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Monday, April 13, 2026

आया बैसाखी का पावन पर्व


डॊं. सौरभ मालवीय
बैसाखी ऋतु आधारित पर्व है. बैसाखी को वैसाखी भी कहा जाता है. पंजाबी में इसे विसाखी कहते हैं. बैसाखी कृषि आधारित पर्व है. जब फ़सल पक कर तैयार हो जाती है और उसकी कटाई का काम शुरू हो जाता है, तब यह पर्व मनाया जाता है. यह पूरी देश में मनाया जाता है, परंतु पंजाब और हरियाणा में इसकी धूम अधिक होती है. बैसाखी प्रायः प्रति वर्ष 13 अप्रैल को मनाई जाती है, किन्तु कभी-कभी यह पर्व 14 अप्रैल को भी मनाया जाता है.

यह सिखों का प्रसिद्ध पर्व है. जब मुगल शासक औरंगजेब ने अन्याय एवं अत्याचार की सभी सीमाएं तोड़कर  श्री गुरु तेग बहादुरजी को दिल्ली में चांदनी चौक पर शहीद किया था, तब इस तरह 13 अप्रैल,1699 को श्री केसगढ़ साहिब आनंदपुर में दसवें गुरु गोविंद सिंह जी ने अपने अनुयायियों को संगठित कर खालसा पंथ की स्थापना की थी. सिखो के दूसरे गुरु, गुरु अंगद देव का जन्म इसी महीने में हुआ था. सिख इसे सामूहिक जन्मदिवस के रूप में मनाते हैं. गोविंद सिंह जी ने निम्न जाति के समझे जाने वाले लोगों को एक ही पात्र से अमृत छकाकर पांच प्यारे सजाए, जिन्हें पंज प्यारे भी कहा जाता है. ये पांच प्यारे किसी एक जाति या स्थान के नहीं थे. सब अलग-अलग जाति, कुल एवं अलग स्थानों के थे. अमृत छकाने के बाद इनके नाम के साथ सिंह शब्द लगा दिया गया.
इस दिन श्रद्धालु अरदास के लिए गुरुद्वारों में जाते हैं. आनंदपुर साहिब में मुख्य समारोह का आयोजन किया जाता है. प्रात: चार बजे गुरु ग्रंथ साहिब को समारोहपूर्वक कक्ष से बाहर लाया जाता है. फिर दूध और जल से प्रतीकात्मक स्नान करवाया जाता है. इसके पश्चात गुरु ग्रंथ साहिब को तख्त पर बिठाया जाता है. इस अवसर पर पंज प्यारे पंजबानी गाते हैं. दिन में अरदास के बाद गुरु को कड़ा प्रसाद का भोग लगाया जाता है. प्रसाद लेने के बाद श्रद्धालु गुरु के लंगर में सम्मिलत होते हैं. इस दिन श्रद्धालु कारसेवा करते हैं. दिनभर गुरु गोविंदसिंह और पंज प्यारों के सम्मान में शबद और कीर्तन गाए जाते हैं.
शाम को आग के आसपास इकट्ठे होकर लोग नई फ़सल की की खुशियां मनाते हैं और पंजाब का परंपरागत नृत्य भांगड़ा और गिद्दा किया जाता है.

बैसाखी के दिन सूर्य मेष राशि में प्रवेश करता है. हिन्दुओं के लिए भी बैसाखी का बहुत महत्व है. पौराणिक कथा के अनुसार ब्रह्मा जी ने सृष्टि की रचना इसी दिन की थी.  इसी दिन अयोध्या में श्रीराम का राज्याभिषेक हुआ था. राजा विक्रमादित्य ने विक्रमी संवत का प्रारंभ इसी दिन से किया था, इसलिए इसे विक्रमी संवत कहा जाता है. बैसाखी के पावन पर्व पर पवित्र नदियों में स्नान किया जाता है. महादेव और दुर्गा देवी की पूजा की जाती है. इस दिन लोग नये कपड़े पहनते हैं. वे घर में मिष्ठान बनाते हैं. बैसाखी के पर्व पर लगने वाला बैसाखी मेला बहुत प्रसिद्ध है. जगह-जगह विशेषकर नदी किनारे बैसाखी के दिन मेले लगते हैं. हिंदुओं के लिए यह पर्व नववर्ष की शुरुआत है. हिन्दू इसे स्नान, भोग लगाकर और पूजा करके मनाते हैं.

Thursday, March 19, 2026

नववर्ष विक्रम संवत एवं चैत्र नवरात्रि की हार्दिक शुभकामनाएं



भारतीय सांस्कृतिक गौरव की स्मृतियाँ समेटे हुए नव संवत्सर (विक्रम संवत-२०८३) के शुभारंभ के पावन अवसर पर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू जी ने श्री अयोध्या धाम में श्रीराम जन्मभूमि मंदिर में श्रीराम यंत्र की प्रतिष्ठापना कर प्रभु श्रीरामलला के दर्शन-पूजन किए।

यह दिव्य आयोजन राष्ट्र के आध्यात्मिक उत्थान, लोककल्याण एवं सनातन सांस्कृतिक चेतना को नवीन ऊर्जा प्रदान करने वाला है।
नववर्ष विक्रम संवत २०८३ एवं चैत्र नवरात्रि की हार्दिक शुभकामनाएं।

Thursday, January 22, 2026

वसंतोत्सव : प्रेम का पर्व


डॊ. सौरभ मालवीय
प्राचीन काल से ही भारतीय संस्कृति में ऋतुओं का विशेष महत्व रहा है. इन ऋतुओं ने विभिन्न प्रकार से हमारे जीवन को प्रभावित किया है. ये हमारे जन-जीवन से गहरे से जुड़ी हुई हैं. इनका अपना धार्मिक और पौराणिक महत्व है. वसंत ऋतु का भी अपना ही महत्व है. भारत की संस्कृति प्रेममय रही है. इसका सबसे बड़ा उदाहरण वसंत पंचमी का पावन पर्व है. वसंत पंचमी को वसंतोत्सव और मदनोत्सव भी कहा जाता है. प्राचीन काल में स्त्रियां इस दिन अपने पति की कामदेव के रूप में पूजा करती थीं, क्योंकि इसी दिन कामदेव और रति ने सर्वप्रथम मानव हृदय में प्रेम और आकर्षण का संचार किया था. यही प्रेम और आकर्षण दोनों के अटूट संबंध का आधार बना, संतानोत्पत्ति का माध्यम बना.

वसंत पंचमी का पर्व माघ मास में शुक्ल पक्ष की पंचमी के दिन मनाया जाता है, इसलिए इसे वसंत पंचमी कहा जाता है. इस दिन विद्या की देवी सरस्वती की पूजा-अर्चना की जाती है. भारत सहित कई देशों में यह पर्व हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है. इस दिन घरों में पीले चावल बनाए जाते हैं, पीले फूलों से देवी सरस्वती की पूजा की जाती है. महिलाएं पीले कपड़े पहनती हैं. बच्चे पीली पतंगे उड़ाते हैं. विद्या के प्रारंभ के लिए ये दिन शुभ माना जाता है. कलाकारों के लिए इस दिन का विशेष महत्व है.

प्राचीन भारत में पूरे वर्ष को जिन छह ऋतुओं में विभाजित किया जाता था, उनमें वसंत जनमानस की प्रिय ऋतु थी. इसे मधुमास भी कहा जाता है. इस दौरान सूर्य कुंभ राशि में प्रवेश कर लेता है. इस ऋतु में खेतों में फ़सलें पकने लगती हैं, वृक्षों पर नये पत्ते आ जाते हैं. आम पर की शाख़ों पर बौर आ जाता है. उपवनों में रंग-बिरंगे पुष्प खिलने लगते हैं. चहुंओर बहार ही बहार होती है. रंग-बिरंगी तितलियां वातावरण को और अधिक सुंदर बना देती हैं.

वसंत का धार्मिक महत्व भी है. वसंत ऋतु का स्वागत करने के लिए माघ मास के पांचवे दिन महोत्सव का आयोजन किया जाता था. इस उत्सव में भगवान विष्णु और कामदेव की पूजा होती थी. शास्त्रों में वसंत पंचमी को ऋषि पंचमी से उल्लेखित किया गया है, तो पुराणों-शास्त्रों तथा अनेक काव्यग्रंथों में भी अलग-अलग ढंग से इसका चित्रण मिलता है. मान्यता है कि सृष्टि के प्रारंभिक काल में भगवान विष्णु की आज्ञा से ब्रह्मा ने जीवों की रचना की, परंतु इससे वे संतुष्ट नहीं थे. भगवान विष्णु ने अपने कमंडल से जल छिड़का, जिससे एक चतुर्भुजी सुंदर स्त्री प्रकट हुई, जिसके एक हाथ में वीणा तथा दूसरा हाथ वर मुद्रा में था. अन्य दोनों हाथों में पुस्तक एवं माला थी. ब्रह्मा ने देवी से वीणा बजाने का अनुरोध किया. जैसे ही देवी ने वीणा का मधुरनाद किया, वैसे ही संसार के समस्त जीव-जन्तुओं को वाणी प्राप्त हो गई. जलधारा में कोलाहल व्याप्त हो गया. पवन चलने से सरसराहट होने लगी. तब ब्रह्मा ने उस देवी को वाणी की देवी सरस्वती के नाम से पुकारा. सरस्वती को बागीश्वरी, भगवती, शारदा, वीणावादनी और वाग्देवी सहित अनेक नामों से पूजा जाता है. वे विद्या और बुद्धि प्रदान करती हैं. संगीत की उत्पत्ति करने के कारण वे संगीत की देवी कहलाईं. वसंत पंचमी को उनके जन्मोत्सव के रूप में भी मनाते हैं. ऋग्वेद में भगवती सरस्वती का वर्णन करते हुए उल्लेख गया है-
प्रणो देवी सरस्वती वाजेभिर्वजिनीवती धीनामणित्रयवतु।
अर्थात ये परम चेतना हैं. सरस्वती के रूप में ये हमारी बुद्धि, प्रज्ञा तथा मनोवृत्तियों की संरक्षिका हैं. हममें जो आचार और मेधा है, उसका आधार भगवती सरस्वती ही हैं. इनकी समृद्धि और स्वरूप का वैभव अद्भुत है.
मान्यता है कि वसंत पंचमी के दिन देवी सरस्वती पूजा करने और व्रत रखने से वाणी मधुर होती है, स्मरण शक्ति तीव्र होती है, प्राणियों को सौभाग्य प्राप्त होता है तथा विद्या में कुशलता प्राप्त होती है.
"यथा वु देवि भगवान ब्रह्मा लोकपितामहः।
त्वां परित्यज्य नो तिष्ठंन, तथा भव वरप्रदा।।
वेद शास्त्राणि सर्वाणि नृत्य गीतादिकं चरेत्।
वादितं यत् त्वया देवि तथा मे सन्तुसिद्धयः।।
लक्ष्मीर्वेदवरा रिष्टिर्गौरी तुष्टिः प्रभामतिः।
एताभिः परिहत्तनुरिष्टाभिर्मा सरस्वति।।
अर्थात् देवी! जिस प्रकार लोकपितामह ब्रह्मा आपका कभी परित्याग नहीं करते, उसी प्रकार आप भी हमें वर दीजिए कि हमारा भी कभी अपने परिवार के लोगों से वियोग न हो. हे देवी! वेदादि सम्पूर्ण शास्त्र तथा नृत्य गीतादि जो भी विद्याएं हैं, वे सभी आपके अधिष्ठान में ही रहती हैं, वे सभी मुझे प्राप्त हों. हे भगवती सरस्वती देवी! आप अपनी- लक्ष्मी, मेधा, वरारिष्टि, गौरी, तुष्टि, प्रभा तथा मति- इन आठ मूर्तियों के द्वारा मेरी रक्षा करें.

पुराणों के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण ने सरस्वती से प्रसन्न होकर उन्हें वरदान दिया था कि वसंत पंचमी के दिन तुम्हारी भी आराधना की जाएगी. इस तरह भारत के कई हिस्सों में वसंत पंचमी के दिन विद्या की देवी सरस्वती की भी पूजा होने लगी. त्रेता युग में जिस दिन श्रीराम शबरी मां के आश्रम में पहुंचे थे, वह वसंत पंचमी का ही दिन था. श्रीराम ने भीलनी शबरी मां के झूठे बेर खाए थे. गुजरात के डांग जिले में जिस स्थान पर शबरी मां के आश्रम था, वहां आज भी एक शिला है. लोग इस शिला की पूजा-अर्चना करते हैं. बताया जाता है कि श्रीराम यहीं आकर बैठे थे. इस स्थान पर शबरी माता का मंदिर भी है, जहां दूर-दूर से श्र्द्धालु आते हैं.

वसंत पंचमी के दिन मथुरा में दुर्वासा ऋषि के मंदिर पर मेला लगता है. सभी मंदिरों में उत्सव एवं भगवान के विशेष शृंगार होते हैं. वृंदावन के श्रीबांके बिहारीजी मंदिर में बसंती कक्ष खुलता है. शाह जी के मंदिर का बसंती कमरा प्रसिद्ध है. मंदिरों में वसंती भोग रखे जाते हैं और वसंत के राग गाये जाते हैं वसंम पंचमी से ही होली गाना शुरू हो जाता है. ब्रज का यह परम्परागत उत्सव है.

इस दिन हरियाणा के कुरुक्षेत्र जिले के पौराणिक नगर पिहोवा में सरस्वती की विशेष पूजा-अर्चना होती है. पिहोवा को सरस्वती का नगर भी कहा जाता है, क्योंकि यहां प्राचीन समय से ही सरस्वती सरिता प्रवाहित होती रही है. सरस्वती सरिता के तट पर इस क्षेत्र में अनेक प्राचीन तीर्थ स्थल हैं. यहां सरस्वती सरिता के तट पर विश्वामित्र जी ने गायत्री छंद की रचना की थी. पिहोवा का सबसे मुख्य तीर्थ सरस्वती घाट है, जहां सरस्वती नदी बहती है. यहां देवी सरस्वती का अति प्राचीन मंदिर है. इन प्राचीन मंदिरों में देशभर के श्रद्धालु आते हैं. यहां भव्य शोभायात्रा निकलती है.

वसंत पंचमी का साहित्यिक महत्व भी है. इस दिन हिन्दी साहित्य की अमर विभूति महाकवि सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' का जन्मदिवस भी है. 28 फरवरी, 1899 को जिस दिन निराला जी का जन्म हुआ, उस दिन वसंत पंचमी ही थी. वंसत कवियों की अति प्रिय ऋतु रही है. कालजयी रचनाकार रवींद्रनाथ टैगोर ने वसंत ऋतु के महत्व को दर्शाते हुए लिखा है-
आओ आओ कहे वसंत धरती पर, लाओ कुछ गान प्रेमतान
लाओ नवयौवन की उमंग नवप्राण, उत्फुल्ल नई कामनाएं घरती पर
हिंदी साहित्य में छायावादी युग के महान स्तंभ सुमित्रानंदन पंत वसंत का मनोहारी वर्णन करते हुए कहते हैं-
चंचल पग दीपशिखा के धर
गृह मग वन में आया वसंत।
सुलगा फागुन का सूनापन
सौंदर्य शिखाओं में अनंत।
सौरभ की शीतल ज्वाला से
फैला उर-उर में मधुर दाह
आया वसंत भर पृथ्वी पर
स्वर्गिक सुंदरता का प्रवाह।
वसंत पंचमी हमारे जीवन में नव ऊर्जा का संचार करती है. ये निरंतर आगे बढ़ने की प्रेरणा देती है. जिस तरह वृक्ष पुराने पत्तों को त्याग कर नये पत्ते धारण करते हैं, ठीक उसी तरह हमें भी अपने अतीत के दुखों को त्याग कर आने वाले भविष्य के स्वप्न संजोने चाहिए.

संपर्क
डॉ. सौरभ मालवीय
सहायक प्राध्यापक
माखनलाल चतुर्वेदी
राष्‍ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल (मध्य प्रदेश)
मो. +919907890614
ईमेल : drsourabhmalviya@gmail.com

Saturday, October 25, 2025

सूर्य उपासना का पर्व है छठ पूजा

डॉ. सौरभ मालवीय
छठ सूर्य की उपासना का पर्व है. यह प्रात:काल में सूर्य की प्रथम किरण और सायंकाल में सूर्य की अंतिम किरण को अर्घ्य देकर पूर्ण किया जाता है.  सूर्य उपासना का पावन पर्व छठ कार्तिक शुक्ल की षष्ठी को मनाया जाने जाता है. इसलिए इसे छठ कहा जाता है. हिन्दू धर्म में सूर्य उपासना का बहुत महत्व है. छठ पूजा के दौरान क केवल सूर्य देव की उपासना की जाती है, अपितु सूर्य देव की पत्नी उषा और प्रत्यूषा की भी आराधना की जाती है अर्थात प्रात:काल में सूर्य की प्रथम किरण ऊषा तथा सायंकाल में सूर्य की अंतिम किरण प्रत्यूषा को अर्घ्य देकर उनकी उपासना की जाती है. पहले यह पर्व पूर्वी भारत के बिहार, झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश और नेपाल के तराई क्षेत्रों में मनाया जाता था, लेकिन अब इसे देशभर में मनाया जाता है. पूर्वी भारत के लोग जहां भी रहते हैं, वहीं इसे पूरी आस्था से मनाते हैं.

