Monday, June 29, 2026

समाचार पत्र खरीद कर पढ़ें, मांग कर नहीं

   


महाराष्ट्र के पुणे में 20 जनवरी, 1982 को ’तरुण भारत’ की रजत जयंती समारोह को संबोधित करते हुए श्री अटल बिहारी वाजपेयी ने समाचार पत्रों से जुड़ी समस्याओं पर प्रकाश डाला था. अपने संबोधन में श्री वाजपेयी ने कहा- सबसे पहले मैं ’तरुण भारत’ के संपादकों, संस्थापकों, संचालकों, संपादक मंडल और कर्मचारियों को बधाई देना चाहता हूं, जिनके परिश्रम और प्रयत्नों से आज ’तरुण भारत’ संघर्ष के पच्चीस वर्ष पूर्ण करके यह रौम्य महोत्सव मना रहा है. मुझे समाचार पत्र में काम करने का मौका मिला था. शायद इसलिए इस समारोह में मुझे बुलाया गया है. विश्वविद्यालय की शिक्षा समाप्त करने के बाद मैंने एक मासिक पत्र में काम करना शुरू किया था. बाद में एक साप्ताहिक पत्र में संपादन का कार्य करने लगा. फिर दैनिक पत्र में जिम्मेदारी मेरे ऊपर आ गई. मैं जानता हूं- पत्र निकालना और  निकालते रहना कितना कठिन होता है. मैंने पत्र निकाले भी हैं और बंद भी किए हैं. पत्र बंद करते समय मैं संपादकीय लिखा करता था, उसकी बड़ी चर्चा होती थी.

’तरुण भारत’ पच्चीस वर्ष पूर्ण कर चुका है. यह सचमुच में, अपने आप में एक महत्वपूर्ण घटना है. वैसे तो पुणे की नगरी में अभी ’केसरी’ का समारोह हुआ था, जिसने सौ वर्ष पूरे किए. ’सकाल’ ने पचास वर्ष पूरे किए. मैं इन दोनों पत्रों का इस अवसर पर अभिनंदन करना चाहता हूं. ’तरुण भारत’ तरुण है, इसलिए पच्चीस वर्ष का है. किसी ने शुभकामनाएं भेजी हैं चिरतारुण्य की. ’तरुण भारत’ सिर्फ तरुण हो. आयु बढ़ती जाए. लेकिन प्रखरता में कमी न आए. समाचार पत्र के ऊपर एक बड़ा राष्ट्रीय दायित्व है. भले हम समाचार पत्रों की गणना उद्योग में करें, कर्मचारियों के साथ न्याय करने की दृष्टि से आज यह आवश्यक भी होगा, लेकिन समाचार पत्र केवल उद्योग नहीं है, उससे भी कुछ अधिक है. यह व्यवसाय भी है. धंधा नहीं है. पत्रकारिता एक मिशन है. बिना ध्येयवाद के, बिना निष्ठा के, बिना सत्य के, और सत्य के आग्रह को निभाने के लिए कष्ट झेलने की तैयारी के बिना कोई पत्रकार अपने धर्म का पालन नहीं कर सकता. शब्द का महत्व है. लेकिन बोला हुआ शब्द दूर तक नहीं पहुंचता. लिखा हुआ शब्द दूर-दूर तक जाता है. बोला हुआ शब्द हवा में उड़ जाता है, लिखा हुआ शब्द टिकता है. ये ठीक है कि देश में दुर्भाग्य से चालीस फीसद से अधिक लोग साक्षर नहीं हैं. इसलिए समाचार पत्रों का महत्व अनायास बढ़ जाता है, क्योंकि जो पढ़ते हैं- पढ़ सकते हैं, वे लोकतंत्र को बनाने में अपनी भूमिका निभाते हैं.  
 
आज अपने मित्रों से एक बात कहना चाहूंगा, हमारे देश में अभी भी अखबार मांग कर पढ़ने की पद्धति चल रही है. हम मांग कर खाना पसंद नहीं करते, हम मांगा हुआ कपड़ा पहनना पसंद नहीं करते, तो हम मांगा हुआ अखबार पढ़ने से संकोच क्यों नहीं करते ?  कारण धनाभाव नहीं है. अच्छे-अच्छे लोगों को मैं देखता हूं. पत्र खरीदते नहीं हैं, लेकिन पढ़ना चाहते हैं. पढ़ने के लिए इतने उतावले रहते हैं कि अगर किसी ने अखबार पढ़ना शुरू किया हो, तो वह पढ़ने की अपनी इच्छा को रोक नहीं सकते. कहते हैं- क्या एक पन्ना मुझे दे सकते हैं ? ऐसे मांग कर पढ़ने वाले आपको विमान में मिलेंगे, रेलगाड़ी में मिलेंगे. विमान में तो अखबार बेचा नहीं जाता, मगर रेलगाड़ी में- स्टेशन पर समाचार पत्र उपलब्ध रहते हैं. शायद उन्हें मांग कर पढ़ने में मज़ा आता है. कभी-कभी तो ऐसे अवसर पर मांगते हैं कि देने की इच्छा नहीं होती. पहले पृष्ठ का आधा समाचार पांचवें पृष्ठ पर, पहला पृष्ठ हमारे हाथ में, पांचवां पृष्ठ किसी और के हाथ में. अब पत्र पढ़ने का कार्यक्रम कैसे बनेगा ?  मगर वे इसकी चिंता नहीं करते. आज हम निश्चय करें कि कि पत्र खरीद कर पढ़ेंगे, मांगकर नहीं पढ़ेंगे. परिवार में एक ही पत्र आए, यह आवश्यक नहीं है. जो समृद्ध परिवार हैं पति की मोटर अलग है, पत्नी की अलग है. लड़का अलग मोटर रखना चाहता है, लड़की अलग मोटर रखना चाहती है. काश ! समाचार पत्र के बारे में भी ऐसा ही हो सकता. पढ़ने के लिए अलग-अलग टेबल चाहिए, उसी तरह अपनी रुचि का पत्र भी खरीदने की हमें आदत डालनी चाहिए. 

