मक क्रांति हुई. गत मार्च में हुए चुनावों में भारतीय जनता ने मानव की दुर्दम्य आत्मशक्ति का परिचय दिया और एक स्वतंत्र और उन्मुक्त समाज में अपनी आस्था की पुष्टि की. उन्होंने लोकतंत्र को नष्ट करने के तामसी तथा निरंकुश शक्तियों के धूर्ततापूर्ण प्रयत्नों को निर्णायक रूप से पराजित कर दिया. हमारे देश की 60 करोड़ की जनता के लिए मार्च की यह क्रांति स्पष्टतया दूरगामी महत्व रखती है, साथ ही समस्त संसार के स्वतंत्रता-प्रेमी लोगों के लिए यह उतनी ही महत्वपूर्ण है.

हमारी जनता ने निर्भय होकर उन मूलभूत सिद्धांतों, जीवन-मूल्यों तथा आकांक्षाओं को परिपुष्ट किया, जिन पर लगभग 30 वर्ष पहले संयुक्त राष्ट्र संघ की आधारशिला रखी गई थी. भारत के लोगों ने अपनी खोई हुई स्वतंत्रता और मूलभूत मानव-अधिकार पुन: प्राप्त कर लिए. मैं भारतीय जनता की ओर से राष्ट्र संघ के लिए शुभकामनाओं का संदेश लाया हूं. महासभा के इस बत्तीसवें दिन अधिवेशन के अवसर पर मैं संयुक्त राष्ट्र संघ में भारत की दृढ़ आस्था को पुन: व्यक्त करना चाहता हूं. हमारा विश्वास है कि राष्ट्र संघ विश्व में शांति और सुरक्षा बनाए रखने और राष्ट्रों के बीच सहयोग के माध्यम से समानता, न्याय और समता पर आधारित शांतिपूर्ण प्रगति को प्रोत्साहित करने का उपकरण बनेगा.

जनता सरकार को शासन की बागडोर संभाले छह माह भर हुए हैं. फिर भी इतने अल्प समय में हमारी उपलब्धियां उल्लेखनीय हैं. भारत में मूलभूत मानव अधिकार पुन: प्रतिष्ठित हो गए हैं. जिस भय और आतंक के वातावरण ने हमारे लोगों को घेर लिया था, वह अब दूर हो गया है. ऐसे संवैधानिक कदम उठाए जा रहे हैं, जिनसे यह सुनिश्चित हो जाए कि लोकतंत्र और बुनियादी आजादी का अब फिर कभी हनन नहीं होगा. लेकिन हम केवल इन उपलब्धियों से संतुष्ट नहीं है. हमारी संसद में 22 जुलाई, 1977 को विधिवत इस बात की पुष्टि कर दी गई है कि भारत के लोग शांतिमय और वैध तरीकों से देश में एक ऐसी आर्थिक और सामाजिक क्रांति लाने के लिए कृत-संकल्प हैं, जो लोकतांत्रिक भावनाओं से प्रदीप्त हो, समाजवादी आदर्शों से अनुप्राणित हो और नैतिक तथा आध्यात्मिक मूल्यों की आधारशिला पर सुदृढ़ रूप से स्थित हो.
 
अध्यक्ष महोदय, मैं भले ही संयुक्त राष्ट्र संघ में नया हूं, मेरा देश नया नहीं है. इस संस्था की स्थापना के समय से ही भारत का इससे निकट संबंध रहा है. इस सम्मान्य सभा को संबोधित करते हुए मुझे गौरव का अनुभव हो रहा है. अपने देश में 20 वर्ष से अधिक राष्ट्रीय संसद का सदस्य होने के नाते, विश्व के देशों की इस सभा में पहली बार भाग लेते हुए, मुझे विशेष उल्लास हो रहा है.

अध्यक्ष महोदय, आपको अध्यक्ष पद पर आसीन देखकर मुझे और भी अधिक प्रसन्नता हो रही है, क्योंकि आप एक ऐसे देश के प्रतिनिधि हैं, जो भारत के साथ गुटनिरपेक्ष आंदोलन का संस्थापक रहा है, और जिसके साथ हमारे मैत्री-संबंध हैं. भारत सरकार की ओर से और अपनी ओर से भी मैं संयुक्त राष्ट्र महासभा के बत्तीसवें अधिवेशन के सर्वानुमति से अध्यक्ष चुने जाने पर आपका हार्दिक अभिनंदन करता हूं. आपका चुनाव न केवल आपके विस्तृत राजनयिक अनुभवों और निजी विशिष्टताओं के प्रति आदर का द्योतक है, बल्कि आपके देश यूगोस्लाविया तथा उसके द्वारा शांति और स्थायित्व की शक्तियों को जो बल प्रदान किया जा रहा है, उसके प्रति भी सम्मान का सूचक है. मैं आश्वासन देना चाहता हूं कि आपको अपने पद का दायित्व निभाने में हमारा पूरा सहयोग मिलेगा.

पदमुक्त अध्यक्ष महामान्य शर्ली अमरसिघे का भी हार्दिक अभिनंदन करते हुए मुझे विशेष प्रसन्नता हो रही है. वे हमारे निकट पड़ोसी देश श्रीलंका के विशिष्ट प्रतिनिधि हैं और उन्होंने संयुक्त राष्ट्र संघ के इकत्तीसवें अधिवेशन का बड़ी कुशलता और योग्यता के साथ संचालन किया है.

अन्य प्रतिनिधि मंडलों के साथ मैं भी संयुक्त राष्ट्र संघ के महासचिव डॊक्टर कुर्ट वाल्डहाइम को हार्दिक बधाई देना चाहूंगा. वे अपनी बुद्धिमता, धैर्य और संयुक्त राष्ट्र संघ के प्रति अपनी गहरी प्रतिबद्धता के साथ अपने जटिल दायित्व को निभा रहे हैं और अंतर्राष्ट्रीय सदभाव और विश्व-कल्याण को बढ़ाने में योगदान दे रहे हैं. 

महासचिव ने बहुत विचारप्रेरक रिपोर्ट महासभा के सम्मुख प्रस्तुत की है. मैं उसके लिए उन्हें विशेष रूप से बधाई देना चाहूंगा. इस रिपोर्ट में उन्होंने साफ-साफ शब्दों में हमारा ध्यान भविष्य में आने वाली चुनौतियों की ओर आकर्षित किया है. उन्होंने कहा है कि संयुक्त  राष्ट्र संघ में अतुलनीय संभावनाएं हैं, लेकिन किसी हद तक यह भी अपने अभिन्न व्यक्तित्व और सही भूमिका की खोज में है.

जनता सरकार शांति, गुटनिरपेक्षता और सब देशों के साथ मैत्री की नीति का दृढ़ता से अनुसरण कर रही है. गुटनिरपेक्षता अंतर्राष्ट्रीय संबंधों में राष्ट्रीय संप्रभुता का विस्तार है. इसका मूल तत्व तटस्थता न होकर स्वाधीनता है, जो उपनिवेशवाद के विरुद्ध हमारे राष्ट्रीय संघर्ष और दासता तथा दमन से मानव-चेतना की मुक्ति का सहज परिणाम है. हम राष्ट्रों की सच्ची स्वतंत्रता में विश्वास रखते हैं. हमारी मान्यता है कि हर देश को अपने सर्वोत्तम हितों के अनुकूल नीति अनुसरण करने की तथा प्रत्येक समस्या पर गुणों के आधार पर विचार करने और निर्णय लेने की स्वतंत्रता होनी चाहिए.

नई सरकार ने शासन संभालते ही न केवल गुटनिरपेक्षता के मार्ग पर चलते रहने की, अपितु उसके मौलिक तथा सकारात्मक रूप को पुन: प्रतिष्ठित करने की घोषणा की. यह संतोष का विषय है कि वास्तविक गुटनिरपेक्षता पर हमारे द्वारा दिए गए जोर और इस नीति को उत्साह और गतिशीलता से आगे बढ़ाने के हमारे निर्णय को सही मानो में देखा और समझा गया है.

अध्यक्ष महोदय,’वसुधैव कुटुम्बकम’ की परिकल्पना बहुत पुरानी है. भारतवर्ष में सदा से हमारा इस धारणा में विश्वास रहा है कि संसार एक परिवार है. अनेकानेक प्रयत्नों और प्रयोगों के बाद संयुक्त राष्ट्र संघ के  रूप में इस स्वप्न के अब साकार होने की संभावना है, क्योंकि संयुक्त राष्ट्र संघ की सदस्यता लगभग विश्वव्यापी हो गई है और वह 400 करोड़ लोगों का, जो विभिन्न जातियों, रंगों और समुदायों के हैं, प्रतिनिधित्व करता है. फिर भी यह आवश्यक है कि संयुक्त राष्ट्र संघ केवल सरकारी प्रतिनिधि मंडलों का मिलनमंच मात्र न रहे. हमें इस लक्ष्य को ध्यान में रखना चाहिए कि किस प्रकार राष्ट्रों की यह महासभा मानवता के सामूहिक विवेक और इच्छा शक्ति का प्रतिनिधित्व करने वाली मानव की संसद का रूप ले चुकी है. 

संयुक्त राष्ट्र संघ का घोषणा-पत्र केवल राष्ट्रों की ओर से या राष्ट्रों के लिए किया गया आह्वान मात्र नहीं है. यह तो संसार के समस्त लोगों द्वारा किया गया सदघोष है कि अपनी भावी पीढ़ी को युद्ध की विभीषिका से बचाया जाए और सच्ची स्वतंत्रता के वातावरण में एक नई विश्व-व्यवस्था की रचना की जाए.

यहां मैं राष्ट्रों की सत्ता और महत्ता के बारे में नहीं सोच रहा. आम आदमी की प्रतिष्ठा और प्रगति मेरे लिए अधिक महत्व रखती है. अंतत: हमारी सफलताएं और असफलताएं केवल एक ही मापदंड से नापी जानी चाहिए कि क्या हम पूरे मानव समाज, वस्तुत: हर नर, नारी और बालक के लिए न्याय और गरिमा की आश्वस्ति देने में यत्नशील हैं. संयुक्त राष्ट्र की सफलता के लिए यह आवश्यक है कि वह समस्त मानवता का सबल स्वर बन सके और देशों के बीच एक-दूसरे पर अवलंबित सामूहिक कृति तथा सहयोग का गतिशील माध्यम बन सके.

स्वयं अपने इतिहास और राजनीतिक अनुभव से हमने सीखा है कि वास्तविक सत्ता सरकारों में नहीं, जनता में निहित है, और जो उनकी इच्छा और समर्थन पर आश्रित है. आज से 30 वर्ष पहले महात्मा गांधी के नेतृत्व में जनता ने हथियार उठाए बिना बड़ी हिम्मत से एक शक्तिशाली साम्राज्य का सामना किया और उससे देश को मुक्ति दिलाई. इस वर्ष के प्रारंभ में हमारी जनता ने एक स्वार्थांध सत्ता के उन सब प्रयत्नों पर सफलतापूर्वक पानी फेर दिया, जिनके द्वारा उनकी मूलभूत स्वतंत्रता को छीना जा रहा था. 

इस घटना से हमारे कई विदेशी मित्र-बंधुओं को आश्चर्य हुआ. परंतु मुझे तो स्पष्ट है कि हमारे लोगों द्वारा प्रदर्शित महान राजनीतिक साहस की प्रेरणा हमारी प्रकृति और परंपरा से मिली है. सदा से ही हमारी धार्मिक और दार्शनिक विचारधारा का केंद्र बिंदु व्यक्ति रहा है. हमारे धर्मग्रंथों और महाकाव्यों में सदैव यह संदेश निहित रहा है कि समस्त ब्राह्मांड और सृष्टि का मूल- व्यक्ति और उसका संपूर्ण विकास है.

