Wednesday, July 15, 2026

कुछ दोस्ती को भी मौका मिलना चाहिए

   


प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी ने 20 फरवरी, 1999 को बस से लाहौर की यात्रा प्रारंभ की थी. वे 22 सदस्यों वाला एक प्रतिनिधिमंडल भी अपने साथ लेकर गए थे, जिनमें देश की सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक हस्तियां सम्मिलित थीं. लाहौर के ऐतिहासिक किले में अटलजी के सम्मान में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने भोज दिया था. इस अवसर पर उनका नागरिक अभिनंदन किया गया. समारोह को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि कल आए थे, आज जा रहे हैं, दुनिया का यही तरीका है. लेकिन मैं अकेला नहीं जा रहा हूं. आया भी अकेला नहीं था. मेरे साथ एक प्रतिनिधिमंडल आया है, एक डेलीगेशन आया है. भारत के चुने हुए लोग. अलग-अलग क्षेत्रों में नाम कमाने वाले मेरे साथ आए हैं. मुझे 24 घंटे मिले. लेकिन इन 24 घंटों में मुझे ऐसा लगता है कि दिल्ली और लाहौर  की दूरी कुछ कम हो गई है. हम कुछ नजदीक आ गए हैं. कुछ भरोसा बढ़ गया है. साथ मिलकर चलने के लिए कदम में कुछ तेजी आ गई है.

जैसा मैंने कल कहा था, मैं जानबूझ कर बस से आना चाहता था. पहले इरादा बाघा की सीमा से मियां साहब से मिलकर वापस जाने का था. उन्होंने कहा ऐसा नहीं हो सकता, दरवाजे से लौट जाएं ये भी कोई बात हुई. घर के भीतर तक आना चाहिए. लाहौर की कई यादें मेरे दिमाग में हैं. मैं पहली बार नहीं आया हूं और आखिरी बार भी नहीं आया हूं. पहली दफा जब मैं आया. अंग्रेजों का राज था. मैं कोहाट बन्नू तक गया था. हाई स्कूल का विद्यार्थी था. उस समय अनारकली देखी थी. बाद में जब वजीरे-खारजा बनने के बाद आया, तो रात में पंजाब के गवर्नर साहब से मैंने कहा था कि मेरा जो ऒफिशियल प्रोग्राम है, उसमें अनारकली जाने की कोई सूरत नजर नहीं आती. मगर अनारकली जाए बिना मैं कैसे दिल्ली वापस जा सकता हूं. रात में मेरे लिए अनारकली जाने का खास इंतजाम किया गया था. इस बार मैं नहीं गया, क्योंकि और नई कलियां खिल गई हैं. 

24 घंटे के भीतर हमने कुछ फैसले किए हैं, अच्छे फैसले किए हैं. मुझे भरोसा है आपको पसंद आएंगे. दुनिया हैरान है और हम भी कभी-कभी सोच-सोच कर संकोच में पड़ जाते हैं कि आखिर हम दौड़ क्यों रहे हैं ? कल मियां साहब ने भी यह सवाल उठाया था. यह सवाल हम सबको कुरेदता है. दुनिया कहां से कहां पहुंच गई है. साम्राज्यवाद समाप्त हो गया. कहते हैं वह ऐसा राज था, जिसमें सूरज नहीं डूबता था. मगर सूरज के देखते-देखते वह राज डूब गया. बेड़ियां टूट गईं. हथकड़ियां छूट गईं. जब तक हम पराधीन थे, गुलाम थे, यह कहकर अपना मन बहला लिया करते थे कि जब हम आजाद हो जाएंगे, तो ये करेंगे वो करेंगे. हर बात के लिए हम कोई न कोई बहाना ढूंढ लेते थे. 

