Tuesday, September 8, 2026

स्मार्ट गंगा सिटी परियोजना : गंगा का प्रदूषण कम होगा


देश के दस शहरों में स्मार्ट गंगा सिटी योजना शुरू की गई है। केंद्रीय जल संसाधन, नदी विकास और गंगा संरक्षण मंत्री उमा भारती और केंद्रीय शहरी विकास मंत्री वैंकेया नायडु ने 13 अगस्त, 2016 को वीडियो कांफ्रेंस के माध्यम से देश के दस प्रमुख शहरों में स्मार्ट गंगा सिटी परियोजना का प्रारंभ किया। इस योजना के लिए उत्तर प्रदेश से सबसे ज्यादा पांच शहरों मथुरा, लखनऊ, कानपुर, इलाहाबाद और वाराणसी को चुना गया है. इसके साथ ही उत्तराखंड से ऋषिकेश और हरिद्वार, बिहार से पटना, झारखंड से साहिबगंज और पश्चिम बंगाल से बैरकपुर भी इस योजना में शामिल हैं। राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन ने सीवेज उपचार के बुनियादी ढांचे के निर्माण के लिए हाइब्रिड एन्यूटी आधारित सार्वजनिक एवं निजी भागीदारी मॉडल पर कार्य के लिए प्रथम चरण में इन शहरों का चयन किया है। नमामि गंगा अभियान के अंतर्गत चलने वाली इस परियोजना का उद्देश्य इन सभी शहरों में गंगा में गिरने वाले सीवर एवं अन्य प्रदूषित जल को रोकना है। सीवर का पानी गंगा में न जाए इसके लिए एसटीपी के निर्माण पर बल दिया जा रहा है। इस योजना के अंतर्गत सीवेज उपचार के बुनियादी ढांचे का हाइब्रिड एन्यूटी आधार पर सार्वजनिक एवं निजी भागीदारी के माध्यम से निर्माण किया जाएगा और इन शहरों में गंदे पानी का शोधन करके उसे छोड़ा जाएगा।

इस अवसर पर केंद्रीय जल संसाधन, नदी विकास और गंगा संरक्षण मंत्री उमा भारती ने उज्जैन से समारोह को संबोधित करते हुए कहा कि इस कार्यक्रम की सफलता के लिए केंद्रीय शहरी विकास मंत्रालय का सहयोग बहुत जरूरी है। उन्होंने कहा कि गंगा कार्य योजना की असफलता से सबक लेकर अब हमारा मंत्रालय हाइब्रिड एन्यूटी मॉडल पर जा रहा है। पहले इस काम का खर्चा केंद्र और राज्य सरकार 70:30 के अनुपात में उठाते थे, लेकिन इस बार इस पूरे कार्यक्रम का सारा खर्च केंद्र सरकार वहन करेगी। कार्यक्रम के सुचारू कार्यान्वयन पर नजर रखने के लिए जिला स्तर पर भी निगरानी समितियों का गठन किया जाएगा। देश की कई बड़ी कंपनियों के अलावा कई विदेशी कंपनियों ने भी हाइब्रिड एन्यूटी मॉडल पर हमारे साथ काम करने की इच्छा जताई है। पहले चरण में दस शहरों को शामिल किया गया है, लेकिन धीरे-धीरे इसमें बाकी के शहर भी शामिल किए जाएंगे। इन शहरों में यह कार्यक्रम करते समय इन शहरों की नदियों की जैव विविधता और उससे जुड़ी सांस्कृतिक विरासत का पूरा ध्यान रखा जाएगा। 

समारोह को वीडियो कांफ्रेंसिंग के माध्यम से हैदराबाद से संबोधित करते हुए केंद्रीय शहरी विकास मंत्री वैंकेया नायडु ने स्थानीय निकायों से कहा कि वे इस कार्यक्रम की सफलता के लिए अपना भरपूर सहयोग दें। उनका मंत्रालय नमामि गंगे कार्यक्रम से बहुत घनिष्ठता से जुड़ा हुआ है और उन्हें उम्मीद है कि हाइब्रिड एन्यूटी मॉडल पर यह कार्यक्रम तेजी से सफलता हासिल करेगा। इस कार्यक्रम की सफलता के लिए जन भागीदारी उतनी ही जरूरी है, जितना सरकारी प्रयास। इस अवसर पर केंद्रीय जल संसाधन के विशेष सचिव डॉ. अमरजीत सिंह ने कहा कि गंगा में गिरने वाले 7300 एमएलडी अपशिष्ट में से 4200 एमएलडी के उपचार के बारे में कार्रवाई शुरू हो गई है। बाकी के 3100 एमएलडी के बारे में सर्वेक्षण का काम चल रहा है। 

इस योजना से प्रदूषित पानी को गंगा में गिरने से रोका जा सकेगा। इससे गंगा को स्वच्छ और निर्मल बनाने में सहायता मिलेगी।



(डॉ सौरभ मालवीय की पुस्तक- 'विकास के पथ पर भारत' से)

