Wednesday, July 15, 2026

जनप्रतिनिधि शासन का प्रशिक्षण लें

   


महाराष्ट्र के मुंबई के समीप  7 जनवरी, 2003 को केशव सृष्टि म्हालगी प्रबोधिनी के प्रशिक्षण केंद्र के लोकार्पण समारोह को  संबोधित करते हुए श्री अटल बिहारी वाजपेयी ने इस बात पर बल दिया कि जनप्रतिनिधियों को शासन चलाने से संबंधित प्रशिक्षण लेना चाहिए. उन्होंने कहा कि रामभाऊ म्हालगी के संबंध में एक प्रसंग याद आ रहा है. उन्होंने जब लोकसभा में पंचवर्षीय योजना के संबंध में भाषण दिया, उस पर तत्कालीन केंद्रीय मंत्री यशवंत चव्हाण ने बहस का उत्तर देते हुए एक वाक्य में सारी चर्चा को समाप्त करने का प्रयास किया था. तब उन्होंने रामभाऊ के भाषण की ओर संकेत करते हुए कहा था- उनके वे शब्द मुझे अभी तक याद हैं, मैं दोहराता हूं कि ’नियोजन ह्या मंडलींचा विषय नाहीं.’ नियोजन से जनसंघ वालों का कोई संबंध नहीं है. उस दिन मुझे लगा और रामभाऊ ने भी अनुरोध किया, हम राजनीति में आ गए हैं, राष्ट्र की सेवा हमारा लक्ष्य है, अगर हम चुनाव लड़ेंगे, सत्ता में आने का प्रयास करेंगे, इसके लिए हमें सभी विषयों की जानकारी प्राप्त करनी होगी, शासन चलाने का एक तरह से प्रशिक्षण लेना होगा. 

राजनीतिक नेतृत्व और प्रशासन चलाने वाली सरकारी यंत्रणा, जिसे आप ’ब्यूरोक्रेसी’ कह सकते हैं, उसमें खाई बढ़ती जा रही है. लोकप्रियता एकमात्र निष्कर्ष है. मतदाता किसका समर्थन करेंगे, यह कह नहीं सकते. लेकिन जो भी चुनकर आएगा, वह अगर शासन चलाने के मामले में, राजकाज चलाने के मामले में बिल्कुल अनभिज्ञ होगा, तो लोकतंत्र, जड़ शासनतंत्र में बदल जाएगा. शासन चलाने की जो पद्धति है, उसमें अगर परिवर्तन किया जाए, तो बात अलग है, लेकिन बड़ी मात्रा में आज चुने हुए राजनीतिक नेताओं को ब्यूरोक्रेसी पर निर्भर रहना पड़ता है. ब्यूरोक्रेसी का काम है कि वह सहायक हो, जानकारी दे, अपनी सलाह भी दे, लेकिन उस सलाह को नाप तौलकर व्यवहार में लाने की जिम्मेदारी राजनीतिक नेताओं की है. मैं देखता हूं कि यह जिम्मेदारी घट रही है. जो लोग राजनीति में जाना चाहते हैं या जो उसके लिए तैयार हो रहे हैं, वे बौद्धिक दृष्टि से अपने को समृद्ध कर रहे हैं, तैयार कर रहे हैं, ऐसा दृश्य हमें दिखाई नहीं देता. शायद ’प्रबोधिनी’ ये पहला प्रयास है अपने ढंग का. और इसलिए मैं इसका स्वागत करता हूं. प्रशिक्षण का रूप क्या हो, उसका विवरण क्या हो, ये प्रबोधिनी तय करेगी. ये निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है. शासन भी निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है. 