आज दुनिया कोई बहाना सुनने को तैयार नहीं है. आज हमारा मन भी नया बहाना गढ़ने को तैयार नहीं है. भगवान का दिया सबकुछ है. प्रकृति ने दौलत लुटाई है यहां. इतनी बड़ी आबादी है, जनबल है. मेहनती किसान है. पसीना बहाने वाला मजदूर है. थोड़ी-सी आमदनी में घर को कुशलता से चलाने वाली गृहणी है. विज्ञान और टेक्नोलॊजी पर प्रभुत्व जमाने वाले नौजवान हैं. फिर हम पिछड़ क्यों रहे हैं ? कल प्रधानमंत्री जी ने मेरी कविता की कुछ पंक्तियां, कुछ लाइनें उद्धृत कीं. ’जंग न होने देंगे.’ यह कविता वजीर बनने के बाद नहीं लिखी गई है, पहले लिखी गई थी.
भारत-पाकिस्तान पड़ौसी साथ-साथ रहना है
प्यार करें या वार करें, दोनों को ही सहना है
तीन बार लड़ चुके लड़ाई, कितना महंगा सौदा है
रूसी बम हो या अमरीकी, खून एक बहना है
जो हम पर गुजरी, बच्चों के संग न होने देंगे
जंग न होने देंगे

मगर इसके पहले एक छंद मैं आपके सामने रखना चाहता हूं.

क्यों हमें जंग रोकना है ?
क्यों हमें ऐसे हालात पैदा करने हैं
जिनमें जंग न हो, अमन हो
शांति बने रहे, हथियारों पर भी खर्चा न हो
जितनी जरूरत का है, उतना ही हो

उस समय मैंने लिखा था-
हमें चाहिए शांति, जिंदगी हमको प्यारी

इस दुनिया में जिंदगी से बढ़कर क्या नियामत हो सकती है, जिंदगी से बढ़कर और क्या वरदान हो सकता है. कभी-कभी हम जिंदा हैं, तो शायद यह नहीं समझते कि जिंदगी कितनी कीमती है. जिंदगी कितनी अनमोल है.

हमें चाहिए शांति, जिंदगी हमको प्यारी
हमें चाहिए शांति, सृजन की है तैयारी
सृजन माइने निर्माण
हमें चाहिए शांति, जिंदगी हमको प्यारी
हमें चाहिए शांति, सृजन की है तैयारी
हमने छेड़ी जंग, भूख से, बीमारी से

ऐसा नहीं कि हम निठल्ले बैठे हैं. निठल्ला बैठना भी नहीं चाहिए. हम जूझेंगे, लेकिन किससे जूझेंगे. पड़ौसी से नहीं, आपस में नहीं.
हमने छेड़ी जंग, भूख से, बीमारी से
आगे आकर हाथ बंटाए दुनिया सारी

हम दुनिया को दावत दे रहे हैं आइए, हमारी मदद करिए, साथ मिलकर चलिए. हम जानते हैं कि हमें अपना विकास करना होगा. अपने पैरों पर आप खड़े रहना पड़ेगा. मगर दुनिया इतनी छोटी हो गई है कि हम अपने को टापू नहीं बना सकते. एक-दूसरे की मदद लेनी चाहिए. एक-दूसरे की सहायता से आगे बढ़ने की कोशिश होनी चाहिए. हम दुनिया को दावत दे रहे हैं कि आइए.

हमें चाहिए शांति, जिंदगी हमको प्यारी
हमें चाहिए शांति, सृजन की है तैयारी
हमने छेड़ी जंग, भूख से, बीमारी से
आगे आकर हाथ बंटाए दुनिया सारी
हरी भरी धरती को खूनी रंग न लेने देंगे
जंग न होने देंगे

आप में से कोई पूछ सकता है जब आपने ऐसी कविता लिखी, जंग न होने देंगे, यह ऐलान कर दिया, तो फिर पोखरण विस्फोट करने की क्या जरूरत थी. यह सवाल उठ सकता है, उठना चाहिए. इस पर खुले दिल से बातें होनी चाहिए. हमने पोखरण विस्फोट हमले के लिए नहीं किया, बचाव के लिए किया है. हम तीन बार लड़ाइयों में फंस चुके हैं. हम हमेशा के लिए लड़ाई रोकना चाहते हैं. श्रीमती इंदिरा गांधी के जमाने में परमाणु विस्फोट हुआ था. उसके बाद भारत इंतजार करता रहा. हम उम्मीद कर रहे थे कि यह हथियार दुनिया में समाप्त कर दिया जाएगा. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. दुनिया न्यूक्लियर डिसआर्मामेंट की ओर नहीं बढ़ी. हथियार और संगीन होते गए. धारें और पैनी होती गईं. कुछ लोग इस काम में लगे रहे. हमारे वैज्ञानिकों ने कहा कि कुछ सोचने की जरूरत है. अणु शक्ति का शांति के लिए उपयोग हो यह बहुत जरूरी है. लेकिन विनाश के लिए इसका कोई उपयोग न कर पाए इसकी रोकथाम भी जरूरी है.

