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Tuesday, November 25, 2025

भारतीय संविधान भारतीय जीवन दर्शन का ग्रंथ है


डॉ. सौरभ मालवीय
किसी भी देश के लिए एक विधान की आवश्यकता होती है। देश के विधान को संविधान कहा जाता है। यह अधिनियमों का संग्रह है। भारत के संविधान को विश्व का सबसे लम्बा लिखित विधान होने का गौरव प्राप्त है। भारतीय संविधान हमारे देश की आत्मा है। इसका देश से वही संबंध है, जो आत्मा का शरीर से होता है।

भारत का संविधान 26 नवम्बर 1949 को बनकर पूर्ण हुआ था। चूंकि डॉ. भीमराव आम्बेडकर संविधान सभा के प्रारूप समिति के अध्यक्ष थे, इसलिए भारत सरकार द्वारा उनकी 125वीं जयंती वर्ष के रूप में 26 नवम्बर 2015 को प्रथम बार संविधान दिवस संपूर्ण देश में मनाया गया। उसके पश्चात 26 नवम्बर को प्रत्येक वर्ष संविधान दिवस मनाया जाने लगा। इससे पूर्व इसे राष्ट्रीय विधि दिवस के रूप में मनाया जाता था। संविधान सभा द्वारा देश के संविधान को 2 वर्ष 11 माह 18 दिन में पूर्ण किया गया था। इस पर 114 दिन तक चर्चा हुई तथा 12 अधिवेशन आयोजित किए गए। भारतीय संविधान को बनाने में लगभग एक करोड़ की लागत आई थी। भारतीय संविधान में डॉ. राजेंद्र प्रसाद को 11 दिसंबर 1946 में स्थाई अध्यक्ष मनोनीत किया गया था। भारतीय संविधान पर 284 लोगों ने हस्ताक्षर किए थे। यह 26 नवम्बर 1949 को पूर्ण कर राष्ट्र को समर्पित किया गया। इसके पश्चात 26 जनवरी 1950 से देश में संविधान लागू किया गया। इससे पूर्व देश में भारत सरकार अधिनियम-1935 का कानून लागू था। कोई भी वस्तु पूर्ण नहीं होती है। समय के अनुसार उसमें परिवर्तन होते रहते हैं। भारतीय संविधान लागू होने के पश्चात इसमें 100 से अधिक संशोधन किए जा चुके हैं। ऐसा भविष्य में भी होने की पूर्ण संभावना है।

भारतीय संविधान में सरकार के अधिकारियों के कर्तव्य एवं नागरिकों के अधिकारों के बारे में विस्तार से बताया गया है। संविधान सभा के कुल सदस्यों की संख्या 389 थी। इनमें 292 ब्रिटिश प्रांतों के 4 चीफ कमिश्नर थे, जबकि 93 सदस्य देशी रियासतों के थे। विशेष बात यह है कि देश की स्वतंत्रता के पश्चात संविधान सभा के सदस्य ही देश की संसद के प्रथम सदस्य बने थे। देश की संविधान सभा का चुनाव भारतीय संविधान के निर्माण के लिए ही किया गया था। भारतीय संविधान के अनुसार केंद्रीय कार्यपालिका का संवैधानिक प्रमुख राष्ट्रपति होता है। भारतीय संविधान का निर्माण करने वाली संविधान सभा का गठन 19 जुलाई 1946 को किया गया था। संविधान के कुछ अनुच्छेदों को 26 नवंबर 1949 को पारित किया गया, जबकि शेष अनुच्छेदों को 26 जनवरी 1950 को लागू किया गया।
 
संविधान की विशेषता
भारत एक विशाल देश है। इसमें विभिन्न संस्कृतियों के लोग निवास करते हैं। यहां विभिन्न संप्रदायों, पंथों, जातियों आदि के लोग हैं। उनके रीति-रिवाज, भाषाएं, रहन-सहन एवं खान-पान भी भिन्न-भिन्न हैं। इस सबके मध्य वे आपस में मिलजुल कर रहते हैं। वास्तव में यही भारत का स्वभाव है। भारतीय संविधान में भारत के नागरिकों को छह मौलिक अधिकार प्रदान किए गए हैं, जिनका वर्णन अनुच्छेद 12 से 35 के मध्य किया गया है। इनमें समानता का अधिकार, स्वतंत्रता का अधिकार, शोषण के विरुद्ध अधिकार,  धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार, संस्कृति और शिक्षा से संबंधित अधिकार एवं संवैधानिक उपचारों का अधिकार सम्मिलित है। उल्लेखनीय है कि पहले संविधान में सात मौलिक अधिकार थे, जिसे ‘44वें संविधान संशोधन- 1978 के अंतर्गत हटा दिया गया। सातवां मौलिक अधिकार संपति का अधिकार था। मूल अधिकार का एक दृष्टांत है- "राज्य नागरिकों के बीच परस्पर विभेद नहीं करेगा।“ भारतीय संविधान में भी किसी के साथ किसी भी प्रकार का भेद नहीं किया जाता। यही इसकी विशेषता है।  
 
ऋषि परम्परा का धर्मशास्त्र
भारतीय संविधान "हम भारत के लोगों" के लिए हमारी अद्वितीय सांस्कृतिक विरासत जनित स्वतंत्रता एवं समानता के आदर्श मूल्यों के प्रति एक राष्ट्र के रूप में हमारी प्रतिबद्धता का परिचायक है। वर्तमान के आधुनिक भारत की संकल्पना के समय संविधान निर्माताओं ने इसी सांस्कृतिक विरासत को उसके मूल स्वरूप में अक्षुण्ण रखने के ध्येय से भारतीय संविधान की मूल प्रतिलिपि में सांस्कृतिक एवं ऐतिहासिक महत्व के रुचिकर चित्रों को स्थान दिया, जो मूलतः भारतीय संविधान के भारतीय चैतन्य को ही परिभाषित करते हैं। भारतीय ज्ञान परम्परा के अलोक में निर्मित भारतीय संविधान भारत की ऋषि परम्परा का धर्मशास्त्र है। भारतीय जीवन दर्शन का ग्रंथ है।
भारत एक लोकतांत्रिक देश है। यहां सबका सम्मान किया जाता है। वसुधैव कुटुम्बकम भारतीय संस्कृति का मूल आधार है। यह सनातन धर्म का मूल संस्कार है। यह एक विचारधारा है। महा उपनिषद सहित कई ग्रंथों में इसका उल्लेख मिलता है।
अयं निजः परोवेति गणना लघुचेतसाम् ।
उदारचरितानां वसुधैव कुटुम्बकम् ।।
अर्थात यह मेरा अपना है और यह नहीं है, इस तरह की गणना छोटे चित्त वाले लोग करते हैं। उदार हृदय वाले लोगों की तो संपूर्ण धरती ही परिवार है। कहने का अभिप्राय है कि धरती ही परिवार है। यह वाक्य भारतीय संसद के प्रवेश कक्ष में भी अंकित है।
निसंदेह भारत के लोग विराट हृदय वाले हैं। वे सबको अपना लेते हैं। विभिन्न संस्कृतियों के पश्चात भी सब आपस में परस्पर सहयोग भाव बनाए रखते हैं। एक-दूसरे के साथ मिलजुल कर रहते हैं। यही हमारी भारतीय संस्कृति की महानता है।      
 