नमामि गंगे योजना : निर्मल होगी गंगा


भारतीय संस्कॄति में गंगा को पवित्र नदी माना जाता है। इसे मोक्षदायिनी भी कहा जाता है। किन्तु दुख की बात यह है कि सबके पाप धोने वाली यह पवित्र नदी दिन-प्रतिदिन प्रदूषित होती जा रही है। इस नदी को साफ करने के लिए सरकारी और गैर सरकारी स्तर पर कई बार प्रयास हुए. समय समय पर कई कार्यक्रम और योजनाएं चलाई गईं। केंद्र सरकार ने वर्ष 1984 में गंगा सफाई की एक व्यापक कार्ययोजना बनाई। इसके लिए आठ हजार करोड़ रुपये का प्रावधान भी किया गया, किन्तु सफलता नहीं मिली। 

उल्लेखनीय है कि पहले गंगा सफाई अभियान का दायित्व वन तथा पर्यावरण मंत्रालय का था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने निर्मल गंगा के लिए अलग से एक मंत्रालय बनाया, जिसका नाम जल संसाधन, नदी विकास और गंगा संरक्षण रखा गया। इस नये मंत्रालय के अंतर्गत केंद्र सरकार ने जून, 2014 में नमामि गंगे कार्यक्रम को स्वीकृति दी। उत्तर प्रदेश में गंगा के तट पर स्थित वाराणसी से संसद के लिए मई, 2014 में निर्वाचित होने के बाद प्रधानमंत्री मोदी ने कहा था, मां गंगा की सेवा करना मेरे भाग्य में है।
उन्होंने कहा कि हम सब का जीवन गंगा से जुडा हुआ है। अगर आज मां गंगा न होती तो पता नहीं हमारा पूरा भू-भाग वहां की कैसी भयंकर स्थिति होती। लेकिन उस गंगा को कभी बचाने के लिए हमने प्रयास नहीं किए, हमने उदासीनता बरती। गंगा को बचाना हमारी भावी पीढ़ियों को बचाना है। गंगा को निर्मल करेंगे, तो गंगा को अविरल करने से कोई रोक नहीं पाएगा और इसलिए सरकार अरबो-खरबो रुपया खर्च करके गंगा की सफाई पर लगी है और यह सिर्फ एक नदी का नाम नहीं है, एक बार नदियों के प्रति फिर से वही एक बार वही श्रद्धाभाव जगेगा, नदियों को बचाने की पहल चलेगी, हिन्दुस्तान की हर नदियों के प्रति जागरूकता आएगी। भारत में, भविष्य में पानी के संकट से अगर बचना है तो यही मार्ग है जिसको हमने गंभीरता से लेना होगा और इसलिए गंगा सफाई का जो अभियान चल रहा है, गंगोत्री से ले करके बंगाल सागर तक जो भी राज्य इसके साथ जुडे हैं उनके अलग-अलग भाग करके गंगा गंदी न हो, सबसे पहली प्राथमिकता उस पर दी गई है। गंगा में जाने वाले गंदे पानी को, केमिकल वाले पानी को रोकने की दिशा में अभियान चला है। आज बिहार में एक साथ अनेक विद्, इस प्रोजेक्टों का भी शिलान्यास हो रहा है, जो आने वाले दिनों में मां गंगा को हम जैसी श्रद्धाभाव रखते हैं, उसी रूप में देखने को मिलेगा और जब मां गंगा हमारे सपनों के अनुरूप होगी, तब छठ पूजा का आनंद ही कुछ और होगा, वो भक्ति का भाव भी कुछ और होगा। गंगा नदी का न केवल सांस्कृतिक और आध्यात्मिक महत्व है बल्कि देश की 40 प्रतिशत जनसंख्या गंगा नदी पर निर्भर है। यदि हम इसे साफ करने में सक्षम हो गए, तो यह देश की 40 प्रतिशत जनसंख्या  के लिए एक बड़ी मदद साबित होगी। अतः गंगा की सफाई एक आर्थिक एजेंडा भी है।
केंद्र सरकार ने गंगा नदी के प्रदूषण को समाप्त करने और नदी को पुनर्जीवित करने के लिए ‘नमामि गंगे’ नामक एक एकीकृत गंगा संरक्षण मिशन का शुभारंभ किया। केंद्रीय मंत्रिमंडल ने नदी की सफाई के लिए बजट को चार गुना करते हुए पर वित्तीय वर्ष 2019-2020 तक नदी की सफाई पर 20 हजार करोड़ रुपये खर्च करने की केंद्र की प्रस्तावित कार्य योजना को स्वीकृति दे दी और इसे 100 प्रतिशत केंद्रीय हिस्सेदारी के साथ एक केंद्रीय योजना का रूप दिया।
यह समझते हुए कि गंगा संरक्षण की चुनौती बहु-क्षेत्रीय और बहु-आयामी है और इसमें कई हितधारकों की भी भूमिका है, विभिन्न मंत्रालयों के बीच एवं केंद्र-राज्य के बीच समन्वय को बेहतर करने एवं कार्य योजना की तैयारी में सभी की भागीदारी बढ़ाने के साथ केंद्र एवं राज्य स्तर पर निगरानी तंत्र को बेहतर करने के प्रयास किए गए हैं। कार्यक्रम के कार्यान्वयन के प्रारंभिक स्तर की गतिविधियों (तत्काल प्रभाव दिखने के लिए), मध्यम अवधि की गतिविधियों (समय सीमा के पांच वर्ष के भीतर लागू किया जाना है), और लंबी अवधि की गतिविधियों (10 वर्ष के भीतर लागू किया जाना है) में विभाजित किया गया है।