समाचार पत्रों की बिक्री बढ़ना जरूरी है. लेकिन मैं जानता हूं- मैं समाचार पत्र चला चुका हूं. अगर समाचार पत्र घाटे में चलता है, तो बिक्री से घाटा और बढ़ता है. समाचार पत्र घाटे में न चले, इसका प्रबंधन भी बहुत आवश्यक है. कागज महंगा हो रहा है. सरकार न्यूज प्रिंट का दाम बढ़ाती जा रही है. वर्तमान पत्र निकलेंगे कैसे ? अपने पैरों पर कैसे खड़े होंगे ? न्यूज प्रिंट तो समाचार पत्र के काम आता है. उस पर शुल्क नहीं बढ़ना चाहिए. जो शुल्क बढ़ाया उसका कोई औचित्य नहीं है. सरकार की आमदनी बढ़ाने के और भी साधन हो सकते हैं. विद्या पर, लोक शिक्षण पर, कर लगाना न्याय संगत नहीं माना जा सकता. दूसरी बात है- समाचार पत्र को विज्ञापन चाहिए. उन्हें विज्ञापन की आवश्यकता है. केवल सर्कुलेशन के दम पर समाचार पत्र विफल है. सबसे अधिक विज्ञापन देने वाली संस्था है सरकार. पब्लिक अंडर्टेकिंग्ज है. यूनियन पब्लिक सर्विस कमीशन है. स्टेट का पब्लिक सर्विस कमीशन है. रेलवे के विज्ञापन आते हैं. और अगर विज्ञापन देने में सरकार कंजूसी करेगी या भेदभाव करेगी, तो देश में स्वतंत्र पत्रकारिता का विकास बड़ा मुश्किल हो जाएगा. आदर्श व्यवस्था तो ये होगी कि सरकारी विज्ञापनों को वर्तमान पत्रों के सर्कुलेशन के साथ जोड़ दिया जाए. पत्र अपनी विचारधारा का प्रतिपादन करेंगे. लोकतंत्र में मतभिन्नता होगी. मतभिन्नता का हमें समादर करना चाहिए. लेकिन विज्ञापन के लिए जो धन आता है, वह जनता से वसूल किया जाता है. उस धन से अगर स्वतंत्र पत्रकारिता में बाधा पैदा होती है, तो समझना चाहिए कि शासन अपने कर्तव्य का पालन नहीं कर पा रहा है. ऐसी शिकायतें मिली हैं. आप प्रेस कौंसिल की रिपोर्ट देखिए. पत्रकारों के संगठन इस सवाल को उठाते हैं. संपादक के नाते मुझे भी इस बात का अनुभव है. लेकिन मैं किसी विशेष सरकार की आलोचना नहीं कर रहा हूं. सरकारें सब एक तरह की होती हैं. 

सत्ता का अपना एक चरित्र होता है. लेकिन अगर लोकशाही को मजबूत करना है, तो कुछ संस्थाओं का विकास करना होगा. नई संस्थाओं का विकास करना होगा. कुछ मर्यादाओं का विकास करना होगा. कुछ मर्यादाओं का पालन करना होगा. कुछ नये मानदंड कायम करने होंगे. विज्ञापन का अधिकार बड़ा अधिकार है. लेकिन अगर इस अधिकार के दुरुपयोग की संभावना है, तो दुरुपयोग होता भी है. ऐसी व्यवस्था का विकास जरूरी है कि जिसमें समाचार पत्र अपने प्रसार के अनुसार विज्ञापन पा सके. हां, अगर कोई समाचार पत्र निर्धारित आचार संहिता का उल्लंघन करता है, तो कुछ महीनों के लिए उसका विज्ञापन रोका जा सकता है. प्रेस कौंसिल ने भी इस आशय की सिफारिश की है. कोई वर्तमान पत्र अगर कानून का उल्लंघन करता है, तो अदालत उसे दंडित कर दे, तो वह थोड़े समय के लिए विज्ञापन पाने का अधिकार खो देता है.  जिसके बारे में कोई शिकायत ही नहीं है, आचार संहिता का उल्लंघन नहीं है, कानून के दायरे के भीतर वर्तमान पत्र चल रहा है, उसके साथ सचमुच में विज्ञापन में भेदभाव नहीं किया जाना चाहिए. ये भी जरूरी है कि हम समाचार पत्रों को जानकारी इकट्ठी करने का कानूनी अधिकार प्रदान करें. दुनिया भर के लोकतांत्रिक देशों में ऐसे कानून हैं. प्रेस को अधिकार है. जो सरकार के पास जाकर सरकार के किसी अधिकारी के पास जाकर जानकारी की मांग कर सके, इस घटना के बारे में-अमुक घटना के बारे में मुझे तथ्यों की जानकारी चाहिए, आप वह दीजिए. पत्रकार यह मांग कर सकते हैं कि हमें दस्तावेज दिखाएं. राइट टू हैव इंफोर्मेशन जानकारी प्राप्त करने का अधिकार. इसके बिना पत्रकार अपने कर्तव्य का पालन कैसे करे ? अगर सही जानकारी नहीं है, तो अफवाहों पर जाएंगे, सुनी-सुनाई बातों पर भरोसा करने के लिए विवश होंगे. या येन-केन-प्रकारेण वे जानकारी प्राप्त करने की कोशिश करेंगे. इस संबंध में कानून बनाना जरूरी है. प्रेस को कानून से ये अधिकार होना चाहिए कि वह शासन से, या शासन के अधिकारियों से जानकारी प्राप्त कर सके. दस्तावेजों को देख सके. हमें प्रेस के इस अधिकार का समादर करना होगा कि वे अपनी जानकारी का उदघाटन न करें.