हमारी सदा मान्यता रही है कि ईश्वर के अनेक रूप हो सकते हैं. हर भारतवासी को, भले ही वह कहीं जन्मा हो या कोई भी आस्था रखता हो, अपने उद्धार और मुक्ति का मार्ग ढूंढने की स्वतंत्रता रही है. साथ ही हमारे मनीषियों ने वैदिक युग से लेकर अब तक सदा ही हमें अपने साथी मानवों के प्रति करुणा और सहिष्णुता का पाठ पढ़ाया है. गांधी जी ने इस तत्व का सार उनके प्रिय शब्द ’अंत्योदय’ में व्यक्त किया है. ’अंत्योदय’ का अभिप्राय है : निम्नतम और निर्धनतम वर्गों के हितों की रक्षा और कल्याण, जिसके लिए प्रत्येक समाज को संलग्न रहना चाहिए.

मेरा विश्वास है कि हमारी राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में निरंतर सर्वोच्च स्थान मनुष्य, उसके सुख और कल्याण तथा मानव की आधारभूत एकता को मिलना चाहिए. मेरा अभिप्राय किसी आकृतिहीन मानव से नहीं है, जो अतीत काल में निरंकुशता को थोपने का बहाना रहा है, मेरा मतलब जीते-जागते मानव से है. उसकी संवेदनाएं और अपेक्षाएं, उसका सुख और दुख हमारे प्रयत्नों का केंद्र बिंदु होना चाहिए.

अध्यक्ष महोदय, हम विश्व शांति के, ऐसी शांति के, जो जीवंत है, प्रबल समर्थक हैं. विश्व शांति हमारे सारे प्रयत्नों की आधारशिला है. शांति की परिभाषा केवल युद्ध न होना मात्र नहीं है. विश्व शांति का ताना-बाना किसी समय भी छिन्न-भिन्न हो सकता है. उसका संरक्षण तो केवल उन सामूहिक प्रयत्नों से हो सकता है, जो राष्ट्रों के बीच विद्यमान भारी असमानता और असंतुलन को दूर कर सकें, एक राष्ट्र पर दूसरे राष्ट्र के प्रभुत्व और शोषण का अंत कर सकें और संसार के समस्त लोगों को बराबरी के आधार पर अवसर और अधिकार प्रदान कर सकें.

नि:संदेह हर देश अपने राष्ट्रीय हितों का संरक्षण और संवर्धन करना चाहता है. पर कोई देश सबसे अलग-थलग होकर चहारदीवारी के भीतर नहीं रह सकता.  हमें यह समझना होगा कि विश्व के देशों में पारस्परिक निर्भरता के अतिरिक्त कोई और चारा नहीं है. इसी में विश्व मानव कल्याण है. इसके लिए यह आवश्यक है कि हम सब अपने-अपने राष्ट्रीय क्षितिजों के पार दृष्टि दौड़ाएं. पारस्परिक सहकारिता और त्याग की प्रवृत्ति को बल देकर ही मानव-प्रगति और समृद्धि का पूरा-पूरा लाभ उठा सकता है.

जब भारत ने उपनिवेशवाद और साम्राज्यवाद के विरुद्ध स्वातंत्र्य संग्राम छेड़ा था, तब से विश्व एक लंबा रास्ता तय कर चुका है. एक एशियाई देश के नाते हमने वियतनाम के बहादुर लोगों द्वारा स्वतंत्रता संग्राम के दौरान झेले गए अपार कष्टों और अनगिनत बलिदानों को बड़ी संवेदना के साथ देखा. उनकी अंतत: सफलता मानव की आत्मशक्ति की ज्वलंत परिचायक तथा दासता के विरुद्ध उसके अदम्य प्रतिरोध के प्रति श्रद्धांजलि है.

हमें प्रसन्नता है कि संयुक्त राष्ट्र संघ ने वियतनाम के पुनर्निमाण और वहां के लोगों के पुनर्वासन के लिए अंतर्राष्ट्रीय पैमाने पर सहायता देने की योजना बनाई है. भारत वियतनाम को अपनी ओर से यथासंभव और भरसक सहायता देने के लिए तत्पर है.

भारत, वियतनाम समाजवादी गणराज्य के संयुक्त राष्ट्र संघ में प्रवेश का सहर्ष स्वागत करता है. नये अफ्रीकी राज्य जिबूटी का भी हम हार्दिक अभिनंदन करते हैं. इन दोनों देशों की सदस्यता से संयुक्त राष्ट्र संघ और भी विश्वव्यापी हो गया है. इन दोनों देशों के साथ भारत के मधुर मैत्री संबंध हैं और हम आशा करते हैं कि भविष्य में हमारे पारस्परिक सहयोग में वृद्धि होगी. 

इस अवसर पर मैं साइप्रस के दिवंगत राष्ट्रपति आर्चबिशप मकारियोस के प्रति श्रद्धांजलि अर्पित करना चाहता हूं. स्वर्गीय आर्चशिप एक विश्वनेता थे और वे गुटनिरपेक्ष आंदोलन के संस्थापकों में से एक थे. उन्होंने साइप्रस की आजादी का सृजन तो किया ही, साथ ही उसके अस्तित्व के संरक्षण का मार्ग भी प्रशस्त किया.

अध्यक्ष महोदय, महासभा के समक्ष जो कार्यसूची है, उसमें संसार की कई महत्वपूर्ण संस्थाएं सम्मिलित हैं. मैं इनमें से कुछ ऐसे विशिष्ट प्रश्नों का उल्लेख करना चाहूंगा, जिनका तात्कालिक महत्व है, और जिनको हमारे इस सामूहिक विचार-विनिमय में प्राथमिकता दी जानी चाहिए. 

हमारे सामने सबसे बड़ी समस्या दक्षिणी अफ्रीका में मानव अधिकारों और स्वतंत्रता के लिए हो रहे महान संघर्ष की है. भारत ने सदैव ही राष्ट्रीय तथा अंतर्राष्ट्रीय मामलों में अनावश्यक रक्तपात और हिंसा का विरोध किया है. हम अहिंसा में आस्था रखते हैं और चाहते हैं कि विश्व के संघर्षों का समाधान शांति और समझौते के मार्ग से हो. पराधीनता के अंधकारपूर्ण काल में भी भारत कतिपय आधारभूत सिद्धांतों पर दृढ़ था. ये सिद्धांत थे औपनिवेशिक दमन का तीव्र विरोध और रंगभेद के  प्रत्येक हनन की पूर्ण अस्वीकृति. इन सिद्धांतों के प्रति स्वतंत्र भारत की श्रद्धा आज भी अधिक गहरी हो गई है.

अफ्रीका में चुनौती स्पष्ट है. प्रश्न यह है कि किसी जनता को स्वतंत्रता और प्रतिष्ठा से रहने के अपहरणीय अधिकार हैं या रंगभेद में विश्वास रखने वाला अल्पमत किसी विशाल बहुमत पर हमेशा अन्याय और दमन करता रहे. नि:संदेह रंगभेद के सभी रूपों का जड़ से उन्मूलन होना चाहिए. रंगभेद निश्चित रूप से समाप्त होना चाहिए. इसका अस्तित्व मानवता पर कलंक और संयुक्त राष्ट्र संघ पर एक गहरा आक्षेप है.

भारत चाहता है कि जिम्बाब्वे की समस्या का शांतिपूर्ण ढंग से अतिशीघ्र समाधान हो. भारत ने इसी संदर्भ में आंग्ल-अमेरिकी प्रस्तावों के उन विधायक अंशों का स्वागत किया है, जो एक विशिष्ट समयावधि में वास्तविक बहुमत शासन की स्थापना की ओर इंगित करते हैं. आशा है कि इस विषय पर हाल ही में सुरक्षा परिषद में स्वीकृत प्रस्ताव से युद्ध-विराम होगा और अंततोगत्वा समस्या का समाधान निकलेगा. यह अधिकांश इस बात पर निर्भर है कि रियान-ह्यूझान का अवैधानिक शासन अपना दुराग्रह और अकड़ त्यागने और विवेकशील दृष्टिकोण अपनाने को तैयार है या नहीं ?

जब तक स्मिथ सरकार हटा नहीं दी जाती और जब तक लंबे समय से त्रस्त जनता को स्वाधीनता की पुन: प्राप्ति नहीं हो जाती, हम यह कैसे आशा कर सकते हैं कि स्वतंत्रता के सेनानी अपने हथियार रख देंगे. भारत जिम्बाब्वे में अपनी स्वतंत्रता के लिए संघर्षरत देशभक्त शक्तियों के प्रति अपने ठोस समर्थन की पुन: पुष्टि करता है, जो भारी बने रहने के निष्फल प्रयास में रियान-ह्यूझान विश्व जनमत की जानबूझकर अवहेलना करता रहता है, तो संयुक्त राष्ट्र संघ को अपने समस्त अधिकारों का प्रयोग कर अवैधानिक और अल्पमतीय सत्ता और उसके समर्थक दक्षिण अफ्रीका के विरुद्ध अनिवार्य प्रतिबंधों को अधिक व्यापक करना पड़ेगा. इसी से अवैधानिक शासन का अंत निकट आएगा और जिम्बाब्वे के लोगों को अपने भाग्य का स्वयं फैसला करने का अपहरणीय अधिकार प्राप्त होगा.

नामीबिया में भी, जिसे अंतर्राष्ट्रीय राज्य क्षेत्र का दर्जा मिला हुआ है,  संयुक्त राष्ट्र संघ की सत्ता, विश्वसनीयता और प्रतिष्ठा को समान तथा चुनौती का सामना करना पड़ रहा है. 

अभी यह देखना बाकी है कि पाश्चात्य देशों के प्रयत्न दक्षिण अफ्रीकी सरकार को कहां तक नामीबिया छोड़ने के लिए तैयार करते हैं, जिससे कि संयुक्त राष्ट्र संघ के प्रस्ताव कार्यान्वित हो सकें. वालविस बे को, जो नामीबिया का एक भाग है, अपने राज्य क्षेत्र में स्थित केप प्रांत में शामिल करने के दक्षिण अफ्रीका के निर्णय की हम निंदा करते हैं. इसी तरह नामीबिया के एक क्षेत्र का अणु परीक्षण के लिए कथित उपयोग करने की योजना की भी हम भर्त्सना करते हैं.

हम पूर्ण रूप से स्वापो (दक्षिण-पश्चिमी अफ्रीका जन संस्था) के साथ हैं और सभी देशों को उसके प्रातिनिधिक स्वरूप को स्वीकार करने की अपील करते हैं. हम नामीबिया की जनता से अपेक्षा नहीं कर सकते कि वह अपना सशक्त संघर्ष छोड़ दे. यदि आजादी हासिल करने का एक यही उपाय रह जाता है. किंतु हम समस्या का समाधान केवल स्वापों के प्रयत्नों  और संघर्ष पर ही नहीं छोड़ सकते. इस कार्य में संयुक्त राष्ट्र संघ ने दक्षिण अफ्रीकी प्रशासन को नामीबिया से पूर्ण रूप से हट जाने के लिए बाध्य करने की अपनी समर्थता का निश्चय ही अभी तक पूरा उपयोग नहीं किया है.

जबकि दक्षिण अफ्रीका में हम उपनिवेशवाद और रंगभेद के निकृष्टम रूप का सामना कर रहे हैं, पश्चिम एशिया में विश्व शांति को और भी अधिक विस्फोटक खतरा है. यहां भी कुछ मूलभूत सिद्धांतों का प्रश्न है. सर्वप्रथम किसी को भी आक्रमण के फलों का उपयोग करने की छूट नहीं दी जा सकती. दूसरे किसी भी जनमसूह को अपने ही देश में रहने के अपहरणीय अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता. तीसरे, सीमा संबंधी सभी विवाद शक्ति प्रयोग से नहीं, बल्कि बातचीत के जरिये सुलझाए जाने चाहिए.