प्रारंभिक स्तर की गतिविधियों के अंतर्गत नदी की उपरी सतह की सफाई से लेकर बहते हुए ठोस कचरे की समस्या को हल करने; ग्रामीण क्षेत्रों की सफाई से लेकर ग्रामीण क्षेत्रों की नालियों से आते मैले पदार्थ (ठोस एवं तरल) और शौचालयों के निर्माण; शवदाह गृह का नवीकरण, आधुनिकीकरण और निर्माण ताकि अधजले या आंशिक रूप से जले हुए शव को नदी में बहाने से रोका जा सके, लोगों और नदियों के बीच संबंध को बेहतर करने के लिए घाटों के निर्माण, मरम्मत और आधुनिकीकरण का लक्ष्य निर्धारित है। 
मध्यम अवधि की गतिविधियों के अंतर्गत नदी में नगर निगम और उद्योगों से आने वाले कचरे की समस्या को हल करने पर ध्यान दिया जाएगा। नगर निगम से आने वाले कचरे की समस्या को हल करने के लिए अगले पांच वर्षों में 2500 एमएलडी अतिरिक्त ट्रीटमेंट कैपेसिटी का निर्माण किया जाएगा। लंबी अवधि में इस कार्यक्रम को बेहतर और टिकाऊ बनाने के लिए प्रमुख वित्तीय सुधार किए जा रहे हैं। परियोजना के कार्यान्वयन के लिए वर्तमान में कैबिनेट हाइब्रिड वार्षिकी आधारित पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप मॉडल पर विचार किया जा रहा है। अगर यह स्वीकृत हो जाता है, तो विशेष प्रयोजन वाले वाहन सभी प्रमुख शहरों में रियायत का प्रबंधन करेगा, प्रयोग किए गए पानी के लिए एक बाजार बनाया जाएगा और परिसंपत्तियों की दीर्घकालिक स्थिरता सुनिश्चित की जाएगी।

औद्योगिक प्रदूषण की समस्या के समाधान के लिए बेहतर प्रवर्तन के माध्यम से अनुपालन को बेहतर बनाने के प्रयास किए जा रहे हैं। गंगा के किनारे स्थित ज्यादा प्रदूषण फैलाने वाले उद्योगों को गंदे पानी की मात्रा कम करने या इसे पूर्ण तरीके से समाप्त करने के निर्देश दिए गए हैं। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड इन निर्देशों के कार्यान्वयन के लिए कार्य योजना पहले से ही तैयार कर चुका है और सभी श्रेणी के उद्योगों को विस्तृत विचार-विमर्श के साथ समय-सीमा दे दी गई है। सभी उद्योगों को गंदे पानी के बहाव के लिए रियल टाइम ऑनलाइन निगरानी केंद्र स्थापित करना होगा।

इस कार्यक्रम के अंतर्गत इन गतिविधियों के अलावा जैव विविधता संरक्षण, वनीकरण, और पानी की गुणवत्ता की निगरानी के लिए भी कदम उठाए जा रहे हैं। महत्वपूर्ण प्रतिष्ठित प्रजातियों, जैसे गोल्डन महासीर, डॉल्फिन, घड़ियाल, कछुए, ऊदबिलाव आदि के संरक्षण के लिए कार्यक्रम पहले से ही शुरू किए जा चुके हैं। इसी तरह ‘नमामि गंगे’ के अंतर्गत जलवाही स्तर की वृद्धि, कटाव कम करने और नदी के पारिस्थितिकी तंत्र की स्थिति में सुधार करने के लिए 30 हजार हेक्टेयर भूमि पर वन लगाए जाएंगे। व्यापक स्तर पर पानी की गुणवत्ता की निगरानी के लिए 113 रियल टाइम जल गुणवत्ता निगरानी केंद्र स्थापित किए जाएंगे।
लंबी अवधि के अंतर्गत ई-फ़्लो के निर्धारण, बेहतर जल उपयोग क्षमता, और सतही सिंचाई की क्षमता को बेहतर बना कर नदी का पर्याप्त प्रवाह सुनिश्चित किया जाएगा। इसका उल्लेख करना आवश्यक है कि गंगा नदी की सफ़ाई इसके सामाजिक-आर्थिक और सांस्कृतिक महत्व और विभिन्न उपयोगों के लिए इसका दोहन करने के कारण अत्यंत जटिल है। विश्व में कभी भी इस तरह का जटिल कार्यक्रम कार्यान्वित नहीं किया गया है और इसके लिए देश के सभी क्षेत्रों और हरेक नागरिक की भागीदारी आवश्यक है। विभिन्न तरीके हैं जिसके माध्यम से हम सभी गंगा नदी की सफ़ाई में अपना योगदान दे सकते हैं:
विशाल जनसंख्या और इतनी बड़ी एवं लंबी नदी गंगा की गुणवत्ता को बहाल करने के लिए भारी निवेश की आवश्यकता है। सरकार ने पहले ही बजट को चार गुना कर दिया है, लेकिन अभी भी आवश्यकताओं के हिसाब से यह पर्याप्त नहीं होगा। स्वच्छ गंगा निधि बनाई गई है, जिसमें आप सभी गंगा नदी को साफ़ करने के लिए धनराशि का योगदान कर सकते हैं।
हममें से अधिकांश को यह पता नहीं है कि हमारे द्वारा इस्तेमाल किया गया पानी और हमारे घरों की गंदगी अंततः नदियों में ही जाती है यदि उसका सही से निपटान न किया गया हो। सरकार पहले से ही नालियों से संबंधित इंफ्रास्ट्रक्चर का निर्माण कर रही है, लेकिन नागरिक कचरे और पानी के उपयोग को कम कर सकते हैं। उपयोग किए गए पानी, जैविक कचरे एवं प्लास्टिक की रिकवरी और इसके पुनः उपयोग से इस कार्यक्रम को काफ़ी लाभ मिल सकता है।

राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन (एनएमसीजी) की कार्यकारी समिति ने गंगा को स्वच्छ बनाने के अभियान में तेजी लाने के लिए लगभग 19 अरब रुपये लागत वाली परियोजनाओं को स्वीकृति प्रदान की थी। कार्यकारी समिति की 2 मार्च, 2017 को हुई बैठक में स्वीकृत की गई 20 परियोजनाओं में से 13 उत्तराखंड से सम्बद्ध हैं, जिनमें नए मलजल उपचार संयंत्रों की स्थापना, मौजूदा सीवर उपचार संयंत्रों का उन्नयन और हरिद्वार में मलजल नेटवर्क कायम करने जैसे कार्य शामिल हैं। इन सभी पर लगभग 415 करोड़ रुपये की लागत आएगी। हरिद्वार देश के सर्वाधिक पवित्र शहरों में से एक है, जहां हर वर्ष लाखों श्रद्धालु आते हैं। अनुमोदित योजना का लक्ष्य न केवल शहर के 1.5 लाख स्थानीय निवासियों द्वारा, बल्कि विभिन्न प्रयोजनों के लिए इस पवित्र स्थान की यात्रा करने वाले लोगों द्वारा उत्सर्जित मलजल का उपचार भी करना है। इन सभी परियोजनाओँ के लिए केंद्र सरकार द्वारा पूर्ण वित्त पोषण किया जाएगा। यहं तक कि इन परियोजनाओं के प्रचालन और रख-रखाव का खर्च भी केंद्र सरकार वहन करेगी।

उत्तराखंड में अनुमोदित अन्य परियोजनाओं में से चार परियोजनाएं अलकनंदा नदी का प्रदूषण दूर करने से संबंधित है, ताकि नीचे की ओर नदी की धार का स्वच्छतर प्रवाह सुनिश्चित किया जा सके।  इसमें गंदे पानी के नालों को नदी में जाने से रोकने के लिए उनका मार्ग बदलना, बीच मार्ग में अवरोधक संयंत्र लगाना और साथ ही चार महत्वपूर्ण स्थानों जोशीमठ, रुद्रप्रयाग, कर्णप्रयाग और कीर्तिनगर में नये लघु एसटीपीज़ लगाना शामिल है, जिन पर लगभग 78 करोड़ रुपये की लागत आएगी। इनके अलावा गंगा का प्रदूषण दूर करने के लिए ऋषिकेश में 158 करोड़ रुपये से अधिक की लागत वाली एक बड़ी परियोजना का अनुमोदन किया गया है। गंगा जैसे ही पर्वत से उतरकर मैदानी भाग में प्रवेश करती है, तो वहीं ऋषिकेश से नगरीय प्रदूषक गंगा में मिलने शुरू हो जाते हैं। गंगा को इन प्रदूषकों से छुटकारा दिलाने के लिए ऋषिकेश में यह सर्व-समावेशी परियोजना शुरू करने को हरी झंडी दिखाई गई है। इससे न केवल सभी शहरी नालों को ऋषिकेश में गंगा में जाने से रोका जा सकेगा, बल्कि उत्सर्जित जल को उपचार के माध्यम से फिर से इस्तेमाल योग्य भी बनाया जाएगा। ऋषिकेश संबंधी इस विशेष परियोजना में लक्कड़घाट पर 26 एमएलडी क्षमता के नये एसटीपी का निर्माण किया जाएगा, जिसके लिए ऑनलाइन निगरानी प्रणाली की भी व्यवस्था है।

राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में 665 करोड़ रुपये की अनुमानित लागत से उत्कृष्ट प्रदूषक मानकों के साथ 564 एमएलडी क्षमता के अत्याधुनिक ओखला मलजल उपचार संयंत्र के निर्माण की परियोजना भी अनुमोदित की गई है। यह संयंत्र मौजूदा एसटीपी फेज़- I, II, III और IV का स्थान लेगा। इसके अलावा पीतमपुरा और कोंडली में 100 करोड़ रुपये से अधिक अनुमानित लागत वाली नई मलजल पाइप लाइनें बिछाने की दो परियोजनाएं भी स्वीकृत की गई हैं, ताकि रिसाव रोका जा सके।

