Wednesday, December 11, 2013

राष्ट्र की अस्मिता का गीत


सौरभ मालवीय
जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी अर्थात जननी और जन्मभूमि स्वर्ग से भी बढ़कर है. फिर अपनी मातृभूमि से प्रेम क्यों नहीं ? अपनी मातृभूमि की अस्मिता से संबद्ध प्रतीक चिन्हों से घृणा क्यों? प्रश्न अनेक हैं, परंतु उत्तर कोई नहीं. प्रश्न है राष्ट्रगीत वंदे मातरम का. क्यों कुछ लोग इसका इतना विरोध करते हैं कि वे यह भी भूल जाते हैं कि वे जिस भूमि पर रहते हैं, जिस राष्ट्र में निवास करते हैं, यह उसी राष्ट्र का गीत है, उस राष्ट्र की महिमा का गीत है?

वंदे मातरम को लेकर प्रारंभ से ही विवाद होते रहे हैं, परंतु इसकी लोकप्रियता में दिन-प्रतिदिन वृद्धि होती चली गई.  2003 में बीबीसी वर्ल्ड सर्विस द्वारा आयोजित एक अंतर्राष्ट्रीय सर्वेक्षण के अनुसार वंदे मातरम विश्व का दूसरा सर्वाधिक लोकप्रिय गीत है. इस सर्वेक्षण विश्व के लगभग सात हज़ार गीतों को चुना गया था. बीबीसी के अनुसार 155 देशों और द्वीप के लोगों ने इसमें मतदान किया था.  उल्लेखनीय है कि विगत दिनों कर्नाटक विधानसभा के इतिहास में पहली बार शीतकालीन सत्र की कार्यवाही राष्ट्रगीत वंदे मातरम के साथ शुरू हुई. अधिकारियों के अनुसार कई विधानसभा सदस्यों के सुझावों के बाद यह निर्णय लिया गया था. विधानसभा अध्यक्ष कागोदू थिमप्पा ने कहा था कि लोकसभा और राज्यसभा में वंदे मातरम गाया जाता है और सदस्य बसवराज रायारेड्डी ने इस मुद्दे पर एक प्रस्ताव दिया था, जिसे आम-सहमति से स्वीकार कर लिया गया.

वंदे मातरम भारत का राष्ट्रीय गीत है. वंदे मातरम बहुत लंबी रचना है, जिसमें मां दुर्गा की शक्ति की महिमा का वर्णन किया गया है. भारत में पहले अंतरे के साथ इसे सरकारी गीत के रूप में मान्यता मिली है. इसे राष्ट्रीय गीत का दर्जा कर इसकी धुन और गीत की अवधि तक संविधान सभा द्वारा तय की गई है, जो 52 सेकेंड है. उल्लेखनीय है कि 1870 के दौरान ब्रिटिश शासन ने 'गॉड सेव द क्वीन' गीत गाया जाना अनिवार्य कर दिया था. बंकिमचंद्र चटर्जी को इससे बहुत दुख पहुंचा. उस समय वह एक सरकारी अधिकारी थे. उन्होंने इसके विकल्प के तौर पर 7 नवंबर, 1876 को बंगाल के कांतल पाडा नामक गांव में वंदे मातरम की रचना की. गीत के प्रथम दो पद संस्कृत में तथा शेष पद बांग्ला में हैं. राष्ट्रकवि रबींद्रनाथ ठाकुर ने इस गीत को स्वरबद्ध किया और पहली बार 1896 में कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में यह गीत गाया गया. 1880 के दशक के मध्य में गीत को नया आयाम मिलना शुरू हो गया. वास्तव में बंकिमचंद्र ने 1881 में अपने उपन्यास 'आनंदमठ' में इस गीत को सम्मिलित कर लिया. उसके बाद कहानी की मांग को देखते हुए उन्होंने इस गीत को और लंबा किया, अर्थात बाद में जोड़े गए भाग में ही दशप्रहरणधारिणी, कमला और वाणी के उद्धरण दिए गए हैं. बाद में इस गीत को लेकर विवाद पैदा हो गया.



वंदे मातरम स्वतंत्रता संग्राम में लोगों के लिए प्ररेणा का स्रोत था. इसके बावजूद इसे राष्ट्रगान के रूप में नहीं चुना गया. वंदे मातरम के स्थान पर वर्ष 1911 में इंग्लैंड से भारत आए जॊर्ज पंचम के सम्मान में रबींद्रनाथ ठाकुर द्वारा लिखे और गाये गए गीत जन गण मन को वरीयता दी गई. इसका सबसे बड़ा कारण यही था कि कुछ मुसलमानों को वंदे मातरम गाने पर आपत्ति थी. उनका कहना था कि वंदे मातरम में मूर्ति पूजा का उल्लेख है, इसलिए इसे गाना उनके धर्म के विरुद्ध है. इसके अतिरिक्त यह गीत जिस आनंद मठ से लिया गया है, वह मुसलमानों के विरुद्ध लिखा गया है. इसमें मुसलमानों को विदेशी और देशद्रोही बताया गया है.  1923 में कांग्रेस अधिवेशन में वंदे मातरम के विरोध में स्वर उठे. कुछ मुसलमानों की आपत्तियों को ध्यान में रखते हुए कांग्रेस ने इस पर विचार-विमर्श किया. पंडित जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में समिति गठित की गई है, जिसमें मौलाना अबुल कलाम आज़ाद, सुभाष चंद्र बोस और आचार्य नरेन्द्र देव भी शामिल थे. समिति का मानना था कि इस गीत के प्रथम दो पदों में मातृभूमि की प्रशंसा की गई है, जबकि बाद के पदों में हिन्दू देवी-देवताओं का उल्लेख किया गया है. समिति ने 28 अक्टूबर, 1937 को कलकत्ता अधिवेशन में पेश अपनी रिपोर्ट में कहा कि इस गीत के प्रारंभिक दो पदों को ही राष्ट्र-गीत के रूप में प्रयुक्त किया जाएगा. इस समिति का मार्गदर्शन रबींद्रनाथ ठाकुर ने किया था. मोहम्मद अल्लामा इक़बाल के क़ौमी तराने ’सारे जहां से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा’ के साथ बंकिमचंद्र चटर्जी द्वारा रचित प्रारंभिक दो पदों का गीत वंदे मातरम राष्ट्रगीत स्वीकृत हुआ. 14 अगस्त, 1947 की रात्रि में संविधान सभा की पहली बैठक का प्रारंभ वंदे मातरम के साथ हुआ. फिर 15 अगस्त, 1947 को प्रातः 6:30 बजे आकाशवाणी से पंडित ओंकारनाथ ठाकुर का राग-देश में निबद्ध वंदे मातरम के गायन का सजीव प्रसारण हुआ था. डॊ. राजेंद्र प्रसाद ने संविधान सभा में 24 जनवरी, 1950 को  वंदे मातरम को राष्ट्रगीत के रूप में अपनाने संबंधी वक्तव्य पढ़ा, जिसे स्वीकार कर लिया गया.  वंदे मातरम को राष्ट्रगान के समकक्ष मान्यता मिल जाने पर अनेक महत्त्वपूर्ण राष्ट्रीय अवसरों पर यह  गीत गाया जाता है. आज भी आकाशवाणी के सभी केंद्रों का प्रसारण वंदे मातरम से ही होता है. वर्ष 1882 में प्रकाशित इस गीत को सर्वप्रथम 7 सितंबर, 1905 के कांग्रेस अधिवेशन में राष्ट्रगीत का दर्जा दिया गया था. इसलिए वर्ष 2005 में इसके सौ वर्ष पूरे होने पर साल भर समारोह का आयोजन किया गया. 7 सितंबर, 2006 को इस समारोह के समापन के अवसर पर मानव संसाधन मंत्रालय ने इस गीत को स्कूलों में गाये जाने पर विशेष बल दिया था.  इसके बाद देशभर में वंदे मातरम का विरोध प्रारंभ हो गया. परिणामस्वरूप तत्कालीन मानव संसाधन विकास मंत्री अर्जुन सिंह को संसद में यह वक्तव्य देना पड़ा कि वंदे मातरम गाना अनिवार्य नहीं है. यह व्यक्ति की स्वेच्छा पर निर्भर करता है कि वह वंदे मातरम गाये अथवा न गाये. इस तरह कुछ दिन के लिए यह मामला थमा अवश्य, परंतु वंदे मातरम के गायन को लेकर उठा विवाद अब तक समाप्त नहीं हुआ है. जब भी वंदे मातरम के गायन की बात आती है, तभी इसके विरोध में स्वर सुनाई देने लगते हैं. इस गीत के पहले दो पदों में कोई भी मुस्लिम विरोधी बात नहीं है और न ही किसी देवी या दुर्गा की आराधना है. इसके बाद भी कुछ मुसलमानों का कहना है कि इस गीत में दुर्गा की वंदना की गई है, जबकि इस्लाम में किसी व्यक्ति या वस्तु की पूजा करने की मनाही है. इसके अतिरिक्त यह गीत ऐसे उपन्यास से लिया गया है, जो मुस्लिम विरोधी है. गीत के पहले दो पदों में मातृभूमि की सुंदरता का वर्णन किया गया है. इसके बाद के दो पदों में मां दुर्गा की अराधना है, लेकिन इसे कोई महत्व नहीं दिया गया है. ऐसा भी नहीं है कि भारत के सभी मुसलमानों को वंदे मातरम के गायन पर आपत्ति है या सब हिन्दू इसे गाने पर विशेष बल देते हैं. कुछ वर्ष पूर्व विख्यात संगीतकार एआर रहमान ने वंदे मातरम को लेकर एक संगीत एलबम तैयार किया था, जो बहुत लोकप्रिय हुआ. उल्लेखनीय बात यह भी है कि ईसाई समुदाय के लोग भी मूर्ति-पूजा नहीं करते, इसके बावजूद उन्होंने कभी वंदे मातरम के गायन का विरोध नहीं किया.  वरिष्ठ साहित्यकार मदनलाल वर्मा क्रांत ने वंदे मातरम का हिन्दी में अनुवाद किया था. अरबिंदो घोष ने इस गीत का अंग्रेज़ी में और आरिफ़ मोहम्मद ख़ान ने उर्दू में अनुवाद किया. उर्दू में ’वंदे मातरम’ का अर्थ है ’मां तुझे सलाम’. ऐसे में किसी को भी अपनी मां को सलाम करने में आपत्ति नहीं होनी चाहिए. शाइरा, लेखिका और पत्रकार फ़िरदौस ख़ान ने पंजाबी में वंदे मातरम का अनुवाद किया है. आशा है कि आगे भी देश-विदेश की अन्य भाषाओं में इसका अनुवाद होगा.

मीडिया सम्मान से सम्मानित होंगे डॉ. सौरभ मालवीय


आगामी 21 दिसंबर 2013 को उत्तर प्रदेश के देवरिया जिला पंचायत सभागार में नया मीडिया एवं ग्रामीण पत्रकारिता विषयक संगोष्ठी का आयोजन नया मीडिया मंच द्वारा किया जा रहा है. उक्त कार्यक्रम में नया मीडिया के विस्तार एवं ग्रामीण अंचलों में इसकी जरुरत पर तमाम राष्ट्रीय स्तर के पत्रकारों का वक्तव्य होना है. उक्त आयोजन में दिल्ली से वरिष्ठ पत्रकार एवं पूर्वं संपादक श्री शंभूनाथ शुक्ल माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय के इलेक्ट्रोनिक मीडिया विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ श्रीकांत सिंह संपादक श्री पंकज चतुर्वेदी वरिष्ठ स्तंभकार एवं टीवी पत्रकार श्री उमेश चतुर्वेदी सहित संपादक श्री पंकज झा श्री यशवंत सिंह श्रीमती अलका सिंह (रेडियो पत्रकार) श्री संजीव सिन्हा आदि वक्ता उपस्थित रहेंगे. कार्यक्रम में बतौर मुख्य अतिथि जिलाधिकारी देवरिया एवं आईपीएस श्री अमिताभ ठाकुर उपस्थित होंगे. कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रख्यात साहित्यकार आचार्य रामदेव शुक्ल करेंगे. उक्त कार्यक्रम के माध्यम से नया मीडिया एवं ग्रामीण पत्रकारिता की तमाम संभावनाओं को टटोलने का प्रयास किया जाएगा. कार्यक्रम के दौरान ही पत्रकारिता एवं अध्यापन के क्षेत्र में नया मीडिया पर अपने उल्लेखनीय उपस्थिति के लिए देवरिया की माटी से आने वाले पाँच गणमान्यों को “मोती बी.ए नया मीडिया सम्मान“ से सम्मानित किया जाएगा. इसी क्रम में देवरिया के डॉ सौरभ मालवीय की नया मीडिया पर सशक्त उपस्थिति को देखते हुए कार्यक्रम के सह-संयोजक शिवानन्द द्विवेदी सहर ने उक्त पुरस्कार की सूचना दी