इस दृष्टि से देखा जाए तो स्पष्ट है कि इजराइल ने बल प्रयोग द्वारा जिन क्षेत्रों पर अवैध रूप से कब्जा किया है, उसे मान्यता नहीं दी जा सकती. आक्रमण समाप्त होना ही चाहिए. यह भी आवश्यक है कि फिलिस्तीन के अरब लोगों को, जिन्हें बलपूर्वक अपने घरों से उजाड़ दिया गया है, पुन: अपने देश में लौटने के अपहरणीय अधिकार का उपयोग करने दिया जाए. इस क्षेत्र के सभी लोगों और राज्यों को अपने पड़ोसियों के साथ शांति और मेल-मिलाप से रहने का अधिकार है. इस भूखंड की समस्याओं के स्थायी समाधान के लिए यह एक आवश्यक शर्त है. हाल में इजराइल ने वैस्ट बैंक और गाजा में नई बस्तियां बसाकर अधिकृत क्षेत्रों में जनसंख्या परिवर्तन करने का जो प्रयत्न किया है, संयुक्त राष्ट्र संघ को उसे पूरी तरह अस्वीकार और रद्द कर देना चाहिए.

यदि इन समस्याओं का संतोषजनक और शीघ्र ही समाधान नहीं होता, तो इसके दुष्परिणाम इस क्षेत्र के बाहर भी फैल सकते हैं. यह अति आवश्यक है कि जेनेवा सम्मेलन का शीघ्र ही पुन: आयोजन किया जाए और उसमें पी.एल.ओ. को प्रतिनिधित्व दिया जाए.

साइप्रस की स्थिति का भी समाधान बाकी है. हमें अब भी आशा है कि द्विपक्षीय सामुदायिक वार्ताएं पुन: प्रारंभ होंगी और समस्या का ऐसा हल निकलेगा जो साइप्रस गणराज्य की क्षेत्रीय अखंडता, सार्वभौमिकता और गुटनिरपेक्षता के अनुरूप होगा.

अंतर्राष्ट्रीय संबंधों में आर्थिक समस्याओं का महत्व अधिकाधिक बढ़ता जा रहा है. समानता और न्याय पर आधारित एक नई अंतर्राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था की परिकल्पना को विश्व समाज में मान्यता मिल गई है. अब इसे मूर्त रूप देने की दिशा में शीघ्र आगे बढ़ना है, जिससे विश्व के सभी नर-नारियों को अधिक न्यायसंगत और समुचित अवसर तथा अपने श्रम के लिए लाभ प्राप्त हो.

अध्यक्ष महोदय, मैं पहले इस बात का उल्लेख कर चुका हूं कि अंतर्राष्ट्रीय सहयोग और राष्ट्रीय दायित्वों के बीच संतुलन स्थापित करने में अनेक अंतर्विरोध और चुनौतियां हैं. संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना के  30 वर्ष बाद आज हमें, पहले से कहीं अधिक स्पष्ट हो गया है कि दरिद्रता के सागर में कोई एक राष्ट्र या राष्ट्र समूह समृद्धि का द्वीप बनकर नहीं रह सकता. 

दो दशकों से भी अधिक  समय से अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक संबंधों पर विचार-विनिमय हो रहा है. परंतु विकास दशक के लिए जो स्वरूप लक्ष्य निश्चित किए गए थे, उनकी या तो अवहेलना कर दी गई है या उन्हें पीछे धकेल दिया गया है. बढ़ी हुई विषमताओं को कम करने के लिए विकसित देशों से संसाधनों और तकनीकी ज्ञान का पर्याप्त स्थानांतरण नहीं हुआ. 

इस वर्ष पेरिस में हुए अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक सहयोग सम्मेलन में इन सभी समस्याओं पर विस्तृत रूप से विचार-विमर्श हुआ था. यद्यपि इन 18 महीनों के प्रदीर्घ विचार-विनिमय के फलस्वरूप कुछ प्रगति हुई, किंतु पेरिस सम्मेलन का परिणाम, कुल मिलाकर अत्यंत निराशाजनक रहा है.

एक विशेष कोष कायम किया जाएगा और ओ.डी.ए. (अधिकृत विकास सहायता) के लिए दिए गए कुल आश्वासनों की भी पुष्टि कर दी गई है. लेकिन संसाधनों और तकनीक के स्थानांतरण तथा कर्ज के बोझ से बचने की गंभीर समस्याओं का हल निकलना अभी बाकी है. यद्यपि वस्तुओं के एकीकृत कार्यक्रम के अंतर्गत सामान्य कोष पर सिद्धांतत: सहमति हो गई है, किंतु इसे व्यवहार में मूर्त रूप देना अभी शेष है.

ऐसे तर्क और विचार प्रस्तुत किए जा रहे हैं, जो विकासशील देशों के सम्मुख खड़े गंभीर संकट का पर्याप्त मूल्यांकन नहीं करते. संभवत: इसका कारण यह है कि विकसित देश अपनी स्वयं की समस्याओं और कठिनाइयों में उलझे हुए हैं. कई स्थितियों में तो जो एक हाथ से दिया जा रहा है, उसे दूसरे हाथ से वापस लिया जा रहा है.

प्राय: यह दावा किया जाता है कि आधुनिक विज्ञान और तकनीकी प्रगति निर्धनता को दूर करने और उन्नति के लाभों को समस्त संसार में उपलब्ध करने की क्षमता रखती है, किंतु सत्य तो यह है कि विकासशील देशों को सही ढंग की तकनीक न मिलने के कारण धनी और निर्धन देशों के बीच की खाई बढ़ती जा रही है.

निस्संदेह युद्धोपरांत की शताब्दियों में अंतर्राष्ट्रीय वाणिज्य का कई गुना विस्तार हुआ है, परंतु उसका लाभ अधिकांशत:  विकसित देशों को मिला है और उन्हीं देशों के लोगों के आर्थिक विकास तथा जीवन स्तर को ऊंचा उठाने में सहायक हुआ है.

विकासशील  देशों के लिए विभिन्न व्यापार संबंधी प्रतिबंधों को शिथिल करने तथा निर्यातों के लाभकारी मूल्यों को सुरक्षित रखने की समस्याएं आज भी उसी स्थिति में हैं, वो ऊर्जा के संकट के तुरंत बाद थीं. तेल आयातक देशों की आर्थिक समस्या इतनी गंभीर हो गई है कि कर्ज के बोझ को निरंतर बढ़ाने के अतिरिक्त उनके सम्मुख कोई अन्य उपचार नहीं दिखाई देता.

इसमें संदेह नहीं कि विकसित देशों की अपनी आंतरिक, सामाजिक और आर्थिक समस्याएं हैं, लेकिन उन्हें अपने दृष्टिकोणों और नीतियों को तात्कालिक तथा संकीर्ण राष्ट्रीय हितों से ऊपर उठाना आवश्यक है. यह पूछा जा सकता है कि क्या विकसित देशों के आर्थिक ढांचे की समस्याओं के समाधान का युक्तिसंगत और प्रबुद्ध रास्ता यह नहीं है कि इन देशों से विकासशील  देशों में विशिष्ट मात्रा में वित्तीय और प्रौद्योगिक क्षमता का स्थानांतरण किया जाए ? समृद्ध देशों की बेरोजगारी और आर्थिक उथल-पुथल का समुचित समाधान संसार के तीन अरब लोगों की क्रयशक्ति में वृद्धि होने पर ही हो सकता है.

भारत ने इस बारे में अंतर्राष्ट्रीय विचार-विमर्शों में उत्साह और ईमानदारी से भाग लिया है. हमारी मान्यता रही है कि संसार के आर्थिक रोगों का निवारण संघर्ष की भावना को बल देने से नहीं, बल्कि अंतर्राष्ट्रीय पारस्परिक निर्भरता और सहयोग की नई भावना को जागृत करने से होगा. 

अध्यक्ष महोदय, इस संबंध में मैं आपके सम्मुख महात्मा गांधी के दृष्टिकोण को प्रस्तुत करना चाहता हूं, जिसका उन्होंने कई दशकों पहले सुझाव दिया था. जैसा आप जानते हैं, वे सचमुच में एक विश्व-मानव थे. दो दिन पूर्व ही उनका 108वां जन्मोत्सव मनाया गया था. उन्हें कुछ विशिष्ट सिद्धांतों पर आधारित विश्व अर्थव्यवस्था के संबंध में स्पष्ट बोध था. संक्षिप्त रूप से, उनके विचार भी मेरी राय में इस प्रकार थे-
-सब लोगों को अपनी बुनियादी आवश्यकताओं की पूर्ति का अधिकार है, भले ही उनकी अर्थव्यवस्था का रूप, उत्पादकता का स्तर तथा भौगोलिक स्थिति कुछ भी हो.
-राष्ट्रों के बीच पारस्परिक निर्भरता शोषण-रहित होनी चाहिए. असमान लोगों के बीच वास्तविक पारस्परिक निर्भरता नहीं हो सकती, अंत: असमानता को दूर करने के लिए कार्रवाई होनी चाहिए.
-विकासशील देशों को स्वावलंबन और सामूहिक निर्भरता की नीति का पालन करना चाहिए. यह एक ऐसी व्यापक रणनीति का अंश होना चाहिए, जिसका उद्देश्य विकसित देशों से संसाधनों और तकनीक का स्थानांतरण कराना होगा. 
-संसार के लोग, भले ही पृथक राष्ट्रों में बंटे हों, एक ही परिवार हैं. एक सुसंबद्ध विश्व अर्थव्यवस्था की मांग है कि सीमाओं से परे न केवल वस्तुओं, पूंजी के साधनों और तकनीक का आदान-प्रदान हो, बल्कि आदमियों का भी आवागमन होता रहे.
-आर्थिक व्यूह रचना का लक्ष्य मात्र जी.ए.पी. बढ़ाना न होकर, रोज़गार में वृद्धि करना हो.
-उपभोग में असंयम के विरुद्ध एक विश्वव्यापी आंदोलन की आवश्यकता है, क्योंकि ऐसा असंयम मनुष्य को गिराता है और उसे शेष समाज से दूर ले जाता है.
-न केवल विकसित, बल्कि विकासशील देशों को भी अपने देश की आम जनता और आभिजात्य वर्ग के बीच की खाई को भरना चाहिए. न्यायसंगत  विश्व अर्थव्यवस्था का आधार हर देश में एक न्यायोचित अर्थव्यवस्था की रचना हो सकता है.

अध्यक्ष महोदय, संसार में जनसंख्या की दृष्टि से दूसरे नंबर का देश होने के नाते भारत की समस्याएं भी बहुत जटिल हैं. हमारी प्रगति उल्लेखनीय है, लेकिन हमारे सम्मुख कई चुनौतियां विद्यमान हैं. एक ऐसे देश के नाते जिसने लोकतंत्र में अपनी आस्था पुन: व्यक्त की है और जो सहमति के अधार पर शासन चलाना चाहता है, हमारा काम और भी अधिक क्लिष्ट हो गया है.

हमें गत कुछ  दशकों तथा सदियों से जो अनेकानेक समस्याएं विरासत में मिली हैं, उन्हें हल करने के लिए हमारे पास न तो कोई जादू की छड़ी है और न कोई तुरत-फुरत समाधान. लेकिन हमें आशा और विश्वास है कि हम सफल होंगे. स्वतंत्रता के विगत 30 वर्षों में हमारे लोगों ने अपनी परंपरागत प्रतिभा के बल पर विज्ञान और तकनीक द्वारा प्रस्तुत नये अवसरों के महत्व को समझा है और राष्ट्र की उन्नति के लिए प्रगति के इन नवीन उपकरणों का प्रयोग करने की क्षमता दिखाई है.