उल्लेखनीय है कि भारत का संविधान बहुत ही परिश्रम से तैयार किया गया है। इसके निर्माण से पूर्व विश्व के अनेक देशों के संविधानों का अध्ययन किया गया। तत्पश्चात उन पर गंभीर चिंतन किया गया। इन संविधानों में से उपयोगी संविधानों के शब्दों को भारतीय संविधान में सम्मिलित किया गया। आजादी के बाद भारत का वैचारिक दृष्टिकोण भारतीय ज्ञान परम्परा के आलोक में विकास के पाठ पर खड़ा करने का प्रयास होना चाहिए था।
भारतीय संविधान की उद्देशिका
हम, भारत के लोग, भारत को एक संपूर्ण प्रभुत्व संपन्न, समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने के लिए, तथा उसके समस्त नागरिकों को:
सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय,
विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता,
प्रतिष्ठा और अवसर की समता, प्राप्त कराने के लिए,
तथा उन सब में,
व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता और अखण्डता सुनिश्चित कराने वाली, बंधुता बढ़ाने के लिए,
दृढ़ संकल्पित होकर अपनी संविधानसभा में आज तारीख 26 नवम्बर 1949 ई॰ (मिति मार्गशीर्ष शुक्ल सप्तमी, संवत दो हजार छह विक्रमी) को एतद्द्वारा इस संविधान को अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित करते हैं।
 
भारतीय संविधान की इस उद्देशिका में भारत की आत्मा निवास करती है। इसका प्रत्यके शब्द एक मंत्र के समान है। हम भारत के लोग- से अभिप्राय है कि भारत एक प्रजातांत्रिक देश है तथा भारत के लोग ही सर्वोच्च संप्रभु है। इसी प्रकार संप्रभुता- से अभिप्राय है कि भारत किसी अन्य देश पर निर्भर नहीं है। समाजवादी- से अभिप्राय है कि संपूर्ण साधनों आदि पर सार्वजनिक स्वामित्व या नियंत्रण के साथ वितरण में समतुल्य सामंजस्य। ‘पंथनिरपेक्ष राज्य’ शब्द का स्पष्ट रूप से संविधान में कोई उल्लेख नहीं है। लोकतांत्रिक- से अभिप्राय है कि लोक का तंत्र अर्थात जनता का शासन। गणतंत्र- से अभिप्राय है कि एक ऐसा शासन जिसमें राज्य का मुखिया एक निर्वाचित प्रतिनिधि होता है। न्याय- से आशय है कि सबको न्याय प्राप्त हो। स्वतंत्रता- से अभिप्राय है कि सभी नागरिकों को स्वतंत्रता से जीवन यापन करने का अधिकार है। समता- से अभिप्राय है कि देश के सभी नागिरकों को समान अधिकार प्राप्त हैं। इसी प्रकार बंधुत्व- से अभिप्राय है कि देशवासियों के मध्य भाईचारे की भावना।
विचारणीय विषय यह है कि भारतीय संविधान ने देश के सभी नागरिकों को समान अधिकार प्रदान किए हैं तथा उनके साथ किसी भी प्रकार का भेदभाव नहीं किया। किन्तु देश में आज भी ऊंच-नीच, अस्पृश्यता आदि जैसे बुराइयां व्याप्त हैं। इन बुराइयों को समाप्त करने के लिए कानून भी बनाए गए, परन्तु इनका विशेष लाभ देखने को नहीं मिला। ग्रामीण क्षेत्रों में यह समस्या अधिक देखने को मिलती है। सामाजिक समरसता भारतीय समाज का सौंदर्य है, अस्पृश्यता से संबंधित अप्रिय घटनाएं भी चर्चा में रहती हैं। इन बुराइयों को समाप्त करने के लिए जागरूक लोगों को ही आगे आना चाहिए तथा सभी लोगों को अपने देश के संविधान का पालन करना चाहिए।
(लेखक- मीडिया शिक्षक एवं राजनीतिक विश्लेषक हैं)

Friday, April 4, 2025

वक्फ संशोधन विधेयक, 2025: हितधारक जुड़ाव के माध्यम से सुधार

वक्फ संशोधन विधेयक-2025 को वक्फ संपत्तियों के प्रबंधन और शासन में कमियों को दूर करने के प्राथमिक उद्देश्य के साथ पेश किया गया था। इन संशोधनों का उद्देश्य अधिक स्पष्टता प्रदान करना, समावेशिता सुनिश्चित करना और वक्फ संपत्तियों के बेहतर उपयोग के लिए प्रशासनिक ढांचे को बेहतर करना है।
8 अगस्त, 2024 को वक्फ बोर्ड के काम को सुव्यवस्थित करने और वक्फ संपत्तियों के कुशल प्रबंधन को सुनिश्चित करने के उद्देश्य से लोकसभा में दो विधेयक, वक्फ (संशोधन) विधेयक, 2024 और मुसलमान वक्फ (निरसन) विधेयक, 2024 पेश किए गए थे।
मुसलमान वक्फ (निरसन) विधेयक, 2025 का प्राथमिक उद्देश्य  मुसलमान वक्फ अधिनियम, 1923 को निरस्त करना है, जो एक औपनिवेशिक युग का कानून है और आधुनिक भारत में वक्फ संपत्तियों के प्रबंधन के लिए पुराना और अपर्याप्त हो गया है। निरसन का उद्देश्य  वक्फ अधिनियम, 1995 के तहत वक्फ संपत्तियों के प्रशासन और प्रबंधन में एकरूपता, पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करना है, इस प्रकार इस निरर्थक कानून के निरंतर अस्तित्व के कारण होने वाली विसंगतियों और अस्पष्टताओं को समाप्त करना है।
वक्फ (संशोधन) विधेयक, 2025 का उद्देश्य वक्फ अधिनियम, 1995 में संशोधन करना है, ताकि वक्फ संपत्तियों के विनियमन और प्रबंधन में मुद्दों और चुनौतियों का निवारण किया जा सके। संशोधन विधेयक भारत में वक्फ संपत्तियों के प्रशासन और प्रबंधन में सुधार करना चाहता है। इसका उद्देश्य है:
पिछले अधिनियम की कमियों को दूर करना और अधिनियम का नाम बदलने जैसे परिवर्तनों को पेश करके वक्फ बोर्डों की दक्षता में वृद्धि करना
वक्फ की परिभाषाओं को अद्यतन करना
पंजीकरण प्रक्रिया में सुधार
वक्फ अभिलेखों के प्रबंधन में प्रौद्योगिकी की भूमिका बढ़ाना।



इस विधेयक के विशिष्ट पहलू:
09 अगस्त, 2024 को संसद के दोनों सदनों द्वारा अपनाए गए अलग-अलग प्रस्तावों के माध्यम से उक्त विधेयक को विधेयक की  जांच करने और रिपोर्ट बनाने के जनादेश के साथ एक संयुक्त समिति को भेजा गया था।  संयुक्त समिति में लोक सभा के 21 सदस्य और राज्य सभा के 10 सदस्य शामिल थे।
विधेयक के महत्व और इसके व्यापक निहितार्थों को ध्यान में रखते हुए, समिति ने विधेयक के प्रावधानों पर आम जनता और विशेषज्ञों/हितधारकों और विशेष रूप से अन्य संबंधित संगठनों से विचार प्राप्त करने के लिए ज्ञापन आमंत्रित करने का निर्णय लिया था ।
 पहली बैठक 22 अगस्त, 2024 को हुई  और बैठकों के दौरान जिन प्रमुख संगठनों/हितधारकों से परामर्श किया गया, वे थे:
 
संख्या  
प्रमुख संगठन/हितधारक
 
ऑल इंडिया सुन्नी जमीयतुल उलमा, मुंबई;
 
नागरिक अधिकारों के भारतीय मुस्लिम (आईएमसीआर), नई दिल्ली
 
मुत्ताहेदा मजलिस-ए-उलेमा, जम्मू-कश्मीर (मीरवाइज उमर फारूक)
 
