Wednesday, July 15, 2026

आर्थिक और सामाजिक स्वतंत्रता चाहते हैं

   


प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी ने 15 अगस्त, 1998 को लाल किले से देश को संबोधित करते हुए आर्थिक और सामाजिक स्वतंत्रता की प्राप्ति पर विशेष बल दिया. उन्होंने कहा कि देखते ही आधी शताब्दी बीत गई. लगता है कि कल ही की बात है. पंडित जवाहर लाल नेहरू जी ने इसी स्थान पर पहली बार हमारा प्यारा तिरंगा नीले आसमान में फहराया था. उसके पश्चात प्रत्येक स्वतंत्रता दिवस पर इस ऐतिहासिक लाल किले से राष्ट्रीय ध्वज फहराने की परंपरा चलती आ रही है. मैंने कभी यह नहीं सोचा था कि यह सौभाग्य एक दिन मुझे भी मिलेगा. एक गरीब स्कूल मास्टर के लड़के का धूल और कुएं से भरी बस्ती से उठकर लाल किले की प्राचीर तक पहुंचना और स्वतंत्रता के पावन पर्व पर तिरंगा फहराना, यह भारतीय लोकतंत्र की शक्ति और क्षमता को उजागर करता है. 

हम सब जानते हैं कि यह आजादी हमें सस्ते में नहीं मिली है. एक तरफ महात्मा गांधी के नेतृत्व में आजादी के अहिंसात्मक आंदोलन में लाखों नर-नारियों ने कारावास में यातनाएं सहन कीं, तो दूसरी ओर हजारों क्रांतिकारियों ने हंसते-हंसते फांसी का तख्ता चूम कर अपने प्राणों का बलिदान दिया. हमारी आजादी इन सभी ज्ञात-अज्ञात शहीदों और स्वतंत्रता सेनानियों की देन है. आइए, हम सब मिलकर इनको अपनी हार्दिक श्रद्धांजलि अर्पित करें और प्रतिज्ञा करें कि हम इस आजादी की रक्षा करेंगे, भले ही इसके लिए सर्वस्व की आहुति क्यों न देनी पड़े.

हमारा देश विदेशी आक्रमणों का शिकार होता रहा है. पचास वर्षों के इस छोटे से काल खंड में भी हम चार बार आक्रमण के शिकार हुए हैं. लेकिन हमने अपनी स्वतंत्रता और अखंडता अक्षुण्ण रखी है. इसका सर्वाधिक श्रेय जाता है- हमारे सेना के जवानों को. अपने घर और प्रियजनों से दूर, अपना सर हथेली पर रख कर, ये रात-दिन हमारी सीमा की रखवाली करते हैं. इसलिए हम अपने घरों में चैन की नींद सो सकते हैं. सियाचिन की शून्य से 32 अंश कम बर्फीली वादियां हों या पूर्वांचल का घना जंगल, कच्छ या जैसलमेर का रेगिस्तान का इलाका हो या हिन्द महासागर का गहरा पानी, सभी स्थानों पर हमारा जवान चौकस खड़ा है. इन सभी जवानों को, जो थल सेना, वायु सेना और जल सेना के साथ-साथ अन्य सुरक्षा बलों से संबंधित हैं, मैं अपनी ओर से और आप सबकी ओर से बहुत-बहुत बधाइयां देता हूं और इतना ही कहता हूं कि हे भारत के वीर जवानों ! हमें तुम पर नाज है, हमें तुम पर गर्व है.

सेना को समर्थन चाहिए जनता का. गत पचास वर्षों में किसानों और मजदूरों ने खेत-खलिहानों में, कल-कारखानों में देश की दूसरी रक्षा-पंक्ति को मजबूत किया है, हम यह भूल नहीं सकते. लाल बहादुर शास्त्री जी ने कहा था, "जय जवान, जय किसान," मानो हर कोई एक दूसरे के बिना अधूरा है, एक दूसरे के बिना अपूर्ण है.

मैंने अब इसमें नया आयाम जोड़ा है- ’जय विज्ञान’ 21वीं सदी में देश की सुरक्षा, देश का विकास बीती सदी के साधनों से नहीं किया जा सकता. 

इसी उद्देश्य से और केवल इसी उद्देश्य से हमने 11 मई और 13 मई को पोखरण में अणु विस्फोट किया था. पोखरण का विस्फोट वह एक रात का खेल नहीं था. हमारे वैज्ञानिकों, इंजीनियरों, टेक्नीशियनों और हमारे सुरक्षा बलों के बरसों की तपस्या का यह फल था. 25 वर्ष पूर्व श्रीमती इंदिरा गांधी ने जिस कार्य की नींव रखी थी, मैंने उस पर इमारत को खड़ा करने का प्रयास किया है. 

