Monday, July 13, 2026

मेले ग्रामीण परंपरा के अंग हैं

   


श्री अटल बिहारी वाजपेयी ने 11 जनवरी, 1999 को स्वदेशी मेले का उदघाटन करते हुए मेलों की उपयोगिता पर प्रकाश डाला. उन्होंने कहा कि मुझे उदघाटन के लिए बुलाया गया है या समापन के लिए ? मेरे बोलने के बाद क्या कार्यक्रम समाप्त होने वाला है ? मैं आभारी हूं, मुझे स्वदेशी मेले में आमंत्रित किया गया. मेला शब्द मुझे प्रिय है. मेले में मिठास है, मेले में सुगंध है. एक शब्द अंग्रेजी का प्रयोग करते हुए मैं पूछूंगा एग्जीबिशन तो खुला प्रदर्शन है. उसके बारे में तो कहने की भी आवश्यकता नहीं पड़ती. लेकिन गांवों में जो मेले होते हैं, ग्रामीण परंपरा के अंग हैं. उनमें समाज के सभी वर्गों का और जीवन के सभी विभिन्न क्षेत्रों का बड़ा सरस रूप होता है. मेले में खरीद-बिक्री तो होनी ही है. लेकिन कथा-वार्ता भी होती है, खेल-तमाशों का आयोजन भी किया जाता है. पहलवानों के लिए दंगल की भी व्यवस्था होती है. हरेक मेले का अलग-अलग रूप होता है. मेला नदी के किनारे जलाशय के तट पर या किसी पूजा स्थल के आसपास आयोजित किया जाता है.

मैं समझता हूं कि स्वदेशी मेला भी इस ध्येय का पालक होगा. भारत माता को निरंतर सौभाग्य से मंडित करने के लिए हम लोग प्रयत्नशील हैं. भारत को सोने की चिड़िया कहा जाता था, संयोजकों ने जो दस्तावेज प्रकाशित किया है, उसमें इस बात का उल्लेख है. भारत फिर से सोने की चिड़िया बने, यह हमारी महत्वाकांक्षा है. मेले का आयोजन कर भारत के औद्योगिक क्षेत्र में अब तक जो उपलब्धियां हुई हैं, उनका और भारत की जो क्षमता है औद्योगिक क्षेत्र में उनका, प्रभावशाली प्रस्तुतिकरण करने का प्रयास किया गया है. हम सबकी इच्छा है कि भारत एक महान शक्तिशाली और समृद्ध राष्ट्र बने. इसके लिए स्वदेशी की भावना को निरंतर जागृत करना आवश्यक है.

स्वदेशी के आधार पर स्वावलंबी भारत बनाना, अपने पैरों पर खड़ा करना है. शक्ति हमें स्वयं प्रकट करनी होगी. समृद्धि भी अपने प्रयासों से लानी होगी. हम परावलंबी बनने की भूल नहीं कर सकते. हम परावलंबी होकर विकृत जीवन नहीं जी सकते. हमें अपने पैरों पर खड़ा होना है. हम अपने परिश्रम से, अपनी प्रतिभा से, अपने सहयोग से, अपनी आस्था से, राष्ट्रहित की निष्ठा से जिस शक्ति का अर्जन करेंगे, वह शक्ति टिकाऊ होगी. वही हमें शक्तिशाली बनाएगी. उधार की शक्ति से कोई शक्तिशाली नहीं होता. ये सदी समृद्धि की है. बाहर वाले हमें मदद दें. लेकिन जितना बड़ा महान कार्य हमारे सामने है, वह केवल बाहर की मदद से नहीं हो सकता. उसके लिए संसाधन जुटाने पड़ेंगे. इसके लिए परिश्रम भी बड़ा करना होगा. पारदर्शी प्रामाणिकता का परिचय देना होगा. 

