Sunday, July 5, 2026

सरदार अली जाफ़री शांति के कवि हैं

   


5 जून, 1998 को मशहूर शायर सरदार अली जाफ़री को 33वां ज्ञानपीठ पुरस्कार प्रदान करते समय प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने उनकी काव्य विशेषताओं पर प्रकाश डाला. उन्होंने कहा कि सबसे पहले मैं सरदार अली जाफ़री को बधाई देता हूं, ज्ञानपीठ पुरस्कार इस वर्ष उन्हें प्राप्त हुआ है. वे हम सबके अभिनंदन के अधिकारी है. मैं ज्ञानपीठ परिवार को भी बधाई देता हूं कि उन्होंने मुझे यहां आने का सुअवसर दिया. आजकल राजनीति की जो दशा हो रही है, उसमें यह अच्छा ही है कि कम से कम थोड़ी देर के लिए साहित्य के वातावरण का लाभ उठाया जाए. गर्म लू के झोंकों से त्रस्त होकर अगर कोई व्यक्ति पेड़ों की शीतल छाया में पहुंच जाए, तो उसे अपने लिए यह सौभाग्य की बात ही समझनी चाहिए.

जनाब अली सरदार जाफ़री साहब से मेरा बहुत पुराना परिचय है. सचमुच में हमारा जन्म स्थान एक है. उनका जन्म बलरामपुर में हुआ था और मेरा राजनीतिक जन्म बलरामपुर में हुआ था. 1957 में मैं पहली बार लोकसभा का चुनाव लड़ने के लिए बलरामपुर गया था. लखनऊ से गाड़ी पकड़नी होती थी. छोटी लाइन थी. उससे पहले मैं बलरामपुर कभी नहीं गया था. लेकिन फ़ैसला हुआ, लड़ना है तो लड़ना है. मुझे शाम को गाड़ी में बिठाकर मित्र लोग चले गए. मैं अकेला था. जाते-जाते वो कह गए कि सवेरा जब आएगा तब बलरामपुर पहुंचोगे, सोते मत रहना. सवेरा होते-होते मेरी आंख खुल गई. मैंने सुना कि बाहर कौवों का बड़ा शोर हो रहा है. गाड़ी की खिड़की खोली, बाहर झांका, कुछ धुंधलका था, मगर हजारों कौवे वहां इकट्ठे थे, कांव-कांव कर रहे थे. मैंने पूछा, यह कौन-सा स्टेशन है ? कहा, यह कौवापुर है. इसके आगे बलरामपुर था. अभी भी बलरामपुर कौवापुर और इंटियालोक के बीच में है. 

बलरामपुर एक छोटी-सी जागीर थी. वहां के राजा महाराजा कहलाते थे. अली सरदार जाफ़री की कविता में उत्पीड़न और अत्याचार के खिलाफ संघर्ष का जो सबल स्वर उभरा है और जो हरेक हृदय को स्पर्श करता है, मुझे कभी-कभी लगता है कि बलरामपुर में बचपन में उन्होंने जो दृश्य देखे थे, उनकी छाया का एक अंग है. वे संघर्ष के कवि हैं, इंसानियत के कवि हैं, शांति के कवि हैं. यद्यपि कभी-कभी जंग का आह्वान भी उनकी कविता में सुनाई पड़ता है. जंग भी शांति के लिए. उत्पीड़न की समाप्ति के लिए. साम्राज्यवाद से लड़ने में उन्होंने इसी वृत्ति का परिचय दिया था.

जाफ़री साहब केवल कवि नहीं हैं, आलोचक हैं, कहानीकार हैं. जैसा डॊ. कर्णसिंह ने बताया, साहित्य के भंडार को उन्होंने भरा है. वे प्रगतिशील परंपरा के प्रमुख लेखक हैं. उनके विचारों से किसी का मतभेद हो सकता है, लेकिन उनकी पारदर्शी प्रामाणिकता सबको प्रभावित करती है और सब उसके सामने नत-मस्तक होते हैं. उर्दू और हिंदी को जोड़ने में इस समय अली सरदार जाफ़री एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं. आवश्यकता इस बात की है कि हिंदी का साहित्य और अन्य भारतीय भाषाओं का साहित्य उर्दू में प्रकाशित हो और उर्दू का साहित्य भारतीय भाषाओं में स्थान पाए.

अली सरदार जाफ़री ने ’कुमारसंभव’ का उर्दू अनुवाद किया है. एक अलग रंग, एक अलग रस है. कबीर के बारे में लिखा है, मीरा पर लिखा है, रूपांतरित किया है. रैदास पर उनकी लेखनी चली है और इस प्रकार एक बड़ा महत्वपूर्ण कार्य साहित्य की दृष्टि से, संस्कृतिक दृष्टि से उन्होंने अपने हाथ में लिया है. यह दिल्ली है. 15 अगस्त को जब भारत स्वाधीन हो रहा था, तब उन्होंने जो कुछ लिखा था और जो उसी समय पढ़ा गया था, आज पुनरावृत्ति की प्रतीक्षा करता है.

