लड़की तो नहीं मिली, जिन्दगी का मिशन मिल गया


17 अगस्त 2006 को रोड एक्सीडेंट में सर फट गया. 60 प्रतिशत हिस्सा बाहर निकल गया. डॉक्टरों ने मृत बता दिया. शरीर को अग्नि में सुपुर्द करने की तैयारी शुरू हो गई, लेकिन नियति को कुछ और ही कराना था इसलिए आजाद पाण्डेय की सांसे किसी कोने में छुपी थी. आजाद जिन्दा थे, शरीर में कुछ हल-चल हुई. गोरखपुर सावित्री नर्सिंग होम में भगवन बनकर एक डॉक्टर आजाद को नई जिन्दगी देने में सहायक बने, परन्तु आजाद स्मरण शक्ति खो दिए थे. शरीर और दिमाग दोनों का इलाज दिल्ली और गोरखपुर में चलता रहा. धीरे-धीरे सुधार होता गया. इसी बिच एक घटना होती है दिल्ली इलाज के लिए आजाद अपने पापा के साथ आते है. ट्रेन के जनरल डिब्बे में दोनों बैठे है. खिड़की से बहार आजाद की नज़र पड़ती है. एक छोटी सी बच्ची 7-8 साल की जो ट्रेन से फेकी हुई गंदगी को खा रही थी. यह देखकर आजाद चिल्लाये,शोर मचाये और पापा से बोले इसे अपना खाना दीजिये. पापा ने डांटा, लोगो ने समझाया. मगर आजाद के जिद्द के सामने किसी की नही चली और पापा ने पूरा खाना दे दिया. बच्ची खाने लगी. ट्रेन चल पड़ी. आजाद बोलने लगे पापा को ख़ुशी हुई. मेरा बेटा ठीक हो गया.
कुछ वर्षो तक आजाद पाण्डेय अक्सर स्टेशन परिवार के किसी न किसी के साथ आते रहते थे. लड़की को तलाशते रहे, मगर वो बच्ची नही मिली. धीरे धीरे आजाद अपनी याद्दाश्त के साथ स्वस्थ हो रहे थे. उस बच्ची जैसे अनेक बच्चे स्टेशन पर रोज ही मिल जाते. आजाद उनके साथ घंटो बैठते. एक दिन भूख से रोते एक बच्चे को देखा, उनके पास भी खिलाने को कुछ नही था. तभी आजाद ने संकल्प लिया लि मेरी जिन्दगी इनके नाम और बनाया “स्माइल रोटी बैंक”
बाल भिक्षावृति के साथ-साथ अक्षम जिंदगियों की तस्वीर बदलने में, समाज की अनेक समस्याओं व समाधान,जीवन में लक्ष्यों का महत्व,नारी सशक्तिकरण,जैसे अनेक मुद्दो पर उनके बिच काम कर रहे है . आप को बहुत बहुत शुभकामनाएं

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