Friday, July 17, 2026

यह लोकतंत्र का युग है

   


नई दिल्ली में 17 अगस्त, 1994 को श्री अटल बिहारी वाजपेयी को सर्वश्रेष्ठ सांसद के सम्मान से सम्मानित गया. इस अवसर पर उन्होंने कहा कि मेरी समझ में नहीं आता कि मैं क्या कहूं. प्रसंग ही ऐसा है. कुछ कहना भी मुश्किल है, लेकिन बिना कहे रहना भी मुश्किल है. औरों के सम्मान समारोहों में बोलना सरल है, अपने कार्यक्रम में शब्दों को ढूंढना भी कठिन है. मैं आभारी हूं उप राष्ट्रपति महोदय आपका, प्रधानमंत्री जी का, लोकसभा अध्यक्ष का, निर्णायकों का, पंडित गोविंद वल्लभ पंत समारोह ट्रस्ट का, जिन्होंने मुझे इस सम्मान के लिए चुना है.

मैं अपनी सीमाओं से परिचित हूं. मुझे अपनी कमियों का अहसास है. निर्णायकों ने अवश्य ही मेरी न्यूनताओं को नजरअंदाज करके मुझे निर्वाचित किया है. सदभाव में अभाव दिखाई नहीं देता है. यह देश बड़ा अदभुत है, बड़ा अनूठा है. किसी भी पत्थर को सिंदूर लगाकर अभिवादन किया जा सकता है, अभिनंदन किया जा सकता है. 

गत वर्ष यह सम्मान मेरे मित्र वरिष्ठ सांसद कामरेड इंद्रजीत जी गुप्त को दिया गया था. वे सब दृष्टियों से सम्मान के अधिकारी थे. मेरे बारे में यह बात नहीं कही जा सकती. अब उनके बाद मुझे सम्मान दिया जा रहा है. मुझे डर है कि कोई यह न समझे कि मैं उनके पीछे पड़ गया हूं.

स्वनामधन्य पंडित गोविंद वल्लभ पंत को मैंने निकट से देखा था. उनके संपर्क में आने का मुझे सौभाग्य मिला था, पहले लखनऊ में, फिर दिल्ली में. जब वे आधुनिक उत्तर प्रदेश के शिल्प का गठन कर रहे थे, तो मैं उनके शब्द-चित्रों का गठन किया करता था. उनका जैसा व्यक्तित्व था, वैसा ही कीर्तिमान स्थापित करने वाला कर्तृत्व था. उनका प्रकांड पांडित्य, उनकी वाग्मयी संसदपटुता, जिन गुणों का उल्लेख अध्यक्ष महोदय ने किया, व्यक्ति और घटना का सही मूल्यांकन करने की उनकी क्षमता, पैनी और दूर-दृष्टि परस्पर विरोधी विचारों में समन्वय, सामंजस्य स्थापित करने की वृत्ति, स्वाधीनता के समर में और पुनर्निमाण के यज्ञ में ’उनकी भूमिका सदैव स्मरण की जाएगी. उनके नाम से जुड़े हुए इस पुरस्कार को पाकर मैं अपने को गौरान्वित समझता हूं. 

जब पंत जी केंद्र में आए, मैं संसद का सदस्य था, कभी राज्यसभा में और कभी लोकसभा में. वह काल बड़ा कठिन काल था, जब राज्यों के पुनर्गठन की विस्फोटक स्थिति थी, भाषा का विवाद खड़ा हो गया था. लेकिन पंत जी ने अपनी कुशलता, चतुरता और नीतिमत्ता से समस्याओं का समाधान किया. अगर मैं गलत नहीं हूं, तो जम्मू-कश्मीर के प्रश्न पर लोगों की राय लेने का प्रस्ताव रखने के कारण, हम जिस भंवर में फंस गए थे, उस भंवर में से अगर किसी ने दृढ़ता के साथ भारत को निकाला तो पंडित गोविंद वल्लभ पंत ने निकाला. उन्होंने स्पष्ट शब्दों में घोषणा की कि कश्मीर की जनता की राय ली जा चुकी है. उसकी जनता ने भारत में मिलने का फैसला किया है. इसलिए फिर से जनमत संग्रह की बात ही नहीं उठती है. पाकिस्तान ने प्रस्ताव नहीं माने और वक्त पाकिस्तान के लिए रुका नहीं रहेगा, कालचक्र थमा नहीं रहेगा.

