Monday, July 13, 2026

भारतीय राष्ट्र का मूल

   


राष्ट्रीय एकता को सुदृढ़ बनाने के लिए आवश्यक है कि हम राष्ट्र की स्पष्ट कल्पना लेकर चलें. राष्ट्र कुछ संप्रदायों अथवा जनसमूहों का समुच्चय मात्र नहीं, अपितु एक जीवमान इकाई है, जिसे जोड़-तोड़कर नहीं बनाया जा सकता.  इसका अपना व्यक्तित्व होता है, जो उसकी प्रकृति के आधार पर कालक्रम का परिणाम है. उसके घटकों में राष्ट्रीयता की यह अनुभूति, मातृभूमि के प्रति भक्ति, उसके जन के प्रति आत्मीयता और उसकी संस्कृति के प्रति गौरव के भाव में प्रकट होती है. इसी आधार पर अपने-पराये का, शत्रु-मित्र, अच्छे-बुरे और योग्य-अयोग्य का निर्णय होता है. जीवन की इन निष्ठाओं तथा मूल्यों के चारों ओर विकसित इतिहास, राष्ट्रीयता की भावना घनीभूत करता हुआ उसे बल प्रदान करता है. उसी से व्यक्ति को त्याग और समर्पण की, पराक्रम और पुरुषार्थ की, सेवा और बलिदान की प्रेरणा मिलती है.

भारत एक प्राचीन राष्ट्र है. स्वतंत्रता की प्राप्ति से, इसके चिरकालीन इतिहास में एक नया अध्याय का प्रारंभ हुआ. किसी नवीन राष्ट्र का जन्म नहीं. नया राष्ट्र बनाने की चर्चा का परिणाम जीवन-मूल्यों की अवहेलना और आत्म-विस्मृति में हुआ है. फलत: हमारे राष्ट्रीय मानस में एक गांठ पड़ गई है और द्वैत भाव की सृष्टि हुई है. घर और बाहर के राजनीतिक और सांस्कृतिक जीवन के अलग-अलग आदर्श बन गए हैं. भारत के ऋषि-महर्षियों , स्मृतिकारों, पुराण-निर्माताओं, साधु-संन्यासियों. कवि-कलाकारों, सम्राटों-सेनापतियों और संतों तथा सुधारकों ने जिस एकात्मक जीवन के ताने-बाने को बुना था, आज वह उपेक्षा तथा उपहास का विषय बनाया जा रहा है. जिन उपादानों ने हमें हजारों साल तक एक  बनाए रखा, जिनके कारण हम बाहरी आक्रमण और आंतरिक विघटन के बावजूद अपने अस्तित्व को कायम रख सके, उन्हें आज तिरस्कृत किया जा रहा है. यह एकता की प्राप्ति का नहीं, बची-खुची एकता को भी खतरे में डालने का मार्ग रहा है. आवश्यकता है कि हम राष्ट्र की प्राचीनता को मान्य करें और उसके सही स्वरूप को समझें.

भारतीय राष्ट्र का मूल स्वरूप राजनीतिक नहीं, सांस्कृतिक है. सांस्कृतिक एकता की अनुभूति ही राजनीतिक एकता के पक्ष की प्रेरक शक्ति रही है. राजनीतिक एकता के अभाव ने देश की सांस्कृतिक धारा को कभी खंडित नहीं होने दिया. जहां एक ओर हम भारत की संस्कृति से अभिन्न रूप से संबद्ध अनेक राजनीतिक इकाइयों के प्रति उदासीन तथा सहिष्णु रहे हैं, वहां दूसरी ओर भारतीय संस्कृति से भिन्न उसके विकृत अथवा विरोधी भाव पर आधारित, कोई भी राजनीतिक सत्ता हमें मान्य नहीं हुई. हम सदैव उसके विरुद्ध संघर्ष कर रहे हैं.

विविधता में एकता भारतीय संस्कृति की विशेषता रही है. हमने एकरूपता की नहीं, अपितु एकता की कामना की है. फलत: देश में अनेक उपासना पद्धतियों, पंथों, दर्शनों, जीवन-प्रणालियों, भाषाओं, साहित्यों और कलाओं का विकास हुआ, जो संपन्नता की द्योतक हैं. हमें उनके प्रति अपनत्व और गौरव का भाव लेकर चलना होगा. किंतु विविधता के नाम पर विभाजन को प्रोत्साहन देना भूल होगी. भारतीय संस्कृति कभी किसी एक उपासना पद्धति से बंधी नहीं रही और न उसका आधार प्रादेशिक ही रहा है. मजहब अथवा क्षेत्र के आधार पृथक संस्कृति की चर्चा तर्क विरुद्ध ही नहीं, भयावह भी है, क्योंकि वह राष्ट्रीय एकता की जड़ पर ही कुठाराघात करती है. 

