Thursday, August 27, 2026

राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन : ग्रामीणों के लिए हितकारी


देश में स्वास्थ्य सेवाओं का अभाव है। ग्रामीण क्षेत्रों की स्थिति तो बहुत दयनीय है। उपचार के अभाव में रोगियों की मृत्यु होने के समाचार भी सुनने को मिलते रहते हैं। देश की जनसंख्या की दृष्टि से देखें, तो उपलब्ध स्वास्थ्य सुविधाएं अपर्याप्त हैं। ग्रामीणों को स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराने के लिए सरकार ने 12 अप्रैल 2005 को राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन का शुभारंभ किया। यह केन्द्र सरकार की एक महत्वपूर्ण योजना है, जो स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा चलाई जा रही है।आरंभ में यह मिशन केवल सात वर्ष अर्थात 2005 से 2012 तक के लिए रखा गया था, परंतु बाद में इसे आगे बढ़ा दिया गया। 

इसका प्रमुख उद्देश्य सामुदायिक स्वामित्व की विकेंद्रित स्वास्थ्य प्रदान करने वाली प्रणाली विकसित करना है। यह ग्रामीण क्षेत्रों में सुगमता से वहनीय और जवाबदेही वाली गुणवत्तायुक्त स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराना है। यह योजना विभिन्न स्तरों पर चल रही लोक स्वास्थ्य सुपुर्दगी प्रणाली को मजबूत बनाने के साथ-साथ विद्यमान सभी कार्यक्रमों जैसे प्रजनन बाल स्वास्थ्य परियोजना, एकीकृत रोग निगरानी, मलेरिया, कालाज़ार, तपेदिक तथा कुष्ठ आदि के लिए एक ही स्थान पर सभी सुविधाएं प्रदान कराना है।संचारी और असंचारी रोगों की रोकथाम व नियंत्रण के कार्य करना, जनसंख्या नियंत्रण के साथ-साथ लिंग व जन सांख्यिकीय संतुलन सुनिश्चित करना, अन्य वैकल्पिक औषधी पद्धतियों आयुर्वेद, यूनानी एवं होम्योपैथी आदि को प्रोत्साहित करना भी इसमें सम्मिलित है। 
इसके अंतर्गत जन स्वास्थ्य को बेहतर बनाने के साथ-साथ बाल मृत्यु और मातृ दर को घटाना है। इसके लिए केवल स्वास्थ्य सेवाओं की ही नहीं, साथ में अन्य मूलभूत आवश्यकताओं जैसे पीने का पानी, सफाई व शौचालय, टीकाकरण और पर्याप्त पोषण का भी प्रबंध करना भी है। 
इस योजना को पूरे देश में विशेषकर उन 18 राज्यों में लागू किया गया, जिनमें स्वास्थ्य अवसंरचना अत्यंत दयनीय तथा स्वास्थ्य संकेतक निम्न हैं। इन राज्यों में अरुणाचल प्रदेश, असम, बिहार, छत्तीसगढ़, हिमाचल प्रदेश, झारखंड, जम्मू और कश्मीर, मणिपुर, मिज़ोरम, मेघालय, मध्य प्रदेश, नागालैंड, उड़ीसा, राजस्थान, सिक्किम, त्रिपुरा, उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश सम्मिलित हैं। इसके द्वारा वर्तमान प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों, सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों और जिला स्वास्थ्य केन्दों को सुदृढ़ बनाने और गैर सरकारी संगठनों का अधिकतम उपयोग करने की योजना है। इस मिशन के अंतर्गत किए जाने वाले कार्यों में स्वास्थ्य पर सरकारी खर्च में बढोत्तरी, स्वास्थ्य सेवाओं के ढांचा का सुधार, ग्रामीण स्वास्थ्य केंद्रों को मजबूत बनाना, देशी याब्नी परंपरागत आरोग्य प्रणालियों को बढावा देना, उन्हें स्वास्थ्य सेवाओं का मुख्य अंग बनाना, निजी स्वास्थ्य क्षेत्र का नियमीकरण, इसके लिए मापदंड और अधिनियम बनाना, निजी स्वास्थ्य क्षेत्र के साथ साझेदारी बनाना, लोगों को इलाज प्राप्त करने के लिए जो खर्च करना पड़ता है, उसके लिए उचित बीमा-योजनाओं का प्रबंध करना, जिला कार्यक्रमों का विकेंद्रीकरण करना ताकि ये जिला स्तर पर चला जा सकें, स्वास्थ्य के प्रबंधन में पंचायती राज संस्थाओं/ समुदाय की भागीदारी को बढाना, समयबद्ध लक्ष्य और कार्य की प्रगति पर जनता के सामने रिपोर्ट पेश करना आदि सम्मिलित है।
इस योजना के क्रियान्वयन में लगीं प्रशिक्षित आशा की भूमिका बहुत ही महत्वपूर्ण है। लगभग प्रति एक हजार ग्रामीण जनसंख्या पर एक आशा कार्यरत है। 