अंतर्राष्ट्रीय सहयोग की उपयोगिता को समझते हुए भी, हमारा प्रयास यही रहा है कि अपनी राष्ट्रीय प्रगति और आर्थिक स्वावलंबन के लिए हम अपने ही प्रयत्नों पर निर्भर रहें. हमारी नई सरकार नई प्राथमिकताओं के निश्चित करने और नियोजन तथा नीतियों में जो विकृतियां आ गई थीं, उन्हें दूर करने के लिए तत्पर है. आर्थिक क्षेत्र में अपने विकास के लिए हम औद्योगिक देशों की आंख मूंदकर नकल नहीं करना चाहते. हम ऐसे एकात्मक नियोजन की ओर बढ़ना चाहते हैं, जिसका केंद्रबिंदु मानव हो. हम अपना ध्यान ग्रामीण विकास पर अधिक केंद्रित करना चाहते हैं, क्योंकि हमारे देश की बहुसंख्यक जनता गांवों में रहती है और उसका जीवन वहीं बीतेगा. हम आभिजात्य वर्ग के उपभोगवाद पर आधारित बहुलता नहीं चाहते. मनुष्य का मूल्यांकन इस आधार पर नहीं होना चाहिए कि उसके पास क्या है, बल्कि उसकी कसौटी यह है कि वह कैसा है ? हम बेरोजगारों को रोजगार देना चाहते हैं और पिछड़े वर्गों की बुनियादी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए कृतसंकल्प हैं. नगरों की ओर दौड़ने की प्रवृत्ति को उलटने या कम से कम रोकने की हमारी योजना है. विकासशील देशों के लिए यह एक बहुत बड़ी सामाजिक और आर्थिक समस्या बन गई है. कई दशक पहले गांधी जी ने इस बारे में चेतावनी दी थी.  

अधिक सुहाने प्रभात के लिए जूझते हुए भी भारत अपने आर्थिक और तकनीकी अनुभव में अपने बराबर विकासशील देशों को सहभागी बनाने के लिए सदैव तत्पर रहा है. हम अपनी विभिन्न शिक्षा संस्थाओं में अन्य विकासशील देशों के हजारों  छात्रों को प्रशिक्षण दे रहे हैं. हमारा विश्वास है कि यह विविधतापूर्ण प्रशिक्षण उन देशों के सामाजिक और आर्थिक विकास में सहायक होगा. हम विकासशील देशों के बीच परस्पर लाभकारी सहयोग बनाने पर जोर दे रहे हैं और इससे हम केवल अपने लिए किसी प्रकार के राजनीतिक या आर्थिक लाभ की कामना नहीं करते. 

अध्यक्ष महोदय, भारत सब देशों से मैत्री चाहता है और किसी पर प्रभुत्व नहीं चाहता. जनता सरकार सभी देशों के साथ स्नेह, सहयोग और समझदारी के सेतु निर्माण करने के लिए सक्रिय है. सर्वप्रथम हमारा ध्यान नजदीकी देशों के साथ संबंध सुदृढ़ करने की ओर गया है. यह मैत्री संदेश लेकर हाल ही में नेपाल, बर्मा और अफगानिस्तान गया था. पाकिस्तान के साथ संबंधों को सामान्य बनाने की प्रक्रिया को हम सुदृढ़ करना चाहते हैं, जिससे न केवल स्थायी शांति कायम हो, बल्कि लाभदायक सहयोग में भी वृद्धि हो.

चार दिन पूर्व 30 सितंबर को भारत और बांग्लादेश के प्रतिनिधियों ने गंगाजल की समस्या पर हुए एक समझौते पर हस्ताक्षर किए. यह एक व्यापक समझौता है, जिसमें अल्पकालीन समस्या को हल किया गया है और दीर्घकालीन समस्या के समाधान की नींव रखी गई है. इससे दोनों देशों की समुचित आवश्यकताओं की पूर्ति होगी.

इस समस्या ने हमारे पड़ोसी देश के साथ हमारे संबंधों में पिछले 25 वर्षों से बिगाड़ पैदा कर रखा था. समझौता हमारे इस विश्वास की पुष्टि करता है कि ऐसी जटिल समस्या को, जो दो पड़ोसी देशों की अर्थव्यवस्था और करोड़ों लोगों के जीवन को प्रभावित करती है, ईमानदारी से प्रेरित द्विपक्षीय चर्चा के द्वारा ही हल किया जा सकता है. ऐसे हल के लिए दोनों पक्षों को कुछ न कुछ त्याग करना पड़ता है और आदान-प्रदान के आधार पर आगे बढ़ना होता है.

पिछले एक वर्ष में दक्षिण एशिया के देशों में अनेक राजनीतिक परिवर्तन हुए हैं. फिर भी इन देशों के लोगों को इस बात का श्रेय मिलना चाहिए कि दक्षिण एशिया पिछले कई दशकों की अपेक्षा आज तनाव से अधिक मुक्त है. यदि सचमुच दक्षिण एशिया में शांति और सहयोग का मार्ग प्रशस्त हो जाए, तो हम सब, जिन पर विकास का सारा बोझ है, अपने विकास की ओर अधिक ध्यान दे सकेंगे और अपने संसाधनों को विनाश से हटाकर विकास में लगा सकेंगे.

वस्तुत: इसी संदर्भ में हम यह विशेष अपील करते हैं कि हमारे चारों तरफ के हिंद महासागर के विशाल क्षेत्र को बड़ी शक्तियों की प्रतिद्वंद्विता और सैनिक अड्डों से मुक्त रखा जाए, जिनका उपयोग  आक्रमण के लिए हो सकता है. विस्तृत परिपेक्ष्य में भारत तनावशैथिल्य के प्रयत्नों का स्वागत करता है. भारत चाहता है कि तनावशैथिल्य केवल यूरोप तक सीमित न रहे, बल्कि विश्वव्यापी हो और उसके लाभ विश्व के सब देशों और लोगों को मिलें.

वर्षानुवर्ष संयुक्त राष्ट्र संघ में अनगिनत प्रस्ताव पास किए गए हैं, जिनमें पूर्ण निरस्त्रीकरण, विशेषकर आणविक निरस्त्रीकरण की मांग की गई है. अणु शस्त्रों की दौड़ बहुत भयावह स्थिति में पहुंच गई है. विनाशकारी हथियारों के अंबार ने संसार को बड़ी विकट दुविधा में डाल दिया है. हमसे कहा जा रहा है कि युद्ध रोकने के लिए आणविक शस्त्र आवश्यक हैं और यह कि इन शस्त्रों के प्रयोग का डर ही युद्ध की रोकथाम करने में समर्थ हो सकता है. हम इस दावे को स्वीकार नहीं करते.

हमारी धारणा है कि आणविक शस्त्र खतरनाक हैं, भले ही वे एक के पास हों, कुछ देशों के पास हों या कई देशों के पास हों. हम केवल आणविक शस्त्रों के फैलाव के ही विरुद्ध नहीं हैं, वस्तुत: हम तो आणविक शस्त्रों के ही खिलाफ हैं. भारत सदा से ही आणविक शस्त्रों को प्राप्त करने और उन्हें विकसित करने का विरोधी रहा है.

तथ्य तो यह है कि भारत पहला देश था, जिसने संयुक्त राष्ट्र संघ में 20 वर्ष पूर्व समस्त आणविक शस्त्रों के परीक्षण पर रोक लगाने का मसला उठाया था. उस समय बड़ी शक्तियां हमारी बात को सुनने के लिए बिल्कुल तैयार नहीं थीं.  जब वे तैयार हुईं, तो उन्होंने केवल आंशिक परीक्षण प्रतिबंध संधि पर हस्ताक्षर किए. यह 15 वर्ष पूर्व की बात है. उस समय विश्व में हर्ष की लहर दौड़ गई और यह उम्मीद बंधी कि पूर्णरूपेण परीक्षण प्रतिबंध संधि पर भी जल्दी ही समझौता हो जाएगा. लेकिन हम अभी भी उसकी राह देख रहे हैं. आंशिक शस्त्र प्रतिबंध लागू करने के बाद, पहले की बजाय अधिक अणुशस्त्र परीक्षण हुए हैं. भूमिगत परीक्षण तो अभी भी जारी हैं. आणविक निरस्त्रीकरण की दिशा में कोई प्रगति नहीं हुई है.

भारत न तो आणविक शस्त्र शक्ति है और न बनना चाहता है. नई सरकार ने असंदिग्ध शब्दों में इस बात की पुन: घोषणा की है. हमारे प्रधानमंत्री श्री मोरारजी देसाई ने कहा है कि यदि विश्व के अन्य सभी देश आणविक शस्त्र बनाने लगें, तब भी भारत आणविक शस्त्रों को बनाने की ओर अग्रसर नहीं होगा. हमने अणु शस्त्रों के फैलाव को रोकने वाली संधि पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं, क्योंकि हम उसे एक असमान और भेदमूलक संधि समझते हैं. यह संधि दस वर्ष पूर्व तैयार हुई थी. तब से अब तक ऐसी कोई घटना नहीं घटी, जिसके कारण हमें अपने दृष्टिकोण में परिवर्तन करने की आवश्यकता महसूस हुई हो.

अध्यक्ष महोदय, भारत ने लगभग  25 वर्ष पूर्व आणविक शक्ति के शांतिमय उपयोग के कार्यक्रम को प्रारंभ किया था. अणुशक्ति के शांतिमय उपयोग में हमारा विश्वास दृढ़ है. हम इस दृष्टिकोण से पूर्णतया सहमत हैं कि आणविक शस्त्रों का फैलाव और आणविक प्रौद्योगिकी का विस्तार दो पृथक चीजें हैं और इनके स्पष्ट अंतर को समझा जाना चाहिए.

हम उन सब कदमों और नीतियों का पहले की तरह विरोध करेंगे, जो आणविक शक्ति के शांतिमय उपयोग में रुकावट डालेंगी, साथ ही हम उन सब कदमों और नीतियों का भी विरोध करेंगे, जो भेदभावपूर्ण हैं. हम अन्य देशों के साथ इस समस्या पर पूर्ण सहयोग देने और चर्चा करने के लिए तैयार हैं कि आणविक शस्त्रों के खतरे को किस प्रकार समाप्त किया जाए.

यह नितांत आवश्यक है कि राजनीतिक दिमाग अपने आपको सैनिक तर्कों से मुक्त रखे. यह भी आवश्यक है कि राजनीतिक इच्छाशक्ति विवेक से काम लेकर आणविक शस्त्रों की होड़ को आणविक निरस्त्रीकरण की दिशा में पलट दे. हमें विश्वास है कि आगामी वर्ष निरस्त्रीकरण पर संयुक्त राष्ट्र महासभा में जो अधिवेशन होने वाला है, उसमें आणविक निरस्त्रीकरण की प्राथमिकताओं को स्पष्ट करने की दिशा में ध्यान केंद्रित होगा और निरस्त्रीकरण से ऐसे उपाय ढूंढे जाएंगे, जो एक निश्चित समयावधि में सफलतापूर्वक कार्यान्वित किए जा सकें.

पहले ही अंतर्राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था की स्थापना में शस्त्रों की निरर्थक दौड़ में विश्व के सीमित संसाधनों के फंसे रहने से देरी हो रही है.  वर्तमान कीमतों के आधार पर संसार का कुल सैन्य खर्च लगभग 400 अरब डॊलर है. इसका 90 प्रतिशत विकसित देश खर्च कर रहे हैं, जो विकासशील देशों को दी जाने वाली अधिकृत विकास सहायता से 20 गुना अधिक है. यदि शस्त्रों पर किए जाने वाले व्यय में पांच प्रतिशत की कमी हो जाए, तो उससे विकासशील देशों को अपने सामान्य आर्थिक लक्ष्य को प्राप्त करने में भारी सहायता मिलेगी. अत: निरस्त्रीकरण न केवल शांति तथा सुरक्षा के लिए बल्कि त्वरित आर्थिक सामाजिक प्रगति के लिए भी महत्वपूर्ण है.

