Friday, October 16, 2026

पुस्तक भेंट





लखनऊ। ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती भाषा विश्वविद्यालय, लखनऊ के कुलपति प्रो. अजय तनेजा जी के साथ एक सुखद एवं आत्मीय मुलाकात हुई।
इस अवसर पर उन्हें अपनी पुस्तक ‘श्रेष्ठ भारत : आत्मबोध से राष्ट्रबोध’ भेंट की। 

Thursday, October 15, 2026

शिक्षा, संस्कार और सेवा के लिए समर्पित विद्या भारती के बढ़ते कदम : डॉ. सौरभ मालवीय














लखनऊ। शिक्षा के साथ संस्कार और कौशल विकास को बढ़ावा देने के उद्देश्य से विद्या भारती निरंतर नए आयाम स्थापित कर रही है। इसी क्रम में आज सरस्वती विद्या मंदिर वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय, सेक्टर-क्यू, अलीगंज, लखनऊ में भाऊराव देवरस कौशल विकास केंद्र का उद्घाटन विद्या भारती पूर्वी उत्तर प्रदेश के क्षेत्रीय मंत्री डॉ. सौरभ मालवीय ने किया।

विद्यार्थियों को व्यावहारिक ज्ञान प्रदान करने, उनकी प्रतिभा को निखारने तथा उन्हें विभिन्न कौशलों में दक्ष बनाने के उद्देश्य से विद्या भारती ने अपने विद्यालयों में कौशल विकास कार्यक्रम संचालित करने का संकल्प लिया है। इस केंद्र के माध्यम से विद्यार्थियों को आधुनिक तकनीक और व्यावहारिक कौशल से परिचित कराने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल की गई है।

कार्यक्रम में मुख्य अतिथि डॉ. सौरभ मालवीय, संभाग निरीक्षक, कोषाध्यक्ष श्री के. आर. कनौजिया तथा विद्यालय के प्रधानाचार्य श्री संतोष कुमार सिंह ने फीता काटकर केंद्र का उद्घाटन किया। इसके उपरांत मां सरस्वती एवं मां दुर्गा के नौ स्वरूपों के समक्ष दीप प्रज्वलित कर सांस्कृतिक कार्यक्रमों का शुभारंभ किया गया। इस अवसर पर डॉ. मालवीय ने विद्यालय की एआई लैब का भी निरीक्षण किया और विद्यार्थियों के लिए आधुनिक तकनीक आधारित शिक्षा के प्रयासों का अवलोकन किया।

विद्यार्थियों को संबोधित करते हुए डॉ. सौरभ मालवीय ने ध्यान, योग और प्रार्थना के महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि प्रार्थना और वंदना हमारी भारतीय संस्कृति एवं जीवन मूल्यों से जुड़ने का माध्यम हैं। विद्यार्थियों को अपनी भारतीय पहचान, संस्कृति और ज्ञान परंपरा पर गर्व करना चाहिए। शिक्षा का उद्देश्य केवल रोजगार प्राप्त करना नहीं, बल्कि चरित्र निर्माण, आत्मविश्वास, कौशल और राष्ट्र के प्रति उत्तरदायित्व की भावना विकसित करना भी है।

उन्होंने कहा कि आधुनिक तकनीक के साथ भारतीय संस्कारों का समन्वय विद्यार्थियों को जीवन की चुनौतियों का सामना करने के लिए सक्षम बनाएगा। कौशल विकास केंद्र जैसी पहल विद्यार्थियों को आत्मनिर्भर बनाने और उनके उज्ज्वल भविष्य के निर्माण में सहायक सिद्ध होगी।

कार्यक्रम के प्रारंभ में प्रधानाचार्य श्री संतोष कुमार सिंह ने अतिथियों का परिचय कराते हुए उनका स्वागत एवं अभिनंदन किया। कार्यक्रम में विद्यालय परिवार के सदस्य एवं अन्य गणमान्यजन उपस्थित रहे।