जकात फाउंडेशन ऑफ इंडिया
 
अंजुमन ए शितेवाली दाऊदी बोहरा समुदाय
 
चाणक्य नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी, पटना
 
ऑल इंडिया पसमांदा मुस्लिम महाज, दिल्ली
 
ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (एआईएमपीएलबी), दिल्ली
 
अखिल भारतीय सूफी सज्जादानशीं परिषद (एआईएसएससी), अजमेर
 
 मुस्लिम राष्ट्रीय मंच, दिल्ली -
 
मुस्लिम महिला बौद्धिक समूह - डॉ. शालिनी अली, राष्ट्रीय संयोजक
 
जमीयत उलमा-ए-हिंद, दिल्ली
 
शिया मुस्लिम धर्मगुरु और बौद्धिक समूह
 
दारूल उलूम देवबंद
 
संयुक्त संसदीय समिति ने छत्तीस बैठकें आयोजित कीं, जिनमें उन्होंने विभिन्न मंत्रालयों/विभागों, राज्य सरकारों, राज्य वक्फ बोर्डों और विशेषज्ञों/हितधारकों के प्रतिनिधियों/सुझावों को सुना। समिति को  भौतिक और डिजिटल दोनों माध्यमों से कुल 97,27,772 ज्ञापन प्राप्त हुए।
वक्फ संशोधन विधेयक, 2024 की व्यापक समीक्षा सुनिश्चित करने के लिए, संयुक्त समिति ने भारत के विभिन्न शहरों में व्यापक अध्ययन दौरे किए।
26.09.2024 से 01.10.2024: मुंबई, अहमदाबाद, हैदराबाद, चेन्नई और बेंगलुरु
09.11.2024 से 11.11.2024: गुवाहाटी, भुवनेश्वर
18.01.2025 से 21.01.2025: पटना, कोलकाता और लखनऊ
समिति ने इस विषय पर विस्तृत विचार-विमर्श किया जिसमें 284 हितधारकों, 25 राज्य वक्फ बोर्डों, 15 राज्य सरकारों, 5 अल्पसंख्यक आयोग और 20 मंत्रियों/सांसदों/विधायकों/विधान परिषद सदस्यों के साथ बातचीत शामिल थी। इन यात्राओं ने समिति के सदस्यों को हितधारकों के साथ जुड़ने, जमीनी वास्तविकताओं की जांच करने और क्षेत्र-विशिष्ट जानकारी एकत्र करने की अनुमति दी।
वक्फ (संशोधन) विधेयक में 44 खंड हैं और वक्फ संशोधन विधेयक पर संयुक्त समिति (जेसीडब्ल्यूएबी) ने 19 खंडों में परिवर्तन की सिफारिश की है।
संयुक्त समिति ने 31 जनवरी 2025 को लोकसभा के माननीय अध्यक्ष को अपनी रिपोर्ट सौंपी और रिपोर्ट 13 फरवरी 2025 को संसद के दोनों सदनों के समक्ष रखी गई।
प्रस्तुत सिफारिशों का एक उदाहरण:
अखिल भारतीय पसमांदा मुस्लिम महाज, उनके उत्थान के लिए काम करने वाली संस्था ने वक्फ (संशोधन) विधेयक, 2024 पर संयुक्त समिति के समक्ष अपने सुझाव प्रस्तुत किए।
एक अपीलीय प्रणाली की शुरूआत
वक्फ अभिलेखों का बेहतर प्रबंधन
अतिक्रमण और दुरुपयोग के लिए सख्त दंड
अनियमितताओं में शामिल बोर्ड के सदस्यों की अयोग्यता
वक्फ संपत्ति राजस्व का उचित उपयोग
निष्पक्ष जांच के लिए वरिष्ठ राजस्व अधिकारियों को सशक्त बनाना
 
समाहार
वक्फ (संशोधन) विधेयक, 2024 पर संयुक्त संसदीय समिति की रिपोर्ट वक्फ संपत्तियों के संतुलित, पारदर्शी और कुशल प्रबंधन को सुनिश्चित करने की प्रतिबद्धता को रेखांकित करती है। व्यापक परामर्श, अध्ययन दौरों और विचार-विमर्श के माध्यम से, समिति ने विधायी ढांचे को मजबूत करते हुए हितधारकों द्वारा उठाई गई प्रमुख चिंताओं को दूर करने की मांग की है। विधेयक में प्रस्तावित संशोधनों का उद्देश्य एक अधिक समावेशी और जवाबदेह प्रणाली बनाना है जो समाज की उभरती जरूरतों के अनुरूप हो।

Thursday, April 3, 2025

वक्फ (संशोधन) विधेयक-2025: विधेयक के लाभ


वक्फ क्या है
'वक्फ' की अवधारणा इस्लामी कानूनों और परंपराओं में निहित है। यह एक मुस्लिम द्वारा मस्जिद, स्कूल, अस्पताल या अन्य सार्वजनिक संस्थानों के निर्माण जैसे धर्मार्थ या धार्मिक उद्देश्यों के लिए किए गए दान को संदर्भित करता है। वक्फ की एक और परिभाषित विशेषता यह है कि यह अविभाज्य है - जिसका अर्थ है कि इसे बेचा, उपहार या विरासत में नहीं दिया जा सकता तथा उस पर कोई बोझ नहीं डाला जा सकता। एक बार वक्फ के रूप में नामित होने के बाद, स्वामित्व वक्फ (वाकिफ) करने वाले व्यक्ति से अल्लाह को हस्तांतरित हो जाता है, जिससे यह अपरिवर्तनीय हो जाता है। चूंकि अल्लाह हमेशा के लिए है, इसलिए 'वक्फ संपत्ति' भी हमेशा के लिए है।
लंबे समय से चले आ रहे मुद्दों का समाधान करना
वक्फ (संशोधन) विधेयक का उद्देश्य निम्नलिखित मुद्दों का समाधान करना है -
1. वक्फ संपत्ति प्रबंधन में पारदर्शिता की कमी
2. वक्फ भूमि अभिलेखों का अधूरा सर्वेक्षण और म्यूटेशन
3. महिलाओं के उत्तराधिकार अधिकारों के लिए अपर्याप्त प्रावधान
4. अतिक्रमण सहित बड़ी संख्या में लंबे समय से चल रहे मुकदमे। वर्ष 2013 में 10,381 मामले लंबित थे, जो अब बढ़कर 21,618 हो गए हैं।
5. किसी भी संपत्ति को अपनी जांच के आधार पर वक्फ की संपत्ति घोषित करने की वक्फ बोर्डों की अतार्किक शक्ति।
6. सरकारी भूमि को वक्फ घोषित करने से जुड़े कई विवाद।
7. वक्फ संपत्तियों के उचित लेखा-जोखा और लेखा-परीक्षण का अभाव।
8. वक्फ प्रबंधन में प्रशासनिक अक्षमता।
9. ट्रस्ट संपत्तियों के साथ अनुचित व्यवहार।
10. केंद्रीय वक्फ परिषद और राज्य वक्फ बोर्डों में हितधारकों का कम प्रतिनिधित्व।
 
वक्फ विधेयक का आधुनिकीकरण
वक्फ (संशोधन) विधेयक, 2025 का उद्देश्य वक्फ संपत्तियों के प्रबंधन को सुव्यवस्थित करना है, जिसमें विरासत स्थलों की सुरक्षा और सामाजिक कल्याण को बढ़ावा देने के प्रावधान हैं।
 
