Monday, June 29, 2026

मैं अध्यापक बनना चाहता था

   


श्री अटल बिहारी वाजपेयी अध्यापक बनना चाहते थे. यह बात उन्होंने 12 अगस्त, 1995 को लखनऊ विश्वविद्यालय के शिक्षक संघ द्वारा आयोजित कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में दिए गए अपने भाषण में कही. उन्होंने कहा कि मैं आपका प्रतिनिधि हूं. लखनऊ के सांसद के नाते, मुझे आप सबके बीच में उपस्थित होने में प्रसन्नता का अनुभव हो रहा है. यहां के छात्र जब कभी मुझसे मिलने आए- मैंने कहा कि विश्वविद्यालय के अधिकारियों की सहमति के बिना, मैं वहां नहीं आ सकता. यदि विश्वविद्यालय का कोई भी समूह मेरे आने का विरोध करता है, तो मैं नहीं आ सकता. मैं आपको नाराज नहीं कर सकता, क्योंकि आप हमारे मतदाता हैं.

हम विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र हैं. दो दिन बाद हम अपनी स्वतंत्रता की वर्षगांठ मनाएंगे. हम लोकतंत्र की शिक्षा औरों को देने के लिए तैयार हैं, किंतु स्वयं का आत्म-साक्षात्कार नहीं कर सकते. हमारे विश्वविद्यालय किस ओर जा रहे हैं, इसका हम सबको भारी दुख है. हमारे विश्वविद्यालय की शिक्षा ऐसी होनी चाहिए, जिससे नवयुवकों में उत्तरदायित्व की भावना उत्पन्न हो, राष्ट्र प्रेम की उत्कट भावना जागृत हो. क्योंकि अपनी अस्मिता की सुरक्षा तभी की जा सकती है, जब भावी पीढ़ी के अंदर राष्ट्रभक्ति उत्पन्न हो.

एक समय, लखनऊ विश्वविद्यालय की, देश में बड़ी चर्चा होती थी. यहां की शिक्षा पाने के लिए देश के कोने-कोने से छात्र-छात्राएं आया करते थे. सन 43 में मैं भी यहां आना चाहता था, पर कानपुर के डीएवी कॊलेज चला गया. वहां से राजनीति में एमए किया. इसके बाद मन बनाया कि लखनऊ विश्वविद्यालय से पीएचडी करूं. उन दिनों यहां के राजनीति विभाग के प्रोफेसरों का बड़ा नाम था.  पर उसी समय राष्ट्र का आह्वान- उस संकट की घड़ी में छात्र निकले, जवान निकले, मैं भी निकल पड़ा. पीएचडी करने की बात मन की मन में ही रह गई और राष्ट्र को जीवन अर्पित कर दिया. मानद पीएचडी तो मिली, किंतु में उसे लिखने में संकोच करता हूं. बताने में भी संकोच करता हूं.

आप लोग आचार्य हैं, शिक्षाशास्त्री हैं. समाज में आपकी प्रतिष्ठा है. विश्वविद्यालय अपने प्रोफेसरों के कारण ही जाने जाते हैं. उन्हीं के नाम से खिंचकर दूर-दूर से छात्र अध्ययन के लिए आते हैं. प्राचीन काल में  अपने विषय में निष्पात आचार्यों को लोग पूजते थे, उन्हें व्याख्यान देने के लिए अन्य विश्वविद्यालयों में आमंत्रित किया जाता था. आज परिस्थिति बदली हुई है. अब विद्वानों का वह सम्मान कहां हो पा रहा है, जो प्राचीन काल में होता था.

देश की द्रुत गति से बढ़ती हुई जनसंख्या ने चारों ओर अव्यवस्था उत्पन्न कर दी है. ऐसे में विद्या मंदिरों में विद्यार्थियों की संख्या अधिक हो गई है. अध्यापक प्रत्येक छात्र की ओर ध्यान कैसे दे सकता है ? शोध करने वाले छात्र भी अनुसंधान इसलिए करते हैं कि उन्हें रोजी मिल जाए. योग्यता और ज्ञान की ओर ध्यान नहीं दिया जाता. नौकरी के लिए डिग्री जरूरी है, इसलिए किसी न किसी प्रकार डिग्री पाने का प्रयत्न होता है. डिग्री के साथ जब तक ज्ञान नहीं रहता, तो वह निर्गंध पुष्प की तरह होती है. शिक्षा आज व्यापार बन गई है. ऐसी दशा में उसमें प्राणवत्ता कहां रहेगी ? उपनिषदों या अन्य प्राचीन ग्रंथों की ओर हमारा ध्यान नहीं जाता. आज विद्यालयों में छात्र थोक में आते हैं. 