छठ पूजा चार दिवसीय पर्व है. इसका प्रारंभ कार्तिक शुक्ल चतुर्थी को तथा कार्तिक शुक्ल सप्तमी को यह समाप्त होता है. इस दौरान व्रतधारी लगातार 36 घंटे का कठोर व्रत रखते हैं. इस दौरान वे पानी भी ग्रहण नहीं करते. पहला दिन कार्तिक शुक्ल चतुर्थी नहाय-खाय के रूप में मनाया जाता है. सबसे पहले घर की साफ-सफाई की जाती है. इसके पश्चात छठव्रती स्नान कर पवित्र विधि से बना शुद्ध शाकाहारी भोजन ग्रहण कर व्रत आरंभ करते हैं. घर के सभी सदस्य व्रती के भोजन करने के उपरांत ही भोजन ग्रहण करते हैं. भोजन के रूप में कद्दू-चने की दाल और चावल ग्रहण किया जाता है. दूसरा दिन कार्तिक शुक्ल पंचमी खरना कहा जाता है. व्रतधारी दिन भर का उपवास रखने के पश्चात संध्या को भोजन करते हैं. खरना का प्रसाद लेने के लिए आस-पास के सभी लोगों को बुलाया जाता है. प्रसाद के रूप में गन्ने के रस में बने हुए चावल की खीर, दूध, चावल का पिट्ठा और घी चुपड़ी रोटी बनाई जाती है. इसमें नमक या चीनी का उपयोग नहीं किया जाता है. तीसरे दिन कार्तिक शुक्ल षष्ठी को दिन में छठ प्रसाद बनाया जाता है. प्रसाद के रूप में ठेकुआ और चावल के लड्डू बनाए जाते हैं. चढ़ावे के रूप में लाया गया सांचा और फल भी छठ प्रसाद के रूप में सम्मिलित होते हैं. संध्या के समय बांस की टोकरी में अर्घ्य का सूप सजाया जाता है और व्रती के साथ परिवार तथा पड़ोस के सारे लोग अस्ताचलगामी सूर्य को अर्घ्य देने घाट की ओर चल पड़ते हैं. सभी छठ व्रती नदी या तालाब के किनारे एकत्रित होकर सामूहिक रूप से अर्घ्य दान संपन्न करते हैं. सूर्य देव को जल और दूध का अर्घ्य दिया जाता है तथा छठी मैया की प्रसाद भरे सूप से पूजा की जाती है. चौथे दिन कार्तिक शुक्ल सप्तमी की सुबह उदियमान सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है. व्रती वहीं पुनः इक्ट्ठा होते हैं, जहां उन्होंने संध्या के समय सूर्य को अर्घ्य दिया था और सूर्य को अर्घ्य देते हैं. इसके पश्चात व्रती कच्चे दूध का शीतल पेय पीकर तथा प्रसाद खाकर व्रत पूर्ण करते हैं. इस पूजा में पवित्रता का ध्यान रखा जाता है; लहसून, प्याज वर्जित है. जिन घरों में यह पूजा होती है, वहां छठ के गीत गाए जाते हैं.

छठ का व्रत बहुत कठोर होता है. चार दिवसीय इस व्रत में व्रती को लगातार उपवास करना होता है. इस दौरान व्रती को भोजन तो छोड़ना ही पड़ता है. इसके अतिरिक्त उसे भूमि पर सोना पड़ता है. इस पर्व में सम्मिलित लोग नये वस्त्र धारण करते हैं, परंतु व्रती बिना सिलाई वाले वस्त्र पहनते हैं. महिलाएं साड़ी और पुरुष धोती पहनकर छठ पूजा करते हैं. इसकी एक विशेषता यह भी है कि प्रारंभ करने के बाद छठ पर्व को उस समय तक करना होता है, जब तक कि अगली पीढ़ी की किसी विवाहित महिला इसे आरंभ नहीं करती. उल्लेखनीय है कि परिवार में किसी की मृत्यु हो जाने पर यह पर्व नहीं मनाया जाता है.

छठ पर्व कैसे आरंभ हुआ, इसके पीछे अनेक कथाएं हैं. एक मान्यता के अनुसार लंका विजय के बाद रामराज्य की स्थापना के दिन कार्तिक शुक्ल षष्ठी को भगवान राम और सीता मैया ने उपवास रखकर सूर्यदेव की पूजा की थी. सप्तमी को सूर्योदय के समय पुनः अनुष्ठान कर सूर्यदेव से आशीर्वाद प्राप्त किया था. एक अन्य  कथा के अनुसार राजा प्रियवद को कोई संतान नहीं थी, तब महर्षि कश्यप ने पुत्रेष्टि यज्ञ कराकर उनकी पत्नी मालिनी को यज्ञाहुति के लिए बनाई गई खीर दी थी. इसके प्रभाव से उन्हें पुत्र हुआ, परंतु वह मृत पैदा हुआ. प्रियवद पुत्र को लेकर श्मशान गए और पुत्र वियोग में प्राण त्यागने लगे. तभी भगवान की मानस कन्या देवसेना प्रकट हुई. उसने कहा कि सृष्टि की मूल प्रवृत्ति के छठे अंश से उत्पन्न होने के कारण वह षष्ठी है. उसने राजा से कहा कि वह उसकी उपासना करे, जिससे उसकी मनोकामना पूर्ण होगी. राजा ने पुत्र इच्छा से देवी षष्ठी का व्रत किया और उन्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई. यह पूजा कार्तिक शुक्ल षष्ठी को हुई थी. एक अन्य मान्यता के अनुसार छठ पर्व का आरंभ महाभारत काल में हुआ था. सबसे पहले सूर्य पुत्र कर्ण ने सूर्य देव की पूजा शुरू की थी. वह प्रतिदिन घंटों कमर तक पानी में ख़ड़े होकर सूर्य को अर्घ्य देता था.  आज भी छठ में सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है. कुछ कथाओं में पांडवों की पत्नी द्रौपदी द्वारा सूर्य की पूजा करने का उल्लेख है.

पौराणिक काल में सूर्य को आरोग्य देवता भी माना जाता था. भारत में वैदिक काल से ही सूर्य की उपासना की जाती रही है. देवता के रूप में सूर्य की वंदना का उल्लेख पहली बार ऋगवेद में मिलता है. विष्णु पुराण, भगवत पुराण, ब्रह्मा वैवर्त पुराण आदि में इसकी विस्तार से चर्चा की गई है. उत्तर वैदिक काल के अंतिम कालखंड में सूर्य के मानवीय रूप की कल्पना की जाने लगी.  कालांतर में सूर्य की मूर्ति पूजा की जाने लगी. अनेक स्थानों पर सूर्य देव के मंदिर भी बनाए गए. कोणार्क का सूर्य मंदिर विश्व प्रसिद्ध है.

छठ महोत्सव के दौरान छठ के लोकगीत गाए जाते हैं, जिससे सारा वातावरण भक्तिमय हो जाता है.
’कईली बरतिया तोहार हे छठी मैया’ जैसे लोकगीतों पर मन झूम उठता है.

Saturday, October 18, 2025

अंधेरे पर प्रकाश की जीत का पर्व है दीपावली

डॊ. सौरभ मालवीय
असतो मा सद्गमय।
तमसो मा ज्योतिर्गमय।
मृत्योर्मा अमृतं गमय।
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
अर्थात्
असत्य से सत्य की ओर।
अंधकार से प्रकाश की ओर।
मृत्यु से अमरता की ओर।
ॐ शांति शांति शांति।।
अर्थात् इस प्रार्थना में अंधकार से प्रकाश की ओर जाने की कामना की गई है. दीपों का पावन पर्व दीपावली भी यही संदेश देता है. यह अंधकार पर प्रकाश की जीत का पर्व है. दीपावली का अर्थ है दीपों की श्रृंखला. दीपावली शब्द की उत्पत्ति संस्कृत के दो शब्दों 'दीप' एवं 'आवली' अर्थात 'श्रृंखला' के मिश्रण से हुई है. दीपावली का पर्व कार्तिक अमावस्या को मनाया जाता है. वास्तव में दीपावली एक दिवसीय पर्व नहीं है, अपितु यह कई त्यौहारों का समूह है, जिनमें धन त्रयोदशी अर्थात धनतेरस, नरक चतुर्दशी, दीपावली, गोवर्धन पूजा और भैया दूज सम्मिलित हैं. दीपावली महोत्सव कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी से शुक्ल पक्ष की दूज तक हर्षोल्लास से मनाया जाता है. धनतेरस के दिन बर्तन खरीदना शुभ माना जाता है. तुलसी या घर के द्वार पर दीप जलाया जाता है. नरक चतुर्दशी के दिन यम की पूजा के लिए दीप जलाए जाते हैं.  गोवर्धन पूजा के दिन लोग गाय-बैलों को सजाते हैं तथा गोबर का पर्वत बनाकर उसकी पूजा करते हैं. भैया दूज पर बहन अपने भाई के माथे पर तिलक लगाकर उसके लिए मंगल कामना करती है. इस दिन यमुना नदी में स्नान करने की भी परंपरा है.

प्राचीन हिंदू ग्रंथ रामायण के अनुसार दीपावली के दिन श्रीरामचंद्र अपने चौदह वर्ष के वनवास के पश्चात अयोध्या लौटे थे. अयोध्यावासियों ने श्रीराम के स्वागत में घी के दीप जलाए थे. प्राचीन हिन्दू महाकाव्य महाभारत के अनुसार दीपावली के दिन ही 12 वर्षों के वनवास एवं एक वर्ष के अज्ञातवास के बाद पांडवों की वापसी हुई थी. मान्यता यह भी है कि दीपावली का पर्व भगवान विष्णु की पत्नी देवी लक्ष्मी से संबंधित है. दीपावली का पांच दिवसीय महोत्सव देवताओं और राक्षसों द्वारा दूध के लौकिक सागर के मंथन से पैदा हुई लक्ष्मी के जन्म दिवस से प्रारंभ होता है. समुद्र मंथन से प्राप्त चौदह रत्नों में लक्ष्मी भी एक थीं, जिनका प्रादुर्भाव कार्तिक मास की अमावस्या को हुआ था. उस दिन से कार्तिक की अमावस्या लक्ष्मी-पूजन का त्यौहार बन गया. दीपावली की रात को लक्ष्मी ने अपने पति के रूप में विष्णु को चुना और फिर उनसे विवाह किया था. मान्यता है कि दीपावली के दिन विष्णु की बैकुंठ धाम में वापसी हुई थी.
कृष्ण भक्तों के अनुसार इस दिन भगवान श्रीकृष्ण ने अत्याचारी राजा नरकासुर का वध किया था. एक पौराणिक कथा के अनुसार भगवान विष्णु ने नरसिंह रूप धारणकर हिरण्यकश्यप का वध किया था. यह भी कहा जाता है कि इसी दिन समुद्र मंथन के पश्चात धन्वंतरि प्रकट हुए. मान्यता है कि इस दिन देवी लक्ष्मी प्रसन्न रहती हैं. जो लोग इस दिन देवी लक्ष्मी की पूजा करते हैं, उन पर देवी की विशेष कृपा होती है. लोग लक्ष्मी के साथ-साथ संकट विमोचक गणेश, विद्या की देवी सरस्वती और धन के देवता कुबेर की भी पूजा-अर्चना करते हैं.

अन्य हिन्दू त्यौहारों की भांति दीपावली भी देश के अन्य राज्यों में विभिन्न रूपों में मनाई जाती है. बंगाल और ओडिशा में दीपावली काली पूजा के रूप में मनाई जाती है. इस दिन यहां के हिन्दू देवी लक्ष्मी के स्थान पर काली की पूजा-अर्चना करते हैं. उत्तर प्रदेश के मथुरा और उत्तर मध्य क्षेत्रों में इसे भगवान श्री कृष्ण से जुड़ा पर्व माना जाता है. गोवर्धन पूजा या अन्नकूट पर श्रीकृष्ण के लिए 56 या 108 विभिन्न व्यंजनों का भोग लगाया जाता है.

दीपावली का ऐतिहासिक महत्व भी है. हिन्दू राजाओं की भांति मुगल सम्राट भी दीपावली का पर्व बड़ी धूमधाम से मनाया करते थे. सम्राट अकबर के शासनकाल में दीपावली के दिन दौलतखाने के सामने ऊंचे बांस पर एक बड़ा आकाशदीप लटकाया जाता था. बादशाह जहांगीर और मुगल वंश के अंतिम सम्राट बहादुर शाह जफर ने भी इस परंपरा को बनाए रखा. दीपावली के अवसर पर वे कई समारोह आयोजित किया करते थे. शाह आलम द्वितीय के समय में भी पूरे महल को दीपों से सुसज्जित किया जाता था. कई महापुरुषों से भी दीपावली का संबंध है. स्वामी रामतीर्थ का जन्म एवं महाप्रयाण दोनों दीपावली के दिन ही हुआ था. उन्होंने दीपावली के दिन गंगातट पर स्नान करते समय समाधि ले ली थी. आर्य समाज के संस्थापाक महर्षि दयानंद ने दीपावली के दिन अवसान लिया था.

जैन और सिख समुदाय के लोगों के लिए भी दीपावली महत्वपूर्ण है. जैन समाज के लोग दीपावली को महावीर स्वामी के निर्वाण दिवस के रूप में मनाते हैं. जैन मतावलंबियों के अनुसार चौबीसवें तीर्थकर महावीर स्वामी को इस दिन मोक्ष की प्राप्ति हुई थी.  इसी दिन संध्याकाल में उनके प्रथम शिष्य गौतम गणधर को केवल ज्ञान की प्राप्ति हुई थी. जैन धर्म के मतानुसार लक्ष्मी का अर्थ है निर्वाण और सरस्वती का अर्थ है ज्ञान. इसलिए प्रातःकाल जैन मंदिरों में भगवान महावीर स्वामी का निर्वाण उत्सव मनाया जाता है और लड्डू का भोग लगाया जाता है. सिख समुदाय के लिए दीपावली का दिन इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसी दिन अमृतसर में वर्ष 1577 में स्वर्ण मंदिर का शिलान्यास हुआ था. वर्ष 1619 में दीपावली के दिन ही सिखों के छठे गुरु हरगोबिन्द सिंह जी को जेल से रिहा किया गया था.

दीपावली से पूर्व लोग अपने घरों, दुकानों आदि की सफाई करते हैं. घरों में मरम्मत, रंग-रोगन, सफ़ेदी आदि का कार्य कराते हैं. दीपावली पर लोग नये वस्त्र पहनते हैं. एक-दूसरे को मिष्ठान और उपहार देकर उनकी सुख-समृद्धि की कामना करते हैं. घरों में रंगोली बनाई जाती है, दीप जलाए जाते हैं. मोमबत्तियां जलाई जाती हैं. घरों व अन्य इमारतों को बिजली के रंग-बिरंगे बल्बों की झालरों से सजाया जाता है. रात में चहुंओर प्रकाश ही प्रकाश दिखाई देता है. आतिशबाज़ी भी की जाती है. अमावस की रात में आकाश में आतिशबाज़ी का प्रकाश बहुत ही मनोहारी दृश्य बनाता है.

दीपावली का धार्मिक ही नहीं, सांस्कृतिक और सामाजिक महत्व भी है. दीपावली पर खेतों में खड़ी खरीफ़ की फसल पकने लगती है, जिसे देखकर किसान फूला नहीं समाता. इस दिन व्यापारी अपना पुराना हिसाब-किताब निपटाकर नये बही-खाते तैयार करते हैं.

दीपावली बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है, लेकिन कुछ लोग इस दिन दुआ खेलते हैं और शराब पीते हैं. अत्यधिक आतिशबाज़ी के कारण ध्वनि और वायु प्रदूषण भी बढ़ता है. इसलिए इस बात की आवश्यकता है कि दीपों के इस पावन पर्व के संदेश को समझते हुए इसे पूरी श्रद्धा और आस्था के साथ मनाया जाए.

Tuesday, October 7, 2025

प्रेरणादायक हैं महर्षि वाल्मीकि के विचार

 

डॉ. सौरभ मालवीय 
विगत एक दशक से देशभर में भारतीय संस्कृति के पुनर्जागरण का स्वर्णिम युग चल रहा है। उत्तर प्रदेश सहित देशभर में सांस्कृतिक, धार्मिक एवं सामाजिक कार्य तीव्र गति से चल रहे हैं। भारतीय संस्कृति का विश्वुभर में प्रचार-प्रसार हो रहा है। यह सब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के अथक प्रयासों से ही संभव हो रहा है। उत्तर प्रदेश की योगी सरकार राज्य में धार्मिक एवं सांस्कृतिक गतिविधियों को निरंतर प्रोत्साहित कर रही है। इसी कड़ी में महर्षि वाल्मीकि जयंती धूमधाम से मनाई जा रही है। वाल्मीकि जयंती प्रत्येक वर्ष आश्विन मास की पूर्णिमा को मनाई जाती है। इसे महर्षि वाल्मीकि प्रकट दिवस भी कहा जाता है। इस दिन वाल्मीकि मंदिरों को सजाया जाता है। मंदिरों में पूजा-अर्चना की जाती है। श्रद्धालु सभा का आयोजन करते हैं। मंदिरों में कीर्तन एवं रामायण का पाठ होता है। इस दिन शोभायात्रा भी निकाली जाती है।    
 
योगी सरकार के आदेशानुसार राज्य के सभी जनपदों में वाल्मीकि जयंती हर्षोल्लास से मनाई जा रही है। महर्षि वाल्मीकि से संबंधित सभी स्थलों एवं मंदिरों में दीप प्रज्ज्वलन, दीपदान एवं रामायण के पाठ भी हो रहे हैं। यह कार्यक्रम जनपद, तहसील एवं विकास खंड स्तर पर आयोजित किए जा रहे हैं। इनके सफल आयोजन के लिए शासन ने विशेष प्रबंध किए हैं। आयोजन स्थलों पर स्वच्छता, पेयजल एवं विद्युत आदि का विशेष प्रबंध किया गया है। योगी सरकार ने इसके लिए अधिकारियों को विशेष निर्देश दिए हैं। समन्वय संस्कृति विभाग, सूचना-जनसंपर्क विभाग एवं पर्यटन एवं संस्कृति परिषद मिलकर कार्य कर रहे हैं। योगी सरकार धार्मिक एवं सांस्कृतिक कार्यक्रमों पर विशेष ध्यान दे रही है।    
 
उल्लेखनीय है कि इससे पूर्व देश के अनेक स्थानों पर वाल्मीकि जयंती केवल वाल्मीकि समाज के लोगों तक ही सीमित थी। केवल वाल्मीकि मंदिरों में ही वाल्मीकि जयंती पर कार्यक्रमों का आयोजन होता था। पूर्वाग्रहों अथवा अपरिहार्य कारणों से वाल्मीकि जयंती मनाने का समाज में अधिक चलन नहीं था। किंतु प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और योगी आदित्यनाथ के प्रयासों ने वाल्मीकि जयंती व्यापक स्तर पर धूमधाम से मनाई जाने लगी है। अब यह एक बड़ा पर्व बन चुकी है।  
 