I.      वक्फ संपत्ति के रूप में घोषित गैर-मुस्लिम संपत्तियां - वक्फ (संशोधन) विधेयक 2025 का उद्देश्य विरासत स्थलों और व्यक्तिगत संपत्ति अधिकारों की सुरक्षा करते हुए वक्फ संपत्ति प्रबंधन को सुव्यवस्थित करना है। विभिन्न राज्यों में वक्फ संपत्ति के दावों को लेकर विवाद देखे गए हैं, जिससे कानूनी लड़ाई और सामुदायिक चिंताएं पैदा हुई हैं। सितंबर 2024 के आंकड़ों के अनुसार, 25 राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों के वक्फ बोर्डों में कुल 5973 सरकारी संपत्तियों को वक्फ संपत्ति घोषित किया गया है। इसके कुछ उदाहरण:
●      तमिलनाडु: थिरुचेंथुरई गांव का एक किसान वक्फ बोर्ड के पूरे गांव पर दावे के कारण अपनी ज़मीन नहीं बेच पा रहा था। इसके चलते वह अपनी बेटी की शादी हेतु लिए गए ऋण को चुकाने के लिए अपनी ज़मीन बेच नहीं सका।
●     गोविंदपुर गांव, बिहार: अगस्त 2024 में, बिहार सुन्नी वक्फ बोर्ड के अगस्त 2024 में पूरे गांव पर किए गए दावे के कारण सात परिवार प्रभावित हुए।  यह मामला पटना उच्च न्यायालय में चल रहा है।
●     केरल: सितंबर 2024 में एर्नाकुलम जिले के करीब 600 ईसाई परिवार अपनी पुश्तैनी जमीन पर वक्फ बोर्ड के दावे का विरोध कर रहे हैं। उन्होंने संयुक्त संसदीय समिति में अपील की है।
●          कर्नाटक: 2024 में वक्फ बोर्ड द्वारा विजयपुरा में 15,000 एकड़ जमीन को वक्फ जमीन के रूप में नामित करने के बाद किसानों ने विरोध प्रदर्शन किया। बल्लारी, चित्रदुर्ग, यादगीर और धारवाड़ में भी विवाद उठे। हालांकि, सरकार ने आश्वासन दिया कि कोई बेदखली नहीं होगी।
●     उत्तर प्रदेश: राज्य वक्फ बोर्ड के कथित भ्रष्टाचार और कुप्रबंधन के खिलाफ शिकायतें उठाई गई हैं।
इसके अलावा, वक्फ (संशोधन) विधेयक पर गठित संयुक्त समिति को वक्फ बोर्डों द्वारा संपत्तियों के गैरकानूनी दावे के बारे में कुछ शिकायतें प्राप्त हुए, जो इस प्रकार हैं:
●      कर्नाटक (1975 और 2020): 40 वक्फ संपत्तियों को अधिसूचित किया गया, जिनमें खेत, सार्वजनिक स्थान, सरकारी भूमि, कब्रिस्तान, झीलें और मंदिर शामिल हैं।
●      पंजाब वक्फ बोर्ड ने पटियाला में शिक्षा विभाग की जमीन पर दावा किया है।
इसके अतिरिक्त, आवासन और शहरी कार्य मंत्रालय ने सितंबर 2024 में अपनी प्रस्तुति के दौरान संयुक्त संसदीय समिति को सूचित किया कि भूमि और विकास कार्यालय के नियंत्रण में 108 संपत्तियां, दिल्ली विकास प्राधिकरण के नियंत्रण में 130 संपत्तियां और सार्वजनिक डोमेन में 123 संपत्तियों को वक्फ संपत्ति घोषित किया गया और मुकदमेबाजी में लाया गया।
II. मुस्लिम महिलाओं और कानूनी उत्तराधिकारियों के अधिकार- विधेयक में स्व-सहायता समूहों (एसएचजी) और वित्तीय स्वतंत्रता कार्यक्रमों को बढ़ावा देकर मुस्लिम महिलाओं, विशेष रूप से विधवाओं और तलाकशुदा महिलाओं की आर्थिक और सामाजिक स्थिति में सुधार करने का भी प्रयास किया गया है। इसके अतिरिक्त, विधेयक का उद्देश्य मुस्लिम महिलाओं के लाभ के लिए निम्नलिखित लक्ष्य प्राप्त करना है-
● वक्फ प्रबंधन में पारदर्शिता - भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के लिए वक्फ रिकॉर्ड का डिजिटलीकरण।
● कानूनी सहायता और सामाजिक कल्याण - पारिवारिक विवादों और उत्तराधिकार अधिकारों के लिए कानूनी सहायता केंद्रों की स्थापना।
● सांस्कृतिक और धार्मिक पहचान - सांस्कृतिक संरक्षण और अंतर-धार्मिक संवाद को मजबूत करना।

महिलाओं की भागीदारी पारदर्शिता सुनिश्चित करती है और वक्फ संसाधनों को इस दिशा में निर्देशित करती है:
● मुस्लिम लड़कियों के लिए छात्रवृत्ति
● स्वास्थ्य सेवा और मातृत्व कल्याण
● महिला उद्यमियों के लिए कौशल विकास और माइक्रोफाइनेंस सहायता
● फैशन डिजाइन, स्वास्थ्य सेवा और उद्यमिता जैसे क्षेत्रों में व्यावसायिक प्रशिक्षण
● उत्तराधिकार विवादों और घरेलू हिंसा मामलों के लिए कानूनी सहायता केंद्रों की स्थापना
● विधवाओं के लिए पेंशन योजनाएं
III. गरीबों का उत्थान
वक्फ धार्मिक, धर्मार्थ और सामाजिक कल्याण की जरूरतों को पूरा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, खासकर वंचितों के लिए। हालांकि, कुप्रबंधन, अतिक्रमण और पारदर्शिता की कमी के कारण इसका प्रभाव अक्सर कम हो जाता है। गरीबों के लिए वक्फ के कुछ प्रमुख लाभ:
1. पारदर्शिता और जवाबदेही के लिए डिजिटलीकरण
● एक केंद्रीकृत डिजिटल पोर्टल वक्फ संपत्तियों की पहचान करेगा, जिससे बेहतर निगरानी और प्रबंधन सुनिश्चित होगा।
● ऑडिटिंग और अकाउंटिंग उपायों से वित्तीय कुप्रबंधन को रोका जा सकेगा और यह सुनिश्चित किया जा सकेगा कि फंड का इस्तेमाल केवल कल्याणकारी उद्देश्यों के लिए किया जाए।
2. कल्याण और विकास के लिए राजस्व में वृद्धि
● वक्फ भूमि के दुरुपयोग और अवैध कब्जे को रोकने से वक्फ बोर्डों के राजस्व में वृद्धि होगी, जिससे उन्हें कल्याणकारी कार्यक्रमों का विस्तार करने में मदद मिलेगी।
● स्वास्थ्य सेवा, शिक्षा, आवास और आजीविका सहायता के लिए धन आवंटित किया जाएगा, जिससे आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों को प्रत्यक्ष लाभ होगा।
● नियमित ऑडिट और निरीक्षण, वित्तीय अनुशासन को बढ़ावा देंगे और वक्फ प्रबंधन में जनता का विश्वास मजबूत करेंगे।
IV. प्रशासनिक चुनौतियों का समाधान-
वक्फ (संशोधन) विधेयक 2025  में निम्नलिखित उपायों के जरिये व्यवस्था में सुधार करने का लक्ष्य है:
● संपत्ति प्रबंधन में पारदर्शिता बढ़ाना।
● वक्फ बोर्ड और स्थानीय अधिकारियों के बीच तालमेल को सुव्यवस्थित करना।
● हितधारकों के अधिकारों की रक्षा सुनिश्चित करना।
 
V. पिछड़े वर्गों और मुस्लिम समुदायों के अन्य संप्रदायों का सशक्तिकरण: विधेयक का उद्देश्य वक्फ बोर्ड को बेहतर वक्फ शासन और निर्णय लेने के लिए विभिन्न मुस्लिम संप्रदायों को प्रतिनिधित्व देकर अधिक समावेशी बनाना है-
● विधेयक में राज्य/केंद्र शासित प्रदेशों के वक्फ बोर्डों में बोहरा और अघाखानी समुदायों से एक-एक सदस्य को शामिल करने का प्रावधान है।
● साथ ही, बोर्ड में शिया और सुन्नी सदस्यों के अलावा पिछड़े वर्गों से संबंधित मुसलमानों का प्रतिनिधित्व होगा।
● नगर पालिकाओं या पंचायतों से दो या अधिक निर्वाचित सदस्यों को शामिल करना, वक्फ मामलों में स्थानीय शासन को मजबूत करना।
● बोर्ड/केंद्रीय वक्फ परिषद में पदेन सदस्यों को छोड़कर दो गैर-मुस्लिम सदस्य होंगे।
निष्कर्ष:
वक्फ (संशोधन) विधेयक 2025 वक्फ प्रशासन के लिए एक धर्मनिरपेक्ष, पारदर्शी और जवाबदेह व्यवस्था तय करता है। जहां वक्फ संपत्तियां धार्मिक और धर्मार्थ उद्देश्यों की पूर्ति करती हैं, उनके प्रबंधन में कानूनी, वित्तीय और प्रशासनिक जिम्मेदारियां शामिल होती हैं जिनके लिए सुव्यवस्थित शासन की आवश्यकता होती है। वक्फ बोर्ड और केंद्रीय वक्फ परिषद (सीडब्ल्यूसी) की भूमिका धार्मिक नहीं बल्कि नियामक है, जो कानूनी अनुपालन सुनिश्चित करती है और सार्वजनिक हितों की रक्षा करती है। यह विधेयक हितधारकों को सशक्त बनाकर और शासन में सुधार करके देश में वक्फ प्रशासन के लिए एक प्रगतिशील और निष्पक्ष ढांचा तैयार करता है।