Wednesday, August 14, 2013

भारतीय संस्कृति


डॉ. सौरभ मालवीय
संस्कृति का उद्देश्य मानव जीवन को सुन्दर बनाना है। मानव की जीवन पद्धति और धर्माधिष्ठित उस जीवन पद्धति का विकास भी उस संस्कृति शब्द से प्रकट होने वाला अर्थ है। इस अर्थ में राष्ट्र उसकी संतति रूप समाज, उस समाज का धर्म इतिहास एवं परम्परा आदि सभी बातों का आधार संस्कृति है। सम्पर्क सूत्र दृष्टि से देखा जाए तो इस संस्कृति का मूल वेदों में है। भाषा की उच्चता से समृद्ध, विचारों से परिपक्व, मानवीय मूल्यों का संरक्षक, समाज रचना एवं जीवन पद्धति का समुचित मार्गदर्शन कराने वाला यह वैदिक वाङ्मय गुरु शिष्य परम्परा की असाधारण प्रणाली से उसके मूल स्वरूप में आज तक यथावत् चला आ रहा है। ऐतिहासिक रूप में संसार के सभी विद्वान इस बात पर एकमत हैं कि वेद ही इस धरती की प्राचीनतम पुस्तक है और वे वेद जिस संस्कृति के मूल हैं वह संस्कृति भी इस पृथ्वी पर सर्वप्रथम ही उदित हुई। उसका निश्चित काल बताना सम्भव ही नहीं हो रहा है। लाख प्रयत्नों के बावजूद विद्वान इसे ईसा पूर्व 6000 वर्ष के इधर नहीं खींच पा रहे हैं।
भारतीय ऋषियों ने लोकमंगल की कामना से द्रवित होकर मानवीय गुणों को दैवीय उच्चता से विभूषित करने के लिए संस्कारों की अत्यन्त वैज्ञानिक एवं सार्वकालिक सार्वभौमिक व्यवस्था दी है। ऐसा नहीं है कि यह केवल भारतीयों के लिये ही उचित है अपितु किसी भी भू-भाग के मानवीय गुणों के उत्थान हेतु ये संस्कार समीचीन है। इसमें किसी भी प्रकार का बन्धन जातीय, वर्णीय, आर्थिक, सामाजिक देशकालीय लागू नहीं होता।
उत्तम से उत्तम कोटि का हीरा खान से निकलता है। उस समय वह मिट्टी आदि अनेक दोषों से दूषित रहता है। पहले इसे सारे दोषों से मुक्त किया जाता है। फिर तराशा जाता है, तराशने के बाद कटिंग की जाती है। यह क्रिया गुणाधान संस्कार है। तब वह हार पहनने लायक होता है। जैसे-जैसे उसका गुणाधान-संस्कार बढत़ा चला जाता है, वैसे ही मूल्य भी बढत़ा चला जाता है। संस्कारों द्वारा ही उसकी कीमत बढी़। संस्कार के बिना कीमत कुछ भी नहीं। इसी प्रकार संस्कारों से विभूषित होने पर ही व्यक्ति का मूल्य और सम्मान बढत़ा है। इसीलिये हमारे यहां संस्कार का महात्म्य है।
संस्कार और संस्कृति में जरा-सा भी भेद नहीं है। भेद केवल प्रत्यय का है। इसीलिए संस्कार और संस्कृति दोनों शब्दों का अर्थ है-धर्म। धर्म का पालन करने से ही मनुष्य, मनुष्य है, अन्यथा खाना, पीना, सोना, रोना, धोना, डरना, मरना, संतान पैदा करना ये सभी काम पशु भी करते हैं। पशु और मनुष्य में भेद यह है कि मनुष्य उक्त सभी कार्य संस्कार के रूप में करता है। गाय, भैंस, घोड़ा, बछडा़ आदि जैसा खेत में अनाज खड़ा रहता है वैसा ही खा जाते हैं। लेकिन कोई मनुष्य खडे़े अनाज को खेतों में खाने को तैयार नहीं होता। खायेगा तो लोग कहेंगे पशुस्वरूप है। इसीलिए संस्कार, संस्कृति और धर्म के द्वारा मानव में मानवता आती है। बिना संस्कृति और संस्कार के मानव में मानवता नहीं आ सकती।
हमारे यहां प्रत्येक कर्म का संस्कृति के साथ सम्बन्ध है। जन्म से लेकर मृत्युपर्यन्त और प्रातःकाल शैया त्यागकर पुनः शैया ग्रहणपर्यन्त हम जितने कार्य करें, वे सभी वैसे हो, जिससे हमारे जीवन का विकास ही नहीं हो बल्कि वे अलंकृत, सुशोभित और विभूषित भी करें। ऐसे कर्म कौन से हैं, उनका ज्ञान मनुष्य को अपनी बुद्धि से नहीं हो सकता सामान्यतया बुद्धिमान व्यक्ति सोचता है कि वह वही कार्य करेगा जिससे उसे लाभ हो। लेकिन मनुष्य अपनी बुद्धि से अपने लाभ और हानि का ज्ञान कर ही नहीं सकता। अन्यथा कोई मनुष्य निर्धन और दुखी नहीं होता। अपने प्रयत्नों से ही उसे हानि भी उठानी पडत़ी है। इसलिये कहा जाता है कि हमने अपने हाथों से अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार ली। अतः मनुष्य को कर्तव्य-अकर्तव्य का ज्ञान शास्त्रों द्वारा हो सकता है। शास्त्रों द्वारा बताये गये अपने-अपने अधिकारानुसार कर्तव्य कर्म और निषिद्ध कर्म को जानकर आचरण करना ही संस्कृति है।
जैसे संस्कार और संस्कृति में कोई अन्तर नहीं होता है केवल प्रत्यय भेद है वैसे ही संस्कृति और सभ्यता भी समान अर्थों में प्रयोग होती है। धर्म और संस्कृति भी एक ही अर्थ में प्रयोग होता है लेकिन अन्त में एक सूक्ष्म भेद हो जाता है जिसको मोटे तौर पर कह सकते हैं कि धर्म केवल शस्त्रेयीकसमधिगम्य है, अर्थात् शास्त्र के आदेशानुरूप कृत्य धर्म है जब कि संस्कार में शास्त्र से अविरुद्ध लौकिक कर्म भी परिगणित होता है।
अनादि सृष्टि परम्परा के रक्षण हेतु परब्रह्म परमात्मा ने अखिल धर्म मूल वेदों को प्रदान किया। हमारी मान्यता है कि वेद औपौरुषेय है उसे ही श्रुति कहा जाता है। उन्हीं श्रुतियों पर आधारित है धर्म शास्त्र जिसे स्मृति कहते हैं। शृंगेरी शारदा पीठ के प्रमुख जगत गुरु शंकराचार्य स्वामी श्री भारती तीर्थ जी महाराज के अनुसार-
श्रुति स्मृति पुराणादि के आलय सर्वज्ञ भगवत्पाद श्री जगत गुरु श्री शंकराचार्य जी ने श्रीमदभागवतगीता के शाकर भाष्य के प्रारम्भ में ही यह स्पष्ट कर दिया है कि परमपिता परमात्मा ने जगत की सृष्टि कर उसकी स्थिति के लिए मरीच आदि की सृष्टिकर प्रवृति लक्षण धर्म का प्रबोध किया और सनक सनन्दनादि को उत्पन्न कर के ज्ञान वैराग्य प्रधान निवृति लक्षण धर्म का मार्ग प्रशस्त किया। ये ही दो वैदिक धर्म मार्ग है।
स भगवान सृष्टा इदं जगत् तस्य च स्थितिं चिकीर्षुः मरीच्यादीन् अग्रे सृष्टा प्रजापतीन् प्रवृति -लक्षणं धर्म ग्राध्यामास वेदोक्तम्। ततः अन्यान् च सनकसनन्दनादीन् उत्पाद्य निवृति -लक्षणं धर्म ज्ञान वैराग्यलक्षणं ग्राध्यामान। द्विविधो हि वेदोक्तो धर्मः प्रवृति लक्षणो निवृति लक्षणच्य। जगतः स्थिति कारणम्।।
(जगत गुरु आदि शंकराचार्य, श्रीमदभागवतगीता के शाकर भाष्य में)
इस प्रकार धर्म सम्राट श्री करपात्री जी के अनुसार-
युद्ध भोजनादि में लौकिकता-अलौकिकता दोनों ही है। जितना अंश लोक प्रसिद्ध है उतना लौकिक है और जितना शास्त्रेयीकसमधिगम्य है उतना अलौकिक है। लौकिक अंश धर्म है एवं धर्माविरुद्ध लौकिक अंश धम्र्य है। संस्कृति में दोनों का अन्तरभाव है। अनादि अपौरुषेय ग्रन्थ वेद एवं वेदानुसारी आर्ष धर्म ग्रन्थों के अनुकूल लौकिक पारलौकिक अभ्युदय एवं निश्श्रेयशोपयोगी व्यापार ही मुख्य संस्कृति है और वही हिन्दू संस्कृति वैदिक संस्कृति अथवा भारतीय संस्कृति है। सनातन परमात्मा ने अपने अंशभूत जीवात्माओं को सनातन अभ्युदय एवं निःश्रेयश परम् पद प्राप्त करने के लिए जिस सनातन मार्ग का निर्देश किया है तदनकूल संस्कृति ही सनातन वैदिक संस्कृति है और वह वैदिक सनातन हिन्दू संस्कृति ही सम्पूर्ण संस्कृतियों की जननी है।
(संस्कार संस्कृति एवं धर्म)
सनातन संस्कृति के कारण इस पावन धरा पर एक अत्यंत दिव्य विद्युत चुम्बकीय क्षेत्र निर्मित हुआ। प्राकृतिक पर्यावरण कठिन तप, ज्ञान, योग, ध्यान, सत्संग, यज्ञ, भजन, कीर्तन, कुम्भ तीर्थ, देवालय और विश्व मंगल के शुभ मानवीय कर्म एवं भावों से निर्मित इस दिव्य इलेक्ट्रो-मैगनेटिक फील्ड से अत्यंत प्रभावकारी विद्युत चुम्बकीय तरंगों का विकिरण जारी है, इसी से समग्र भू-मण्डल भारत की ओर आकर्षित होता रहा है और होता रहेगा। भारतीय संस्कृति की यही विकिरण ऊर्जा ही हमारी चिरंतन परम्परा की थाती है। भूगोल, इतिहास और राज्य व्यवस्थाओं की क्षुद्र संकीर्णताओं के इतर प्रत्येक मानव का अभ्युदय और निःश्रेयस ही भारत का अभीष्ट है। साम्राज्य भारत का साध्य नहीं वरन् साधन है। परिणामतः हिन्दू साम्राज्य किसी समाज, देश और पूजा पद्धति को त्रस्त करने में कभी उत्सुक नहीं रहे। यहां तो सृष्टि का कण-कण अपनी पूर्णता और दिव्यता के साथ खिले, इसका सतत् प्रयत्न किया जाता है। आवश्यकतानुरूप त्यागमय भोग ही अभीष्ट है तभी तो दातुन हेतु भी वृक्ष की एक टहनी तोड़ने के पूर्व हम वृक्ष की प्रार्थना करते हैं और कहते हैं कि-
आयुर्बलं यशो वर्चः प्रजा पशु वसूनिच।
ब्रह्म प्रज्ञां च मेधां च त्ंवनो देहि वनस्पति।।
(वाधूलस्मृति 35, कात्यायन स्मृति 10-4,
विश्वामित्र स्मृति 1-58, नारद पुराण 27-25,
देवी भागवत 11-2-38, पद्म पुराण 92-12)

Thursday, August 1, 2013

आशीष

माननीय प्रभात झा जी को राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनने पर हार्दिक शुभकामना

सत्याग्रह कर रहे श्याम जी को अपना समर्थन


श्री श्याम रूद्र पाठक की अदम्य जिजीविषा को नमन। ऐसे ही छोटे- छोटे गाँधी की बदौलत देश में परिवर्तन साकार हो रहा है। सर्वोच्च न्यायलय और उच्च न्यायालयों में अंग्रेजी की अनिवार्यता गुलामी की निशानी है। 161 दिन से श्रीमती सोनिया गाँधी के निवास के सामने दो साथियों के साथ सत्याग्रह कर रहे श्याम जी को अपना समर्थन देने मै कल मित्र संजीव सिन्हा और भारत भूषण के साथ सत्याग्रह स्थल पहुंचा। इस राष्ट्रीय कार्य में सबको भागीदार बनना चाहिए।

मीडिया के साथी




देश के ये सभी चर्चित चेहरे है जो दिखते भी है और लिखते भी भारतीय जनता पार्टी की कार्यकरणी बैठक गोवा से वापस दिल्ली जाते समय भोपाल स्टेशन पे मेरे सभी अजीज पत्रकार मित्र

भोज


आज दोपहर का भोजन आर्य भवन भोपाल मे आदरणीय पुष्पेंद्र सिंह जी, पत्रकारिता मे खास मुकाम बनाने वाले भाई संजय द्विवेदी जी.

एक मुलाक़ात

भारतीय जनता युवा मोर्चा के राष्‍ट्रीय अध्‍यक्ष एवं सांसद श्री अनुराग ठाकुर. उनके साथ (बाएं से) कमल संदेश संपादक मंडल सदस्‍य श्री विकाश आनंद, सहायक संपादक संजीव कुमार सिन्‍हा एवं डॉ. सौरभ मालवीय.

बैठक


‘प्रवक्ता डॉट कॉम’ के 5 वर्ष पूर्ण होने के उपलक्ष्य में 18 अक्तूबर 2013 को constitution club, नई दिल्ली में एक भव्य कार्यक्रम आयोजित करने के निमित्त आज प्रथम बैठक इंडियन कॉफी हाउस (मोहन सिंह पैलेस, कनौट प्लेस) में सायं 5 बजे से 7 बजे तक सम्पन्न हुई.

भारतीय राजनीति


श्री चंदूलाल साहू सांसद बीजेपी लोक सभा महासमुंद छत्तीसगद से मिलना हुआ. बड़े ही सरल, शालीन और विद्वान हैं. उनसे कई मुद्दों पर चर्चा हुई. यह बताते हुए हर्ष हो रहा है कि भारतीय राजनीति मे ऐसे जन नेता जनता के बीच काम कर रहे हैं.