इसमें संदेह नहीं कि हमें काफी कुछ करना अभी बाकी है. हम अकसर इच्छाशक्ति या प्रगति की कमी की शिकायत करते रहते हैं. लेकिन हमें हताश या निराश होने की जरूरत नहीं है. कई विफलताओं के बावजूद भी, संयुक्त राष्ट्र संघ की उपलब्धियां बड़ी प्रभावशाली रही हैं. मैं आई.एल.ओ., डब्ल्यू. एच. ओ., यूनेस्को, यूनीसेफ, एफ.ए.ओ. अंकटाड, यूनीडी और संयुक्त राष्ट्र संघ की अन्य संस्थाओं के काम की प्रशंसा करना चाहता हूं. यदि इन्हें पर्याप्त धनराशि मिले, तो ये संस्थाएं मानव व्यथाओं का निवारण करने और मानव कल्याण को बढ़ावा देने की दिशा में और भी बहुत काम कर सकती हैं. एक उदाहरण विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा मलेरिया के उन्मूलन के लिए किए गए उपाय हैं. आज मलेरिया पुन: अपना सिर उठा रहा है. इसके निराकरण के लिए डब्ल्यू.एच.ओ. द्वारा बनाए गए कार्यक्रम में लगभग 45 करोड़ डॊलर लगेंगे. यह राशि संसार में प्रतिदिन होने वाले सैन्य खर्च से आधी है. फिर भी धन के अभाव में यह कार्यक्रम पिछड़ रहा है.

अध्यक्ष महोदय, भारत का विश्वास है कि संयुक्त राष्ट्र संघ का एक विश्व संगठन के रूप में समर्थन, सुदृढ़ीकरण तथा विकास होना चाहिए, जिससे न केवल विश्व शांति को संरक्षण तथा मानव अधिकारों का संवर्धन हो, बल्कि वह आर्थिक सहयोग की वृद्धि और राष्ट्रों के क्रियाकलाप में मेल बैठाने के दायित्व का भी निर्वाह कर सके. यह अंतर्राष्ट्रीय समाज के सम्मुख एक बड़ा महत्वपूर्ण कार्य है.

अंत में मैं पुन: अपने भाषण के मूल विषय पर आना चाहता हूं. हमारे सम्मुख महानतम कार्य मानव कल्याण का है, जो मानवता के सम्मुख समुपस्थित सभी समस्याओं को स्वयं में समाहित करता है. यह कार्य मनुष्य की जाति, रंग, संप्रदाय या राष्ट्रीयता की परिधि से परे है. हमारी सारी समस्याएं- युद्ध और शांति का प्रश्न, आर्थिक और तीव्र गति से समाप्त हो रहे प्राकृतिक संसाधन, सब हमें एक ही निष्कर्ष पर ले जाते हैं. हमारे इस पारस्परिक निर्भर संसार में हममें से प्रत्येक अपने भाई का रखवाला है.

हमारी कार्यसूची का एक सर्वस्पर्शी विषय, जो आगामी अनेक वर्षों और दशकों बना रहेगा- वह है मानव का भविष्य. इस मानव को यह पृथ्वी विरासत में मिली है और उसने इस धरती का विकास किया है और इससे स्वयं पोषण पा रहा है. यदि हम यह अनुभव करते हैं कि मानव की अस्तित्व रक्षा अन्य करोड़ों मानवों के साथ अभिन्न रूप से जुड़ी हुई है, जैसी कि पहले कभी नहीं थी, तो हम अपने समय के इस एकमात्र निष्कर्ष पर पहुंच जाएंगे कि राष्ट्रीय प्रभुसत्ता का अंतर्राष्ट्रीय परस्पर निर्भरता के साथ निश्चित रूप से मेल बैठाना चाहिए.

मैं भारत की ओर से इस महासभा को आश्वासन देना चाहता हूं कि हम एक विश्व के आदर्शों की प्राप्ति और मानव कल्याण तथा उसकी कीर्ति के लिए त्याग और बलिदान की बेला में कभी पीछे पग नहीं हटाएंगे. 
-डॉ. सौरभ मालवीय

(पुस्तक- 'राष्ट्रवादी पत्रकारिता के शिखर पुरुष अटल बिहारी वाजपेयी' से)

Monday, July 13, 2026

सुखद साथ




श्री रंजीव तिवारी, सचिव महामना शिक्षण संस्थान, लखनऊ एवं डॉ. संतोष शुक्ला जी वरिष्ठ वैज्ञानिक भारत सरकार.

लोकतंत्र का ध्वजवाहक है भारत

   


भाऊराव देवरस सेवा न्यास द्वारा 19 मई, 1995 को उत्तर प्रदेश के लखनऊ में आयोजित समारोह को अध्यक्ष के रूप में संबोधित करते हुए श्री अटल बिहारी वाजपेयी ने भारतीय संसद की स्थिति पर प्रकाश डाला. अपने भाषण में उन्होंने कहा कि जैसा आपने अभी सुना मुझे बहुत छोटा-सा, मगर बहुत मीठा-सा काम करना है. मुझे आज के वक्ता का परिचय देना है. यह तो सभी जानते हैं कि पाटिल साहब लोकसभा के अध्यक्ष हैं, लेकिन यह बात सब लोग नहीं जानते कि किस तरह से महाराष्ट्र के औरंगाबाद क्षेत्र के एक छोटे-से गांव में जन्म लेकर, म्युनिसिपैलिटी, विधानसभा और फिर लोकसभा- इन सारी  सीढ़ियों को पार करके पाटिल साहब आज जिस ऊंचे स्थान पर पहुंचे हैं, वह बिना कठोर परिश्रम के, बिना प्रामाणिकता के, बिना गंभीर अध्ययन के, और कर्म और व्यवहार में बिना समन्वय के प्राप्त नहीं किया जा सकता. मैं तो उन लोगों में से हूं, जो सीधे लोकसभा में छलांग लगाकर पहुंच गए. लेकिन आज लोकसभा का संचालन जिनके हाथ में है, वे अपने जीवन के सारे अनुभवों के निचोड़ के आधार पर और विश्व की परिस्थिति और भारत की दशा, इनका सही आकलन करने के बाद संसदीय लोकतंत्र देश में किस तरह से शक्तिशाली होगा, इसकी चिंता में लगे हैं और इसके चिंतन में भी लगे हैं. पहले वे म्युनिसिपैलिटी के अध्यक्ष बने, फिर महाराष्ट्र विधानसभा के सदस्य बने, वहां उपमंत्री रहे, फिर डिप्टी स्पीकर चुने गए, फिर स्पीकर चुने गए, फिर लोकसभा में आए, मंत्री पद का दायित्व संभाला, अनेक मंत्रालय देखे, सुरक्षा मंत्रालय से विशेष संबंध रहा.  स्पीकर के नाते वे लोकसभा के सदस्यों का नियमन करते हैं. हमें अनुशासन में रखते हैं. सदन की मर्यादा बनाए रखने के लिए बड़े तत्पर रहते हैं. लोकतांत्रिक जीवन-मूल्यों में उनकी आस्था संसद की कार्यवाही में भी देखी जा सकती है. 

हमारा लोकतंत्र संसार का सबसे बड़ा लोकतंत्र है. लोकतंत्र की परंपरा हमारे यहां बड़ी प्राचीन है. यह ठीक है कि आज लोकतंत्र का जो ढांचा हम विकसित कर रहे हैं, उसका ऊपरी आवरण, ब्रिटेन की संसदीय पद्धति का है. लेकिन बात ढांचे की नहीं हो रही है. वाद-विवाद के द्वारा, शास्त्रार्थ के द्वारा, विवादग्रस्त प्रश्नों का नियमन करना, यह जिस देश की परंपरा में और प्राचीन संस्कृति में घुला हुआ है, वह सचमुच में, संसार में लोकतंत्र का ध्वजवाहक बनकर आगे चले, इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है. भारत में ऐसा होता था. यहां जो गणतंत्र थे, उनमें मतदान की प्रक्रिया थी.  समितियों का निर्माण करके प्रश्न तय करने का विधान था. बाद में  कालखंड ऐसा आया कि हमारा विकास अवरुद्ध हो गया. आज हम फिर से संसार के सबसे बड़े लोकतंत्र के रूप में खड़े हैं. नये-नये आजाद हुए देश के लोकतंत्र को अपने लिए अनुकरणीय समझते हैं. वे चकित हैं कि पचास साल से, निर्बाध रूप से, लोकतंत्र चल रहा है. उनके यहां तो लोकतंत्र कठिनाइयों में पड़ जाता है. कठिनाइयों में हम भी पड़ जाते हैं, लेकिन उन कठिनाइयों में से निकल भी जाते हैं. उसमें भी लोकतंत्र की शक्ति प्रकट होती है. लोक शक्ति का प्रकटीकरण होता है. लेकिन वे हमारे लोकतंत्र को बड़ी ललचायी नजरों से देखते हैं. अभी-अभी यूरोप में क्रांतिकारी परिवर्तन हुआ. सोवियत साम्राज्य बिखर गया. अनेक देशों ने अपनी खोई हुई स्वाधीनता पा ली. नागरिकों ने भी व्यक्तिगत स्वाधीनता अर्जित की. अब वहां लोकतंत्र चल रहा है. वे हमसे सीखना चाहते हैं.  वे जानना चाहते हैं कि हम लोकतंत्र को किस तरह से सफलतापूर्वक चला रहे हैं ? इसमें पाटिल साहब का योगदान उल्लेखनीय है.

पाटिल साहब ने जहां इस बात पर बल दिया है कि कानून बनाने के साथ-साथ लोकसभा जन-जीवन के ज्वलंत प्रश्नों पर भी अपना अभिमत प्रकट करती रहे, वहां लोकसभा किस तरह से सरकार पर अंकुश लगा सकती है, उसके खर्चों पर, इसके लिए उन्होंने संसदीय पद्धति का प्रारंभ किया है. अभी तक हम लोकसभा में चर्चा करके अलग-अलग मंत्रालयों की मांगों पर अपना अभिमत प्रकट कर दिया करते थे, लेकिन ब्यौरे में जाकर विवरण में जाकर, एक-एक खर्चे की गहराई में जाकर देखना सदन के लिए संभव नहीं होता था. इतना समय भी नहीं था और इतना लोग ध्यान लगाकर काम करें, ऐसा भी नहीं होता था. अब संसदीय समितियां काम कर रही हैं. लोकसभा का कोई न कोई सदस्य किसी न किसी समिति का सदस्य है. अलग-अलग मंत्रालयों की देखरेख का काम इन समितियों के पास है और वे समितियां मंत्रालयों की पूरी छानबीन करती हैं. कितना बजट था, कितना पैसा खर्च हुआ और ज्यादा खर्च हुआ, तो क्यों ज्यादा खर्च हुआ ? उनके सामने अधिकारी आते हैं. उनकी गवाहियां ली जाती हैं.  समितियां रिपोर्ट देती हैं. सदन रिपोर्ट की चर्चा कर सकता है, उस मंत्रालय के बारे में, उस मंत्रालय की विभिन्न गतिविधियों के बारे में. यह बड़ा प्रयोग है. पहले आशंका थी. मन में संदेह था. अब धीरे-धीरे वे संदेह छंट गए हैं और संसदीय पद्धति, स्थायी समितियों की जो परिकल्पना है, वह अधिकाधिक लोगों को पसंद आ रही है. 

