Saturday, January 31, 2026

हिन्दू सम्मेलन में संघ के विचारों से समाज को दिशा मिलती है : सौरभ मालवीय






गोमतीनगर (लखनऊ)। हिन्दू समाज की एकता, सांस्कृतिक चेतना और राष्ट्र के प्रति दायित्वबोध ही भारत की वास्तविक शक्ति है। संघ का कार्य व्यक्ति निर्माण से राष्ट्र निर्माण की दिशा में सतत् प्रयास है।
सौरभ मालवीय ने अपने वक्तव्य में कहा कि हिन्दू समाज एक जीवन दर्शन है, जो समरसता, सेवा, त्याग और लोकमंगल की भावना से संचालित होता है। आज आवश्यकता है कि समाज संगठित होकर अपनी सांस्कृतिक जड़ों को समझे और भावी पीढ़ी को राष्ट्रवादी संस्कार प्रदान करे।
उन्होंने कहा कि आरएसएस ने अपने शताब्दी-समीप यात्रा में बिना किसी भेदभाव के समाज के हर वर्ग को जोड़ने का कार्य किया है। सेवा कार्य, शिक्षा, सामाजिक समरसता और राष्ट्रभक्ति के क्षेत्र में स्वयंसेवकों का योगदान अतुलनीय है।
सम्मेलन में बड़ी संख्या में प्रबुद्ध नागरिक, सामाजिक कार्यकर्ता, युवा एवं मातृशक्ति उपस्थित रही। कार्यक्रम के दौरान वक्ताओं ने हिन्दू समाज की भूमिका, सांस्कृतिक पुनर्जागरण और राष्ट्र की एकता पर अपने विचार रखे।

Wednesday, January 28, 2026

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नमस्ते यूपी 
दूरदर्शन

सिद्धार्थनगर महोत्सव


उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा कि विश्व को मानवता, करुणा और मैत्री का संदेश देने वाले भगवान बुद्ध की पावन धरा पर सिद्धार्थनगर महोत्सव का आयोजन किया जा रहा है। महोत्सव शब्द स्वयं में एक विराट अवधारणा को समाहित किए हुये है। सिद्धार्थनगर महोत्सव यहां के कलाकारों, किसानों, युवाओं तथा संस्थाओं सहित प्रत्येक वर्ग के उत्कृष्ट कार्य करने वाले लोगों को प्लेटफॉर्म प्रदान करेगा। उत्तर प्रदेश उपद्रव प्रदेश से उत्सव प्रदेश बन चुका है। विकास की इस यात्रा में निरन्तरता बनाए रखने के लिए प्रदेश सरकार दृढ़संकल्पित है।

मुख्यमंत्री 28 जनवरी 2026 को जनपद सिद्धार्थनगर में ‘सिद्धार्थनगर महोत्सव’ का शुभारम्भ तथा 1052 करोड़ रुपये की 229 विकास परियोजनाओं का लोकार्पण तथा शिलान्यास करने के पश्चात आयोजित कार्यक्रम में अपने विचार व्यक्त कर रहे थे। उन्होंने कहा कि किसी बड़े महोत्सव के आयोजन से पूर्व स्थानीय स्तर पर कार्यक्रम आयोजित किये जाने चाहिए। गायन-वादन के साथ-साथ विविध कलाओं से संबंधित प्रतिस्पर्धा ग्राम पंचायत, वार्ड, नगर पंचायत, नगर पालिका, क्षेत्र पंचायत, तहसील तथा विधानसभा स्तर पर की जानी चाहिए। इस प्रतिस्पर्धा में सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करने वाले कलाकारों को मुख्य महोत्सव में सम्मानित करने के साथ उनके परफार्मेन्स को जनता-जनार्दन के सामने प्रस्तुत किया जाना चाहिए। यह कलाकार प्रगतिशील किसान, श्रमिक, खिलाड़ी, उद्यमी सहित जीवन के किसी भी क्षेत्र में कार्य करने वाले व्यक्ति हो सकते हैं।


उन्होंने कहा कि सिद्धार्थनगर जनपद राजकुमार सिद्धार्थ के नाम पर बना है। आज से ढाई हजार वर्ष पूर्व यहां उन्हीं का राज था। कपिलवस्तु उनकी राजधानी थी। वह सब कुछ त्याग कर ज्ञान की खोज तथा जीवन की सच्चाई जानने के लिए निकले। विश्व प्रसिद्ध तीर्थ गया में जाकर लम्बी साधना की। ज्ञान प्राप्त होने के पश्चात उन्होंने पहला उपदेश सारनाथ में दिया। उन्होंने अपने जीवन के सर्वाधिक चतुर्मास श्रावस्ती जनपद में व्यतीत किये।

उन्होंने कहा कि ईश्वर की सर्वश्रेष्ठ कृति होने के कारण मनुष्य के मन में मानवीय गरिमा, उसकी सुरक्षा और सम्प्रभुता का भाव सदैव बना रहता है। सर्वश्रेष्ठ कृति होने के नाते मनुष्य द्वारा अच्छा सोचने, बोलने तथा सकारात्मक दिशा में पहल करने के अच्छे परिणाम प्राप्त होंगे। ‘बुद्धम् शरणम् गच्छामि’, ‘धम्मम् शरणम् गच्छामि’ तथा ‘संघम् शरणम् गच्छामि‘। धर्म की शरण में जाने के लिए बुद्धि और विवेक की आवश्यकता होती है। यदि बुद्धि व विवेक के साथ-साथ संगठन होगा, तो सकारात्मक ऊर्जा लोगों के जीवन में व्यापक परिवर्तन का कारण बनेगी। यही कार्य डबल इंजन सरकार कर रही है।

