नई दिल्ली में 14 सितंबर, 1999 को राजभाषा की स्वर्ण जयंती समारोह को संबोधित करते हुए श्री अटल बिहारी वाजपेयी ने भारत की विभिन्न भाषाओं के महत्व पर प्रकाश डाला. अपने संबोधन में उन्होंने कहा कि पचास साल पहले आज ही के दिन संविधान परिषद ने हिंदी को केंद्र की राजभाषा के रूप में प्रतिष्ठित किया था. यह भाषाई स्वराज्य की ओर एक ठोस और प्रभावी कदम था. सबके सहयोग से सारे देश के समर्थन से हिंदी राष्ट्रभाषा बनी, राष्ट्रभाषा के रूप में स्वीकार की गई और बाद में इसे राजभाषा का पद प्राप्त हुआ.
भारत एक बहुभाषी देश है. अनेक भाषाएं हैं. भाषाओं की अनेकता या बहुलता हमारे लिए कठिनाई पैदा नहीं करती, हमारी सांस्कृतिक समृद्धि का परिचय देती है. कठिनाइयां तो हल हो जाती हैं, लेकिन संस्कृति की विरासत को बचाए रखना, बढ़ाना, यह बहुत आवश्यक है. बहुभाषी देश में आदान-प्रदान के माध्यम के रूप में भाषा की उपयोगिता हम सभी जानते हैं. हमारे यहां यह बड़ा सुखद संयोग है और आज के अवसर पर उसका उल्लेख करना जरूरी है कि हिंदी को सबसे पहले और सबसे अधिक समर्थन मिला, वह अहिंदी भाषी क्षेत्रों से मिला. तमिलनाडु से सुब्रमण्यम भारती, गुजरात से स्वामी दयानंद सरस्वती और महात्मा गांधी, बंगाल से आचार्य केशव चंद्र सेन, नेताजी सुभाष चंद्र बोस, इन सबने सारे देश की भाषा के रूप में हिंदी के पक्ष में अपनी आवाज उठाई. उस समय भाषा का प्रश्न नौकरियों से जुड़ा नहीं था. भाषा का प्रश्न राष्ट्र की पहचान से, अस्मिता से, राष्ट्रीयता से संलग्न था और इसलिए सबकी सहमति से, सबके सहयोग से हिंदी आगे बढ़ी.
हिंदी केंद्र की राजभाषा होने के अलावा कुछ प्रदेशों की राजभाषा भी है. वहां राज-काज, शिक्षा-दीक्षा, न्यायदान आदि के लिए माध्यम के रूप में हिंदी का प्रयोग हो रहा है. केवल हिंदी ही नहीं, अन्य भारतीय भाषाएं भी अपने-अपने प्रदेशों में फल-फूल रही है, माध्यम के रूप में विकसित हो रही हैं. लोकतंत्र में, लोकराज में शासन चलाना होता है. और इस आवश्यकता की पूर्ति के लिए हमारी भाषाएं बहुत अच्छी तरह से काम कर रही हैं. आज इस अवसर पर मैं हिंदी के साथ-साथ सभी भारतीय भाषाओं का अभिनंदन करता हूं.
आज लंदन में विश्व हिंदी सम्मेलन प्रारंभ हो रहा है. उसमें भाग लेने के लिए सारी दुनिया के प्रतिनिधि आए हैं. मैं यहां से उनके लिए भी अपनी शुभकामनाएं प्रेषित करता हूं.
हिंदी भाषियों से मुझे एक बात कहनी है, केंद्र में हिंदी की मंद गति देखकर उन्हें जरूर शिकायत होगी, लेकिन इस रास्ते में जो कठिनाइयां हैं, उनको समझने की आवश्यकता है. भाषा जोड़ने वाली होनी चाहिए, तोड़ने वाली नहीं. भाषा अभिव्यक्ति का माध्यम होनी चाहिए, उत्तेजना को जगाने का साधन नहीं. आज सारे देश में भाषा को लेकर कोई विवाद नहीं है. जो विवाद हैं, वे हल कर लिए गए हैं. हिंदी भाषी मित्रों से मैं कहना चाहता हूं कि जिन्हें हिंदी सीखनी पड़ती है, उनकी कठिनाई पर भी थोड़ा विचार करें. केंद्र की राजभाषा के नाते संपर्क भाषा के रूप में हिंदी का उपयोग बढ़ रहा है. हिंदी फैल रही है, हिंदी पसंद की जा रही है. हिंदी नये-नये समर्थक तैयार कर रही है. थोड़े धैर्य की आवश्यकता है, थोड़ा दूसरे की भावनाओं को ध्यान में रखकर नीति निर्धारण करने की जरूरत है.
