भाऊराव देवरस सेवा न्यास द्वारा 19 मई, 1995 को उत्तर प्रदेश के लखनऊ में आयोजित समारोह को अध्यक्ष के रूप में संबोधित करते हुए श्री अटल बिहारी वाजपेयी ने भारतीय संसद की स्थिति पर प्रकाश डाला. अपने भाषण में उन्होंने कहा कि जैसा आपने अभी सुना मुझे बहुत छोटा-सा, मगर बहुत मीठा-सा काम करना है. मुझे आज के वक्ता का परिचय देना है. यह तो सभी जानते हैं कि पाटिल साहब लोकसभा के अध्यक्ष हैं, लेकिन यह बात सब लोग नहीं जानते कि किस तरह से महाराष्ट्र के औरंगाबाद क्षेत्र के एक छोटे-से गांव में जन्म लेकर, म्युनिसिपैलिटी, विधानसभा और फिर लोकसभा- इन सारी सीढ़ियों को पार करके पाटिल साहब आज जिस ऊंचे स्थान पर पहुंचे हैं, वह बिना कठोर परिश्रम के, बिना प्रामाणिकता के, बिना गंभीर अध्ययन के, और कर्म और व्यवहार में बिना समन्वय के प्राप्त नहीं किया जा सकता. मैं तो उन लोगों में से हूं, जो सीधे लोकसभा में छलांग लगाकर पहुंच गए. लेकिन आज लोकसभा का संचालन जिनके हाथ में है, वे अपने जीवन के सारे अनुभवों के निचोड़ के आधार पर और विश्व की परिस्थिति और भारत की दशा, इनका सही आकलन करने के बाद संसदीय लोकतंत्र देश में किस तरह से शक्तिशाली होगा, इसकी चिंता में लगे हैं और इसके चिंतन में भी लगे हैं. पहले वे म्युनिसिपैलिटी के अध्यक्ष बने, फिर महाराष्ट्र विधानसभा के सदस्य बने, वहां उपमंत्री रहे, फिर डिप्टी स्पीकर चुने गए, फिर स्पीकर चुने गए, फिर लोकसभा में आए, मंत्री पद का दायित्व संभाला, अनेक मंत्रालय देखे, सुरक्षा मंत्रालय से विशेष संबंध रहा. स्पीकर के नाते वे लोकसभा के सदस्यों का नियमन करते हैं. हमें अनुशासन में रखते हैं. सदन की मर्यादा बनाए रखने के लिए बड़े तत्पर रहते हैं. लोकतांत्रिक जीवन-मूल्यों में उनकी आस्था संसद की कार्यवाही में भी देखी जा सकती है.
हमारा लोकतंत्र संसार का सबसे बड़ा लोकतंत्र है. लोकतंत्र की परंपरा हमारे यहां बड़ी प्राचीन है. यह ठीक है कि आज लोकतंत्र का जो ढांचा हम विकसित कर रहे हैं, उसका ऊपरी आवरण, ब्रिटेन की संसदीय पद्धति का है. लेकिन बात ढांचे की नहीं हो रही है. वाद-विवाद के द्वारा, शास्त्रार्थ के द्वारा, विवादग्रस्त प्रश्नों का नियमन करना, यह जिस देश की परंपरा में और प्राचीन संस्कृति में घुला हुआ है, वह सचमुच में, संसार में लोकतंत्र का ध्वजवाहक बनकर आगे चले, इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है. भारत में ऐसा होता था. यहां जो गणतंत्र थे, उनमें मतदान की प्रक्रिया थी. समितियों का निर्माण करके प्रश्न तय करने का विधान था. बाद में कालखंड ऐसा आया कि हमारा विकास अवरुद्ध हो गया. आज हम फिर से संसार के सबसे बड़े लोकतंत्र के रूप में खड़े हैं. नये-नये आजाद हुए देश के लोकतंत्र को अपने लिए अनुकरणीय समझते हैं. वे चकित हैं कि पचास साल से, निर्बाध रूप से, लोकतंत्र चल रहा है. उनके यहां तो लोकतंत्र कठिनाइयों में पड़ जाता है. कठिनाइयों में हम भी पड़ जाते हैं, लेकिन उन कठिनाइयों में से निकल भी जाते हैं. उसमें भी लोकतंत्र की शक्ति प्रकट होती है. लोक शक्ति का प्रकटीकरण होता है. लेकिन वे हमारे लोकतंत्र को बड़ी ललचायी नजरों से देखते हैं. अभी-अभी यूरोप में क्रांतिकारी परिवर्तन हुआ. सोवियत साम्राज्य बिखर गया. अनेक देशों ने अपनी खोई हुई स्वाधीनता पा ली. नागरिकों ने भी व्यक्तिगत स्वाधीनता अर्जित की. अब वहां लोकतंत्र चल रहा है. वे हमसे सीखना चाहते हैं. वे जानना चाहते हैं कि हम लोकतंत्र को किस तरह से सफलतापूर्वक चला रहे हैं ? इसमें पाटिल साहब का योगदान उल्लेखनीय है.