उन्होंने कहा कि हमारा दायित्व है कि जनता-जनार्दन द्वारा दी गई शक्ति का उपयोग जनता-जनार्दन के हित में बिना भेदभाव करके दिखाएं। आज सिद्धार्थनगर महोत्सव के शुभारम्भ पर 1052 करोड़ रुपये से अधिक की परियोजनाओं की सौगात इस जनपद को प्रदान की जा रही है। यह परियोजनाएं यहां के जनप्रतिनिधियों द्वारा भेजे गए प्रस्तावों एवं प्रयासों से जनपद में लागू हो रही हैं। राज्य सरकार प्रदेश की 25 करोड़ आबादी को अपना परिवार मानकर जनकल्याणकारी परियोजनाओं के लिए बिना भेदभाव के धनराशि उपलब्ध कराती है।

उन्होंने कहा कि गत वर्ष मई महीने में मध्य उत्तर प्रदेश के भ्रमण के दौरान पाया कि वहां के किसान दो फसल के बाद तीसरी मक्का की फसल उपजा रहे थे। एटा, कन्नौज, औरैया, कानपुर देहात, हरदोई आदि जनपदों के अन्नदाता किसानों ने अवगत कराया कि उन्हें तीसरी फसल से एक लाख रुपये प्रति एकड़ अतिरिक्त आय प्राप्त हो रही है। यहां के किसानों को भी इस दिशा में प्रयास करना होगा। फूड प्रोसेसिंग के प्रस्ताव लाएं, प्रदेश सरकार धनराशि तथा सब्सिडी उपलब्ध करा रही है। अच्छी नीयत होने पर नियन्ता भी सहयोग करता है। यहां का अन्नदाता किसान जैसी बरसात चाहता था, रात्रि से वैसी बरसात इन्द्रदेव द्वारा की जा रही है। यह एक प्रकार से धरती माता से सोना उगाने के लिए अन्नदाता किसान के लिए व्यवस्थित ईश्वरीय कृपा है।

उन्होंने सिद्धार्थनगर महोत्सव में नेता प्रतिपक्ष श्री माता प्रसाद पाण्डेय को सम्मिलित होने के लिए धन्यवाद देते हुए कहा कि यह जीवन हताशा व निराशा के लिए नहीं है। मनुष्य का जीवन उत्साह और उमंग के लिए प्राप्त हुआ है। एक-दूसरे के साथ मिलकर सकारात्मक ऊर्जा के साथ विकास के अभियान को आगे बढ़ाना आवश्यक है। प्रत्येक जगह काट-छांट नहीं होनी चाहिए। अच्छी सोच के साथ किए गये प्रयासों का परिणाम है कि सिद्धार्थनगर में श्री माधव बाबू के नाम पर श्री माधव प्रसाद त्रिपाठी मेडिकल कॉलेज का निर्माण हुआ है। यह मेडिकल कॉलेज शानदार तरीके चल रहा है। यहां नर्सिंग कॉलेज भी प्रारम्भ हो चुका है। आज महिला छात्रावास का शिलान्यास तथा एक हजार सीट की क्षमता के ऑडिटोरियम को आगे बढ़ाने का कार्य किया गया है।

उन्होंने कहा कि सिद्धार्थनगर जनपद आकांक्षी जनपद इसलिए था, क्योंकि यहां विकास के लिए इन्फ्रास्ट्रक्चर का अभाव था। लोग पलायन के लिए मजबूर थे। बीमार मानसिकता के लोगों ने जनपद सिद्धार्थनगर सहित पूर्वी उत्तर प्रदेश को बीमार बना दिया था। मच्छर और माफियाओं के आगोश में ला दिया था। परिणामस्वरूप  इन्सेफेलाइटिस से कमजोर वर्ग के हजारों बच्चों की मौत होती थी। हमारे लिए वह दलित, अति पिछड़ा, अल्पसंख्यक तथा वोट बैंक नहीं थे, बल्कि वह बच्चे उत्तर प्रदेश की अमानत व हमारे परिवार का हिस्सा थे। डबल इंजन सरकार ने प्राण-पण से काम किया और दशकों की बीमारी कुछ ही वर्षों में समाप्त कर दी गई। अब सिद्धार्थनगर सहित पूर्वी उत्तर प्रदेश का कोई भी बच्चा इस बीमारी से दम नहीं तोड़ता है।

उन्होंने कहा कि लगभग 125 वर्ष पूर्व भगवान बुद्ध के अवशेष पिपरहवा से इंग्लैंड पहुंचा दिए गये थे। इन अवशेषों की वहां तथा ताइवान में नीलामी हो रही थी। यहां के सांसद ने प्रयास किया तथा हमने एक पत्र लिखा। प्रधानमंत्री जी के नेतृत्व में भारत सरकार द्वारा किए गये प्रयासों से भगवान बुद्ध से जुड़े यह पवित्र अवशेष भारत लौट आए हैं। अब कपिलवस्तु में विपश्यना केंद्र बनाया जा रहा है। वहां विकास के कार्य आगे बढ़ाए जा रहे हैं। पहले मित्र राष्ट्र नेपाल से कनेक्टिविटी अच्छी नहीं थी। प्रदेश सरकार ने फोर-लेन की बेहतर इंटर स्टेट तथा इंटरनेशनल कनेक्टिविटी प्रदान करने का प्रयास किया है। आज सिद्धार्थनगर को फोर-लेन की कनेक्टिविटी से जोड़ने का कार्य किया जा रहा है।