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वाल्मीकि जयंती पर लोगों को शुभकामनाएं देते हुए कहा था कि सामाजिक समानता और सद्भावना से जुड़े उनके अनमोल विचार आज भी भारतीय समाज को सिंचित कर रहे हैं। मानवता के अपने संदेशों के माध्यम से वे युगों-युगों तक हमारी सभ्यता और संस्कृति की अमूल्य धरोहर बने रहेंगे। महर्षि वाल्मीकि के विचार आज भी भारतीय समाज को प्रेरित करते हैं। महर्षि वाल्मीकि के आदर्श लाखों लोगों को प्रेरित करते हैं। महर्षि वाल्मीकि गरीब और दलितों के लिए आशा की किरण हैं। उनकी सरकार के कदम महर्षि वाल्मीकि के विचारों से प्रेरित हैं। भगवान राम के आदर्श आज भारत के कोने-कोने में एक-दूसरे को जोड़ रहे हैं, इसका बहुत बड़ा श्रेय महर्षि वाल्मीकि को ही जाता है।
 
भारतीय संस्कृति में महर्षि वाल्मीकि का योगदान 
महर्षि वाल्मीकि का भारतीय संस्कृति में जो स्थान है, वह किसी अन्य को प्राप्त नहीं है। उन्हें आदिकवि भी कहा जाता है, क्योंकि उन्होंने रामायण नामक महाकाव्य की रचना की थी। यह संस्कृत का प्रथम महाकाव्य है। 
धार्मिक पवित्र ग्रंथ रामायण की रचना करके वे घर-घर में विराजमान हो गए। उन्होंने रामायण की संस्कृत में रचना की थी। इसे वाल्मीकि रामायण भी कहा जाता है। यह मौलिक ग्रंथ है। इसके पश्चात अनेक भाषाओं में रामायण लिखी गई, परंतु सबका आधार यही संस्कृत की वाल्मीकि रामायण ही थी। वाल्मीकि रामायण का अनेक भाषाओं में अनुवाद भी हो चुका है। 
 
महर्षि वाल्मीकि ने रामायण के माध्यम से भगवान विष्णु के अवतार श्रीराम का जीवन दर्शन जनसाधारण तक पहुंचाने का कार्य किया। मान्यता है कि रामायण लिखने की प्रेरणा उन्हें एक पक्षी से प्राप्त हुई थी। एक समय की बात है कि वाल्मीकि ने एक वृक्ष की शाखा पर बैठे क्रौंच पक्षी के एक युगल को देखा। वह युगल प्रेमालाप में लीन था। वाल्मीकि उस युगल को एकटक निहार रहे थे, तभी नर पक्षी को बहेलिये का एक तीर आकर लगा और वह वहीं मृत्यु को प्राप्त हो गया। अपने साथी की मृत्यु पर मादा पक्षी वेदना से तड़प उठी और विलाप करने लगी। उसके वेदनापूर्ण विलाप को सुनकर वाल्मीकि को अत्यंत दुख हुआ। वे उसकी पीड़ा से द्रवित हो उठे। इसी अवस्था में उनके मुख से स्वतः ही एक श्लोक निकला-
मा निषाद प्रतिष्ठां त्वंगमः शाश्वतीः समाः।
यत्क्रौंचमिथुनादेकं वधीः काममोहितम्॥
अर्थात हे दुष्ट, तुमने प्रेम में लीन क्रौंच पक्षी को मारा है। जा तुझे कभी भी प्रतिष्ठा की प्राप्ति नहीं होगी तथा तुझे भी वियोग झेलना पड़ेगा।
 
मान्यता यह भी है कि वाल्मीकि आदिकवि होने के साथ-साथ खगोल एवं ज्योतिष विद्या के भी ज्ञाता थे। इसका आधार यह है कि उन्होंने अनेक घटनाओं के समय सूर्य, चंद्र व अन्य नक्षत्र की स्थितियों का वर्णन किया है। ऐसा वही व्यक्ति कर सकता है, जिसे इन विद्याओं का ज्ञान हो।
 
महर्षि वाल्मीकि भारतीय संस्कृति के पुरोधा भी हैं। उन्होंने रामायण के माध्यम से श्रीराम के महान चरित्र से लोगों को अवगत करवाया है। उनके कारण ही अनंतकाल तक जनसाधारण श्रीराम से जुड़ा रहेगा। रामायण से ही हमें श्रीराम को जानने का अवसर प्राप्त हुआ है। वे एक आदर्श पुत्र थे। उन्होंने अपने पिता राजा दशरथ के वचन का पालन करने के लिए अपना सबकुछ त्याग दिया। उन्होंने राजा दशरथ द्वारा अपनी पत्नी कैकेयी को दिए वचन को पूर्ण करने के लिए अपना राज सिंहासन त्याग कर चौदह वर्ष का वनवास प्रसन्नतापूर्वक स्वीकार कर लिया। उन्होंने माता कैकेयी की प्रसन्नता के लिए वनवास स्वीकार किया। उन्होंने यह सिद्ध कर दिया कि उनके लिए पिता के वचन एवं माता की प्रसन्नता से अधिक कुछ भी महत्व नहीं रखता। उन्होंने वैभवशाली एवं ऐश्वर्य का जीवन त्याग दिया तथा वन में रहना उचित समझा। उन्होंने अपने पिता की मनोव्यथा एवं उनकी विवशता को हृदय से अनुभव किया। वे बिना किसी अनर्द्वन्द्व के वनवास के लिए चले गए। यह कोई सरल कार्य नहीं था, परंतु उन्होंने ऐसा कठोर निर्णय लिया। कुछ समय पूर्व ही उनका विवाह हुआ था। उन्हें अपनी पत्नी के साथ सुखमय दाम्पत्य जीवन का प्रारंभ करना था। श्रीराम के साथ-साथ उनकी पत्नी ने भी त्याग किया। जो सीता राजभवन में पली थीं। उन्होंने भी राजभवन का सुख त्याग कर पति के साथ वन में जाना चुना। इसी प्रकार श्रीराम के छोटे भ्राता लक्ष्मण ने भी अपने भाई और भाभी की सेवा के लिए वन में जाने का निर्णय लिया। वनवास तो केवल श्रीराम के लिए था, परंतु सीता और लक्ष्मण ने भी वनवास का स्वेच्छा से चयन करके यह सिद्ध कर दिया की उनके लिए श्रीराम से बढ़कर कुछ भी नहीं है। भरत ने भी हाथ में आया राजपाट त्याग दिया तथा अपनी माता कैकेयी से स्पष्ट रूप से कह दिया कीस राज सिंहासन पर केवल श्रीराम का ही अधिकार है। इसलिए वे इसे स्वीकार नहीं कर सकते। वास्तव में रामायण एक ऐसी कथा है, जो परिवार एवं समाज में आदर्श स्थापित करती है। 
 
किंवदंती है कि श्रीराम ने अपनी पत्नी सीता का त्याग कर दिया था। इस प्रकार माता सीता को पुन: वन में आना पड़ा। उस समय महर्षि वाल्मीकि ने माता सीता को अपने आश्रम में शरण दी थी। माता सीता अपना परिचय सबको नहीं देना चाहती थीं, इसलिए महर्षि ने उन्हें वन देवी का नाम दिया था। यहीं पर लव और कुश का जन्म हुआ था। यहीं लव और कुश ने अश्वमेघ को पकड़ा था और यहीं उनकी अपने पिता श्रीराम से भेंट हुई थी। महर्षि वाल्मीकि ने भारतीय जनमानस में राम के मर्यादित जीवन और सामाजिक जीवन को स्थापित किया।
(लेखक - सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के अध्येता हैं)

 

महर्षि वाल्मीकि जयंती उत्सव



लखनऊ। विराम खंड बस्ती के महर्षि वाल्मीकि जयंती एवं शरद पूर्णिमा उत्सव के अवसर पर उपस्थित नागरिक व स्वयंसेवक बन्धुओं के साथ रहने का अवसर मिला.
पूरा मानव समाज मह​र्षि वाल्मीकि जी के प्रति कृतज्ञ है, जिन्होंने प्रभु श्री राम के ऐसे आदर्श चरित्र का चित्रण किया, जो हर काल और परिस्थिति में प्रासंगिक एवं प्रेरणास्रोत बना हुआ है।
'त्रिकालदर्शी' के श्री चरणों में कोटिश: नमन!

Sunday, September 21, 2025

नवरात्रि का संदेश : नारी सशक्तीकरण

 

डॉ. सौरभ मालवीय 
भारतीय पर्व हमारी सांस्कृतिक विरासत के प्रतीक हैं। इनसे हमें ज्ञात होता है कि हमारी प्राचीन संस्कृति कितनी विशाल, संपन्न एवं समृद्ध है। यदि नवरात्रि की बात करें तो यह पर्व भी भारतीय संस्कृति की महानता को दर्शाता है। विगत कुछ दशकों से देश में महिला सशक्तीकरण की बात हो रही है। कुछ लोग विदेशों के उदाहरण देते हैं कि वहां की महिलाएं सशक्त हैं तथा उन्हें बहुत से अधिकार प्राप्त हैं। किंतु ये लोग अपने देश के इतिहास पर चिंतन एवं मनन नहीं करते हैं। वास्तव में भारत विश्व का एकमात्र ऐसा देश है, जहां महिलाओं को पुरुषों के समान माना गया है। उदाहरण के लिए भारत में देवियों की पूजा-अर्चना की जाती है। यहां पर उन्हें भी देवताओं के समान ही पूजा जाता है, अपितु देवियों का स्थान देवता से पहले आता है जैसे राधा कृष्ण, सीता राम आदि। भगवान शिव के साथ देवी पार्वती की भी पूजा की जाती है। भगवान राम के साथ देवी सीता की पूजा की जाती है तथा भगवान श्रीकृष्ण के साथ राधा की पूजा-अर्चना करने का विधान प्राचीन काल से ही चला आ रहा है। हमारी मान्यता के अनुसार शक्ति की देवी दुर्गा है। धन एवं समृद्धि की देवी लक्ष्मी है तथा ज्ञान की देवी सरस्वती है। कहने का अभिप्राय यह है कि मनुष्य को जीवन में जिन वस्तुओं की आवश्यकता होती है, वह सब उन्हें इन देवियों से ही तो प्राप्त होती हैं।    
नवरात्रि देवी दुर्गा को समर्पित एक महत्वपूर्ण पर्व है। नवरात्रि का पर्व वर्ष में चार बार आता है अर्थात चैत्र, आषाढ़, अश्विन, माघ। इनमें से चैत्र एवं आश्विन माह में आने वाली नवरात्रि अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है। माघ एवं आषाढ़ माह में आने वाली नवरात्रि को गुप्त नवरात्रि कहा जाता है, क्योंकि इनमें कोई सार्वजनिक उत्सव का आयोजन नहीं किया जाता है। आश्विन माह में आने वाली नवरात्रि को शारदीय नवरात्रि कहा जाता है। इसका  आरंभ अश्विन मास के शुक्ल पक्ष की प्रथम तिथि से होता है। इस दिवस पर शुभ मुहूर्त में कलश की स्थापना की जाती है। नवरात्रि में नौ दिन देवी दुर्गा के नौ रूपों की पूजा-अर्चना की जाती है।
प्रथमं शैलपुत्री च द्वितीयं ब्रह्मचारिणी।
तृतीयं चन्द्रघण्टेति कूष्माण्डेति चतुर्थकम्।।
पंचमं स्कन्दमातेति षष्ठं कात्यायनीति च।
सप्तमं कालरात्रीति महागौरीति चाष्टमम्।।
नवमं सिद्धिदात्री च नवदुर्गा: प्रकीर्तिता:।
उक्तान्येतानि नामानि ब्रह्मणैव महात्मना:।।
अर्थात देवी पहली शैलपुत्री, दूसरी ब्रह्मचारिणी, तीसरी चंद्रघंटा, चौथी कूष्मांडा, पांचवी स्कंध माता, छठी कात्यायिनी, सातवीं कालरात्रि, आठवीं महागौरी एवं नौवीं देवी सिद्धिदात्री है।

शैलपुत्री
नवरात्रि के प्रथम दिन देवी दुर्गा के प्रथम स्वरूप मां शैलपुत्री की पूजा-अर्चना की जाती है। मां शैलपुत्री को सफेद वस्तुएं अत्यंत प्रिय हैं, इसलिए उन्हें सफेद मिष्ठान का भोग लगाया जाता है। यह प्रसाद गाय के शुद्ध घी से बनाया जाता है। सफेद रंग पवित्रता एवं शांति का प्रतीक माना जाता है। जीवन में सर्वाधिक पवित्रता एवं शांति का ही महत्व है। इनके बिना सब व्यर्थ है। देवी की साधना से सुख एवं समृद्धि में वृद्धि होती है।

ब्रह्मचारिणी
नवरात्रि के दूसरे दिन देवी देवी दुर्गा के द्वितीय स्वरूप मां ब्रह्मचारिणी की पूजा-अर्चना की जाती है। मां ब्रह्मचारिणी को शक्कर एवं पंचामृत का भोग लगाया जाता है। शक्कर जीवन में मिठास का प्रतीक है। जिस प्रकार भोजन में मिष्ठान का महत्व है, उसी प्रकार जीवन में मधुर वाणी का महत्व है। मृदु भाषी व्यक्ति सबका मन मोह लेते हैं। देवी की साधना से भाग्य में वृद्धि होती है तथा आयु भी लम्बी होती है।  

चंद्रघंटा
नवरात्रि के तीसरे दिन देवी दुर्गा के तृतीय स्वरूप मां चंद्रघंटा की पूजा-अर्चना की जाती है। मां चंद्रघंटा को दुग्ध से बने मिष्ठान एवं खीर का भोग लगाया जाता है। खीर भी दुग्ध से बनाई जाती है। दुग्ध समृद्धि एवं अच्छे स्वास्थ्य का प्रतीक है। देवी की साधना से व्यक्ति बुरी शक्तियों से सुरक्षित रहता है।

कुष्मांडा
नवरात्रि के चौथे दिन देवी दुर्गा के चतुर्थ स्वरूप मां कुष्मांडा की पूजा-अर्चना की जाती है। मां कुष्मांडा को मालपुये का भोग लगाया जाता है। देवी की साधना से मनुष्य की समस्त इच्छाएं पूर्ण होती हैं।

स्कंदमाता
नवरात्रि के पांचवे दिन देवी दुर्गा के पांचवे स्वरूप स्कंदमाता की पूजा-अर्चना की जाती है। स्कंदमाता को फल विशेषकर केला अत्यंत प्रिय है, इसलिए उन्हें केले का भोग लगाया जाता है। देवी की साधना से सुख एवं एश्वर्य में वृद्धि होती है। 

कात्यायनी
नवरात्रि के छठे दिन देवी दुर्गा के छठे स्वरूप मां कात्यायनी की पूजा-अर्चना की जाती है। मां कात्यायनी को मीठे पान एवं मधु का भोग लगाया जाता है। देवी की साधना से दुखों का नाश होता है तथा जीवन में सुख का आगमन होता है।

कालरात्रि
नवरात्रि के सातवें दिन देवी दुर्गा के सातवे स्वरूप मां कालरात्रि की पूजा-अर्चना की जाती है। मां कालरात्रि को गुड़ अत्यंत प्रिय है, इसलिए उन्हें गुड़ से बने व्यंजन का भोग लगाया जाता है। देवी की साधना से समस्त नकारात्मक शक्तियों का नाश होता है तथा सकारात्मकता में वृद्धि होती है। जीवन सुखी हो जाता है। 

महागौरी
नवरात्रि के आठवें दिन देवी दुर्गा के आठवे स्वरूप मां महागौरी की पूजा-अर्चना की जाती है। मां महागौरी को नारियल अत्यंत प्रिय है, इसलिए उन्हें नारियल का भोग लगाया जाता है अर्थात नारियल अर्पित किया जाता है। देवी की साधना से व्यक्ति के रुके हुए कार्य पूर्ण होते हैं। 

सिद्धिदात्री
नवरात्रि के अंतिम दिन देवी दुर्गा के नौवें स्वरूप मां सिद्धिदात्री की पूजा-अर्चना की जाती है। इस दिन कन्या पूजन का विधान है। कन्याओं की पूजा की जाती है। उन्हें भोजन ग्रहण कराया जाता है। इसके पश्चात उनके चरण स्पर्श कर उनसे आशीर्वाद लिया जाता है। कन्याओं को प्रसाद के साथ उपहार भेंट किए जाते हैं। तदुपरांत देवी को काले चने, हलवा पूड़ी एवं खीर का भोग लगाया जाता है। देवी की साधना से व्यक्ति के समस्त पापों का नाश होता है तथा उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है।

वास्तव में नवरात्रि का पर्व नारी शक्ति का उत्सव है। प्राचीन काल से ही यह पर्व भारतीय संस्कृति में नारी शक्ति का प्रतीक रहा है। कन्या पूजन इस बात को सिद्ध करता है कि भारतीय समाज में कन्या का महत्वपूर्ण स्थान रहा है। कन्या भ्रूण हत्या तथा नवजात कन्याओं का वध कर देने जैसी बुराइयां हमारे समाज में कब और कैसे सम्मिलित हो गईं, ज्ञात ही नहीं हो पाया। निरंतर घटता लिंगानुपात अत्यंत चिंता का विषय बना हुआ है। विदेशों में भारत की जिन बुराइयों का उल्लेख कुछ लोग बड़े गर्व के साथ करते हैं, वे बुराइयों तो हमारे समाज में कभी नहीं थीं। जिस समय विश्व के अधिकांश देश अशिक्षित एवं असभ्य थे, उस समय हमारा देश शिक्षा के क्षेत्र में अग्रणी था। पुरुष ही नहीं, अपितु महिलाएं भी शिक्षित थीं। वे शास्त्रार्थ करती थीं, अस्त्र-शस्त्र चलाती थीं। देवियों ने कितने ही राक्षसों का अकेले वध किया है।

