Monday, August 31, 2026

बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ : सक्षम होंगी बेटियां


जिस देश में नारी को देवी का रूप मानकर उसकी पूजा की जाती है, उस देश में कन्याओं के प्रति घृणा की मानसिकता का पैदा होना तुच्छ कहा जाएगा। अधिकतर माता-पिता अपनी संतान के रूप में पुत्र की कामना करते हैं। पुत्र की अभिलाषा में वे अवैध रूप से भ्रूण की जांच कराते हैं। सरकार की पाबंदी के बाद भी चोरी-छिपे लिंग जांच का कार्य चल रहा है। भ्रूण के कन्या होने पर लोग गर्भपात करा देते हैं। इसी कारण देश में लड़कियों का अनुपात निरंतर कम हो रहा है। वर्ष 2001 में की गई गणना के अनुसार प्रति 1000 लड़को में 927 लड़कियां थीं। इसके एक दशक बाद यह आंकड़ा गिरकर वर्ष 2011 में 918 हो गया। 

कन्या भ्रूण हत्या को रोकने के लिए केंद्र सरकार बेटी बचाओं बेटी पढ़ाओ योजना चला रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 22 जनवरी, 2015 को हरियाणा के पानीपत में यह योजना प्रारंभ की थी। इस योजना का उद्देश्य कन्या भ्रूणहत्या को रोकना और बेटियों को सुरक्षा प्रदान करना है। वित्तमंत्री अरुण जेटली ने अपने बजट में बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ योजना के लिए 100 करोड़ की प्रारंभिक राशि की घोषणा की थी। सरकार महिलाओं की सुरक्षा के लिए विशेष कार्य करने पर बल दे रही है। इसके लिए 50 करोड़ रुपये का फंड दिया जाएगा,  जिससे मुख्यतः महिलाओं के लिए सार्वजनिक परिवहन की सुविधा दी जाएगी। एक बटन के माध्यम से संदेश आवाज के साथ ही चित्र के माध्यम से सुरक्षा के लिए सहायता मांगने की सुविधा दी जाएगी। यदि कोई दुर्घटना हो गई है, तो इस स्थिति में उचित कार्यवाही के लिए संकट प्रबंधन केंद्र की सुविधा दी जाएगी। इस योजना के प्रति लोगों को जागरूक करने के लिए कई विज्ञापन, स्लोगन एवं पोस्टर बनाए गए हैं। 

बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ के अंतर्गत कई कार्यक्रम हैं। सुकन्या समृद्धि योजना इसकी सबसे महत्वपूर्ण योजना है। इसके अंतर्गत 10 वर्ष से कम उम्र की कन्याओं के लिए एक बैंक खाता खोला जाता है। कन्या की आयु कम होने के कारण इस खाते की देखरेख उसके माता-पिता द्वारा की जाएगी। इस खाते पर 9।1 वार्षिक चक्रवर्ती ब्याज दिया जाएगा।  यह दर बढ़ाई भी जा सकती है। सुकन्या समृद्धि खाता खोलने के लिए कई प्रमाण-पत्रों की आवश्यकता होती है, जिनमें बेटी का जन्म प्रमाण पत्र, माता-पिता या अन्य संरक्षक का पते का प्रमाण पत्र और परिचय पत्र आदि सम्मिलित हैं।

सुकन्या समृद्धि खाते को खोलने के लिए इसमें 1000 रुपये की न्यूनतम राशि ली जाएगी, जो खाते में ही जमा होगी। प्रति वर्ष इसमें न्यूनतम 100 रुपये जमा करना अनिवार्य हैं, अन्यथा इसे बंद कर दिया जाएगा।  इसकी अधिकतम 150000 प्रति वर्ष की राशि तय की गई हैं। इस खाते के शुरू होने की तारीख से 14 वर्ष तक इसमें राशि जमा की जा सकती हैं। अतः 15 से 21 वर्ष तक इस खाते मे अन्य राशि जमा नहीं की जा सकती। लड़की की आयु 18 वर्ष हो जाने पर इस खाते से 50 प्रतिशत की राशि उसकी पढ़ाई एवं विवाह के लिए निकाली जा सकती हैं। सुकन्या समृद्धि खाते की आयु उसे खोलने वाली तारीख से 21 वर्ष तय की गई है, जिसे 14 वर्ष तक इस खाते में रुपये जमा करने की सुविधा दी गई है। 21 वर्ष की अवधि के बाद इस खाते से धनराशि प्राप्त होगी।