मैं जानता हूं कि केवल निमित्त मात्र हूं. इस महान उपलब्धि का सेहरा तो वैज्ञानिकों की कुशाग्र बुद्धि और जवानों की अतुलनीय मेहनत को जाता है. मैं इन सबको स्वतंत्रता के इस अत्यंत शुभ अवसर पर बहुत-बहुत बधाई देना चाहता हूं.

मैं आप सबका भी बहुत आभारी हूं कि आपने परीक्षा की इस घड़ी में मुझे पूर्ण समर्थन देकर हौसला बढ़ाया. कुछ तत्वों को छोड़कर हर भारतीय, चाहे वह दुनिया के किसी भी कोने में खड़ा हो, उसने इस कदम का स्वागत किया. मानो हम में से हर एक का माथा उस दिन उन्नत हुआ, सीना चौड़ा हुआ और हम एक स्वर से और ऊंचे स्वर से कहने लगे- "गर्व से कहो, हम भारतीय हैं," क्योंकि उस दिन पोखरण में केवल अणु ऊर्जा का नहीं, राष्ट्र की ऊर्जा का भी प्रकटीकरण हुआ था. 

इसी क्षण मैं इस बात को स्पष्ट करना चाहता हूं कि भारत सदैव शांति का पुजारी था, है और रहेगा. हम शस्त्र का उपयोग आत्मरक्षा के लिए करना जानते हैं और चाहते हैं. हम अणु शस्त्र का प्रयोग आक्रमण के लिए नहीं करेंगे और इसलिए हमने नये अणु परीक्षण पर अपनी ओर से पाबंदी लगा दी है. हमने स्वयं आगे होकर दुनिया से अणु शस्त्र का पहला प्रयोग न करने का वायदा किया है. हम यह सब न किसी के दबाव में कर रहे हैं, न किसी के डर से. हम केवल स्वेच्छा से इसलिए कर रहे हैं कि विश्व शांति और निरस्त्रीकरण में हमारी गहरी आस्था है. अणु अस्त्र रहित दुनिया, यह हमारा सपना है, जिसे हम साकार करना चाहते हैं. 

प्रारंभ में दुनिया के कुछ राष्ट्रों ने राष्ट्रीय सुरक्षा की हमारी आवश्यकता की नीति और नीयत पर संदेह किया. कुछ ने हम पर आर्थिक प्रतिबंध लगा दिए. अब परिस्थिति बदल रही है. दुनिया अब भारत की भूमिका को धीरे-धीरे समझ रही है. हम उन्हें अपना दृष्टिकोण समझाने में सफल हो रहे हैं. इसके चलते कुछ आर्थिक प्रतिबंध ढीले भी पड़ने लगे हैं. दुनिया की इस बदलती दृष्टि का हम स्वागत करते हैं.

इसके साथ एक बात और हम स्पष्ट कर देना चाहते हैं. भारत एक महान देश है. हमारी जनता पराक्रमी है. अपने गौरव के लिए बहादुर जनता हर संकट का मुकाबला कर सकती है. इसका हमने इतिहास को बार-बार परिचय दिया है.

मैं अहंकार से नहीं, विनम्रता से, आह्वान के रूप में नहीं, चुनौती के रूप में नहीं, आत्मविश्वास से कहना चाहता हूं कि दुनिया की कोई भी ताकत हमें अपने निर्धारित मार्ग से दूर नहीं कर सकती. राष्ट्र की एकता, अखंडता और सुरक्षा के लिए हम बड़ी से बड़ी कुर्बानी देने के लिए तैयार हैं.

हम अपने पड़ोसी देशों से संबंध सुधारना चाहते हैं. हम जानते हैं कि युद्ध जीतने का सबसे आसान तरीका युद्ध को न होने देना है. पाकिस्तान से हम किसी भी विषय पर किसी भी स्तर पर और कहीं भी बात करने के लिए तैयार हैं.

आज सब जानते हैं कि कोलम्बो में सार्क सम्मेलन के अवसर पर मैंने इस बात की पहल की थी. मुझे थोड़ा सा दुख हुआ कि हमें अपेक्षित उत्तर नहीं मिला. फिर भी मैंने आशा नहीं छोड़ी है. इस मास के अंत में दक्षिण अफ्रीका में होने वाले गुट निरपेक्ष देशों के सम्मेलन के अवसर पर मैं फिर संवाद का प्रयास करूंगा.

मेरी मान्यता है कि दुनिया में कोई भी समस्या ऐसी नहीं है, जिसका बातचीत से हल नहीं हो सकता. इसलिए पाकिस्तान हो या ईरान, हम सबसे मैत्री भाव से बातचीत करके आपसी समस्याओं का हल ढूंढने के लिए प्रयास करते रहेंगे.