पाटिल साहब केवल भारत की लोकसभा का संचालन करते हैं, ऐसा नहीं है. कॊमनवेल्थ के देशों का एक संगठन है, वे इसकी भी अध्यक्षता कर चुके हैं. सारे संसार की पार्लियामेंट की एक एसोसिएशन है, वे उसकी भी अध्यक्षता कर चुके हैं. अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलनों में भारत का प्रतिनिधित्व करते हैं और भारतीय लोकतंत्र की प्रतिभा से और प्रतिमा से सबको प्रभावित रखते हैं. वे लोकसभा के अध्यक्ष हैं, और मैं एक छोटा-सा सदस्य हूं. आप जानते हैं. अभी राजनाथ सिंह जी लोकसभा अध्यक्ष को और मुझको समकक्ष रख रहे थे कि तीन-तीन बत्तियां इन्होंने जलाईं. मैं तीन बत्तियां नहीं जलाना चाहता था और चाहता था कि राजनाथ सिंह जी भी एकाध बत्ती जलाएं. लेकिन इन्होंने सारा भार मेरे ऊपर छोड़ दिया. लोकसभा के अध्यक्ष के ऊंचे आसन पर जो बैठता है, मुझे कभी बोलने का अवसर दे या न दे और कभी अध्यक्ष महोदय कह सकते हैं कि माननीय सदस्य ! आप सदन के बाहर जाइए और मैं आज्ञा का उल्लंघन नहीं कर सकता. यह बात अलग है कि ऐसी स्थिति आएगी नहीं, लेकिन कुछ सदस्यों के लिए आती है और तब वे जड़ हो जाते हैं. शांति से समझा-बुझाकर ताकि पार्लियामेंट की गरिमा बनी रहे. यह बात अलग है कि गरिमा क्षीण हो रही है, लेकिन उनकी पूरी कोशिश है कि वह बनी रहे.

और, इस काम में जितना योगदान मैं दे सकता हूं, देता रहता हूं. यद्यपि मेरी पार्टी वालों को भी कभी-कभी ऐसे क्षण आंदोलित कर देते हैं, जब उनकी इच्छा भी कुएं में कूदने की होती है. जो अध्यक्ष के सामने जगह होती है, लोकसभा में उसको ’वैल’ कहते हैं ’वैल’. और मेम्बर अपना स्थान छोड़कर कुएं में आ जाते हैं, तो समझो कि दो-दो हाथ होने वाले हैं. ये दो-दो हाथ जबान से ही होते हैं. अब उसको भी टाला जाना चाहिए.

40 साल से ऊपर का मेरा संसद का अनुभव कभी-कभी मुझे बहुत पीड़ित कर देता है, दुखी कर देता है. हम किधर जा रहे हैं ? और जब मैं यह बात कह रहा हूं, तो खाली दिल्ली की संसद ही मेरे ध्यान में है, लखनऊ का विधानमंडल तो मेरे ध्यान में बिल्कुल नहीं है. यहां तो सारी मर्यादाएं टूट गई हैं. सारे मूल्य जैसे ताक पर रख दिए गए हैं. मैं किसी एक पार्टी को इसके लिए दोष नहीं देता, क्योंकि पार्टी समाज में से उत्पन्न हुई है और समाज के समर्थन से खड़ी है. निर्वाचित होकर आई है. लेकिन कुछ मूल्य ऐसे हैं, जिनके साथ समझौता नहीं होना चाहिए. सरकारें बदलेंगी. कोई सरकार स्थिर नहीं है. लेकिन संसद रहेगी, विधानमंडल रहेगा. और वह अगर रहेगा, तो उसे चलाना होगा, नियमों के अनुसार, निर्देशों के अनुसार, परंपरा के अनुसार, मर्यादा में रहकर, सीमाओं के भीतर. स्वतंत्रता और उच्छृंखलता में अंतर है. स्वतंत्रता में अपने को बांधने का भाव है. कोई दूसरा बांधे, विरोध करेंगे. इसीलिए पराधीनता के खिलाफ लड़े, लेकिन हम स्वेच्छा से ऐसे बंधन में बंध सकते हैं, जो हमारी आत्माभिव्यक्ति में सहायक हो. जो हमारे कल्याण का भी रास्ता बनाए और जो पूरे समाज को भी कल्याण के पथ पर ले जाए, प्रगति के पथ पर ले जाए.

मित्रों, भाषण देने की मेरी कोई इच्छा नहीं है. मैं तो न्यास के अध्यक्ष के नाते पाटिल साहब का बहुत आभारी हूं कि उन्होंने हमारा निमंत्रण स्वीकार किया. यह कार्यक्रम प्रेस में काफी चर्चा का विषय बन चुका है. अभी भी अटकलें लगाई जा रही हैं. तिवारी जी आए थे, तब भी मैंने कहा था, आज मैं फिर दोहराता हूं कि यह गैर राजनीतिक मंच है. मैं दल से जुड़ा हुआ हूं, मगर दल से जुड़ा हूं यह मेरे जीवन का, मेरे आचरण का एक पहलू है. और भी पहलू हैं और उनमें मैं दल की बात नहीं आने देता. और ’दल-दल’ की बात तो बिल्कुल नहीं आने देता. दल अपनी जगह है. राजनीति सर्वांग जीवन नहीं है, उसका एक पहलू है. और यही शिक्षा हमने पाई है, यही संस्कार हमने पाए हैं. लेकिन आज हर चीज़ को राजनीति के लक्ष्य से नत्थी कर दिया जाता है, बांध दिया जाता है. इसमें व्यक्ति का सही मूल्यांकन नहीं हो पाता और परिस्थिति का भी सच्चा आकलन नहीं हो पाता. इसी का कारण है कि राजनीति में अस्पृश्यता बहुत बढ़ गई है. एक-दूसरे को जैसे सहन नहीं कर सकते. एक-दूसरे के प्रति आदर से बोल नहीं सकते. इसीलिए ब्रिटेन की पार्लियामेंट का नियम है कि मेम्बर का नाम नहीं लिया जाएगा. ’आनरेबिल मेम्बर’ कहा जाएगा. और जहां से चुनकर आया है- ’ आनरेबिल मेम्बर फ्रॊम लखनऊ’ इतना काफी है. यहां असल में कहां से चुनकर आया है, इसकी तो गिनती ही नहीं होती. नाम, बिना किसी आदर के, बिना किसी सम्मान के भाव के लिए जाते हैं, गाली-गलौच होती है. बड़ा दुख होता है. मैंने पाटिल साहब से कहा कि आप चलिए, शायद आपकी उपस्थिति का, आपके आचरण का, आपके भाषण का लखनऊ पर भी कुछ असर होगा. लखनऊ के राजनेताओं पर असर होगा. और आज, उनकी उपस्थिति यहां लखनऊ में ’भाऊराव देवरस सेवा न्यास’ के अंतर्गत होने वाले कार्यक्रम में, जो देश की राजनीति के लिए शुभ संकेत है. यह इस बात का प्रमाण है. भले ही कठिनाइयां आ रही हों, मगर अंत में हम लोकतंत्र की मशाल को जलता हुआ रखने में सफल होंगे और यह मशाल निरंतर हमारा पथ-प्रदर्शन करती रहेगी.

मित्रों, यह व्याख्यानमाला आरंभ की गई है, आज इसका दूसरा पुष्प गूंथा जाना है. श्री शिवराज पाटिल जी ने हमारा आमंत्रण स्वीकार किया, हम उनके आभारी हैं. अब मैं उनको भाषण के लिए आमंत्रित कर रहा हूं. 
सवेरे कुछ लोग हवाई अड्डे पर गए थे और वे पाटिल साहब को पुष्पमाला अर्पित करने के अवसर से वंचित हो गए थे. अगर वे पुष्प अभी तक सूखे न हों और उनमें से कोई पुष्प लाए हों, तो मैं निमंत्रण देता हूं कि वे पाटिल साहब को यहां आकर सम्मान करें.
-डॉ. सौरभ मालवीय

(पुस्तक- 'राष्ट्रवादी पत्रकारिता के शिखर पुरुष अटल बिहारी वाजपेयी' से)

भारतीय राष्ट्र का मूल

   


राष्ट्रीय एकता को सुदृढ़ बनाने के लिए आवश्यक है कि हम राष्ट्र की स्पष्ट कल्पना लेकर चलें. राष्ट्र कुछ संप्रदायों अथवा जनसमूहों का समुच्चय मात्र नहीं, अपितु एक जीवमान इकाई है, जिसे जोड़-तोड़कर नहीं बनाया जा सकता.  इसका अपना व्यक्तित्व होता है, जो उसकी प्रकृति के आधार पर कालक्रम का परिणाम है. उसके घटकों में राष्ट्रीयता की यह अनुभूति, मातृभूमि के प्रति भक्ति, उसके जन के प्रति आत्मीयता और उसकी संस्कृति के प्रति गौरव के भाव में प्रकट होती है. इसी आधार पर अपने-पराये का, शत्रु-मित्र, अच्छे-बुरे और योग्य-अयोग्य का निर्णय होता है. जीवन की इन निष्ठाओं तथा मूल्यों के चारों ओर विकसित इतिहास, राष्ट्रीयता की भावना घनीभूत करता हुआ उसे बल प्रदान करता है. उसी से व्यक्ति को त्याग और समर्पण की, पराक्रम और पुरुषार्थ की, सेवा और बलिदान की प्रेरणा मिलती है.

भारत एक प्राचीन राष्ट्र है. स्वतंत्रता की प्राप्ति से, इसके चिरकालीन इतिहास में एक नया अध्याय का प्रारंभ हुआ. किसी नवीन राष्ट्र का जन्म नहीं. नया राष्ट्र बनाने की चर्चा का परिणाम जीवन-मूल्यों की अवहेलना और आत्म-विस्मृति में हुआ है. फलत: हमारे राष्ट्रीय मानस में एक गांठ पड़ गई है और द्वैत भाव की सृष्टि हुई है. घर और बाहर के राजनीतिक और सांस्कृतिक जीवन के अलग-अलग आदर्श बन गए हैं. भारत के ऋषि-महर्षियों , स्मृतिकारों, पुराण-निर्माताओं, साधु-संन्यासियों. कवि-कलाकारों, सम्राटों-सेनापतियों और संतों तथा सुधारकों ने जिस एकात्मक जीवन के ताने-बाने को बुना था, आज वह उपेक्षा तथा उपहास का विषय बनाया जा रहा है. जिन उपादानों ने हमें हजारों साल तक एक  बनाए रखा, जिनके कारण हम बाहरी आक्रमण और आंतरिक विघटन के बावजूद अपने अस्तित्व को कायम रख सके, उन्हें आज तिरस्कृत किया जा रहा है. यह एकता की प्राप्ति का नहीं, बची-खुची एकता को भी खतरे में डालने का मार्ग रहा है. आवश्यकता है कि हम राष्ट्र की प्राचीनता को मान्य करें और उसके सही स्वरूप को समझें.

भारतीय राष्ट्र का मूल स्वरूप राजनीतिक नहीं, सांस्कृतिक है. सांस्कृतिक एकता की अनुभूति ही राजनीतिक एकता के पक्ष की प्रेरक शक्ति रही है. राजनीतिक एकता के अभाव ने देश की सांस्कृतिक धारा को कभी खंडित नहीं होने दिया. जहां एक ओर हम भारत की संस्कृति से अभिन्न रूप से संबद्ध अनेक राजनीतिक इकाइयों के प्रति उदासीन तथा सहिष्णु रहे हैं, वहां दूसरी ओर भारतीय संस्कृति से भिन्न उसके विकृत अथवा विरोधी भाव पर आधारित, कोई भी राजनीतिक सत्ता हमें मान्य नहीं हुई. हम सदैव उसके विरुद्ध संघर्ष कर रहे हैं.

