नई दिल्ली में 26 नवंबर, 1998 को आयोजित समारोह में श्री अटल बिहारी वाजपेयी को ’सत्यनिष्ठ व्यक्ति पुरस्कार’ से सम्मानित किया गया. इस अवसर पर समारोह को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा- मैं बड़े धर्मसंकट में हूं, जब इस पुरस्कार से मुझे सम्मानित किया जाना था, तब मैं प्रतिपक्ष में था. इसीलिए मैंने पुरस्कार स्वीकार भी कर लिया. लेकिन आज प्रधानमंत्री के नाते मुझे पुरस्कार ग्रहण करते हुए बड़ा संकोच हो रहा है. एक तो प्रधानमंत्री पुरस्कार ग्रहण करे, इसके औचित्य का सवाल उठाया जाता है. किस पुरस्कार को ले, किसको छोड़े ? लें तो उसकी कसौटी क्या हो, न लें तो किस आधार पर मना करें. यह श्रृंखला शुरू हो जाएगी, जो कठिनाइयां पैदा करेगी.
दूसरी बात यह है कि ऐसे अवसरों पर जिसे पुरस्कार दिया जाना है और मैंने जब जूरी के नाम देखे- उसी समय देखे थे, तो यह भी एक कारण था कि मैं पुरस्कार लेने के लिए तैयार हो गया. लेकिन पुरस्कार समारोह में दिए जाते हैं, अभिनंदन का आयोजन होता है, मानपत्र प्रस्तुत किया जाता है- यहां तो कविता भी पढ़ी गई- और सब में प्रशंसा के इतने पुल बांधे जाते हैं, अतिश्योक्ति अलंकार का इतनी प्रचुर मात्रा में प्रयोग किया जाता है कि सुनकर बड़ा संकोच होता है. गनीमत है कि यह एक वर्ष के निष्ठा पुरुष के लिए है. मेरा वह एक वर्ष बीत गया. लेकिन मैं जानता हूं, वह बीता नहीं है, इस पुरस्कार को मैं बड़े विनम्र भाव से ग्रहण कर रहा हूं. मेरा प्रयास रहा है, आगे भी रहेगा कि मैं लोगों की आशाओं और आकांक्षाओं के अनुरूप खरा उतर सकूं.
इस देश में भौतिक संपदा पर्याप्त है. प्रकृति बड़ी उदार है, पांच हजार साल, छह हजार साल की हमारी संस्कृति है. लेकिन अगर हम आज भी अपनी संभावनाओं के अनुरूप, अपनी क्षमताओं के अनुरूप आगे नहीं बढ़ पा रहे हैं, तो उसका एक कारण यह भी है कि जो चोटी के लोग हैं, वे आम आदमी के सामने अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत नहीं कर पा रहे हैं. पुरानी कहावत है कि धरती टिकी है पुण्यात्माओं के बल पर. कुछ दुष्कर्म तो यहां होते रहे हैं. आज भी हमारे देश में ऐसे लोगों की संख्या ज्यादा है, जो प्रामाणिक हैं, ईमानदार हैं, मेहनत करके रोटी कमाते हैं, बांटकर खाते हैं, हमारी सारी परिवार प्रणाली, कौटुम्बिक पद्धति इसी पर टिकी हुई है. हराम की कमाई को हमारे यहां बहुत बुरा समझा जाता था. ईमानदारी की बड़ी प्रशंसा होती थी. ईमानदारी की बड़ी कद्र थी. वक्त बदला है. लेकिन मूल्यों में होने वाली गिरावट को हमें रोकना है. इसके लिए अनेक उपाय करने होंगे. शासन पद्धति में, प्रणाली में सुधार लाना होगा. सार्वजनिक जीवन को शुद्ध करना होगा. अपराधियों और राजनेताओं की बढ़ती हुई सांठ-गांठ को तोड़ना होगा. और सबसे बड़ी बात यह है कि देश में एक ऐसा वातावरण बनाना होगा, एक ऐसी हवा बनानी होगी कि जिसमें आदमी को काम करने के लिए, ईमानदारी से काम करने के लिए प्रोत्साहन मिले. आज ऐसा नहीं है, आठ महीने में मैंने बहुत सी ऐसी बातें सीखी हैं, उनमें कुछ अच्छी बातें भी हैं. लेकिन कभी-कभी ऐसी तस्वीर उपस्थित हो जाती है कि देखकर बड़ा दुख होता है.
यदि कोई अधिकारी मेरे इस सवाल के जवाब में कि तुम ठीक तरह से काम क्यों नहीं कर पा रहे, वह मुझसे यह कहे कि साहब, मुझे ठीक तरह से काम करने नहीं दिया जाता. मैं ईमानदार हूं और इसलिए जहां हूं, वहां न रहूं, कहीं और चला जाऊं. ये मेरे संगी-साथी मेरे ऊपर दबाव डालते रहते हैं. मैं नहीं जानता, यह कहां तक ठीक है कि कुछ कठोर कदम उठाने की आज जरूरत है. लोकतंत्र है, लोकतंत्र एक नैतिक व्यवस्था है, मात्र शासन चलाने का ढंग नहीं है. हर बालिग को वोट का अधिकार क्यों ? वोट का अधिकार बराबर क्यों ? विभिन्नताएं हैं, विषमताएं हैं. लेकिन सबमें एक ही परम तत्व है, एक ही ईश्वर विद्यमान है और इसीलिए सब बराबर हैं. इसीलिए मानवाधिकारों की सार्थकता है.