गत कुछ दिनों में जम्मू व कश्मीर में उग्रवादियों की कार्रवाइयां बढ़ गईं. उनके द्वारा हिमाचल में हुआ हत्याकांड एक बड़े षडयंत्र का भाग मालूम होता है. सीमा पार से प्रतिदिन होने वाली यह आतंकवादी कार्रवाइयां अघोषित युद्ध के समान हैं. सरकार ने इन घटनाओं को बहुत ही गंभीरता से लिया है. हम पूरी ताकत के साथ इसका मुकाबला कर रहे हैं और आतंकवाद को परास्त करके ही रहेंगे. 

व्यक्तिगत जीवन हो या राष्ट्र जीवन, इक्यानवीं वर्षगांठ बीते हुए अर्ध शताब्दी के जीवन का लेखा-जोखा लेने का स्वर्णिम अवसर होता है. हम सबके लिए आज का क्षण भी सिंहावलोकन का क्षण है. आज हम एक क्षण के लिए सिंह की तरह पीछे मुड़ कर देखें और फिर  21वीं शताब्दी में छलांग लगाने के लिए अपने आपको तैयार करें. 

लेखा-जोखा लेते समय एक गलती अकसर हो जाती है. हम अपनी उपलब्धि को कम आंकते हैं और कमजोरी को बढ़ा-चढ़ाकर देखते हैं. जिसके परिणामस्वरूप देश में निराशा के स्वर को ज्यादा बढ़ते हुए देखता हूं. बात थोड़ी बहुत बिगड़ी भी होगी, लेकिन इतनी बिगड़ी नहीं कि सुधारी न जा सके. हमारे शास्त्रों में कहा है- "आत्मप्रशंसा मूर्खों का लेखा-जोखा है."

जब हम आजाद हुए थे, तब कुछ पश्चिम के पंडितों ने भविष्यवाणी की थी कि हम जनतंत्र और स्वतंत्रता के लायक नहीं हैं. जल्दी ही हम बिखर कर नष्ट हो जाएंगे. लेकिन आज गर्व से कह सकते हैं कि न हमने केवल हमारी अखंडता और स्वतंत्रता की रक्षा की है, अपितु विश्व का सबसे बड़ा जनतंत्र सफलतापूर्वक चला कर दिखाया है. जो राष्ट्र हमारे साथ आजाद हुए वे लभगभ सभी कभी न कभी तानाशाही या सेनाशाही का शिकार हुए, लेकिन हमने लोकशाही का दीप हमेशा जलाए रखा.

आज की लोकसभा बारहवीं लोकसभा है. मैं हिन्दुस्तान का ग्यारवां प्रधानमंत्री हूं. छोटे से देहात की चौपाल से लेकर संसद तक से सत्ता परिवर्तन होते हुए दृश्य को हमने देखा है. इस सबका श्रेय आप सबको है. हर चुनाव में आपने ऐसा चमत्कार करके दिखाया कि सभी पंडित-ज्ञानी हतप्रभ रह गए हैं. आपको बहुत-बहुत बधाई. जब तक आप जागरूक हैं, हमारे जनतंत्र पर कोई आंच नहीं आ सकेगी. आज के स्वर्ण जयंती समापन समारोह के अवसर पर एक महत्वपूर्ण तथ्य पर पूरे राष्ट्र को सोचना है. स्वतंत्रता, राष्ट्रीय एकता, लोकतंत्र और पंथ निरपेक्षता, ये चारों एक दूसरे के पूरक हैं. हमें हर हालत में स्वतंत्र रहना है. स्वतंत्रता की अनिवार्य शर्त है- राष्ट्रीय एकता. राष्ट्रीय एकता के लिए लोकतंत्र जरूरी है. पंथ निरपेक्षता, लोकतंत्र और राष्ट्रीय एकता का अटूट हिस्सा है. मैं और मेरी सरकार इन चारों तत्वों के प्रति प्रतिबद्ध है. 

हमें यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि हम एक राष्ट्र के नागरिक हैं. लद्दाख से लेकर निकोबार तक फैला हुआ है, यह देश. गारो पर्वत से लेकर गिलगित तक इसका विस्तार है, यह एक प्राचीन देश है. इसकी सभ्यता और संस्कृति 5000 वर्ष से भी अधिक पुरानी है. इतना विशाल देश, इतनी विविधताओं से भरा हुआ देश भाषाओं, उपासना पद्धतियों, रहन-सहन, खान-पान की भिन्नताओं के बावजूद लोकतंत्र के सूत्र में बंधकर सामाजिक और आर्थिक न्याय की स्थापना के लिए कमर कसकर जुटा हुआ है. साथ-साथ हम इसे भी भूल नहीं सकते कि हमें जनतंत्र को विकृतियों से बचाना है. 