उन्होंने कहा कि खलीलाबाद से बहराइच होकर जाने वाली रेलवे लाइन 80 किलोमीटर सिद्धार्थनगर जनपद से गुजरती है। यह कार्य निवेश को आकर्षित करेगा। गोरखपुर-शामली इकोनॉमिक कॉरिडोर सिद्धार्थनगर जनपद के बांसी, डुमरियागंज तथा इटवा विधानसभा क्षेत्रों को टच करते हुए विकास का नया कॉरिडोर बनने जा रहा है। यह चीजें दिखाती हैं कि सरकार बांटकर विकास नहीं कर सकती, बल्कि समग्रता के भाव से देखती है। भेदभाव मुक्त तथा सतत विकास की दृष्टि से किए जाने वाले प्रयास ही रामराज्य की अवधारणा के साकार रूप हैं। राशन, आवास, आयुष्मान भारत सहित समस्त सरकारी योजनाओं का लाभ गरीबों, महिलाओं तथा युवाओं आदि को बिना भेदभाव प्राप्त होना आवश्यक है। प्रधानमंत्री जी ने इसी अवधारणा पर फोकस कर योजनाओं का निर्माण किया है। डबल इंजन सरकार सबका साथ-सबका विकास के लक्ष्य के साथ कार्य कर रही है।


उन्होंने कहा कि गरीब कल्याणकारी योजनाओं के माध्यम से प्रतिस्पर्धा को आगे बढ़ाने की आवश्यकता है। मनरेगा में पहले कच्चा काम ही किया जा सकता था। पक्के काम की गुंजाइश नहीं थी। केवल 100 दिन के रोजगार की गारंटी थी। अब विकसित भारत जी-राम-जी की नई योजना के अंतर्गत 125 दिन के रोजगार की गारंटी सुनिश्चित कराई जा रही है। यदि मांगने पर ग्राम पंचायत रोजगार नहीं देगी, तो उसे मुआवजा देना होगा। अब पक्का कार्य भी किया जा सकता है। गांव, गरीब, किसान, युवा, महिलाएं तथा समाज का प्रत्येक तबका विकास का आधार होना चाहिए। इसी भाव के साथ डबल इंजन सरकार ने इस कार्य को आगे बढ़ाया।

उन्होंने कहा कि सिद्धार्थनगर की एक महिला उद्यमी ने भगवान बुद्ध के प्रसाद के रूप में काला नमक चावल की ब्रांडिंग व उसके एक्सपोर्ट के माध्यम से आत्मनिर्भरता के लक्ष्य को प्राप्त करने का उदाहरण प्रस्तुत किया है। यहां की एक महिला स्वयंसेवी संस्था ‘मुख्यमंत्री मत्स्य सम्पदा योजना’ तथा ‘प्रधाननमंत्री मत्स्य सम्पदा योजना’ का लाभ लेकर 15 लाख रुपये प्रतिवर्ष की आमदनी प्राप्त कर रही है। ‘एक जनपद एक उत्पाद योजना’ तथा ‘मत्स्य सम्पदा योजना’ के माध्यम से सिद्धार्थनगर ने महिला उद्यमिता के क्षेत्र में अच्छी प्रगति की है। पिछली बार ‘एक जनपद एक उत्पाद योजना’ के लिए कॉमन सर्विस सेण्टर दिया गया था। जहां काला नमक चावल का उत्पादन होता है तथा जहां से इसे निर्यात किया जा सकता है, वहां जगह चिन्हित कर कॉमन सर्विस सेंटर की सुविधा को आगे बढ़ाने की आवश्यकता है।
इस अवसर पर जनपद सिद्धार्थनगर के विकास से संबंधित लघु फिल्म प्रदर्शित की गई।
इसके पूर्व उन्होंने बच्चों का अन्नप्राशन व महिलाओं की गोदभराई की तथा आयोजित प्रदर्शनी का अवलोकन किया।

