जल ही जीवन है। जल के बिना जीवन की कल्पना करना असंभव है। हर प्राणी को जीवित रहने के लिए जल चाहिए। खेती-किसानी के लिए भी जल की अत्यधिक आवश्यकता होती है। देश के अधिकतर किसानों को अपनी फसल की संचाई के लिए वर्षा पर निर्भर रहना पड़ता है। पर्याप्त वर्षा न होने पर उनकी फसल सूख जाती है। देश के अधिकांश क्षेत्र ऐसे हैं, जहां पर वर्षा नाममात्र को ही होती है। इसके कारण इन क्षेत्रों में सूखे की समस्या है। इनमें देश का उत्तर-पश्चिमी और दक्षिण के पठार सम्मिलित हैं। लगातार गिरते भू-जल स्तर ने भी सिंचाई जल संकट उत्पन्न कर दिया है। देश में कुल 14.2 करोड़ हेक्टेयर कृषि योग्य भूमि में से 65 प्रतिशत में सिंचाई सुविधा नहीं है।
खराब मानसून से किसानी को राहत पहुचाने के लिए प्रधान मंत्री कृषि सिंचाई योजना शुरू की गई है। इस योजना का उद्देश्य देश के हर खेत तक किसी न किसी माध्यम से सिंचाई सुविधा सुनिश्चित करना है, ताकि जल का अधिक से अधिक सदुपयोग कर अधिक फसल ली जा सके। इसमें पांच वर्षों 2015-16 से 2019-20 के लिए 50 हजार करोड़ रुपये की राशि का प्रावधान किया गया है। इस निवेश से प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना कार्यक्रम में पूरी आपूर्ति श्रंखला अर्थात जल स्त्रोत, वितरण नेटवर्क तथा फार्म स्तर के अनुप्रयोग पर ध्यान केंद्रित करके एकीकृत विकास की कल्पना की गई हैं। वर्ष 2015-16 के दौरान लघु सिंचाई के तहत 8.0 लाख हेक्टेयर क्षेत्र लाने का लक्ष्य निर्धारित किया गया था। दिसंबर 2019 तक 99 मुख्य और माध्यम सिंचाई को मिशन मोड़ में पूरा किए जाने का भी निर्णय लिया गया हैं। इसके अतिरिक्त 76.03 लाख हेक्टेयर क्षेत्र सिंचाई के अंतर्गत लाया जा सकेगा। इससे सिंचाई में निवेश में एकरूपता लाई जा सकेगी। ’हर खेत को पानी’ के अंतर्गत कृषि योग्य क्षेत्र का विस्तार करने के लिए, खेतों में ही जल को इस्तेमाल करने की दक्षता को बढ़ाना देना है, ताकि पानी के अपव्यय को कम किया जा सके। साथ ही सही सिंचाई और पानी को बचाने की तकनीक को अपनाना जा सके। इसके अतिरिक्त इसके माध्यम से सिंचाई में निवेश को आकर्षित करने का भी प्रयास किया जाएगा। इस योजना के अंतर्गत वर्ष 2016-17 में रुपये 125.17 करोड़ की लागत से 23 बड़े और माध्यम सिंचाई परियोजनाओं को पूरा किए जाने का निर्णय लिया गया था। लगभग 20 हजार करोड़ की धनराशि से नाबार्ड में एक लम्बी अवधि सिंचाई कोष का सर्जन किया जाएगा।
इस योजना के उद्देश्यों की उपलब्धि के लिए विशेषकर तीन मंत्रालयों जल संसाधन, नदी विकास एवं गंगा पुनरुद्धार मंत्रालय, ग्रामीण विकास मंत्रालय तथा कृषि मंत्रालय के सहभागिता द्वारा विभिन्न कार्यक्रम चलाए जाते हैं। समेकित पनधारा प्रबंधन कार्यक्रम के अंतर्गत ग्रामीण विकास मंत्रालय मुख्य रूप से मृदा एवं जल संरक्षण के लिए छोटे तालाब, जल संचयन संरचना के साथ-साथ छोटे बांधों तथा सम्मोच्च मेढ़ निर्माण आदि कार्यों का क्रियान्वयन राज्य सरकार के माध्यम से करेगा। इसके लिए वर्ष 2015-16 में 1500 करोड़ रुपये आवंटित किए गए।
जल संसाधन, नदी विकास एवं गंगा पुनरुद्धार मंत्रालय संरक्षित जल को खेत तक पहुंचाने के लिए नाली इत्यादि विकास के साथ-साथ त्वरित सिंचाई लाभ संबंधी कार्यक्रम समयबद्ध तरीके से पूर्ण करेगा। इसके अंतर्गत निम्न स्तर पर जल निकाय सृजन, नदियों में लिफ्ट सिंचाई योजना, जल वितरण नेटवर्क तथा उपलब्ध जलस्रोतों के मरम्मत, पुन: भंडारण तथा सृजन का कार्य मुख्य रूप से किया जाएगा। महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम के अंतर्गत पांच लाख कृषि तालाबों और कुओं का निर्माण प्रस्तावित है। महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम के अंतर्गत पांच लाख कृषि तालाबों और कुओ का निर्माण प्रस्तावित है। इन कार्यों के लिए वर्ष 2015-16 के लिए 2000 करोड़ रुपये की राशि उपलब्ध कराई गई है।