हम संसद और विधानमंडलों के सदनों में ऐसा व्यवहार करते हैं कि जिसे स्कूल की कक्षा में कोई भी शिक्षक कभी भी बर्दाश्त नहीं करेगा. लोकशाही चर्चा से चलने वाली है. विपक्ष को कहने का, और सत्ता पक्ष को करने का अधिकार होना चाहिए. दोनों एक दूसरे के पूरक हैं, विरोधक नहीं. 

निर्भय और निष्पक्ष मतदान को और निखारना होगा. पद्धति में परिवर्तन कर उसे जातिवाद, हिंसा, धन, शक्ति आदि दुर्गुणों से मुक्त करना होगा, जिससे अगली शताब्दी में हमारा शासनतंत्र और भी निखर कर आए.

एक समय था, यह देश सोने की चिड़िया कहा जाता था. बाद में स्थिति बिगड़ी और हम गरीब राष्ट्रों में गिने जाने लगे. गत कुछ वर्षों में हमारे किसानों और खेतिहर मजदूरों ने कड़ी मेहनत करके देश को खाद्यान्न उत्पादन में आत्मनिर्भर बना दिया है. भूखे पेट कोई सेना नहीं लड़ सकती. भूखा देश चैन की नींद नहीं सो सकता. हमारे किसान-मजदूर भाइयों ने देश को अनाज में आत्मनिर्भर बनाकर अपनी ’अन्नदाता’ की उपाधि सार्थक की है. मैं तो भगवान से केवल इतनी ही प्रार्थना कर सकता हूं ’अन्नदाता सुखी भव:’.

इस आनंद में दुख की छाया छिपी है. आज हमारे इस अन्नदाता की स्थिति विकट हुई है. मुझे इस बात की अत्यधिक पीड़ा है कि इस वर्ष कुछ प्रांतों में किसानों को कर्ज का बोझ असह्य होने के कारण आत्महत्या करनी पड़ी. मैं इनके परिवारों के प्रति अपनी संवेदना प्रकट करता हूं. इन किसानों को श्रद्धांजलि के रूप में मैंने एक निर्णय लिया है. फसल बीमा योजना का विस्तार किया जाएगा, नई फसलें इसमें जोड़ी जाएंगी और भौगोलिक क्षेत्रों में भी इसे बढ़ाया जाएगा.

किसानों की सही आर्थिक स्थिति की जांच-पड़ताल करने के लिए और उसमें सुधार के सुझाव देने के लिए एक उच्चाधिकार संपन्न आयोग गठित किया जाएगा. मैं किसान भाइयों को आश्वस्त करना चाहता हूं, आप हमारे देश की रीढ़ की हड्डी हैं. आपको इस शासन में कभी झुकने की नौबत नहीं आएगी. उड़ीसा में बोलनगीर-कालाहांडी-कोरापुर एक ऐसा क्षेत्र है, जहां आज भी लोग भूख से पीड़ित हैं. स्वतंत्रता के पचास वर्षों के बाद भी देश में लोग भूखे रहें, यह हम कल्पना भी नहीं कर सकते. मैंने योजना आयोग से कहा है कि इस क्षेत्र में रोजगार आश्वासन योजना की रकम दुगुनी कर दें. मेरा प्रयास रहेगा कि देश में अन्न के अभाव में किसी को भी अपनी जान न खोनी पड़े.

व्यापार, उद्योग और सेवाओं में भी देश ने उल्लेखनीय प्रगति की है. हमारे कुछ उद्योग तो विश्व की स्पर्धा में अपने झंडे गाड़ रहे हैं. इस सफलता के लिए मैं सभी मजदूरों, कर्मचारियों, प्रबंधकों, उद्योगपतियों व व्यापारियों को बहुत बधाई देता हूं. लेकिन हम जानते हैं कि यह सफलता एक पड़ाव है, अंतिम लक्ष्य की प्राप्ति नहीं. हमारा अंतिम लक्ष्य है- भारत को एक आर्थिक महाशक्ति के रूप में दुनिया में उभारना. 

मैं जानता हूं कि यह कहना जितना आसान है, करना कठिन है. इसके लिए हमें कठोर परिश्रम, प्रामाणिकता और स्वावलंबन का मार्ग अपनाना होगा. विश्व के दर्जे का माल तैयार करना पड़ेगा, जो घरेलू और विश्व बाजार में प्रतिस्पर्धा कर सके. अर्थव्यवस्था में सुधार की दिशा में तेजी से आगे बढ़ाने की जरूरत है.

लेकिन हम उदारीकरण का अनुचित लाभ नहीं उठाने देंगे. आधारभूत ढांचे के क्षेत्र में हमने परियोजनाओं को तीव्रता से लागू करने का निर्णय किया है.