Tuesday, January 27, 2026

मेरा गांव - मेरा तीर्थ









पटनेजी ग्राम में शतचंडी यज्ञ का पूर्णाहुति पर्व : अध्यात्म, संस्कार और लोकमंगल का संदेश
मेरे पिताश्री की अभिलाषा, जिजीविषा और निष्ठा से उनकी मनोकामना पूर्ण हुई. 
मेरे गांव -मेरे घर की पुण्यभूमि पर सम्पन्न हुआ शतचंडी यज्ञ केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि भारतीय सनातन परम्परा के उस शाश्वत चिंतन का सजीव उदाहरण रहा, जिसमें आध्यात्म, संस्कार, समाज और लोककल्याण एक सूत्र में पिरोए जाते हैं। वैदिक मंत्रोच्चार, अग्नि की पवित्र ज्वालाएँ और श्रद्धालुओं की सामूहिक साधना ने पूरे वातावरण को दिव्यता और सकारात्मक ऊर्जा से भर दिया।
शतचंडी यज्ञ का मूल उद्देश्य आत्मिक शुद्धि, मानसिक संतुलन और सामाजिक समरसता की स्थापना है। माँ चंडी की उपासना शक्ति, साहस और धर्मरक्षा का प्रतीक है। यह यज्ञ हमें यह संदेश देता है कि जब समाज आध्यात्मिक चेतना से जुड़ता है, तब व्यक्ति का अहंकार गलता है और सेवा, करुणा व त्याग का भाव जाग्रत होता है।
आज के भौतिकतावादी युग में ऐसे यज्ञ समाज को आंतरिक शांति और नैतिक दिशा प्रदान करते हैं। शतचंडी यज्ञ भारतीय संस्कृति केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं है, बल्कि वह लोकमंगल की भावना से ओत-प्रोत है। यज्ञ की अग्नि में आहुतियाँ केवल सामग्री की नहीं होतीं, बल्कि यह हमारे भीतर की नकारात्मक प्रवृत्तियों—क्रोध, लोभ और अहंकार—की भी आहुति है।
 नारी शक्ति, वृद्धजन का अनुभव और समाज के प्रत्येक वर्ग का सम्मान ही सशक्त राष्ट्र की आधारशिला है। आध्यात्मिक आयोजनों में जब सामाजिक संवेदनशीलता जुड़ती है, तब धर्म केवल कर्मकांड न रहकर जीवन पद्धति बन जाता है।
शतचंडी यज्ञ का समापन हमें यह स्मरण कराता है कि धर्म का अंतिम लक्ष्य आत्मकल्याण के साथ-साथ समाज का उत्थान है।
 ग्राम पटनेजी में सम्पन्न यह यज्ञ आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा बने—कि जब गाँव, समाज और राष्ट्र आध्यात्मिक मूल्यों से जुड़ते हैं, तब संस्कृति जीवित रहती है और राष्ट्र सशक्त होता है।
यही यज्ञ का सार है—स्व से समाज और समाज से राष्ट्र की चेतना का जागरण। 

Monday, January 26, 2026

सप्तचंडी यज्ञ सम्पन्न















देवरिया। लार. पटनेजी.
शासकीय अधिवक्ता श्री नवनीत मालवीय के आवास पर ग्राम पटनेजी में आयोजित सप्तचंडी यज्ञ का समापन धार्मिक एवं सामाजिक गरिमा के साथ हुआ। 
समापन अवसर पर जिला अधिकारी श्रीमती दिव्या मित्तल ने शारीरिक रूप से पूर्णतः विकलांग विनय शर्मा को सम्मानित कर उनका उत्साहवर्धन किया। 
इसके साथ ही समाज में उल्लेखनीय योगदान देने वाली महिलाओं एवं बुजुर्गों को भी सम्मानित किया गया।
इस अवसर पर एसडीएम सलेमपुर अलका सिंह, जिला पंचायत अध्यक्ष गिरीश तिवारी सहित अनेक गणमान्य नागरिक, जनप्रतिनिधि एवं क्षेत्रवासी उपस्थित रहे। 
कार्यक्रम में आध्यात्मिक वातावरण के साथ-साथ सामाजिक समरसता और सेवा भाव का संदेश दिया गया।
आयोजकों द्वारा सभी अतिथियों का आभार व्यक्त करते हुए नवनीत मालवीय ने कहा  कि ऐसे आयोजन समाज में सकारात्मक ऊर्जा, सहयोग और संस्कारों को सुदृढ़ करने का कार्य करते हैं।
कार्यक्रम की अध्यक्षता विद्यानन्द दुबे ने की.

Sunday, January 25, 2026

७७वें गणतंत्र दिवस⁠ की अनंत शुभकामनाएं


आपको ७७वें गणतंत्र दिवस⁠ की अनंत शुभकामनाएं
इस अवसर पर हम अपनी स्वतंत्रता व गणतंत्र की अक्षुण्णता के प्रति निरंतर सजग रहते हुए ऐसे भारत के निर्माण का संकल्प लें जिसमें प्रत्येक देशवासी अपने नागरिक कर्तव्यों के प्रति जागरूक हो।

गणतंत्र दिवस समारोह







देवरिया।
सरस्वती वरिष्ठ माध्यमिक विद्या मंदिर, देवरिया खास के प्रांगण में 77वें गणतंत्र दिवस के अवसर पर भव्य कार्यक्रम का आयोजन किया गया। विद्यालय परिसर देशभक्ति के रंग में रंगा रहा और विद्यार्थियों, आचार्यों व अभिभावकों में राष्ट्रप्रेम का उत्साह स्पष्ट रूप से परिलक्षित हुआ।
कार्यक्रम का शुभारंभ ध्वजारोहण के साथ हुआ। इस अवसर पर विद्या भारती के क्षेत्रीय मंत्री प्रो. सौरभ मालवीय मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। उन्होंने अपने प्रेरणादायी उद्बोधन में भारतीय संविधान के मूल्यों, राष्ट्र की एकता-अखंडता तथा युवाओं की राष्ट्रनिर्माण में भूमिका पर विस्तार से प्रकाश डाला।
प्रो. मालवीय ने कहा कि गणतंत्र दिवस केवल एक पर्व नहीं, बल्कि संविधान द्वारा प्रदत्त अधिकारों और कर्तव्यों का स्मरण कराने वाला अवसर है। उन्होंने विद्यार्थियों से आह्वान किया कि वे संस्कार, शिक्षा और सेवा के माध्यम से एक सशक्त एवं आत्मनिर्भर भारत के निर्माण में सहभागी बनें।
कार्यक्रम में विद्यार्थियों द्वारा देशभक्ति गीत, सांस्कृतिक प्रस्तुतियाँ एवं प्रेरक नाट्य मंचन प्रस्तुत किया गया, जिसने उपस्थित जनसमूह को भावविभोर कर दिया। विद्यालय परिवार द्वारा आयोजित यह कार्यक्रम अनुशासन, राष्ट्रभाव और सांस्कृतिक चेतना का उत्कृष्ट उदाहरण रहा।
इस अवसर पर प्रदेश मंत्री डॉ. डॉ. शैलेश सिंह जी और प्रदेश निरीक्षक श्री राम सिंह जी का विशेष मार्गदर्शन मिला. 
अंत में विद्यालय के प्रधानाचार्य द्वारा सभी अतिथियों, आचार्यों, विद्यार्थियों एवं अभिभावकों के प्रति आभार व्यक्त किया गया।