जनहित के नाम पर आज इस देश में बहुत सी बातें पार्लियामेंट को, प्रेस को बताई नहीं जातीं. जनहित की अंतिम कसौटी कौन तय करेगा ? कोई चीज जनहित में है या नहीं, इसका निर्धारण कौन करेगा ? मैं संसद में देखता हूं, कोई जानकारी अगर मांगी जाती है, सरकार कहती है- ये जानकारी देना जनहित में नहीं है. और उसके आगे कोई तर्क काम नहीं करता. अगर हम लोकसभा के अध्यक्ष से कहेंगे कि अध्यक्ष महोदय, आप हस्तक्षेप करिए. जनहित का तकाजा है कि ये जानकारी सदन के सामने रखी जाए, देश के सामने रखी जाए. अध्यक्ष महोदय कहते हैं कि जहां जनहित की तलवार टांग दी गई, वहां मेरे अधिकार निष्प्रभावी हो जाते हैं. अब अगर राष्ट्र की सुरक्षा के संबंध में कोई मामला है, तो जनहित की बात समझ में आ सकती है. कोई नहीं चाहेगा कि हमारे देश के रक्षा के रहस्य किसी को भी पता लगें. लेकिन रक्षा के मामले में मैं जहां देखता हूं, जो जानकारी लंदन में उपलब्ध है, वह नई दिल्ली में नहीं दी जाती. जो जानकारी पत्रों में छपती है, वह संसद के सदस्यों को प्राप्त नहीं कराई जाती. आप ऐसा मत समझिए कि जब जनता सरकार थी, तब इस संबंध में कोई अलग पक्रिया थी. मैंने आपसे कहा कि ढंग एक ही था, ढर्रा एक ही था. मगर विचित्र बात है कि हमारे कांग्रेसी मित्र भी ये शिकायत करते थे कि जनमत जनहित का बहाना बनाया जा रहा है. तथ्यों को छिपाने के लिए और आज हम बहाना कर रहे हैं. कहीं न कहीं इस स्थिति को रोकना पड़ेगा. जनहित का अंतिम निर्णय सरकार पर नहीं छोड़ना चाहिए. नाजुक मामलों में मैं समझ सकता हूं. आप जानते हैं मुझे पूरे पच्चीस साल हो गए संसद में. मंत्री भी मैं बहुत थोड़े दिनों के लिए था.  जरूर जन्मपत्री में कई ढाई साल का राजयोग होगा. मेरा विश्वास नहीं है जन्मपत्री पर, मगर आजकल जन्मपत्री का बड़ा जोर है, कर्म पत्री की किसी को चिंता नहीं है. सतहत्तर में लोगों ने बनाया, तो बन गए, अस्सी में हटाया तो हट गए. मन में कोई मलाल नहीं है. विरोधी दल में रहकर देश की सेवा हो सकती है. ऐसी मेरी मान्यता है. लेकिन मैं अनुभव से बता रहा हूं संसद सदस्य के नाते, कि अगर संसद का इसी तरह से अवमूल्यन होता रहा, जैसा कुछ  वर्षों से हो रहा है, तो संसदीय लोकतंत्र से लोगों की आस्था उठ जाएगी. 

संसद को समाज का दर्पण होना चाहिए. समाचार पत्रों को भी समाज का दर्पण होना चाहिए. लेकिन अगर संसद से तथ्य छिपाए जाएंगे, अगर उन्मुक्त वाद-विवाद के लिए वातावरण नहीं होगा, अगर संख्या के बल पर बात गले के नीचे उतरवाने की कोशिश की जाएगी, तो संसद राष्ट्र के हृदय का एक स्पंदन नहीं रहेगी. अन्य संस्थाओं की तरह ही एक संस्था मात्र रह जाएगी, वह कानूनों को मुहर लगाएगी. मगर देश में न तो कोई बुनियादी परिवर्तन ला सकेगी और न तो देश को अराजकता की ओर जाने से रोक सकेगी. इस अवमूल्यन को देखते हुए समाचार पत्रों की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाती है. लोकसभा में बैठकर कभी-कभी मुझे लगता है कि मैं अपने दायित्व का पालन नहीं कर पाता. क्या बोलें ? किसके सामने बोलें ? जिन्हें सुनाना चाहते हैं, वे सुनते नहीं. जो सुनते हैं, वे समझ नहीं पा रहे हैं. जो समझ रहे हैं, वे जवाब नहीं दे रहे हैं. संसद में वार्तालाप कम हो गया है. अपनी बात कहने की रस्म अदायगी ज्यादा हो रही है. ये खतरे की घंटी है. विधानसभाओं का तो और भी बुरा हाल है. उनका कार्यकाल घटाया जा रहा है. बिहार की विधानसभा चार घंटे ही चलती है. जितने अध्यादेश निकाले गए, ऒर्डिनन्स निकाले गए हैं. उनको भी पास नहीं करते. ये अध्यादेश टेबल पर रखे जाते हैं, स्वीकृत नहीं होते. अध्यादेश रद्द होते हैं, विधानसभा स्थगित हो जाती है, फिर अध्यादेश जारी किए जाते हैं. पैंतालीस-चालीस अध्यादेश ऐसे हैं कि जिन्हें विधानसभा ने स्वीकृति नहीं दी, मगर चल रहे हैं. लोकसभा की बैठकें कम कर दी गई  हैं. अन्य विधानसभाएं भी इसी तरह काम कर रही हैं. ऐसे में देश के मानस का प्रतिबिंबीकरण कैसे होगा ? शासन पर अंकुश लगाने का काम कैसे होगा ? नीति निर्धारण में जन प्रतिनिधियों को शामिल करने की प्रक्रिया कैसे चलेगी ? इसके साथ-साथ न्यायपालिका का अवमूल्यन व उस पर हो रहे प्रहारों से इसकी भी प्रतिष्ठा पर आंच आ रही है. मैं इसके विस्तार में नहीं जाना चाहता, अब लोकतंत्र के स्तंभ संसद व न्यायपालिका अगर दुर्बल होते हैं, और कमजोर होते हैं, तो फिर आशा का एक ही स्थान रह जाता है- निर्भीक और स्वतंत्र प्रेस.  निर्भीकता के साथ लिखने वाला पत्रकार, दबाव से मुक्त, सत्ता के प्रभाव से दूर, भीड़ के प्रभाव से दूर, उन्माद के असर से दूर, कलम को पैना करके जो आलोचना करते हैं वैसे समाचार पत्र. लेकिन उन आलोचनाओं के प्रति भी असहिष्णुता की भावना पैदा होती है.  