पटना में कर्मालिचक और झारखंड में राजमहल में 335 करोड़ रुपये से अधिक लागत से मलजल निकासी संबंधी कार्यों का भी कार्य समिति की बैठक में अनुमोदन किया गया। वाराणसी में, जहां वर्ष भर लाखों तीर्थ यात्री आते हैं, गंगा के प्रदूषण की समस्या का समाधान करने के लिए सार्वजनिक-निजी-भागीदारी यानी पीपीपी मॉडल वाली 151 करोड़ रुपये की परियोजना का भी कार्यकारिणी की बैठक में अनुमोदन किया गया। 

उल्लेखनीय है कि राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन (एनएमसीजी) ने भौगोलिक सूचना प्रणाली (जीआईएस) प्रौद्योगिकी का उपयोग करके गंगा कायाकल्प कार्य को पूरा करने के उद्देश्य से 1767 में गठित भारत के सबसे पुराने विभाग, भारतीय सर्वेक्षण विभाग को अपने साथ जोड़ा है। इस परियोजना को कार्यकारी समिति की बैठक में स्वीकृत किया गया था और इसकी अनुमानित लागत 86.84 करोड़ रुपये है। एनएमसीजी का लक्ष्य राष्ट्रीय/राज्य/स्थानीय स्तर पर योजना निर्माण तथा इसका कार्यान्वयन है। परियोजना में डिजीटल इलिवेशन मॉडल (डीईएम) प्रौद्योगिकी का उपयोग शामिल है, जो सटीक आंकड़ा संग्रह सुनिश्चित करता है। यह नदी-बेसिन प्रबंधन योजना का एक महत्त्वपूर्ण घटक है। डीईएम प्रौद्योगिकी पूरे क्षेत्र की स्थलाकृति की पहचान करता है। इससे नीति निर्माता आसानी से उपलब्ध आंकड़ों का विश्लेषण कर सकते हैं। इस प्रकार यह नीति निर्माण प्रक्रिया को सहायता प्रदान करता है। इस तकनीक से महत्त्वपूर्ण स्थानों की पहचान की जा सकती है। भौगोलिक सूचना प्रणाली प्रौद्योगिकी का उपयोग विकेंद्रीकरण भी सुनिश्चित करेगा। संग्रह किये गए आंकड़ों तथा सरकार द्वारा उठाए गए कदमों की जानकारी पोर्टल व मोबाईल एप के माध्यम से स्थानीय लोगों के साथ साझा की जा सकती है। स्थानीय लोग अपनी प्रतिक्रिया दे सकते हैं। इस प्रकार यह आपसी संवाद सुलभ करेगा तथा एक पारदर्शी मंच साबित होगा। प्रभावी निर्वहन प्रबंधन के लिए औद्योगिक, व्यावसायिक और सभी अन्य प्रकार की संस्थाओं से निकलने वाले सीवेज की मैपिंग की जाएगी। भौगोलिक सूचना प्रणाली प्रौद्योगिकी से नदी के दोनों किनारों पर प्रस्तावित उच्च क्षमता वाली संरक्षित क्षेत्रों के नियमन में सहायता मिलेगी।
राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन में गंगा बेसिन राज्यों उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड व पश्चिम बंगाल के राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों को सुदृढ़ बनाने से संबंधित एक परियोजना को स्वीकृति दी है, ताकि वे समय-समय पर जल की गणवत्ता सत्यापित कर सकें। प्रदूषण मूल्यांकन और जल गुणवत्ता निगरानी के लिए प्रयोगशालाओं में आधुनिक उपकरण लगाए जाएंगे तथा प्रशिक्षित विज्ञानकर्मियों को नियुक्त किया जाएगा। राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों को सुदृढ़ बनाने की परियोजना की अनुमानित लागत पांच वर्षों के लिए 85.97 करोड़ रुपये है।
पश्चिम बंगाल में हुगली-चिनसुरह और महेशतला नगरपालिकाओं में सीवेज अवसंरचना को विकसित करने के लिए 358.43 करोड़ रुपये स्वीकृत किए गए हैं। इन दोनों परियोजनाओं के पूरे होने से 56 एलएलडी सीवेज पानी सीधे गंगा में बहने से रुक जाएगा।
महेशतला एक प्रमुख शहर है और यह वृहत कोलकाता का एक हिस्सा है। महेशतला परियोजना में पृथक सीवर नेटवर्क (27 किलोमीटर), एक एसटीजी (26 एमएलडी), मौजूदा बुनियादी ढांचे की मरम्मत कार्य और 15 वर्षों तक संचालन एवं रखरखाव आदि शामिल हैं। इनकी कुल लागत 198.43 करोड़ रुपये है। 160 करोड़ रूपये की लागत से हुगली-चिनसुरह परियोजना में एक एसटीजी का निर्माण (29.3 एमएलडी), 20 किलोमीटर सीवर लाइन का निर्माण, दो पंपिंग स्टेशनों का निर्माण, मौजूदा बुनियादी ढांचे का मरम्मत कार्य तथा 15 वर्षों तक संचालन एवं रखरखाव आदि शामिल हैं। ये दोनों परियोजनाएं पीपीपी मॉडल आधारित हाइब्रिड एन्यूटी के अंतर्गत स्वीकृत की गई हैं। 531.24 करोड़ रुपये की लागत वाली ये चार नई परियोजनाएं राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन की ग्यारहवीं कार्यकारी समिति की बैठक में स्वीकृत की गई थीं। 