हमने विस्फोट करने के बाद ऐलान कर दिया कि अब हम विस्फोट नहीं करेंगे. हमने यह भी ऐलान कर दिया कि हम एटमी हथियारों का उपयोग करने वाले पहले देश नहीं होंगे. खुद उपयोग नहीं करेंगे, शुरुआत नहीं करेंगे. हमने यह भी कहा कि जिनके पास एटमी हथियार नहीं हैं, उनके खिलाफ हम एटमी हथियार काम में नहीं लाएंगे. नैम (NAM) के सदस्य के नाते, जिसकी अभी दक्षिण अफ्रीका में बैठक हुई थी, हमने फिर इस बात को दोहराया है कि एक वक्त का ढांचा बनाकर सारी एटमी हथियारों को खत्म करने का काम शुरू होना चाहिए. जरूरत क्या है एटमी हथियारों की. किसी जमाने में इन हथियारों ने, एटमी हथियारों ने एक रोल अदा किया होगा. बैलेंस ऒफ टेरर का. अब इसकी कोई जरूरत नहीं है. कितना खर्चा हो रहा है. होड़ लगी है. आज इस सवाल पर पाकिस्तान के प्रधानमंत्री से भी बात हुई है. हमने तय किया है कि हम अपने ख्यालात का तबादला करते रहेंगे. भारत क्या कर रहा है, पाकिस्तान क्या कर रहा है. यह आपस में पता नहीं है. अगर पता लग रहा है, तो दूसरों से लग रहा है. दूसरे पूछते हैं कि क्या आपको मालूम नहीं है कि आपका पड़ौसी क्या कर रहा है. इस हालत को बदलने की जरूरत है.

विश्व में जनमत बनाना पड़ेगा. यह जरूरी है कि इस संबंध में भारत और पाकिस्तान मिलकर काम करें. दोनों की जिम्मेदारी बढ़ गई है. अब अमन के सिवा कोई रास्ता नहीं है. अब चिंगारी का खेल नहीं चलेगा. छोटी सी चिंगारी आग में बदल सकती है. आग सब कुछ जलाकर खाक कर सकती है. चिंगारी को रोकना होगा. ध्यान, गरीबी, बेरोजगारी, बीमारी, इनके निराकरण की ओर लगाना पड़ेगा. किस तरह से हम पिछड़ रहे हैं ? किस तरह से ? लोग, जिस तरह की जिंदगी जीना चाहिए, उस तरह की जिंदगी नहीं जी पा रहे हैं. इसके लिए शांति चाहिए. शांति के लिए जो मसले हैं, उनको हल करने की जरूरत है. मसले हल करने के लिए भरोसे की हवा पैदा करने की जरूरत है, विश्वास का वातावरण बनाने की जरूरत है.

सवेरे यह सवाल उठा कि मुझे मिनारे-पाकिस्तान जाना चाहिए या नहीं जाना चाहिए. प्रोग्राम बन गया था. लेकिन कुछ लोगों की राय थी कि अगर मैं वहां गया तो फिर पाकिस्तान के ऊपर मेरी मोहर लग जाएगी. मैंने कहा, क्या मतलब है इसका ? क्या पाकिस्तान मेरी मोहर से चलता है ? पाकिस्तान की अपनी मोहर है और वह चल रही है. लेकिन शक इतना गहरा है. हो सकता है कि मैं वापस जाऊं और मुझसे सवाल किए जाएं कि आप गए थे ऒफिश्यल विजिट पर, मिनारे-पाकिस्तान जाने की क्या जरूरत. मैं जवाब दूंगा. मेरे जवाब से लोग संतुष्ट होंगे, मैं यह भी जानता हूं. लेकिन कुछ नहीं होंगे, यह भी मैं जानता हूं. लेकिन मुझे मिनारे-पाकिस्तान पर जाना चाहिए या नहीं जाना चाहिए, यह भी बहस का एक मुद्दा बन गया है. यह ठीक है कि हम बंटवारा नहीं चाहते थे. मैंने आपसे कहा, जब मैं यहां आया तब सारा हिन्दुस्तान एक था, अंग्रेज राज कर रहे थे. मैं कोहाट बन्नू तक गया था. वह हिन्दुस्तान हमारी आंखों में है. देश का बंटवारा हुआ.