हमारे यहां उद्योगों की अलग-अलग श्रेणियां हैं. मुझे बताया गया है कि मेले की विशेषता यह है कि इसमें सभी तरह के उद्योगों का प्रतिनिधित्व है. खासकर जो नॊन-कॊर्पोरेट सेक्टर है, उसको और अधिक सहायता की आवश्यकता है, प्रचार की आवश्यकता है. हमारे पास अच्छी सामग्री है. सेवाएं भी उपलब्ध हैं. लेकिन प्रचार के मैदान में हम मात खा गए हैं. इसका कोई उपाय निकालना पड़ेगा. हमारे छोटे और लघु उद्योगों के बारे में दुनिया कितना जानती है. वे सबसे अधिक रोजगार देते हैं, सबसे अधिक विदेशी मुद्रा कमाते हैं. लेकिन उनके सामने बाजार की समस्या है. इसलिए उन्हें संरक्षण देने का फैसला किया गया है. लेकिन उस संरक्षण को भी कुतरने की कोशिश होती रहती है. देश में एक ऐसी मानसिकता का विकास हुआ है और वह मानसिकता केवल आज की देन नहीं है, हमें वह उत्तराधिकार में मिली है, विरासत में मिली है. इस मानसिकता में केवल बड़े उद्योगों की प्रशंसा की जाती है और छोटे उद्योग उपेक्षित रह जाते हैं हम इस संस्कृति को बदलने का प्रयास कर रहे हैं. और अगर समय मिला, सहयोग मिला, तो हम इसे बदलकर दिखा देंगे. आज हम आपको आश्वासन देना चाहते हैं.

स्वदेशी एक साधना है. इस भावना को हमें बनाए रखना पड़ेगा. इसके लिए यह जरूरी है कि हम सब राष्ट्र का सही निर्माण करने का बीड़ा उठाएं. सचमुच में, पचास साल में जिन समस्याओं का समाधान हो जाना चाहिए था और वो समस्याएं पैदा ही नहीं होनी चाहिए थीं, गलत नीतियों के कारण आज पैदा हो गई हैं. हमारे पास लिखने के लिए साफ पट्टी नहीं है, ठीक स्लेट नहीं है, टेढ़ी-मेढ़ी इबारत से लिखी पट्टी हमें मिली है. अब हमें फिर से उसमें अक्षर लिखना है. सरकार की सीमाएं हैं. आर्थिक संकट भी है. वह संकट केवल भारत तक ही सीमित नहीं है, और देश भी उसकी चपेट में आ रहे हैं. सबको मिलकर यह सोचना पड़ेगा कि हमने किस तरह का प्रयास किया. हमें किस तरह से करना था. आर्थिक संकट, जिसके कारण आज देश संकट में है, एक के बाद एक पड़ते जा रहे हैं. हमें अनगिनत समस्याओं का समाधान करना पड़ रहा है. वे समस्याएं क्यों उत्पन्न हुईं ? बेरोजगारी बढ़ रही है, विषमता बढ़ रही है. और दूसरी ओर हमें मतभेदों को समाप्त करना है. सरकारी कारखाने बड़े उत्साह से चलाए गए थे. वे राष्ट्र की संपत्ति हैं. यह मानकर उन्हें प्रश्रय दिया गया, प्रोत्साहन दिया गया. आज उनमें से अनेक सरकारी फर्मों की हालत खराब है, बंद हो रहे हैं, या बंद होने की कगार पर हैं. यह स्थिति क्यों पैदा हुई ? बड़े उद्योगों की ओर ध्यान दिया हमने. लेकिन फिर भी बड़े उद्योगों को राष्ट्र के निर्माण में जैसा योगदान देना चाहिए था, नहीं दे पाए. इस पर गहराई से विचार करना होगा.

मैं इस सुझाव का स्वागत करता हूं कि प्राइवेट सेक्टर के अलावा भी जिन क्षेत्रों में आर्थिक गतिविधियां चलती हैं, जिनका योगदान है, उत्पादन में, सेवा में, उनसे सरकार का वार्तालाप होना चाहिए. विचार-विनिमय होना चाहिए. यह भ्रम पैदा किया गया है कि सरकार विदेशी दबाव में आकर काम कर रही है. इस आरोप में कोई सच्चाई नहीं है. हम किसी दबाव में आने वाले नहीं हैं. भारत अनेक दबाव के सामने दृढ़ रहने की शक्ति रखता है. अगर हम दबाव में होते, तो पोखरण का परमाणु परीक्षण कभी नहीं करते. हमें पता था कि आर्थिक संकट का सामना करना होगा. हम जानते थे कि प्रतिबंध लगेंगे. हम जानते थे कि बाहर से पूंजी लेने का मार्ग कठिन होगा. लेकिन हमने राष्ट्रीय सुरक्षा को सर्वोपरि समझा और सब दबावों का सामना करते हुए भी सुरक्षा के प्रति अपने कर्तव्य का पालन किया. आर्थिक क्षेत्र में हम किसी दबाव में आने वाले नहीं हैं. दबाव डाले जाते हैं, दबाव डाले जाएंगे.