विविधता में एकता भारतीय संस्कृति की विशेषता रही है. हमने एकरूपता की नहीं, अपितु एकता की कामना की है. फलत: देश में अनेक उपासना पद्धतियों, पंथों, दर्शनों, जीवन-प्रणालियों, भाषाओं, साहित्यों और कलाओं का विकास हुआ, जो संपन्नता की द्योतक हैं. हमें उनके प्रति अपनत्व और गौरव का भाव लेकर चलना होगा. किंतु विविधता के नाम पर विभाजन को प्रोत्साहन देना भूल होगी. भारतीय संस्कृति कभी किसी एक उपासना पद्धति से बंधी नहीं रही और न उसका आधार प्रादेशिक ही रहा है. मजहब अथवा क्षेत्र के आधार पृथक संस्कृति की चर्चा तर्क विरुद्ध ही नहीं, भयावह भी है, क्योंकि वह राष्ट्रीय एकता की जड़ पर ही कुठाराघात करती है. 

क्षेत्र, प्रदेश, जाति, पंथ, भाषा, भूषा आदि के आधार पर भारतीय जन की पृथकता की कल्पना भ्रामक है. उनके आधार पर भारत में अनेक राष्ट्रों अथवा राष्ट्रीयताओं के अस्तित्व का विचार भी मूलत: अशुद्ध है. हम एक राज्य में रहने के कारण एक नहीं हैं, अपितु हम एक हैं, इसलिए भारत एक राष्ट्र है.

राष्ट्र के प्रति अनन्य निष्ठा ही राष्ट्रीयता का निकष होने के कारण भारत के सभी जनों को अपनी निष्ठाओं को इसके अधीन बनाना होगा. इसके लिए दोहरा प्रयत्न आवश्यक है. एक ओर जहां अपने प्रदेश, पंथ अथवा जाति के प्रति निष्ठा रखने वालों को राष्ट्रनिष्ठ बनाना होगा, वहां दूसरी ओर भारत से बाहर निष्ठा रखने वालों को फिर से, चाहे वे पाकिस्तानपरस्त हों, अथवा रूस और चीन के भक्त, उन्हें उससे विरत करना होगा.

उपासना मत और ईश्वर संबंधी विश्वास की स्वतंत्रता भारतीय संस्कृति की परंपरा रही है. भारतीय संविधान ने भी इसे स्वीकार किया है. किंतु मजहब के आधार पर किसी को ’अल्पमत’ अथवा ’बहुमत’ वाला मानना न तो राष्ट्रीय एकात्मकता के लिए हितावह है और न सत्यसंगत ही. मुसलमान अथवा ईसाई कहीं बाहर से नहीं आए. उनके पूर्वज हिंदू ही थे. मजहब बदलने से राष्ट्रीयता बदलती है और न संस्कृति में परिवर्तन होता है. मुसलमानों अथवा ईसाइयों को अल्पमत मानने का अर्थ होगा मजहब को राजनीतिक, आर्थिक, समाज-जीवन के सभी क्षेत्रों में विभाजक रखा स्वीकार करना. यह तो प्रच्छन्न रूप से द्विराष्ट्रवाद अथवा बहुराष्ट्रवाद को मान्यता देनी होगी.

सुखेद कहना पड़ता है कि भारतीय राष्ट्रवाद की साधना में मुस्लिम मतावलंबियों का व्यापक सहयोग नहीं मिल पाया. उन्होंने राजनीति और मजहब को एक मानकर ही अधिकांश प्रयत्न किए. परकीय सत्ता के साथ अपने को एकरूप करने के कारण मुस्लिम  समाज के जीवन में अनेक ऐसी विकृतियां आ गईं, जिनका इस्लाम के साथ कोई संबंध नहीं है. यहां के समाज से अपने-आपको पृथक सिद्ध करने की लालसा में धीरे-धीरे उन्होंने, उन सब प्रथाओं, रहन-सहन की पद्धतियों एवं रीति-नीतियों से अपने को अलग कर लिया, जो यहां के जन को इस भूमि से जोड़े हुए हैं.

इतना ही नहीं, उन्होंने राम और कृष्ण को अपना पूर्वज मानने से भी इंकार कर दिया. यहां के परंपरागत त्यौहारों से, जिनका संबंध किसी मजहब से न होकर यहां की मिट्टी और मौसम से है, अपने को दूर रखा. इस प्रसंग में पारसियों का उल्लेख करना आवश्यक है. अपने मजहब को सुरक्षित रखते हुए भी, उन्होंने न तो कभी भेदभाव की शिकायत की और न कभी संरक्षण ही मांगा है. अपनी योग्यता और समाजनिष्ठा के बल पर उन्होंने देश का सभी क्षेत्रों में नेतृत्व किया है. उनका उदाहरण अनुकरणीय है.
-डॉ. सौरभ मालवीय

(पुस्तक- 'राष्ट्रवादी पत्रकारिता के शिखर पुरुष अटल बिहारी वाजपेयी' से)

मेले ग्रामीण परंपरा के अंग हैं

   


श्री अटल बिहारी वाजपेयी ने 11 जनवरी, 1999 को स्वदेशी मेले का उदघाटन करते हुए मेलों की उपयोगिता पर प्रकाश डाला. उन्होंने कहा कि मुझे उदघाटन के लिए बुलाया गया है या समापन के लिए ? मेरे बोलने के बाद क्या कार्यक्रम समाप्त होने वाला है ? मैं आभारी हूं, मुझे स्वदेशी मेले में आमंत्रित किया गया. मेला शब्द मुझे प्रिय है. मेले में मिठास है, मेले में सुगंध है. एक शब्द अंग्रेजी का प्रयोग करते हुए मैं पूछूंगा एग्जीबिशन तो खुला प्रदर्शन है. उसके बारे में तो कहने की भी आवश्यकता नहीं पड़ती. लेकिन गांवों में जो मेले होते हैं, ग्रामीण परंपरा के अंग हैं. उनमें समाज के सभी वर्गों का और जीवन के सभी विभिन्न क्षेत्रों का बड़ा सरस रूप होता है. मेले में खरीद-बिक्री तो होनी ही है. लेकिन कथा-वार्ता भी होती है, खेल-तमाशों का आयोजन भी किया जाता है. पहलवानों के लिए दंगल की भी व्यवस्था होती है. हरेक मेले का अलग-अलग रूप होता है. मेला नदी के किनारे जलाशय के तट पर या किसी पूजा स्थल के आसपास आयोजित किया जाता है.

मैं समझता हूं कि स्वदेशी मेला भी इस ध्येय का पालक होगा. भारत माता को निरंतर सौभाग्य से मंडित करने के लिए हम लोग प्रयत्नशील हैं. भारत को सोने की चिड़िया कहा जाता था, संयोजकों ने जो दस्तावेज प्रकाशित किया है, उसमें इस बात का उल्लेख है. भारत फिर से सोने की चिड़िया बने, यह हमारी महत्वाकांक्षा है. मेले का आयोजन कर भारत के औद्योगिक क्षेत्र में अब तक जो उपलब्धियां हुई हैं, उनका और भारत की जो क्षमता है औद्योगिक क्षेत्र में उनका, प्रभावशाली प्रस्तुतिकरण करने का प्रयास किया गया है. हम सबकी इच्छा है कि भारत एक महान शक्तिशाली और समृद्ध राष्ट्र बने. इसके लिए स्वदेशी की भावना को निरंतर जागृत करना आवश्यक है.

स्वदेशी के आधार पर स्वावलंबी भारत बनाना, अपने पैरों पर खड़ा करना है. शक्ति हमें स्वयं प्रकट करनी होगी. समृद्धि भी अपने प्रयासों से लानी होगी. हम परावलंबी बनने की भूल नहीं कर सकते. हम परावलंबी होकर विकृत जीवन नहीं जी सकते. हमें अपने पैरों पर खड़ा होना है. हम अपने परिश्रम से, अपनी प्रतिभा से, अपने सहयोग से, अपनी आस्था से, राष्ट्रहित की निष्ठा से जिस शक्ति का अर्जन करेंगे, वह शक्ति टिकाऊ होगी. वही हमें शक्तिशाली बनाएगी. उधार की शक्ति से कोई शक्तिशाली नहीं होता. ये सदी समृद्धि की है. बाहर वाले हमें मदद दें. लेकिन जितना बड़ा महान कार्य हमारे सामने है, वह केवल बाहर की मदद से नहीं हो सकता. उसके लिए संसाधन जुटाने पड़ेंगे. इसके लिए परिश्रम भी बड़ा करना होगा. पारदर्शी प्रामाणिकता का परिचय देना होगा. 

हमारे यहां उद्योगों की अलग-अलग श्रेणियां हैं. मुझे बताया गया है कि मेले की विशेषता यह है कि इसमें सभी तरह के उद्योगों का प्रतिनिधित्व है. खासकर जो नॊन-कॊर्पोरेट सेक्टर है, उसको और अधिक सहायता की आवश्यकता है, प्रचार की आवश्यकता है. हमारे पास अच्छी सामग्री है. सेवाएं भी उपलब्ध हैं. लेकिन प्रचार के मैदान में हम मात खा गए हैं. इसका कोई उपाय निकालना पड़ेगा. हमारे छोटे और लघु उद्योगों के बारे में दुनिया कितना जानती है. वे सबसे अधिक रोजगार देते हैं, सबसे अधिक विदेशी मुद्रा कमाते हैं. लेकिन उनके सामने बाजार की समस्या है. इसलिए उन्हें संरक्षण देने का फैसला किया गया है. लेकिन उस संरक्षण को भी कुतरने की कोशिश होती रहती है. देश में एक ऐसी मानसिकता का विकास हुआ है और वह मानसिकता केवल आज की देन नहीं है, हमें वह उत्तराधिकार में मिली है, विरासत में मिली है. इस मानसिकता में केवल बड़े उद्योगों की प्रशंसा की जाती है और छोटे उद्योग उपेक्षित रह जाते हैं हम इस संस्कृति को बदलने का प्रयास कर रहे हैं. और अगर समय मिला, सहयोग मिला, तो हम इसे बदलकर दिखा देंगे. आज हम आपको आश्वासन देना चाहते हैं.

स्वदेशी एक साधना है. इस भावना को हमें बनाए रखना पड़ेगा. इसके लिए यह जरूरी है कि हम सब राष्ट्र का सही निर्माण करने का बीड़ा उठाएं. सचमुच में, पचास साल में जिन समस्याओं का समाधान हो जाना चाहिए था और वो समस्याएं पैदा ही नहीं होनी चाहिए थीं, गलत नीतियों के कारण आज पैदा हो गई हैं. हमारे पास लिखने के लिए साफ पट्टी नहीं है, ठीक स्लेट नहीं है, टेढ़ी-मेढ़ी इबारत से लिखी पट्टी हमें मिली है. अब हमें फिर से उसमें अक्षर लिखना है. सरकार की सीमाएं हैं. आर्थिक संकट भी है. वह संकट केवल भारत तक ही सीमित नहीं है, और देश भी उसकी चपेट में आ रहे हैं. सबको मिलकर यह सोचना पड़ेगा कि हमने किस तरह का प्रयास किया. हमें किस तरह से करना था. आर्थिक संकट, जिसके कारण आज देश संकट में है, एक के बाद एक पड़ते जा रहे हैं. हमें अनगिनत समस्याओं का समाधान करना पड़ रहा है. वे समस्याएं क्यों उत्पन्न हुईं ? बेरोजगारी बढ़ रही है, विषमता बढ़ रही है. और दूसरी ओर हमें मतभेदों को समाप्त करना है. सरकारी कारखाने बड़े उत्साह से चलाए गए थे. वे राष्ट्र की संपत्ति हैं. यह मानकर उन्हें प्रश्रय दिया गया, प्रोत्साहन दिया गया. आज उनमें से अनेक सरकारी फर्मों की हालत खराब है, बंद हो रहे हैं, या बंद होने की कगार पर हैं. यह स्थिति क्यों पैदा हुई ? बड़े उद्योगों की ओर ध्यान दिया हमने. लेकिन फिर भी बड़े उद्योगों को राष्ट्र के निर्माण में जैसा योगदान देना चाहिए था, नहीं दे पाए. इस पर गहराई से विचार करना होगा.