आज भी सिर पर मैला ढोने वाली बहनों को देखकर अंत:करण में पीड़ा क्यों होती है ? क्योंकि भीतर बैठा हुआ चैतन्य कचोटता है. पीड़ा संवेदना जगाती है. संवेदना मर न जाए यह खतरा पैदा होता है कभी-कभी, डर लगता है. क्योंकि इस देश में ऐसा होगा नहीं. हम भले ही वैसा करने की काफी कोशिश करें. लेकिन इस देश की पुण्याई है. और जैसा कि मैंने कहा कि करोड़ों लोग लगे हुए हैं इस काम में, ईमानदारी से अपना काम करने के लिए, पड़ोसी की मदद करने के लिए. खुद नदी में डूबकर, डूबने वाले को बचाने के लिए. क्या आवश्यकता है ? आदमी डूबता है, डूबने दो. मैं अपनी जान खतरे में क्यों डालूं ? लेकिन अंतर्यामी बैठा हुआ है. उसको चुप बैठने नहीं देता. वह छलांग लगाता है. कभी-कभी तो ऐसा होता है कि डूबने वाले को बचा लाता है, लेकिन खुद डूब जाता है. यह केवल भौतिकता के आधार पर नहीं है. इसमें कहीं नैतिकता है, आध्यात्मिकता है- अगर कोई आपत्ति न करे, तो देश में ईमानदारी का, प्रामाणिकता का वातावरण बनाने के लिए भी उसी भाव को जगाने की जरूरत है.
आखिर मनुष्य को कितना धन चाहिए, कितना पैसा चाहिए ? मैं जब कुछ आंकड़े सुनता हूं, तो आश्चर्यचकित हो जाता हूं. लोग कितना धन कमाना चाहते हैं ? वैध और अवैध, दो सवाल हैं. अवैध तरीकों से ज्यादा कमा सकते हैं. लेकिन कितना धन चाहिए आदमी को ? कोई सीमा नहीं, कोई मर्यादा नहीं. लाभ की, लोभ की कोई सीमा होनी चाहिए. इसकी कोई मर्यादा होनी चाहिए और यह मर्यादा मन को बांधनी पड़ेगी. कानून अपनी जगह है. कानून और भी कड़ा किया जा सकता है. उसको प्रभावी बनाने की भी कोशिश की जा रही है. लेकिन सारे देश में एक नैतिक पुनर्जागरण की आवश्यकता है.
सुलभ इंटरनेशनल अपने ढंग से बहुत अच्छा काम कर रहा है. संसद सदस्य के नाते अपने चुनाव क्षेत्र के लिए मुझे जो एक करोड़ रुपया मिला था, उसका मैं सबसे अच्छी तरह से विनियोग कैसे करूं, जब यह प्रश्न लखनऊ में पैदा हुआ तो अनेक संस्थाएं और सरकारी संस्थाएं भी थीं. लेकिन सबकी नजर गई- सुलभ इंटरनेशनल पर. उनको जो काम सौंपा जाएगा, वे ठीक करेंगे. और बाद में हमने काम की देखभाल के लिए लोग लगाए थे, कार्यकर्ता खड़े किए थे. सीमेंट में रेत ज्यादा न हो, ईंट अच्छी हो. इंजीनियर प्रामाणिकता से काम करें. और इन कसौटियों पर सुलभ इंटरनेशनल खरा उतरता है. यदि कहीं कार्यकर्ता को लगा कि काम ठीक नहीं हो रहा है, तो तत्काल इनके प्रबंधकों को जाकर बताए. और फिर उसको जल्दी से ठीक करें. अन्यथा ठेकेदार काम करते हैं. कैसा करते हैं- उसकी ज्यादा चर्चा न करना ही अच्छा है. सड़क बनती है, एक बरसात के बाद सड़क फिर बनाने की जरूरत पड़ती है. ऐसा क्यों होता है ?
पारदर्शी प्रामाणिकता, इस देश की मुक्ति के अनेक उपायों में एक है- पारदर्शी प्रामाणिकता. दिखाई देना चाहिए. कोई अवगुंठन नहीं, कोई प्रच्छन्नता नहीं. लोगों को जानने का हक होना चाहिए, क्या हो रहा है. और जो शीर्ष स्थानों पर बैठे हैं, उनकी चादर साफ होनी चाहिए. मैं आभारी हूं, मुझे एक वर्ष के लिए चुना गया. मैं पुरस्कार की राशि स्वीकार नहीं करूंगा. मैं पुरस्कार सुलभ इंटरनेशनल को वापस कर रहा हूं. इस पुरस्कार का उपयोग वे जैसा चाहें, करें, करें और मुझे भरोसा है कि वे अच्छा ही उपयोग करेंगे. मेरे बारे में जो भावनाएं व्यक्त की गई हैं, मैं उनके अनुरूप आगे आने वाले जीवन को जीने का प्रयास करूंगा. परमात्मा मुझे यह शक्ति दे. आप सब मुझे सहयोग दें, आशीर्वाद दें.
-डॉ. सौरभ मालवीय
(पुस्तक- 'राष्ट्रवादी पत्रकारिता के शिखर पुरुष अटल बिहारी वाजपेयी' से)


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