इस देश में शास्त्रार्थ की पुरानी परंपरा है. शास्त्रार्थ में हारने वाला अपने को पराजित नहीं समझता, अपमानित नहीं मानता, मगर तर्क के द्वारा, तथ्य के द्वारा हम किसी निर्णय पर पहुंच सकते हैं, यह निर्णय सर्वमान्य होगा. इस परंपरा से देश हट रहा है. ’निंदकाचे घर असावे शेजारी’ निंदा करने वाले को पड़ोस में रखो. ये भी पुरानी भावना है. आजकल निंदा करने वाले को कहा जाता है-  जरा दूर हटो. कौन निंदा सुनना चाहता है ?  कौन आलोचना पसंद करता है ? एक देश के नाते हम अपने पर हंसना भी भूल गए. व्यंग्य अच्छा नहीं लगता. विनोद का आनंद नहीं ले सकते. अभी उत्तर प्रदेश में एक घटना हुई. कवि सम्मेलन था. कवियों ने कुछ व्यंग्य कसे होंगे. उत्तर प्रदेश के एक मंत्री महोदय वहां उपस्थित थे. उन्हें पसंद नहीं आया. उन्होंने कहा, "इन कवियों को ठीक करो". फिर उस कवि सम्मेलन में मारपीट हुई. कवियों की ठुकाई की गई. लोग भाग खड़े हुए. कवि मार खाकर वापस आ गए. ऐसा नहीं होना चाहिए.  मैंने कहा, " मैं भी मंत्री रह चुका हूं. उस समय हमें भी सुननी पड़ती थी.  लेकिन हमें इसके लिए तैयार रहना चाहिए.  मगर हम जरूरत से ज्यादा सेंसटिव हो गए हैं. या तो मन में अपराध की भावना है. या हम समझ नहीं पा रहे कि तर्क-वितर्क में से एक समन्वित विचार कैसे निकाला जाए ? इस देश में खंडन होगा, मंडन होगा, मान्यता पर प्रहार किए जाएंगे, मूल्यों को चुनौती दी जाएगी. 
 
इस देश में भगवान के अस्तित्व को नकारने वाले लोग भी पैदा हुए. उन्हें सूली पर नहीं चढ़ाया गया. उन्हें विश्वास के लिए भी मजबूर नहीं किया गया. उनके मत का खंडन किया गया. क्या हम अपनी यह परंपरा या धरोहर छोड़ देंगे ? क्या देश में असहिष्णुता की ऐसी ही लहर चलेगी, जो सारे दिमाग की, चर्चा को, विवेक को, बुद्धि को झुठला देगी ? मैं समाचार पत्रों को बधाई देना चाहता हूं. जो काम संसद नहीं कर पा रही, जो काम विधानसभाएं नहीं कर पा रहीं, वह प्रेस कर रहा है- समाचार पत्र कर रहे हैं. अगर पत्र न हो, तो संसद में जो हम बोलें और वह न छपे, तो किसे पता लगेगा कि हम क्या बोले ? मगर संसद में बोलने के लिए हमें मसाला कहां से आता है ?  समय तो नहीं है, वह अगर है, तो धैर्य नहीं है. किसी बात के पीछे पड़ने की लगन नहीं है. साधन भी नहीं है. योग्यता भी नहीं है. ट्रेनिंग भी नहीं है. मैं आज इस मंच से अरुण शौरी का अभिनंदन करना चाहता हूं. यह बात प्रकाश में न आती, अगर कोई एक पत्रकार खतरों से खेलते हुए भी, सच्चाई की खोज में जुटा न रहता. बिहार में लोग अंधे कर दिए गए, हवालात में अंधे कर दिए गए. अगर जागरूक पत्रकार न होते, अगर वहां जाकर लोगों से बातें न करते, पुलिस के हमले का डर होते हुए भी अपने को खतरे में डालने को तैयार न होते. तो बिहार का वह ’अंधा युग’ प्रकरण कभी रोशनी में न आता. लोक प्रतिनिधि अपना काम नहीं कर पा रहे हैं. सुविधाएं जुटाने में लगे हैं.  इस समय पत्रकार जागरूक हैं, सचेत हैं, हर हालात में हमें पत्रकारों की स्वतंत्रता-प्रेस की स्वतंत्रता की रक्षा करनी है. वे ठीक है कि पत्रकारों का भी अपना दायित्व है. मैंने आपसे निवेदन किया. लिखे हुए शब्द का महत्व है. देश में बहुत से लोग ऐसे हैं, जो कहते हैं- " साब, ये बात सच है, क्योंकि अखबार में लिखी हुई है". मैंने कहा, "अखबार में तो बहुत सी गलत बातें भी छपती हैं." मगर कुछ लोगों को भरोसा है. 

