विजय का पर्व ! जीवन-मरण के संग्राम की काली घड़ियों में क्षणिक पराजय के छोटे-छोटे क्षण, अतीत के गौरव की स्वर्णिम गाथाओं के पुण्य स्मरण मात्र से प्रकाशित होकर विजयोन्मुख भविष्य का पथ प्रशस्त करते हैं. अमावस के अभेद्य अंधकार का अंत:करण पूर्णिमा की उज्ज्वलता का स्मरण कर थर्रा उठता है.
सरिता की मंझधार में अपराजित पौरुष की संपूर्ण उमंगों के साथ, जीवन की उत्ताल तरंगों से हंस-हंसकर क्रीड़ा करने वाले नैराश्य के भीषण भंवर को कौतुक के साथ आलिंगन आनंद देता है. पर्वतप्राय लहरावलियां उसे भयभीत नहीं कर सकतीं, उसे चिंता क्या है ? कुछ क्षण पूर्व ही तो वह स्वेच्छा से कूल-कछार छोड़कर आया है. उसे भय क्या है? कुछ क्षण पश्चात ही तो वह संघर्ष की सरिता को पार कर, समृद्ध दृष्टि-पथ पर फैले हुए विस्तृत प्रदेश के विशाल वक्षस्थल पर वैभव के अमिट चरण-चिह्न अंकित करेगा.
हृदय-मंदिर में ध्येय-देवता की प्राण-प्रतिष्ठा करके, श्रद्धा के प्याले में विश्वास की वर्तिका बालते हुए शताब्दियों से संजोये स्वप्नों को साकार करने की दुर्दम्य आकांक्षा लेकर चलने वाले ही पराजय के कालिया नाग को वश में कर, विजय की वीणा से स्वधर्म और स्वराज्य के स्वर्गिक संगीत को गुंजरित कर, जन-जन के मन को झंकृत करने में समर्थ हो सकते हैं. बाधाओं के विन्ध्याचल ऐसे अगस्त्य के चरणों में शीश नवाकर साष्टांग प्रणिपात करते रहते हैं. भावी संतति उनके मार्ग का अनुसरण करती है. उनकी विजय के दिवस राष्ट्र के लिए पर्व बन जाते हैं.
विजयादशमी हमारे राष्ट्र की अगणित महान विजयों का पर्व है. हमारा राष्ट्र-जीवन केवल दो हजार वर्ष प्राचीन नहीं है. अनादिकाल से, असंख्य युगों के राष्ट्र-जीवन में हमने दो-चार-दस नहीं, असंख्य बार अराष्ट्रीय शक्तियों का मानमर्दन कर, विजयलक्ष्मी का वरण किया है. सृष्टि के प्रारंभ से लेकर आज तक धर्म के संगर में सतत रत रहकर हमने राष्ट्र-जीवन के उज्ज्वल इतिहास में विजय के अनेक कालखंड निर्माण किए हैं. विजयादशमी हमारी संपूर्ण विजयों का दिन है, अराष्ट्रीय शक्तियों के पराभव का दिन है.
निराशा की अमावस की गहन निशा के अंधकार में हम अपना मस्तक आत्म-गौरव के साथ तनिक ऊंचा उठाकर देखें. विश्व के गगन-मंडल पर हमारी कलित कीर्ति के असंख्य दीपक जल रहे हैं. संस्कृति के गौरवपूर्ण इतिहास के प्रत्येक पृष्ठ पर- असंख्य युगों के वज्र कठोर हृदय पर हमारी विजय के स्तंभ अंकित हैं. अनंत भूतकाल हमारी दिव्य विभा के आलोकित है. भावी की अगणित घड़ियां हमारे विजमालिका की लड़ियां बनने की प्रतीक्षा में मौन खड़ी हैं.
हमारी विश्वविदित विजयों का इतिहास अधर्म पर धर्म की जय-गाथाओं से बना है. हमारे राष्ट्र-जीवन की कहानी विशुद्ध राष्ट्रीयता की विजय की कहानी है, प्रतिक्रियात्मक शक्तियों के पराभव की कहानी है, धर्म के सम्मुख अधर्म के आत्मसमर्पण की कहानी है.
वह सृष्टि का प्रारंभ था. साम गान के स्वर्गिक स्वर चराचर मात्र को व्याप्त कर, संसुति में सुखद शांति का संचार कर रहे थे. सर्वत्र आनंद का पारावार उमड़ रहा था. समग्र पृथ्वी पर हमारे प्रभाव की रश्मियां बिखरी हुई थीं. धर्म का डंका बज रहा था.