नारी को ईश्वर ने श्रेष्ठ बनाया है। अनेक मामलों में वह पुरुष से उच्च स्थान पर है। वह जन्मदात्री है। जिस प्रकार एक स्त्री अपने बालकों का पालन-पोषण कर लेती है, उस प्रकार एक पुरुष उनका पालन-पोषण नहीं कर पाता। उदाहरण के लिए यदि किसी की पत्नी की मृत्यु हो जाए, तो वह न चाहते हुए भी इसलिए विवाह कर लेगा कि बच्चों का पालन-पोषण ठीक से हो जाएगा। यदि किसी के पति की मृत्यु हो जाए, तो महिला जीविकोपार्जन के साथ-साथ बच्चों का पालन-पोषण भी कर लेती है। यदि दृष्टि डालें तो आसपास ऐसे बहुत से उदाहरण मिल जाएंगे। कहने का तात्पर्य यह है कि ईश्वर ने नारी को अत्यंत सबल बनाया है। नारी प्रत्येक क्षेत्र में अपनी योग्यता एवं प्रतिभा का सफल प्रदर्शन कर रही है।

Thursday, August 21, 2025

राधे राधे : जय श्री कृष्णा

 



राधे राधे : जय श्री कृष्णा 
आज श्रीकृष्ण जी की छठी मनाई गयी. 
इस अवसर पर श्री महेन्द्र सिंह जी पूर्व मंत्री उत्तर प्रदेश एवं प्रभारी मध्य प्रदेश बीजेपी तथा यजमान श्री मधुरेश श्रीवास्तव जी 🙏
लखनऊ

Friday, August 15, 2025

श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का महत्व


डॉ. सौरभ मालवीय   
त्योहार किसी भी देश एवं उसकी संस्कृति के संवाहक होते हैं। त्योहारों के कारण ही हमें अपनी प्राचीन गौरवशाली संस्कृति को जानने एवं समझने का अवसर प्राप्त होता है। यदि त्योहार नहीं होते, तो हमें अपने देवी-देवताओं एवं महापुरुषों तथा उनके जीवन के संबंध में कोई जानकारी प्राप्त नहीं होती। त्योहारों का हमारे जीवन में अत्यधिक महत्व है। श्रीकृष्ण जन्माष्टमी पूर्ण विधि विधान से भारत सहित विश्व के विभिन्न भागों में धूमधाम से मनाई जाती है। इस त्योहार का न केवल धार्मिक महत्व है, अपितु इसका सांस्कृतिक, सामाजिक एवं आर्थिक महत्व भी है।
 
धार्मिक महत्व
श्रीकृष्ण भगवान विष्णु के आठवें अवतार माने जाते हैं। भगवान विष्णु ने भाद्रपद कृष्ण अष्टमी की मध्यरात्रि को देवकी एवं वासुदेव के पुत्र के रूप में जन्म लिया था। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार मथुरा नरेश कंस बहुत अत्याचारी था। वह प्रजा पर बहुत अत्याचार करता था। उसका नाश करने के लिए भगवान विष्णु ने मथुरा में जन्म लिया था। कहा जाता है कि कंस अपनी बहन देवकी से अत्यधिक स्नेह करता था। एक दिन वह अपनी बहन को लेकर कहीं जा रहा था, तब आकाशवाणी हुई कि जिस बहन से तू इतना स्नेह करता है उसी के आठवें पुत्र के हाथों तेरा वध होगा। इस भविष्यवाणी को सुनकर कंस बहुत भयभीत हो गया तथा उसने अपनी बहन एवं उसके पति को कारागार में बंद कर दिया। मृत्यु के भय के कारण उसने अपनी बहन के सात नवजात शिशुओं का वध कर दिया। देवकी के आठवें पुत्र के जन्म के समय मूसलाधार वर्षा हो रही थी तथा अंधकार व्याप्त था। श्रीकृष्ण का जन्म होते ही देवकी एवं वासुदेव की बेड़ियां खुल गईं। कारागार के द्वार भी स्वयं ही खुल गए तथा पहरेदार सो गए। वासुदेव उफनती हुई यमुना पार करके अपने पुत्र को गोकुल ग्राम में अपने मित्र नन्द  के घर ले गए। वहां नन्द की पत्नी यशोदा ने एक कन्या को जन्म दिया था। नन्द ने श्रीकृष्ण को अपनी पत्नी के पास लिटा दिया और अपनी पुत्री वासुदेव को सौंप दी। जब वासुदेव कारागार आ गए तो सबकुछ पूर्व की भांति हो गया। शिशु के जन्म का समाचार प्राप्त होते ही कंस वहां आया तथा उसने कन्या को पटक कर मारना चाहा, किन्तु वह यह कहते हुए आकाश की ओर चली गई कि तुझे मारने वाला जन्म ले चुका है। इसके पश्चात कंस ने अपने राज्य के सभी नवजात बालकों की हत्या करने का आदेश दे दिया। उसके सैनिक घर-घर जाकर नवजात शिशुओं को खोजते तथा उन्हें मौत के घात उतार देते। कंस के अत्याचारों से तंग आकर बहुत से लोग राज्य छोड़कर जाने लगे, परन्तु सभी ऐसा नहीं कर सकते थे। दिन-प्रतिदिन कंस के अत्याचार बढ़ते ही जा रहे थे। कंस ने श्रीकृष्ण को मारने के भी अनेक प्रयास किए, किन्तु बाल्यकाल में ही श्रीकृष्ण ने अपने कंस द्वारा भेजे गए सभी राक्षसों को मार दिया। युवा होने पर उन्होंने कंस को मारकर मथुरा को उसके अत्याचारों से मुक्त करवाया। श्रीकृष्ण का पालन-पोषण गोकुल में नन्द बाबा के घर में हुआ। श्रीकृष्ण की अनेक लीलाएं हैं, जो उल्लेखनीय हैं। इन पर असंख्य साहित्यिक ग्रंथ लिखे गए हैं।    
हिन्दुओं का प्रमुख ग्रंथ भगवद गीता श्रीकृष्ण की देन है। उन्होंने महाभारत युद्ध के समय अर्जुन को कुरुक्षेत्र में जो उपदेश दिए थे, वे इसमें संकलित हैं। इसमें धर्म, कर्म, भक्ति, प्रेम, वैराग्य एवं मोक्ष आदि का उल्लेख मिलता है। इसमें जीवन दर्शन है तथा जीवन का सार भी है।    
  
सांस्कृतिक महत्व
भारत सहित विश्वभर के हिन्दू बहुल देशों में जन्माष्टमी का पर्व हर्षोल्लास से मनाया जाता है। इस त्योहार पर मंदिरों की साज-सज्जा की जाती है। उनमें रंगोलियां भी बनाई जाती हैं। श्रद्धालु उपवास रखते हैं। वे पूजा-अर्चना करते हैं। सत्संग एवं कीर्तन भी किए जाते हैं। बहुत से मंदिरों में 'भागवत पुराण' एवं 'भगवद गीता' का पाठ होता है। नाट्य मंडलियों द्वारा कृष्ण लीला का आयोजन किया जाता है। नाट्य मंचन में गीत एवं नृत्य भी सम्मिलित रहता है। नगर में शोभायात्रा भी निकाली जाती है। इन सब आयोजनों से श्रीकृष्ण के जीवन दर्शन एवं उनके कार्यों की जानकारी प्राप्त होती है। इस प्रकार बालक बाल्यकाल से ही अपने देवी-देवताओं के संबंध में जानकारी प्राप्त कर लेते हैं। समय का चक्र घूमता रहता है। तदुपरांत यही बच्चे अपने त्योहारों पर विभिन्न धार्मिक एवं सांस्कृतिक आयोजन करके ये ज्ञान अपने बच्चों को देते हैं। इसी प्रकार ये ज्ञान निरंतर आगे बढ़ता रहता है। इन आयोजनों के कारण रंगोली, भजन-कीर्तन, नाटक, नृत्य आदि कलाओं का भी विकास होता है। त्योहार हमारी शास्त्रीय एवं लोक कलाओं के भी संवाहक हैं। इनके कारण ही अनेक कलाएं फलफूल रही हैं, वरन ये कब की लुप्त हो चुकी होतीं।                 
विदेशों में जन्माष्टमी मनाए जाने के कारण भारतीय संस्कृति विश्व के कोने-कोने में पहुंच रही है। जिस समय विश्व के अनेक देश अज्ञान के अंधकार में डूबे हुए थे, उस समय भी हमारी संस्कृति अपने शिखर पर थी।
 
सामाजिक महत्व
त्योहारों का सामाजिक महत्व भी हैं। श्रीकृष्ण ने विश्व को प्रेम, करुणा, न्याय एवं सद्भाव का संदेश दिया। सामाजिक सद्भाव को बनाए रखने के लिए इन्हीं गुणों की सबसे अधिक आवश्यकता होती है। जन्माष्टमी भी इसी सद्भाव को बनाए रखने का संदेश देती है। वास्तव में जब एक परंपरा के लोग आपस में मिलकर कोई त्योहार मनाते हैं तो उनमें प्रेम एवं भाईचारे का संचार होता है। इसके अतिरिक्त यदि अन्य धर्म एवं पंथ के लोग इसमें सम्मिलित होते हैं, तो इससे सामाजिक सद्भाव, प्रेम एवं भईचारा बढ़ता है। भारतीय संस्कृति भी ऐसी ही अर्थात सबको अपनाने वाली। हमारा आदर्श वाक्य ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ है अर्थात पूरा विश्व एक परिवार है। यह वाक्य सदैव से ही प्रासंगिक रहा है, क्योंकि यह वैश्विक स्तर पर सामूहिक कल्याण को प्राथमिकता देता है। यही भारतीय संस्कृति का मूल मंत्र है, जो इसकी महानता का प्रतीक है। 
अन्य त्योहारों की भांति जन्माष्टमी पर भी भंडारे किए जाते हैं, जिनमें प्रसाद वितरित किया जाता है तथा सामूहिक भोजन ग्रहण किया जाता है। मंदिरों के अतिरिक्त बाजारों में भी भंडारों का आयोजन किया जाता है। लोग चंदा एकत्रित करके भी भंडारे करते हैं। अनेक स्थानों पर क्षेत्र के लोग ही आपस में सब्जियां, अनाज व अन्य खाद्य वस्तुएं एकत्रित करके भोजन बनाते हैं। इस कार्य में महिलाएं भी बढ़-चढ़कर भाग लेती हैं। भोजन बनाने से लेकर भोजन परोसने तक में उनका योगदान सम्मिलित रहता है।
इसके अतिरिक्त इन भंडारों के कारण उन लोगों को भी भरपेट स्वादिष्ट भोजन मिल जाता है, जो अभाववश स्वादिष्ट भोजन ग्रहण नहीं कर पाते हैं। भंडारे में सब लोग मिलजुल कर भोजन ग्रहण करते हैं। यहां किसी प्रकार का भेदभाव अथवा ऊंच-नीच का भाव नहीं होता। यह सामजिक समरसता को बढ़ावा देता है। आज के समय में इसकी अत्यधिक आवश्यकता है।      
 
आर्थिक महत्व
त्योहार आर्थिक गतिविधियों के भी केंद्र होते हैं। जन्माष्टमी से पूर्व ही इसकी तैयारियां प्रारंभ हो जाती हैं। मंदिरों को सजाया जाता है। इसके लिए बहुत से सजावटी सामान की आवश्यकता होती है, जिनमें बिजली की झालरें एवं पुष्प आदि भी सम्मिलत हैं। पुष्पों का एक बड़ा बाजार हैं, जिनमें असंख्य लोग लगे हुए हैं। पुष्प की खेती से लेकर फूल मालाएं बनाने वाले लोगों तक को रोजगार प्राप्त होता है। इसके साथ-साथ मिष्ठान वालों एवं हलवाइयों का कार्य भी बढ़ जाता है। बाजारों में जन्माष्टमी से संबंधित सामान की भरमार देखने को मिलती है। इस सामान को बनाने वालों से लेकर बाजार में इन्हें विक्रय करने वालों को भी रोजगार प्राप्त होता है।
नि:संदेह जन्माष्टमी भारतीय संस्कृति के प्रचार-प्रसार का सशक्त माध्यम है

Thursday, August 7, 2025

रक्षाबंधनः भारतीय संस्कृति का प्रतिनिधि पर्व


डॉ. सौरभ मालवीय
रक्षाबंधन भारतीय संस्कृति का प्रतिनिधि पर्व है। अनेकानेक श्रेष्ठतम आदर्शों उच्चतम प्रेरणाओ, महान प्रतिमानों और वैदिक वांग्मय से लेकर अद्यतन संस्कृति तक फैले हुए भारतीयता के समग्र जीवन का प्राण है|यह पर्व श्रावण शुक्ल पूर्णिमा को आयोजित किया जाता जाता है, जब चन्द्रमा श्रवण नक्षत्र में विचरण करते हों तो यह पर्व आता है। इस श्रवण नक्षत्र का नाम ही मातृ–पितृ भक्ति के श्रेष्टतम बिन्दु श्रवण कुमार के नाम पर पड़ा है|यह नाम ही बताता है कि हमारे आदर्श कैसे होने चाहिए। इस नाम की गरिमा इतनी आदरणीय है कि अनेक कुलीन परिवारों में श्रावणी कर्म किया जाता है।

इसी दिन भारत की सांस्कृतिक नगरी काशी में भगवान विष्णु का हयग्रीव अवतार हुआ था। आज के ही शुभ दिन पर हमारे ऋषियों ने परम-पावन सिन्धु नदी में प्रातःकाल स्नान करके सामवेद को देखा था, इसी सामवेद में परम प्रतापी राजराजेश्वर नरेश्वर श्री लंकेश्वर महाराजा रावण ने स्वर दिया था श्री रावण उत्तम कुल उत्पन्न ऋषि पुलत्स के वंशज थे। सामवेद की स्वर परम्परा आज भी महाराजा लंकेश्वर का अनुसरण करती है|आज ही के दिन भगवान महादेव ने श्री अमरनाथ में परमसती त्रिपुर सुंदरी भगवती को पहली बार राम कथा सुनाई थी इसी के फल स्वरुप रामकथा इस धरती पर उतारी थी,इतना ही नही आज ही के दिन भगवान चंद्रमौलिस्वर विश्वेश्वर महादेव ने देवताओं की अत्मा हिमालय में भगवती जगदम्बा पार्वती को श्रीकृष्ण कथा का भी उपहार दिया था तभी से श्रीमदभगवत कथा की भाव भूमि बनी।

पुराणों में रक्षाबंधन के सन्दर्भ में कथा ऐसी है कि राजा बली की परीक्षा के लिए स्वयं भगवान वामन अवतार राजा बली के यहाँ गए राजा बली अपनी श्रेष्टतम दान कार्य के कारण प्रसिद्ध थे भगवान वामन ने राजा बली से अपने लिए साढ़े तीन पग भूमि की याचना की महाराज बली सहर्ष देने के लिए तैयार हो गए,यद्यपि महाराज बली के गुरु महर्षि शुक्राचार्य ने रजा बली को मना किया था कि भगवान वामन को दान नहीं देना, लेकिन अपने जीवन भर की उच्चतम परम्परा को राजा बली मलिन नहीं कर सकते थे और गुरु आदेश के विपरीत यह जानकर की स्वयं भगवान नारायण उनके यहाँ मांगने आये है राजा बली ने दान देना स्वीकार कर लिया और भगवान वामन ने तीन पग में तीनो लोको को नाप दिया आधे पग में अपनी पीठ राजा बली ने भगवान वामन के चरणों में रख दिया|यह देख साक्षात् नारायण अपने मूल स्वरूप में प्रगट होकर राजा बली को आशीर्वाद दिया और वर मांगने को कहा राजा ने बरदान में भगवान की अखंड भक्ति और यह भी माँगा की आप हमारी रक्षा सदैव करते रहे और निरंतर मेरे आँखों के सामने बने रहे भगवान श्री हरी ने एवमस्तु कहा और रजा बली के राज भवन के मुख्य द्वार पर खड़े हो गए क्योकि अब तो वे राजा बली के पहरेदार भी थे और निरंतर आँखों के सामने खड़े रहने का आशीर्वाद भी दे चुके थे|
   इस प्रकार बहुत समय बीत गया भगवती नारायणी को देव वार्ताकार नारद जी ने यह पूरी सूचना दी तो भगवती बहुत चिंतित और दुखी हुई कि अब नारायण हमेशा राजा की रक्षा में ही रहेंगे,अनेक विचार विमर्श के बाद देवी नारायणी स्वयं रजा बली से याचना करने और दान मांगने राजा के सम्मुख राज सभा में पहुची रजा बली ने भगवती से निवेदन किया की आप निःसंकोच अपनी इक्छा प्रगट करे इस पर भगवती ने राजा से उस पहरेदार को ही मांग लिया जो मूल रूप से भगवान वामन थे यह सुन कर राजा बली ने कहा की श्री हरी वचन दे चुके है की अहर्निश मेरे आँखों के सामने ही रहेंगे यह संकल्प कैसे पूर्ण होगा|यह सुन कर भगवती नारायणी ने आशीर्वाद दिया की भगवन श्री हरी सदैव आप की भावभूमि में ही रहेंगे इसलिए निरंतर दर्शन का तो समाधान हो गया और भगवती ने अपने वस्त्र से कुछ धागे निकाल कर राजा बली के दाहिने हाथ में वाध दिया यह कहते हुए की इस रक्षा सूत्र से आप के और आप के राज्य की निरंतर रक्षा होती रहेगी वह पवित्र दिन श्रवण पूर्णिमा ही था और तभी से रक्षाबंधन की परम्परा हमारे समाज में चली आ रही है।  

Wednesday, July 23, 2025

महाशिवरात्रि का सांस्कृतिक एवं वैज्ञानिक महत्व

 

डॉ. सौरभ मालवीय
पर्व एवं त्योहार भारतीय संस्कृति की पहचान हैं। ये केवल हर्ष एवं उल्लास का माध्यम नहीं हैं, अपितु यह भारतीय संस्कृति के संवाहक भी हैं। इनके माध्यम से ही हमें अपनी गौरवशाली प्राचीन संस्कृति के संबंध में जानकारी प्राप्त होती है। महाशिवरात्रि भी संस्कृति के संवाहक का ऐसा ही एक बड़ा त्योहार है।   