Saturday, January 24, 2026

भारतबोध कराता है भारतीय पर्यटन


डॉ. सौरभ मालवीय  
पर्यटन देश की आर्थिक स्थिति को सुदृढ़ बनाता है। इससे सरकार को राजस्व तथा विदेशी मुद्रा प्राप्त होती है। इसके कारण विकास कार्यों को भी बढ़ावा मिलता है। भारत एक विशाल देश है। यहां के विभिन्न राज्यों की भिन्न-भिन्न संस्कृतियां हैं। सबकी अपनी परम्पराएं हैं। इसके साथ ही यहां प्राकृतिक सौंदर्य से ओतप्रोत पर्यटन स्थल हैं। यहां पर ऐतिहासिक स्थल हैं। यहां पर असंख्य धार्मिक स्थल भी हैं। 

राष्ट्रीय पर्यटन दिवस का प्रारम्भ 
देश के विभिन्न पर्यटन स्थलों के प्रचार एवं प्रसार के लिए केंद्र सरकार ने 25 जनवरी 1948 को प्रथम बार राष्ट्रीय पर्यटन दिवस मनाया था। तब से प्रतिवर्ष 25 जनवरी को राष्ट्रीय पर्यटन दिवस मनाया जाता है। इसके पश्चात एक पर्यटन यातायात समिति भी गठित की गई। इस समिति के गठन के तीन वर्ष पश्चात 1951 में कोलकाता और चेन्नई में पर्यटन दिवस के क्षेत्रीय कार्यालयों में वृद्धि होती गई। दिल्ली, मुंबई, कोलकाता और चेन्नई में पर्यटन कार्यालय बनाए गए। वर्ष 1998 में पर्यटन और संचार मंत्री के नेतृत्व में एक पर्यटन विभाग बनाया गया। इसका उद्देश्य भारतीय पर्यटन को प्रोत्साहित करना है। पर्यटन स्थलों के कारण लाखों लोगों को आजीविका प्राप्त होती है।

धार्मिक पर्यटन 
भारत में प्रत्येक वर्ष लाखों पर्यटक आते हैं। इनमें धार्मिक पर्यटक भी सम्मिलित हैं। धार्मिक पर्यटक से अभिप्राय उन पर्यटकों से है, जो यहां के तीर्थ स्थानों के दर्शनों के लिए आते हैं। भारत तीर्थों का देश है। यहां बहुत से तीर्थ स्थान हैं। हिन्दू धर्म में अनेक प्रकार के तीर्थों का वर्णन मिलता है। इन तीर्थों में 12 ज्योतिर्लिंग भी सम्मिलत है। इनका अत्यंत महत्त्व है। गुजरात के सौराष्ट्र में स्थित सोमनाथ ज्योतिर्लिंग पृथ्वी का प्रथम ज्योतिर्लिंग माना जाता है। मान्यता है कि यहां पर देवताओं ने एक पवित्र कुंड का निर्माण किया था। इसे सोमकुंड कहा जाता है। यह भी मान्यता है कि इस कुंड में स्नान करने से व्यक्ति के समस्त पापों का नाश हो जाता है। इसलिए इसे पापनाशक कुंड कहा जाता है। 

आंध्र प्रदेश में कृष्णा नदी के तट पर श्रीशैल नामक पर्वत पर मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग है। इस ज्योतिर्लिंग में भगवान शिव और माता पार्वती की संयुक्त रूप से दिव्य ज्योतियां विद्यमान हैं। मध्य प्रदेश के उज्जैन में महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग है। यह एकमात्र दक्षिणमुखी ज्योतिर्लिंग है। यहां प्रतिदिन चिता की भस्म से महादेव का श्रंगार होता है तथा आरती होती है। यह आरती विश्वभर में प्रसिद्ध है, क्योंकि यह जलती चिता की भस्म से की जाती है। मध्य प्रदेश के खंडवा जिले में ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग है। यह नर्मदा नदी के मध्य मन्धाता अथवा शिवपुरी नामक द्वीप पर स्थित है।यहां ॐ का आकार बनता है। इसलिए इसे ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग कहा जाता है। उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग जिले में हिमालय की केदार नामक चोटी पर केदारनाथ ज्योतिर्लिंग है। कहा जाता है कि इसका निर्माण पांडवों ने करवाया था। महाराष्ट्र के पुणे जिले में सह्याद्रि नामक पर्वत पर भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग है। यहां से भीमा नदी निकलती है। यहां का शिवलिंग बहुत मोटा है। इसलिए इसे मोटेश्वर महादेव भी कहा जाता है। 