किंतु पूर्णिमा को. षोडश कलाधारी को, ग्रसने के लिए राहु सदैव तत्पर रहता है. धर्म के बाल-रवि को सदा-सर्वदा के लिए आच्छादित करने की विषाक्त भावना भरकर अधर्म के विषधर से काले-काले मेघ सदलबल घिर-घिरकर आए, अत्याचारों की झड़ी लग गई. अन्याओं ने सर्वत्र सरोष सर उठा लिया. धर्म की श्वास रुद्ध होने लगी. महिषासुर के आतंक से मेदिनी थर्रा उठी.
किंतु अधर्म के मेघ टिक नहीं सके, प्रबल समीर के सबल थपेड़े खाकर वे छिन्न-भिन्न हो गए. अराष्ट्रीय शक्तियों को विनष्ट करने के लिए राष्ट्र की सर्वशक्तियों का केंद्रीयकरण किया गया. ब्रह्मा की सृजन, विष्णु की सिंचन और शंकर की संहार शक्ति ने सम्मिलित होकर देवों के शरीरों से प्रकटित पुण्य प्रकोप द्वारा आदिशक्ति का निर्माण किया. समाज में प्राप्त समस्त शस्त्रों से सज्जित होकर, राष्ट्र-शक्ति ने महिषासुर को अराष्ट्रीय शक्ति को, युद्ध के लिए आह्वान किया. धर्म और अधर्म के बीच महाभयंकर युद्ध ठन गया. आश्विन शुक्ल प्रतिपदा से दशमी-पर्यंत वह संग्राम चला. अराष्ट्रीय शक्ति की पराजय हुई. उसके नेता महिषासुर का मान-मर्दन कर दिया गया. राष्ट्र की विजय के उपलक्ष्य में हम नवरात्र का उत्सव मनाते हैं. सहस्रों वर्ष पूर्व की विजय-स्मृति को हमने अंत:करण में संजोकर सुरक्षित रखा है. रूठी हुई विजय को लौटा लाने का हमारा यह दृढ़ निश्चय है.
विजय-पर्व के दो भाग हैं-शस्त्र-पूजन और सीमोल्लंघन. शक्ति की पूजा करते हुए अजेय सामर्थ्य संचित करने का मंगल प्रयास प्राचीन काल से होता आया है. जिन शस्त्रों की सहायता से धर्म की संस्थापना एवं अधर्म का नाश किया जाता है, उनका पूजन वीरोचित है, धार्मिक है, राष्ट्रीय पर्व की स्फूर्तिदायिनी विधि है. शक्ति-पूजन के पश्चात अस्त्र-शस्त्र अर्जित सैन्य सजाकर स्वराज की सीमाओं को समग्र भूमंडल पर चतुर्दिक विस्तृत करने का पुनीत प्रयत्न होता था. हमारी विराट वाहनियां विजय की लालसा से भरकर, धर्म की ध्वजाएं फहरातीं, चतुरंगिणियों में परिणित होकर सीमोल्लंघन के लिए प्रस्थान किया करती थीं.
स्वदेश की रक्षा के निमित्त, संभावित आक्रमण का प्रतिकार करने के शत्रु के दुर्भावों के कार्यरूप में प्रकट होकर, युद्ध के कराल मेघ बन शस्य-श्यामला भूमि पर प्रलय का तांडव नृत्य करने के पूर्व ही समाप्त करने के लिए सीमा लांघकर सांप को उसकी बांबी में ही कुचल डालने की दृष्टि से इस प्रथा का पालन होता था. सीमोल्लंघन के मूल में साम्राज्य की भावना को प्रेश्र्य देकर समस्त संसार में शुद्ध सांस्कृतिक राज्य की स्थापना के ध्येय को सम्मुख रखा गया है. धर्म की नींव पर न्याय-सम्मत दिव्य तंत्र की रचना द्वारा आध्यात्मिक रूप से स्वतंत्र होने का मंगल मंत्र शताब्दियों पूर्व भारत ने विश्व के सम्मुख समुपस्थित किया था. स्वार्थ साधन को तिलांजलि देकर समाज के सामूहिक कल्याण की भावना से प्रेरित होकर किए गए सैन्य-संचालनों में प्राप्त विजय के लाभ का वितरण भी सामूहिक हुआ करता था. समानता और समाजवाद की बड़ी-बड़ी बातें करके गाल बजाने वाले हमारे व्यावहारिक समाजवाद का, आंखें खोलकर अवलोकन करें. विजय में हस्तगत किए गए संपूर्ण सुवर्ण का वितरण सर्व स्वजन-साधारण में करना विजयादशमी की महत्वपूर्ण धार्मिक विधि है.