शिक्षा के द्वारा व्यक्ति के व्यक्तित्व का विकास होता है. व्यक्तित्व के उत्तम विकास के लिए शिक्षा का स्वरूप आदर्शों से युक्त होना चाहिए. हमारी माटी में आदर्शों की कमी नहीं है. शिक्षा द्वारा ही हम नवयुवकों में राष्ट्र प्रेम की सच्ची भावना जागृत कर सकते हैं. यह तो बीज से वृक्ष बनाने का साधन है. हर फूल को खिलने का अवसर मिलना चाहिए. अध्यापक को अपने छात्र की योग्यता की जानकारी रखना आवश्यक है. उसी के अनुसार वह उसे शिक्षा दे, अन्यथा शिक्षा अपने उद्देश्य को पूरा न कर सकेगी. जब अध्यापक गुरु के गुरुतर भार को सच्चे मन से स्वीकार करता है, तो निस्संदेह वह अपने मिशन में सफल होता है. मिशन की सफलता ही तो जीवन की सफलता है.

मैं स्वयं अध्यापक बनना चाहता था. अगर देश का बंटवारा न होता, तो मैं राजनीति में न आता. मुझे शिक्षकों का मान-सम्मान करने में गर्व की अनुभूति होती है. अध्यापकों को शासन द्वारा प्रोत्साहन मिलना चाहिए. प्राचीन काल में अध्यापक का बहुत सम्मान था. आज तो अध्यापक पिस रहा है. शिक्षा के क्षेत्र में हमने नग्णय कार्य किया है. हां, शिक्षक दिवस पर औपचारिकता पूरी कर लेते हैं और कुछ अध्यापकों को सम्मानित कर लेते हैं, बस. आवश्यकता है पूरी शिक्षा पर पुनर्विचार करने की. शिक्षा में कम से कम राजनीति हो और राजनीति में ज्यादा से ज्यादा शिक्षा हो. तभी देश का कल्याण होगा. 

अपने देश में लोकतंत्र है. लोकतंत्र में शिक्षा की बड़ी आवश्यकता होती है. जब तक नागरिकों में लोकतंत्र के मूल्यों का बोध उत्पन्न न होगा, तब तक लोकतंत्र सफल नहीं हो सकता. हमने लोकतंत्र का शिखर तो खड़ा कर दिया है, किंतु खंभे मजबूत नहीं बनाए. राष्ट्र निर्माण में शिक्षा और शिक्षक की बहुत बड़ी जिम्मेदारी होती है. सारे समाज को राष्ट्र निर्माण की ओर उन्मुख करने का दायित्व शिक्षकों पर बहुत हद तक होता है.

अपना देश क्षमताओं से भरा हुआ देश है. हमारे वैज्ञानिक दुनिया भर में सम्मान पाते हैं. हम विज्ञान और टेक्नोलॊजी में किसी से पीछे नहीं हैं. सारा संसार हमारी क्षमताओं और कर्मठता को मानता है. हम एक महान देश के रूप में उभर रहे हैं. पर हम स्वयं अपनी क्षमताओं से परिचित नहीं हैं.

हमें अध्यापकों को उचित सम्मान देना ही होगा. अध्यापक का सम्मान उसके छात्र करते हैं. किंतु अध्यापक भी अपने विषय का पंडित होना चाहिए. उसकी मुस्कान पुरस्कार होती है और भृकुटि दंड. ऐसा तभी संभव होगा जब अध्यापक का चरित्र खरे सोने जैसा होगा, चौदह कैरेट का नहीं. अध्यापक का कर्तव्य होता है कि वह ज्ञान देने के साथ-साथ छात्रों को देशभक्ति और चरित्र की भी शिक्षा दे. यदि देश सही है, तो सब कुछ सही है. वैसे तो जिन्दगी में हमेशा परीक्षा होती रहती है. जीवन एक लंबी परीक्षा का ही तो नाम है.
-डॉ. सौरभ मालवीय

(पुस्तक- 'राष्ट्रवादी पत्रकारिता के शिखर पुरुष अटल बिहारी वाजपेयी' से)

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