मैं इस सुझाव का स्वागत करता हूं कि प्राइवेट सेक्टर के अलावा भी जिन क्षेत्रों में आर्थिक गतिविधियां चलती हैं, जिनका योगदान है, उत्पादन में, सेवा में, उनसे सरकार का वार्तालाप होना चाहिए. विचार-विनिमय होना चाहिए. यह भ्रम पैदा किया गया है कि सरकार विदेशी दबाव में आकर काम कर रही है. इस आरोप में कोई सच्चाई नहीं है. हम किसी दबाव में आने वाले नहीं हैं. भारत अनेक दबाव के सामने दृढ़ रहने की शक्ति रखता है. अगर हम दबाव में होते, तो पोखरण का परमाणु परीक्षण कभी नहीं करते. हमें पता था कि आर्थिक संकट का सामना करना होगा. हम जानते थे कि प्रतिबंध लगेंगे. हम जानते थे कि बाहर से पूंजी लेने का मार्ग कठिन होगा. लेकिन हमने राष्ट्रीय सुरक्षा को सर्वोपरि समझा और सब दबावों का सामना करते हुए भी सुरक्षा के प्रति अपने कर्तव्य का पालन किया. आर्थिक क्षेत्र में हम किसी दबाव में आने वाले नहीं हैं. दबाव डाले जाते हैं, दबाव डाले जाएंगे.

दुनिया की नजर हमारे बड़े बाजार पर है. इतना बड़ा देश. इतना बड़ा लोकतंत्र, चलो चलते हैं, माल बेचें. उनकी यह सहज स्वाभाविक लालसा समझ में आ सकती है. लेकिन हमें तो अपने हितों का रक्षण करना पड़ेगा. कोई भी ऐसी नीति बनाई जाएगी, कोई भी कदम उठाए जाएंगे, वे राष्ट्र की कसौटी पर खरे उतरने के बाद ही उठाए जाएंगे. इसमें सबके विचारों का आदान-प्रदान होते रहना चाहिए, यह मैं मानता हूं. इसमें अगर कोई कमी रह गई, तो उसे ठीक किया जाएगा. लेकिन अब इस भ्रामक प्रचार में न आएं. क्या इस क्षेत्र में सरकार जो कदम उठाती है, वो किसी के दबाव में आकर उठाती है ? नीतियों के बारे मे प्रामाणिक मतभेद हो सकता है. प्रामाणिक मतभेद के लिए हमेशा गुंजाइश रहती है. लेकिन किसी की प्रामाणिकता पर संदेह नहीं किया जाना चाहिए. भारत को खरीदने वाला कोई माई का लाल पैदा नहीं हुआ है. और भारत को बेचने वाला कोई कपूत भी भारत माता की कोख से कभी पैदा नहीं होगा. कौन इस महान देश को खरीद सकता है ? यह बहुत प्रचार किया जा रहा है कि ईस्ट इंडिया कंपनी के दिन आने वाले हैं. कोई सच्चाई नहीं है इसमें. ईस्ट इंडिया कंपनी के दिन आएं, इसका प्रश्न ही पैदा नहीं होता. उस समय तराजू की डंडी, राजदंड में बदल गई, तब देश बिखरा हुआ था, बंटा हुआ था. आज देश एक है. सौ करोड़ की जनसंख्या एक झंडे के नीचे खड़ी है. चुनौतियों का जवाब देने के लिए तैयार है.

आज हम अनाज के क्षेत्र में आत्मनिर्भर हैं. कुछ फसलें ऐसी हैं, जिनके साथ संकट पैदा हो जाता है. कभी मौसम साथ नहीं देता है, तो प्यास मुद्दा बन जाता है. पहले प्याज इसलिए संकट पैदा कर रहा था कि उसका दाम ज्यादा था, आजकल प्याज कुछ क्षेत्रों में इसलिए संकट पैदा कर रहा है कि उसका दाम गिर रहा है. प्याज कम हो तो संकट, प्याज ज्यादा हो तो संकट. लेकिन आत्मनिर्भरता की ओर हम बढ़ रहे हैं. और भी बढ़ेंगे. भारत का विकास स्वगुणों से होना चाहिए. विकासशील देश भारत की ओर देख रहे हैं. उनके प्रति भी हमारा कुछ कर्तव्य है. हम पड़ौसियों के साथ अच्छे संबंध स्थापित करना चाहते हैं. इसीलिए आर्थिक आजादी प्राप्त करना चाहते हैं. आर्थिक सहयोग बढ़ाना चाहते हैं. क्योंकि इस देश की अर्थव्यवस्था अगर ठीक हो जाए, तो अनेक समस्याएं हल हो सकती हैं. इस कारण सभी को सहयोग देना चाहिए. इस कारण सभी को सहायता देनी चाहिए.

मैं स्वदेशी मंच के कार्यक्रम में जा रहा हूं. इस बात को लेकर काफी हलचल है. पता नहीं क्यों हलचल है. स्वदेशी मंच जो चला रहे हैं, वे भी मेरे मित्र हैं. मैं सरकार में हूं, कोई फर्क नहीं पड़ता, स्वदेशी मंच अपना काम करे. हमें सलाह देता रहे. वह सलाह हमें जंची, तो अपनाएंगे. नहीं जंची, तो माफी मांग लेंगे कि क्षमा कीजिए, हम आपके विचार से सहमत नहीं हैं.  विचारों में विभिन्नता है. लेकिन लक्ष्य एक है. और वह एक लक्ष्य है महान शक्तिशाली, समुद्धशाली भारत की रचना. हमारे आदर्श समान हैं. उन आदर्शों से प्रेरणा लेते हुए और भारत के प्रति अपने सपनों को साकार करने का संकल्प लेते हुए हम आगे बढ़ें. स्वदेशी मेला उस यात्रा में सहायक बने, यही कामना है.
-डॉ. सौरभ मालवीय

(पुस्तक- 'राष्ट्रवादी पत्रकारिता के शिखर पुरुष अटल बिहारी वाजपेयी' से)

संगीत में बड़ी शक्ति है

   


महाराष्ट्र के पुणे में 7 जनवरी, 2003 को सवाई गंधर्व स्मारक के उदघाटन समारोह को संबोधित करते हुए श्री अटल बिहारी वाजपेयी ने संगीत के महत्व और इसकी परंपरा पर प्रकाश डाला. अपने संबोधन में उन्होंने कहा कि गत सितंबर माह में जब मुझे डॊक्टर जोशी ने- पंडित भीमसेन जोशी ने यहां आने का निमंत्रण दिया, तो उसमें, दिसंबर की तारीख दी हुई थी. मैंने कहा कि आपको भरोसा है कि मैं दिसंबर तक प्रधानमंत्री रहने वाला हूं, तो मैं निमंत्रण जरूर स्वीकार करूंगा, लेकिन अगर मान लीजिए मैं नहीं रहा, भारतीय राजनीति का कोई भरोसा नहीं- चलायमान है, दोलायमान हो सकती है, क्यों विलासराव जी ? तो कठिनाई हो सकती है. अगर मैं प्रधानमंत्री न रहा, क्या तब भी आप मुझे बुलाएंगे ? ऐसे प्रसंगों की मुझे याद है कि दिए गए निमंत्रण वापस ले लिए जाते हैं. पंडित भीमसेन जोशी ने कहा, "अगर आप प्रधानमंत्री न रहे, तो भी मैं आपको बुलाऊंगा." तो हो सकता है कि उनके आशीर्वाद के कारण ही मैं प्रधानमंत्री बना हुआ हूं. पर मैंने सोचा कि शायद मुझे बुलाने का कारण ये भी है कि मैं ग्वालियर का हूं. ग्वालियर संगीत का गढ़ रहा है. भीमसेन जोशी जी ने भी ग्वालियर से शिक्षा प्राप्त की. किन परिस्थितियों में की थी, वह वर्णन रोमांचक है. लेकिन संगीत की साधना करनी थी, इसलिए कष्ट झेल कर उन्होंने संगीत साधना को पूरा किया. किराना घराने का उल्लेख होता है. ग्वालियर उसकी नींव जाना जाता है. मैंने सोचा कि शायद मैंने ग्वालियर में जन्म लिया है, शायद इसलिए पंडित जी मुझे बुला रहे हैं. ग्वालियर वाले ऐसा समझते हैं कि अगर बच्चा भी पैदा होता है, तो वह भी रोना, गाने से ही शुरू करता है.

पचास साल की संगीत साधना की यह परंपरा है. महोत्सव की आधी शती. अगर मैं गलत नहीं हूं, तो सवाई गंधर्व महोत्सव का आयोजन 1953 में शुरू हुआ था.  यह एक महान शिष्य द्वारा एक महान गुरु का स्मरण है. गुरु-शिष्य परंपरा हमारे संगीत का आधार है. क्या गुरुकुल परंपरा के अनुसार संगीत चलता है ? गुरु-शिष्य परंपरा के अनुसार भीमसेन जी जोशी लगातार इस महोत्सव का आयोजन करते रहे, और आज जब ये भव्य भवन बनकर तैयार है, तो मैं कहना चाहूंगा, आज मानो शिष्य ने अपने गुरु को गुरु दक्षिणा दे दी है इस भवन को बनाकर.  संगीत में बड़ी शक्ति है. जोड़ने की शक्ति. भाषा भेद भी बीच में नहीं आता. संगीत पंथ निरपेक्ष है. देश के सभी क्षेत्रों में इसका प्रभाव है और उसमें सदैव कुछ होने की क्षमता है. पंडित भीमसेन जी जोशी जैसे संगीतज्ञ आज हमारे बीच में हैं और अपनी परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं, ये बड़ी प्रसन्नता की बात है. मैं यही सोचता रहा हूं कि कार्यक्रम दोपहर में क्यों आयोजित किया गया ? दोपहर का संबंध संगीत से कम है. संगीत के लिए तो चांदनी चाहिए. लेकिन शायद कोई मजबूरी रही होगी और मुझे डर है कि मेरी वजह से यह न हो रहा हो. आते-जाते जब मैं देखता हूं, सड़क पर लोगों को चलने से रोका जाता है, तो मुझे अच्छा नहीं लगता. लेकिन आज शायद इसीलिए इस कार्यक्रम को दोपहर में रखा गया है. भारतीय संगीत को नई चुनौती से डरना नहीं है. देश के जीवन का चक्र बार-बार बदलता रहता है. और फिर एक पहलू को देखकर ऐसा लगता है, जो कुछ हुआ या होने वाला है, वह फिर बड़ी शक्ति के साथ उभरकर आता है. तो यह प्राणवान होता है, सभी को खुशी होती है. और साधना का परिणाम मिलता है.  उसके मूल में अर्थ की भावना नहीं होती. भावना होती है, तो धर्म की. जो स्थायी होता है. डॊक्टर पंडित जोशी जी हमारे बीच में हैं, हम उनका अभिनंदन करते हैं. उन्होंने शिष्य परंपरा का पालन किया है,  हम उनके आभारी हैं. उन्होंने मुझे यहां आने का अवसर दिया, इसके लिए मैं उन्हें हृदय से धन्यवाद देता हूं. मैं चाहता हूं कि उनका आशीर्वाद मुझे आगे भी प्राप्त होता रहे. और हम शास्त्रीय संगीत के रास्ते पर प्रेम के साथ, स्नेह के साथ, आगे बढ़ते रहें.
-डॉ. सौरभ मालवीय

(पुस्तक- 'राष्ट्रवादी पत्रकारिता के शिखर पुरुष अटल बिहारी वाजपेयी' से)

राष्ट्रीय संकल्प की उदघोषणा है वंदे मातरम

    महाराष्ट्र के मुंबई के विलेपार्ले में 1996 में राष्ट्रीय गीत वंदे मातरम की 150वीं जयंती के समारोह को संबोधित करते हुए श्री अटल बिहारी वा...