लोकतंत्र में सत्ता का विभाजन होगा. एक्जक्यूटिव हैं, लेजिस्लेचर हैं और ज्यूडिशियरी की एक अलग भूमिका है. अब जिन्होंने अपने को उसके लिए तैयार नहीं किया है, उनसे यह आशा तो की ही जाती है कि राजनीतिज्ञ सत्ता में आने के बाद जल्दी से जल्दी अपने को तैयार करें. लेकिन तैयारी की कोई पृष्ठभूमि चाहिए. यही कठिनाई होती है. शासन जीवन के सभी क्षेत्रों में फैल रहा है. और भले ही हम कहें कि शासन में विकार कम होना चाहिए, लेकिन व्यवहार में निर्णय लेने की प्रक्रिया सीमित होती जा रही है, संकुचित होती जा रही है. और आख़िर में वह थोड़े से चोटी के लोगों पर निर्भर करती है. उसमें जिन्होंने ट्रेनिंग ली है, इस अर्थ में उन्होंने नौकरी करने के लिए वह रास्ता चुना, उनमें और जब जनता के चुने हुए प्रतिनिधियों में आमना-सामना होता है, तो फिर ये अनुभव होता है कि जनप्रतिनिधि जितने तैयार होने चाहिए, उतने नहीं हैं. अभी तक ऐसा प्रयास नहीं हुआ था, वह हो रहा है और बड़ी अच्छी बात है. 

लोकसभा की आप डिबेट कभी सुनें जाकर. सदस्यों को समय नहीं मिलता, ये शिकायत होती रहती है, लेकिन उन्हें जब समय मिलता है तब वे क्या बोलते हैं मालूम नहीं. वे इसकी तरफ ध्यान नहीं देते, तैयारी नहीं करते. अब काम, कमीटियों में होता है, कमीटियों में उपस्थिति नहीं होती. तैयार होकर सदस्य नहीं आते. उनकी रुचि भी नहीं होती. जब तैयार होने की पृष्ठभूमि नहीं होती, इसलिए ऐसी ट्रेनिंग के लिए जनप्रतिनिधियों में रुचि पैदा होना भी जरूरी है. उनमें विषय को समझने की तैयारी हो, और फिर उसके अनुसार काम लेने की तैयारी हो. मैं समझता हूं कि प्रबोधिनी इस संबंध में महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर सकती है. यहीं कहीं केशव सृष्टि है. मुझे इस नई सृष्टि को देखकर बड़ा आनंद हुआ है. यहां आने तक मुझे यह कल्पना नहीं थी कि इस सृष्टि का रूप क्या है ? जो कुछ आज मैंने देखा, मुझे आश्चर्य है, सुखद आश्चर्य है. अब कोई यह नहीं कहेगा कि नियोजन या मंडलींचा विषय नाही. उस विश्वास के अनुरूप  हम शासन के हर एक अंग को किस तरह से चला सकते हैं, किस तरह से सही परिणाम पा सकते हैं, इस दृष्टि से विचार करने की जरूरत है. और मैं समझ रहा हूं कि जो भी इस दिशा में प्रयास हुआ है, वह प्रशंसनीय है. बड़ी संख्या में हमारे कार्यकर्ता इसका लाभ उठाएं, प्रशिक्षित हों. पहले शिक्षित हों, फिर प्रशिक्षित हों, परंतु अभी तो ’शिक्षा’ ही शुरू नहीं हुई है. ये शिक्षा मराठी वाली शिक्षा नहीं है. ’शिक्षण’ अभी तो शिक्षण ही शुरू नहीं हुआ है. इसकी आवश्यकता ही नहीं समझी गई है. लेकिन अब आवश्यकता का अनुभव हो रहा है. यह अभाव था. जो खल रहा है. और जो सत्ता में बैठे हैं, उनको तो ये अभाव ज्यादा खलेगा.

जो सत्ता में हैं, जो बाद में सत्ता में जाएंगे, उन्हें यह अभाव न खले, इसके लिए उन्हें अपने आप को अभी से तैयार करने की जरूरत है. यही प्रयास हो रहा है, बड़ी प्रसन्नता है. मैं सफलता की कामना करता हूं.
-डॉ. सौरभ मालवीय

(पुस्तक- 'राष्ट्रवादी पत्रकारिता के शिखर पुरुष अटल बिहारी वाजपेयी' से)

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