गंगा की सफाई का दायित्व केवल सरकार का ही नहीं है, अपितु सबको इसे स्वच्छ रखने में अपनी भूमिका का निर्वाह करना चाहिए।



(डॉ सौरभ मालवीय की पुस्तक- 'विकास के पथ पर भारत' से)

Sunday, September 6, 2026

'श्रेष्ठ भारत : आत्मबोध से राष्ट्रबोध' का अवलोकन





मेरे द्वारा लिखित पुस्तक ‘श्रेष्ठ भारत : आत्मबोध से राष्ट्रबोध’ का उत्तर प्रदेश सरकार के माननीय कैबिनेट मंत्री श्री स्वतंत्रदेव सिंह जी द्वारा आत्मीयता एवं रुचिपूर्वक अवलोकन।

यह मेरे लिए अत्यंत सुखद और गौरवपूर्ण क्षण है। पुस्तक के माध्यम से आत्मबोध से राष्ट्रबोध की यात्रा और श्रेष्ठ भारत के निर्माण की भारतीय दृष्टि को समाज के सामने रखने का प्रयास किया गया है।

Saturday, September 5, 2026

शिक्षक केवल ज्ञान नहीं, जीवन का मार्ग भी दिखाते हैं : डॉ. सौरभ मालवीय











लखनऊ। शिक्षक दिवस के अवसर पर महामना सरस्वती विद्या मंदिर में शिक्षक सम्मान एवं समारोह का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में डॉ. सौरभ मालवीय ने कहा कि शिक्षक केवल विद्यार्थियों को विषय का ज्ञान देने का कार्य नहीं करते, बल्कि वे उनके व्यक्तित्व निर्माण, संस्कार और चरित्र निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
उन्होंने कहा कि शिक्षा मनुष्य को ज्ञान देती है, जबकि शिक्षक उस ज्ञान को जीवन के उद्देश्य से जोड़ने का कार्य करता है। शिक्षक विद्यार्थियों को कर्तव्य पथ पर आगे बढ़ने, चुनौतियों का सामना करने और समाज एवं राष्ट्र के प्रति अपने दायित्वों का निर्वहन करने की प्रेरणा देता है।
डॉ. मालवीय ने कहा कि आज शिक्षा के क्षेत्र में तकनीक, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और डिजिटल माध्यमों का प्रभाव तेजी से बढ़ रहा है। ऐसे समय में शिक्षक की भूमिका और अधिक महत्वपूर्ण हो गई है। तकनीक ज्ञान का माध्यम हो सकती है, लेकिन संस्कार, संवेदना, विवेक और जीवन-मूल्यों का निर्माण शिक्षक ही कर सकता है।
उन्होंने कहा कि भारतीय शिक्षा परंपरा में गुरु का स्थान सदैव सर्वोच्च रहा है। हमारी शिक्षा व्यवस्था का उद्देश्य केवल रोजगार प्राप्त करना नहीं, बल्कि ऐसे नागरिक तैयार करना होना चाहिए जो ज्ञानवान होने के साथ-साथ संवेदनशील, संस्कारवान और राष्ट्र के प्रति समर्पित हों।
कार्यक्रम में विद्यालय के आचार्यों का सम्मान किया गया। विद्यार्थियों ने शिक्षक दिवस के महत्व पर अपने विचार व्यक्त किए तथा सांस्कृतिक प्रस्तुतियां दीं। विद्यालय परिवार की ओर से शिक्षकों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हुए उनके योगदान को सराहा गया।

Friday, September 4, 2026

हज नीति : महिलाएं अकेले हज करेंगी


किसी भी धर्म के लोगों की इच्छा होती है कि वे अपने तीर्थों की यात्रा पर जाएं। केन्द्र सरकार सभी की धार्मिक भावनाओं को ध्यान में रखते हुए उन्हें तीर्थ यात्रा पर भेजने के लिए हर संभव प्रयास कर रही है। ये केन्द्र सरकार के प्रयासों का ही परिणाम है कि इस वर्ष 2018 में जहां रिकॉर्ड संख्या में यात्री हज पर जा रहे हैं, वहीं महिलाएं भी बिना पुरुष साथी के हज पर जा रही हैं। भारत से प्रति वर्ष लगभग 1।70 लाख लोग हज यात्रा पर जाते हैं। सऊदी अरब ने पांच हज़ार और यात्रियों की अनुमति दे दी है। इसलिए इस साल यह संख्या 1.75 लाख हो गई है। 