विद्या भारती का यह प्रयास शिक्षा, संस्कार और कौशल के समन्वय से आत्मनिर्भर, चरित्रवान एवं राष्ट्रनिष्ठ युवा पीढ़ी के निर्माण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। 

टीवी पर लाइव

 



माफिया की जमीन पर गरीबों के आशियाने, यही है बदलते उत्तर प्रदेश की तस्वीर!
जिस जमीन पर कभी माफिया का कब्जा था, वहाँ आज गरीबों के सपनों का घर आकार ले रहा है।
अतीक अहमद की जमीन पर गरीबों के लिए आवास—यह सत्ता के संरक्षण से नहीं, कानून के राज और जनकल्याण की सोच से बदलाव का संदेश है।
यही है योगी राज—अवैध कब्जे से मुक्ति, गरीबों को आशियाना और सुशासन की नई पहचान!

Sunday, October 11, 2026

टीवी पर लाइव




लोकतंत्र में विपक्ष को धरना-प्रदर्शन करने और सरकार की नीतियों का विरोध करने का पूरा अधिकार है, लेकिन यह विरोध सदन, संविधान और लोकतांत्रिक मर्यादाओं के प्रति विश्वास बनाए रखते हुए होना चाहिए।

सड़क पर दबाव बनाकर राजनीति करने के बजाय सदन में तथ्यों, तर्कों और प्रमाणों के साथ अपनी बात रखना अधिक प्रभावी लोकतांत्रिक प्रक्रिया है। विरोध के ऐसे तरीकों से बचना चाहिए, जिनसे आमजन का जनजीवन प्रभावित हो, यातायात बाधित हो और नागरिकों को अनावश्यक परेशानियों का सामना करना पड़े।

लोकतंत्र में असहमति का सम्मान आवश्यक है, लेकिन जनहित और जनसुविधा की रक्षा भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।

विरोध का उद्देश्य व्यवस्था को बाधित करना नहीं, बल्कि व्यवस्था को बेहतर बनाना होना चाहिए।

सदन में संवाद, संविधान में विश्वास और जनहित को सर्वोपरि रखना ही सशक्त लोकतंत्र की पहचान है।

पुस्तक ‘श्रेष्ठ भारत : आत्मबोध से राष्ट्रबोध’ का लोकार्पण






लखनऊ। भारतीय संस्कृति, राष्ट्रीय चेतना और राष्ट्रबोध के विचारों को केंद्र में रखकर लिखी गई पुस्तक ‘श्रेष्ठ भारत : आत्मबोध से राष्ट्रबोध’ के लेखक डॉ. सौरभ मालवीय हैं। यह पुस्तक आत्मचिंतन से राष्ट्रचिंतन की ओर अग्रसर होने तथा व्यक्ति के भीतर राष्ट्रीय चेतना का विकास करने के विचार को प्रमुखता देती है।

पुस्तक का शीर्षक ‘आत्मबोध से राष्ट्रबोध’ इस विचार को अभिव्यक्त करता है कि राष्ट्र के प्रति दायित्वबोध की शुरुआत व्यक्ति के स्वयं के बोध, सांस्कृतिक जड़ों की पहचान और सामाजिक उत्तरदायित्व से होती है। भारतीय ज्ञान परंपरा, सांस्कृतिक मूल्यों और राष्ट्रीय दृष्टिकोण के संदर्भ में यह विषय समकालीन विमर्श के लिए महत्वपूर्ण है।

लेखक डॉ. सौरभ मालवीय लखनऊ विश्वविद्यालय के पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग के अध्यक्ष हैं। पत्रकारिता, लेखन और वैचारिक विमर्श के क्षेत्र में सक्रिय डॉ. मालवीय की यह पुस्तक भारत की सांस्कृतिक पहचान, राष्ट्रीय अस्मिता और समाज के प्रति नागरिकों के दायित्वों पर विचार करने का अवसर प्रदान करती है।

‘श्रेष्ठ भारत : आत्मबोध से राष्ट्रबोध’ का मूल भाव व्यक्ति निर्माण से राष्ट्र निर्माण की दिशा में आगे बढ़ना है। यह कृति आत्मचेतना, सांस्कृतिक गौरव और राष्ट्र के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण को प्रोत्साहित करने की वैचारिक पहल के रूप में प्रस्तुत है।

इस पुस्तक का प्रकाशन - शिल्पायन पब्लिशर्स नयी दिल्ली ने लिया हैं.