वक्फ संशोधन विधेयक- 2025


वक्फ संशोधन विधेयक-2025: भारत में वक्फ का इतिहास
'वक्फ' को मुस्लिम कानून द्वारा पवित्र, धार्मिक या धर्मार्थ के रूप में मान्यता प्राप्त किसी भी उद्देश्य के लिए किसी भी चल या अचल संपत्ति के किसी भी व्यक्ति द्वारा स्थायी समर्पण के रूप में परिभाषित किया गया है।

परिचय
भारत में वक्फ कानून का विकास वक्फ संपत्तियों को विनियमित और संरक्षित करने के चल रहे प्रयासों को दर्शाता है, जो महत्वपूर्ण सामाजिक, धार्मिक और आर्थिक महत्व रखते हैं। 1954 के वक्फ अधिनियम से शुरू होकर, वक्फ संपत्तियों को नियंत्रित करने वाले कानूनी ढांचे में उभरती चुनौतियों का समाधान करने और बेहतर प्रबंधन सुनिश्चित करने के लिए वर्षों में कई संशोधन हुए हैं। हाल ही में वक्फ संशोधन विधेयक 2025 का उद्देश्य पारदर्शिता बढ़ाना, शासन संरचनाओं में सुधार करना और वक्फ संपत्तियों को दुरुपयोग से बचाना है। इन कानूनी सुधारों ने वक्फ संपत्तियों के प्रशासन को आकार दिया है और वैश्विक सर्वोत्तम प्रथाओं को अपनाया है।

भारत में वक्फ संपत्तियों का प्रशासन वर्तमान में वक्फ अधिनियम, 1995 द्वारा शासित है, जिसे केंद्र सरकार द्वारा अधिनियमित और विनियमित किया जाता है। वक्फ प्रबंधन में शामिल प्रमुख प्रशासनिक निकायों में शामिल हैं:
केंद्रीय वक्फ परिषद (सीडब्ल्यूसी) – अल्पसंख्यक मामलों के मंत्रालय के तहत एक सलाहकार निकाय जो देश भर में वक्फ प्रशासन पर मार्गदर्शन और निरीक्षण प्रदान करता है। इसका वक्फ संपत्तियों पर सीधा नियंत्रण नहीं है, लेकिन नीतिगत मामलों पर सरकार और राज्य वक्फ बोर्डों को सलाह देता है।

राज्य वक्फ बोर्ड (एसडब्ल्यूबी) – ये बोर्ड वक्फ संपत्तियों के संरक्षक के रूप में कार्य करते हैं और वक्फ अधिनियम के अनुसार उनके प्रबंधन, संरक्षण और उपयोग के लिए जिम्मेदार हैं। प्रत्येक राज्य का अपना वक्फ बोर्ड होता है, जो अपने अधिकार क्षेत्र में वक्फ संपत्तियों पर प्रशासनिक नियंत्रण रखता है।

वक्फ ट्रिब्यूनल – वक्फ संपत्तियों से संबंधित विवादों, प्रश्नों और अन्य मामलों के निर्धारण के लिए स्थापित विशेष न्यायिक निकाय।
यह संरचित प्रशासनिक सेटअप वक्फ संपत्तियों के बेहतर शासन को सुनिश्चित करता है और वक्फ से संबंधित विवादों के त्वरित समाधान की सुविधा प्रदान करता है, जिससे प्रणाली अधिक कुशल और पारदर्शी हो जाती है।
वर्षों से, वक्फ संपत्तियों को नियंत्रित करने वाला भारत का कानूनी और प्रशासनिक ढांचा पारदर्शिता, दक्षता और वित्तीय जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए विभिन्न विधायी अधिनियमों के माध्यम से विकसित हुआ है।

भारत में वक्फ इतिहास का अवलोकन
भारत में वक्फ संपत्तियों के शासन को प्रशासन में सुधार और कुप्रबंधन को रोकने के उद्देश्य से कई विधायी अधिनियमों के माध्यम से विनियमित किया गया है:
मुसलमान वक्फ वैधीकरण अधिनियम, 1913: इस अधिनियम ने मुसलमानों के अपने परिवारों और वंशजों के लाभ के लिए वक्फ बनाने के अधिकार को स्पष्ट और पुष्टि की, जिसमें अंतिम धर्मार्थ उद्देश्य शामिल हैं:
वक्फ प्रबंधन को अधिक कुशल और पारदर्शी बनाने का उद्देश्य।
तथापि, अधिनियम के कार्यान्वयन के दौरान यह महसूस किया गया कि यह अधिनियम वक्फ के प्रशासन में सुधार करने में कारगर सिद्ध नहीं हुआ।
मुसलमान वक्फ अधिनियम, 1923: वक्फ संपत्तियों के प्रशासन में उचित लेखांकन और पारदर्शिता सुनिश्चित करके उनके प्रबंधन में सुधार के लिए पेश किया गया।
मुसलमान वक्फ विधिमान्य अधिनियम, 1930: इसने 1913 के अधिनियम को पूर्वव्यापी प्रभाव प्रदान किया, जिससे पारिवारिक वक्फ की कानूनी वैधता को बल मिला।
वक्फ अधिनियम, 1954: वक्फ संपत्तियों के व्यवस्थित प्रशासन, पर्यवेक्षण और संरक्षण के लिए पहली बार राज्य वक्फ बोर्डों (एसडब्ल्यूबी) की स्थापना की गई:
आजादी के बाद ही वक्फ को मजबूत किया गया है।
1954 के वक्फ अधिनियम ने वक्फ के केंद्रीकरण की दिशा में एक मार्ग प्रदान किया।
सेंट्रल वक्फ काउंसिल ऑफ इंडिया, एक वैधानिक निकाय 1964 में भारत सरकार द्वारा 1954 के इस वक्फ अधिनियम के तहत स्थापित किया गया था।
यह केंद्रीय निकाय विभिन्न राज्य वक्फ बोर्डों के तहत काम की देखरेख करता है जिन्हें वक्फ अधिनियम, 1954 की धारा 9 (1) के प्रावधानों के तहत स्थापित किया गया था।
वक्फ अधिनियम, 1954 (1959, 1964, 1969 और 1984) में संशोधन: इन संशोधनों का उद्देश्य वक्फ संपत्तियों के प्रशासन में और सुधार करना था।
वक्फ अधिनियम, 1995: इस व्यापक अधिनियम ने वर्ष 1954 के अधिनियम और इसके संशोधनों को निरस्त कर दिया:
वक्फ अधिनियम, 1995 को भारत में वक्फ संपत्तियों (धार्मिक बंदोबस्ती) के प्रशासन को नियंत्रित करने के लिए अधिनियमित किया गया था।
यह वक्फ परिषद, राज्य वक्फ बोर्डों और मुख्य कार्यकारी अधिकारी की शक्ति और कार्यों के साथ-साथ मुतवल्ली के कर्तव्यों का भी प्रावधान करता है।
यह अधिनियम एक वक्फ ट्रिब्यूनल की शक्ति और प्रतिबंधों का भी वर्णन करता है जो अपने अधिकार क्षेत्र के तहत एक सिविल कोर्ट के बदले कार्य करता है।
एक ट्रिब्यूनल का निर्णय पार्टियों पर अंतिम और बाध्यकारी होगा. कोई मुकदमा या कानूनी कार्यवाही किसी भी सिविल कोर्ट के तहत नहीं होगी। इस प्रकार, वक्फ ट्रिब्यूनल के फैसले को किसी भी सिविल कोर्ट से ऊपर बनाया गया।