अब पत्रकारों और प्रेस की जिम्मेदारी है कि वे जो कुछ भी छापें, सोच समझकर छापें. छापने से पहले सोचें. मैं दैनिक पत्रों की कठिनाइयों को जानता हूं. ये ’तरुण भारत’  का विशेषांक निकला है, उसको मैं पढ़ रहा था. कोई वार्ताहर थे, उन्होंने गांव से खबर भेजी, कि मारकर जला दिया. टेलीफोन से जो खबर आई, उसमें शब्द ऐसे होते- जलाकर मार दिया. भाव बदल गया. मगर गनीमत है- उन्हें टेलीफोन तो मिल गया. पर कहीं कहीं तो आजकल टेलीफोन भी नहीं मिलते. मेरे साथ दिल्ली से पत्रकार गए थे, एक पदयात्रा में. पहले दिन हमारी पदयात्रा प्रारंभ हुई. हमने कहां जाकर विश्राम किया, यह जानने के लिए पत्रकार आगे-आगे भागे. दिल्ली जल्दी से जल्दी खबर जानी चाहिए. खबर कहां से जाएगी ? टेलीफोन काम नहीं कर रहा है. पत्रकार के लिए बाधा है. रात में अगर समाचार नहीं पहुंचा, तो नहीं छपेगा. दूसरे दिन बासी हो जाएगा. पत्रकार के परिश्रम पर पानी फिर जाएगा. कभी-कभी तार से भेजते हैं. तार की हालत ऐसी है कि चिट्ठी पहले मिलती है- तार बाद में. प्रेस टेलीग्राम अलग कैटेगरी में आते हैं. कितनी कठिनाइयां हैं. और दैनिक पत्र में तो रात में समाचार चाहिए. अब जो मशीनें हैं, जो ज्यादा छाप सकती हैं, वहां देरी से भी समाचार आए,  तो भी आप ले सकते हैं. नहीं तो पहले ही छापना शुरू करना पड़ेगा. 

मैं समाचार पत्रों के इस अधिकार का सम्मान करता हूं, कि उन्हें ये बताने के लिए विवश नहीं किया जाना चाहिए कि उन्हें समाचार कहां से मिला. इंग्लैंड में इस मामले को लेकर सजाएं नहीं होतीं. पत्रकार को तकलीफ उठाने के लिए जेल जाने के लिए तैयार रहना पड़ेगा, अगर उसे धोखा देने के लिए विवश किया जाएगा. इस मामले में एक रोचक घटना मुझे याद है. वहां एक पुलिस अफसर थे, जो अच्छी हिंदी नहीं जानते थे. वे इंटेलिजेंस का भी काम देखते थे. उनके नीचे एक कर्मचारी थी. उस कर्मचारी ने एक दिन रिपोर्ट की, कि विश्वस्त सूत्रों से ऐसा ज्ञात हुआ है कि नगर में कुछ गड़बड़ करने की तैयारी हो रही है. अधिकारी ने वह रिपोर्ट पढ़ी. वे समझे नहीं कि ’विश्वस्त सूत्र’ का क्या मतलब है, उन्होंने फाइल पर लिख दिया- विश्वस्त सूत्रों को मेरे सामने पेश किया जाए. अब इंटेलिजेंस का ऒफिसर बड़ा मुसीबत में पड़ा. विश्वस्त सूत्रों को कैसे आगे करूं ? हैं भी या नहीं ? और अगर हैं, और उन्हें हाजिर किया जाएगा, तो आगे से वह समाचार नहीं देगा. उसने चतुराई से काम लिया. उसने फाइल पर कुछ नहीं लिखा. उसके घर जाकर सलाम किया और कहा. " आपका आदेश तो सर आंखों पर है, मगर वह विश्वस्त सूत्र इस समय शहर से बाहर चला गया है, इसलिए मैं हाजिर नहीं कर सकता. अफसर का समाधान हो गया. अगर समाचार पत्रों को अधिकृत जानकारी नहीं मिल्गी, तो वह इसी तरह सूत्रों से मिलेगी. हालांकि इसके बारे में कोई सीक्रेसी नहीं है. हर किसी को मालूम है और सबसे पहले मालूम है. लेकिन अगर कोई समाचार पत्र इसका उल्लेख कर दे और सरकार को पसंद न आए, तो सरकार अदालत में जा सकती है. इस कारण अगर कोई खबर देता है, तो देना बंद कर देगा. पत्रकार के लिए सत्य का उदघाटन करना जरूरी है. यह पत्रकार के लिए एक चुनौती भी है. और कुछ वर्षों से हमारे देश में ऐसी पत्रकारिता, जांच-पड़ताल करने वाली पत्रकारिता का चलन चल गया है. बहादुरगढ़ कांड का उदघाटन न होता, अगर पत्रकार पीछे न पड़ जाते. ये हमने महाराष्ट्र में भी देखा है. इस पत्रकारिता को प्रोत्साहन देना चाहिए. मगर इसके लिए दृढ़ आर्थिक आधार जरूरी है. उसके बारे में एक आम सहमति बनाई जा सकती है. केवल दल का प्रश्न नहीं. दल तो बदल जाएंगे. सत्ता बदल जाएगी. लेकिन हम ऐसी परंपराएं डालें, ऐसी संस्थाओं का निर्माण करें कि जीवन जगता रहे, जीवन चलता रहे. 