शिवरात्रि प्रत्येक मास की अमावस्या से एक दिन पूर्व अर्थात कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को मनाई जाती है, जबकि महाशिवरात्रि वर्ष में एक बार आती है। यह फाल्गुन मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को मनाई जाती है। शिव पुराण की ईशान संहिता में कहा गया है कि फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी की रात्रि में भगवान शिव करोड़ों सूर्यों के समान प्रभाव वाले लिंग रूप में प्रकट हुए थे-
फाल्गुनकृष्णचतुर्दश्यामादिदेवो महानिशि। शिवलिंगतयोद्भूत: कोटिसूर्यसमप्रभ:॥
माना जाता है कि इसी दिन प्रलय आएगा, जब प्रदोष के समय भगवान शिव तांडव करते हुए ब्रह्मांड को तृतीय नेत्र की ज्वाला से नष्ट कर देंगे। इसीलिए शिवरात्रि को कालरात्रि भी कहा जाता है। 

सांस्कृतिक एवं धार्मिक महत्त्व
महाशिवरात्रि धार्मिक एवं सांस्कृतिक रूप से अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। महाशिवरात्रि के सन्दर्भ में अनेक पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं। एक कथा के अनुसार अग्निलिंग के उदय के साथ इसी दिन सृष्टि प्रारंभ हुई थी। एक पौराणिक कथा के अनुसार फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी पर भगवान शिव सर्वप्रथम शिवलिंग के स्वरूप में प्रकट हुए थे। इसीलिए इस दिवस को भगवान शिव के ज्योतिर्लिंग के प्रकाट्य पर्व को प्रत्येक वर्ष महाशिवरात्रि के रूप में मनाया जाता है।

एक अन्य कथा के अनुसार इस दिन भगवान शिव का देवी पार्वती के साथ विवाह सम्पन्न हुआ था। यह उनके विवाह की रात्रि है। उन्होंने वैराग्य त्याग कर गृहस्थ जीवन अ पना लिया था। एक पौराणिक कथा के अनुसार इस दिन भगवान शिव ने समुद्र मंथन के समय निकले कालकूट नामक विष को अपने कंठ में रख लिया था। इससे उनका कंठ नीला हो गया था। इसीलिए उन्हें नीलकंठ नाम से भी जाना जाता है। कहा जाता है कि इस घातक  विष के कारण भगवान शिव को ताप चढ़ गया था। इसे उतारने के लिए उनके मस्तक पर बेल पत्र रखा गया, क्योंकि बेल पत्र शीतल गुण वाला होता है। इससे उन्हें संतुष्टि प्राप्त हुई। तभी से शिवलिंग पर बेल पत्र चढ़ाने की परंपरा आरंभ हुई। एक कथा के अनुसार इस रात्रि भगवान शिव ने संरक्षण एवं विनाश के नृत्य का सृजन किया था। इसलिए भी यह रात्रि विशेष है।

महाशिवरात्रि का वैज्ञानिक महत्त्व
महाशिवरात्रि का वैज्ञानिक दृष्टि से अत्यंत महत्त्व है। माना जाता है कि इस रात्रि ग्रह का उत्तरी गोलार्द्ध इस प्रकार अवस्थित होता है कि मानव की आंतरिक ऊर्जा प्राकृतिक रूप से ऊपर की ओर जाती है। मान्यता है कि यह ऊर्जा मनुष्य को आध्यात्मिक शिखर तक ले जाने में सहायक सिद्ध होती है। इसलिए इस रात्रि में भगवान शिव की पूजा- अर्चना करने का अत्यंत महत्त्व है। पूजा के समय भक्त सीधा बैठता है तथा उसकी रीढ़ की हड्डी सीधी होती है। इसके कारण उसकी ऊर्जा उसके मस्तिष्क की ओर जाती है। इससे उसे शारीरिक ही नहीं, अपितु मानसिक एवं आध्यात्मिक शक्ति भी प्राप्त होती है। भगवान शिव का पंचाक्षरी मंत्र ॐ नमः शिवाय है। यह मंत्र भगवान शिव को अत्यंत प्रिय है। इस मंत्र का संबंध पंच महाभूतों भूमि, गगन, वायु अग्नि एवं नीर से माना जाता है। इस मंत्र का निरंतर जाप करने से शरीर में ऊर्जा का संचार होता है। इससे मनुष्य का आत्मबल बढ़ता है।   

धर्म ग्रंथों के अनुसार महाशिवरात्रि के दिन भगवान शिव की पूजा- अर्चना करने से वे प्रसन्न होकर अपने भक्तों को मनचाहा वरदान देते हैं। शिवरात्रि का महोत्सव एक दिवस पूर्व ही प्रारंभ हो जाता है। भगवान शिव के मंदिरों में रात्रि भर पूजा-अर्चना की जाती है। भक्त रात्रिभर जागरण करते हैं एवं सूर्योदय के समय पवित्र स्थलों पर स्नान करते हैं। नदी तटों विशेष कर गंगा के तटों पर भक्तों की भीड़ उमड़ पड़ती है। स्नान के पश्चात भगवान शिव के मंदिरों में पूजा-अर्चना की जाती है। भक्त शिवलिंग की परिक्रमा करते हैं। तत्पश्चात भगवान शिव का अभिषेक किया जाता है। शिवलिंग का जलाभिषेक अथवा दुग्धाभिषेक भी किया जाता है। शिवलिंग पर जल से जो अभिषेक जाता है, उसे जलाभिषेक कहा जाता है। इसी प्रकार शिवलिंग पर दुग्ध से जो अभिषेक किया जाता है, उसे दुग्धाभिषेक कहा जाता है। मधु से भी शिवलिंग का अभिषेक किया जाता है। इसके अतिरिक्त शिवलिंग पर सिंदूर लगाया जाता है एवं सुगंधित धूप जलाई जाती है। दीपक भी जलाया जाता है। उस पर फल, अन्न एवं धन चढ़ाया जाता है। उस पर बेल पत्र एवं पान के पत्ते चढ़ाए जाते हैं। इनके अतिरिक्त वे वस्तुएं भी भगवान शिव को चढ़ाई जाती हैं, जो उन्हें प्रिय हैं। इनमें धतूरा एवं धतूरे के पुष्प सम्मिलित हैं। मुक्तिदायिनी गंगा के जल का भी विशेष महत्व है, क्योंकि गंगा देवलोक से सीधी भगवान शिव की जटा पर ही उतरी थी। इसके पश्चात ही वह पृथ्वी लोक में उतरी एवं प्रवाहित हुई। इसलिए सभी नदियों में गंगा का स्थान सर्वोपरि माना जाता है। भक्तजन महाशिवरात्रि के दिन उपवास भी रखते हैं। कुछ लोग निर्जल रहकर भी उपवास करते हैं। उपवास से तन एवं मन दोनों ही शुद्ध होते हैं। शुद्ध मन में ही तो भगवान वास करते हैं। कई स्थानों पर भगवान शिव की बारात भी निकाली जाती है। इसमें कलाकार शिव एवं पार्वती का रूप धारण करते हैं। बारात में सम्मलित लोग शरीर पर भस्म लगाए हुए होते हैं। वे नाचते गाते हुए शिव एवं पार्वती के रथ के पीछे चल रहे होते हैं। भक्तजन इसमें भाग लेते हैं।

महिलाओं के लिए विशेष है शिवरात्रि
शिवरात्रि का महिलाओं के लिए विशेष महत्व है। विवाहित महिलाएं व्रत रखकर अपने पति की दीर्घायु एवं सुखी जीवन के लिए प्रार्थना करती हैं, जबकि अविवाहित युवतियां भगवान शिव से अपने लिए सुयोग्य वर मांगती हैं। भगवान शिव को आदर्श पति के रूप में माना जाता है। इसलिए युवतियां सुयोग्य वर के लिए सोलह सोमवार का व्रत भी करती हैं। मान्यता है कि सोलह सोमवार का व्रत करने से सुयोग्य वर की प्राप्ति होती है।

भगवान शिव के बारह ज्योतिर्लिंग
महाशिवरात्रि पर ज्योतिर्लिंग पर विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। भगवान शिव के बारह ज्योतिर्लिंग हैं अर्थात प्रकाश के लिंग हैं। ये स्वयम्भू के रूप में जाने जाते हैं, जिसका अर्थ है स्वयं उत्पन्न। ये बारह स्थानों पर ज्योतिर्लिंग स्थापित हैं। इनमें उत्तराखंड में हिमालय का दुर्गम केदारनाथ ज्योतिर्लिंग, उत्तर प्रदेश के ही काशी विश्वनाथ मंदिर में स्थापित विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग, बिहार के बैद्यनाथ धाम में स्थापित शिवलिंग, गुजरात के काठियावाड़ में स्थापित सोमनाथ शिवलिंग, मध्यप्रदेश के उज्जैन के अवंति नगर में स्थापित महाकालेश्वर शिवलिंग, मध्यप्रदेश के ही ओंकारेश्वर में नर्मदा तट पर स्थापित ममलेश्वर ज्योतिर्लिंग, गुजरात के द्वारकाधाम के निकट स्थापित नागेश्वर ज्योतिर्लिंग, महाराष्ट्र की भीमा नदी के किनारे स्थापित भीमशंकर ज्योतिर्लिंग, महाराष्ट्र के नासिक के समीप त्र्यंम्बकेश्वर में स्थापित ज्योतिर्लिंग, महाराष्ट्र के ही औरंगाबाद जिले में एलोरा गुफा के समीप वेसल गांव में स्थापित घुमेश्वर ज्योतिर्लिंग, चेन्नई में कृष्णा नदी के किनारे पर्वत पर स्थापित श्री शैल मल्लिकार्जुन शिवलिंग एवं चेन्नई में ही रामेश्वरम् त्रिचनापल्ली समुद्र तट पर भगवान श्रीराम द्वारा स्थापित रामेश्वरम ज्योतिर्लिंग सम्मिलित हैं। शिवरात्रि एवं महाशिवरात्रि आर यहां भक्तजनों का तांता लग जाता है। वे ज्योतिर्लिंग के दर्शन करके आध्यात्मिक लाभ अर्थात पुण्य प्राप्त करते हैं।

पुराणों के अनुसार आध्यात्मिक जीवन की पूर्णता प्राप्त करने के लिए भगवान शिव के इन बारह ज्योतिर्लिंग के दर्शन करने अति आवश्यक हैं। मान्यता है कि इन सभी बारह स्थानों पर भगवान शिव ने स्वयं प्रकट होकर दर्शन दिए थे। इसीलिए यहां ये ज्योतिर्लिंग उत्पन्न हुए हैं।
भारत के अतिरिक्त उन देशों में भी शिवरात्रि का पर्व हर्षोल्लास से मनाया जाता है, जहां हिन्दू लोग निवास करते हैं। भगवान शिव मोक्षदायिनी माने जाते हैं। इसलिए यह त्योहार भी मनुष्य को पुण्य कर्मों के माध्यम से मोक्ष प्राप्ति के लिए प्रेरित करता है।
(लेखक- लखनऊ विश्वविद्यालय में पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग में एसोसिएट प्रोफेसर हैं)
 

सत्यम शिवम सुंदरम

डॉ. सौरभ मालवीय
सत्य ही शिव है, शिव ही सुंदर है. भगवान शिव को देवों का देव महादेव भी कहा जाता है। भगवान शिव को आदि गुरु माना जाता है। भगवान शिव की आराधना का मूल मंत्र तो ऊं नम: शिवाय ही है, परंतु इस मंत्र के अतिरिक्त भी कुछ मंत्र हैं, जिनके जाप से भोले शंकर प्रसन्न हो जाते हैं। शिवरात्रि हिन्दुओं विशेषकर शिव भक्तों का प्रमुख त्योहार है। शिव रात्रि भगवान शिव को अतिप्रिय है। शिव पुराण के ईशान संहिता के अनुसार फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी की रात्रि में आदिदेव भगवान शिव करोड़ों सूर्यों के समान प्रभाव वाले लिंग रूप में प्रकट हुए थे-
फाल्गुनकृष्णचतुर्दश्यामादिदेवो महानिशि। शिवलिंगतयोद्भूत: कोटिसूर्यसमप्रभ:॥
मानयता यह भी है कि इसी दिन प्रलय आएगा, जब प्रदोष के समय भगवान शिव तांडव करते हुए ब्रह्मांड को तीसरे नेत्र की ज्वाला से नष्ट कर देंगे। इसीलिए इसे महाशिवरात्रि अथवा कालरात्रि भी कहा जाता है।

वर्ष में 12 शिवरात्रियां आती हैं। इनमें महाशिवरात्रि की सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है। महाशिवरात्रि का पावन पर्व फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को मनाया जाता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार अग्निलिंग के उदय के साथ इसी दिन सृष्टि का प्रारंभ हुआ था। यह भी मान्यता है कि इसी दिन भगवान शिव का विवाह देवी पार्वती के साथ सम्पन्न हुआ था। कहा जाता है कि महाशिवरात्रि के दिन भगवान शिव ने कालकूट नामक विष को अपने कंठ में रख लिया था, जो समुद्र मंथन के समय समुद्र से निकला था। इससे शिवशंकर का कंठ नीला हो गया था. इसीलिए उन्हें नीलकंठ नाम से भी जाना जाता है. शैव परंपरा की एक पौराणिक कथा के अनुसार, इस रात भगवान शिव ने संरक्षण और विनाश के स्वर्गीय नृत्य का सृजन किया था.

महाशिवरात्रि से संबंधित कई पौराणिक कथाएं हैं. एक कथा के अनुसार चित्रभानु नामक एक शिकारी था. वह वन्य पशुओं का शिकार करके अपना जीवन यापन करता था. एक बार महाशिवरात्रि के दिन अनजाने में उसने शिवकथा सुन ली. इसके बाद वह शिकार की खोज में वन में गया. वह बेल के वृक्ष के ऊपर चढ़कर शिकार की प्रतीक्षा करने लगा और अनजाने में बेल के पत्ते तोड़कर नीचे  फेंकने लगा. वृक्ष के नीचे घास-फूंस से ढका एक शिवलिंग था. बेलपत्र शिवलिंग पर गिरते रहे. इससे प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उसका ह्रदय निर्मल बना दिया. उसके मन से हिंसा के विचार समाप्त हो गया. वह वन में शिकार करने गया था, परंतु उसने चार हिरणों को जीवनदान दे दिया. इसके बाद उसके जीवन में परिवर्तन आ गया. यह कथा अहिंसा पर की शिक्षा देती है.

मान्यता है कि शिवरात्रि को ग्रहों की विशेष स्थिति होती है. इसके कारण मानव शरीर में ऊर्जा का एक शक्तिशाली पुंज प्रवेश करता है. इसलिए इस रात्रि में जागरण करना बहुत उत्तम माना गया है. इसी कारण शिवरात्रि के पर्व का उत्सव एक दिन पहले से ही प्रारंभ हो जाता है. भगवान शिव के मंदिरों में पूरी रात पूजा-अर्चना की जाती है. भक्तजन रात्रिभर कीर्तन करते हैं.  भक्तजन सूर्योदय के समय पवित्र स्थानों पर स्नान करते हैं. नदी किनारों पर भक्तों का तांता लग जाता है. स्नान के बाद भगवान शिव के मंदिरों में पूजा-अर्चना की जाती है. भक्त शिवलिंग की परिक्रमा करते हैं और फिर भगवान शिव का अभिषेक किया जाता है। भक्तजन शिवलिंग का जलाभिषेक या दुग्धाभिषेक करते हैं. शिवलिंग पर जल से जो अभिषेक जाता है, उसे जलाभिषेक कहा जाता है. इसी प्रकार शिवलिंग पर दूध से जो अभिषेक किया जाता है, उसे दुग्‍धाभिषेक  कहते हैं. शहद से भी अभिषेक किया जाता है. इसके अतिरिक्त शिवलिंग पर सिंदूर लगाया जाता है. सुगंधित धूप जलाई जाती है. दीपक जलाता जाता है. फल, अन्न और धन चढ़ाया जाता है. बेल पत्र और पान के पत्ते अर्पित किए जाते हैं. इनके अतिरिक्त वे वस्तुएं भी भगवान शिव को अर्पित करना चाहिए, जो उन्हें प्रिय हैं. धतूरा और धतूरे के पुष्प भगवान शिव को प्रिय हैं. मुक्तिदायिनी गंगा के जल का भी विशेष महत्व है, क्योंकि  गंगा देवलोक से भगवान श‌िव की जटा से होकर ही पृथ्वी लोक में उतरी हैं. इसील‌िए सभी नद‌ियों में गंगा का स्थान सर्वोपरि माना जाता है। भक्तजन महाशिवरात्रि के दिन उपवास भी रखते हैं. कुछ लोग निर्जल रहकर भी उपवास करते हैं. कई स्थानों पर इस दिन भगवान शिव की बारात भी निकाली जाती है. इसमें कलाकार शिव-पार्वती का रूप धारण करते हैं. भक्तजन इसमें बढ़ चढ़कर भाग लेते हैं. शिवरात्रि का महिलाओं के लिए विशेष महत्व है। विवाहित महिलाएं अपने पति की दीर्घायु और सुखी जीवन के लिए प्रार्थना करती हैं, जबकि अविवाहित लड़कियां भगवान शिव से अपने लिए सुयोग्य वर मांगती हैं. भगवान शिव को आदर्श पति के रूप में माना जाता है. लड़कियां सुयोग्य वर के लिए सोलह सोमवार का व्रत भी करती हैं.

महाशिवरात्रि पर ज्योतिर्लिंग पर विशेष पूजा-अर्चना की जाती है. भगवान शिव के बारह ज्योतिर्लिंग अर्थात प्रकाश के लिंग हैं. ये स्वयम्भू के रूप में जाने जाते हैं, जिसका अर्थ है स्वयं उत्पन्न। इनमें गुजरात के काठियावाड़ में स्थापित सोमनाथ शिवलिंग, मद्रास में कृष्णा नदी के किनारे पर्वत पर स्थापित श्री शैल मल्लिकार्जुन शिवलिंग, मध्यप्रदेश के उज्जैन के अवंति नगर में स्थापित महाकालेश्वर शिवलिंग, मध्यप्रदेश के ही ओंकारेश्वर में नर्मदा तट पर स्थापित ममलेश्वर ज्योतिर्लिंग, गुजरात के द्वारकाधाम के निकट स्थापित नागेश्वर ज्योतिर्लिंग, बिहार के बैद्यनाथ धाम में स्थापित शिवलिंग, महाराष्ट्र की भीमा नदी के किनारे स्थापित भीमशंकर ज्योतिर्लिंग, महाराष्ट्र के नासिक के समीप त्र्यंम्बकेश्वर में स्थापित ज्योतिर्लिंग, महाराष्ट्र के ही औरंगाबाद जिले में एलोरा गुफा के समीप वेसल गांव में स्थापित घुमेश्वर ज्योतिर्लिंग, उत्तराखंड में हिमालय का दुर्गम केदारनाथ ज्योतिर्लिंग, उत्तर प्रदेश के काशी विश्वनाथ मंदिर में स्थापित विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग एवं मद्रास में रामेश्वरम्‌ त्रिचनापल्ली समुद्र तट पर भगवान श्रीराम द्वारा स्थापित रामेश्वरम ज्योतिर्लिंग  सम्मिलित हैं.