वक्फ (संशोधन) अधिनियम, 2013 में महत्वपूर्ण बदलाव किए गए हैं:
तीन सदस्यीय वक्फ ट्रिब्यूनल का गठन, जिसमें मुस्लिम कानून और न्यायशास्त्र का ज्ञान रखने वाला व्यक्ति शामिल है।
राज्य वक्फ बोर्डों में दो महिला सदस्यों को शामिल करना।
वक्फ संपत्तियों की बिक्री और उपहार पर प्रतिबंध, अलगाव की गुंजाइश को कम करना।
वक्फ संपत्तियों के लिए लीज अवधि 3 साल से बढ़ाकर 30 साल करना, बेहतर उपयोग को प्रोत्साहित करना।
वक्फ (संशोधन) विधेयक, 2025, और मुसलमान वक्फ (निरसन) विधेयक, 2024
प्रस्तावित विधेयक वक्फ प्रशासन का आधुनिकीकरण करने, मुकदमेबाजी को कम करने और वक्फ संपत्तियों के कुशल प्रबंधन को सुनिश्चित करने के उद्देश्य से एक व्यापक विधायी प्रयास है।
प्रस्तावित संशोधनों का उद्देश्य वक्फ अधिनियम, 1995 की कमियों को दूर करना और 2013 (संशोधन) अधिनियम द्वारा पेश की गई विसंगतियों को दूर करना है।

अल्पसंख्यक कार्य मंत्रालय द्वारा योजनाएं
कौमी वक्फ बोर्ड तरक्कियाती योजना (क्यूडब्ल्यूबीटीएस) और शहरी वक्फ सम्पत्ति विकास योजना (एसडब्ल्यूएसवीवाई) अल्पसंख्यक कार्य मंत्रालय (एमओएमए), भारत सरकार के माध्यम से कार्यान्वित की जा रही है। ये दो योजनाएं राज्य वक्फ बोर्डों के स्वचालन और आधुनिकीकरण के लिए हैं।
क्यूडब्ल्यूबीटीएस के अंतर्गत, वक्फ संपत्तियों के अभिलेखों के कम्प्यूटरीकरण और डिजिटीकरण के लिए जनशक्ति की तैनाती और वक्फ बोर्डों के प्रशासन को बेहतर करने के लिए सीडब्ल्यूसी के माध्यम से राज्य वक्फ बोर्डों को सरकारी सहायता अनुदान (जीआईए) प्रदान किया जाता है।
एसडब्ल्यूएसवीवाई के अंतर्गत, वक्फ संपत्तियों पर वाणिज्यिक रूप से व्यवहार्य परियोजनाएं विकसित करने के लिए वक्फ बोर्डों/वक्फ संस्थाओं को ब्याज मुक्त ऋणों के आगे संवितरण के लिए केन्द्रीय वक्फ बोर्ड को अनुदान प्रदान किया जाता है।
2019-20 से 2023-24 तक क्यूडब्ल्यूबीटीएस और एसडब्ल्यूएसवीवाई के तहत क्रमशः 23.87 करोड़ रुपये और 7.16 करोड़ रुपये खर्च किए गए।

भारत में वक्फ संपत्तियों का अवलोकन :
WAMSI पोर्टल पर उपलब्ध डेटा के अनुसार, 30 राज्य/केंद्र शासित प्रदेशों और 32 बोर्डों ने रिपोर्ट किया है कि वहां 8.72 लाख संपत्तियां हैं, जो 38 लाख एकड़ से अधिक भूभाग को कवर करती हैं। 8.72 लाख संपत्तियों में से 4.02 लाख उपयोगकर्ता द्वारा वक्फ हैं। शेष वक्फ संपत्तियों के लिए, स्वामित्व अधिकार स्थापित करने वाले दस्तावेज़ (डीड्स) WAMSI पोर्टल पर 9279 मामलों के लिए अपलोड किए गए हैं और केवल 1083 वक्फ डीड अपलोड किए गए हैं।



(14 मार्च, 2025 के अनुसार)

Monday, January 27, 2025

उत्तराखंड में समान नागरिक संहिता लागू


डॉ. सौरभ मालवीय  
उत्तराखंड सरकार ने आज से राज्य में समान नागरिक संहित लागू कर दी है। उत्तराखंड विधानसभा द्वारा गत वर्ष समान नागरिक संहिता विधेयक-2024 पारित किया गया था। उत्तराखंड समान नागरिक संहित लागू करने वाला देश का पहला राज्य बन गया है।

समान नागरिक संहिता को लेकर देशभर में एक बार फिर से बहस जारी है। देश में समान नागरिक संहिता को लागू करने की बात बार-बार उठती रही है, परन्तु इस पर विवाद होने के पश्चात यह मामला दबकर रह जाता है। किन्तु जब से उत्तर प्रदेश में भाजपा की वापसी हुई है, तब से यह मामला फिर से तूल पकड़ने लगा है। जहां भाजपा इसे देशभर में लागू करना चाहती है, वहीं मुस्लिम संगठन इसका कड़ा विरोध कर रहे हैं। 

उल्लेखनीय है कि मुस्लिम समाज में विवाह कानूनों को लेकर ब्रिटिश शासनकाल से ही विवाद होता रहा है, क्योंकि मुसलमानों में बहु पत्नी प्रथा का चलन है। शरीयत के अनुसार पुरुषों को चार विवाह करने का अधिकार है। ऐसी स्थिति में मुस्लिम समाज में महिलाओं की स्थिति कितनी दयनीय होगी, यह सर्वविदित है। पति जब चाहे पत्नी को तीन तलाक कहकर घर से निकाल देता है। ऐसी स्थिति में महिला का जीवन नारकीय बन जाता है। शाह बानो प्रकरण ने लोगों का ध्यान इस ओर खींचा था। वर्ष 1978 में शाह बानो नाम की वृद्धा को उसके पति ने तीन तलाक देकर घर से निकाल दिया था। उसके पांच बच्चे थे। पीड़ित महिला के पास जीविकोपार्जन का कोई साधन नहीं था। उसके पति ने उसे गुजारा भत्ता देने से स्पष्ट इनकार कर दिया था। इस पर महिला ने न्यायालय का द्वार खटखटाया। इस मामले को सर्वोच्च न्यायालय तक पहुंचने में सात वर्ष लग गए। वर्ष 1985 में सर्वोच्च न्यायालय ने उसके पति को निर्देश दिया कि वह अपनी तलाकशुदा पत्नी को जीविकोपार्जन के लिए मासिक भत्ता दे। न्यायालय ने यह निर्णय अपराध दंड संहिता की धारा-125 के अंतर्गत लिया था। विदित रहे कि अपराध दंड संहिता की यह धारा सब लोगों पर लागू होती है चाहे वे किसी भी धर्म, जाति या संप्रदाय से संबंध रखते हों। सर्वोच्च न्यायालय के इस निर्णय से मुस्लिम महिलाओं की स्थिति बेहतर हो जाती, परन्तु कट्टरपंथियों को यह सहन नहीं हुआ और उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय के इस निर्णय का कड़ा विरोध किया। उन्होंने ऑल इंडिया पर्सनल लॉ बोर्ड नाम की एक संस्था का गठन किया तथा सरकार को देशभर में आन्दोलन करने की चेतावनी दे डाली। परिणामस्वरूप तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी कट्टरपंथियों के आगे झुक गए था तथा उनकी सरकार ने 1986 में संसद में कानून बनाकर सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय को पलट दिया। इससे शाह बानो के सामने जीविकोपार्जन का संकट खड़ा हो गया। मानवता के नाते जिस समाज को वृद्धा की सहायता करनी चाहिए थी, वही उसका शत्रु बन गया। आज भी यही स्थिति है। मुस्लिम समाज में शाह बानो जैसी महिलाओं की कमी नहीं है। मुस्लिम समाज में ऐसे मामले सामने आते रहते हैं कि पति ने तीन तलाक कहकर पत्नी को घर से बाहर निकाल दिया। ऐसी स्थिति में पीड़ित महिला का कोई साथ नहीं देता। मुस्लिम समाज की महिलाओं की स्थिति को बेहतर बनाने के लिए पहले भाजपा सरकार ने तीन तलाक को रोकने का कानून बनाया और अब समान नागरिक संहिता लागू करने के लिए प्रयासरत है। भाजपा ने वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव के अपने घोषणापत्र में वादा किया था कि यदि भाजपा सत्ता में आती है, तो देश में समान नागरिक संहिता को लागू करने की प्रक्रिया प्रारंभ की जाएगी। इससे पूर्व  आरएसएस तथा जनसंघ द्वारा भी देश में समान नागरिक संहिता को लागू करने की मांग की गई थी। वर्ष 1998 में भी भाजपा ने अपने चुनावी घोषणापत्र में देश में समान नागरिक संहिता को लागू करने का वादा किया था। 

केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने कहा है कि भाजपा शासित राज्यों में सामान नागरिक संहिता कानून लाया जाएगा।  उन्होंने कहा कि उत्तराखंड में चुनाव से ठीक पहले हमने समान नागरिक संहिता कानून लाने की घोषणा की थी। अब इसे विधानसभा से पारित करके कानून बना लिया जाएगा। इसी प्रकार अन्य भाजपा शासित राज्यों में भी इसे लागू कर दिया जाएगा। उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने कहा है कि समान नागरिक संहिता का मसौदा तैयार करने के लिए शीघ्र ही एक उच्च स्तरीय समिति का गठन किया जाएगा और राज्य में सांप्रदायिक सौहार्द को किसी भी कीमत पर बाधित नहीं होने दिया जाएगा। वहीं उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य का कहना है कि इसे देश-प्रदेश में लागू किया जाना चाहिए, ऐसा करना अत्यंत आवश्यक है। उनका यह भी कहना है कि प्रदेश सरकार समान नागरिक संहिता कानून लागू करने पर विचार कर रही है। हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर ने कहा है कि प्रदेश में समान नागरिक संहिता को लागू करने के बारे में सरकार गंभीरता से विचार कर रही है। उन्होंने कहा कि यह विशेष रूप से मुस्लिम महिलाओं के लिए एक सम्मान का विषय है। 

उल्लेखनीय है कि समान नागरिक संहिता के अंतर्गत देश में निवास करने वाले सभी लोगों के लिए एक समान कानून का प्रावधान किया गया है। धर्म के आधार पर किसी भी समुदाय को कोई विशेष लाभ प्राप्त नहीं हो सकेगा। इसके लागू होने की स्थिति में देश में निवास करने वाले प्रत्येक व्यक्ति पर एक ही कानून लागू होगा, अर्थात कानून का किसी धर्म विशेष से कोई संबंध नहीं रह जाएगा। ऐसी स्थिति में अलग-अलग धर्मों के पर्सनल लॉ समाप्त हो जाएंगे। वर्तमान में देश में कई निजी कानून लागू हैं, उदाहरण के लिए मुस्लिम पर्सनल लॉ, इसाई पर्सनल लॉ एवं पारसी पर्सनल लॉ। इसी प्रकार हिंदू सिविल लॉ के अंतर्गत हिंदू, सिख एवं जैन समुदाय के लोग आते हैं।  समान नागरिक संहिता लागू होने से इनका अस्तित्व समाप्त हो जाएगा तथा विवाह, तलाक एवं संपत्ति के मामले में सबके लिए एक ही कानून होगा।
 
इसके दूसरी ओर ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने समान नागरिक संहिता को असंवैधानिक और अल्पसंख्यक विरोधी बताते हुए सरकार से इसे लागू न करने की अपील है। बोर्ड का कहना कि भारत के संविधान ने देश के प्रत्येक नागरिक को उसके धर्म के अनुसार जीवन जीने की अनुमति दी है। इसे मौलिक अधिकारों में सम्मिलित किया गया है। 
 
नि:संदेह देश में समान नागरिक संहिता लागू होने से मुस्लिम समाज की महिलाओं का जीवन स्तर बेहतर हो जाएगा। यह कानून मुस्लिम समाज से बहुपत्नी प्रथा का उन्मूलन करने में प्रभावी सिद्ध हो सकेगा, क्योंकि इस समाज के पुरुष अपनी पत्नी के जीवित रहते दूसरा, तीसरा एवं चौथा विवाह नहीं कर पाएंगे। इतना ही नहीं, संपत्ति में भी पुत्रियों को पुत्रों के समान ही भाग मिलेगा। इसमें दो मत नहीं है कि समान नागरिक संहिता मुस्लिम महिलाओं के लिए सम्मानजनक कानून है, जो उन्हें सम्मान से जीवन जीने का अधिकार देगा। 


Friday, August 2, 2024

लव जिहाद : योगी सरकार का ऐतिहासिक निर्णय

 

डॉ. सौरभ मालवीय 
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ निरंतर जनहित में बड़े एवं ऐतिहासिक निर्णय ले रहे हैं। इसी कड़ी में योगी आदित्यनाथ की सरकार ने जबरन धर्म परिवर्तन एवं लव जिहाद के विरुद्ध नए विधेयक को पारित करवाकर एक और इतिहास रच दिया है। इसमें अतिशयोक्ति नहीं है कि जब से योगी आदित्यनाथ उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने हैं तभी से वे भारतीय संस्कृति के संरक्षण के लिए गंभीरता से कार्य कर रहे हैं। अपनी संस्कृति एवं धर्म की रक्षा करना प्रत्येक मनुष्य का परम कर्तव्य है तथा वह इसी का पूर्ण निष्ठा के साथ पालन कर रहे हैं।
 
विगत दीर्घ काल से लव जिहाद के प्रकरण सामने आ रहे हैं। प्रकरणों के अनुसार प्रेम प्रसंग में पड़कर लड़कियां दूसरे धर्म के पुरुषों से विवाह कर लेती हैं। विवाह के कुछ समय पश्चात् इन लड़कियों पर ससुराल पक्ष का धर्म स्वीकार करने का दबाव बढ़ने लगता है। बहुत सी लड़कियां ससुराल पक्ष का धर्म स्वीकार करने पर विवश हो जाती हैं, क्योंकि उनके पास इसके अतिरिक्त कोई विकल्प नहीं होता। जो लड़कियां ऐसा नहीं करतीं, उनका जीवन नारकीय बन जाता है। उन्हें ससुराल में यातना एवं अपमान का सामना करना पड़ता है। अनेक प्रकरणों में पति अथवा ससुराल पक्ष द्वारा लड़कियों को बेच देने के मामले भी प्रकाश में आए हैं। ऐसे प्रकरणों में लड़कियों की हत्याओं के मामले भी प्रकाश में आए हैं। नि:संदेह ऐसे प्रकरण किसी भी सभ्य समाज के लिए शुभ संकेत नहीं हैं।              
अब उत्तर प्रदेश में नया कानून बनने से कुछ संतोषजनक होने की आशा जगी है। उत्तर प्रदेश में जबरन धर्म परिवर्तन एवं लव जिहाद की रोकथाम के लिए ऐतिहासिक निर्णय लिया गया है। उल्लेखनीय है कि सोमवार को योगी आदित्यनाथ की सरकार ने उत्तर प्रदेश विधानसभा में जबरन धर्म परिवर्तन एवं लव जिहाद के विरुद्ध नया विधेयक प्रस्तुत किया, जो मंगलवार को पारित हो गया। इसे उत्तर प्रदेश विधि विरुद्ध धर्म संपरिवर्तन प्रतिषेध (संशोधन) विधेयक-2024 नाम दिया गया है। इस नए विधेयक के अनुसार नाबालिग लड़की का लव जिहाद के लिए अपहरण करने तथा उसे बेचने पर आजीवन कारावास एवं एक लाख रुपए तक के आर्थिक दंड का प्रावधान किया गया है। यदि किसी नाबालिग, दिव्यांग अथवा मानसिक रूप से दुर्बल व्यक्ति, महिला, अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति का जबरन धर्म परिवर्तन कराया जाता है तो दोषी को आजीवन कारावास के साथ-साथ एक लाख रुपए का आर्थिक दंड भी दिया जा सकता है। इसी प्रकार सामूहिक रूप से जबरन धर्म परिवर्तन पर भी आजीवन कारावास एवं एक लाख रुपए के आर्थिक दंड का प्रावधान है।
 