’स्वदेशी’ का अर्थ यह नहीं, हम कूपमंडूक हो जाएं. नई  दुनिया छोटा सा गांव बन गई है. हम सब एक दूसरे पर निर्भर हैं. हम इसे खुली अर्थव्यवस्था में भी अपनी आंतरिक शक्ति के आधार पर विश्व स्पर्धा में डटकर खड़े रह सकते हैं, और ऐसा हमारा विश्वास है, हम डटकर खड़े रहेंगे. 

आज के स्वतंत्रता दिवस की इक्यानवी वर्षगांठ केवल हमारे देश में नहीं, दुनिया भर में मनाई जा रही है. हर देश में बसा भारतीय मूल का नागरिक यह पावन पर्व हर्ष और उल्लास के साथ मना रहा है. मैं विदेशों में बसे सभी भारतीयों को स्वतंत्रता दिवस की शुभकामनाएं देता हूं. इनमें से कुछ देशों में भाई-बहन हमारे इस कार्यक्रम का सीधा प्रसारण टीवी पर देख रहे होंगे.

अनिवासी भारतीयों ने, जहां वे बसे हैं, उन देशों की अर्थव्यवस्था में मजबूती लाई है. अब उन्हें भारतीय अर्थव्यवस्था को भी मजबूत करने का अवसर मिला है. हमने अब रिसर्जेट इंडिया बॊन्ड्स निकाले हैं. दुनिया भर में बसे अनिवासी भारतीय इस अवसर का लाभ उठा रहे हैं. अभी तक इस योजना में पांच हजार करोड़ रुपये विदेशी मुद्रा के रूप में आए हैं. मुझे विश्वास है कि अनिवासी भारतीय और भी इसका लाभ उठाएंगे. देश का आर्थिक विकास अपने साथ-साथ समस्याएं भी लेकर आता है. हमें उन्हें हल करना है.

मैं जानता हूं कि आप सब और खास कर बहनें कुछ चीजों की बढ़ती कीमतों से खासी परेशान हैं.  मैं आपकी परेशानी समझ सकता हूं. इसमें सरकार से ज्यादा प्रकृति का दोष है. लेकिन मैं समझता हूं कि यह कहने से आपका बोझ तो हल्का नहीं  होता है. वित्त मंत्रालय और राज्य सरकारें मिलकर इस महंगाई से जूझने का अभियान शुरू करेंगी. व्यापारी वर्ग से भी अब मैं इसमें सहयोग चाहता हूं. वे अनावश्यक जमाखोरी और मुनाफाखोरी को बढ़ावा न दें. हम ऐसे तत्वों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करने में हिचकिचाहट नहीं करेंगे. मैं जानता हूं कि आने वाले दिन त्योहारों के दिन हैं. मेरी यह कोशिश होगी कि बढ़ती महंगाई आपके त्योहारों का रंग फीका न कर दे.

देश में एक और महत्वपूर्ण समस्या है- भ्रष्टाचार की. भ्रष्टाचार का रोग देश को कैंसर रोग के समान खाये जा रहा है.  हमने इससे लड़ने का निर्णय लिया है. इसका आरंभ ऊपर से किया है. लोकसभा में पेश किए लोकपाल विधेयक में मैंने प्रधानमंत्री को भी नहीं बख्शा है. इससे हमने उच्च स्तरीय भ्रष्टाचार से लड़ने की हमारी नीति और नीयत स्पष्ट की है. इसके साथ हम अफसरशाही के भ्रष्टाचार से भी लड़ना चाहते हैं. मैं जल्दी ही प्रधानमंत्री कार्यालय के उस कक्ष के क्रियान्वयन में तेजी लाऊंगा, जो भ्रष्ट अधिकारियों के खिलाफ कार्यवाही की देखरेख करता है. 

"बेरोजगारी हटाओ", हम हमारे राष्ट्रीय एजेंडा का महत्वपूर्ण संकल्प है.  बेरोजगारी बड़ी समस्या है. यह सबके जीवन के साथ जुड़ी है. सबकी न्यूनतम बुनियादी आवश्यकताओं की पूर्ति करने का भी यही तरीका है.

पूर्ण रोजगार के लिए योजना बनाना कठिन जरूर है, लेकिन असंभव नहीं. लेकिन इसके लिए नियोजन की पूरी प्रक्रिया में परिवर्तन करना होगा. बुनियादी जरूरत की चीजों और सेवाओं का उत्पादन जन साधारण द्वारा होना चाहिए. इसके लिए विज्ञान और टेक्नोलॊजी की सहायता लेनी पड़ेगी.

सरकार का फैसला है कि 10 सालों में 10 करोड़ लोगों के लिए रोजगार के अवसर उपलब्ध कराए जाएंगे. इसका अर्थ यह हुआ कि एक वर्ष में एक करोड़ लोगों को रोजगार के अवसर उपलब्ध कराए जाएंगे. इसके लिए टॊस्क फोर्स गठित की जाएगी.