समस्त संसार को जीतने के पश्चात विश्वजीत यज्ञ में सर्वस्व का दान करने वाले राजा रघु की कथा सर्वविदित है. रघु के राघव द्वारा अराष्ट्रीय शक्तियों को समूल नष्ट करने के लिए, समाज की अपहृत लजा के पुन: सम्मान प्राप्त्यर्थ लंका पर की गई चढ़ाई का वृतांत सर्वज्ञात है. आज ही के दिन, अराष्ट्रीय तत्वों के नेता, उपद्रव शक्ति का उपयोग कर आतंक प्रसारित करने की नीति के प्रणेता, जगत जननी के अपहरणकर्ता का राष्ट्र पुरुष द्वारा शिरच्छेद हुआ था. राष्ट्र शक्त्ति को अपमानित करने का मूल्य रावण को अपने दस शीशों के रूप में सब्याज चुकाना पड़ा. दशानन का वध हुआ, इसलिए दशहरा हुआ. असुरों की लंका, भारत के पावन चरणों में भक्तिभाव से भरकर कुंद कली-सी सुशोभित हुई. धर्म की स्थापना हुई, अधर्म का नाश हुआ. विजय का आनंद स्वजनों में सुवर्ण वितरित कर मनाया गया.
विजयादशमी राष्ट्रीय विजय का त्यौहार है. आज के दिन ही पांडव अपना अज्ञातवास समाप्त कर कर्मक्षेत्र में पुन: अवतरित हुए थे. वही कर्मक्षेत्र भविष्य में धर्मक्षेत्र में परिवर्तित हो गया. आज के दिन ही धर्मचक्र प्रवर्तक ने इस पुण्य भू पर धार्मिक साम्राज्य की संस्थापना के लिए जन्म लिया था. आज के शुभ मुहुर्त पर ही हिंदू पदपादशाही के प्रस्थापक छत्रपति शिवाजी की विजयिनी सेनाएं यवनों के असुरी राज्य की अंत्येष्टि करने के लिए ’भवनी’ का शुभाशीर्वाद ग्रहण कर प्रस्थान किया करती थीं. आज की शुभ घड़ी पर ही अरावली के शैल शिखरों पर दास्य के अभेद्य अंधकार को भेदते हुए, स्वराज्य के दीपक से, स्वधर्म के प्रकाश की दिव्य रश्मियां वितरित करने का पवित्र कार्य महाराणा के मतवाले अनुनायी किया करते थे.
आज के महामंगल पावन पुण्य क्षणों में ही महावीर की आत्मविस्मृति से भरे हुए राष्ट्र के पुनरुज्जीवन का दैवी कार्य पूजनीय डॊ. हेडगेवार द्वारा प्रारंभ हुआ था. सलस सुषुप्ति को जीवन जागृति में, ग्लानिजनक आत्मविस्मृति को दिव्य आत्म साक्षात्कार में और दयनीय शरणगति को प्रचंड आत्माभिमान में परिवर्तित करने की महत्ती आकांक्षा को कार्यरूप में परिणत करने के लिए राष्ट्र संघ का निर्माण किया गया. वर्षों से दैर्बल्य, कायरता, शैथिलता, निष्क्रियता और व्यामोह से समाज को सर्वदा के लिए मुक्त कर संगठन और शक्ति पूजन द्वारा राष्ट्र सांस्कृतिक पुनरुज्जीवन का व्यवस्थित प्रयत्न करते हुए स्वधर्म के अधिष्ठान पर, स्वराज्य की सीमाओं के विपुल विस्तार का कार्य अहर्निश हो रहा है. यह पावन प्रयास विजय के पर्व से प्रारंभ हुआ है, विजय की प्राप्ति में ही प्रयत्न की पूर्णता सन्निहित है.
आज अहिंसा के आवरण में नपुंसकता प्रश्रय पा रही है. सीमोल्लंघन के स्थान पर स्वदेश की सीमाएं छोटी हो रही हैं. महिषासुर का आतंक बढ़ गया है. देश की देहली पर खड़ा शत्रु हमारे पुरुषत्व को चुनौती दे रहा है. राष्ट्र की समस्त शक्तियों का एकत्रीकरण ही असुर के अन्याय को समाप्त कर धर्म की संस्थापना कर सकता है.
-डॉ. सौरभ मालवीय(पुस्तक- 'राष्ट्रवादी पत्रकारिता के शिखर पुरुष अटल बिहारी वाजपेयी' से)


No comments:
Post a Comment