कृषि मंत्रालय, कृषि एवं सहकारिता विभाग, वर्षाजल संरक्षण, जल बहाव नियंत्रण कार्य, जल उपलब्धता के अनुसार फसल उत्पादन, कृषि वानिकी, चारागाह विकास के साथ-साथ कृषि जीविकोपार्जन के विभिन्न कार्यक्रमों को भी चलाया जाएगा। जल प्रयोग क्षमता बढ़ाने के लिए सूक्ष्म सिंचाई योजना ड्रिप, स्प्रिंकलर, रेनगन आदि का उपयोग विभिन्न फसलों की सिंचाई के लिए किया जाएगा। इस सभी कार्यक्रमों को चलाने के लिए वर्ष 2015-16 के लिए 1800 करोड़ रुपये की राशि आवंटित की गई है। इस योजना के अंतर्गत कृषि-जलवायु की दशाओं और पानी की उपलब्धता के आधार पर जिला और राज्य स्तरीय योजनाएं बनाई जाएंगी। इसके अंतर्गत हर खेत तक सिंचाई जल पहुंचाने के लिए योजनाएं बनाने एवं उनके कार्यान्वयन की प्रक्रिया में राज्यों को अधिक स्वायत्ता तथा धन के इस्तेमाल की सुविधा दी गई है। इस योजना में केंद्र 75 प्रतिशत अनुदान देगा और 25 प्रतिशत खर्च राज्यों द्वारा वहन किया जाएगा। पूर्वोत्तर क्षेत्र और पर्वतीय राज्यों में केंद्र का अनुदान 90 प्रतिशत तक होगा।
राष्ट्रीय स्तर पर पीएमकेएसवाई योजना की निगरानी प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में सभी संबंधित मंत्रालयों के मंत्रियों के साथ एक अंतर मंत्रालयी राष्ट्रीय संचालन समिति द्वारा की जाएगी। कार्यक्रम के कार्यान्वयन संसाधनों के आवंटन, अंतर मंत्रालयी समन्वय, निगरानी और प्रदर्शन के आकलन के लिए नीति आयोग के उपाध्यक्ष की अध्यक्षता में एक राष्ट्रीय कार्यकारी समिति गठित की जाएगी। राज्य के स्तर पर योजना का कार्यान्वयन संबंधित राज्य के मुख्य सचिव की अध्यक्षता में राज्य स्तरीय स्वीकृति देने वाली समिति द्वारा किया जाएगा। इस समिति के पास परियोजना को स्वीकति देने और योजना की प्रगति की निगरानी करने का पूरा अधिकार होगा। कार्यक्रम को और बेहतर ढंग से लागू करने के लिए जिला स्तर पर जिला स्तरीय समिति भी होगी। इस योजना के अंतर्गत उन कार्यकर्मों को प्रोत्साहित करने पर बल दिया जाता है, जिनसे किसानों को लाभ होता है। किसान अपनी सुविधानुसार बेहतर सिंचाई जल योजना अपना सकते हैं। वे ड्रिप, स्प्रिकलर सिंचाई योजनाओं आदि उपयोग कर सकते हैं। किसानों को इन तकनीकों की जानकारी अपने जिले के कृषि/बागवानी अधिकारी से प्राप्त हो सकती हैं। इसके अतिरिक्त किसान टोल फ्री किसान कॉल सेंटर 1800-180-1551 से भी जानकारी ले सकते हैं। कृषि समन्वय एवं किसान कल्याण विभाग को वर्ष 2016-17 में सूक्ष्म सिंचाई के लिए 2340 करोड़ रुपये का आवंटन किया गया हैं, जो वर्ष 2015-16 के 1550 करोड़ रुपये के बजट से 51 प्रतिशत अधिक हैं।
इस योजना के अंतर्गत “हर खेत को पानी” यानि प्रत्येक किसान के खेत मे सिंचाई की सुविधा और फसल की ‘जल उपयोग दक्षता’ को बढाने पर ज़ोर दिया जा रहा है। सरकार जल संरक्षण और क्षेत्रीय स्तर पर सिंचाई के क्षेत्र में निवेश को बढ़ावा देने तथा इसके प्रबंधन के लिए प्रतिबद्ध है। सुनिश्चित सिंचाई के तहत कृषि योग्य क्षेत्र का विस्तार, खेत में पानी के संरक्षण के लिए इसकी उपयोग दक्षता में सुधार, परिशुद्ध सिंचाई तथा पानी के बचत के लिए नवीन प्रौद्योगिकियों को बढ़ावा देना, जलवाही स्तर के पुनर्भरण बढ़ाने, अर्धशहरी कृषि के लिए नगरपालिका के अपशिष्ट जल के पुन: उपयोग की व्यवहार्यता की खोज तथा टिकाऊ और स्थाई जल संरक्षण के उपायों को लागू करने पर बल दिया जा रहा है, जिससे सिंचाई परियोजनाओं मे निजी निवेश भी अधिक से अधिक आकर्षित हो रहे है।
उल्लेखनीय है कि भारत में विश्व की आबादी की 17 प्रतिशत जनसंख्या तथा 11.3 प्रतिशत पशुधन निवास करते हैं, जबकि देश में विश्व का मात्र 4 प्रतिशत जल संसाधन उपलब्ध है। ऐसे में देश के समक्ष इतनी बड़ी मानव आबादी तथा पशुधन को पानी की आपूर्ति करने की अभूतपूर्व चुनौती है। ऐसे में समुचित जल प्रबंधन करके ही इस चुनौती का सामना किया जा सकता है। सरकार द्वारा समय-समय पर जल संरक्षण से संबंधित कार्यकर्मों का भी आयोजन कराया जाता है, ताकि लोगों में जल संरक्षण और जल प्रबंधन के प्रति जागरुकता पैदा की जा सके। निसंदेह, बेहतर जल प्रबंधन से ही जल संकट से उबरा जा सकता है और संरक्षण भी किया जा सकता है।
(डॉ सौरभ मालवीय की पुस्तक- 'विकास के पथ पर भारत' से)


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