किसी भी आधुनिक समाज की प्रगति का मापदंड उस समाज में महिलाओं की स्थिति से होता है. हमने महिलाओं को संसद और विधान सभाओं में 33 फीसद आरक्षण देने का वायदा किया था. हमें खेद है कि इसे अभी तक पूरा नहीं कर सके हैं. 

लड़कियों को स्नातक स्तर तक मुफ्त शिक्षा देने का निर्णय तो हम ले ही चुके हैं. अब हम एक और बड़ा कदम उठाने जा रहे हैं, प्राथमिक शिक्षा प्राप्त करने वाली सभी छात्राओं को उनकी पाठ्य क्रमिक पुस्तकें मुफ्त दी जाएंगी. इस पर 550 करोड़ रुपये खर्च किए जाएंगे.

महिलाओं को आर्थिक सुरक्षा प्रदान करने के लिए राष्ट्रीय स्तर पर एक महिला कल्याण बीमा योजना ’राजराजेश्वरी’ और लड़कियों के लिए एक विशेष योजना ‘भाग्यश्री’ इसी वर्ष दिवाली के आनंद पर्व से शुरू की जाएगी. इस योजना के लिए केवल एक महीने के लिए एक रुपया देना होगा. आवश्यकता होने पर वह एक रुपया देने वाले को 25 हजार रुपये के रूप में मिल सकेगा. इसका पूरा विवरण शीघ्र ही आपके सामने रखा जाएगा. 

अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों तथा अन्य पिछड़े वर्गों को बराबरी और भागीदारी दिलाने के लिए हमने नौकरियों में आरक्षण का प्रावधान तो किया है, लेकिन उसका क्रियान्वयन बहुत धीमे से होता है. मेरी सरकार का यह प्रयास रहेगा कि इस क्रियान्वयन में तेजी लाई जाए और इन वर्गों को नौकरियों देने के कार्य को जल्दी से जल्दी पूरा किया जाए. शासनतंत्र को इन वर्गों के प्रति अधिक संवेदनशील और जवाबदेह बनाया जाए.

युवा शक्ति ही राष्ट्र की शक्ति है, देश का भविष्य है. बहुत वर्ष पहले मैंने बाबा आम्टे का एक वाक्य पढ़ा था- "हाथ लगे निर्माण में, नहीं मांगने, मरने में". हमारी भी यही इच्छा है. भारत के युवक-युवतियों को न किसी के सामने हाथ फैलाना चाहिए, न किसी पर अपने हाथों का जोर आजमाना चाहिए. सिर्फ अपने आपको राष्ट्र के पुनर्निर्माण के काम में झोंक देना चाहिए.

इसी हेतु हमने "राष्ट्रीय पुनर्निर्माण वाहिनी" के गठन की योजना बनाई है. 18 से 35 वर्ष आयु के युवक-युवतियां इसमें सम्मिलित हो सकेंगे. ग्रामीण और कृषि क्षेत्रों में आधारभूत सेवाएं, पर्यावरण की रक्षा करना, जनसंख्या के सवाल पर जन अभियान, नशीली दवाओं के प्रभाव के विरोध में लड़ना, शिक्षा का प्रसार, दलित वनवासी महिला उत्थान, खेल, कला, संस्कृति आदि क्षेत्रों में ये युवक-युवतियां काम कर सकेंगी. इसके लिए इन्हें मानधन भी मिलेगा. प्रारंभ में कुछ जिलों में और अंतत: सारे देश में यह योजना लागू की जाएगी. 12 जनवरी को स्वामी विवेकानंद का जन्म हुआ था. उसे उसी रूप में मनाना है. इस दिन से इस योजना का शुभारंभ होगा. युवक-युवतियों का मैं आह्वान करता हूं- आइए-, अपने यौवन का एक वर्ष देश को दान कर दीजिए और राष्ट्र को पुनर्यौवन प्रदान कर दीजिए.

21वीं सदी हमें दस्तक दे रही है. यह सदी सूचना की तकनीक की सदी होगी. भारत की सबसे बड़ी शक्ति है-भारत की बुद्धिमत्ता. विज्ञान और टेक्नोलॊजी में प्रशिक्षित व्यक्ति दृष्टि से विश्व में हमारा तीसरा स्थान है. हमें इस शक्ति का दोहन करना होगा. मेरी सरकार ने सूचना तकनीक के क्षेत्र में अनेक कदम उठाए हैं. हमारी आकांक्षा है सूचना-तकनीक में महाशक्ति बनना. इस दृष्टि से मैं आज एक नये कदम की घोषणा कर रहा हूं. 