क्षेत्र, प्रदेश, जाति, पंथ, भाषा, भूषा आदि के आधार पर भारतीय जन की पृथकता की कल्पना भ्रामक है. उनके आधार पर भारत में अनेक राष्ट्रों अथवा राष्ट्रीयताओं के अस्तित्व का विचार भी मूलत: अशुद्ध है. हम एक राज्य में रहने के कारण एक नहीं हैं, अपितु हम एक हैं, इसलिए भारत एक राष्ट्र है.

राष्ट्र के प्रति अनन्य निष्ठा ही राष्ट्रीयता का निकष होने के कारण भारत के सभी जनों को अपनी निष्ठाओं को इसके अधीन बनाना होगा. इसके लिए दोहरा प्रयत्न आवश्यक है. एक ओर जहां अपने प्रदेश, पंथ अथवा जाति के प्रति निष्ठा रखने वालों को राष्ट्रनिष्ठ बनाना होगा, वहां दूसरी ओर भारत से बाहर निष्ठा रखने वालों को फिर से, चाहे वे पाकिस्तानपरस्त हों, अथवा रूस और चीन के भक्त, उन्हें उससे विरत करना होगा.

उपासना मत और ईश्वर संबंधी विश्वास की स्वतंत्रता भारतीय संस्कृति की परंपरा रही है. भारतीय संविधान ने भी इसे स्वीकार किया है. किंतु मजहब के आधार पर किसी को ’अल्पमत’ अथवा ’बहुमत’ वाला मानना न तो राष्ट्रीय एकात्मकता के लिए हितावह है और न सत्यसंगत ही. मुसलमान अथवा ईसाई कहीं बाहर से नहीं आए. उनके पूर्वज हिंदू ही थे. मजहब बदलने से राष्ट्रीयता बदलती है और न संस्कृति में परिवर्तन होता है. मुसलमानों अथवा ईसाइयों को अल्पमत मानने का अर्थ होगा मजहब को राजनीतिक, आर्थिक, समाज-जीवन के सभी क्षेत्रों में विभाजक रखा स्वीकार करना. यह तो प्रच्छन्न रूप से द्विराष्ट्रवाद अथवा बहुराष्ट्रवाद को मान्यता देनी होगी.

सुखेद कहना पड़ता है कि भारतीय राष्ट्रवाद की साधना में मुस्लिम मतावलंबियों का व्यापक सहयोग नहीं मिल पाया. उन्होंने राजनीति और मजहब को एक मानकर ही अधिकांश प्रयत्न किए. परकीय सत्ता के साथ अपने को एकरूप करने के कारण मुस्लिम  समाज के जीवन में अनेक ऐसी विकृतियां आ गईं, जिनका इस्लाम के साथ कोई संबंध नहीं है. यहां के समाज से अपने-आपको पृथक सिद्ध करने की लालसा में धीरे-धीरे उन्होंने, उन सब प्रथाओं, रहन-सहन की पद्धतियों एवं रीति-नीतियों से अपने को अलग कर लिया, जो यहां के जन को इस भूमि से जोड़े हुए हैं.

इतना ही नहीं, उन्होंने राम और कृष्ण को अपना पूर्वज मानने से भी इंकार कर दिया. यहां के परंपरागत त्यौहारों से, जिनका संबंध किसी मजहब से न होकर यहां की मिट्टी और मौसम से है, अपने को दूर रखा. इस प्रसंग में पारसियों का उल्लेख करना आवश्यक है. अपने मजहब को सुरक्षित रखते हुए भी, उन्होंने न तो कभी भेदभाव की शिकायत की और न कभी संरक्षण ही मांगा है. अपनी योग्यता और समाजनिष्ठा के बल पर उन्होंने देश का सभी क्षेत्रों में नेतृत्व किया है. उनका उदाहरण अनुकरणीय है.
-डॉ. सौरभ मालवीय

(पुस्तक- 'राष्ट्रवादी पत्रकारिता के शिखर पुरुष अटल बिहारी वाजपेयी' से)

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