उत्तर प्रदेश के वाराणसी में बाबा विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग है। मान्यता है कि यह मंदिर शिव और पार्वती का आदि स्थान है। महाराष्ट्र के नासिक जिले के ग्राम त्रयंबक में त्र्यंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग है। इसके समीप ब्रह्मागिरि नामक पर्वत है, जो गोदावरी नदी का उद्गम स्थल है। यहां त्रिदेव अर्थात ब्रह्मा, विष्णुप एवं महेश विराजमान हैं, जो इसकी सबसे बड़ी विशेषता है। अन्यष सभी ज्यो तिर्लिंगों में केवल भगवान शिव ही विराजमान हैं। झारखंड के संथाल परगना में वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग है। शिव का एक नाम वैद्यनाथ भी है, इसलिए इसे वैद्यनाथ धाम भी कहा जाता है। पुराणों में शिव के इस धाम को चिताभूमि का नाम दिया गया है। गुजरात के बड़ौदा क्षेत्र में नागेश्वर ज्योतिर्लिंग है। नागेश्वर का अर्थ है नागों का ईश्वर तथा शिव को नागों का देवता माना जाता है। तमिलनाडु के रामनाथम नामक स्थान पर रामेश्वरम् ज्योतिर्लिंग है। इसे सेतुबंध तीर्थ भी कहा जाता है। मान्यता है कि लंका पर चढ़ाई करने से पूर्व श्रीराम ने इसकी स्थापना की थी। इसलिए इसे रामेश्वरम कहा जाता है। महाराष्ट्र के दौलताबाद के समीप घुश्मेश्वर ज्योतिर्लिंग है। इस स्थान को शिवालय भी कहा जाता है। इस मंदिर का निर्माण अहिल्याबाई होल्कर ने करवाया था।

हिन्दू धर्म में चार धामों की यात्रा को भी अत्यंत पुण्यदायक माना जाता है। इनमें उत्तराखंड का बद्रीनाथ धाम, गुजरात का द्वारका धाम, उड़ीसा का जगन्नाथ पुरी तथा तमिलनाडु का रामेश्वरम धाम सम्मिलित है। मान्यता है कि इन चार धामों की यात्रा करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को अपने जीवन में एक बार अवश्य इन चार धामों की यात्रा कर पुण्य प्राप्त करना चाहिए। 

पर्यटन की वैश्विक स्थिति 
वैश्विक रूप से पर्यटन की बात करें, तो यह एक बड़ा क्षेत्र है। एक रिपोर्ट के अनुसार पर्यटन का सकल घरेलू उत्पाद में लगभग 11 प्रतिशत का योगदान है। भारत में पर्यटन का सकल घरेलू उत्पाद में 6.7 प्रतिशत का योगदान है। भारत की स्थिति के दृष्टिगत यह बहुत कम योगदान है। चीन में यह योगदान 8.6 प्रतिशत, श्रीलंका में 8.8 प्रतिशत, इंडोनेशिया में 9.2 प्रतिशत, मलेशिया में 12.9 प्रतिशत तथा थाइलैंड में 13.9 प्रतिशत है। एक रिपोर्ट के अनुसार प्रथम पंचवर्षीय योजना के समय देश में केवल 17 हजार विदेशी पर्यटक आए थे। यह पर्यटन को प्रोत्साहित करने का परिणाम है कि वर्ष 2017 में देश में लगभग 77 लाख विदेशी पर्यटक भारत भ्रमण के लिए आए। अब देश में प्रतिवर्ष लगभग 77 विदेशी पर्यटक आते हैं। केंद्र की मोदी सरकार इस ओर ध्यान दे रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अनुसार आज पर्यटन विश्व के अनेक देशों में एक आकर्षक उद्योग के रूप में रोजगार का बहुत बड़ा माध्यम बना हुआ है। विश्व में अनेक देश हैं, जिनकी पूरी अर्थव्यवस्था केवल और केवल पर्यटकों के भरोसे चल रही है। भारत के कोने-कोने में पर्यटन की शक्ति अपार है, बहुत सामर्थ्य पड़ा हुआ है, हमें इसे बढ़ाने की आवश्यकता है। आज यह समय की मांग है कि भारत अपनी विरासत को अधिक से अधिक और तेजी के साथ संरक्षित करे, वहां आधुनिक सुविधाएं बढ़ाए। हम यह पूरे देश में देख रहे हैं कि बीते वर्षों में जिन भी तीर्थ स्थलों को आधुनिक सुविधाओं से जोड़ा गया, वहां यात्रियों, पर्यटकों की संख्या अनेक गुना बढ़ गई है। इसका सीधा लाभ स्थानीय लोगों तथा वहां समीपवर्ती क्षेत्र के लोगों को हो रहा है।

उल्लेखनीय है कि भारत के तीर्थ स्थलों पर आने वाले पर्यटकों को दोहरा लाभ होता है, क्योंकि लगभग सभी तीर्थ ऐसे स्थानों पर हैं, जहां का प्राकृतिक सौन्दर्य देखते ही बनता है। भारत के उत्तर पूर्व में हिमालय पर्वत है। बर्फ से आच्छादित पर्वत सौन्दर्य का अद्भुत खजाना हैं। हिमालय के अतिरिक देश में अनेक पर्वत श्रृंखलाएं हैं, जिनमें अगस्त्यमलाई पहाड़ी, अनामलाई पहाड़ी, अरावली पर्वतमाला, बैलाडिला पहाड़ियां, कैमोर पहाड़ी, इलायची पहाड़ियां, धौलाधार श्रेणी, पूर्वी घाट, गढ़जात रेंज, कार्बी, आंगलोंग पठार, गारो पहाड़ियां, जयंतिया पहाड़ियां, काराकोरम शृंखला तथा खासी पर्वतमाला आदि सम्मिलित हैं। इन पर्वतमालाओं की हरियाली बड़ी मनोहारी लगती है। यहां के वन, वन्यजीव एवं इन वनों में निवास करने वाले आदिवासी समाज के लोगों की संस्कृति भी आकर्षण का केंद्र है।      