मेरी दिल्ली मेरी महबूब दिल्ली
ग़ालिब और मीर की सरज़मीं 
अब तू कासिम शहंशाहों की दास ना
और खुतकाम की जागीरदारों की लौंडी नहीं है
ग़ैर मुल्कों के सरमायदारों की मंडी नहीं है
तू हमारी उम्मीदों का मरकज़ है
ख़्वाबों की ताबीर है, आरज़ुओं की तस्वीर है

कवि की आंखों में क्या सपने थे, हम हमारी दिल्ली के बारे में, क्या उन्होंने सोचा था, शब्दों की सीमित शक्ति में भी उसे बड़े प्रभावशाली ढंग से उन्होंने प्रकट किया है. फिर उन्होंने भविष्य की तस्वीर खींची है कि बच्चे किस तरह से खिलखिलाकर हंसेंगे, माताएं किस तरह से भीगे हुए आंचलों को सुखाएंगी, देवियां किस तरह से मांग में सिंदूर भरेंगी, बीवियां किस तरह से माथे पर हबशा लगाएंगी, अजंता की शहज़ादियां किस तरह से नाचेंगी, एलोरा की परियां अपनी सदियों की खामोशी को तोड़कर किस तरह से गीत गाएंगी, केतकी और चम्पा की कलियां अपनी खुशबू बिखेरेंगी और हिमालय की झोली में हंसते हुए सुर्ख दिलकश कमल नाजुक हथेली पर रंगीन शामें जलाएंगे.

अली सरदार जाफ़री साहब को कमल पहले से आकर्षित करता रहा है, कोई नया आकर्षण नहीं है. कीचड़ में रहकर भी जो निष्कलंक कमल है और ऐसे कमल की आवश्यकता कदम-कदम पर हमारे जीवन में दिखाई देती है. लेकिन बाद में जो तस्वीर उभरी, देश की जो स्थिति बनी, कवि का मन खट्टा हो गया. पाठक के नाते सबके मन पर चोट करेगा. जाफ़री साहब ने लिखा है-

गरीब सीता के घर पर कब तक रहेगी रावण की हुक्मरानी
द्रौपदी का लिबास उसके बदन से कब तक छिना रहेगा
शकुंतला कब तक अंधी तक़दीर के भंवर में फंसी रहेगी
ये लखनऊ की शगुफ्तगी मक़बरों में कब तक दबी रहेगी
सरों के ऊपर मुसीबतों के पहाड़ कब तक गिरा करेंगे

आने वाले काल की एक झलक उन्होंने इस कविता के द्वारा प्रस्तुत की थी और इसीलिए उन्होंने कहा कि शायरी, शायरी नहीं है, नफ़्स की आवाज़, बादलों की गरज है, तूफ़ान की सदा है. नफ़्स की आवाज़ यानी युद्ध का आह्वान. किसके खिलाफ युद्ध का आह्वान ? गरीबी के खिलाफ, बेकारी के खिलाफ, भुखमरी के खिलाफ, सांस्कृतिक दरिद्रता के खिलाफ, विघटन के खिलाफ, विभाजन के खिलाफ आज भी उनकी आवाज़ बुलंद है.

मैं उन्हें आश्वासन देना चाहता हूं कि हम कभी जंग की शुरुआत नहीं करेंगे. हम आत्मरक्षा में विश्वास करते हैं. 24 साल तक भारत संयम से बैठा रहा, तब कोई प्रतिबंध नहीं था, किसी तरह की रुकावट नहीं थी, जगह-जगह अणु परीक्षण हो रहे थे. लेकिन हमने कहा, यह रास्ता हमारा रास्ता नहीं है. लेकिन हमने एक बात और कही कि जिन्होंने एटमी हथियार इकट्ठे कर रखे हैं, वो उन हथियारों को खत्म करने के लिए कदम उठाएं. किसी ने सुना नहीं. हमारे चारों ओर असुरक्षा के बादल घिरते रहे. फिर वैज्ञानिकों से विचार-विनिमय करके एक फैसला हुआ. हमने स्पष्ट किया है कि हम अब आगे अणु-परीक्षण नहीं करेंगे. हमने जो जानकारी प्राप्त की करनी थी, कर ली, वो आत्मरक्षा के लिए है, बचाव के लिए है, आक्रमण के लिए नहीं है, हमले के लिए नहीं है. लेकिन जिस तरह से तालियां बजाने के लिए दोनों हाथ चाहिए, हाथ मिलाने के लिए भी दो हाथ चाहिए. मुझे विश्वास है कि बुद्धिजीवियों की आवाज, संवेदनशील हृदयों का स्वर, विवेकशील नागरिक इस स्थिति को समझेंगे और इसके साथ अपने को जोड़ेंगे.

मेरा और जाफ़री साहब का केवल बलरामपुर का संबंध नहीं है, लखनऊ का भी है. अभी वो याद दिला रहे थे कि आगरे में भी हम इकट्ठे थे. आज उन्हें ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया है. ऐसा करके हमने सचमुच में जनाब अली सरदार जाफ़री को सम्मानित नहीं किया है, बल्कि उनका सम्मान करके स्वयं को सम्मानित किया है. अपने को सम्मनित किया है. जीवन-भर की उनकी साधना, उनका संघर्ष, उनकी देशभक्ति और सामाजिक न्याय के प्रति उनका समर्पण, ये सब अभिनंदन के अधिकारी हैं.

ज्ञानपीठ को मैं बधाई देता हूं, प्रवर समिति के अध्यक्ष डॊ. कर्णसिंह और उनके साथियों को बधाई देता हूं कि उन्होंने सही चुनाव किया. डाक-तार विभाग भी धन्यवाद का पात्र है, जिसने इस अवसर पर एक टिकट निकाला. भविष्य में वो ध्यान रखें कि अगर वो टिकट निकालते हैं, तो केवल पति का टिकट नहीं होना चाहिए, उसमें पत्नी का भी समावेश किया जाना चाहिए और सुष्मा जी को तो इसमें कठिनाई नहीं होनी चाहिए.
-डॉ. सौरभ मालवीय

(पुस्तक- 'राष्ट्रवादी पत्रकारिता के शिखर पुरुष अटल बिहारी वाजपेयी' से)

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