उप केंद्रों की क्षमताओं के विकास के लिए आवश्यकता के अनुसार नये उपकेंद्र उपकेंद्र के भवन का निर्माण करना, आवश्यकतानुसार एक और महिला स्वास्थ्य कार्यकर्ता एएनएम की नियुक्ति की जाएगा, जो उसी क्षेत्र की होगी। हर उप-केंद्र को 10 हजार रुपये की गैर मद निर्धारित अनुदान राशि दी जाएगी, जो सरपंच और महिला स्वास्थ्य कार्यकर्ता एएनएम के नाम से बैंक में जमा होगी। महिला स्वास्थ्य कार्यकर्ता इसका इस्तेमाल ग्राम स्वास्थ्य समिति से चर्चा करके कर सकती है। प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में सभी आवश्यक दवाइयां उपलब्ध होंगी। प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र के क्रियान्वयन के लिए कई महत्वपूर्ण कार्य कि जाएंगे, जैसे आवश्यकतानुसार भवन का निर्माण, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र 24 घंटे खुले रहेंगे और नर्सिंग की सुविधा उपलब्ध होगी। कुछ चुनिंदा प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र को 24 घंटे का अस्पताल बनाया जाएगा, जिसमें आपातकालीन सेवाएं प्राप्त हो सकें। प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में दो और नर्स की नियुक्ति की जाएगी, यानी कुल तीन नर्स आवश्यकता के अनुसार एक और चिकित्सक  आयुष चिकित्सक आयुर्वेदिक, यूनानी, होमियोपैथी की नियुक्ति की जाएगी।हर प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र को 10 हजार का अनुदान मिलेगा, जिसे स्थानीय स्वास्थ्य संबंधी कार्य के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र के रख-रखाव के लिए 50 हजार रुपये दिए जाएंगे।

