कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी


डॉ. सौरभ मालवीय
भगवान श्री कृष्ण ने अपने आप्तवचन श्रीमद्भगवद् गीता में साधिकार घोषणा की है कि
जातस्य हि ध्रुवो मृत्युध्र्रुवं जन्म मृतस्य च।
तस्मादपरिहार्येऽर्थे न त्वं शोचितुमर्हसि
- गीता 2.27
अर्थात् जन्म लिये हुए का मरना सुनिश्चित है। इसी क्रम में नचिकेता ने भी कठोपनिषद में ऐसा ही कहा यह बातें केवल मनुष्यों पर ही नहीं अपितु राष्ट्रों पर भी समान रूपेण प्रभावी है, राष्ट्रांे के जीवन में भी अवसानाविर्भाव आते रहते है अन्यथा पिछली शताब्दी के इस जगतीतल के श्रेष्ठतम प्रतिभा वालों में से एक प्रो. अर्नाल्डटायनवी ने अपने गहन शोधो उपरांत यह घोषणा की है कि समय-समय पर विश्व का सांस्कृतिक नेतृत्व करने वाली 49 सभ्यतायें कठिन काल के कराल गाल में समा गयी है। कई सभ्यताओं की तो अवशेष भी धराधाम पर शेष नहीं है।

सच तो ये है कि अनेक सभ्यताओं के खण्डहर भी अब केवल विलुप्त जन श्रूतियों के माध्यम से पुस्तकागारों के खण्डहर बने हुए हैं। और कई सभ्यताओं के भगना अवशेषों पर तो कई-कई बार नये-नये भगनाअवशेष बन चुके आज कहां पता है इन्का और एजेटेक सभ्यताओं के उत्स। खालडियन, सुनेरियन समेत अनेक सभ्यताएं जिस भूमि पर पली, बढ़ीं अब उस भूमि पर अब उस भूमि के वासियों में उन सभ्यताओं के स्वपनावशेष भी नहीं हैं। उनके परिकथाओं में भी अब वे पुरानी बातें नहीं बची है।

ऐसा इसलिए हुआ कि उस भू-भाग के मानवों ने एकात्म भाव जीवन से पुष्पित पल्लवित उस संस्कृति का परित्याग कर दिया। यह कोई अल्प समय में घटित होने वाली बात नहीं है अपितु प्रदीर्घ समयान्तराल एवं तज्जन्य सांस्कृतिक विस्मरण का कुफल होता है।

कभी-कभी इस प्रक्रिया में कई शताब्दियां लग जाती हैं, यही नहीं वह भू-भाग तो वैसे ही रहता है परन्तु उस भू-भाग के मनुष्य जब भिन्न प्रकार की जीवन प्रणाली व्यवहृत करने लगते है तो शनैः शनैः उसी भूमि पर नये राष्ट्र का जन्म होता है। यह भी प्रक्रिया सदियों-सदियांे तक चलती रहती है। अधिकांश संस्कृतियों के संदर्भ में तो यह दृष्टिगोचर हुआ है कि नया राष्ट्र पुराने से अधिक जाज्वल्यमान, प्राणवान, महिमावान एवं समर्थवान रहता है। अनेक संस्कृतियों के संदर्भ में यह भी हुआ है कि परवर्ती परम्परायें पूर्ववर्तियों की अपेक्षा अल्पजीवी रही है।

आर्ष और आप्त प्रमाणानुसार भारत मृत्युंजय है, विश्व के अनेक विद्याविदों, रहस्यदर्शी, दार्शनिकांे, वैज्ञानिकों और प्रतिभावानों ने भारत की अमरता को सिद्ध किया है। किसी ने इसे ज्ञान की भूमि कहा है तो किसी ने मोक्ष की किसी ने इसे सभ्यताओं का मूल कहा है तो किसी ने इसे भाषाओं की जननी किसी ने यहां आत्मिक पीपासा बुझाई है तो कोई यहां के वैभव से चमत्कृत हुआ है, कोई इसे मानवता का पालना मानता है तो किसी ने इसे संस्कृतियों का संगीत कहा है।

कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी यह अपने आप में एक रहस्य है, पहेली है, यक्ष-प्रश्न है। सिर्फ भारत ही नहीं है, जो नहीं मिटा है। नहीं मिटने वाले याने कायम रहने वाले और देश भी हैं। चीन है, यूनान है, रोम है, बेबीलोन है, ईरान है। ये देश कायम तो हैं लेकिन क्या भारत की तरह कायम हैं? क्या ये हिंदोस्तां की तरह कायम हैं? शायद नहीं है। इसीलिए इकबाल ने कहा है कि अगर वे कायम हैं तो भी सिर्फ नाम के लिए कायम हैं। उनकी हस्ती तो मिट चुकी है। उनकी मूल पहचान नष्ट हो चुकी है। इन पुरानी सभ्यताओं को समय ने इतने थपेड़े मारे हैं कि उनका सातत्य भंग हो चुका है।

जिसे कहते है, परंपरा, वह धागा टूट चुका है। परिवर्तन ने परंपरा को परास्त कर दिया है। कुछ देशों ने अपना धर्म बदल लिया कुछ ने अपनी भाषा बदल ली, कुछ ने अपना नाम बदल लिया और कुछ ने अपनी जीवन-पद्धति ही बदल ली। परिवर्तन की आंधी ने परंपरा के परखचे उड़ा दिए। यह ठीक हुआ या गलत, यह एक अलग प्रश्न है लेकिन भारत में ऐसी क्या खूबी है कि परंपरा और परिवर्तन यहां कंधे से कंधे मिलाकर आगे बढ़े जा रहे हैं। उनकी द्वंद्वात्मकता उनके विनाश का पर्याय नहीं बन रही है बल्कि नित्य नूतन सृजन की गर्भ-स्थली बन गई है।

द्वंद्व में से सृजन की निष्पत्ति भारत में लगभग उसी तरह हो रही है, जैसा कि जर्मन दार्शनिक हीगल ने कभी सोचा था। थीसिस और एंटी-थीसिस के टकराव में से सिन्थेसिस निकलता चला जाता है। वाद, प्रतिवाद और संवाद। संवाद याने सम्यक् वाद, समन्वय वाद! यह समन्वय ऐसी प्रक्रिया है, जिसमें मूल सदा वर्तमान रहता है। कभी नष्ट नहीं होता। बीज रूप में रहता है। सूक्ष्म रूप मे रहता है। यदि मूल अशक्त है तो उसे निर्मूल होने में देर नहीं लगती। भारत की मूल पहचान इतनी सशक्त है कि सैकड़ों हमलों के बावजूद वह कायम है। हमलावर यों तो सोने की चिडि़या को लूटने के लिए आते रहे लेकिन उनमें से कुछ को यह बुखार भी चढ़ा कि वे भारत को सभ्य बनाएंगे। उसके धर्म, संस्कृति, भाषा और संपूर्ण जीवन-पद्धति को नए रूप में ढालेंगे। लेकिन हुआ क्या? जो भी भारत में रहे गए, वे भारत के रूप में ढल गए। इकबाल ने गलत नहीं कहा कि भारत के किनारे पर सभ्यताओं के अनेक जहाज आए और डूब गए। आखिर यह हुआ कैसे?