जब मैं पहली बार 1957 में लोकसभा सदस्य बना, तो उस समय पंडित जवाहरलाल नेहरू प्रधानमंत्री थे. वे सदन के नेता भी थे. नियमित रूप से बैठकों में भाग लेते, उपस्थित रहते, चर्चा में योगदान देते, आवश्यकता होने पर हस्तक्षेप करते, प्रतिपक्ष का ध्यान रखते. स्पीकर को पूरा आदर करते. उनकी उपस्थिति मात्र से सदन की गरिमा बढ़ती थी. सब लोग रचनात्मक भूमिका निभाने के लिए प्रोत्साहित होते थे, प्रेरित होते थे. उस समय का एक प्रसंग मुझे याद है. मेरी स्मृति के आकाश में वह प्रसंग बिजली की तरह कौंध जाता है. पंडित जी के एक विश्वस्त सहायक थे श्री एम. ओ. मथाई. उन्होंने कुछ संसद सदस्यों के कुछ आचरण पर टिप्पणी की थी. स्वाभाविक है कि यह मामला सदन में उठाया जाता. सदन में सभी पक्षों ने इस पर आपत्ति की. विशेषाधिकार के उल्लंघन के प्रस्ताव दिए गए. सदन की अवमानना का मामला उठाया गया. मेरे प्रस्ताव को स्पीकर ने स्वीकार कर लिया. नेहरू जी सदन में थे. उन्होंने कहा, ’अध्यक्ष महोदय, यह विशेषाधिकार का मामला मालूम नहीं होता. यह एक इम्प्रोपरायटी है, अनौचित्य है, इस पहलू पर भी विचार कर लिया जाए.’  लेकिन सदन तैयार नहीं था. प्रतिपक्ष को भी यह बात पसंद नहीं आई. नेहरू जी ने सदन का मूड देखा, प्रतिपक्ष का तेवर देखा.  नेहरू जी ने इस सुझाव को मान लिया कि सारा मामला विशेषाधिकार समिति को सौंप दिया जाए. उस समय पंडित नेहरू ने जो कुछ कहा था, मैं उसे उदधृत कर रहा हूं-

’जब सदन का एक महत्वपूर्ण सदस्य यह महसूस कर रहा हो कि कुछ न कुछ किया जाना चाहिए, तब बहुमत के लिए यह कतई उचित नहीं है कि सदन की इच्छा को दरकिनार कर दिया जाए. मेरे विचार से इस मामले को ताक पर रख देने का सुझाव उचित नहीं होगा, क्योंकि इससे यह साफ झलकेगा कि मामले को किसी न किसी प्रकार दबाने का अथवा तथ्यों को छुपाने का प्रयास किया गया है. यह अच्छी बात नहीं होगी कि इस प्रकार की भावना उत्पन्न की जाए.’

लोकतंत्र 51 और 49 का खेल नहीं है. लोकतंत्र मूल रूप में एक नैतिक व्यवस्था है. सदन या संसद यानी कानून की छोटी सी कचहरी नहीं है, जहां शब्दों की चीर-फाड़ की जाए. यह एक राजनीतिक मंच है. राजनीतिक शब्द का प्रयोग मैं संकुचित रूप में नहीं कर रहा हूं, बल्कि विराट अर्थ में कर रहा हूं, जिस मंच पर देश की 90 करोड़  जनता की आशाएं, अपेक्षाएं और कुंठाएं भी प्रतिबिम्बित होनी चाहिए, प्रतिध्वनि होनी चाहिए.