Friday, October 9, 2026

नवरात्रि का संदेश : नारी सशक्तीकरण


डॉ. सौरभ मालवीय 
भारतीय पर्व हमारी सांस्कृतिक विरासत के प्रतीक हैं। इनसे हमें ज्ञात होता है कि हमारी प्राचीन संस्कृति कितनी विशाल, संपन्न एवं समृद्ध है। यदि नवरात्रि की बात करें तो यह पर्व भी भारतीय संस्कृति की महानता को दर्शाता है। विगत कुछ दशकों से देश में महिला सशक्तीकरण की बात हो रही है। कुछ लोग विदेशों के उदाहरण देते हैं कि वहां की महिलाएं सशक्त हैं तथा उन्हें बहुत से अधिकार प्राप्त हैं। किंतु ये लोग अपने देश के इतिहास पर चिंतन एवं मनन नहीं करते हैं। वास्तव में भारत विश्व का एकमात्र ऐसा देश है, जहां महिलाओं को पुरुषों के समान माना गया है। उदाहरण के लिए भारत में देवियों की पूजा-अर्चना की जाती है। यहां पर उन्हें भी देवताओं के समान ही पूजा जाता है, अपितु देवियों का स्थान देवता से पहले आता है जैसे राधा कृष्ण, सीता राम आदि। भगवान शिव के साथ देवी पार्वती की भी पूजा की जाती है। भगवान राम के साथ देवी सीता की पूजा की जाती है तथा भगवान श्रीकृष्ण के साथ राधा की पूजा-अर्चना करने का विधान प्राचीन काल से ही चला आ रहा है। हमारी मान्यता के अनुसार शक्ति की देवी दुर्गा है। धन एवं समृद्धि की देवी लक्ष्मी है तथा ज्ञान की देवी सरस्वती है। कहने का अभिप्राय यह है कि मनुष्य को जीवन में जिन वस्तुओं की आवश्यकता होती है, वह सब उन्हें इन देवियों से ही तो प्राप्त होती हैं।    
नवरात्रि देवी दुर्गा को समर्पित एक महत्वपूर्ण पर्व है। नवरात्रि का पर्व वर्ष में चार बार आता है अर्थात चैत्र, आषाढ़, अश्विन, माघ। इनमें से चैत्र एवं आश्विन माह में आने वाली नवरात्रि अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है। माघ एवं आषाढ़ माह में आने वाली नवरात्रि को गुप्त नवरात्रि कहा जाता है, क्योंकि इनमें कोई सार्वजनिक उत्सव का आयोजन नहीं किया जाता है। आश्विन माह में आने वाली नवरात्रि को शारदीय नवरात्रि कहा जाता है। इसका  आरंभ अश्विन मास के शुक्ल पक्ष की प्रथम तिथि से होता है। इस दिवस पर शुभ मुहूर्त में कलश की स्थापना की जाती है। नवरात्रि में नौ दिन देवी दुर्गा के नौ रूपों की पूजा-अर्चना की जाती है।
प्रथमं शैलपुत्री च द्वितीयं ब्रह्मचारिणी।
तृतीयं चन्द्रघण्टेति कूष्माण्डेति चतुर्थकम्।।
पंचमं स्कन्दमातेति षष्ठं कात्यायनीति च।
सप्तमं कालरात्रीति महागौरीति चाष्टमम्।।
नवमं सिद्धिदात्री च नवदुर्गा: प्रकीर्तिता:।
उक्तान्येतानि नामानि ब्रह्मणैव महात्मना:।।
अर्थात देवी पहली शैलपुत्री, दूसरी ब्रह्मचारिणी, तीसरी चंद्रघंटा, चौथी कूष्मांडा, पांचवी स्कंध माता, छठी कात्यायिनी, सातवीं कालरात्रि, आठवीं महागौरी एवं नौवीं देवी सिद्धिदात्री है।