केंद्रीय अल्पसंख्यक मामले मंत्री मुख्तार अब्बास नकवी के अनुसार आजादी के बाद पहली बार इस वर्ष भारत से रिकॉर्ड 1,75,025 मुस्लिम तीर्थयात्री हज पर जाएंगे और वह भी बिना किसी अनुदान के। केन्द्र  सरकार भारत का हज कोटा लगातार दूसरे वर्ष बढ़ा पाने में कामयाब हो पाई है।
हज के लिए कुल 3,55,604 आवेदन प्राप्त हुए थे, जिनमें 1,89,217 पुरुष एवं 1,66,387 महिला आवेदक शामिल थे। इस वर्ष कुल 1,28,002 मुस्लिम तीर्थयात्री भारत की हज समिति के माध्यम से हज पर जाएंगे, जिनमें 47 प्रतिशत महिलाएं शामिल हैं। 47,023 हज तीर्थयात्री निजी टूर ऑपरेटरों के माध्यम से हज पर जाएंगे।
इसके अतिरिक्त भारत से पहली बार, मुस्लिम महिलाएं बिना ‘मेहराम‘ (पति, पिता या भाई) के हज यात्रा पर जाएंगी। कुल 1308 महिलाओं ने बिना मेहराम के हज यात्रा के लिए आवेदन किया है और इनमें से सभी महिलाओं को लॉटरी स्स्टिम से छूट दे दी गई है और हज पर जाने की अनुमति दी गई है।

उल्लेखनीय है कि अब किसी मुस्लिम महिला को बिना किसी मेहरम (पति, पिता या भाई) के स्वतंत्र रूप से हज यात्रा की अनुमति होगी। सऊदी अरब 45 और इससे अधिक उम्र की महिलाओं को हज के लिए प्रवेश की अनुमति देता है। 45 साल की उम्र पार चुकी 4 या उससे अधिक मुस्लिम महिलाएं एक साथ हज यात्रा पर जा सकती हैं। इससे पहले कोई भी मुस्लिम महिला मेहरम (पति, पिता या भाई) अर्थात अपने खून के रिश्ते वाले रिश्तेदार के बिना हज पर नहीं जा सकती थी। 

केंद्र सरकार ने हज यात्रा के बारे में नई नीति बनाने के लिए पूर्व सिविल अधिकारी अफजल अमानुल्लाह की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया है। इस छह सदस्यीय हज समिति ने 2018 से 2022 के लिए एक मसौदा तैयार किया है। इसमें कुछ सुझाव दिए गए हैं, जैसे 45 वर्ष की आयु से अधिक महिला को मेहरम के बिना हज यात्रा करने की अनुमति दी जाए और हज सब्सिडी समाप्त की जाए। इन सुझावों को केंद्र सरकार ने स्वीकार कर लिया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने मन की बात में इस निर्णय की घोषणा की थी। इससे मुस्लिम महिलाओं में प्रसन्नता की लहर दौड़ गई थी। 
  
केंद्र सरकार की पारदर्शिता के प्रति प्रतिबद्धता एवं किराये में अनुचित बढ़ोतरी रोकने के लिए एयरलाइंस को दिए गए कठोर आदेश से यह सुनिश्चित हुआ है कि हज 2018 के हवाई जहाज के किराये में इस वर्ष उल्लेखनीय कमी आई है।

हज प्रक्रिया को पूरी तरह ऑनलाइन/डिजिटल बनाए जाने से पूरी हज प्रक्रिया पारदर्शी और हज तीर्थयात्रियों के अनुकूल बन गई है। नई हज नीति के अनुसार यात्रियों को देश में बेहतर सुविधाएं दिए जाने पर बल दिया गया है। इसके लिए हज रवानगी स्थलों की संख्या 21 से घटाकर नौ कर दी गई, जिनमें दिल्ली, लखनऊ, कोलकाता, अहमदाबाद, मुंबई, चेन्नई, हैदराबाद, बेंगलुरू और कोच्चि शामिल हैं।

केन्द्र सरकार की नई हज नीति के अच्छे परिणाम सामने आ रहे हैं। अब वे महिलाएं भी हज यात्रा कर सकेंगी, जो अकेली रहती हैं या जिनके परिवार में कोई पुरुष नहीं है।



(डॉ सौरभ मालवीय की पुस्तक- 'विकास के पथ पर भारत' से)

शादी शगुन योजना : लड़कियां खुशहाल होंगी


मुस्लिम समाज में लड़कियों की स्थिति दयनीय है. शिक्षा के मामले में भी उनकी स्थिति अच्छी नहीं है.  गरीबी के कारण भी मुस्लिम लड़कियां अपनी शिक्षा जारी नहीं रख पातीं. किसी भी समाज की समृद्धि के लिए शिक्षा अति आवश्यक है. केन्द्र सरकार मुस्लिम लड़कियों को शिक्षित करना चाहती है, ताकि उनके जीवन स्तर में सुधार हो सके. 