देश में असंख्य नदियां हैं। पंजाब राज्य का नामकरण तो पांच नदियों के कारण ही हुआ है। इनमें सतलुज, व्यास, रावी, चिनाब और झेलम नदी सम्मिलित है। देश में मुख्यतः चार नदी प्रणालियां अर्थात अपवाह तंत्र हैं। उत्तरी भारत में सिंधु, उत्तरी-मध्य भारत में गंगा तथा और उत्तर-पूर्व भारत में ब्रह्मपुत्र नदी प्रणाली है। प्रायद्वीपीय भारत में नर्मदा, कावेरी, महानदी आदि नदियां हैं, जो विस्तृत नदी प्रणाली का निर्माण करती हैं। देश में नदियों के संगम पर तीर्थस्थल बने हुए हैं। इन संगमों के नाम के साथ से प्रयाग जुड़ा हुआ है। देश में 14 प्रयाग हैं। उत्तर प्रदेश के प्रयाग में गंगा, यमुना एवं सरस्वती का संगम है। उत्तराखंड में पांच प्रयाग हैं। यहां अलकनंदा का अन्य नदियों से संगम होता है। यहां के देवप्रयाग में अलकनंदा और भागीरथी का संगम होता है। रुद्रप्रयाग में मन्दाकिनी तथा अलकनंदा नदियों का संगम होता है। कर्णप्रयाग में अलकनंदा तथा पिण्डर नदियों का संगम होता है। नन्दप्रयाग में नन्दाकिनी तथा अलकनंदा नदियों का संगम होता है। विष्णुप्रयाग में धौली गंगा तथा अलकनंदा नदियों का संगम होता है।

मान्यता है कि त्यौहारों पर इन तीर्थ स्थलों पर स्नान करने से व्यक्ति के समूल पापों का नाश हो जाता है तथा उसे पुण्य की प्राप्ति होती है। प्रयागराज हिन्दुओं का महत्वपूर्ण तीर्थ स्थल है। इसे अत्यंत पवित्र माना जाता है। यहां कुम्भ मेले का भी आयोजन किया जाता है। कुम्भ मेले के अवसर पर करोड़ों श्रद्धालु प्रयाग, हरिद्वार, उज्जैन तथा नासिक में स्नान करते हैं। इनमें से प्रत्येक स्थान पर प्रति बारहवें वर्ष तथा प्रयाग में दो कुम्भ पर्वों के मध्य छह वर्ष के अंतराल में अर्धकुम्भ मेले का आयोजान किया जाता है। यहां देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु आते हैं। कुम्भ मेले को अमृत उत्सव भी कहा जाता है।  

भारत में अनेक समुद्र तट हैं, जहां का अपार सौन्दर्य पर्यटकों को अपनी ओर खींचता है। इनमें आंध्र प्रदेश के समुद्र तट, उड़ीसा के समुद्र तट, पश्चिम बंगाल के समुद्र तट, गोवा के समुद्र तट, केरल के समुद्र तट, तमिलनाडु के समुद्र तट, मुंबई के समुद्र तट, दीव के समुद्र तट, अंडमान और निकोबार द्वीप समूह तथा लक्षद्वीप के समुद्र तट सम्मिलित हैं। विदेशी पर्यटकों के यहां के समुद्र तट बहुत पसंद हैं।

इसमें दो मत नहीं है कि यदि भारतीय पर्यटन को प्रोत्साहित किया जाए, तो यह रोजगार में सृजन करेगा। इससे रोजगार की समस्या का समाधान होगा तथा गरीबी उन्मूलन भी यह सहायक सिद्ध होगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में पर्यटन को प्रोत्साहित करने पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है, जो सार्थक सिद्ध होगा।
(लेखक-मीडिया शिक्षक एवं राजनीतिक विश्लेषक है)

Friday, January 23, 2026

वसंत पंचमी पर वास्तु पूजन सम्पन्न









नई दिल्ली में विद्या भारती के नवीन कार्यालय का वसंत पंचमी पर वास्तु पूजन सम्पन्न। 
वसंत पंचमी के पावन अवसर पर विद्या भारती के नवीन कार्यालय का विधिवत वास्तु पूजन सम्पन्न हुआ। यह कार्यक्रम वैदिक मंत्रोच्चार एवं आध्यात्मिक वातावरण में सम्पन्न हुआ।
इस शुभ अवसर पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह सरकार्यवाह डॉ. कृष्ण गोपाल जी की गरिमामयी उपस्थिति रही। उन्होंने विद्या भारती द्वारा राष्ट्र निर्माण, शिक्षा और संस्कार के क्षेत्र में किए जा रहे कार्यों की सराहना की तथा नवीन कार्यालय को संगठन की भावी गतिविधियों के लिए एक सशक्त केंद्र बताया।
कार्यक्रम में विद्या भारती से जुड़े पदाधिकारी, कार्यकर्ता एवं गणमान्यजन उपस्थित रहे।