ऒल इंडिया रेडियो व टेलीविजन सरकार के अंग के रूप में चल रहे हैं. इसलिए भारत में पत्रों के ऊपर और भी जिम्मेदारी बढ़ जाती है.  आप कह सकते हैं कि, जब आपकी सरकार थी, तब आपने ऒटोनॊमस कॊर्पोरेशन क्यों नहीं बनाया ? वादा तो हमने किया था, पूरा नहीं कर पाए, अगर कोई काम हमने नहीं किया, इसलिए वह काम अब नहीं होना चाहिए, तो ये बात मेरी समझ में नहीं आती. ऒल इंडिया रेडियो-टेलीविजन का ऒटोनॊमस कॊर्पोरेशन जरूरी है. बीबीसी अपने कर्तव्य का पालन कर रहा है. मगर ऒल इंडिया रेडियो अगर 19 तारीख को सवेरे से यह कहना शुरू कर देती है, "आम हड़ताल विफल हो गई, आम हडताल विफल हो गई.’ यदि हड़ताल शुरू नहीं हुई, तो विफल कहां से हुई ? अगर ऒल इंडिया रेडियो ये कहे कि हड़ताल सफल हुई या विफल हुई- इसके बारे में अलग-अलग दावे किए जा रहे हैं, तो लोग थोड़ा सा सुनेंगे भी, थोड़ा सा उससे प्रभावित भी होंगे. इसलिए प्रचार के साधनों की विश्वसनीयता जरूरी है. कैसी विचित्र स्थिति हो जाती है, मैं आपको एक उदाहरण देना चाहता हूं. असम की सरकार ने समाचार पत्रों पर सेंसर लगा दिया. आवश्यकता नहीं थी, फिर भी लगा दिया. लोकतांत्रिक देश में जन-आंदोलनों से निपटने का ये तरीका नहीं होता. लेकिन वह सेंसरशिप किस सीमा तक चली गई, इसका उदाहरण सामने आया.  जब मैंने भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष के नाते ग्यारह जनवरी को सारे देश में ’असम दिवस’ मनाने का आवाहन किया, तो असम के पत्रों में वे समाचार छपने नहीं दिया गया. छप जाता, तो असम वालों पर अच्छा प्रभाव होता. असम की समस्या के प्रति शेष भारत में भी चेतना है, वे अलग-थलग नहीं हैं, वह अकेला नहीं है. शेष भारत उसके साथ खड़ा है. क्या इसका असर वहां अच्छा नहीं होता ?  मगर ऐसा होने से रोक दिया गया. ऒल इंडिया रेडियो पर ’असम दिवस’ की बात नहीं कहने दी गई. मगर हम दिवस मना रहे हैं, इसकी आलोचना में जो वक्तव्य आए, वे वक्तव्य प्रसारित किए गए. ’असम दिवस’ मनाना ठीक नहीं है, भारतीय जनता पार्टी वाले राजनीतिक लाभ उठाना चाहते हैं, और हम ’असम दिवस’ मना रहे हैं, ये बताया नहीं श्रोताओं को. असम के संबंध में एक दूसरी घटना हुई, जब मैंने सात सूत्री फार्मूला रखा. रेडियो पर फार्मूला नहीं बताया गया. जब मैंने लोकसभा में श्री वसंतराव साठे से पूछा, "आपने रेडियो पर फार्मूला क्यों नहीं बताया?’ कहने लगे, "हमने बताया था,"  मैंने कहा "समय ?" कहने लगे, "सवेरे आठ बजे." हमने कहा, "रात में नौ बजे क्यों नहीं ?" कहने लगे. "नहीं, सवेरे-सवेरे समाचार- ताज़ा समाचार था." और समाचार था एक दिन पहले का. तब प्रेस कांफ्रेंस में मैंने बताया कि किस तरह सरकार ने विपक्ष के विचारों को चालाकी से दबा दिया.

ऒल इंडिया रेडियो जब तक कॊर्पोरेशन नहीं बनता, तब तक प्रेस की जिम्मेदारी और भी बढ़ेगी. सेंसरशिप का विरोध होना चाहिए. समाचार पत्रों के दफ्तरों को घेर लिया जाए, वह प्रवृत्ति खतरनाक है. समाचार पत्रों को धमकी दी जाए, ये लोकशाही की भावना के अनुकूल नहीं है. आलोचना का स्वागत होना चाहिए. मुझे याद है, पंडित नेहरू ने कहा था, "हो सकता है, प्रेस गलती करे, हो सकता है, प्रेस ऐसी बात लिख दे, जो मुझे पसंद न हो. प्रेस का गला घोंटने की बजाय मैं यह पसंद करूंगा कि प्रेस गलती करे और गलती से सीखे, मगर देश में प्रेस की स्वतंत्रता बरकरार रहे." स्पष्ट है कि प्रेस पर भी जिम्मेदारी है. और प्रेस के कागजी संविधान तैयार करके उसका पालन करें, यह आवश्यक है. प्रेस को सनसनी पैदा करने से बचना होगा. एक सांप्रदायिक दंगा हो जाए, इससे प्रेस की जिम्मेदारी बढ़ जाती है. हिंसा की निंदा होनी चाहिए. तनाव घटाने के लिए प्रेस को अपने प्रभाव का उपयोग करना होगा. प्रेस सामाजिक समता के लिए अपनी लेखनी का, अपने प्रभाव का उपयोग करे. 