संविधान और कानून सबका अपना महत्व है, लेकिन अगर लोकतंत्र एक ढांचा मात्र बनकर रह जाए, एक कर्मकांड में बदल जाए, उसकी प्राणशक्ति घटती जाए, तो वहां कठिनाई पैदा हो जाती है. उस प्राणशक्ति को घटने न देना, यह हम सबकी जिम्मेदारी है. 

अभी दो दिन पहले हमने स्वतंत्रता की वर्षगांठ मनाई. हमने स्वतंत्रता को अक्षुण्ण रखने की शपथ ली. हम देश को समृद्धि की ओर ले जाना चाहते हैं. बाहर की चुनौतियों का हम मिलकर सामना करते हैं, लेकिन घर के भीतर लोकतांत्रिक संस्थाओं का अवमूल्यन न होने पाए, उनका क्षरण न होने पाए, इसकी देखभाल की जरूरत है. जन प्रतिनिधियों की साख घटनी नहीं चाहिए. जन प्रतिनिधि संस्थाओं की विश्वसनीयता में कमी नहीं आनी चाहिए. हमारे लोकतंत्र का पौधा मजबूत है, लेकिन ऐसा न हो कि वह ऊपर-ऊपर तो बढ़ता जाए, पर उसकी जड़ें खोखली होती जाएं. यही कर्तव्य हमारे सामने है.

मैं आप सबको एक बार फिर हृदय से धन्यवाद देता हूं. प्रधानमंत्री के हाथों आज मैंने पुरस्कार स्वीकार किया है, इस पर जरूर टीका-टिप्पणी होगी. अब उससे बचा नहीं जा सकता, लेकिन मुझे याद है, जब पहली बार संसद आया, तो बोलने के लिए समय नहीं मिल पाता था. पीछे की बेंचों पर बैठता था. एक बार नेहरू जी द्वारा सदन में लाए गए विदेश नीति संबंधी प्रस्ताव पर बोलना चाहता था, वे प्रतिवर्ष प्रस्ताव लाते थे, लेकिन स्पीकर साहब ने कहा कि समय नहीं है, आपकी पार्टी बहुत छोटी है, आपको मौन धारण करना चाहिए. इसके विरोध में मैं वाक-आउट कर गया. वाक-आउट का सिलसिला अभी भी चल रहा है. यह बात अलग है कि इस बार ज्यादा लंबा हो गया है. लेकिन वाक-आउट एक लोकतांत्रिक तरीका है, संसदीय आचरण का हिस्सा है. अब हम भीतर जाकर सदन की कार्रवाई में विघ्न डालें, उससे तो अच्छा है कि बाहर ही रहें. यह बात अलग है कि ज्यादा दिन बाहर नहीं रहना चाहिए, लेकिन कभी-कभी असहयोग करना आवश्यक हो जाता है. असहयोग का रास्ता गांधी जी ने दिखाया था. उस पर चलने में कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए, लेकिन वह रास्ता संसद में जाकर समाप्त होना चाहिए.

यह लोकतंत्र का युग है. आज सारे संसार में एक लहर आई है. भारत संसार का सबसे बड़ा लोकतंत्र है. दुनिया हमारी तरफ देख रही है. परीक्षा की इस घड़ी में विफल होने की गलती हम नहीं कर सकते. 

एक बार फिर मैं हृदय से आभार प्रकट करता हूं और मैं प्रयत्न करूंगा कि इस सम्मान के लायक अपने आचरण को बनाए रख सकूं. जब कभी मेरे पैर डगमगाएं, तो ’पंत सम्मान’ मुझे चेतावनी देता रहे, मुझे बताता रहे कि इस रास्ते पर डांवाडोल होने की गलती मैं न करूं.
-डॉ. सौरभ मालवीय

(पुस्तक- 'राष्ट्रवादी पत्रकारिता के शिखर पुरुष अटल बिहारी वाजपेयी' से)

No comments:

Post a Comment

यह लोकतंत्र का युग है

    नई दिल्ली में 17 अगस्त, 1994 को श्री अटल बिहारी वाजपेयी को सर्वश्रेष्ठ सांसद के सम्मान से सम्मानित गया. इस अवसर पर उन्होंने कहा कि मेरी ...