इसका पहला कारण तो मुझे यह सूझता है कि दुनिया की दूसरी सभ्यताएं अभी जब अपने शैशव में भी नहीं पहुंची थी, भारतीय सभ्यता अपने चीर-यौवन में गमक रही थी। यह वही सभ्यता है, जिसे हमलावर हिंदू सभ्यता कहते रहे। जरा हम पीछे मुड़कर देखें तो पाएंगे कि भारत उस समय बेजोड़ था। जब सिकंदर, हूण, अरब, मंगोल, मुगल आदि भारत आए तो जिन देशों से वे आए थे, वे देश वहां थे और उस समय भारत काहं था। यदि सिकंदर के यूनान मे ंचलें तो वह युग प्लेटो और अरस्तू का था। प्लेटो और अरस्तू की रचनाओं- रिपब्लिक और पाॅलिटिक्स- की तुलना जरा करें हमारी उपनिषदों से रामायण और महाभारत से, कालिदास और कौटिल्य की रचनाओं से तो हम किस निष्कर्ष पर पहुंचेंगे? ये तो बहुत बाद की रचनाएं हैं।

ऋग्वेद, षड्दर्शन, जैन और बौद्ध धर्म आदि के मुकाबले की कोई चीज क्या हमें पश्चिम मे दिखाई पड़ती हैं? ये सभ्यताएं, ये समाज, ये राष्ट्र जब विकास की पहली सीढ़ी पर पांव रख रहे थे, तब तक भारत में वर्ण-व्यवस्थामूलक समाज स्थापित हो चुका था, राज्य-व्यवस्थाएं परिपक्व हो चुकी थीं, अर्थ-व्यवस्थाएं अपने चरमोत्कर्ष पर थीं। राज्य, परिवार, व्यक्ति और व्यक्तिगत सम्पदा की संस्थाएं न केवल स्वस्थ रूप से काम कर रही थीं बल्कि उनके पारस्परिक संबंध भी सुपरिभाषित हो चुके थे। जहां तक पहुंचने में पश्चिम को शताब्दियां लग गई, पुनर्जागरण और औद्योगिक क्रांति के दौर से गुजरना पड़ा, हजार साल के अंधकार युग मंे भटकना पड़ा, फ्रांस और रूस की खूनी क्रांतियों के अग्निकुंड में कूदना पड़ा, साम्राज्यवाद के राक्षस को अपने कंधे पर बिठाना पड़ा और विश्व युद्ध की विभिषिकाओं को सहना पड़ा, वहां तक भारत कई हजार साल पहले ही पहुंच चुका था। अब से ढाई-तीन हजार साल पहले के भारत ने जिन विचारों को उछाला था, क्या उनसे बेहतर विचार अभी तक किसी अन्य सभ्यता ने मानवता के सामने प्रस्तुत किए हैं?

भारत में जो भी आया, वह उसके भौगोलिक सौन्दर्य और भौतिक सम्पन्न्ता से तो अभिभूत हुआ ही, बौद्धिक दृष्टि से वह भारत का गुलाम होकर रह गया। वह भारत को क्या दे सकता था? भौतिक भारत को उसने लूटा लेकिन वैचारिक भारत के आगे उसने आत्म-समर्पण कर दिया। ह्वेन-सांग, फाह्यान, इब्न-बतूता, अल-बेरूनी, बर्नियर जैसे असंख्य प्रत्यक्षदर्शियों के विवरण इस सत्य को प्रमाणित करते हैं। जिस देश के हाथों में वेद हों, सांख्य और वैशेषिक दर्शन हो, उपनिषदें हों, त्रिपिटक हो, अर्थशास्त्र हो, अभिज्ञानशाकुंतलम् हो, रामायण और महाभारत हो, उसके आगे बाइबिल और कुरान, मेकबेथ और प्रिन्स, ओरिजिन आॅफ स्पेसीज या दास केपिटल आदि की क्या बिसात है? दूसरे शब्दों में भारत की बौद्धिक क्षमता ने उसकी हस्ती को कायम रखा।