शैलपुत्री
नवरात्रि के प्रथम दिन देवी दुर्गा के प्रथम स्वरूप मां शैलपुत्री की पूजा-अर्चना की जाती है। मां शैलपुत्री को सफेद वस्तुएं अत्यंत प्रिय हैं, इसलिए उन्हें सफेद मिष्ठान का भोग लगाया जाता है। यह प्रसाद गाय के शुद्ध घी से बनाया जाता है। सफेद रंग पवित्रता एवं शांति का प्रतीक माना जाता है। जीवन में सर्वाधिक पवित्रता एवं शांति का ही महत्व है। इनके बिना सब व्यर्थ है। देवी की साधना से सुख एवं समृद्धि में वृद्धि होती है।

ब्रह्मचारिणी
नवरात्रि के दूसरे दिन देवी देवी दुर्गा के द्वितीय स्वरूप मां ब्रह्मचारिणी की पूजा-अर्चना की जाती है। मां ब्रह्मचारिणी को शक्कर एवं पंचामृत का भोग लगाया जाता है। शक्कर जीवन में मिठास का प्रतीक है। जिस प्रकार भोजन में मिष्ठान का महत्व है, उसी प्रकार जीवन में मधुर वाणी का महत्व है। मृदु भाषी व्यक्ति सबका मन मोह लेते हैं। देवी की साधना से भाग्य में वृद्धि होती है तथा आयु भी लम्बी होती है।  

चंद्रघंटा
नवरात्रि के तीसरे दिन देवी दुर्गा के तृतीय स्वरूप मां चंद्रघंटा की पूजा-अर्चना की जाती है। मां चंद्रघंटा को दुग्ध से बने मिष्ठान एवं खीर का भोग लगाया जाता है। खीर भी दुग्ध से बनाई जाती है। दुग्ध समृद्धि एवं अच्छे स्वास्थ्य का प्रतीक है। देवी की साधना से व्यक्ति बुरी शक्तियों से सुरक्षित रहता है।

कुष्मांडा
नवरात्रि के चौथे दिन देवी दुर्गा के चतुर्थ स्वरूप मां कुष्मांडा की पूजा-अर्चना की जाती है। मां कुष्मांडा को मालपुये का भोग लगाया जाता है। देवी की साधना से मनुष्य की समस्त इच्छाएं पूर्ण होती हैं।

स्कंदमाता
नवरात्रि के पांचवे दिन देवी दुर्गा के पांचवे स्वरूप स्कंदमाता की पूजा-अर्चना की जाती है। स्कंदमाता को फल विशेषकर केला अत्यंत प्रिय है, इसलिए उन्हें केले का भोग लगाया जाता है। देवी की साधना से सुख एवं एश्वर्य में वृद्धि होती है। 

कात्यायनी
नवरात्रि के छठे दिन देवी दुर्गा के छठे स्वरूप मां कात्यायनी की पूजा-अर्चना की जाती है। मां कात्यायनी को मीठे पान एवं मधु का भोग लगाया जाता है। देवी की साधना से दुखों का नाश होता है तथा जीवन में सुख का आगमन होता है।

कालरात्रि
नवरात्रि के सातवें दिन देवी दुर्गा के सातवे स्वरूप मां कालरात्रि की पूजा-अर्चना की जाती है। मां कालरात्रि को गुड़ अत्यंत प्रिय है, इसलिए उन्हें गुड़ से बने व्यंजन का भोग लगाया जाता है। देवी की साधना से समस्त नकारात्मक शक्तियों का नाश होता है तथा सकारात्मकता में वृद्धि होती है। जीवन सुखी हो जाता है। 