केंद्रीय वित्त एवं कॉरपोरेट मामलों के मंत्री अरुण जेटली ने 29, जनवरी,  2018 को संसद के पटल पर आर्थिक सर्वेक्षण 2017-18 प्रस्तुत करते हुए बताया था कि पिछले 10 से 15 वर्षों में महिलाओं की क्षमता का दृष्टिकोण और परिणामों के संबंध में 17 में से 14 संकेतकों पर भारत का प्रदर्शन बेहतर रहा है। इनमें से 7 संकतकों में सुधार कुछ ऐसा रहा है कि भारत की स्थिति विकास के स्तरों को मापने के बाद अनेक देशों में सामान दिखाई देती है। अच्छी बात यह है कि महिलाओं से जुड़े परिणाम समानभिरूपता का पैटर्न दर्शाते हैं, जो समान अवसर के देशों के मुकाबले भारत में काफी हद तक समृद्धि बढ़ने के साथ-साथ इतने बेहतर होते जाते हैं कि जन पहलुओं पर यह पिछड़ भी रहे हैं, वहां समय के साथ इनके और आगे बढ़ने की उम्मीद बढ़ती जाती है। दूसरे संकेतकों मुख्यतः रोजगार और परिवर्तनीय गर्भनिरोध के प्रयोग और पुत्र की चाह के संबंध में, भारत को अभी कुछ दूरी और तय करनी है क्योंकि विकास इन समस्याओं का समाधान नहीं बन पाया है। भारत के भीतर ही काफी विविधता दिखाई देती है। जहां पूर्वोत्तर के राज्यों में ने अन्य राज्यों के मुकाबले लगातार बेहतर प्रदर्शन किया है और वह इसलिए नहीं हुआ कि वे समृद्ध है;  भीतरी राज्य इस मामले में पिछड़ गए हैं। हालांकि हैरानी की बात यह है कि दक्षिणी राज्य अपने विकास स्तरों की तुलना में इतना अच्छा प्रदर्शन नहीं कर रहे हैं। महिला पुरूष भेदभाव की चुनौती लंबे समय से, शायद सदियों से चली आ रही है। इसीलिए सभी पक्ष समग्र रूप से इसके समाधान के लिए जिम्मेदार है। भारत को पुत्र के लिए, यहां तक कि अधिक पुत्रों के लिए समाज की इस प्रबल चाह पर विचार करना चाहिए, जो विकास से अप्रभावित दिखाई देती है। महिलाओं और पुरुषों में प्रतिकूल लिंग अनुपात के कारण ‘गुमशुदा’ महिलाओं की समस्याओं की पहचान हो पाई है। लेकिन अधिक पुत्रों की चाह जनन क्षमता रोकने के नियमों में भी प्रतिबिंबित हो सकती है, जो अंतिम संतान के लिए लिंग पर आधारित हो और जो संभवतः ‘अवांछित’ कन्याओं के वर्गों को जन्म देती है- ऐसी कन्याओं की संख्या 21 मिलियन के लगभग आंकी गई है। समाज का यह उद्देश्य होना चाहिए कि यह घृणित श्रेणियां निकट भविष्य में इतिहास बन जाए। सरकार की बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ, सुकन्या समृद्धि योजना और अनिवार्य मातृत्व अवकाश नियमावली सही दिशा में उठाया गया कदम है।

निसंदेह, केन्द्र सरकार की बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ योजना से बेटियां सक्षम होंगी। वे अच्छी शिक्षा प्राप्त कर पाएंगी और उनके विवाह के लिए धन की भी कोई समस्या नहीं होगी।



(डॉ सौरभ मालवीय की पुस्तक- 'विकास के पथ पर भारत' से)

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