भारत के इस अखंड बौद्धिक आत्मविश्वास ने उसके जठरानल को अत्यंत प्रबल बना दिया। उसकी पाचन शक्ति इतनी प्रबल हो गई कि इस्लाम और ईसाइयत जैसे एकचालकानुवर्तित्ववाले मजहबों को भी भारत आकर उदारमना बनना पड़ा। भारत ने इन अभारतीय धाराओं को आत्मसात कर लिया और इन धाराओं का भी भारतीयकरण हो गया। मैं तो यहां तक कहता हूं कि इस्लाम और ईसाइयत भारत आकर उच्चतर इस्लाम और उच्चतर ईसाइयत में परिणत हो गए। धर्मध्वजियों और धर्मग्रंथों पर आधारित इन मजहबों में कर्मफल और पुनर्जन्म का प्रावधान कहीं नहीं है लेकिन इनके भारतीय संस्करण इन बद्धमूल भारतीय धारणाओं से मुक्त नहीं हैं। भक्ति रस में डूबे भारतीयों के मुकाबले इन मजहबों के अभारतीय अनुयायी काफी फीके दिखाई पड़ते हैं। भारतीय मुसलमान और भारतीय ईसाई दुनिया के किसी भी मुसलमान और ईसाई से बेहतर क्यों दिखाई पड़ता है? इसीलिए कि वह पहले से उत्कृष्ट आध्यात्मिक और उन्नत सांस्कृतिक भूमि पर खड़ा है। यह धरोहर उसके लिए अयत्नसिद्ध है। उसे सेत-मेंत में मिली है। यही भारत का रिक्थ है।


सनातन संस्कृति के कारण इस पावन धरा पर एक अत्यंत दिव्य विद्युत चुम्बकीय क्षेत्र निर्मित हुआ। प्राकृतिक पर्यावरण कठिन तप, ज्ञान, योग, ध्यान, सत्संग, यज्ञ, भजन, कीर्तन, कुम्भ तीर्थ, देवालय और विश्व मंगल के शुभ मानवीय कर्म एवं भावों से निर्मित इस दिव्य इलेक्ट्रो-मैगनेटिक फील्ड से अत्यंत प्रभावकारी विद्युत चुम्बकीय तरंगों का विकिरण जारी है इसी से समग्र भू-मण्डल भारत की ओर आकर्षित होता रहा है और होता रहेगा। भारतीय संस्कृति की यही विकिरण ऊर्जा ही हमारी चिरंतन परम्परा की थाती है। भूगोल, इतिहास और राज्य व्यवस्थाओं की क्षुद्र संकीर्णताओं के इतर प्रत्येक मानव का अभ्युदय और निःश्रेयस ही भारत का अभीष्ट है। साम्राज्य भारत का साध्य नहीं वरन् साधन है। परिणामतः हिन्दू साम्राज्य किसी समाज, देश और पूजा पद्धति को त्रस्त करने में कभी उत्सुक नहीं रहे। यहां तो सृष्टि का कण-कण अपनी पूर्णता और दिव्यता के साथ खिले इसका सतत प्रयत्न किया जाता है। आवश्यकतानुरूप त्यागमय भोग ही अभीष्ट है तभी तो दातुन हेतु भी वृक्ष की एक टहनी तोड़ने के पूर्व हम वृक्ष की प्रार्थना करते हैं और कहते हैं कि-
आयुर्बलं यशो वर्चः
प्रजा
पशु वसूनिच।
ब्रह्म प्रज्ञां च मेधां च
त्ंवनो
देहि वनस्पति।।
(वाधूलस्मृति 35, कात्यायन स्मृति 10-4, विश्वामित्र स्मृति 1-58, नारद पुराण 27-25, देवी भागवत 11-2-38, पद्म पुराण 92-12)

दरअसल भारत का राष्ट्रजीवन सत्यकामी है। उसने पाया कि मनुष्य एक रहस्य है। तमाम आधुनिक वैज्ञानिक खोजों और विचार तथा दर्शन की हजारों व्याख्याओं के बावजूद मनुष्य एक पहेली है। एक अचरज है। एक अचम्भा है।