भारत के अतिरिक्त अन्य देशों में भी शिवरात्रि का पर्व हर्षोल्लास से मनाया जाता है. त्योहार मनुष्य को पुण्य कर्मो की शिक्षा देते हैं. हमें समाज के हित के कार्य करने चाहिए. अपने सामर्थ्य के अनुसार मानव कल्याण के लिए अपना योगदान सबको देना चाहिए.

Monday, May 12, 2025

देवर्षि नारद को आदि गुरु मानने से बढ़ेगा गौरव


डॉ. सौरभ मालवीय 
देश में प्राचीन काल से ही ज्येष्ठ मास की कृष्ण पक्ष की द्वितीय तिथि को देवर्षि नारद मुनि की जयंती मनाने की परंपरा चली आ रही है। हिन्दू शास्त्रों के अनुसार देवर्षि नारद मुनि को सृष्टिकर्ता ब्रह्मा का मानस पुत्र माना जाता है। कहा जाता है कि उनका जन्‍म ब्रह्मा जी की गोद से हुआ था। इसलिए वे उनके मानस पुत्र माने जाते हैं। वे समस्त  देवी- देवताओं के ऋषि हैं इसीलिए उन्हें देवर्षि एवं ब्रह्मर्षि कहा जाता है। ब्रह्मर्षि का पद प्राप्त करने के लिए उन्होंने कठिन तपस्या की थी। उन्हें ब्रह्मनंदन एवं वीणाधर के नाम से भी पुकारा जाता है। ‘नारद’ शब्द में ‘नार’ का अर्थ है जल एवं अज्ञान तथा ‘द’ का अर्थ है प्रदान करना एवं नाश करना। वे समस्त प्राणियों को ज्ञान का दान करके अज्ञानता का नाश करते हैं। वे प्राणियों को तर्पण करने में भी सहायता करते थे, इसीलिए उन्हें नारद कहा जाने लगा।
 
भगवान विष्णु के अनन्य भक्त
देवर्षि नारद मुनि सृष्टि के पालनहार भगवान विष्णु के अनन्य भक्त माने जाते हैं। वे तीनों लोकों में भ्रमण करते हुए अपनी वीणा की सुमधुर तान पर भगवान विष्णु की महिमा का गान करते हैं। प्रत्यके समय उनकी जिव्हा पर भगवान विष्णु का नाम रहता है- नारायण-नारायण। वे सदैव भक्ति में लीन रहते हैं। इसके साथ-साथ में भटके हुए लोगों का मार्गदर्शन करते हैं तथा उनकी शंकाओं का समाधान भी करते हैं। उनके महान कार्यों की गणना संभव नहीं है। किन्तु कुछ कार्यों का उल्लेख करना संभव है, जैसे उन्होंने लक्ष्मी का विवाह अपने इष्टदेव भगवान विष्णु के साथ करवाया था। उन्होंने स्वर्ग के राजा इन्द्रदेव को मनाकर अप्सरा उर्वशी का पुरुरवा के साथ विवाह करवाया था। उन्होंने ऋषि बाल्मीकि को महान ग्रंथ रामायण लिखने की प्रेरणा दी थी। उन्होंने व्यास जी को भागवत की रचना करने की प्रेरणा दी थी। उन्होंने विष्णु भक्त प्रह्लाद एवं भक्त ध्रुव का मार्गदर्शन किया था। उन्होंने बृहस्पति एवं शुकदेव आदि को उपदेश देकर उनका मार्गदर्शन किया था। उनके ऐसे असंख्य महान कार्य हैं।
 
देवर्षि नारद मुनि के ग्रंथ   
देवर्षि नारद मुनि बहुत ज्ञानी थे। वे अनेक कलाओं में पारंगत थे। उन्होंने वाद्य यंत्र वीणा का आविष्कार किया था। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि वे ब्रह्मांड के प्राय: सभी विषयों के ज्ञाता थे। लगभग सभी आदि ग्रंथों में उनका उल्लेख मिलता है। वे व्यास, बाल्मीकि एवं शुकदेव आदि के गुरु हैं। उन्हें तीनों लोकों में मान-सम्मान प्राप्त है। वे देवी-देवताओं के मन की बात भी समझ जाते थे। उन्होंने भक्तिभाव का प्रचार-प्रसार किया। उनका कहना था कि व्यक्ति को सर्वदा सर्वभाव से निश्चित होकर केवल अपने प्रभु का ही स्मरण करना चाहिए। यही भक्ति है एवं यही साधना है।  
लोक कल्याण के लिए उन्होंने अनेक ग्रंथों की रचना की। इनमें नारद पांचरात्र, नारद के भक्तिसूत्र, नारद पुराण, बृहन्नारदीय उपपुराण-संहिता अथवा नारद स्मृति, नारद-परिव्राज कोपनिषद तथा नारदीय-शिक्षा आदि सम्मिलित हैं।

नारद पांचरात्र वैष्णव संप्रदाय का ग्रंथ माना जाता है। इसमें 'रात्र' का अर्थ है ज्ञान। कहा जाता है कि इस ग्रंथ में ब्रह्मा, वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्न एवं अनिरुद्ध का ज्ञान है इसलिए इसे पांचरात्र कहा जाता है। यह ग्रंथ श्रीकृष्ण द्वारा प्रदत्त था। देवर्षि नारद मुनि ने इसका प्रचार-प्रसार किया। इसमें प्रेम, भक्ति, मुक्ति एवं योग आदि का उल्लेख किया गया है। इसमें भक्ति के संबंध में श्रीकृष्ण एवं राधा के प्रेम का उल्लेख किया गया है।
 
नारद भक्ति सूत्र नामक ग्रंथ देवर्षि नारद मुनि द्वारा रचित है। इसमें भक्ति के 84 सूत्रों का उल्लेख किया गया है।
इसमें भक्ति की व्याख्या से लेकर इसकी महत्ता, नियम एवं फल आदि का भी उल्लेख मिलता है। इसमें बताया गया है कि प्रेम भक्ति का प्रथम सोपान है तथा अपने इष्ट के लिए व्याकुल होना भक्तिभाव का चिह्न है। आदर्श भक्ति को समझने के लिए श्रीकृष्ण के प्रति गोपियों के मनोभाव को समझना होगा।
     
नारद पुराण भी वैष्णव का ग्रंथ है। अट्ठारह पुराणों में यह छठे स्थान पर आता है। इसी से इसकी महत्ता का ज्ञान होता है। कहा जाता है कि इस पुराण का श्रवण करने से मुक्ति प्राप्त होती है अर्थात पापी व्यक्ति भी इसका श्रवण करके पाप मुक्त हो जाता है। इसमें पापों का उल्लेख किया गया है। इसके प्रारंभ में अनेक प्रश्न पूछे गए हैं। इसमें अनेक ऐतिहासिक एवं धार्मिक कथाएं, धार्मिक अनुष्ठान, ज्योतिष, मंत्र, बारह मास की व्रत-तिथियों के साथ उनसे संबंधित कथाएं, शिक्षा एवं व्याकरण आदि का भी उल्लेख मिलता है।    
 
बृहन्नारदीय उपपुराण-संहिता अथवा नारद स्मृति नारद स्मृति भी देवर्षि नारद मुनि द्वारा रचित ग्रंथ है। इसमें न्याय, उत्तराधिकार, संपत्ति का क्रय एवं विक्रय, उत्तराधिकार, पारिश्रमिक, ऋण एवं अपराध आदि विषयों उल्लेख है। एक प्रकार से यह न्याय अथवा संविधान का ग्रंथ है। इसमें नारद गीता, नारद नीति एवं 'नारद संगीत आदि ग्रंथ होने का भी उल्लेख किया गया है।
 
नारद-परिव्राजक कोपनिषद अथर्ववेद से संबंधित ग्रंथ है। देवर्षि नारद मुनि इसके उपदेशक हैं। इसमें परिव्राजक संन्यासी के सिद्धांत, आचरण, संन्यासी-धर्म, संन्यासी-भेद आदि का विस्तृत रूप से वर्णन किया गया है। परिव्राजक संन्यासी उसे कहा जाता है जो परिव्रज्या व्रत ग्रहण कर भिक्षाटन करके अपने जीवन का निर्वाह करता है। इसमें ब्रह्म के स्वरूप का विस्तृत रूप से वर्णन किया गया है। इसमें परम पद प्राप्ति की प्रक्रिया का भी स्पष्ट शब्दों में उल्लेख किया गया है। अहं ब्रहृमास्मिअर्थात् ‘मैं ही ब्रह्म हूं’ मंत्र का उल्लेख किया गया है। साधक के लिए यह मोक्ष प्राप्ति की स्थिति है।    
 
लोक कल्याणकारी संदेशवाहक
देवर्षि नारद मुनि एक लोक कल्याणकारी संदेशवाहक एवं लोक-संचारक थे। इसीलिए उन्हें आदि संबाददाता अथवा पत्रकार कहना अनुचित नहीं है। सर्वविदित है कि वही तीनों लोकों में सूचनाओं का आदान-प्रदान करते थे। वे केवल देवी-देवताओं को ही नहीं, अपितु दानवों को भी आवश्यक सूचनाएं देते थे। उस समय मौखिक रूप से ही सूचनाओं का आदान-प्रदान होता था। इसलिए दानव भी उनका आदर-सत्कार करते थे तथा उनसे परामर्श लेने भी संकोच नहीं करते थे।

प्राचीन काल में आधुनिक काल की भांति सूचना के साधन नहीं थे। उस समय चौपालों पर लोग एकत्रित होते थे। इसी समयावधि में उनके मध्य संवाद होता था। इस प्रकार सूचनाओं का आदान-प्रदान होता था। तीर्थ यात्रियों के द्वारा भी सूचनाओं का संचार होता था। व्यापारी भी सूचनाओं के संचार का माध्यम थे। इसके अतरिक्त मेलों, धार्मिक एवं मांगलिक आयोजनों में भी सूचनाओं का आदान-प्रदान होता था। इनमें सम्मिलित होने वाले लोग सूचनाओं को एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचाने का कार्य करते थे।           
 
सूचना देने वाले को संवाददाता कहा जाता है। इस प्रकार देवर्षि नारद मुनि आदि संवाददाता थे। वे सदैव एक स्थान से दूसरे स्थान पर भ्रमण करते रहते थे। इसके संबंध में एक कथा प्रचलित हैं कि ब्रहमाजी के पुत्र दक्ष के यहां सौ पुत्र हुए तथा सभी पुत्रों को जनसंख्या बढ़ाने का आदेश दिया गया, ताकि सृष्टि आगे बढ़ सके। किन्तु देवर्षि नारद मुनि ने अपने भाई दक्ष के पुत्रों अर्थात अपने भतीजों को तपस्या करने के लिए प्रेरित किया। उनकी बात मानकर सभी दक्ष पुत्र घोर तपस्या करने लगे। दक्ष ने अपने पुत्रों को तपस्या छोड़कर सृष्टि बढ़ाने का पुन: आदेश दिया, परन्तु देवर्षि नारद मुनि ने उन्हें पुनः तपस्या में लगा दिया। इस पर दक्ष को क्रोध आ गया और उसने देवर्षि नारद मुनि को श्राप दे दिया। इस श्राप के अनुसार वे एक स्थान पर अधिक समय तक नहीं ठहर पाएंगे तथा सदैव विचरण करते रहेंगे। इसके साथ ही वे सूचना को एक स्थान से दूसरे स्थान पर पहुंचाने का कार्य करेंगे। देवर्षि नारद मुनि ने इस श्राप को सहर्ष स्वीकार कर लिया। उन्होंने इस श्राप का लोकहित में उपयोग किया।      
 
श्रीकृष्ण ने देवर्षि नारद मुनि की श्राप की इस स्वीकारोक्ति की सराहना की थी। एक बार उन्होंने अर्जुन से कहा था कि यदि देवर्षि नारद मुनि चाहते तो दक्ष के श्राप से मुक्ति पा सकते थे, परंतु उन्होंने ऐसा नहीं किया। उन्होंने जनहित में श्राप को सहर्ष स्वीकार किया। उसी समय से वे निरंतर तीनों लोकों का भ्रमण करते रहते हैं।
 
वास्तव में देवर्षि नारद मुनि अत्यंत ज्ञानी एवं अनुभवी थे। वे भली भांति जानते थे कि वे इस श्राप का लोकहित में किस प्रकार उपयोग कर सकते हैं। उन्होंने मानव कल्याण के लिए इसका उपयोग किया। उनके कार्यों से पता चलता है कि किस प्रकार सूचना का उचित उपयोग करके अनिष्ट से बचा जा सकता है।
 
उन्होंने समुद्र मंथन के समय इसमें से विष निकलने की सूचना मंथन में लगे दोनों ही पक्षों को दी थी, किन्तु किसी भी पक्ष ने इस पर तनिक ध्यान नहीं किया। इसका परिणाम भयंकर हुआ तथा विष फैल गया। यह विष इतना भयंकर था कि इससे समस्त सृष्टि का विनाश हो सकता था। उन्होंने इसकी सूचना महादेव को दी। महादेव ने लोकहित में सारा विष पी लिया। इससे सृष्टि तो बच गई, परन्तु महादेव का कंठ नीला हो गया। इस घटना से सूचना के दोनों ही पक्षों के परिणाम का ज्ञान होता है। कहा जाता है कि सती द्वारा राजा दक्ष के यज्ञ कुंड में शरीर त्यागने की सूचना भी देवर्षि नारद मुनि ने ही महादेव को दी थी।
 
आधुनिक समय में पत्रकार देवर्षि नारद मुनि की जयंती को हर्षोल्लास से मनाते हैं। उल्लेखनीय है कि हिंदी साप्ताहिक ‘उदन्त मार्तण्ड’ का प्रकाशन 30 मई 1826 को कोलकाता से प्रारंभ हुआ था। उस दिन नारद जयंती थी। पत्रिका के प्रथम अंक के प्रथम पृष्ठ पर सम्पादक ने लिखा था- “देवऋषि नारद की जयंती के शुभ अवसर पर यह पत्रिका प्रकाशित होने जा रही है क्योंकि नारद जी एक आदर्श संदेशवाहक होने के नाते उनका तीनों लोक में समान सहज संचार था।“
 
इसमें कोई दो मत नहीं है कि महर्षि नारद मुनि एक महान विचारक एवं चिन्तक थे। उनकी सूचनाएं सज्जन के लिए शक्ति तो दुष्ट के लिए विनाशक सिद्ध होती थीं। इसलिए पत्रकारों को उन्हें अपना आदर्श एवं आदि गुरु मानना चाहिए। नि:संदेह इससे उनका गौरव बढ़ेगा तथा पत्रकारिता भी गौरान्वित होगी।
 

Saturday, March 29, 2025

भारतीय नववर्ष उत्सव का उमंग

 

डॉ. सौरभ मालवीय
भारतीय नववर्ष के साथ अनेक त्यौहार आते हैं। इनमें चैत्र शुक्लादि, नवरेह, गुड़ी पड़वा, उगादि, साजिबु नोंगमा पांबा अथवा साजिबु चेराओबा एवं चेटीचंड आदि सम्मिलित हैं। चैत्र शुक्लादि विक्रम संवत के नववर्ष के प्रारम्भ का प्रतीक है। इसे वैदिक अथवा हिन्दू कैलेंडर के रूप में भी जाना जाता है। इस दिन से नवरात्रि का प्रारम्भ होता है। भारतीय नववर्ष के साथ वसंत ऋतु का भी आगमन होता है। इसलिए ये सब त्यौहार वसंत के उत्सव हैं।

नवरेह
जम्मू कश्मीर में नवरेह का त्यौहार हर्ष एवं उल्लास से मनाया जाता है। नव चंद्रवर्ष के रूप में मनाया जाने वाला यह त्यौहार उत्साह एवं रंगों का उत्सव है। यह कश्मीरी पंडितों का विशेष त्यौहार माना जाता है। त्यौहार से एक दिन पूर्व वे पवित्र विचर नाग के झरने की यात्रा करते हैं। इसके पश्चात वे पवित्र जल में स्नान करके अपनी समस्त मलिनताओं का त्याग करते हैं। इसके पश्चात् वे पूजा-अर्चना करके प्रसाद ग्रहण करते हैं। यह प्रसाद चावल एवं विभिन्न प्रकार की जड़ी-बूटियों से बनाया जाता है। नवरेह के प्रातःकाल में वे लोग सर्वप्रथम चावल से भरे पात्र को देखते हैं। उनका मानना है कि ऐसा करने से घर में समृद्धि आती है, क्योंकि चावल धन-धान्य एवं समृद्धि का प्रतीक है।

गुड़ी पड़वा
महाराष्ट्र में गुड़ी पड़वा का त्यौहार धूमधाम से मनाया जाता है। गुड़ी का अर्थ है विजय पताका तथा पड़वा का अर्थ है चंद्रमा का प्रथम दिवस। इस दिन लोग बांस के ऊपर चांदी, तांबे अथवा पीतल के कलश को उल्टा रखते हैं। कलश पर स्वास्तिक का चिह्न बनाया जाता है। बांस पर केसरिया रंग का पताका लगाया जाता है। तदुपरान्त इसे नीम एवं आम की पत्तियां और पुष्पों से सुसज्जित किया जाता है। इसे घर के सबसे उच्च स्थान पर लगाया जाता है। गृह द्वारों पर आम के पत्तों का तोरण लगाया जाता है। मान्यता है कि आम के पत्ते पवित्र होते हैं। इसके लगाने से नकारात्मक शक्तियां घर में प्रवेश नहीं कर पाती हैं तथा घर इनसे सुरक्षित रहता है।  