विश्‍वविद्यालय परिवार

माखनलाल चतुर्वेदी राष्‍ट्रीय पत्रकारिता विश्‍वविद्यालय, भोपाल

Sunday, July 14, 2013

भारत की राष्ट्रीयता हिन्दुत्व है


डॉ. सौरभ मालवीय
हिन्दू शब्द का प्रयोग कब प्रारम्भ हुआ यह बताना कठिन है। परन्तु यह सत्य है कि हिन्दू शब्द अत्यंत प्राचीन वैदिक वाङ्मय के ग्रन्थों मे साक्षात् नहीं पाया जाता है। परन्तु यह भी निर्विवाद है कि हिन्दू शब्द का मूल निश्चित रूप से वेदादि प्राचीन ग्रन्थों में विद्यमान है।
भारत में हिन्दू नाम की उपासना पद्धति है ही नही यहां तो कोई वैष्णव है या शैव अथवा शक्य है कबीरपंथी है सिख है आर्यसमाजी है जैन और बौद्ध है। वैष्णवों में भी उपासना के अनेक भेद हैं. अर्थात् जितने व्यक्ति उपासना और आस्था की उतनी ही विधियां हर विधि को समाज से स्वीकारोक्ति प्राप्त है। पश्चिम के राजनीतिज्ञ व समाजशात्री  भारतीय संस्कृति और समाज के इस पक्ष को या तो समझ ही नहीं सके या उन्होने पश्चिमी अवधारणाओं के बने सांचों में ही भारत को ढ़ालने का प्रयास किया।
अनेक सज्जनों द्वारा विभिन्न प्रकार की व्याख्याओं से यह शब्द भी विवादित हो गया है। यद्यपि यह शब्द भारत का ही पर्याय है और यह जीवन पद्धति की ओर इंगित करता है। विख्यात स्तम्भकार पद्म श्री मुजफ्फर हुसैन कहते हैं कि-
‘‘भारतीयता तो भारत की नागरिकता है, भारत की राष्ट्रीयता हिन्दुत्व है।’’
ऐसा भी प्रचारित किया गया है कि हिन्दू नाम अपमानजनक   है जैसा कि भारतीय फारसी के शब्दकोशों में मिलता है। इनमें हिन्दू का अर्थ द्वेषवश, काला, चोर आदि किया गया है जो कि पूर्णतया असत्य है। अरबी व फारसी भाषा में ‘हिन्द’ का अर्थ है ‘सुन्दर’ एवं ‘भारत का रहने वाला’ आदि। हिंदू चिंतक श्री कृष्णवल्लभ पालीवाल बताते हैं कि जब 1980-82 में, मैं बगदाद में ईराक सरकार का वैज्ञानिक सलाहकार था तो मुझे वहां यह देखकर आश्चर्य हुआ कि अनेक युवक व युवतियों के नाम ‘अलहिन्द’ व ‘विनत हिन्द’ थे। तो मैंने आश्चर्यवश उनसे पूछा कि ये नाम तो हिन्दुओं जैसे लगते है जिसका अर्थ है ‘सुन्दर’ और इसी भाव में हमारे ये नाम है।
कुछ लोगों ने अपने को ‘हिन्दू’ न कहकर ‘आर्य‘ कहना ज्यादा उचित समझा है, किंतु रामकोश में सुस्पष्ट लिखा है कि-
हिन्दूर्दुष्टो न भवति नानार्याे न विदूषकः।
सद्धर्म पालको विद्वान् श्रौत धर्म परायणः।।
यानी ‘‘हिन्दू दुष्ट, दुर्जन व निन्दक नहीं होता है। वह तो सद्धर्म का पालक, सदाचारी, विद्वान, वैदिक धर्म में निष्ठावान और आर्य होता है।“ अतः हिन्दू ही आर्य है और आर्य ही हिन्दू है। समय की मांग है कि हम इस विवाद को भूलकर मिल जुलकर हिन्दू धर्म व हिन्दू संस्कृति को उन्नत करने और हिन्दू राज्य स्थापित करने प्रयास करें।
स्वामी विज्ञानानन्द ने हिन्दू नाम की उत्पति के विषय में कहा कि हमारा हिन्दू नाम हजारों वर्षों से चला आ रहा है जिसके वेदो संस्कृत व लौकिक साहित्य में व्यापक प्रमाण मिलते है। अतः हिन्दू नाम पूर्णतया वैदिक, भारतीय और गर्व करने योग्य है। वस्तुतः यह नाम हमें विदेशियों ने नहीं दिया है बल्कि उन्होंने अपने अरबी व फारसी भाषा के साहित्य में उच्च भाव में प्रयोग किया है।
शताब्दियों से सम्पूर्ण भारतीय समाज ‘‘हिन्दू“ नाम को अपने धार्मिक, सांस्कृतिक, राष्ट्रीय एवं जातिय समुदाय के सम्बोधन के लिए गर्व से प्रयोग करता रहा है। आज भारत ही नहीं, विश्व के कोने-कोने में बसे करोड़ों हिन्दू अपने को हिन्दू कहने में गर्व अनुभव करते हैं। वे जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में अपने धर्म एवं संस्कृति से प्रेरणा पाकर असीम सफलता प्राप्त कर रहे हैं। वे हिन्दू जीवन मूल्यों से स्फूर्ति पाकर समता और कर्मठता के आधार पर, भारत में ही नहीं, विदेशों में भी, अपनी श्रेष्ठता का परिचय दे रहे हैं। वे श्रेष्ठ मानवीय जीवन मूल्यों के आधार पर समाज में प्रतिष्ठित भी हो रहे है।
हिन्दू पुनर्जागरण के पुरोधा महर्षि दयानन्द सरस्वती, युवा हिन्दू सम्राट स्वामी विवेकानन्द, स्वामी श्रद्धानन्द, योगी श्री अरविंद, भाई परमानन्द, स्वातान्त्र्य वीर विनायक दामोदर सावरकर आदि महापुरुषों ने ‘हिन्दू’ नाम को गर्व के साथ स्वीकार कर आदर प्रदान किया है। स्वामी विवेकानन्द एवं स्वातन्त्र्य वीर सावरकर ने हिन्दू नाम के विरूद्ध चलाए जा रहे मिथ्या कुप्रचार का पूर्ण सामथ्र्य से विरोध किया। सावरकर जी ने प्राचीन भारतीय शास्त्रों के आधार पर इस नाम की मौलिकता को बड़ी प्रामाणिता के साथ पुनः स्थापित किया तथा बल देकर सिद्ध किया कि ‘‘हिन्दू नाम पूर्णतया भारतीय है जिसका मूल वेदों का प्रसिद्ध ‘सिन्धु’ शब्द है।’
हिन्दू शब्द का प्रयोग कब प्रारम्भ हुआ, इसकी निश्चित तिथि बताना कठिन अथवा विवादास्पद होगा। परन्तु यह सत्य है कि हिन्दू शब्द अत्यन्त प्राचीन वैदिक वाङ्मय के ग्रन्थों में साक्षात् नहीं पाया जाता है। परन्तु यह भी निर्विवाद है कि हिन्दू शब्द का मूल निश्चित रूप से वेदादि प्राचीन ग्रन्थों में विद्यमान है। औपनिषदिको काल के प्राकृत, अपभ्रंश, संस्कृत एवं मध्यकालीन साहित्य में हिन्दू शब्द पार्यप्त मात्रा में मिलता है। अनेक विद्वानों का मत है कि हिन्दू शब्द प्राचीन काल से सामान्य जनों की व्यावहारिक भाषा में प्रयुक्त होता रहा है। जब प्राकृत एवं अपभ्रंश शब्दों का प्रयोग साहित्यिक भाषा के रूप में होने लगा, उस समय सर्वत्र प्रचलित हिन्दू शब्द का प्रयोग संस्कृत ग्रन्थों में होने लगा। ब्राहिस्र्पत्य कालिका पुराण, कवि कोश, राम कोश, कोश, मेदिनी कोश, शब्द कल्पद्रुम, मेरूतन्त्र, पारिजात हरण नाटक, भविष्य पुराण, अग्निपुराण और वायु पुराणादि संस्कृत ग्रंन्थों में हिन्दू शब्द जाति अर्थ में सुस्पष्ट मिलता है।
इससे यह स्पष्ट होता है कि इन संस्कृत ग्रन्थों के रचना काल से पहले भी हिन्दू शब्द का जन समुदाय में प्रयोग होता था।
संस्कृत साहित्य में ‘हिन्दू’ शब्द
संस्कृत साहित्य में पाए गए हिन्दू शब्द प्रस्तुत है-
हिंसया दूयते यश्च सदाचरण तत्परः।
वेद… हिन्दू मुख शब्दभाक्।।
(वृद्ध स्मृति)
‘‘जो सदाचारी वैदिक मार्ग पर पर चलने वाला, हिंसा से दुःख मानने वाला है, वह हिन्दू है।“
बलिना कलिनाच्छन्ने धर्मे कवलिते कलौ।
यावनैर वनीक्रान्ता, हिन्दवो विन्ध्यमाविशन्।।
(कालिका पुराण)
‘जब बलवान कलिकाल ने सबको प्रच्च्छन्न कर दिया और धर्म उसका ग्रास बन गया तथा पृथ्वी यवनों से आक्रान्त हो गई, तब हिन्दू खिसककर विन्ध्याचल की ओर चले गए।’’
इसी प्रकार का भाव यह श्लोक भी प्रकट करता हैः
यवनैरवनी क्रान्ता, हिन्दवो विन्ध्यमाविशन्।
बलिना वेदमार्र्गाेऽयं कलिना कवलीकृतः।।
(शार्ङ्धर पद्धति)
‘यवनों के आक्रमण से हिन्दू विन्ध्याचल पर्वत की ओर चले गए।’
हिन्दूः हिन्दूश्च प्रसिद्धौ दुष्टानां च विघर्षणे।
(अ˜ुत कोश)
‘हिन्दू’ और ‘हिन्दू’ दोनों शब्द दुष्टों को विघर्षित करने वाले अर्थ में प्रसिद्ध हैं।’
‘‘हिन्दू सद्धर्म पालको विद्वान् श्रौत धर्म परायणः।
(राम कोश)
हिन्दूः हिन्दूश्च हिन्दवः।
(मेदिनी कोश)
“ हिन्दू, हिन्दू और हिन्दुत्व तीनों एकार्थक है।’
हिन्दू धर्म प्रलोप्तारौ जायन्ते चक्रवर्तिनः।
हीनश्च दूषयप्येव स हिन्दूरित्युच्यते प्रिये।।
(मेरु तन्त्र)
‘‘हे प्रिये! हिन्दू धर्म को प्रलुप्त करने वाले चक्रवर्ती राजा उत्पन्न हो रहे हैं। जो हीन कर्म व हीनता का त्याग करता है, वह हिन्दू कहा जाता है।’’
हिनस्ति तपसा पापान् दैहिकान् दुष्टमानसान्।
हेतिभिः शत्रुवर्गः च स हिन्दूः अभिधीयते।।
(परिजातहरण नाटक)
‘जो अपनी तपस्या से दैहिक पापों को दूषित करने वाले दोषों का नाश करता है, तथा  अपने शत्रु समुदाय का भी संहार करता है, वह हिन्दू है।’
हीनं दूषयति इति हिन्दू जाति विशेषः
(शब्द कल्पद्रुमः)
‘हीन कर्म का त्याग करने वाले को हिन्दू कहते हं।’
इन प्रमाणों से यह स्पष्ट है कि प्राचीन एवं अर्वाचीन संस्कृत साहित्य में हिन्दू शब्द का पर्याप्त उल्लेख के साथ  साथ हिन्दू के लक्षणों को भी दर्शाया गया है।


Friday, July 12, 2013

संस्कार


डॉ. सौरभ मालवीय
किसी भी समाज को चिरस्थायी प्रगत और उन्नत बनाने के लिए कोई न कोई व्यवस्था देनी ही पडती है और संसार के किसी भी मानवीय समाज में इस विषय पर भारत से ज्यादा चिंतन नहीं हुआ है। कोई भी समाज तभी महान बनता है जब उसके अवयव श्रेष्ठ हों। उन घटकों को श्रेष्ठ बनाने के लिए यह अत्यावश्यक है कि उनमें दया, करुणा, आर्जव, मार्दव, सरलता, शील, प्रतिभा, न्याय, ज्ञान, परोपकार, सहिष्णुता, प्रीति, रचनाधर्मिता, सहकार, प्रकृति प्रेम, राष्ट्रप्रेम एवं अपने महापुरुषों आदि तत्वों के प्रति अगाध श्रद्धा हो। मनुष्य में इन्हीं सारे सद्गुणों के आधार पर जो समाज बनता है वह चिरस्थायी होता है। यह एक महत्वपूर्ण चिन्तनीय विषय हजारों साल पहले से मानव के सम्मुख था कि आखिर किस विधि से सारे उत्तम गुणों का आह्वान एक-एक व्यक्ति में किया जाए कि यह समाज राष्ट्र और विश्व महान बन सके। भारतीय ऋषियों ने इस पर गहन चिन्तन मनन किया। आयुर्वेद के वन्दनीय पुरुष आचार्य चरक कहते हैं कि-
संस्कारोहि गुणान्तरा धानमुच्चते