पाटिल साहब ने जहां इस बात पर बल दिया है कि कानून बनाने के साथ-साथ लोकसभा जन-जीवन के ज्वलंत प्रश्नों पर भी अपना अभिमत प्रकट करती रहे, वहां लोकसभा किस तरह से सरकार पर अंकुश लगा सकती है, उसके खर्चों पर, इसके लिए उन्होंने संसदीय पद्धति का प्रारंभ किया है. अभी तक हम लोकसभा में चर्चा करके अलग-अलग मंत्रालयों की मांगों पर अपना अभिमत प्रकट कर दिया करते थे, लेकिन ब्यौरे में जाकर विवरण में जाकर, एक-एक खर्चे की गहराई में जाकर देखना सदन के लिए संभव नहीं होता था. इतना समय भी नहीं था और इतना लोग ध्यान लगाकर काम करें, ऐसा भी नहीं होता था. अब संसदीय समितियां काम कर रही हैं. लोकसभा का कोई न कोई सदस्य किसी न किसी समिति का सदस्य है. अलग-अलग मंत्रालयों की देखरेख का काम इन समितियों के पास है और वे समितियां मंत्रालयों की पूरी छानबीन करती हैं. कितना बजट था, कितना पैसा खर्च हुआ और ज्यादा खर्च हुआ, तो क्यों ज्यादा खर्च हुआ ? उनके सामने अधिकारी आते हैं. उनकी गवाहियां ली जाती हैं. समितियां रिपोर्ट देती हैं. सदन रिपोर्ट की चर्चा कर सकता है, उस मंत्रालय के बारे में, उस मंत्रालय की विभिन्न गतिविधियों के बारे में. यह बड़ा प्रयोग है. पहले आशंका थी. मन में संदेह था. अब धीरे-धीरे वे संदेह छंट गए हैं और संसदीय पद्धति, स्थायी समितियों की जो परिकल्पना है, वह अधिकाधिक लोगों को पसंद आ रही है.
पाटिल साहब केवल भारत की लोकसभा का संचालन करते हैं, ऐसा नहीं है. कॊमनवेल्थ के देशों का एक संगठन है, वे इसकी भी अध्यक्षता कर चुके हैं. सारे संसार की पार्लियामेंट की एक एसोसिएशन है, वे उसकी भी अध्यक्षता कर चुके हैं. अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलनों में भारत का प्रतिनिधित्व करते हैं और भारतीय लोकतंत्र की प्रतिभा से और प्रतिमा से सबको प्रभावित रखते हैं. वे लोकसभा के अध्यक्ष हैं, और मैं एक छोटा-सा सदस्य हूं. आप जानते हैं. अभी राजनाथ सिंह जी लोकसभा अध्यक्ष को और मुझको समकक्ष रख रहे थे कि तीन-तीन बत्तियां इन्होंने जलाईं. मैं तीन बत्तियां नहीं जलाना चाहता था और चाहता था कि राजनाथ सिंह जी भी एकाध बत्ती जलाएं. लेकिन इन्होंने सारा भार मेरे ऊपर छोड़ दिया. लोकसभा के अध्यक्ष के ऊंचे आसन पर जो बैठता है, मुझे कभी बोलने का अवसर दे या न दे और कभी अध्यक्ष महोदय कह सकते हैं कि माननीय सदस्य ! आप सदन के बाहर जाइए और मैं आज्ञा का उल्लंघन नहीं कर सकता. यह बात अलग है कि ऐसी स्थिति आएगी नहीं, लेकिन कुछ सदस्यों के लिए आती है और तब वे जड़ हो जाते हैं. शांति से समझा-बुझाकर ताकि पार्लियामेंट की गरिमा बनी रहे. यह बात अलग है कि गरिमा क्षीण हो रही है, लेकिन उनकी पूरी कोशिश है कि वह बनी रहे.
और, इस काम में जितना योगदान मैं दे सकता हूं, देता रहता हूं. यद्यपि मेरी पार्टी वालों को भी कभी-कभी ऐसे क्षण आंदोलित कर देते हैं, जब उनकी इच्छा भी कुएं में कूदने की होती है. जो अध्यक्ष के सामने जगह होती है, लोकसभा में उसको ’वैल’ कहते हैं ’वैल’. और मेम्बर अपना स्थान छोड़कर कुएं में आ जाते हैं, तो समझो कि दो-दो हाथ होने वाले हैं. ये दो-दो हाथ जबान से ही होते हैं. अब उसको भी टाला जाना चाहिए.