इस दिन भोजन में गुड़ एवं नीम परोसा जाता है। गुड़ की मिठास सुख एवं नीम की कड़वाहट दुःख का प्रतीक है अर्थात जीवन के सुख- दुःख को समान भाव से अपनाना चाहिए, क्योंकि मानव की परीक्षा दुःख में ही होती है।   
देश के विभिन्न भागों में इसे भिन्न-भिन्न नामों से जाना जाता है। गुड़ी पड़वा गोवा में संवत्सर पड़वा के रूप में मनाया जाता है। केरल में इसे संवत्सर पड़वो के रूप में मनाया जाता है। आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, कर्नाटक एवं तमिलनाडु सहित दक्षिण भारत के कई क्षेत्रों में इसे उगादी के रूप में मनाया जाता है। राजस्थान में इसे थापना एवं मणिपुर में साजिबु चेराओबा अथवा साजिबु नोंगमा पांबा के रूप में मनाया जाता है।

सिन्धी समुदाय के लोग चेटीचंड का त्यौहार हर्षोल्लास से मनाते हैं। यह त्यौहार भगवान झूलेलाल के जन्म दिवस के रूप में जाना जाता है। उनका जन्म पाकिस्तान के सिंध प्रांत के ग्राम नसरपुर में हुआ था। उनका वास्तविक नाम उदयचंद था। वे वरुण देव के अवतार माने जाते हैं। उन्हें उदेरोलाल, घोड़ेवारो, जिन्दपीर, लालसाँई, पल्लेवारो, ज्योतिनवारो, अमरलाल आदि नामों से भी जाना जाता है। वह सद्भावना के प्रतीक माने जाते हैं।

विक्रम सम्वत् का इतिहास
30 मार्च से विक्रम सम्वत् 2082 का प्रारम्भ चुका है। विक्रम सम्वत् को नव संवत्सर भी कहा जाता है। संवत्सर पांच प्रकार के होते हैं, जिनमें सौर, चन्द्र, नक्षत्र, सावन और अधिमास सम्मिलित हैं। मेष, वृष, मिथुन, कर्क, सिंह, कन्या, तुला, वृश्चिक, धनु, मकर, कुम्भ एवं मीन नामक बारह राशियां सूर्य वर्ष के महीने हैं। सूर्य का वर्ष 365 दिन का होता है। इसका प्रारम्भ सूर्य के मेष राशि में प्रवेश करने से होता है।  चैत्र, वैशाख, ज्येष्ठ, आषाढ़, श्रावण, भाद्रपद, आश्विन, कार्तिक, अग्रहायण, पौष, माघ और फाल्गुन चन्द्र वर्ष के महीने हैं। चन्द्र वर्ष 355 दिन का होता है। इस प्रकार इन दोनों वर्षों में दस दिन का अंतर हो जाता है। चन्द्र माह के बढ़े हुए दिनों को ही अधिमास या मलमास कहा जाता है। नक्षत्र माह 27 दिन का होता है, जिन्हें अश्विन नक्षत्र, भरणी नक्षत्र, कृत्तिका नक्षत्र, रोहिणी नक्षत्र, मृगशिरा नक्षत्र, आर्द्रा नक्षत्र, पुनर्वसु नक्षत्र, पुष्य नक्षत्र, आश्लेषा नक्षत्र, मघा नक्षत्र, पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्र, उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र, हस्त नक्षत्र, चित्रा नक्षत्र, स्वाति नक्षत्र, विशाखा नक्षत्र, अनुराधा नक्षत्र, ज्येष्ठा नक्षत्र, मूल नक्षत्र, पूर्वाषाढ़ा नक्षत्र, उत्तराषाढ़ा नक्षत्र, श्रवण नक्षत्र, घनिष्ठा नक्षत्र, शतभिषा नक्षत्र, पूर्वाभाद्रपद नक्षत्र, उत्तराभाद्रपद नक्षत्र, रेवती नक्षत्र कहा जाता है। सावन वर्ष में 360 दिन होते हैं। इसका एक महीना 30 दिन का होता है।   
 
विक्रम सम्वत् का महत्त्व
भारतीय संस्कृति में विक्रम सम्वत् का बहुत महत्त्व है। चैत्र का महीना भारतीय कैलेंडर के हिसाब से वर्ष का प्रथम महीना है। नवीन संवत्सर के संबंध में अनेक पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं। वैदिक पुराण एवं शास्त्रों के अनुसार चैत्र शुक्ल पक्ष प्रतिपदा तिथि को आदिशक्ति प्रकट हुई थीं। आदिशक्ति के आदेश पर ब्रह्मा ने सृष्टि की प्रारम्भ की थी। इसीलिए इस दिन को अनादिकाल से नववर्ष के रूप में जाना जाता है। मान्यता यह भी है कि इसी दिन भगवान विष्णु ने मत्स्य अवतार लिया था। इसी दिन सतयुग का प्रारम्भ हुआ था। मान्यता है कि इसी दिन सम्राट विक्रमादित्य ने अपना राज्य स्थापित किया था। श्रीराम का राज्याभिषेक भी इसी दिन हुआ था। युधिष्ठिर का राज्याभिषेक भी इसी दिन हुआ था। नवरात्र भी इसी दिन से प्रारम्भ होते हैं। इसी तिथि को राजा विक्रमादित्य ने शकों पर विजय प्राप्त की थी। विजय को चिर स्थायी बनाने के लिए उन्होंने विक्रम सम्वत् का शुभारंभ किया था, तभी से विक्रम सम्वत् चली आ रही है। इसी दिन से महान गणितज्ञ भास्कराचार्य ने सूर्योदय से सूर्यास्त तक दिन, महीने और वर्ष की गणना करके पंचांग की रचना की थी। चैत्र शुक्ल प्रतिपदा का ऐतिहासिक महत्त्व भी है। स्वामी दयानंद सरस्वती ने इसी दिन आर्य समाज की स्थापना की थी। इस दिन महर्षि गौतम जयंती मनाई जाती है। इस दिन संघ संस्थापक डॉ. केशवराव बलिराम हेडगेवार का जन्मदिवस भी मनाया जाता है।

उत्कृष्ट काल गणना
सृष्टि की सर्वाधिक उत्कृष्ट काल गणना का श्रीगणेश भारतीय ऋषियों ने अति प्राचीन काल से ही कर दिया था। तदनुसार हमारे सौरमंडल की आयु लगभग चार अरब 32 करोड़ वर्ष हैं। आधुनिक विज्ञान भी कार्बन डेटिंग और हॉफ लाइफ पीरियड की सहायता से इसे लगभग चार अरब वर्ष पुराना मान रहा है। इतना ही नहीं, श्रीमद्भागवद पुराण, श्री मारकंडेय पुराण और ब्रह्म पुराण के अनुसार अभिशेत् बाराह कल्प चल रहा है और एक कल्प में एक हजार चतुरयुग होते हैं। जिस दिन सृष्टि का प्रारम्भ हुआ, वह आज ही का पवित्र दिन था। इसी कारण मदुराई के परम पावन शक्तिपीठ मीनाक्षी देवी के मंदिर में चैत्र पर्व मनाने की परंपरा बन गई। नवरात्रि के दौरान यहां भक्तों की भीड़ लगी रहती है।

महीनों का नामकरण
भारतीय महीनों का नामकरण भी बड़ा रोचक है अर्थात जिस महीने की पूर्णिमा जिस नक्षत्र में पड़ती है, उसी के नाम पर उस महीने का नामकरण किया गया है, उदाहरण के लिए इस महीने की पूर्णिमा चित्रा नक्षत्र में हैं, इसलिए इसे चैत्र महीने का नाम दिया गया। क्रांति वृत पर 12 महीने की सीमाएं तय करने के लिए आकाश में 30-30 अंश के 12 भाग किए गए और उनके नाम भी तारा मंडलों की आकृतियों के आधार पर रखे गए। इस प्रकार बारह राशियां बनीं।

चूंकि सूर्य क्रांति मंडल के ठीक केंद्र में नहीं हैं, अत: कोणों के निकट धरती सूर्य की प्रदक्षिणा 28 दिन में कर लेती है और जब अधिक भाग वाले पक्ष में 32 दिन लगते हैं। इसलिए प्रति तीन वर्ष में एक मास अधिक हो जाता है।

काल गणना की वैज्ञानिक व्यवस्था
भारतीय काल गणना इतनी वैज्ञानिक व्यवस्था है कि शताब्दियों तक एक क्षण का भी अंतर नहीं पड़ता, जबकि पश्चिमी काल गणना में वर्ष के 365.2422 दिन को 30 और 31 के हिसाब से 12 महीनों में विभक्त करते हैं। इस प्रकार प्रत्येक चार वर्ष में फरवरी महीने को लीप ईयर घोषित कर देते हैं। तब भी नौ मिनट 11 सेकेंड का समय बच जाता है, तो प्रत्येक चार सौ वर्षों में भी एक दिन बढ़ाना पड़ता है, तब भी पूर्णाकन नहीं हो पाता। अभी कुछ वर्ष पूर्व ही पेरिस के अंतर्राष्ट्रीय परमाणु घड़ी को एक सेकेंड धीमा कर दिया गया। फिर भी 22 सेकेंड का समय अधिक चल रहा है। यह पेरिस की वही प्रयोगशाला है, जहां के सीजीएस सिस्टम से संसार भर के सारे मानक तय किए जाते हैं। रोमन कैलेंडर में तो पहले 10 ही महीने होते थे। किंगनुमापाजुलियस ने 355 दिनों का ही वर्ष माना था, जिसे जुलियस सीजर ने 365 दिन घोषित कर दिया और उसी के नाम पर एक महीना जुलाई बनाया गया। उसके एक सौ वर्ष पश्चात किंग अगस्ट्स के नाम पर एक और महीना अगस्ट अर्थात अगस्त भी बढ़ाया गया। चूंकि ये दोनों राजा थे, इसलिए इनके नाम वाले महीनों के दिन 31 ही रखे गए। आज के इस वैज्ञानिक युग में भी यह कितनी हास्यास्पद बात है कि लगातार दो महीने के दिनों की संख्या समान हैं, जबकि अन्य महीनों में ऐसा नहीं है। जिसे हम अंग्रेजी कैलेंडर का नौवां महीना सितम्बर कहते हैं, दसवां महीना अक्टूबर कहते हैं, ग्यारहवां महीना नवम्बर और बारहवां महीना दिसम्बर हैं। इनके शब्दों के अर्थ भी लैटिन भाषा में 7,8,9 और 10 होते हैं। भाषा विज्ञानियों के अनुसार भारतीय काल गणना पूरे विश्व में व्याप्त थी और सचमुच सितम्बर का अर्थ सप्ताम्बर था, आकाश का सातवां भाग, उसी प्रकार अक्टूबर अष्टाम्बर, नवम्बर तो नवमअम्बर और दिसम्बर दशाम्बर है।
उल्लेखनीय है कि ज्योतिष विद्या में ग्रह, ऋतु, मास, तिथि एवं पक्ष आदि की गणना भी चैत्र प्रतिपदा से ही की जाती है। मान्यता है कि नव संवत्सर के दिन नीम की कोमल पत्तियों और पुष्पों का मिश्रण बनाकर उसमें काली मिर्च, नमक, हींग, मिश्री, जीरा और अजवाइन मिलाकर उसका सेवन करने से शरीर स्वस्थ रहता है। इस दिन आंवले का सेवन भी बहुत लाभदायक बताया गया है। माना जाता है कि आंवला नवमीं को जगत पिता ने सृष्टि पर पहला सृजन पौधे के रूप में किया था। यह पौधा आंवले का था। इस तिथि को पवित्र माना जाता है। इस दिन मंदिरों में विशेष पूजा-अर्चना होती है।

वसंत का उल्लास
भारतीय नववर्ष में वातावरण अत्यंत मनोहारी रहता है। केवल मनुष्य ही नहीं, अपितु जड़ चेतना नर-नाग यक्ष रक्ष किन्नर-गंधर्व, पशु-पक्षी लता, पादप, नदी नद, देवी, देव, मानव से समष्टि तक सब प्रसन्न होकर उस परम शक्ति के स्वागत में सन्नध रहते हैं। वृक्षों पर नए पत्ते आ जाते हैं। उपवनों में भी रंग- बिरंगे पुष्प दिखाई देते हैं।   
नववर्ष पर दिवस सुनहले, रात रूपहली, उषा सांझ की लाली छन-छन कर पत्तों में बनती हुई चांदनी जाली कितनी मनोहारी लगती है। शीतल मंद सुगंध पवन वातावरण में हवन की सुरभि कर देते हैं। ऐसे ही शुभ वातावरण में अखिल लोकनायक श्रीराम का अवतार होता है।

भारतीय नववर्ष वसंत का उल्लास साथ लाता है। जब भारतीय नववर्ष का प्रारम्भ होता है तो प्रकृति चहक उठती है। हमारे गौरवशाली भारत देश की बात ही निराली है। हमारे तीज-त्यौहार, व्रत, उपवास, रामनवमी, जन्माष्टमी, गृह प्रवेश, विवाह तथा अन्य शुभ कार्यों के शुभमुहूर्त आदि सभी आयोजन भारतीय कैलेंडर अर्थात हिन्दू पंचांग के अनुसार ही देखे जाते हैं। इसलिए हमारे जीवन में इसका अत्यंत महत्त्व है।

भारतीय नववर्ष : सृष्टि की रचना का दिन


डॊ. सौरभ मालवीय
नव रात्र हवन के झोके, सुरभित करते जनमन को।
है शक्तिपूत भारत, अब कुचलो आतंकी फन को॥
नव सम्वत् पर संस्कृति का, सादर वन्दन करते हैं।
हो अमित ख्याति भारत की, हम अभिनन्दन करते हैं॥
30 मार्च विक्रम संवत 2082 का प्रारंभ हो रहा है. भारतीय पंचांग में हर नवीन संवत्सर को एक विशेष नाम से जाना जाता है. इस वर्ष इस नवीन संवत्सर का नाम विरोधकर्त है. भारतीय संस्कृति में विक्रम संवत का बहुत महत्व है. चैत्र का महीना भारतीय कैलंडर के हिसाब से वर्ष का प्रथम महीना है. नवीन संवत्सर के संबंध में अन्य पौराणिक कथाएं हैं. वैदिक पुराण एवं शास्त्रों के अनुसार चैत्र शुक्ल पक्ष प्रतिपदा तिथि को आदिशक्ति प्रकट हुईं थी. आदिशक्ति के आदेश पर ब्रह्मा ने सृष्टि की प्रारंभ की थी. इसीलिए इस दिन को अनादिकाल से नववर्ष के रूप में जाना जाता है. मान्यता यह भी है कि इसी दिन भगवान विष्णु ने मत्स्य अवतार लिया था. इसी दिन सतयुग का प्रारंभ  हुआ था. इसी तिथि को राजा विक्रमादित्य ने शकों पर विजय प्राप्त की थी. विजय को चिर स्थायी बनाने के लिए उन्होंने विक्रम संवत का शुभारंभ किया था, तभी से विक्रम संवत चली आ रही है. इसी दिन से महान गणितज्ञ भास्कराचार्य ने सूर्योदय से सूर्यास्त तक दिन, महीने और साल की गणना कर पंचांग की रचना की थी.

सृष्टि की सर्वाधिक उत्कृष्ट काल गणना का श्रीगणेश भारतीय ऋषियों ने अति प्राचीन काल से ही कर दिया था. तदनुसार हमारे सौरमंडल की आयु चार अरब 32 करोड़ वर्ष हैं. आधुनिक विज्ञान भी, कार्बन डेटिंग और हॉफ लाइफ पीरियड की सहायता से इसे चार अरब वर्ष पुराना मान रहा है. यही नहीं हमारी इस पृथ्वी की आयु भी 29 मार्च को, एक अरब 97 करोड़ 29 लाख 49 हजार एक सौ 30 वर्ष पूरी हो गई. इतना ही नहीं, श्रीमद्भागवद पुराण, श्री मारकंडेय पुराण और ब्रह्म पुराण के अनुसार अभिशेत् बाराह कल्प चल रहा है और एक कल्प में एक हजार चतुरयुग होते है. इस खगोल शास्त्रीय गणना के अनुसार हमारी पृथ्वी 14 मनवंतरों में से सातवें वैवस्वत मनवंतर के 28वें चतुरयुगी के  अंतिम चरण कलयुग भी. आज 51 सौ 25 वर्ष में प्रवेश कर लिया.जिस दिन सृष्टि का प्रारंभ हुआ, वह आज ही का पवित्र दिन है. इसी कारण मदुराई के परम पावन शक्तिपीठ मीनाक्षी देवी के मंदिर में चैत्र पर्व की परंपरा बन गई.

भारतीय महीनों के नाम जिस महीने की पूर्णिमा जिस नक्षत्र में पड़ती है, उसी के नाम पर पड़ा. जैसे इस महीने की पूर्णिमा चित्रा नक्षत्र में हैं, इसलिए इसे चैत्र महीने का नाम हुआ. श्रीमद्भागवत के द्वादश  स्कंध के द्वितीय अध्याय के अनुसार जिस समय सप्तर्षि मघा नक्षत्र पर यह उसी समय से कलयुग का प्रारंभ हुआ, महाभारत और भागवत के इस खगोलीय गणना को आधार मान कर विश्वविख्यात डॉ. वेली ने यह निष्कर्ष दिया है कि कलयुग का प्रारंभ 3102 बी.सी. की रात दो बजकर 20 मिनट 30 सेकेंड पर हुआ था. डॉ. बेली महोदय आश्चर्य चकित है कि अत्यंत प्रागैतिहासिक काल में भी भारतीय ऋणियों ने इतनी सूक्ष्तम और सटीक गणना कैसे कर ली. क्रांति वृंत पर 12 हो महीने की सीमाएं तय करने के लिए आकाश में 30-30 अंश के 12 भाग किए गए और नाम भी तारा मंडलों की आकृतियों के आधार पर रखे गए. जो मेष, वृष, मिथुन इत्यादित 12 राशियां बनीं.