अंतरिक्ष एक नया क्षेत्र है, जो अगली सदी में मानव जाति को नई-नई संभावनाओं को तलाशने का मौका दे रहा है. अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी के काफी लाभ हैं, जिसे भारत को अपनी युवा पीढ़ी की आकांक्षाओं को पूरा करने के लिए उपयोग में लाना होगा. मेरी सरकार "जय विज्ञान" के नारे के आधार पर युवाओं के सपने साकार करना चाहती है. इस दिशा में हम "स्वर्ण जयंती विद्या विकास अंतरिक्ष उपग्रह योजना" नामक एक नये उपग्रह पर आधारित  कार्यक्रम शुरू करेंगे. इस कार्यक्रम का पहला उपग्रह इन्सैट 3-बी भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो)  द्वारा  15 अगस्त, 1999 से पूर्व 12 महीने के एक रिकार्ड समय में बनाकर अंतरिक्ष में छोड़ा जाएगा. 

इस उपग्रह में 6 ट्रांसपोंडर्स ऒपरेशन नॊलेज को कार्यान्वित करने के लिए अलग से उपलब्ध होंगे, जिसका लक्ष्य देश में सभी विद्यार्थियों के लिए कंप्यूटर, इंटरनेट तथा कंप्यूटर पर आधारित शिक्षा प्रदान करना होगा. विशेष रूप से सभी विश्वविद्यालयों, इंजीनियरिंग कॊलेजों, चिकित्सा कॊलेजों, अनुसंधान प्रयोगशालाओं तथा उच्च शिक्षा केंद्रों को अगले स्वतंत्रता दिवस से पहले सूचना तकनीक नेटवर्क से जोड़ दिया जाएगा. इस कार्यक्रम से राज्य सरकारों की विकास संबंधी संचार आवश्यकताएं भी पूरी होंगी.

आज महर्षि अरविंद की 125वीं जयंती समारोह का समापन होने जा रहा है. उन्होंने भारत के आध्यात्मिक, नैतिक और सांस्कृतिक पुनर्जन्म की कल्पना की थी. आज हम उनकी कल्पनाओं को साकार बनाने का संकल्प करें. 

एक बार भारत रत्न डॊ. बाबा साहेब अम्बेडकर जी ने कहा था- " आर्थिक और सामाजिक आजादी के बिना राजनीतिक आजादी अधूरी है."  आज राजनीतिक स्वतंत्रता दिवस पर हम इस ध्येय वाक्य को भूले नहीं है. बीती हुई अर्द्ध शताब्दी में हमने अपनी राजनीतिक स्वतंत्रता तो अक्षुण्ण रखी,  लेकिन आर्थिक और सामाजिक स्वतंत्रता की लड़ाई अभी तक नहीं जीत सके हैं. हम देश को गरीबी से मुक्त नहीं करा सके हैं.  बेरोजगारी अभी भी अभिशाप बनी हुई है. निरक्षरता का कलंक आज भी हम मिटा नहीं सके हैं. जातिवाद और संप्रदायवाद का भूत अभी भी बीच-बीच में सर उठाता है.

आइए, हम सब मिलकर स्वतंत्रता की दूसरी अर्द्ध शताब्दी के प्रथम स्वतंत्रता दिवस पर प्रतिज्ञा करें कि 50 वर्षों पूर्व हमने राजनीतिक स्वतंत्रता की लड़ाई जीती थी. अब हमारा उद्देश्य होगा- आर्थिक और सामाजिक स्वतंत्रता की लड़ाई जीतना.

प्रधानमंत्री के अभी तक के छोटे से कार्यकाल में मैंने सबको साथ लेकर चलने का प्रयास किया है. आम सहमति की राजनीति से हमारी राजनीति है. कावेरी का ही उदाहरण लें. वर्षों से कर्नाटक, तमिलनाडु, केरल और पांडिचेरी के बीच में कावेरी के जल को लेकर विवाद चला आ रहा था. कभी-कभी तो विवाद ने अत्यंत उग्र रूप धारण कर लिया. जहां कहीं आग लगती है, वहां पानी से उसे बुझाने की कोशिश की जाती है. लेकिन जब पानी में ही आग लग जाए, तो उसका इलाज क्या है ? इलाज है- समझदारी, भाईचारा, सहनशीलता, देशभक्ति और अपने हितों के साथ दूसरों के हितों के बारे में सोचना. हाल ही में हुआ कावेरी का समझौता इसी का परिचायक है. 

क्या यह आश्चर्य की बात नहीं है कि हमारी अनेक नदियों का पानी समुद्र में चला जाता है, और हम किसको कितना पानी मिले, इस विवाद में उलझे हुए हैं. वर्षों से ये विवाद पड़े हुए हैं. इस स्थिति को बदलना होगा. हमारी नदियां, जो हिन्दुस्तान के राज्यों को जोड़ती हैं, उन्हें हिन्दुस्तानी के दिलों को भी जोड़ना चाहिए. एक राष्ट्रीय जल नीति बनाने की आवश्यकता है. हमने ऐसी नीति बनाने का वायदा किया है. लेकिन यह सबके सहयोग और धीरज से ही संभव हो सकता है.