मैंने वर्षों पहले जो कुछ देखा, उसे मैं जिंदगी भर नहीं भूलूंगा. अभी पिछले दिनों दो घटनाएं हुई हैं, वो मेरे हृदय पर गहरा घाव छोड़ गईं. एक घटना कुतुबमीनार के भीतर बच्चों के मरने की- जब मैं देखने गया, तो मैंने देखा कुतुबमीनार के नीचे बच्चों के कपड़ों के ढेर लगे है. छोटे-छोटे कपड़े खून से रंगे हुए, कुछ शर्ट, कुछ अंडरवियर भी, एक छोटा सा जूता भी पड़ा हुआ था. कहीं छोटा सा टिफिन कैरिअर उलट गया था. पता नहीं किस मां ने कितने प्यार से अपने बेटे को उस टिफिन कैरिअर में सुबह का नाश्ता देकर भेजा होगा. बेटा दिल्ली के दर्शन के लिए जाएगा- मगर वह वापस नहीं आया. मैं रात में जाग जाता हूं कभी-कभी और उन कपड़ों के ढेर को याद कर चौंक जाता हूं, डर जाता हूं. मगर सारूपुर में मैंने जो कुछ देखा, उसे भूलना मुश्किल है. हम लोग जब सारूपुर में पहुंचे, पश्चिम में सूरज अस्त हो रहा था. अंधेरा घिर रहा था. मगर गांव की दक्षिण दिशा में प्रकाश उठ रहा था. यह कैसा प्रकाश है ? यह रोशनी कहां से आ रही है ? जाकर देखा, सामूहिक चिताएं जल रही थीं. अलग-थलग नहीं, अंतिम संस्कार नहीं, मंत्र का पाठ नहीं, तर्पण नहीं, पर घरवाले रो रहे हैं. पुलिसवाले सामूहिक चिता जला रहे हैं. चिता के लिए लकड़ियां भी पूरी नहीं थीं. गृहमंत्री वापस चले गए थे. मुख्यमंत्री भी रुके नहीं थे. शायद उन्हें लखनऊ जाना होगा. आगे का प्रबंध करना होगा. वहां सामूहिक चिता के चारों ओर मुट्ठी भर हरिजन बैठे थे, जाट बैठे थे. दो क्षण के लिए मैं चिता के सामने खड़ा रहा, वह मानवता की चिता थी. 

सारूपुर, देहुली ये दो गांव नहीं हैं, भारत की आत्मा पर लगे हुए दो घाव हैं. पता नहीं कितने घाव लग रहे हैं भारत की आत्मा पर, आत्मा छलनी हो रही है. क्या अर्थ है धर्म की बड़ी-बड़ी बातें करने का ? कौन हमारे दर्शन का मूल्यांकन करेगा ? कौन वेदांत का अभिनंदन करेगा ? पश्चिम के देशों में चमड़े का रंग अलग होने के कारण भेदभाव होता है, तो सारी दुनिया में आवाज उठती है. उस आवाज में हम भी अपना स्वर मिलाते हैं. यहां तो चमड़े का रंग भी एक ही है. क्या फर्क है हममें ? दुश्मनी से नहीं मारे गए लोग, बदले की भावना से नहीं, बल्कि दलित हैं, हरिजन हैं, जाटव हैं, इसलिए मारे गए हैं. केवल समाचार पत्रों ने इस संबंध में अच्छी भूमिका निभाई है. वास्तव में उनका अभिनंदन करना चाहिए.  दो दिन पहले घटना हो गई. राजनीतिक कार्यकर्ताओं को पता नहीं, नेताओं को पता नहीं. उत्तर प्रदेश के दूर गांव में डाकू ग्रस्त गांव में कौन मरता है ? कौन जीता है ? कौन है उनका सुख-दुख बताने वाला ? मगर पत्रकारों को पता लग गया. पहले अंग्रेजी में बात छपी, फिर लखनऊ में, फिर दिल्ली में- सारे देश का ध्यान गया. लेकिन पत्रकार का दायित्व केवल घटना का विवरण देना नहीं है. जो कुछ हो रहा है, हमें प्रकट करना होगा, उसकी सही रिपोर्टिंग करनी होगी निर्भीकता के साथ. बिना इसकी चिंता किए कि कौन नाराज होता है, कौन खुश होता है.

सत्य की रक्षा होनी चाहिए. सत्यमेव जयते, सत्य का उदघाटन, मगर पत्रकारों का दायित्व थोड़ा और भी है. ऐसा मानस बनाना होगा, ऐसी मानसिकता जगानी होगी कि प्रदेश में ऐसी दुर्भाग्यपूर्ण घटनाएं फिर नहीं होने पाए. आर्थिक शोषण के खिलाफ, सामाजिक विषमता के खिलाफ- हमें राष्ट्रीय भावना जगानी है. संकल्प जगाना है. पत्रकारों को उसमें भी अपनी भूमिका निभानी है. यह ठीक है- पत्रकारॊं की जीविका का प्रश्न है. पत्रकारों के सामने वेतन की समस्या है. पालेकर एवार्ड का स्वागत होना चाहिए. लेकिन मैं देख रहा हूं, पालेकर एवार्ड का कार्यान्वयन हुआ और छोटे-छोटे पत्र बंद हो गए. अर्थाभाव है. क्या वे किसी उद्योगपति की शरण में जाएं ? या जो पक्ष की सरकार है, उसकी हां में हां मिलाएं ? अपने पैरों पर कैसे खड़े रहेंगे छोटे पत्र ? उन्हें विशेष सहायता देनी होगी, विज्ञापनों की दृष्टि से उनकी मदद करनी होगी. न्यूज प्रिंट की बढ़ी कीमत वापस लेनी होगी. भाषाई पत्रों की अलग समस्या है. मैं ज्यादा विस्तार में जाना नहीं चाहता. आज भी हमारे देश में अंग्रेजी पत्रकारिता अधिक विकसित है. उनके पास अधिक बिक्री साधन हैं, सुविधाएं हैं. भाषाई पत्र अनुवाद के आधार पर चलते हैं. जो हैं, उन्हें पूरी सहायता नहीं मिल रही है. संवाद समिति में भी भेदभाव हो रहा है. अनुवाद की समस्या है. अंग्रेजी से प्रतियोगिता कैसे हो ? भाषाई पत्र अंगेजी पत्र के टक्कर में अधिक कैसे बिकें ? आधा समय अनुवाद में चला जाता है, समय जाता है, शक्ति जाती है, गलतियां हो जाती हैं.