40 साल से ऊपर का मेरा संसद का अनुभव कभी-कभी मुझे बहुत पीड़ित कर देता है, दुखी कर देता है. हम किधर जा रहे हैं ? और जब मैं यह बात कह रहा हूं, तो खाली दिल्ली की संसद ही मेरे ध्यान में है, लखनऊ का विधानमंडल तो मेरे ध्यान में बिल्कुल नहीं है. यहां तो सारी मर्यादाएं टूट गई हैं. सारे मूल्य जैसे ताक पर रख दिए गए हैं. मैं किसी एक पार्टी को इसके लिए दोष नहीं देता, क्योंकि पार्टी समाज में से उत्पन्न हुई है और समाज के समर्थन से खड़ी है. निर्वाचित होकर आई है. लेकिन कुछ मूल्य ऐसे हैं, जिनके साथ समझौता नहीं होना चाहिए. सरकारें बदलेंगी. कोई सरकार स्थिर नहीं है. लेकिन संसद रहेगी, विधानमंडल रहेगा. और वह अगर रहेगा, तो उसे चलाना होगा, नियमों के अनुसार, निर्देशों के अनुसार, परंपरा के अनुसार, मर्यादा में रहकर, सीमाओं के भीतर. स्वतंत्रता और उच्छृंखलता में अंतर है. स्वतंत्रता में अपने को बांधने का भाव है. कोई दूसरा बांधे, विरोध करेंगे. इसीलिए पराधीनता के खिलाफ लड़े, लेकिन हम स्वेच्छा से ऐसे बंधन में बंध सकते हैं, जो हमारी आत्माभिव्यक्ति में सहायक हो. जो हमारे कल्याण का भी रास्ता बनाए और जो पूरे समाज को भी कल्याण के पथ पर ले जाए, प्रगति के पथ पर ले जाए.
मित्रों, भाषण देने की मेरी कोई इच्छा नहीं है. मैं तो न्यास के अध्यक्ष के नाते पाटिल साहब का बहुत आभारी हूं कि उन्होंने हमारा निमंत्रण स्वीकार किया. यह कार्यक्रम प्रेस में काफी चर्चा का विषय बन चुका है. अभी भी अटकलें लगाई जा रही हैं. तिवारी जी आए थे, तब भी मैंने कहा था, आज मैं फिर दोहराता हूं कि यह गैर राजनीतिक मंच है. मैं दल से जुड़ा हुआ हूं, मगर दल से जुड़ा हूं यह मेरे जीवन का, मेरे आचरण का एक पहलू है. और भी पहलू हैं और उनमें मैं दल की बात नहीं आने देता. और ’दल-दल’ की बात तो बिल्कुल नहीं आने देता. दल अपनी जगह है. राजनीति सर्वांग जीवन नहीं है, उसका एक पहलू है. और यही शिक्षा हमने पाई है, यही संस्कार हमने पाए हैं. लेकिन आज हर चीज़ को राजनीति के लक्ष्य से नत्थी कर दिया जाता है, बांध दिया जाता है. इसमें व्यक्ति का सही मूल्यांकन नहीं हो पाता और परिस्थिति का भी सच्चा आकलन नहीं हो पाता. इसी का कारण है कि राजनीति में अस्पृश्यता बहुत बढ़ गई है. एक-दूसरे को जैसे सहन नहीं कर सकते. एक-दूसरे के प्रति आदर से बोल नहीं सकते. इसीलिए ब्रिटेन की पार्लियामेंट का नियम है कि मेम्बर का नाम नहीं लिया जाएगा. ’आनरेबिल मेम्बर’ कहा जाएगा. और जहां से चुनकर आया है- ’ आनरेबिल मेम्बर फ्रॊम लखनऊ’ इतना काफी है. यहां असल में कहां से चुनकर आया है, इसकी तो गिनती ही नहीं होती. नाम, बिना किसी आदर के, बिना किसी सम्मान के भाव के लिए जाते हैं, गाली-गलौच होती है. बड़ा दुख होता है. मैंने पाटिल साहब से कहा कि आप चलिए, शायद आपकी उपस्थिति का, आपके आचरण का, आपके भाषण का लखनऊ पर भी कुछ असर होगा. लखनऊ के राजनेताओं पर असर होगा. और आज, उनकी उपस्थिति यहां लखनऊ में ’भाऊराव देवरस सेवा न्यास’ के अंतर्गत होने वाले कार्यक्रम में, जो देश की राजनीति के लिए शुभ संकेत है. यह इस बात का प्रमाण है. भले ही कठिनाइयां आ रही हों, मगर अंत में हम लोकतंत्र की मशाल को जलता हुआ रखने में सफल होंगे और यह मशाल निरंतर हमारा पथ-प्रदर्शन करती रहेगी.
मित्रों, यह व्याख्यानमाला आरंभ की गई है, आज इसका दूसरा पुष्प गूंथा जाना है. श्री शिवराज पाटिल जी ने हमारा आमंत्रण स्वीकार किया, हम उनके आभारी हैं. अब मैं उनको भाषण के लिए आमंत्रित कर रहा हूं.
सवेरे कुछ लोग हवाई अड्डे पर गए थे और वे पाटिल साहब को पुष्पमाला अर्पित करने के अवसर से वंचित हो गए थे. अगर वे पुष्प अभी तक सूखे न हों और उनमें से कोई पुष्प लाए हों, तो मैं निमंत्रण देता हूं कि वे पाटिल साहब को यहां आकर सम्मान करें.
-डॉ. सौरभ मालवीय(पुस्तक- 'राष्ट्रवादी पत्रकारिता के शिखर पुरुष अटल बिहारी वाजपेयी' से)


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