देश अलग-अलग राज्यों में बंटा, अलग-अलग राष्ट्रों में बंटा. हमारे दिल में घाव लगा. अब घाव भर गया है. दाग जरूर बाकी है. लेकिन वह दाग हमें इस बात की याद दिलाता है कि हमें मिलकर साथ रहना है. और साथ रहने के लिए मिलकर चलना जरूरी है.

पाकिस्तान फले-फूले हम चाहते हैं और हम फले-फूलें यह आप भी चाहते होंगे. इतिहास बदला जा सकता है, मगर भूगोल नहीं बदला जा सकता. ज्योग्राफी नहीं बदली जा सकती. आप दोस्त बदल सकते हैं, पड़ौसी नहीं बदल सकते. हम अच्छे पड़ोसी के नाते रहें. 1977-78 में भी हमने शुरुआत की थी, आपको याद होगा. दोनों देशों के बीच आना-जाना आसान कर दिया था. लोग अभी तक उस बात को याद करते हैं, हम फिर वह काम करने जा रहे हैं. आज कुछ फैसले हुए हैं. मैं एकतरफा उनका ऐलान नहीं करूंगा. वक्त आने पर उनका ऐलान होगा. लोग परिवार वालों से मिलने नहीं जा सकते. हाई कमीशन में भीड़ लगी है. दरवाजे वक्त पर खुलते हैं, वक्त पर बंद होते हैं. और अगर बेवक्त कोई मुसीबत आ जाए तो. और आती है मुसीबत. खबर देकर थोड़े ही आती है. लेकिन मिलने के लिए जा नहीं सकते हैं. अगर पहुंच भी गए, तो भी जिस शहर का वीजा बनाया गया है, उससे दूसरे शहर में जाना है तो पुलिस तस्वीर में आ जाती है और पुलिस के साथ क्या-क्या आ जाता है, यह बताने की जरूरत नहीं है. जो पुलिस वाले मेरी बात सुन रहे हों, बुरा न माने. जो यहां मौजूद हैं, मैं उनके लिए नहीं कह रहा. मैं एक सिस्टम की बात कह रहा हूं. पर इस चीज के बारे में भी सोचा जाना चाहिए. 

लोग मछलियां पकड़ने के लिए आते हैं. समुद्र में भटक जाते हैं. हवालात में पहुंच जाते हैं. मछली पकड़ने की बजाय ख़ुद पकड़ में आ जाते हैं. हमने तय किया है कि ऐसे लोगों को तत्काल छोड़ देना चाहिए. लेकिन दोनों प्रधानमंत्रियों के तय करने से बात नहीं बनेगी. यह मैं साल भर प्रधानमंत्री बने रहने के बाद समझ गया हूं. इसके लिए कुछ और करना पड़ेगा. लेकिन हम करेंगे, हमने तय किया है. हमारा फैसला है. स्थिति बदलनी चाहिए. हवा में और तरह की रंगत आनी चाहिए. दोस्ती की जरूरत है. दोस्ती के साथ भरोसे की जरूरत है. मैं चाहता था कि सरदार जाफरी साहब मेरे साथ आते. मगर वह आ न सके. उनका एक शेर आज मैंने यहां के एक अंग्रेजी अखबार में देखा.
तुम आओ गुलशने-लाहौर से चमन बरदोश
हम आएं सुबह बनारस की रौशनी लेकर
फिर उसके बाद यह पूछें कि कौन दुश्मन है