मुस्लिम लड़कियों को उच्च शिक्षा के लिए प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से केंद्र सरकार ने एक योजना को स्वीकृति दी है. शादी शगुन नामक इस योजना के अंतर्गत सभी ग्रेजुएट मुस्लिम लड़कियों को 51 हजार रुपये तक की आर्थिक सहायता विवाह के उपहार के रूप में प्रदान की जाएगी। यह योजना देश के सभी राज्यों में लागू की गई है। मुस्लिम लड़कियां जो अपनी शादी से पहले किसी भी वर्ग में अपनी ग्रेजुएट स्तर की पढ़ाई पूरी कर लेती हैं, वे इस शादी शगुन योजना का लाभ उठाने के लिए योग्य होंगी। ऐसी मुस्लिम वर्ग की लड़कियां जिन्होंने स्नातक स्तर की परीक्षाएं छोड़ दी हैं। उन्हें भी इस योजना का लाभ नहीं मिल पाएगा।

उल्लेखनीय है कि केंद्रीय अल्पसंख्यक कार्य मंत्रालय की अधीनस्थ संस्था ‘मौलाना आजाद एजुकेशन फाउंडेशन’ द्वारा सरकार को शादी शगुन योजना का प्रस्ताव दिया गया था। इस योजना को अल्पसंख्यक मंत्रालय से भी स्वीकृति मिल गई है। इस योजना का उद्देश्य अल्पसंख्यक समूहों में उच्च शिक्षा को प्रोत्साहित करना है। केन्द्र सरकार की यह योजना विशेष रूप से मुस्लिम समुदाय की लड़कियों को उच्च शिक्षा के लिए प्रेरित करने के लिए एक अच्छा कदम है। अल्पसंख्यक समुदायों में से कई लड़कियां अपनी ग्रेजुएट स्तर की पढ़ाई पूरी करने का अवसर प्राप्त नहीं कर पाती हैं और 18 वर्ष की आयु पूरी करने से पहले शादी कर लेती हैं। मुस्लिम लड़कियों की शिक्षा को ध्यान में रखते हुए केंद्र सरकार ने मौलाना आजाद शिक्षा फाउंडेशन की सिफारिश पर शादी शगुन योजना को प्रारंभ करने का निर्णय लिया है।

मुस्लिम लड़कियों में शिक्षा की स्थिति अच्छी नहीं है, लेकिन मौलाना आजाद शिक्षा फाउंडेशन और केंद्र सरकार के इस कदम से इस लक्ष्य को हासिल करने में सहायता मिलेगी। शादी शगुन योजना मौजूदा बेगम हजरत महल छात्रवृत्ति में एक अतिरिक्त लाभ है, जो छह अधिसूचित अल्पसंख्यक समुदायों– मुस्लिम, ईसाई, सिख, बौद्ध, जैन और पारसी से संबंधित छात्रों को दी जाती है।
इस योजना के योग्य होने के लिए मुस्लिम लड़कियों को शादी से पहले अपनी ग्रेजुएशन की शिक्षा पूरी करनी होगी। इस योजना के लिए एक मान्यता प्राप्त विश्वविद्यालय या  कॉलेज से उत्तीर्ण ग्रेजुएट डिग्री आवश्यक है। मौलाना आजाद फाउंडेशन द्वारा वित्त पोषित बेगम हजरत महल छात्रवृत्ति का लाभ लेने वाली लड़कियां भी इस योजना के लिए योग्य हैं। शादी शगुन योजना का लाभ लेने के लिए ऑनलाइन भी आवेदन किया जा सकता है. 

गरीबी के कारण भी मुस्लिम लड़कियां विद्यालय नहीं जा पातीं. जो लड़कियां विद्यालय जाती हैं, उन्हें भी बीच में पढ़ाई छोड़नी पड़ती है. ऐसे में वे चाहकर भी उच्च शिक्षा प्राप्त नहीं कर पातीं. उल्लेखनीय है कि कुछ समय पूर्व अल्पसंख्यक कार्य मंत्री मुख्तार अब्बास नकवी की अध्यक्षता में हुई मौलाना आजाद शिक्षा फाउंडेशन  की बैठक में लड़कियों को दी जाने वाली छात्रवृत्ति के संदर्भ में कुछ निर्णय किए गए, जिनमें शादी शगुन योजना प्रमुख है। इसके अतिरिक्त यह भी निर्णय लिया गया कि अब नौंवी और दसवीं कक्षा में पढ़ाई करने वाली मुस्लिम बच्चियों को 10 हजार रूपये की राशि प्रदान की जाएगी। अब तक ग्यारहवीं और बारहवीं कक्षा में पढ़ाई करने वाली मुस्लिम लड़कियों को 12 हजार रूपये की छात्रवृत्ति मिल रही थी।

इस योजना से उन समुदायों की लड़कियों में शिक्षा को प्रोत्साहन मिलेगा, जो अब तक शिक्षा से वंचित थीं. इतना ही नहीं, लड़कियों के विवाह के समय उनके माता-पिता को आर्थिक सहायता भी प्राप्त होगी. देश मंा ऐसी योजनाओं की अति आवश्यकता है.


(डॉ सौरभ मालवीय की पुस्तक- 'विकास के पथ पर भारत' से)

बैठक




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