Monday, July 13, 2026

संगीत में बड़ी शक्ति है

   


महाराष्ट्र के पुणे में 7 जनवरी, 2003 को सवाई गंधर्व स्मारक के उदघाटन समारोह को संबोधित करते हुए श्री अटल बिहारी वाजपेयी ने संगीत के महत्व और इसकी परंपरा पर प्रकाश डाला. अपने संबोधन में उन्होंने कहा कि गत सितंबर माह में जब मुझे डॊक्टर जोशी ने- पंडित भीमसेन जोशी ने यहां आने का निमंत्रण दिया, तो उसमें, दिसंबर की तारीख दी हुई थी. मैंने कहा कि आपको भरोसा है कि मैं दिसंबर तक प्रधानमंत्री रहने वाला हूं, तो मैं निमंत्रण जरूर स्वीकार करूंगा, लेकिन अगर मान लीजिए मैं नहीं रहा, भारतीय राजनीति का कोई भरोसा नहीं- चलायमान है, दोलायमान हो सकती है, क्यों विलासराव जी ? तो कठिनाई हो सकती है. अगर मैं प्रधानमंत्री न रहा, क्या तब भी आप मुझे बुलाएंगे ? ऐसे प्रसंगों की मुझे याद है कि दिए गए निमंत्रण वापस ले लिए जाते हैं. पंडित भीमसेन जोशी ने कहा, "अगर आप प्रधानमंत्री न रहे, तो भी मैं आपको बुलाऊंगा." तो हो सकता है कि उनके आशीर्वाद के कारण ही मैं प्रधानमंत्री बना हुआ हूं. पर मैंने सोचा कि शायद मुझे बुलाने का कारण ये भी है कि मैं ग्वालियर का हूं. ग्वालियर संगीत का गढ़ रहा है. भीमसेन जोशी जी ने भी ग्वालियर से शिक्षा प्राप्त की. किन परिस्थितियों में की थी, वह वर्णन रोमांचक है. लेकिन संगीत की साधना करनी थी, इसलिए कष्ट झेल कर उन्होंने संगीत साधना को पूरा किया. किराना घराने का उल्लेख होता है. ग्वालियर उसकी नींव जाना जाता है. मैंने सोचा कि शायद मैंने ग्वालियर में जन्म लिया है, शायद इसलिए पंडित जी मुझे बुला रहे हैं. ग्वालियर वाले ऐसा समझते हैं कि अगर बच्चा भी पैदा होता है, तो वह भी रोना, गाने से ही शुरू करता है.

पचास साल की संगीत साधना की यह परंपरा है. महोत्सव की आधी शती. अगर मैं गलत नहीं हूं, तो सवाई गंधर्व महोत्सव का आयोजन 1953 में शुरू हुआ था.  यह एक महान शिष्य द्वारा एक महान गुरु का स्मरण है. गुरु-शिष्य परंपरा हमारे संगीत का आधार है. क्या गुरुकुल परंपरा के अनुसार संगीत चलता है ? गुरु-शिष्य परंपरा के अनुसार भीमसेन जी जोशी लगातार इस महोत्सव का आयोजन करते रहे, और आज जब ये भव्य भवन बनकर तैयार है, तो मैं कहना चाहूंगा, आज मानो शिष्य ने अपने गुरु को गुरु दक्षिणा दे दी है इस भवन को बनाकर.  संगीत में बड़ी शक्ति है. जोड़ने की शक्ति. भाषा भेद भी बीच में नहीं आता. संगीत पंथ निरपेक्ष है. देश के सभी क्षेत्रों में इसका प्रभाव है और उसमें सदैव कुछ होने की क्षमता है. पंडित भीमसेन जी जोशी जैसे संगीतज्ञ आज हमारे बीच में हैं और अपनी परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं, ये बड़ी प्रसन्नता की बात है. मैं यही सोचता रहा हूं कि कार्यक्रम दोपहर में क्यों आयोजित किया गया ? दोपहर का संबंध संगीत से कम है. संगीत के लिए तो चांदनी चाहिए. लेकिन शायद कोई मजबूरी रही होगी और मुझे डर है कि मेरी वजह से यह न हो रहा हो. आते-जाते जब मैं देखता हूं, सड़क पर लोगों को चलने से रोका जाता है, तो मुझे अच्छा नहीं लगता. लेकिन आज शायद इसीलिए इस कार्यक्रम को दोपहर में रखा गया है. भारतीय संगीत को नई चुनौती से डरना नहीं है. देश के जीवन का चक्र बार-बार बदलता रहता है. और फिर एक पहलू को देखकर ऐसा लगता है, जो कुछ हुआ या होने वाला है, वह फिर बड़ी शक्ति के साथ उभरकर आता है. तो यह प्राणवान होता है, सभी को खुशी होती है. और साधना का परिणाम मिलता है.  उसके मूल में अर्थ की भावना नहीं होती. भावना होती है, तो धर्म की. जो स्थायी होता है. डॊक्टर पंडित जोशी जी हमारे बीच में हैं, हम उनका अभिनंदन करते हैं. उन्होंने शिष्य परंपरा का पालन किया है,  हम उनके आभारी हैं. उन्होंने मुझे यहां आने का अवसर दिया, इसके लिए मैं उन्हें हृदय से धन्यवाद देता हूं. मैं चाहता हूं कि उनका आशीर्वाद मुझे आगे भी प्राप्त होता रहे. और हम शास्त्रीय संगीत के रास्ते पर प्रेम के साथ, स्नेह के साथ, आगे बढ़ते रहें.
-डॉ. सौरभ मालवीय

(पुस्तक- 'राष्ट्रवादी पत्रकारिता के शिखर पुरुष अटल बिहारी वाजपेयी' से)

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