बहुत दिन दुश्मनी हो ली. अब कुछ दोस्ती को भी मौका मिलना चाहिए. बहनो और भाइयो, हमने पाकिस्तान के साथ-साथ, सभी पड़ोसी देशों के साथ संबंध सुधारने की कोशिश की है. अभी श्रीलंका के साथ समझौता हुआ है फ्री ट्रेड के बारे में. बांग्लादेश के साथ भी हमने नहरी पानी का समझौता किया है. आपने यह भी पढ़ा होगा कि दिल्ली से लाहौर बस चल रही है, तो अब ढाका से कलकत्ता तक भी बस चलने वाली है. एक बस नहीं है. बस करो यह भी नहीं है. अभी तो शुरुआत करनी है. दोस्ती से कभी जी नहीं भरता. हां, दुश्मनी में ऐसा मुकाम जाता है  कि जब दिल करता है कि अरे छोड़ो. दुनिया में आर्थिक संबंधों का विकास हो रहा है. हम पाकिस्तान के साथ भी व्यापार के आर्थिक संबंधों में विस्तार के कदम उठाना चाहते हैं. अगर आपके पास बिजली ज्यादा है, हम खरीदना चाहेंगे. जरा भाव ठीक होना चाहिए. बाढ़ और तूफान के बावजूद हमारी गेहूं की फसल अच्छी हुई है. हमने मियां साहब से कहा कि हमने सुना है कि आप बहुत दूर से गंदम ला रहे हैं. हम आपके दरवाजे पर गंदम पहुंचा देते हैं. और चीजें हैं, गिना नहीं रहा हूं. 

मसले हल होंगे. मसले ठीक होने के लिए ठीक वातावरण बनाना चाहिए. कुछ कदम हिम्मत के साथ उठाने पड़ेंगे. और मैं आपसे वादा करना चाहता हूं. जहां तक हिम्मत के साथ कदम उठाने की जरूरत पड़ेगी, आप मुझे और मेरे साथियों को कमजोर नहीं पाएंगे. पीछे हटते हुए नहीं पाएंगे. जब पोखरण में एटमी विस्फोट करने का फैसला हुआ, तो मुझे लोगों ने मेरी ही कविता याद दिलाई थी. मैं हिरोशिमा गया था. मैंने नागासाकी का दृश्य देखा था. वहां बम चलाया जाता, उसकी जरूरत नहीं थी. वहां लड़ाई खत्म हो गई थी. मित्र देश जीत गए थे. वह आत्मरक्षा के लिए चलाया गया एटमी हथियार नहीं था. आज वे लोग भुगत रहे हैं.

मेरी कविता का शीर्षक था-हिरोशिमा की कविता. एक शायर के दिल की पीड़ा थी. और इसलिए जब एक गंभीर फैसला किया गया, तब भी मेरा दिमाग साफ था. हमें मिलकर एटमी वेपन फ्री वर्ल्ड का निर्माण करना है. हम अपने एटमी हथियारों को काम में लाएं, इसका तो सवाल ही पैदा नहीं होता. लेकिन इसके लिए दोस्ती का माहौल चाहिए. मैं उम्मीद करता हूं कि मेरी 24 घंटे की यात्रा इस तरह का माहौल बनाने में मदद करेगी. मैंने कहा कि दिल्ली और लाहौर की दूरी थोड़ी कम सी हो गई है. ये दूरी हमें और कम करनी है. और केवल लाहौर की ही नहीं, सारे पाकिस्तान और हिन्दुस्तान के बीच नजदीकी लानी है. मुझे विश्वास है कि इस सब में पाकिस्तान के वजीरे-आजम का सहयोग और उनके साथियों का सहयोग मिलेगा. पाकिस्तान के अवाम का सहयोग मिलेगा. और हम मिलकर कदम से कदम मिलाकर आगे बढ़ेंगे.

आपने मेरा और मेरे डेलीगेशन का जो स्वागत किया, उसके लिए मैं आपका बहुत-बहुत आभारी हूं. मैं कोशिश करूंगा कि मन में जो आशाएं जगी हैं, उन आशाओं को हम लोग मिलकर पूरा कर सकें और साउथ एशिया में एक नया वातावरण और नई हवा पैदा कर सकें. बहुत-बहुत शुक्रिया.
-डॉ. सौरभ मालवीय

(पुस्तक- 'राष्ट्रवादी पत्रकारिता के शिखर पुरुष अटल बिहारी वाजपेयी' से)

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