अर्थात् यह असर अलग है। मनुष्य के दुर्गुणों को निकाल कर उसमें सद्गुण आरोपित करने की प्रक्रिया का नाम संस्कार है। वास्तव में संस्कार मानव जीवन को परिष्कृत करने वाली एक आध्यात्मिक विधा है। संस्कारों से सम्पन्न होने वाला मानव सुसंस्कृत, चरित्रवान, सदाचारी और प्रभुपरायण हो सकता है अन्यथा कुसंस्कार जन्य चारित्रिक पतन ही मनुष्य और समाज को विनाश की ओर ले जाता है। वही संस्कार युक्त होने पर सबका लौकिक और पारलौकिक अभ्युदय सहज सिद्ध हो जाता है। संस्कार सदाचरण और शाóीय आचार के घटक होते हैं। संस्कार, सद्विचार और सदाचार के नियामक होते हैं। इन्हीं तीनों की सुसम्पन्नता से मानव जीवन को अभिष्ट लक्ष्य की प्राप्ति होती है। भारतीय संस्कृति में संस्कारों का महत्व सर्वाेपरि माना गया है, इसी कारण गर्भाधान से मृत्यु पर्यन्त मनुष्य पर सांस्कारिक प्रयोग चलते ही रहते हैं। इसलिए भारतीय संस्कृति सदाचार से अनुप्रमाणित रही है। प्राकृतिक पदार्थ भी जब बिना सुसंस्कृत किए प्रयोग के योग्य नहीं बन पाते हैं तो मानव के लिए संस्कार कितना आवश्यक है यह समझ लेना चाहिए। जब तक मानव बीज रूप में है तभी से उसके दोषों का अहरण नहीं कर लिया जाता तब तक वह व्यक्ति आर्षेय नहीं बन पाता है और वह मानव जीवन से राष्ट्रीय जीवन में कहीं भी हव्य कव्य देने का अधिकारी भी नहीं बन पाता। मानव जीवन को पवित्र चमत्कारपूर्ण एवं उत्कृष्ट बनाने के लिए संस्कार अत्यावश्यक है। गहरे अर्थों में संस्कार धर्म और नीति समवेत हो जाती है। इसीलिए संस्कार की ठीक-ठाक परिभाषा कर पाना सम्भव ही नहीं है। संस्कार शब्दातीत हो जाते हैं क्योंकि वहां व्यक्ति क्रिया और परिणाम में केवल परिणाम ही बच जाता है। व्यक्ति के अहंकारों का क्रिया में लोप हो जाता है। एक तरह से व्यक्ति मिट ही जाता है तो जब व्यक्ति मिट ही जाता है तो परिभाषा कौन करेगा अब वह व्यक्ति समष्टि बन जाता है। वह निज के सुख-दुख हानि लाभ जीवन मरण, यश अपयश के बारे में काम चलाऊ से ज्यादा विचार ही नहीं करता। उसका तो आनन्द परहित परोपकार और समाज एवं सृष्टि को संवारने में ही निहित हो जाता है और संस्कारों की उपर्युक्त क्रिया ही चरित्र, सदाचार, शील, संयम, नियम, ईश्वर प्रणिधान स्वाध्याय, तप, तितिक्षा, उपरति इत्यादि के रूप में फलित होते हैं।
संस्कारों से अनुप्राणित व्यक्ति की सत्य की खोज एक सनातन यात्रा बन जाती है। और वह प्राप्त सत्य केवल एक भीतरी आनन्द देता है जिसकी ऊर्जा से आपलावित होकर व्यक्ति समाज और मानवता के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर कर देता है। उस सत्य की व्याख्या नहीं की जा सकती। उसे केवल अनुभव किया जा सकता है क्योंकि वो शब्द छोटे पड़ जाते और जो अनुभूति है वो इतनी विराट है कि अनादि, अनन्त। इस अनन्त को सात मानव शब्दों में कैसे पकड स़कता है, वहां तो हर कुछ अद्वैत हो जाता है। ‘नारद भक्ति सूत्र’ में आता है कि सत्य एक है वह अद्वैत है। साधारण ढंग से देखने पर दर्शक, दृश्य और द्रष्टा या ज्ञाता ज्ञेय और ज्ञान तीन दिखाई देते हैं। थोड़ी और गहराई में दो ही बच जाते हैं, लेकिन सच तो यह है कि वह केवल अद्वैत है। वहां ज्ञाता और ज्ञेय दोनों मिट जाते हैं केवल ज्ञान बच जाता है।
तस्या ज्ञान मेव साधनमृत्यके
(नारद भक्ति सूत्र 28)
यह संस्कार वही ज्ञान है, इस त्रिभंग से मुक्त होना ही संस्कार का परिणाम है। ऊपरी तौर पर भी हिन्दू संस्कृति ने इसकी बड़ी सुन्दर व्यवस्था रखी ही है। कुम्भ मेले में अमृत रसपान हेतु लाखों-लाखों लोग लाखों वर्षों से एकत्र होते रहते हैं। वहां भी वे दृश्य गंगा और जमुना में स्नान करते हैं, लेकिन अनुभूति तो अदृश्य सरस्वती की होती है। यह सरस्वती ही ज्ञान है यही संस्कार का सुफल है यह सरस्वती दृश्यमान नहीं है। अनुभूति जन्य है इस सरस्वती को व्याख्यायित करना संभव ही नहीं है केवल कुछ लक्षणों को पकडा़ जा सकता है। यह अद्भुत प्रेम है, जिसमें प्रेमी और प्रेयसी दोनों डूब जाते हैं। केवल प्रेम बच जाता है। यह प्रेम केवल करने से समझ में आता है। शब्दों से इसका स्वाद नहीं मिल पाएगा।
प्रेमैव कार्यम् प्रेमैव कार्यम्।।
religionयही संस्कार है। यूं तो प्रत्येक समाज अपने घटकों को सुसंस्कारित करने का प्रयास करता है। उसके लिए आदर्श भी रखता है। संस्कार की परिधि इतनी व्यापक है कि उसमें श्वास प्रश्वास से लेकर प्रत्येक कर्म समाविष्ट है।
ब्राह्सस्कारसंसकृतः ऋषीणां समानतां सामान्यतां
समानलोकतां सामयोज्यतां गच्छति।
दैवेनोत्तरेण संस्कारेणानुसंस्कृतो देवानां समानतां
समानलोकतां सायोज्यतां च गच्छति
(हारित संहिता)
संस्कारों से संस्कृत व्यक्ति ऋषियों के समान पूज्य तथा ऋषि तुल्य हो जाता है। वह ऋषि लोक में निवास करता है तथा ऋषियों के समान शरीर प्राप्त करता है और पुनः अग्निष्टोमादि दैवसंस्कारों से अनुसंस्कृत होकर वह देवताओं के समान पूज्य एवं देव तुल्य हो जाता है। वह देवलोक में निवास करता है और देवताओं के समान शरीर को प्राप्त करता है।
अव्याकृत किन्तु अनुभव गम्य संस्कारों के फूल जिसके हृदय में खिले हैं और जिसकी पवित्र सुगन्ध वातावरण को मुग्धकारी बना देती है उन ऋषियों ने लोक कल्याण हेतु संस्कारों के लक्षण कहने का प्रयास किया है। यद्यपि वे अनुभोक्ता अपने आनन्द को शब्दों में परिभाषित तो नहीं कर सकते फिर भी कुछ संकेत उन्होंने उसी दिशा में दिए हैं जिससे प्राणी मात्र उसी का अनुसरण कर अपना लौकिक और पारलौकिक उन्नयन कर सके।

संस्कृतस्य हि दान्तस्य नियतस्य यतात्मनः।
प्राज्ञस्यानन्तरा सिद्धिरिहलोके परत च।।
(महाभारत)
sanskarजिसके वैदिक संस्कार विधिवत् सम्पन्न हुए हैं, जो नियमपूर्वक रहकर मन औैर इन्द्रियों पर विजय पा चुका है, उस विज्ञ पुरुष को इहलोक और परलोक में कहीं भी सिद्धि प्राप्त होते देर नहीं लगती।
अंगिरा ऋषि कहते हैं कि-
चित्रकर्म यथाडेनेकैरंगैसन्मील्यते शनैः।
ब्राह्ण्यमपि तद्वास्थात्संस्कारैर्विधिपूर्व कैः।।
जिसके प्रकार किसी चित्र में विविध रंगों के योग से धीरे-धीरे निखार लाया जाता है, उसी प्रकार विधिपूर्वक संस्कारों के सम्पादन से ब्रह्ण्यता प्राप्त होती है।
मानवीय संस्कारों के महत्वपूर्ण तत्वों की ओर इंगित करते हुए भगवान वेद व्यास कहते हैं-
न चात्मानं प्रशंसेद्वा परनिन्दां च वर्जयेत्।
वेदनिन्दां देवनिन्दां प्रयत्तेन विवर्जयेत्।।
(पुराण)
अपनी प्रशंसा न करे तथा दूसरे की निन्दा का त्याग कर दे। वेदनिन्दा और देवनिन्दा का यत्नपूर्वक त्याग करे।
संस्कारों से ही आचरण पवित्र होते हैं।
आचारः परमो धर्मः सर्वेषामिति निश्चयः
हीनाचारी पवित्रात्मा प्रेत्य चेह विनश्यति।।
सभी शाóों का यह निश्चित मत है कि आचार ही सर्वश्रेष्ठ धर्म है। आचारहीन पुरुष यदि पवित्रात्मा भी हो तो उसका परलोक और इहलोक दोनों नष्ट हो जाते हैं।
राष्ट्र कवि रामधारी सिंह दिनकर जी की एक पुस्तक की प्रस्तावना में तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने 30 सितम्बर 1955 को एक बडे़ लेखक के हवाले संस्कृति के बारे में लिखा था कि-
‘‘संसार भर में जो भी सर्वाेŸाम बातें जानी या कही गयी हैं उनसे अपने आप को परिचित कराना संस्कृति है।’’
बकौल एक अन्य लेखक श्री नेहरू जी कहते हैं-
‘‘संस्कृति शारीरिक या मानसिक शक्तियों का प्रशिक्षण, दृढी़करण या विकास अथवा उससे उत्पन्न अवस्था है।’’ यह ‘‘मन, आचार अथवा रूचियों की परिष्कृति या शुद्धि’’ है। यह सभ्यता का भीतर से प्रकाशित हो उठना है। इस अर्थ में संस्कृति कुछ ऐसी चीज का नाम हो जाता है, जो बुनियादी और अन्तर्राष्ट्रीय है। फिर, संस्कृति के कुछ राष्ट्रीय पहलू भी होते हैं। औैर इसमें संदेह नहीं कि अनेक राष्ट्रों ने अपना कुछ विशिष्ट व्यक्तित्व तथा अपने भीतर कुछ खास ढंग के मौलिक गुण विकसित कर लिये हैं।
संस्कारों के प्रयोजन पर विचार करने से यह स्पष्ट होता है कि यही एक माध्यम है जब हम परम सत्य की अनुभूति को कल्याणकारी और लोकरंजक बना सकते हैं।
उपायः सोडवताराय
(माण्डूक्यकारीका)
सत्यं शिवं सुन्दरम् में मनोयोग ही सृष्टि का प्रयोजन है और इस परम प्राप्ति का एकमेव कारण संस्कार है।

Wednesday, June 12, 2013

ताजमहल भगवान शंकर का प्राचीन मंदिर था


डॉ. सौरभ मालवीय
अनेक विचारकों ने गहन शोध के उपरान्त इस स्थापत्य को बारहवी शताब्दी के पूर्वार्ध में निर्मित भगवान शंकर का मंदिर मानते है । जिसे बुंदेलखंड के महाराजा पर्माद्रि देव ने बनवाया था। पंद्रहवी शताब्दी में जयपुर के राजा ने राजा पर्माद्रि देव के वंशजो को पराजित कर आगरा को अधिन कर लिया। और यह  विश्वविख्यात “तेजो महालय मन्दिर ‘’ के साथ साथ जयपुर के राजा का अस्थायी आवास भी हो गया, जिसे शाहजहा ने नाम मात्र का मुआवजा देकर कब्जा कर लिया और थोड़ी बहुत तरमीन के साथ उसे मजार बनवा दिया। आज भी मूलरूप से वह स्थापत्य अपनी हिन्दू गरिमा को गा रहा है । विश्व के किसी भी मुस्लिम ढ़ाचे मे मीनार भूमि पर नहीं बनायी जाती है। वह दीवारों के ऊपर ही बनायी जाती है जबकि ताजमहल के चारों कोनों पर बने मीनार मन्दिर के दीप स्तम्भ है । इस्लामी रचनावों मे किसी भी प्रकार की प्रकृतिक वस्तुवों का चित्रण वर्जित है वे वेल –बूटे तथा अल्पना मानते है । जबकि ताजमहल कमल पुष्पों ,कलश, नारियल आदि शुभ प्रतीकों से अलंकृत है । ताजमहल की अष्ठफलकीय संरचना उसके हिन्दू स्थापत्य को सिद्ध कर रही है । दुनिया भर के मजारों मे मुर्दे का सिर पश्चिम और पैर पूर्व मे होता है जबकि ताजमहल मे स्थित मुमताज़ और शाहजहा की मजार का सिर उत्तर और पैर दक्षिण मे है।  इसमे मजार की लंबाई नौ फुट से अधिक है जो समग्र विश्व के मानवीय लंबाइयो से भी ज्यादे है आखिर ऐसा क्यो ? पाठकगण स्वयं ही कल्पना कर सकते है कि जिस मुमताज़ कि मजार के रूप मे ताजमहल का निर्माण बताया जाता है वह आगरा से लगभग 1500 किलोमीटर दूर “बूरानपुर”(मध्य प्रदेश मे है ) मे अपने चौदहवे प्रसव के दौरान चिकित्सकीय अभाव मे मरी थी और वही पर उसे दफनाया गया था । आज भी बूरानपुर मे मुमताज़ कि मजार दर्शनीय है जो भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की देख रेख मे है । इस्लाम मे एक बार शव को दफनाने के बाद उखारना वर्जित है । इतिहासकारो के अनुसार मुमताज़ के मरने के एक साल बाद उसके मजार को उखार कर आगरा लाया गया और ताजमहल के पास स्थित रामबाग (जिसे अब आरामबाग कहा जाता है ) मे इग्यारह महीने रखा गया फिर उसे पुनः ताजमहल मे दफनाया गया । अब विचारणीय यह है मुमताज़ की दोनों कब्रों का अस्तित्व क्यों है ? रामबाग मे रखने के स्थान को मजार क्यों नहीं माना गया ? ताजमहल मे जो द्रष्टव्य मजार है उसके नीचे भी दो मजार है जिसपर बूंद –बूंद जल टपकता रहता है जिसे अब “वक्फ बोर्ड ” ने बंद करवा दिया । इस प्रकार 6 मजारो का अस्तित्व को क्या माना जाए ?यह सभी प्रश्न गंभीरता पूर्ण विचारणीय है । पराधीन भारत के सारे मापदंडो को विदेशी बताया गया और हमारी गुलाम मनसिक्ता के इतिहासकर भी चाटुकारिता मे गुलामी के गीत गाते रहे । श्री पुरुषोत्तम नागेश ओक नामक प्रज्ञवान इतिहासकार और विचारक है जो अपने 500 पृष्ट से भी ज्यादा वाले शोध मे इन बातों को सप्रमाण प्रस्तुत किया है । अब यह भारत के वौद्धिकक्ता को चुनौति है कि वह गुलाम मनसिक्ता से बाहर निकले और देश के 30 हजार से भी अधिक हिन्दू श्रद्धा के केन्द्रो को पुनः जागृत कर के हिन्दुत्व से जोड़ कर पुनः भारत कि गरिमा बढ़ाए । ये श्रद्धा के केंद्र मध्यकाल मे इस्लामिक वर्वर्ता के शिकार हो कर आज भी अपने उद्धारकर्ता कि खोज मे आंशू बहा रहे है ।


