लोकतंत्र में सवाल उठाना, सरकार से जवाब मांगना और अपनी बात रखना हर नागरिक का अधिकार है। लेकिन विद्यालय जैसे पवित्र शैक्षणिक परिसर को राजनीतिक गतिविधियों का अखाड़ा बनाना उचित नहीं कहा जा सकता।
राजस्थान के विद्यालयों में निरीक्षण और आंदोलन के लिए राजनीतिक कार्यकर्ताओं के दल-बल के साथ पहुंचने की घटना इसी गंभीर प्रश्न को सामने लाती है। यदि ग्रामीणों ने उन्हें विद्यालय परिसर से बाहर किया, तो यह भी इस बात का संकेत है कि समाज अपने बच्चों की शिक्षा को राजनीतिक हस्तक्षेप से मुक्त रखना चाहता है।
राजनीति के अपने मंच हैं, आंदोलन के अपने स्थान हैं, विद्यालय बच्चों के भविष्य निर्माण का केंद्र हैं।
छात्रों के कंधे पर राजनीति करना निंदनीय है, बल्कि यह शिक्षा के मूल उद्देश्य के साथ भी अन्याय है। बच्चों को राजनीतिक संघर्ष का माध्यम बनाने के बजाय उनके हाथों में पुस्तक, ज्ञान और संस्कार दिए जाने चाहिए।
लोकतंत्र में असहमति का सम्मान हो, प्रश्न पूछे जाएं, सरकार की जवाबदेही तय हो,लेकिन विद्यालय की गरिमा और विद्यार्थियों के भविष्य की कीमत पर नहीं।
राजस्थान के विद्यालयों में निरीक्षण और आंदोलन के लिए राजनीतिक कार्यकर्ताओं के दल-बल के साथ पहुंचने की घटना इसी गंभीर प्रश्न को सामने लाती है। यदि ग्रामीणों ने उन्हें विद्यालय परिसर से बाहर किया, तो यह भी इस बात का संकेत है कि समाज अपने बच्चों की शिक्षा को राजनीतिक हस्तक्षेप से मुक्त रखना चाहता है।
राजनीति के अपने मंच हैं, आंदोलन के अपने स्थान हैं, विद्यालय बच्चों के भविष्य निर्माण का केंद्र हैं।
छात्रों के कंधे पर राजनीति करना निंदनीय है, बल्कि यह शिक्षा के मूल उद्देश्य के साथ भी अन्याय है। बच्चों को राजनीतिक संघर्ष का माध्यम बनाने के बजाय उनके हाथों में पुस्तक, ज्ञान और संस्कार दिए जाने चाहिए।
लोकतंत्र में असहमति का सम्मान हो, प्रश्न पूछे जाएं, सरकार की जवाबदेही तय हो,लेकिन विद्यालय की गरिमा और विद्यार्थियों के भविष्य की कीमत पर नहीं।



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