अपनी मातृभाषा से कितना प्यार करते हैं, उसका कितना अभिमान करते हैं, यह दक्षिण के अपने दौरे में देखता रहता हूं. चाहे वह तमिलनाडु हो या कर्नाटक या आंध्र या केरल, इन क्षेत्रों की भाषाएं समृद्ध भाषाएं हैं. इनका साहित्य प्राचीन है, हिंदी अपेक्षाकृत नई भाषा है, हिंदी खड़ी बोली का रूप है या मैं कहूं यह खड़ी बोली है तो कोई आपत्ति नही होनी चाहिए. इससे पहले अनेक बोलियां थीं, वे भी संपन्न थीं, वे समृद्ध थीं और आज भी हैं. उनके प्रयोग की फिर से प्रवृत्ति बढ़ रही है, यह एक अच्छी प्रवृत्ति है.लेकिन दक्षिण में मैं जाता हूं, और अब दक्षिण में हिंदी बोलना कठिनाई का कारण नहीं है. थोड़ा सा यह ध्यान रखना पड़ता है कि जो पहला वाक्य है, वह उनकी मातृभाषा में होना चाहिए. वह तेलुगू में होना चाहिए, तमिल में होना चाहिए. ’सोदर-सोदरी मनुरा’- यह कहने के बाद आप हिंदी पर पहुंच जाएं, तो कोई आपत्ति नहीं करेगा, कोई बाधा पैदा नहीं करेगा. तमिलनाडु में ’वणक्कम’- यह मानो सारे दरवाजे खोल देता है. हृदय के भी दरवाजे खोल देता है. भाषा में इतनी शक्ति है, एक शब्द में इतना प्रभाव है.
हमारी भाषाएं विज्ञान का, टेक्नोलॊजी का माध्यम बनें, अनुसंधान की भाषा बनें, और फिर पराई भाषा यह दायित्व पूरा नहीं कर सकती. उसके लिए अपनेपन की भाषा चाहिए. अन्य भाषाओं का भी हम अध्ययन करें, उनसे ज्ञान प्राप्त करें. लेकिन अनुसंधान के लिए, खोज के लिए और वर्तमान को अतीत से जोड़ने के लिए और वर्तमान को भविष्य से संबंधित करने के लिए यह जरूरी है कि हम अपनी भाषाओं का विकास करें. उन्हें आधुनिक ज्ञान विज्ञान का माध्यम बनाएं और उनके द्वारा आम आदमी तक पहुंचने की आवश्यकता को भी पूरा करें और उनके द्वारा राष्ट्र की संस्कृति, सभ्यता, इनको भी बलशाली रूप में प्रस्तुत करने का अभियान करें.
मुझे एक सुझाव मिला है. मैं उसका उल्लेख कर देना चाहता हूं. कुछ विद्वानों को एक प्रस्ताव भेजा है. अब समय आ गया है कि हम भारतीय भाषाओं की वर्तमान स्थिति पर विचार करने के लिए, उनकी आवश्यकताओं के बारे में पता लगाने के लिए, आदान-प्रदान के बारे में जानकारियां एकत्रित करने के लिए, एक भारतीय भाषा आयोग का गठन करें. भारतीय भाषा आयोग के गठन का प्रस्ताव बहुत अच्छा है. अगर मेरी सरकार कामचलाऊ सरकार न होती, तो मैं शायद उसे स्वीकार करके उसकी स्वीकृति का ऐलान कर देता. लेकिन अभी तो मैं इतना ही कह सकता हूं कि बहुत अच्छा प्रस्ताव है, एक व्यावसायिक प्रस्ताव है. हमें सब भाषाओं के बारे में विचार करना चाहिए. इक्कीसवीं सदी की चुनौतियों का सामना हमारी भाषाएं कैसे करें, इसके बारे में चिंतन करना चाहिए और चिंतन के लिए अगर एक मंच प्रस्तुत किया जा सके, तो मैं समझता हूं कि यह बहुत अच्छा होगा. चुनाव के बाद इस संबंध में अंतिम निर्णय लिया गया.
-डॉ. सौरभ मालवीय
(पुस्तक- 'राष्ट्रवादी पत्रकारिता के शिखर पुरुष अटल बिहारी वाजपेयी' से)


No comments:
Post a Comment