Saturday, March 16, 2013

भारतीय समाज, विविधता, अनेकता एवं एकात्मता


डॉ. सौरभ मालवीय
भारत का समाज अत्यंत प्रारम्भिक काल से ही अपने अपने स्थान भेद, वातावरण भेद, आशा भेद वस्त्र भेद, भोजन भेद आदि विभिन्न कारणों से बहुलवादी रहा है। यह तो लगभग वैदिक काल में भी ऐसा ही रहा है अथर्ववेद के 12वें मण्डल के प्रथम अध्याय में इस पर बड़ी विस्तृत चर्चा हुई है एक प्रश्न के उत्तर में ऋषि यह घोषणा करते हैं कि
जनं विभ्रति बहुधा, विवाचसम्, नाना धर्माणंम् पृथ्वी यथौकसम्।
सहस्र धारा द्रवीणस्यमेदूहाम, ध्रिवेन धेनुंरनप्रस्फरत्नी।।
अर्थात विभिन्न भाषा, धर्म, मत आदि जनों को परिवार के समान धारण करने वली यह हमारी मातृभूमि कामधेनु के समान धन की हजारों धारायें हमें प्रदान करें।
विभिन्नता का यह स्तर इतना गहरा रहा कि केवल मनुष्य ही नहीं अपितु प्रकृति में इसके प्रवाह में चलती रही तभी तो हमारे यहां यह लोक मान्यता बन गयी कि कोस-कोस पर बदले पानी चार कोस पर वाणी।
यहां वाणी दो अर्थों में प्रयोग होता है। वाणी एक बोली के अर्थ में और पहनावे के अर्थ पानी भी दो अर्थी प्रयोग एक सामाजिक प्रतिष्ठा के अर्थ में दूसरा जल के।
इस विविधता में वैचारिक विविधता तो और भी महत्वपूर्ण है। संसार में पढ़ाये जाने वाले छः प्रकार के दर्षन का विकास भारत में ही हुआ कपिल, कणाद, जैमिनी, गौतम, प्रभाकर, वैशेषिक आदि अनेक प्रकार की परस्पर विरोधी विचार तरणियां (शृंखला) इसी पवित्र भूमि पर पली बढ़ी और फली फूली वैदिक मान्यताओं का अद्वैत जब कर्मकाण्डो के आडम्बर से घिर गया तो साक्य मूनि गौतम अपने बौद्ध दर्शन से समाज को एक नयी दिशा देने का प्रयास किया।
उनके कुछ वर्षों बाद केरल एक विचारक और दार्शनिक जगत्गुरु शंकराचार्य ने अपने अद्वैत दर्शन के प्रबल वेग में बुद्धवाद को भी बहा दिया। और इतना ही नहीं वरन पूरे भारत में वैदिक मत की पुर्नप्रतिष्ठा कर दी। लेकिन जगत गुरु शंकर का यह अद्वैत की विभिन्न रूपों में खण्डित होता रहा। इस अद्वैत दर्शन को आचार्य रामानुज ने विशिष्ट अद्वैत के रूप में खण्डित कर दिया महावाचार्य ने द्वैत वाद के रूप में खण्डित कर दिया, वल्लभाचार्य ने द्वैत अद्वैत के रूप में खण्डित कर दिया तिम्वाकाचार्य ने द्वैतवाद के रूप में खण्डित कर दिया और अन्त में चैतन्य महाप्रभु ने अचिन्त्य भेदा भेद के रूप में खण्डित कर दिया। इस खण्डन-मण्डन और प्रतिष्ठापन की परम्परा को पूरा देश सम्मान के साथ स्वीकारता रहा। यहां तक कि हमने चार्वाक को भी दार्शनिको की श्रेणी में खड़ा कर लिया लेकिन वैदिकता के विरोध में कोई फतवा नहीं जारी किया गया।
यहां तो संसार ने अभी-अभी देखा है कि शैटनिक वरसेज के साथ क्या हुआ बलासफेमी की लेखिका डॉ. तहमीना दुरार्ती को देश छोड़ कर भागना पड़ा, तसलीमा नसरीन की पुस्तक लज्जा से उन लोगों को लज्जा भी नहीं आती और नसरीन के लिए उसकी मातृभूमि दूर हो गयी है। लेकिन भारत की विविधता हरदम आदरणीय रही है। इसी का परिणाम रहा है कि यहां 33 करोड़ देवी-देवता बने सच में इससे बड़ा लोकतांत्रिक अभियान और क्या हो सकता है हर स्थिति का इसके स्वभाव के अनुरूप उसे पूजा करने के लिए उसका एक आदर्श देवता तो होना ही चाहिए। यही तो लोकतंत्र है।
लेकिन इस विविधता में भी चिरन्तन सत्य के प्रति समर्पण सबके चित्त में सदैव बना रहा। तभी तो भारत जैसे देश में जहां छः हजार से ज्यादा बोलियां बोली जाती हैं वहां गंगा, गीता, गायत्री, गाय और गोविन्द के प्रति श्रद्धा समान रूप से बनी हुई है। केरल में पैदा होने वाला नारियल जब तक वैष्णो देवी के चरण में चढ़ नहीं जाता है तब तक पूजा अधूरी मानी जाती है। आखिर काशी के गंगाजल से रामेश्वरम् महादेव का अभिषेक करने पर ही भगवान शिव प्रसन्न होते हैं। भारत के अन्तिम छोर कन्याकुमारी अन्तद्वीप में तपस्या कर रही भगवती तृप सुंदरी का लक्ष्य उत्त में कैलाश पर विराजमान भगवान चन्द्रमौलीस्वर तो ही है।
भारत में जो भी आया, वह उसके भौगोलिक सौन्दर्य और भौतिक सम्पन्न्ता से तो अभिभूत हुआ ही, बौद्धिक दृष्टि से वह भारत का गुलाम होकर रह गया। वह भारत को क्या दे सकता था? भौतिक भारत को उसने लूटा लेकिन वैचारिक भारत के आगे उसने आत्म-समर्पण कर दिया। ह्वेन-सांग, फाह्यान, इब्न-बतूता, अल-बेरूनी, बर्नियर जैसे असंख्य प्रत्यक्षदर्शियों के विवरण इस सत्य को प्रमाणित करते हैं। जिस देश के हाथों में वेद हों, सांख्य और वैशेषिक दर्शन हो, उपनिषदें हों, त्रिपिटक हो, अर्थशास्त्र हो, अभिज्ञानशाकुंतलम् हो, रामायण और महाभारत हो, उसके आगे बाइबिल और कुरान, मेकबेथ और प्रिन्स, ओरिजिन आॅफ स्पेसीज या दास कैपिटल आदि की क्या बिसात है? दूसरे शब्दों में भारत की बौद्धिक क्षमता ने उसकी हस्ती को कायम रखा।
भारत के इस अखंड बौद्धिक आत्मविश्वास ने उसके जठरानल को अत्यंत प्रबल बना दिया। उसकी पाचन शक्ति इतनी प्रबल हो गई कि इस्लाम और ईसाइयत जैसे एकचालकानुवर्तित्ववाले मजहबों को भी भारत आकर उदारमना बनना पड़ा। भारत ने इन अभारतीय धाराओं को आत्मसात कर लिया और इन धाराओं का भी भारतीयकरण हो गया। मैं तो यहां तक कहता हूं कि इस्लाम और ईसाइयत भारत आकर उच्चतर इस्लाम और उच्चतर ईसाइयत में परिणत हो गए। धर्मध्वजाओं और धर्मग्रंथों पर आधारित इन मजहबों में कर्मफल और पुनर्जन्म का प्रावधान कहीं नहीं है लेकिन इनके भारतीय संस्करण इन बद्धमूल भारतीय धारणाओं से मुक्त नहीं हैं। भक्ति रस में डूबे भारतीयों के मुकाबले इन मजहबों के अभारतीय अनुयायी काफी फीके दिखाई पड़ते हैं। भारतीय मुसलमान और भारतीय ईसाई दुनिया के किसी भी मुसलमान और ईसाई से बेहतर क्यों दिखाई पड़ता है? इसीलिए कि वह पहले से उत्कृष्ट आध्यात्मिक और उन्नत सांस्कृतिक भूमि पर खड़ा है। यह धरोहर उसके लिए अयत्नसिद्ध है। उसे सेत-मेंत में मिली है। यही भारत का रिक्थ है।
सनातन संस्कृति के कारण इस पावन धरा पर एक अत्यंत दिव्य विद्युत चुम्बकीय क्षेत्र निर्मित हुआ। प्राकृतिक पर्यावरण कठिन तप, ज्ञान, योग, ध्यान, सत्संग, यज्ञ, भजन, कीर्तन, कुम्भ तीर्थ, देवालय और विश्व मंगल के शुभ मानवीय कर्म एवं भावों से निर्मित इस दिव्य इलेक्ट्रो-मैगनेटिक फील्ड से अत्यंत प्रभावकारी विद्युत चुम्बकीय तरंगों का विकिरण जारी है, इसी से समग्र भू-मण्डल भारत की ओर आकर्षित होता रहा है और होता रहेगा। भारतीय संस्कृति की यही विकिरण ऊर्जा ही हमारी चिरंतन परम्परा की थाती है। भूगोल, इतिहास और राज्य व्यवस्थाओं की क्षुद्र संकीर्णताओं के इतर प्रत्येक मानव का अभ्युदय और निःश्रेयस ही भारत का अभीष्ट है। साम्राज्य भारत का साध्य नहीं वरन् साधन है।यहां तो सृष्टि का कण-कण अपनी पूर्णता और दिव्यता के साथ खिले, इसका सतत् प्रयत्न किया जाता है।
विश्व सभ्यता और विचार-चिन्तन का इतिहास काफी पुराना है। लेकिन इस समूची पृथ्वी पर पहली बार भारत में ही मनुष्य की विराट रहस्यमयता पर जिज्ञासा का जन्म हुआ। सृष्टि अनन्त रहस्य वाली है ही। भारत ने दोनों चुनौतियों को निकट नजदीक से देखा। छोटा-सा मनुष्य विराट सम्भावनाआंे से युक्त है। विराट सृष्टि में अनंत सम्भावनाएं और अनंत रहस्य हैं। जितना भी जाना जाता है उससे भी ज्यादा बिना जाने रह जाता है। सो भारत के मनुष्य ने सम्पूर्ण मनुष्य के अध्ययन के लिए स्वयं (मैं) को प्रयोगशाला बनाया। भारत ने समूची सृष्टि को भी अध्ययन का विषय बनाया। यहां बुद्धि के विकास से ‘ज्ञान’ आया। हृदय के विकास से भक्ति। भक्त और ज्ञानी अन्ततः एक ही निष्कर्ष पर पहुंचे। भक्त अंत में ज्ञानी बना। भक्त को अन्ततः व्यक्ति और समष्टि का एकात्म मिला। द्वैत मिटा। अद्वैत का ज्ञान हो गया। ज्ञानी को अंत में बूंद और समुद्र के एक होने का साक्षात्कार हुआ। व्यक्ति और परमात्मा, व्यष्टि और समष्टि की एक एकात्मक प्रतीति मिली। ज्ञानी आखिरकार भक्त बना।
हजारों वर्षों से यह परम्परा रही है कि बद्रीधाम और काठमाण्डू के पशुपतिनाथ का प्रधान पुजारी केरल का होगा और रामेश्वरम् और श्रृंगेरीमठ का प्रधान पुजारी काशी का होगा यही तो विविधता में एकता का वह जीवन्त सूत्र है जो पूरे भारत को अपने में जोड़े हुए है। पाकिस्तान स्थित स्वातघाटी के हिंगलाज शक्तिपीठ के प्रति पूरे भारत में समान रूप आस्था और आदर है। तो समग्र हिमालय को पूरा भारत देवताओं की आत्मा कहता है इसी कारण हमारे ऋषियों ने पूरे भारत के पहाड़ों, नदियों और वनों को सम्मान में वेदों में गीत गाये। कैसे कोई भारतीय भूल सकता है उस सिन्धु नदी को जिसके तट पर वेदों की रचना हुई।
विविधता और अनेकता भारतीय समाज की पहचान है। विविधता के कारण ही भारत देष में बहुरूपता के दर्षन होते हैं। लेकिन यही गुण भारतीय समाज को समृ़द्ध कर एक सूत्र में बांधने का कार्य करता है। हो भी क्यों न? क्योंकि हम उस सम्पन्न परपंरा के वाहक हैं जिसमें वसुधैव कुटुम्बकम की भावना निहित है।

कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी


डॉ. सौरभ मालवीय
भगवान श्री कृष्ण ने अपने आप्तवचन श्रीमद्भगवद् गीता में साधिकार घोषणा की है कि
जातस्य हि ध्रुवो मृत्युध्र्रुवं जन्म मृतस्य च।
तस्मादपरिहार्येऽर्थे न त्वं शोचितुमर्हसि
- गीता 2.27
अर्थात् जन्म लिये हुए का मरना सुनिश्चित है। इसी क्रम में नचिकेता ने भी कठोपनिषद में ऐसा ही कहा यह बातें केवल मनुष्यों पर ही नहीं अपितु राष्ट्रों पर भी समान रूपेण प्रभावी है, राष्ट्रांे के जीवन में भी अवसानाविर्भाव आते रहते है अन्यथा पिछली शताब्दी के इस जगतीतल के श्रेष्ठतम प्रतिभा वालों में से एक प्रो. अर्नाल्डटायनवी ने अपने गहन शोधो उपरांत यह घोषणा की है कि समय-समय पर विश्व का सांस्कृतिक नेतृत्व करने वाली 49 सभ्यतायें कठिन काल के कराल गाल में समा गयी है। कई सभ्यताओं की तो अवशेष भी धराधाम पर शेष नहीं है।