प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र को चलाने के लिए इनमें रोगी कल्याण समिति का गठन किया जाएगा। प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र को प्रोत्साहित करने के लिए एक लाख रुपये का अनुदान दिया जाएगा। शर्त यह है कि यह राशि राज्य को तभी दी जाए, जब राज्य यह वचन दे कि रोगी कल्याण समित जो पैसा इकट्ठा करती है उसे वह उसी के पास रहेगा, राज्य के खाते में नहीं जाएगा। प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र की तरह सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों की क्षमता का विकास किया जाएगा, जिनमें 24 घंटे चिकित्सा सेवाएं उपलब्ध होंगी। उनमें आयुर्वेदिक, यूनानी एवं होमियोपैथी के चिकित्सक की नियुक्ति की जाएगी। सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों के भवनों का निर्माण या पुननिर्माण किया जाएगा। इनमें भी रोगी कल्याण समिति का गठन किया जाएगा। आवश्यकतानुसार नये सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र शुरू किए जा सकेंगे। सारे राष्ट्रीय कार्यक्रमों जैसे मलेरिया, टीबी आदि और परिवार कल्याण कार्यक्रमों का राज्य और ज़िला स्तर पर समन्वयन किया जाएगा। राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन के लिए जो ज़िला स्तर पर टीम बनेगी, उसमें निजी क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया जाएगा। `आशा´ कार्यक्रम के निरीक्षण के लिए एक निगरानी समूह का गठन किया जाएगा। जननी सुरक्षा योजना के अंतर्गत सामाजिक निगरानी और जवाबदेही के लिए प्रबंध किया जाएगा। इसके लिए गांव, जिला और राज्य के स्तर पर समितियां होंगी। जिला स्तर पर जन संवाद, राज्य स्तर पर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के आदेशों का पालन हो रहा है या नहीं, यह सुनिश्चित कर सरकार, राज्य और जिला अपने स्तर पर जन स्वास्थ्य की रिपोर्ट पेश करेगी। राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन में तीन तरीकों से जवाबदेही प्रक्रिया के ढांचे का प्रस्ताव किया गया है। इसमें आंतरिक निगरानी, सामयिक अध्ययन एवं सर्वेक्षण तथा समुदाय आधारित निगरानी शामिल है। समुदाय आधारित निगरानी को स्वास्थ्य के क्षेत्र में सामुदायिक पहलकदमी के एक कदम के रूप में समझा जा सकता है। अत: निगरानी एवं नियोजन समितियों का प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र, प्रखंड, ज़िला एवं राज्य स्तर पर प्रावधान किया गया है। समुदाय आधारित निगरानी प्रक्रिया वस्तुत: स्वास्थ्य सेवाएं प्रदान करना एवं प्रबंधन करने वालों, समुदाय एवं समुदाय आधारित संगठनों यथा स्वयंसेवी संस्थाएं और पंचायती राज संस्थाओं की आपसी साझेदारी एवं समझदारी से ही विकसित एवं सफल हो पाएंगी। 

उल्लेखनीय है कि स्वास्थ्य सुविधाओं में सहयोग बढ़ाने के लिए भारत और मोरक्को ने दिसम्बर 2017 में एक समझौता किया है। स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री जे.पी.नड्डा के अनुसार दोनों देशों के बीच मजबूत और समृद्ध पारंपरिक संबंध हैं। भारत जेनेरिक दवाओं का दो सौ से अधिक देशों को निर्यात कर रहा है और हमारे यहां एक मजबूत जन स्वास्थ्य प्रणाली काम करती है। इस प्रणाली की निगरानी राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के माध्यम से की जाती है। दोनों देशों के बीच सहयोग के मुख्य क्षेत्रों में बाल हृदय रोग और कैंसर सहित गैर-संचारी रोग, औषधि नियमन एवं गुणवत्ता नियंत्रण, संचारी रोग, मातृत्व, बाल एवं पूर्व-प्रसव स्वास्थ्य, बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं के आदान-प्रदान के लिए अस्पतालों के बीच सहयोग, स्वास्थ्य सेवाओं और अस्पतालों के प्रबंधन और प्रशासन में प्रशिक्षण आदि सम्मिलित है। एक समझौता जवाहरलाल इंस्टीट्यूट ऑफ पोस्ट-ग्रेजुएट मेडिकल एजुकेशन एंड रिसर्च और और मराकेश मोहम्मद विश्व विद्यालय अस्पताल के बीच हुआ। दोनों देशों के संस्थानों ने टेली-मेडिसन के क्षेत्र में सहयोग पर सहमति वयक्त की।

उल्लेखनी है कि राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन, राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन का एक घटक है। इसके कारण ग्रामीण क्षेत्रों के लोगों को स्वास्थ्य सुविधाएं मिल पा रही है। इस योजना को अभी उन क्षेत्रों तक ले जाना है, जहां स्वास्थ्य सेवाओं का अभाव है।



(डॉ सौरभ मालवीय की पुस्तक- 'विकास के पथ पर भारत' से)

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