चूंकि सूर्य क्रांति मंडल के ठीक केंद्र में नहीं हैं, अत: कोणों के निकट धरती सूर्य की प्रदक्षिणा 28 दिन में कर लेती है और जब अधिक भाग वाले पक्ष में 32 दिन लगता है. प्रति तीन वर्ष में एक मास अधिक मास कहलाता है. संयोग से यह अधिक मास अगले महीने ही प्रारंभ हो रहा है.

भारतीय काल गणना इतनी वैज्ञानिक व्यवस्था है कि सदियों-सदियों तक एक पल का भी अंतर नहीं पड़ता, जबकि पश्चिमी काल गणना में वर्ष के 365.2422 दिन को 30 और 31 के हिसाब से 12 महीनों में विभक्त करते हैं. इस प्रकार प्रत्येक चार वर्ष में फरवरी महीने को लीप ईयर घोषित कर देते हैं फिर भी. नौ मिनट 11 सेकेंड का समय बच जाता है, तो प्रत्येक चार सौ वर्षों में भी एक दिन बढ़ाना पड़ता है, तब भी पूर्णाकन नहीं हो पाता है. अभी 10 साल पहले ही पेरिस के अंतर्राष्ट्रीय परमाणु घड़ी को एक सेकेंड स्लो कर दिया गया. फिर भी 22 सेकेंड का समय अधिक चल रहा है. यह पेरिस की वही प्रयोगशाला है, जहां के सीजीएस सिस्टम से संसार भर के सारे मानक तय किए जाते हैं. रोमन कैलेंडर में तो पहले 10 ही महीने होते थे. किंगनुमापाजुलियस ने 355 दिनों का ही वर्ष माना था, जिसे जुलियस सीजर ने 365 दिन घोषित कर दिया और उसी के नाम पर एक महीना जुलाई बनाया गया. उसके एक सौ साल बाद किंग अगस्ट्स के नाम पर एक और महीना अगस्ट भी बढ़ाया गया. चूंकि ये दोनों राजा थे, इसलिए इनके नाम वाले महीनों के दिन 31 ही रखे गए. आज के इस वैज्ञानिक युग में भी यह कितनी हास्यास्पद बात है कि लगातार दो महीने के दिन समान हैं, जबकि अन्य महीनों में ऐसा नहीं है. यदि नहीं जिसे हम अंग्रेजी कैलेंडर का नौवां महीना सितंबर कहते हैं, दसवां महीना अक्टूबर कहते हैं, ग्यारहवां महीना नवंबर और बारहवां महीना दिसंबर हैं. इनके शब्दों के अर्थ भी लैटिन भाषा में 7,8,9 और 10 होते हैं. भाषा विज्ञानियों के अनुसार भारतीय काल गणना पूरे विश्व में व्याप्त थी और सचमुच सितंबर का अर्थ सप्ताम्बर था, आकाश का सातवां भाग, उसी प्रकार अक्टूबर अष्टाम्बर, नवंबर तो नवमअम्बर और दिसंबर दशाम्बर है.

सन् 1608 में एक संवैधानिक परिवर्तन द्वारा एक जनवरी को नव वर्ष घोषित किया गया. जेनदअवेस्ता के अनुसार धरती की आयु 12 हजार वर्ष है, जबकि बाइबिल केवल दो हजार वर्ष पुराना मानता है. चीनी कैलेंडर एक करोड़ वर्ष पुराना मानता है, जबकि खताईमत के अनुसार इस धरती की आयु 8 करोड़ 88 लाख 40 हजार तीन सौ 18 वर्षों की है. चालडियन कैलेंडर धरती को दो करोड़ 15 लाख वर्ष पुराना मानता है. फीनीसयन इसे मात्र 30 हजार वर्ष की बताते हैं. सीसरो के अनुसार यह 4 लाख 80 हजार वर्ष पुरानी है. सूर्य सिद्धांत और सिद्धांत शिरोमाणि आदि ग्रंथों में चैत्रशुक्ल प्रतिपदा रविवार का दिन ही सृष्टि का प्रथम दिन माना गया है.

संस्कृत के होरा शब्द से ही, अंग्रेजी का आवर (Hour) शब्द बना है. इस प्रकार यह सिद्ध हो रहा है कि वर्ष प्रतिपदा ही नव वर्ष का प्रथम दिन है. एक जनवरी को नव वर्ष मनाने वाले दोहरी भूल के शिकार होते हैं, क्योंकि भारत में जब 31 दिसंबर की रात को 12 बजता है, तो ब्रिटेन में सायंकाल होता है, जो कि नव वर्ष की पहली सुबह हो ही नहीं सकता. और जब उनका एक जनवरी का सूर्योदय होता है, तो यहां के Happy New Year वालों का नशा उतर चुका रहता है. सनसनाती हुई ठंडी हवायें कितना भी सुरा डालने पर शरीर को गरम नहीं कर पाती हैं. ऐसे में सवेरे सवेरे नहा धोकर भगवान सूर्य की पूजा करना तो अत्यंत दुष्कर रहता है. वही पर भारतीय नव वर्ष में वातावरण अत्यंत मनोहारी रहता है. केवल मनुष्य ही नहीं, अपितु जड़ चेतना नर-नाग यक्ष रक्ष किन्नर-गंधर्व, पशु-पक्षी लता, पादप, नदी नद, देवी, देव, मानव से समष्टि तक सब प्रसन्न होकर उस परम शक्ति के स्वागत में सन्नध रहते हैं.

दिवस सुनहले रात रूपहली उषा सांझ की लाली छन-छन कर पत्तों में बनती हुई चांदनी जाली. शीतल मंद सुगंध पवन वातावरण में हवन की सुरभि कर देते हैं. ऐसे ही शुभ वातावरण में जब मध्य दिवस अतिशित न धामा की स्थिति बनती है, तो अखिल लोकनायक श्रीराम का अवतार होता है. आइए इस शुभ अवसर पर हम भारत को पुन: जगतगुरू के पद पर आसीन करने में कृत संकल्प हों.

ज्योतिषाचार्यों के अनुसार इस वर्ष के राजा सूर्य हैं और शनि मंत्री होंगे. यह वर्ष सभी के लिए काफी सुखद रहेगा. उल्लेखनीय है कि ज्योतिष विद्या में ग्रह, ऋतु, मास, तिथि एवं पक्ष आदि की गणना भी चैत्र प्रतिपदा से ही की जाती है. मान्यता है कि नव संवत्सर के दिन नीम की कोमल पत्तियों और पुष्पों का मिश्रण बनाकर उसमें काली मिर्च, नमक, हींग, मिश्री, जीरा और अजवाइन मिलाकर उसका सेवन करने से शरीर स्वस्थ रहता है. इस दिन आंवले का सेवन भी बहुत लाभदायद बताया गया है. माना जाता है कि आंवला नवमीं को जगत पिता ने सृष्टि पर पहला सृजन पौधे के रूप में किया था. यह पौधा आंवले का था. इस तिथि को पवित्र माना जाता है. इस दिन मंदिरों में विशेष पूजा-अर्चना होती है.
निसंदेह, जब भारतीय नववर्ष का प्रारंभ होता है, तो चहुंओर प्रकृति चहक उठती है. भारत की बात ही निराली है.
कवि श्री जयशंकर प्रसाद के शब्दों में-
अरुण यह मधुमय देश हमारा
जहां पहुंच अनजान क्षितिज को
मिलता एक सहारा
अरुण यह मधुमय देश हमारा


Wednesday, March 12, 2025

हिंदी साहित्य में होली के रंग


डॉ. सौरभ मालवीय
होली कवियों का प्रिय त्योहार है। यह त्योहार उस समय आता है जब चारों दिशाओं में प्रकृति अपने सौन्दर्य के चरम पर होती है। उपवनों में रंग-बिरंगे पुष्प खिले हुए होते हैं। होली प्रेम का त्योहार माना जाता है, क्योंकि भगवान श्रीकृष्ण और राधा को होली अत्यंत प्रिय थी। भक्त कवियों एवं कवयित्रियों ने होली पर असंख्य रचनाएं लिखी हैं।
 
कृष्ण भक्त कवि रसखान ने ब्रज की होली पर अत्यंत सुंदर रचनाएं लिखी हैं। इनमें श्रीकृष्ण की राधा के साथ खेली जाने वाली होली प्रमुख है। वे कहते हैं-       
मिली खेलत फाग बढयो अनुराग सुराग सनी सुख की रमकै।
कर कुंकुम लै करि कंजमुखि प्रिय के दृग लावन को धमकै।।
रसखानि गुलाल की धुंधर में ब्रजबालन की दुति यौं दमकै।
मनौ सावन सांझ ललाई के मांझ चहुं दिस तें चपला चमकै।।
अर्थात श्रीकृष्ण राधा और गोपियों के साथ होली खेल रहे हैं। इस खेल के साथ-साथ उनमें प्रेम बढ़ रहा है। कमल के पुष्प के समान सुंदर मुख वाली राधा श्रीकृष्ण के मुख पर कुमकुम लगाने की चेष्टा कर रही है। वह गुलाल फेंकने का अवसर खोज रही है। चहुंओर गुलाल ही गुलाल दिखाई दे रहा है। इस गुलाल के कारण ब्रजबालाओं की देहयष्टि इस प्रकार दमक रही है जैसे सावन मास के सायंकाल में सूर्यास्त से लाल हुए आकाश में चारों ओर बिजली चमकती रही हो।
 
कृष्ण भक्त सूरदास ने भी श्रीकृष्ण और राधा की होली पर असंख्य रचनाएं लिखी हैं। होली उनकी रासलीलाओं में महत्वूर्ण स्थान रखती है। वे कहते हैं-
हहरि संग खेलति है सब फाग।
इहिं मिस करति प्रगट गोपी, उर अंतर कौ अनुराग।।
सारी पहिरि सुरंग, कसि कचुकि, काजर दै दै नैन।
बनि बनि निकसि निकसि भई ठाढ़ी, सुनि माधौ के बैन।।
डफ, बांसुरी रुंज अरु महुअरि, बाजत ताल मृदंग।
अति आनंद मनोहर बानी, गावत उठति तरंग।।
एक कोध गोविंद ग्वाल सब, एक कोध ब्रज नारि।
छांड़ि सकुच सब देति परस्पर, अपनी भाई गारि।।
मिलि दस पांच अली कृष्नहिं, गहि लावतिं अचकाइ।
भरि अरगजा अबीर कनकघट, देति सीस तै नाइ।।
छिरकतिं सखी कुमकुमा केसरि, भुरकतिं बदनधूरि।
सोभित है तन सांझ-समै-घन, आए है मनु पूरि।।
दसहूं दिसा भयौ परिपूरन, 'सूर' सुरंग प्रमोद।
सुर विमान कौतूहल भूले, निरखत स्याम विनोद।
 
अर्थात श्रीकृष्ण के साथ सब होली खेल रहे हैं। फागुन के रंगों के माध्यम से गोपियां अपने हृदय का प्रेम प्रकट कर रही हैं। वे अति सुन्दर साड़ी एवं चित्ताकर्षक चोली पहन कर तथा आंखों में काजल लगाकर श्रीकृष्ण की पुकार सुनकर होली खेलने के लिए अपने घरों से बाहर आ गईं हैं।
डफ, बांसुरी, रुंज, ढोल एवं मृदंग बजने लगे हैं। सब लोग आनंदित होकर मधुर स्वरों में गा रहे हैं। एक ओर श्रीकृष्ण और ग्वाल बाल डटे हुए हैं तो दूसरी ओर समस्त ब्रज की महिलाएं संकोच छोड़कर एक दूसरे को मीठी गालियां दे रहे हैं तथा छेड़छाड़ चल रही है। अकस्मात कुछ सखियां मिलकर श्रीकृष्ण को घेर लेती हैं और स्वर्णघट में भरा सुगंधित रंग उनके सिर पर उंडेल देती हैं। कुछ सखियां उन पर कुमकुम केसर छिडक़ देती हैं। इस प्रकार ऊपर से नीचे तक रंग, अबीर गुलाल से रंगे हुए श्रीकृष्ण ऐसे लग रहे हैं जैसे सांझ के समय आकाश में बादल छा गए हों। फाग के रंगों से दसों दिशाएं परिपूर्ण हो गई हैं। आकाश से देवतागण अपना विचरण भूलकर श्याम सुन्दर का फाग विनोद देखने के लिए रुक गए हैं तथा आनंदित हो रहे हैं।
 
मीराबाई श्रीकृष्ण को अपना स्वामी मानती थीं। उन्होंने होली और श्रीकृष्ण के बारे में अनेक रचनाएं लिखी हैं। उनकी रचनाओं में आध्यात्मिक संदेश भी मिलता है। वे कहती हैं-
फागुन के दिन चार होली खेल मना रे।।
बिन करताल पखावज बाजै अणहदकी झणकार रे।
बिन सुर राग छतीसूं गावै रोम रोम रणकार रे।।
सील संतोखकी केसर घोली प्रेम प्रीत पिचकार रे।
उड़त गुलाल लाल भयो अंबर, बरसत रंग अपार रे।।
घटके सब पट खोल दिये हैं लोकलाज सब डार रे।
मीरा के प्रभु गिरधर नागर चरणकंवल बलिहार रे।।
 
इस पद में मीराबाई ने होली एवं फागुन के माध्यम से समाधि का उल्लेख किया है। वे कहती हैं कि फागुन मास में होली खेलने के चार दिन ही होते हैं अर्थात बहुत अल्प समय होता है। इसलिए मन होली खेल ले अर्थात श्रीकृष्ण से प्रेम कर ले। करताल एवं पखावाज के बिना ही अनहद की झंकार हो रही है। मेरा मन बिना सुर एवं राग के आलाप कर रहा है। इस प्रकार रोम-रोम श्रीकृष्ण के प्रेम में लीन है। मैंने अपने प्रिय से होली खेलने के लिए शील एवं संतोष रूपी केसर का रंग घोल लिया है। मेरा प्रिय प्रेम ही मेरी पिचकारी है। गुलाल के उड़ने के कारण संपूर्ण आकाश लाल हो गया है। मैंने अपने हृदय के द्वार खोल दिए हैं, क्योंकि अब मुझे लोक लाज का कोई तनिक भी भय नहीं है। मेरे स्वामी गोवर्धन पर्वत को अपनी अंगुली पर उठाने वाले भगवान श्रीकृष्ण हैं। मैंने उनके चरणों में अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया है।       
 
श्रृंगार रस के विख्यात कवि बिहारीलाल को भी होली का त्योहार बहुत प्रिय था। उन्होंने भी होली को लेकर अनेक रचनाएं लिखी हैं। वे कहते हैं-
उड़ि गुलाल घूंघर भई तनि रह्यो लाल बितान।
चौरी चारु निकुंजनमें ब्याह फाग सुखदान।।
फूलन के सिर सेहरा, फाग रंग रंगे बेस।
भांवरहीमें दौड़ते, लै गति सुलभ सुदेस।।
भीण्यो केसर रंगसूं लगे अरुन पट पीत।
डालै चांचा चौकमें गहि बहियां दोउ मीत।।
रच्यौ रंगीली रैनमें, होरीके बिच ब्याह।
बनी बिहारन रसमयी रसिक बिहारी नाह।।
 
रीतिकालीन कवि पद्माकर ने भी होली का बहुत ही सुन्दर वर्णन किया है। उन्होंने श्रीकृष्ण की राधा और गोपियों के साथ होली खेलने को लेकर अनेक सुन्दर रचनाएं लिखी हैं। वे कहते हैं- 
फागु की भीर, अभीरिन ने गहि गोविंद लै गई भीतर गोरी
भाय करी मन की पद्माकर उपर नाई अबीर की झोरी
छीने पीतांबर कम्मर तें सु बिदा कई दई मीड़ि कपोलन रोरी।
नैन नचाय कही मुसकाय ''लला फिर आइयो खेलन होरी।"
 
अर्थात श्रीकृष्ण गोपियों के साथ होली खेल रहे हैं। पद्माकर कहते हैं कि राधा होली खेल रही भीड़ में से श्रीकृष्ण का हाथ पकड़कर भीतर ले जाती है। फिर वह अपने मन की करते हुए श्रीकृष्ण पर अबीर की झोली उलट देती है तथा उनकी कमर से पीतांबर छीन लेती है। वह श्रीकृष्ण को यूं ही नहीं छोड़ती, अपितु जाते हुए उनके गालों पर गुलाल लगाती है। वह उन्हें निहारते एवं मुस्कराते हुए कहती है कि लला फिर से आना होली खेलने।
 
हिन्दी कविता के छायावादी युग के चार प्रमुख स्तंभों में से एक माने जाने वाले सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ भी होली के रंगों से अछूते नहीं रहे। उन्होंने भी होली के रंगीले त्योहार पर कई कविताएं लिखी हैं। वे कहते हैं-
होली है भाई होली है
मौज मस्ती की होली है
रंगो से भरा ये त्यौहार
बच्चो की टोली रंग लगाने आयी है
बुरा ना मानो होली है
 
राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त ने भी होली पर बहुत सी कविताएं लिखी हैं। वे खड़ी बोली के प्रथम कवि माने जाते हैं। उनकी होली की कविताएं बहुत ही सुन्दर एवं लुभावनी हैं। वे कहते हैं-
जो कुछ होनी थी, सब होली
धूल उड़ी या रंग उड़ा है
हाथ रही अब कोरी झोली
आंखों में सरसों फूली है
सजी टेसुओं की है टोली
पीली पड़ी अपत, भारत-भू,
फिर भी नहीं तनिक तू डोली
 
उत्तर छायावाद काल के प्रमुख कवि हरिवंश राय बच्चन की होली पर लिखी कविताएं बहुत ही सुन्दर हैं। इनमें प्रेम एवं विरह आदि के अनेक रंग हैं। वे कहते हैं-
तुम अपने रंग में रंग लो तो होली है
देखी मैंने बहुत दिनों तक
दुनिया की रंगीनी
किंतु रही कोरी की कोरी
मेरी चादर झीनी
तन के तार छूए बहुतों ने
मन का तार न भीगा
तुम अपने रंग में रंग लो तो होली है
 

संकल्प से सिद्धि : नये भारत का निर्माण होगा

देश में भ्रष्टाचार, गरीबी और निरक्षरता जैसी समस्याएं एक बड़ी चुनौती बनी हुई हैं। इससे निपटने के लिए जनता और सरकार दोनों को ही मिलकर काम करना ...