ऐसे प्रकरण भी सामने आते रहते हैं कि भारत में धर्म परिवर्तन को बढ़ावा देने के लिए विदेशों से भारी मात्रा में धनराशि आती है। योगी सरकार की दूरदर्शिता के कारण अब इस पर भी रोकथाम लग सकेगी। इस विधेयक में विदेशों से धर्म परिवर्तन के लिए आने वाले धन पर भी अंकुश लगाने हेतु कठोर प्रावधान किए गए हैं। विदेशी अथवा अपंजीकृत संस्थाओं से धन प्राप्त करने पर 14 वर्ष तक का कारावास तथा 10 लाख रुपए के आर्थिक दंड का प्रावधान किया गया है। यदि कोई धर्म परिवर्तन के लिए किसी व्यक्ति के जीवन अथवा उसकी धन-संपत्ति को भय अथवा हानि में डालता है, उस पर बल प्रयोग करता है, उसे विवाह का झांसा देता है, लालच देकर किसी नाबालिग, महिला या व्यक्ति को बेचता है, तो उसके लिए न्यूनतम 20 वर्ष के कारावास का प्रावधान किया गया है। प्रकरण की गंभीरता के अनुसार इसमें वृद्धि भी की जा सकती है। दोषी को पीड़ित के उपचार एवं पुनर्वास के लिए भी आर्थिक दंड चुकाना होगा। अब जबरन धर्म परिवर्तन के संबंध में कोई भी व्यक्ति प्राथमिकी दर्ज करवा सकता है। इससे पूर्व केवल पीड़ित व्यक्ति, उसके परिवारजन अथवा संबंधी ही प्राथमिकी दर्ज करवा सकते थे।
इस प्रकार योगी सरकार ने जबरन धर्म परिवर्तन रोकने की दिशा में प्रथम पग उठा लिया है। अब इस विधेयक को विधानसभा से पारित होने के पश्चात विधान परिषद भेजा जाएगा। तत्पश्चात इसे राज्यपाल के पास भेजा जाएगा। उसके पश्चात् इसे राष्ट्रपति को भेजा जाएगा।
 
उल्लेखनीय है कि इससे पूर्व नवंबर 2020 में योगी सरकार ने एक अध्यादेश जारी किया था। इसके पश्चात् फरवरी 2021 में उत्तर प्रदेश विधानमंडल के दोनों सदनों ने इस विधेयक को पारित कर दिया था। इस प्रकार उत्तर प्रदेश विधि विरुद्ध धर्म संपरिवर्तन प्रतिषेध अधिनियम- 2021 अस्तित्व में आया था। इस विधेयक के अंतर्गत दोषी को एक से 10 वर्ष तक के कारावास का प्रावधान था। इस विधेयक के अंतर्गत केवल विवाह के लिए किया गया धर्म परिवर्तन ही अमान्य था। किसी से झूठ बोलकर अथवा उसे धोखा देकर धर्म परिवर्तन को अपराध माना गया था। यदि कोई स्वेच्छा से धर्म परिवर्तन करता है तो उसे दो माह पूर्व मजिस्ट्रेट को सूचित करने का प्रावधान था। विधेयक के अनुसार जबरन अथवा धोखे से धर्म परिवर्तन के लिए 15 हजार रुपए आर्थिक दंड के साथ एक से डेढ़ वर्ष के कारावास का प्रावधान था। यदि दलित लड़की का धर्म परिवर्तन होता है तो 25 हजार रुपए के आर्थिक दंड के साथ तीन से 10 वर्ष के कारावास का प्रावधान था।
 
उल्लेखनीय है कि जबरन धर्मांतरण के दृष्टिगत देश के कई राज्यों में जबरन धर्म परिवर्तन विरोधी कानून लागू हैं। इनमें ओडिशा, छत्तीसगढ़, झारखंड, उत्तराखंड, मध्य प्रदेश, कर्नाटक, गुजरात, हिमाचल प्रदेश एवं हरियाणा सम्मिलित हैं। महारष्ट्र में भी जबरन धर्म परिवर्तन के विरुद्ध विधेयक लाने की बात कही जाती रही है, किंतु इस संबंध में कोई विशेष प्रगति नहीं हो सकी है।   
 
पूर्व के कानून की तुलना में नए कानून को अधिक सशक्त एवं कठोर बनाया है। इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि लव जिहाद के प्रकरण रुकने का नाम नहीं ले रहे हैं। हिन्दुत्ववादी संगठन लम्बे समय से कठोर कानून की मांग करते आ रहे हैं। उनका तर्क है कि कठोर कानून से ही उनकी बहन-बेटियां सुरक्षित रह सकेंगी। देश में एक वर्ग ऐसा भी है जो लव जिहाद को ‘मिथ्या’ की संज्ञा देता है। इस वर्ग का कहना है कि देश में ‘लव जिहाद’ नाम की कोई चीज नहीं है। प्रश्न यह भी है कि यदि ऐसा है तो फिर यही वर्ग इस प्रकार के कानूनों की आलोचना क्यों करता है?     
 
वास्तव में यह विधेयक किसी समुदाय या वर्ग विशेष के विरुद्ध नहीं है, अपितु यह केवल जबरन धर्म परिवर्तन के विरुद्ध है। स्वेच्छा से धर्म परिवर्तन करने पर कोई रोक नहीं है। उत्तर प्रदेश सरकार में मंत्री ओमप्रकाश राजभर का कहना है- "कानून में जो संशोधन और सुधार हो रहा है उसके पीछे यह मकसद है कि और कड़ाई से नियम लागू हों और इस तरह की चीजें न हो। विपक्ष जो कह रहा है कि यह सिर्फ मुसलमानों के लिए है, यह कानून सभी धर्मों के लोगों के लिए बनाया गया है, सिर्फ एक धर्म के लिए नहीं, वे इसका विरोध सिर्फ इसलिए करते हैं ताकि मुसलमान उनका गुलाम बना रहे और उन्हें वोट देता रहे, वे सरकार बनाते रहें और मुसलमानों को धोखा देते रहें।"
 
कुछ लोग कहते हैं कि प्रेम धर्म नहीं देखता है। यदि प्रेम की बात की जाए, तो प्रेम त्याग का दूसरा रूप है। प्रेम की बात करने वाले लोगों को त्याग के नाम पर सांप सूंघ जाता है। यह कैसा प्रेम है, जो केवल लड़की से उसकी धार्मिक एवं सांस्कृतिक पहचान छीन लेता है। यदि पुरुष इतना ही प्रेम करने वाला है, तो वह लड़की का धर्म स्वीकार क्यों नहीं करता? यह कैसा एक पक्षीय प्रेम है?  प्रेम के नाम पर धोखा, छल और साजिश तो नहीं ?
(लेखक – राजनीतिक विश्लेषक हैं)
 

नरेंद्र मोदी का व्यक्तित्व अत्यंत विराट है : सौरभ मालवीय

महानायक श्री नरेन्द्र मोदी जी को जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनाएं. पुस्तक चर्चा नरेंद्र मोदी का व्यक्तित्व अत्यंत विराट है : सौरभ मालवीय मीडिया...