दुनिया की नजर हमारे बड़े बाजार पर है. इतना बड़ा देश. इतना बड़ा लोकतंत्र, चलो चलते हैं, माल बेचें. उनकी यह सहज स्वाभाविक लालसा समझ में आ सकती है. लेकिन हमें तो अपने हितों का रक्षण करना पड़ेगा. कोई भी ऐसी नीति बनाई जाएगी, कोई भी कदम उठाए जाएंगे, वे राष्ट्र की कसौटी पर खरे उतरने के बाद ही उठाए जाएंगे. इसमें सबके विचारों का आदान-प्रदान होते रहना चाहिए, यह मैं मानता हूं. इसमें अगर कोई कमी रह गई, तो उसे ठीक किया जाएगा. लेकिन अब इस भ्रामक प्रचार में न आएं. क्या इस क्षेत्र में सरकार जो कदम उठाती है, वो किसी के दबाव में आकर उठाती है ? नीतियों के बारे मे प्रामाणिक मतभेद हो सकता है. प्रामाणिक मतभेद के लिए हमेशा गुंजाइश रहती है. लेकिन किसी की प्रामाणिकता पर संदेह नहीं किया जाना चाहिए. भारत को खरीदने वाला कोई माई का लाल पैदा नहीं हुआ है. और भारत को बेचने वाला कोई कपूत भी भारत माता की कोख से कभी पैदा नहीं होगा. कौन इस महान देश को खरीद सकता है ? यह बहुत प्रचार किया जा रहा है कि ईस्ट इंडिया कंपनी के दिन आने वाले हैं. कोई सच्चाई नहीं है इसमें. ईस्ट इंडिया कंपनी के दिन आएं, इसका प्रश्न ही पैदा नहीं होता. उस समय तराजू की डंडी, राजदंड में बदल गई, तब देश बिखरा हुआ था, बंटा हुआ था. आज देश एक है. सौ करोड़ की जनसंख्या एक झंडे के नीचे खड़ी है. चुनौतियों का जवाब देने के लिए तैयार है.

आज हम अनाज के क्षेत्र में आत्मनिर्भर हैं. कुछ फसलें ऐसी हैं, जिनके साथ संकट पैदा हो जाता है. कभी मौसम साथ नहीं देता है, तो प्यास मुद्दा बन जाता है. पहले प्याज इसलिए संकट पैदा कर रहा था कि उसका दाम ज्यादा था, आजकल प्याज कुछ क्षेत्रों में इसलिए संकट पैदा कर रहा है कि उसका दाम गिर रहा है. प्याज कम हो तो संकट, प्याज ज्यादा हो तो संकट. लेकिन आत्मनिर्भरता की ओर हम बढ़ रहे हैं. और भी बढ़ेंगे. भारत का विकास स्वगुणों से होना चाहिए. विकासशील देश भारत की ओर देख रहे हैं. उनके प्रति भी हमारा कुछ कर्तव्य है. हम पड़ौसियों के साथ अच्छे संबंध स्थापित करना चाहते हैं. इसीलिए आर्थिक आजादी प्राप्त करना चाहते हैं. आर्थिक सहयोग बढ़ाना चाहते हैं. क्योंकि इस देश की अर्थव्यवस्था अगर ठीक हो जाए, तो अनेक समस्याएं हल हो सकती हैं. इस कारण सभी को सहयोग देना चाहिए. इस कारण सभी को सहायता देनी चाहिए.

मैं स्वदेशी मंच के कार्यक्रम में जा रहा हूं. इस बात को लेकर काफी हलचल है. पता नहीं क्यों हलचल है. स्वदेशी मंच जो चला रहे हैं, वे भी मेरे मित्र हैं. मैं सरकार में हूं, कोई फर्क नहीं पड़ता, स्वदेशी मंच अपना काम करे. हमें सलाह देता रहे. वह सलाह हमें जंची, तो अपनाएंगे. नहीं जंची, तो माफी मांग लेंगे कि क्षमा कीजिए, हम आपके विचार से सहमत नहीं हैं.  विचारों में विभिन्नता है. लेकिन लक्ष्य एक है. और वह एक लक्ष्य है महान शक्तिशाली, समुद्धशाली भारत की रचना. हमारे आदर्श समान हैं. उन आदर्शों से प्रेरणा लेते हुए और भारत के प्रति अपने सपनों को साकार करने का संकल्प लेते हुए हम आगे बढ़ें. स्वदेशी मेला उस यात्रा में सहायक बने, यही कामना है.
-डॉ. सौरभ मालवीय

(पुस्तक- 'राष्ट्रवादी पत्रकारिता के शिखर पुरुष अटल बिहारी वाजपेयी' से)

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