मुझे याद है इलाहाबाद से एक पत्र निकलता था. उसमें काम करने वाले कई नये लोग थे, कोई तरुण थे. सवेरे पत्र निकलना है, रात के बारह बजे हैं, कोई खबर आ जाए- और चटपटी खबर चाहिए. पत्रों को इसलिए दोष देने की जरूरत नहीं है. थोड़ी सनसनी जरूरी है. फिर हेडलाइन कैसे बनेगी? अगर सब कुछ ठीक है तो अखबार नहीं बनता. मगर हमारे देश में तो सबकुछ कभी ठीक रहने वाला है नहीं. इसलिए हेडलाइन बनती रहती है. मैं इलाहाबाद की उस घटना का उल्लेख कर रहा हूं, उसमें ऐसा हुआ कि रात में खबर आई- पुलिस ओपन्ड फायर- फिर आगे वर्णन था- कोई नया पत्रकार था, उसने डिक्शनरी देखी- ओपन फायर के बदले उसने लिखा-  पुलिस ने आग खोल दी. उस दैनिक पत्र का शीर्षक था पुलिस ने आग खोल दी. नीचे लिखा था इतने मरे- इतने घायल. (अब यह आग खोल दी क्या हो गया ? आग बंद थी जो खो दी? ओपनफायर- पुलिस ने आग खोल दी.) अंग्रेजी पत्र ऐसी गलतियां नहीं कर सकते. भाषाई अखबार के सामने समस्या है. इसलिए उन्हें विशेष सहायता देने की जरूरत है. लेकिन इसके लिए दृष्टिकोण बदलना पड़ेगा. विविध समाचार पत्रों को हम पढ़ते हैं. वह और अच्छा निकलें. अपनी प्रतिक्रिया से उन्हें अवगत कराएं. हमारे पत्रों पर राजनीति ज्यादा छाई है. राजनीति जीवन का एक महत्वपूर्ण अंग है. मगर राजनीति जीवन का सर्वस्व नहीं है. राजनीति सारा जीवन नहीं है. राजनेता क्या करते हैं ? यह खबर है. मगर एक रचनात्मक कार्यकर्ता किस तरह से अपने को मिटाकर, जूझकर, अंधेरे में रहकर, तिल तिल जलाकर-स्वावलंबन की, स्वदेशी की भावना जगा रहा है. लोगों को अपने पैरों पर खड़े रहने का संस्कार दे रहा है, समाचार पत्रों में उनका भी उल्लेख होना चाहिए. मानवीय संवेदनाओं का उदघाटन- जो लाइम लाइट में नहीं रहते- उन्हें प्रकाश में लाना और दोनों का मेल बिठाया जा सकता है. यह ठीक है कि समाचार पत्रों को रुचि का भी ध्यान रखना पड़ता है. लेकिन रुचि बढ़ाने की भी जिम्मेदारी है, काफी स्थान रहता है. बुद्धिजीवी, रचनात्मक कार्यकर्ता, अन्याय के खिलाफ लड़ने वाले लोग, कहीं गरीब महिलाओं में- कोई बुनाई, सिलाई का केंद्र चलाकर उन्हें कमाई में थोड़ी सी सहायता देने वाली महिला, कोई अच्छा खिलाड़ी, अपने परिश्रम से अपना भविष्य बनाने वाले नौजवान, साहित्यकार, शिल्पकार- धीरे-धीरे हमारे समाचार पत्रों में आने लगे हैं. लेकिन फिर भी जितना आना चाहिए, उतना नहीं आ रहा है.  

हर समस्या का एक मानवीय पक्ष है. मानवीय पक्ष को ध्यान में लाना, उसे उदघाटित करना- यह खबर है, मगर दंगे के साथ यह खबर भी होनी चाहिए कि एक मोहल्ले में दंगा हो रहा था, तो दूसरे मोहल्ले में सब लोग मिलजुल कर सामान खरीद रहे थे, आपस में व्यवहार कर रहे थे. यह मैंने सारूपुर में देखा है. यह नहीं कि आसपास के गांव को पता नहीं- चेतना नहीं- मगर रिश्ते अभी मजबूत हैं, इसलिए देश के बारे में आशा है. कभी-कभी आशंका जरूर होती है. मगर आशा साथ नहीं छॊड़ती. संतुलित दृष्टिकोण लेकर अगर समाचार पत्र चलें, जहां प्रहार करना है, वहां प्रहार करने में कसर नहीं, लेकिन जहां मर्यादा का पालन करना चाहिए, वहां मर्यादा का उल्लंघन का कोई विचार नहीं. स्वदेश में पत्रकारिता अपने दायित्व को और भी अच्छी तरह से पूरा करेगी, लोकशाही को बल मिलेगा, संसद और न्यायपालिका के अवमूल्यन के कारण कमी पैदा हो रही है, उसे समाप्त करने में, स्वतंत्र और निर्भीक प्रेस हमारी सहायता करेंगे. मैं ’तरुण भारत’ को उज्जवल भविष्य के लिए अपनी मंगल कामनाएं देता हूं, उसका अभिनंदन करता हूं, और सब श्रोताओं से एक बार फिर अपील करना चाहता हूं, समाचार पत्र पढ़े, मगर खरीद कर पढ़ें, मांग कर न पढ़ें. 
-डॉ. सौरभ मालवीय

(पुस्तक- 'राष्ट्रवादी पत्रकारिता के शिखर पुरुष अटल बिहारी वाजपेयी' से)

No comments:

Post a Comment

समाचार पत्र खरीद कर पढ़ें, मांग कर नहीं

    महाराष्ट्र के पुणे में 20 जनवरी, 1982 को ’तरुण भारत’ की रजत जयंती समारोह को संबोधित करते हुए श्री अटल बिहारी वाजपेयी ने समाचार पत्रों से...