सच तो ये है कि अनेक सभ्यताओं के खण्डहर भी अब केवल विलुप्त जन श्रूतियों के माध्यम से पुस्तकागारों के खण्डहर बने हुए हैं। और कई सभ्यताओं के भगना अवशेषों पर तो कई-कई बार नये-नये भगनाअवशेष बन चुके आज कहां पता है इन्का और एजेटेक सभ्यताओं के उत्स। खालडियन, सुनेरियन समेत अनेक सभ्यताएं जिस भूमि पर पली, बढ़ीं अब उस भूमि पर अब उस भूमि के वासियों में उन सभ्यताओं के स्वपनावशेष भी नहीं हैं। उनके परिकथाओं में भी अब वे पुरानी बातें नहीं बची है।

ऐसा इसलिए हुआ कि उस भू-भाग के मानवों ने एकात्म भाव जीवन से पुष्पित पल्लवित उस संस्कृति का परित्याग कर दिया। यह कोई अल्प समय में घटित होने वाली बात नहीं है अपितु प्रदीर्घ समयान्तराल एवं तज्जन्य सांस्कृतिक विस्मरण का कुफल होता है।

कभी-कभी इस प्रक्रिया में कई शताब्दियां लग जाती हैं, यही नहीं वह भू-भाग तो वैसे ही रहता है परन्तु उस भू-भाग के मनुष्य जब भिन्न प्रकार की जीवन प्रणाली व्यवहृत करने लगते है तो शनैः शनैः उसी भूमि पर नये राष्ट्र का जन्म होता है। यह भी प्रक्रिया सदियों-सदियांे तक चलती रहती है। अधिकांश संस्कृतियों के संदर्भ में तो यह दृष्टिगोचर हुआ है कि नया राष्ट्र पुराने से अधिक जाज्वल्यमान, प्राणवान, महिमावान एवं समर्थवान रहता है। अनेक संस्कृतियों के संदर्भ में यह भी हुआ है कि परवर्ती परम्परायें पूर्ववर्तियों की अपेक्षा अल्पजीवी रही है।

आर्ष और आप्त प्रमाणानुसार भारत मृत्युंजय है, विश्व के अनेक विद्याविदों, रहस्यदर्शी, दार्शनिकांे, वैज्ञानिकों और प्रतिभावानों ने भारत की अमरता को सिद्ध किया है। किसी ने इसे ज्ञान की भूमि कहा है तो किसी ने मोक्ष की किसी ने इसे सभ्यताओं का मूल कहा है तो किसी ने इसे भाषाओं की जननी किसी ने यहां आत्मिक पीपासा बुझाई है तो कोई यहां के वैभव से चमत्कृत हुआ है, कोई इसे मानवता का पालना मानता है तो किसी ने इसे संस्कृतियों का संगीत कहा है।

कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी यह अपने आप में एक रहस्य है, पहेली है, यक्ष-प्रश्न है। सिर्फ भारत ही नहीं है, जो नहीं मिटा है। नहीं मिटने वाले याने कायम रहने वाले और देश भी हैं। चीन है, यूनान है, रोम है, बेबीलोन है, ईरान है। ये देश कायम तो हैं लेकिन क्या भारत की तरह कायम हैं? क्या ये हिंदोस्तां की तरह कायम हैं? शायद नहीं है। इसीलिए इकबाल ने कहा है कि अगर वे कायम हैं तो भी सिर्फ नाम के लिए कायम हैं। उनकी हस्ती तो मिट चुकी है। उनकी मूल पहचान नष्ट हो चुकी है। इन पुरानी सभ्यताओं को समय ने इतने थपेड़े मारे हैं कि उनका सातत्य भंग हो चुका है।

जिसे कहते है, परंपरा, वह धागा टूट चुका है। परिवर्तन ने परंपरा को परास्त कर दिया है। कुछ देशों ने अपना धर्म बदल लिया कुछ ने अपनी भाषा बदल ली, कुछ ने अपना नाम बदल लिया और कुछ ने अपनी जीवन-पद्धति ही बदल ली। परिवर्तन की आंधी ने परंपरा के परखचे उड़ा दिए। यह ठीक हुआ या गलत, यह एक अलग प्रश्न है लेकिन भारत में ऐसी क्या खूबी है कि परंपरा और परिवर्तन यहां कंधे से कंधे मिलाकर आगे बढ़े जा रहे हैं। उनकी द्वंद्वात्मकता उनके विनाश का पर्याय नहीं बन रही है बल्कि नित्य नूतन सृजन की गर्भ-स्थली बन गई है।

द्वंद्व में से सृजन की निष्पत्ति भारत में लगभग उसी तरह हो रही है, जैसा कि जर्मन दार्शनिक हीगल ने कभी सोचा था। थीसिस और एंटी-थीसिस के टकराव में से सिन्थेसिस निकलता चला जाता है। वाद, प्रतिवाद और संवाद। संवाद याने सम्यक् वाद, समन्वय वाद! यह समन्वय ऐसी प्रक्रिया है, जिसमें मूल सदा वर्तमान रहता है। कभी नष्ट नहीं होता। बीज रूप में रहता है। सूक्ष्म रूप मे रहता है। यदि मूल अशक्त है तो उसे निर्मूल होने में देर नहीं लगती। भारत की मूल पहचान इतनी सशक्त है कि सैकड़ों हमलों के बावजूद वह कायम है। हमलावर यों तो सोने की चिडि़या को लूटने के लिए आते रहे लेकिन उनमें से कुछ को यह बुखार भी चढ़ा कि वे भारत को सभ्य बनाएंगे। उसके धर्म, संस्कृति, भाषा और संपूर्ण जीवन-पद्धति को नए रूप में ढालेंगे। लेकिन हुआ क्या? जो भी भारत में रहे गए, वे भारत के रूप में ढल गए। इकबाल ने गलत नहीं कहा कि भारत के किनारे पर सभ्यताओं के अनेक जहाज आए और डूब गए। आखिर यह हुआ कैसे?

इसका पहला कारण तो मुझे यह सूझता है कि दुनिया की दूसरी सभ्यताएं अभी जब अपने शैशव में भी नहीं पहुंची थी, भारतीय सभ्यता अपने चीर-यौवन में गमक रही थी। यह वही सभ्यता है, जिसे हमलावर हिंदू सभ्यता कहते रहे। जरा हम पीछे मुड़कर देखें तो पाएंगे कि भारत उस समय बेजोड़ था। जब सिकंदर, हूण, अरब, मंगोल, मुगल आदि भारत आए तो जिन देशों से वे आए थे, वे देश वहां थे और उस समय भारत काहं था। यदि सिकंदर के यूनान मे ंचलें तो वह युग प्लेटो और अरस्तू का था। प्लेटो और अरस्तू की रचनाओं- रिपब्लिक और पाॅलिटिक्स- की तुलना जरा करें हमारी उपनिषदों से रामायण और महाभारत से, कालिदास और कौटिल्य की रचनाओं से तो हम किस निष्कर्ष पर पहुंचेंगे? ये तो बहुत बाद की रचनाएं हैं।

ऋग्वेद, षड्दर्शन, जैन और बौद्ध धर्म आदि के मुकाबले की कोई चीज क्या हमें पश्चिम मे दिखाई पड़ती हैं? ये सभ्यताएं, ये समाज, ये राष्ट्र जब विकास की पहली सीढ़ी पर पांव रख रहे थे, तब तक भारत में वर्ण-व्यवस्थामूलक समाज स्थापित हो चुका था, राज्य-व्यवस्थाएं परिपक्व हो चुकी थीं, अर्थ-व्यवस्थाएं अपने चरमोत्कर्ष पर थीं। राज्य, परिवार, व्यक्ति और व्यक्तिगत सम्पदा की संस्थाएं न केवल स्वस्थ रूप से काम कर रही थीं बल्कि उनके पारस्परिक संबंध भी सुपरिभाषित हो चुके थे। जहां तक पहुंचने में पश्चिम को शताब्दियां लग गई, पुनर्जागरण और औद्योगिक क्रांति के दौर से गुजरना पड़ा, हजार साल के अंधकार युग मंे भटकना पड़ा, फ्रांस और रूस की खूनी क्रांतियों के अग्निकुंड में कूदना पड़ा, साम्राज्यवाद के राक्षस को अपने कंधे पर बिठाना पड़ा और विश्व युद्ध की विभिषिकाओं को सहना पड़ा, वहां तक भारत कई हजार साल पहले ही पहुंच चुका था। अब से ढाई-तीन हजार साल पहले के भारत ने जिन विचारों को उछाला था, क्या उनसे बेहतर विचार अभी तक किसी अन्य सभ्यता ने मानवता के सामने प्रस्तुत किए हैं?

भारत में जो भी आया, वह उसके भौगोलिक सौन्दर्य और भौतिक सम्पन्न्ता से तो अभिभूत हुआ ही, बौद्धिक दृष्टि से वह भारत का गुलाम होकर रह गया। वह भारत को क्या दे सकता था? भौतिक भारत को उसने लूटा लेकिन वैचारिक भारत के आगे उसने आत्म-समर्पण कर दिया। ह्वेन-सांग, फाह्यान, इब्न-बतूता, अल-बेरूनी, बर्नियर जैसे असंख्य प्रत्यक्षदर्शियों के विवरण इस सत्य को प्रमाणित करते हैं। जिस देश के हाथों में वेद हों, सांख्य और वैशेषिक दर्शन हो, उपनिषदें हों, त्रिपिटक हो, अर्थशास्त्र हो, अभिज्ञानशाकुंतलम् हो, रामायण और महाभारत हो, उसके आगे बाइबिल और कुरान, मेकबेथ और प्रिन्स, ओरिजिन आॅफ स्पेसीज या दास केपिटल आदि की क्या बिसात है? दूसरे शब्दों में भारत की बौद्धिक क्षमता ने उसकी हस्ती को कायम रखा।

भारत के इस अखंड बौद्धिक आत्मविश्वास ने उसके जठरानल को अत्यंत प्रबल बना दिया। उसकी पाचन शक्ति इतनी प्रबल हो गई कि इस्लाम और ईसाइयत जैसे एकचालकानुवर्तित्ववाले मजहबों को भी भारत आकर उदारमना बनना पड़ा। भारत ने इन अभारतीय धाराओं को आत्मसात कर लिया और इन धाराओं का भी भारतीयकरण हो गया। मैं तो यहां तक कहता हूं कि इस्लाम और ईसाइयत भारत आकर उच्चतर इस्लाम और उच्चतर ईसाइयत में परिणत हो गए। धर्मध्वजियों और धर्मग्रंथों पर आधारित इन मजहबों में कर्मफल और पुनर्जन्म का प्रावधान कहीं नहीं है लेकिन इनके भारतीय संस्करण इन बद्धमूल भारतीय धारणाओं से मुक्त नहीं हैं। भक्ति रस में डूबे भारतीयों के मुकाबले इन मजहबों के अभारतीय अनुयायी काफी फीके दिखाई पड़ते हैं। भारतीय मुसलमान और भारतीय ईसाई दुनिया के किसी भी मुसलमान और ईसाई से बेहतर क्यों दिखाई पड़ता है? इसीलिए कि वह पहले से उत्कृष्ट आध्यात्मिक और उन्नत सांस्कृतिक भूमि पर खड़ा है। यह धरोहर उसके लिए अयत्नसिद्ध है। उसे सेत-मेंत में मिली है। यही भारत का रिक्थ है।


सनातन संस्कृति के कारण इस पावन धरा पर एक अत्यंत दिव्य विद्युत चुम्बकीय क्षेत्र निर्मित हुआ। प्राकृतिक पर्यावरण कठिन तप, ज्ञान, योग, ध्यान, सत्संग, यज्ञ, भजन, कीर्तन, कुम्भ तीर्थ, देवालय और विश्व मंगल के शुभ मानवीय कर्म एवं भावों से निर्मित इस दिव्य इलेक्ट्रो-मैगनेटिक फील्ड से अत्यंत प्रभावकारी विद्युत चुम्बकीय तरंगों का विकिरण जारी है इसी से समग्र भू-मण्डल भारत की ओर आकर्षित होता रहा है और होता रहेगा। भारतीय संस्कृति की यही विकिरण ऊर्जा ही हमारी चिरंतन परम्परा की थाती है। भूगोल, इतिहास और राज्य व्यवस्थाओं की क्षुद्र संकीर्णताओं के इतर प्रत्येक मानव का अभ्युदय और निःश्रेयस ही भारत का अभीष्ट है। साम्राज्य भारत का साध्य नहीं वरन् साधन है। परिणामतः हिन्दू साम्राज्य किसी समाज, देश और पूजा पद्धति को त्रस्त करने में कभी उत्सुक नहीं रहे। यहां तो सृष्टि का कण-कण अपनी पूर्णता और दिव्यता के साथ खिले इसका सतत प्रयत्न किया जाता है। आवश्यकतानुरूप त्यागमय भोग ही अभीष्ट है तभी तो दातुन हेतु भी वृक्ष की एक टहनी तोड़ने के पूर्व हम वृक्ष की प्रार्थना करते हैं और कहते हैं कि-
आयुर्बलं यशो वर्चः
प्रजा
पशु वसूनिच।
ब्रह्म प्रज्ञां च मेधां च
त्ंवनो
देहि वनस्पति।।
(वाधूलस्मृति 35, कात्यायन स्मृति 10-4, विश्वामित्र स्मृति 1-58, नारद पुराण 27-25, देवी भागवत 11-2-38, पद्म पुराण 92-12)

दरअसल भारत का राष्ट्रजीवन सत्यकामी है। उसने पाया कि मनुष्य एक रहस्य है। तमाम आधुनिक वैज्ञानिक खोजों और विचार तथा दर्शन की हजारों व्याख्याओं के बावजूद मनुष्य एक पहेली है। एक अचरज है। एक अचम्भा है।