महागौरी
नवरात्रि के आठवें दिन देवी दुर्गा के आठवे स्वरूप मां महागौरी की पूजा-अर्चना की जाती है। मां महागौरी को नारियल अत्यंत प्रिय है, इसलिए उन्हें नारियल का भोग लगाया जाता है अर्थात नारियल अर्पित किया जाता है। देवी की साधना से व्यक्ति के रुके हुए कार्य पूर्ण होते हैं। 

सिद्धिदात्री
नवरात्रि के अंतिम दिन देवी दुर्गा के नौवें स्वरूप मां सिद्धिदात्री की पूजा-अर्चना की जाती है। इस दिन कन्या पूजन का विधान है। कन्याओं की पूजा की जाती है। उन्हें भोजन ग्रहण कराया जाता है। इसके पश्चात उनके चरण स्पर्श कर उनसे आशीर्वाद लिया जाता है। कन्याओं को प्रसाद के साथ उपहार भेंट किए जाते हैं। तदुपरांत देवी को काले चने, हलवा पूड़ी एवं खीर का भोग लगाया जाता है। देवी की साधना से व्यक्ति के समस्त पापों का नाश होता है तथा उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है।

वास्तव में नवरात्रि का पर्व नारी शक्ति का उत्सव है। प्राचीन काल से ही यह पर्व भारतीय संस्कृति में नारी शक्ति का प्रतीक रहा है। कन्या पूजन इस बात को सिद्ध करता है कि भारतीय समाज में कन्या का महत्वपूर्ण स्थान रहा है। कन्या भ्रूण हत्या तथा नवजात कन्याओं का वध कर देने जैसी बुराइयां हमारे समाज में कब और कैसे सम्मिलित हो गईं, ज्ञात ही नहीं हो पाया। निरंतर घटता लिंगानुपात अत्यंत चिंता का विषय बना हुआ है। विदेशों में भारत की जिन बुराइयों का उल्लेख कुछ लोग बड़े गर्व के साथ करते हैं, वे बुराइयों तो हमारे समाज में कभी नहीं थीं। जिस समय विश्व के अधिकांश देश अशिक्षित एवं असभ्य थे, उस समय हमारा देश शिक्षा के क्षेत्र में अग्रणी था। पुरुष ही नहीं, अपितु महिलाएं भी शिक्षित थीं। वे शास्त्रार्थ करती थीं, अस्त्र-शस्त्र चलाती थीं। देवियों ने कितने ही राक्षसों का अकेले वध किया है।

नारी को ईश्वर ने श्रेष्ठ बनाया है। अनेक मामलों में वह पुरुष से उच्च स्थान पर है। वह जन्मदात्री है। जिस प्रकार एक स्त्री अपने बालकों का पालन-पोषण कर लेती है, उस प्रकार एक पुरुष उनका पालन-पोषण नहीं कर पाता। उदाहरण के लिए यदि किसी की पत्नी की मृत्यु हो जाए, तो वह न चाहते हुए भी इसलिए विवाह कर लेगा कि बच्चों का पालन-पोषण ठीक से हो जाएगा। यदि किसी के पति की मृत्यु हो जाए, तो महिला जीविकोपार्जन के साथ-साथ बच्चों का पालन-पोषण भी कर लेती है। यदि दृष्टि डालें तो आसपास ऐसे बहुत से उदाहरण मिल जाएंगे। कहने का तात्पर्य यह है कि ईश्वर ने नारी को अत्यंत सबल बनाया है। नारी प्रत्येक क्षेत्र में अपनी योग्यता एवं प्रतिभा का सफल प्रदर्शन कर रही है।

सुखद सान्निध्य





सुखद सान्निध्य!
प्रो. मुकेश पाण्डेय जी 
कुलपति 
बुंदेलखंड विश्वविद्यालय - झांसी

पुस्तक भेंट

लखनऊ। ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती भाषा विश्वविद्यालय, लखनऊ के कुलपति प्रो. अजय तनेजा जी के साथ एक सुखद एवं आत्मीय मुलाकात हुई। इस अवसर पर उन्हे...