भारत सत्य का सनातन खोजी बना। सत्य की खोज भारत का स्वभाव बना। इसलिए भारत सिर्फ एक भूखंड ही नहीं है। यह सिर्फ एक सम्प्रभु राज्य भी नहीं है। भारत समूची सृष्टि के रहस्यों को जान लेने की सनातन अभीप्सा है। भारत और सत्य अभीप्सा पर्यायवाची है। भारत और अमृत-प्यास समानार्थी हैं। भारत सनातन यात्रा है। यह यात्रा कब प्रारम्भ हुई? किस जगह प्रारम्भ हुई? कब समाप्त होगी? इन प्रश्नों का कोई उत्तर नहीं दिया जा सकता। इसीलिए भारत के पास आधुनिक शैली वाला इतिहास नहीं है। ‘सनातन’ का कोई इतिहास होता भी नहीं ऐसे प्रश्नों का उत्तर देना जरूरी ही हो तो कह सकते हैं भारत की सनातन यात्रा अनन्त से अनन्त की दिव्ययात्रा है।

भारत विश्व मनुष्यता का स्वर्णिम अतीत है और भारत ही विश्व मनुष्यता का इन्द्रधनुषी सपना भी। भारत उदास होता है तो विश्व मनुष्यता का कोई भविष्य नहीं है। भारत के भाग्य के साथ समूची विश्व मानवता का भाग्य नत्थी है। समूची पृथ्वी पर र्सिु भारत ने अपनी समूची जीवन ऊर्जा को सत्य की खोज से जोड़ा। भारत ने पूरी विनम्रता और आत्यंतिक निरंहकारिता के साथ विश्व कल्याण की खातिर ही अपना सर्वस्व लुटाया। हमारे पूर्वजों ने भौतिक समृद्धि की परवाह नहीं की। उन्हांेंने भूख और नींद जैसी अतिआवश्यक जैविक जरूरतों को भी नजरंदाज करते हुए ज्ञान, भक्ति, योग, तंत्र और ध्यान जैसे आंतरिक संसाधनों का विकास किया। इस देश ने विश्वमानवता के ज्ञात इतिहास में कोई 10-12 हजार वर्ष की सत्यखोजी तप साधना चलाई है।

भारत एक देश है और सभी भारतीय जन एक है, परन्तु हमारा यह विश्वास है कि भारत के एकत्व का आधार उसकी युगों पुरानी अपनी संस्कृति में निहित है।

अनादिकाल से भारत में वैचारिक स्वतंत्रता प्रत्येक मनुष्य को प्राप्त रही है। प्राचीनकाल से ऋषियों, मनीषियों द्वारा समग्र जीवन दाव पर लगाकर भी अप्रतिम जीवन रहस्य खोजे गये। आत्मा और परमात्मा के गूढ़तर सम्बंध के इस सत्य साधकों ने कभी भी अंतिम सत्य प्राप्त कर लेने का दावा नहीं किया। अपना अंतिम अभुभव बताने के पश्चात् भी वे ऋषिगण ‘नेति-नेति’ कहकर अपने आगत पीढि़यों को पर्याप्त अवसर उपलब्ध कराते थे। ‘‘नेति- (ऩइति, यह अंतिम नहीं है) नेति’’ वालों ने यह उद्घोष कर दिया था कि ‘‘आत्म दीपोभव’’ (उपनिषद वाक्य) अर्थात् स्वयम् का ज्ञानदीप प्रज्जवलित करो। इसी मौलिक विचार सूत्र से अनुप्राणित होकर महात्मा बुद्ध ने भी कहा था कि ‘‘किसी सत्य को इसलिए मत मान लो कि किसी बड़ी पुस्तक में लिखा है या इसलिए भी मत मान लो कि किसी अत्यंत प्रभावशाली व्यक्ति ने कहा है अपितु, उस विचार को अपनी प्रज्ञा की कसौटी पर देखो और यदि सत्य लगे तो ही स्वीकार करना। उपर्युक्त श्रुति को ही उन्होंने पालि भाषा में ‘‘अप्प दीपो भव’’ कहा था। इस प्रकार प्रत्येक मनुष्य के आत्मविकास की अन्यतम सम्भावनाओं के खिलने का अवसर उपलब्ध कराना भारतीय धर्म का वैचारिक पद्धति रही है।

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