भारत सत्य का सनातन खोजी बना। सत्य की खोज भारत का स्वभाव बना। इसलिए भारत सिर्फ एक भूखंड ही नहीं है। यह सिर्फ एक सम्प्रभु राज्य भी नहीं है। भारत समूची सृष्टि के रहस्यों को जान लेने की सनातन अभीप्सा है। भारत और सत्य अभीप्सा पर्यायवाची है। भारत और अमृत-प्यास समानार्थी हैं। भारत सनातन यात्रा है। यह यात्रा कब प्रारम्भ हुई? किस जगह प्रारम्भ हुई? कब समाप्त होगी? इन प्रश्नों का कोई उत्तर नहीं दिया जा सकता। इसीलिए भारत के पास आधुनिक शैली वाला इतिहास नहीं है। ‘सनातन’ का कोई इतिहास होता भी नहीं ऐसे प्रश्नों का उत्तर देना जरूरी ही हो तो कह सकते हैं भारत की सनातन यात्रा अनन्त से अनन्त की दिव्ययात्रा है।

भारत विश्व मनुष्यता का स्वर्णिम अतीत है और भारत ही विश्व मनुष्यता का इन्द्रधनुषी सपना भी। भारत उदास होता है तो विश्व मनुष्यता का कोई भविष्य नहीं है। भारत के भाग्य के साथ समूची विश्व मानवता का भाग्य नत्थी है। समूची पृथ्वी पर र्सिु भारत ने अपनी समूची जीवन ऊर्जा को सत्य की खोज से जोड़ा। भारत ने पूरी विनम्रता और आत्यंतिक निरंहकारिता के साथ विश्व कल्याण की खातिर ही अपना सर्वस्व लुटाया। हमारे पूर्वजों ने भौतिक समृद्धि की परवाह नहीं की। उन्हांेंने भूख और नींद जैसी अतिआवश्यक जैविक जरूरतों को भी नजरंदाज करते हुए ज्ञान, भक्ति, योग, तंत्र और ध्यान जैसे आंतरिक संसाधनों का विकास किया। इस देश ने विश्वमानवता के ज्ञात इतिहास में कोई 10-12 हजार वर्ष की सत्यखोजी तप साधना चलाई है।

भारत एक देश है और सभी भारतीय जन एक है, परन्तु हमारा यह विश्वास है कि भारत के एकत्व का आधार उसकी युगों पुरानी अपनी संस्कृति में निहित है।

अनादिकाल से भारत में वैचारिक स्वतंत्रता प्रत्येक मनुष्य को प्राप्त रही है। प्राचीनकाल से ऋषियों, मनीषियों द्वारा समग्र जीवन दाव पर लगाकर भी अप्रतिम जीवन रहस्य खोजे गये। आत्मा और परमात्मा के गूढ़तर सम्बंध के इस सत्य साधकों ने कभी भी अंतिम सत्य प्राप्त कर लेने का दावा नहीं किया। अपना अंतिम अभुभव बताने के पश्चात् भी वे ऋषिगण ‘नेति-नेति’ कहकर अपने आगत पीढि़यों को पर्याप्त अवसर उपलब्ध कराते थे। ‘‘नेति- (ऩइति, यह अंतिम नहीं है) नेति’’ वालों ने यह उद्घोष कर दिया था कि ‘‘आत्म दीपोभव’’ (उपनिषद वाक्य) अर्थात् स्वयम् का ज्ञानदीप प्रज्जवलित करो। इसी मौलिक विचार सूत्र से अनुप्राणित होकर महात्मा बुद्ध ने भी कहा था कि ‘‘किसी सत्य को इसलिए मत मान लो कि किसी बड़ी पुस्तक में लिखा है या इसलिए भी मत मान लो कि किसी अत्यंत प्रभावशाली व्यक्ति ने कहा है अपितु, उस विचार को अपनी प्रज्ञा की कसौटी पर देखो और यदि सत्य लगे तो ही स्वीकार करना। उपर्युक्त श्रुति को ही उन्होंने पालि भाषा में ‘‘अप्प दीपो भव’’ कहा था। इस प्रकार प्रत्येक मनुष्य के आत्मविकास की अन्यतम सम्भावनाओं के खिलने का अवसर उपलब्ध कराना भारतीय धर्म का वैचारिक पद्धति रही है।

Tuesday, March 12, 2013

राष्ट्रवाद को जन-जन तक पहुंचाएं


जागरण संवाददाता, धनबाद : नेताजी की जयंती एवं दृष्टि 2013 के युवा महोत्सव के अंतर्गत बुधवार को दिल्ली पब्लिक स्कूल के स्वामी विवेकानंद सभागार में परिसंवाद हुआ। इसका विषय स्वामी विवेकानंद और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद था। इसमें बतौर मुख्य वक्ता माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विवि के प्रकाशन पदाधिकारी डा.सौरभ मालवीय उपस्थित हुए। डॉ. मालवीय ने सांस्कृतिक राष्ट्रवाद पर अपने शोध श्रोताओं के समक्ष प्रस्तुत किया। इस दौरान विश्र्वनाथ बागी, कंसारी मंडल, इंद्रजीत सिंह, श्रीकांत मिश्र, शशि तिवारी, पीके भट्टाचार्य, सत्यप्रकाश मानव ने भी इस गंभीर विषय पर अपने-अपने विचार रखे। सभी ने राष्ट्रवाद की भावना जन-जन तक पहुंचाने का संकल्प लिया। कार्यक्रम का सफल बनाने में बृजेश, केशव झा, संतोष झा, रमेश कुमार, रविंद्र, आईएसएम के छात्र और दृष्टि 2013 के अन्य राष्ट्रीय संगठनों का महत्वपूर्ण योगदान रहा। दृष्टि 2013 की ओर से 12 जनवरी से 23 मार्च तक युवा महोत्सव मनाया जा रहा है। यह कार्यक्रम उसी की एक कड़ी है।

Saturday, March 9, 2013

सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और मीडिया


डॉ. सौरभ मालवीय
हिन्दी समाचार पत्रों के आलोक में भारतीय पत्रकारिता विशेषकर हिन्दी समाचार पत्र-पत्रिकाओं में सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की प्रस्तुति को लेकर किये गये अध्ययन में अेनक महत्वपूर्ण तथ्य उभरकर सामने आये हैं। सामान्यतः राष्ट्र, राष्ट्रवाद, संस्कृति और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद जैसे अस्थुल व गुढ़ विषय के बारे में लोगों की अवधारणाएं काफी गड़मड़ है। आधुनिक षिक्षा पद्धति यानि षिक्षा के मौजूदा सरोकार और तौर-तरीके तथा अध्ययन सामाग्री और विधि इसमें दिखाई दे रहे हैं। मीडिया के प्रचलन और इसके विकास के बाद जो आस जागी थी कि यह भारतीय जनमानस में विषयों को भारतीय दृष्टि से एक समग्र दृष्टिकोण (भारतीय दृष्टिकोण) विकसित करने में उपयोगी भूमिका निभायेगी। दुर्भाग्य से जनमाध्यम भी इस संदर्भ में विभ्रम की स्थिति में है। चंूकि इन माध्यमों पर धारा विषेष के लोगों में से अधिकांष की षिक्षा पद्धति और सोच के सरोकार पष्चिमी है या भारतीय होते हुए भी इनकी सोच पर पष्चिम की श्रेष्ठता का आधिपत्य है। ऐसी स्थिति में इनसे वृहद परिवर्तन कामी दृष्टिकोण की दिषा-दषा में आमूल-चूक परिवर्तन की उम्मीद करना ही वेमानी है।
अध्ययन में सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के संबंध में सर्वाधिक महत्वपूर्ण तथ्य यह प्रकाष आया है कि राष्ट्र के संबंध में कथित बौद्धिक सभ्रान्त लोगों की अवधारणा ही भ्रामक और अस्पष्ट है। प्राकारान्तर से हम यूं कहें कि इनकी सोच पर पष्चिमी षिक्षा का या षिक्षा के यूरोपीकरण का प्रभुत्व है। अतिरेक न होगा। अधिकांष बुद्धिजीवी राष्ट्र का अर्थ सांस्कृतिक सरोकारों से युक्त नहीं मानते। उनकी सोच के भ्रामक स्थिति के चलते राष्ट्रवाद जैसे व्यापक और वृहद अर्थ ग्रहण वाले शब्द का अर्थ संकुचित अर्थों में आकार पाता है। इन लोगों का मनना है कि राष्ट्र का अभिप्राय क्षेत्र विषेष में रहने वाली विषेष या कुछ जातियों से है। प्रायः जिनमें सांस्कृतिक तौर पर सभ्यता पायी जाती है।
 राष्ट्र की इनकी परिभाषा को स्व्ीकार करने पर भारत बहु-सांस्कृतियों वाला राष्ट्र न होकर एक ऐसा क्षेत्र विषेष होगा जिनको बहुराष्ट्रीय संस्कृति वाला देष कहेंगे। जो देष की सांस्कृतिक और राष्ट्रीय विरासत की दृष्टि से ठीक नहीं होगा। इसको स्व्ीकार करने का अर्थ होगा कि हम यूरोप और अमेरिका के भारत को खण्ड-खण्ड करने वाले दृष्टि के पक्ष में खड़े होंगो जिनका एक मात्र ध्येय भारत को एक राष्ट्र नहीं, राष्ट्रों के समूह के (उप महाद्वीप) रूप में अधिस्थापित करना है। वे भारत को एक राष्ट्र न मानकर भारतीय उप महाद्वीप जैसे नामों से संबोधित करते हैं, जो इनकी अखण्ड भारती की एकता के प्रति संकुचित दृष्टिकोण को परिलक्षित करता है।

       ’आधुनिक बुद्धिजीवी’ राष्ट्र और देष को प्रायः समानार्थी रूप में न सिर्फ प्रयोग करते हैं बल्कि स्वीकार भी करते हैं। कुछ कथित बुद्धिजीवी देष को राष्ट्र से व्यापक इकाई के रूप में परिभाषित करते हैं। राष्ट्र के ऊपर देष के व्यापकता स्वीकार करने का अर्थ होगा कि राष्ट्र को सिर्फ भू-स्थैतिक व्यापकत्व को स्वीकार करना। ये राष्ट्र और राज्य और देष किसी भी रूप में एक नहीं है। दुनिया के अधिकांष विद्वान वेद को प्राचीनतम ज्ञान कोष मानते हैं ऋषि परम्परा के अनुसार राष्ट्र शब्द का प्रयोग भारत में राष्ट्रवाद का इतिहास चार सौ वर्ष से ज्यादा पुराना नहीं है। यह अलग विषय है कि छिट-पुट रूप की अवधारणा प्रचलन में थी। राष्ट्र राज्य के संबंध में आधुनिक, राजनैतिक विदों का मानना है कि यह परिस्थितिजन्य प्रतिक्रिया का परिणाम नहीं है। बल्कि वस्तु स्थिति यह है कि दुनिया के विभिन्न क्षेत्रों में प्रभुत्व में अभी राष्ट्रवादी चेतना का केन्द्रीय स्रोत भारत ही था।
 भारतीय सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का मूल उसकी संस्कृति में है। जो कि शेष दुनिया में प्रचलित राष्ट्र राज्य की अवधारणा में सर्वथा अनुपस्थित है। संस्कृतिमूलक राष्ट्र भाव का जिक्र वेदों में कई जगह आया है। यजुर्वेद में एक राष्ट्रीय गीत का उल्लेख भी मिलता है जिसमें ऋषि ने राष्ट्र में तेज्स्वी विद्वानों, पराक्रमी योद्धाओं, दुधारू पषुओं, तिब्रगामी अष्वों, गुणवती नारीयों, विजय कामी सभ्य जनों, समयानुकूल वर्षा और हरी-भरी कृषि की कामना की है, साथ ही इस गीत में राष्ट्र के योग क्षेम की कामना चाही गई है। प्राकारान्तर से आधुनिक लोक कल्याणकारी राज्य की अवधारणा को इसके षिषु के रूप में उल्लेखित किया जा सकता है।

       अध्ययन से एक ओर जो महत्वपूर्ण तथ्य उजागर हुआ है -राजनैतिक सत्ता के अतिरिक्त भी राष्ट्र का अपना कुछ अलग अस्तित्व होता है जो इसकी संस्कृति और जीवन पद्धति से न सिर्फ पुष्ट होता है बल्कि अघोषित तौर पर सत्ता जनीत शक्ति का केन्द्र होता है। यह दुनिया के प्रत्येक देष में सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक आदि अन्यान्य दबाव समूहों के रूप में मौजूद रहता है। कल्पना करें अगर सांस्कृतिक टकराव नहीं होता तो क्या भारत-पाकिस्तान दो देष बनते और भारत का विभाजन होता ? यह राष्ट्रों के इसी सत्य की ओर इंगित करता है।

      कोई माने या न माने दुनिया के प्रत्येक देष की सत्ता उसके सांस्कृतिक सरोकारों से प्रभावित व आप्लावित होती है। अन्तर सिर्फ इतना है दुनिया के राष्ट्रों के सांस्कृतिक सरोकार आपस में कई बार चुनौति या प्रतिद्वन्दी के रूप में खड़े नजर आते हैं। वहीं सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की भारतीय अवधारणा सिर्फ स्वहित पोषण या संरक्षण की बात नहीं करते बल्कि दुनिया के हितों में ही खुद के हितों को संरक्षित मानते हैं। यहां बनस्पतियैं शान्ति की अवधारणा न सिर्फ अभिसिंचित बल्कि जीवन्त है।

      सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की धारणा राष्ट्रीय हितों को सिर्फ आर्थिक सरोकारों से समतुल्य करके नहीं देखती। अपेक्षात्मक तौर पर मानवीय सरोकार और हित इसके लिए अधिक मायने रखते हैं। सांस्कृतिक राष्ट्रवाद राष्ट्र के लिए सिर्फ राजनैतिक व भू स्थैतिक एकता और संप्रभुता को आधार नहीं मानती बल्कि सांस्कृतिक एकता को उसका प्रमुख आधार मानती है। इसके अनुसार सांस्कृतिक भिन्नता राष्ट्र के स्तित्व के लिए कोई खतरा नहीं है जबकि भिन्न-भिन्न सांस्कृतिक मूल्यों के बीच स्तित्व की भावना के आधार पर यह राष्ट्र मूल्य की बात करता है। बहुत सारे विद्वान भारत को एक राष्ट्र के रूप में मौजूदा स्तित्व के पीछे उसकी द्धैवि शक्ति को मानते है - यह दैविषक्ति कुछ और नहीं बल्कि इसके सांस्कृतिक मूल्य ही हैं  जो इसे अखण्ड राष्ट्र के तौर पर पूरब से लेकर पष्चिम तक और उत्तर से लेकर दक्षिण तक बनाये हुए हैं।

        हिन्दी पत्रों के प्रकाष मंें भारतीय पत्रकारिता विषेषकर हिन्दी समाचार पत्र -पत्रिकाओं में सांस्कृतिक राष्ट्रवाद मीडिया के परिपेक्ष्य में जो अध्ययन किया गया उसमें सर्वाधिक महत्वपूर्ण तथ्य प्रथम दृष्टया यह उजागर हुआ कि मीडिया और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के बीच  अन्योन्याश्रीत सम्बन्ध रहे हैं अभिप्रायतः स्वतंत्रता पूर्ण भारतीय पत्रकारिता के पत्रकारिय सरोकार मूलतः राष्ट्रवादी है इसे हम यू भी कह सकते हैं कि भारती की मूल्य परख राष्ट्रवादी पत्रकारिता और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के मूल्यों में कोई विषेष विभेद नहीं है। दोनों समग्र राष्ट्रीय और सांस्कृतिक हितों की वकालत करते है। समप्रति नेहरू युगीन पत्रकारिता के सरोकार भी सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के मूल्यों से उद्देष्यगत विभेद नहीं रखते इनके विभेद तौर-तरीकों और अपनाये गये संसाधनों को लेकर है।
 इस अध्याय में निर्णायक निष्कर्ष यह उभर कर आया कि राष्ट्रीय स्तर पर पत्रकारिय मूल्यों और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के मूल्यों में बिभेद उस काल में विषेष तौर पर उभर कर आया। जब भारतीय सकारात्मक अधिष्ठान में वामपंथी हस्तक्षेप शक्तिवत वढ़ गया यह दौर राष्ट्रीय परिदृष्य में स्वतंत्रता के बाद प्रभावी हुआ।

      वस्तु स्थिति यह है कि जैसे-जैसे केन्द्र और राज्य स्तर पर समाजवादी और वामपंथी विचारधारा सत्ता के करीब आती गई या इनका सीधे या परोक्ष हस्तक्षेप बढ़ने लगा उसी अनुपात में सिर्फ सत्तात्मक अधिष्ठान से बल्कि पत्रकारिय जगत से भी सांस्कृतिक राष्ट्रवादी विचारधारा का लोप होना या उनका नकारात्मक प्रचार बढ़ गया।

       अध्ययन के अनुसार मीडिया जगत में सांस्कृतिक मूल्यों से जुड़े पत्रकारों का कभी कोई अभाव नहीं रहा है लेकिन सौभाग्य या दुर्भाग्य से इनका नेतृत्व सांस्कृतिक राष्ट्रवाद विरोधी विचारधारा के लोगों के हाथों में रहा है। इसके पीछे सर्वाधिक महत्वपूर्ण कारण सत्ता में इस विचारधारा के लोगों का अधिक मूखर और शक्तिषाली होना रहा है। निष्कर्षतः सांस्कृतिक राष्ट्रवादी विचारधारा से संबंधित समाचारों का कवरेज नकारात्मक तौर पर अधिक किया जाता है और इसी रूप में वे पत्रों में स्थान भी पा रहे हैं इसे संबंधित नकरात्मक तथ्यों और मूल्यों को सर्वाधिक तौर पर उभारा जाता है।
 अध्ययन के अनुसार जो सर्वाधिक तथ्य यह उभर कर सामने आया कि मांग या रूचि आधारित न होकर अधिरोपित अधिक है। जो इस बात के गवाह है कि मीडिया सत्ता में किन लोगों का आधिपत्य है जबकि सामाजिक अभिरूचि इस मामले में मीडिया से मेल नहीं खाते शोध में किये गये सर्वेयात्मक अध्ययन के अनुसार 80 प्रतिषत पाठक सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के बारे में रूचि रखते हैं और वे इसके बारे में वस्तुनिष्ठ जानकारी चाहते हैं।

       उपरोक्त सर्वेक्षण से कई भ्रंतियां समाप्त हो जाती हैं। पहली भ्रांति तो यह निर्मूल होती है कि आज का पाठक सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के बारे में पढ़ना व जानना नहीं चाहता है। सर्वेक्षण के परिणामों से स्पष्ट होता है कि 80 प्रतिशत पाठक सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के बारे में पढ़ने में रूचि रखते हैं (सारणी 39) और 60 प्रतिशत पाठकों का मानना है कि मीडिया में सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को उचित महत्व नहीं दिया जाता है। यह आंकड़ा उन संपादकों और मीडिया घरानों के लिए चैंकाने वाला हो सकता है जो अभी तक यह मानते रहे हैं कि सांस्कृतिक राष्ट्रवाद एक कालबाह्य विचार है और आज का पाठक उसमें रूची नहीं रखता।

यह आंकड़ा और भी महत्वपूर्ण हो जाता है जब हम यह देखते हैं कि सर्वेक्षण के प्रतिभागियों में सबसे अधिक संख्या युवाओं (40 प्रतिशत; सारणी 21) और स्नातक या उससे अधिक शिक्षितों (44 प्रतिशत; सारणी 26) की है। यानी शिक्षित युवा भी सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के बारे में पढ़ने और जानकारी रखने में पर्याप्त रूचि रखते हैं। सर्वेक्षण से यह भी स्पष्ट होता है कि पाठक मीडिया में सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को दिए जाने वाले महत्व व स्थान से संतुष्ट नहीं हैं और 60 प्रतिशत पाठकों का मानना है कि मीडिया में सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को उचित महत्व नहीं दिया जा रहा है।
 रोचक बात यह भी है कि 41 प्रतिशत प्रतिभागियों ने इसका कारण मीडिया का अपना पूर्वाग्रह बताया जबकि 23 प्रतिशत पाठकों का मानना था कि देश में ऐसी गतिविधियों के कम होने के कारण मीडिया में इसे कम स्थान मिलता है।
 
     बहरहाल इस सर्वेक्षण से यह स्पष्ट हो जाता है कि देश का पाठक वर्ग मीडिया में सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को दिए जा रहे महत्व व स्थान से असंतुष्ट है और वह इस पर और सामग्री पढ़ना चाहता है।
(मेरे शोध का अंश)
संपर्क
डॉ. सौरभ मालवीय
सहायक प्राध्यापक
माखनलाल चतुर्वेदी
राष्‍ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल (मध्य प्रदेश)
मो. +919907890614
ईमेल : drsourabhmalviya@gmail.com

भारतीय समाज और मीडिया


डॉ. सौरभ मालवीय
आज संपूर्ण विश्व विज्ञान की प्रगति और संचार माध्यमों के कारण ऐसे दौर में पहुंच चुका है कि मीडिया अपरिहार्य बन गई है. बड़ी-बड़ी और निरंकुश राज सत्ताएं भी मीडिया के प्रभाव के कारण धूल चाट रही है, वरना किसको अनुमान था कि लीबिया के कर्नल मुहम्मद अल गद्दाफी भी धूल चाट लेंगे. मिस्र, यमन और सूडान में जो जन विद्रोह हुए वह कल्पनातीत ही था. सर्व शक्ति संपन्न अमेरिका के ग्वांतानामो और अबू गरीब जेल में जो अमानुषिक यंत्रणा दी जाती है, वह मीडिया के द्वारा ही तो जाना गया. ऒस्ट्रेलिया के जूलियस असांत्जे की विकीलीक्स में विश्व राजनीतिक संबंधों पर पुर्नविचार के लिए बाध्य हो गया. कुल मिलाकर यह अघोषित सत्य हो गया है कि मीडिया को दरकिनार करके जी पाना अब असंभव है. लोकतांत्रिक देशों में तो मीडिया चतुर्थ स्तंभ के रूप में ही जाने जाता है. इस खबर पालिका को कार्यपालिका, विधायिका, न्यायापालिका के समकक्ष ही रखा जाता है. खबर पालिका के अभाव में वह लोकतंत्र लंगड़ा व तानाशाह भी हो जाता है. बहुत पहले प्रयाग के एक शायर अकबर इलाहाबादी ने खबर पालिका की ताकत को राज सत्ता की तोपों से भी ज्यादा शक्तिशाली माना था. उनका यह शेर खबर पालिका में ब्रम्ह बाक्य बन गया-
खींचों न कमाने व न तलवार निकालो
जब तोप मुकाबिल हो तो अखबार निकालो
इन सारी बुलंदियों के बीच खबर पालिका को एक मिशन बनकर उभरना चाहिए. खबर पालिका से जुड़े लोग स्वयं निर्मित एवं स्वयं चयनित होते हैं. ऐसे में राष्ट्र और समाज के प्रति उनका उत्तरदायित्व और गहरा हो जाता है. यदि वह अपने इस कर्तव्य बोध को ठीक से न समझे तो उनके पतीत होने की संभावना पग-पग बनी रहती है. भारत के दुर्भाग्य से भारत में दो प्रकार की खबर पालिका है, जो समानांतर जी रही हैं. एक भारत का प्रतिनिधित्व करता है जिसकी पहुंच भारत की भाषा और बोली में 90 प्रतिशत जनता तक है, लेकिन 90 प्रतिशत यह लोग कम शिक्षित और चकाचौंध से दूर रहने वाले ही हैं. दूसरी मीडिया जो इंडिया का प्रतिनिधित्व करती है वह 3 प्रतिशत से भी कम लोगों की है लेकिन वह तीसरे पेज पर छाये रहने वाले लोगों के बूम से चर्चित रहती है. यह तीसरे पेज वाले लोग स्वयंभू शासक है और उन्होंने मान लिया है कि भारत पर शासन करने, इसकी दशा और दिशा तय करने और भारतीयों को हांकने की मोरूसी लाठी उन्हीं के पास है और यह लोग खबरों को मनमाने ढंग से तोड़ते-मरोड़ते और प्लाटिंग करते रहते हैं. पिछले साल संपन्न हुए कामनवेल्थ खेलों के दौरान और 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले की अनियमित्ता में नीरा राड़िया के सामने इस इंडिया के अनेक मीडियाकर नंगे पाए गए. कहां पत्रकारिता का आदर्श गणेश शंकर विद्यार्थी, बाबू विष्णु पराडकर, पूर्णचन्द्र गुप्त, महावीर प्रसाद आदि और कहां आज सर्व सुविधायुक्त जमाने में नीरा राडिया का आदर्श. यह तो होना ही था. जब पत्रकार अपने आदर्शों से चूकता है तो वह पूरी व्यवस्थाओं को लेकर डूबता है. पहले ऐसे पत्रकार ‘पीत पत्रकार’ की सूची में जाति भ्रष्ट होते थे. अब तो इन कुजातियों को एक अवसर ही ‘पेड न्यूज’ में दे दिया गया है, लेकिन बात सबसे अधिक तब अखरती है जब पत्रकार दलाल पत्रकारिता और सुपारी पत्रकारिता के स्तर पर पतित होता है.
आज हिन्दी पत्रकारिता में दैनिक जागरण और दैनिक भास्कर समूह की यह स्थिति है कि इनमें से किसी एक के बराबर भी पूरे भारत की सारी प्रिंट मीडिया मिलकर भी नहीं है. लेकिन दुर्भाग्य है भारत का कि 2 प्रतिशत लोगों के लिए छपने वाले अंग्रेजी समाचार पत्र भारत का नेतृत्व संभालने का दावा करते हैं. दृश्य पत्रकारिता में अनेक ऐसे ग्रुप आ गए हैं, जो अपने राजनैतिक आका की जी-हजूरी को अपना धर्म मानते हैं. अन्यथा सन टीवी और मलयालम मनोरमा का उदय भी कैसे होता? यह तो भला हो 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले का कि इन लोगों का कुकर्म सामने आ गया. उत्तर भारत के समाचारपत्रों में भी एक-दो छोड़कर ऐसा कोई समाचार समूह नहीं है, जो अपने राजनीतिक देवताओं की जी-हजूरी न बजाता हो. सहारा समूह, नेशनल हेराल्ड, ऐशियन ऐज, नई दुनिया, टाईम्स ग्रुप आदि की स्वामी भक्ति के आगे तो शर्म भी शर्मशार होने लगी है. ‘इंडिया एक्सप्रेस’ ने जब-जब सहास किया, तब-तब सत्ताधारियों ने उसकी कमर तोड़ने में कोई कसर नहीं छोड़ी. वह तो रामनाथ गोयनका और अरूण शौरी की इतनी प्रभुत्य तपस्या थी कि उनका कुछ भी नहीं बिगड़ा. आज भी सत्ता समर्थक मीडिया को सरकारी विज्ञापनों से मालामाल कर दिया जाता है और सत्य समर्थक मीडिया पर सरकारी पुलिसिया रौब के डंडे फटकारे जाते हैं, उनका जीना दुभर कर दिया जाता है. उन्हें संसदीय या विधानसभाई कार्यवाहियों के प्रवेश पत्र भी नहीं दिये जाते हैं, जबकि सरकारी भौपूओं को देश-विदेश की असमिति यात्राओं सहित फ्लैट्स और अनन्यान्य प्रकार की सभी सुविधाओं से सजाकर दामाद जी जैसी आवभगत की जाती है.

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