मेरी सरकार लगभग पिछले पांच महीनों के शासन के राष्ट्रीय एजेंडे में किए गए वायदों को पूरा करने के लिए बड़ी गंभीरता से प्रयास करती रही है. हमारी सरकार मिली-जुली सरकार है. मिली-जुली सरकार का अपना धर्म होता है, जिसका निष्ठापूर्वक पालन होना चाहिए. हमने अपने गठबंधन के लिए एक साझा कार्यक्रम यानी एक नेशनल एजेंडा तैयार किया. हमने सभी विवादास्पद मुद्दों को इस एजेंडे से बाहर रखा है. आज तक हमने जो भी किया है, वह राष्ट्रहित में किया है. हमने हमेशा राष्ट्रहित को दलहित से और व्यक्तिगत हित से ऊपर माना है.

राष्ट्र आज एक संक्रमण काल से गुजर रहा है. आज हमारी पूरी राजनीतिक और शासकीय व्यवस्था एक गंभीर चुनौती के दौर से जा रही है. ऐसी स्थिति में हर एक दल को और हर एक राजनेता को जिम्मेदारी के साथ चलना होगा. राष्ट्रहित को चोट पहुंचाने वाले किसी भी कार्य के लिए इतिहास हमें कभी माफ नहीं करेगा. 

आज की जनता को चाहिए कि वह मौजूदा राजनीतिक और शासकीय व्यवस्था के बारे में गंभीरता से सोचे. हम सबके सामने कुछ बुनियादी सवाल हैं. क्या बार-बार चुनाव होना देश के लिए अच्छी बात है ? क्या इन चुनावों पर होने वाले भारी खर्च का बोझ बार-बार उठाना देशहित में है ? 

मुझे प्रधानमंत्री का पद संभाले केवल पांच महीने हुए हैं. संसद में हमारा बहुमत बहुत कम है. मैं जानता हूं कि साझा सरकारों की मर्यादाएं होती हैं. मैं जानता हूं कि आज की व्यवस्था में निर्दोष संन्यासी को सत्तापिपासु फांसी चढ़ा देते हैं. लेकिन मैं आपको विश्वास दिलाता हूं कि मैंने जीवन में कभी सत्ता के लालच में सिद्धांतों के साथ सौदा नहीं किया है, और न मैं भविष्य में करूंगा. सत्ता का सहवास और विपक्ष का वनवास मेरे लिए एक जैसा है. मैं 40 साल तक विपक्ष में रहा और अपने कर्तव्य का पालन करता रहा. मेरे विरोधी भी उसकी प्रशंसा करते हैं. लेकिन वैसा विरोध आज मुझे दिखाई नहीं देता, जब मैं कुर्सी पर बैठा हूं. यह परिवर्तन क्या हो गया है ?

आज मुझे डॊ. शिवमंगल सिंग ’सुमन’ की एक कविता याद आती है-
क्या हार में क्या जीत में
किंचित नहीं भयभीत मैं
कर्तव्य पथ पर जो मिले
यह भी सही, वह भी सही
वरदान मांगूगा नहीं, वरदान मांगूगा नहीं

मित्रों, मैं आपको आश्वासन देना चाहता हूं कि कितनी भी आपत्तियां आएं, हम वरदान के लिए झोली नहीं फैलाएंगे. आखिरी क्षण तक वरदान की तलाश नहीं करेंगे. न मैं संघर्ष का रास्ता छोड़ूंगा. बस मुझे आपका साथ चाहिए. भारत की  100 करोड़ जनता का आशीर्वाद चाहिए.

जीवन में ऐसा क्षण आता है, जब व्यक्ति चौराहे पर खड़ा होकर सोचता है-
राह कौन सी जाऊं मैं ?
चौराहे पर लुटता चीर
प्यादे से पिट गया वजीर
चलूं आखिरी चाल कि
बाजी छोड़ विरक्ति रचाऊं मैं
राह कौन सी जाऊं मैं ?

फिर लगता है, नहीं बाजी छोड़ कर मैं विरक्ति में नहीं जा सकता. मुझे जूझना होगा और फिर मैं लाल किले की प्राचीर से आपकी उपस्थिति में अपने संकल्प को दोहराता हूं-
हार नहीं मानूंगा
रार नहीं ठानूंगा
काल के कपाल पर लिखता-मिटाता हूं
गीत नया गाता हूं

बहुत-बहुत धन्यवाद
जय हिन्द
-डॉ. सौरभ मालवीय

(पुस्तक- 'राष्ट्रवादी पत्रकारिता के शिखर पुरुष अटल बिहारी वाजपेयी' से)

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