सुप्रभात दिल्ली

 


Thursday, January 22, 2026

वसंतोत्सव : प्रेम का पर्व


डॊ. सौरभ मालवीय
प्राचीन काल से ही भारतीय संस्कृति में ऋतुओं का विशेष महत्व रहा है. इन ऋतुओं ने विभिन्न प्रकार से हमारे जीवन को प्रभावित किया है. ये हमारे जन-जीवन से गहरे से जुड़ी हुई हैं. इनका अपना धार्मिक और पौराणिक महत्व है. वसंत ऋतु का भी अपना ही महत्व है. भारत की संस्कृति प्रेममय रही है. इसका सबसे बड़ा उदाहरण वसंत पंचमी का पावन पर्व है. वसंत पंचमी को वसंतोत्सव और मदनोत्सव भी कहा जाता है. प्राचीन काल में स्त्रियां इस दिन अपने पति की कामदेव के रूप में पूजा करती थीं, क्योंकि इसी दिन कामदेव और रति ने सर्वप्रथम मानव हृदय में प्रेम और आकर्षण का संचार किया था. यही प्रेम और आकर्षण दोनों के अटूट संबंध का आधार बना, संतानोत्पत्ति का माध्यम बना.

वसंत पंचमी का पर्व माघ मास में शुक्ल पक्ष की पंचमी के दिन मनाया जाता है, इसलिए इसे वसंत पंचमी कहा जाता है. इस दिन विद्या की देवी सरस्वती की पूजा-अर्चना की जाती है. भारत सहित कई देशों में यह पर्व हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है. इस दिन घरों में पीले चावल बनाए जाते हैं, पीले फूलों से देवी सरस्वती की पूजा की जाती है. महिलाएं पीले कपड़े पहनती हैं. बच्चे पीली पतंगे उड़ाते हैं. विद्या के प्रारंभ के लिए ये दिन शुभ माना जाता है. कलाकारों के लिए इस दिन का विशेष महत्व है.

प्राचीन भारत में पूरे वर्ष को जिन छह ऋतुओं में विभाजित किया जाता था, उनमें वसंत जनमानस की प्रिय ऋतु थी. इसे मधुमास भी कहा जाता है. इस दौरान सूर्य कुंभ राशि में प्रवेश कर लेता है. इस ऋतु में खेतों में फ़सलें पकने लगती हैं, वृक्षों पर नये पत्ते आ जाते हैं. आम पर की शाख़ों पर बौर आ जाता है. उपवनों में रंग-बिरंगे पुष्प खिलने लगते हैं. चहुंओर बहार ही बहार होती है. रंग-बिरंगी तितलियां वातावरण को और अधिक सुंदर बना देती हैं.

वसंत का धार्मिक महत्व भी है. वसंत ऋतु का स्वागत करने के लिए माघ मास के पांचवे दिन महोत्सव का आयोजन किया जाता था. इस उत्सव में भगवान विष्णु और कामदेव की पूजा होती थी. शास्त्रों में वसंत पंचमी को ऋषि पंचमी से उल्लेखित किया गया है, तो पुराणों-शास्त्रों तथा अनेक काव्यग्रंथों में भी अलग-अलग ढंग से इसका चित्रण मिलता है. मान्यता है कि सृष्टि के प्रारंभिक काल में भगवान विष्णु की आज्ञा से ब्रह्मा ने जीवों की रचना की, परंतु इससे वे संतुष्ट नहीं थे. भगवान विष्णु ने अपने कमंडल से जल छिड़का, जिससे एक चतुर्भुजी सुंदर स्त्री प्रकट हुई, जिसके एक हाथ में वीणा तथा दूसरा हाथ वर मुद्रा में था. अन्य दोनों हाथों में पुस्तक एवं माला थी. ब्रह्मा ने देवी से वीणा बजाने का अनुरोध किया. जैसे ही देवी ने वीणा का मधुरनाद किया, वैसे ही संसार के समस्त जीव-जन्तुओं को वाणी प्राप्त हो गई. जलधारा में कोलाहल व्याप्त हो गया. पवन चलने से सरसराहट होने लगी. तब ब्रह्मा ने उस देवी को वाणी की देवी सरस्वती के नाम से पुकारा. सरस्वती को बागीश्वरी, भगवती, शारदा, वीणावादनी और वाग्देवी सहित अनेक नामों से पूजा जाता है. वे विद्या और बुद्धि प्रदान करती हैं. संगीत की उत्पत्ति करने के कारण वे संगीत की देवी कहलाईं. वसंत पंचमी को उनके जन्मोत्सव के रूप में भी मनाते हैं. ऋग्वेद में भगवती सरस्वती का वर्णन करते हुए उल्लेख गया है-
प्रणो देवी सरस्वती वाजेभिर्वजिनीवती धीनामणित्रयवतु।
अर्थात ये परम चेतना हैं. सरस्वती के रूप में ये हमारी बुद्धि, प्रज्ञा तथा मनोवृत्तियों की संरक्षिका हैं. हममें जो आचार और मेधा है, उसका आधार भगवती सरस्वती ही हैं. इनकी समृद्धि और स्वरूप का वैभव अद्भुत है.
मान्यता है कि वसंत पंचमी के दिन देवी सरस्वती पूजा करने और व्रत रखने से वाणी मधुर होती है, स्मरण शक्ति तीव्र होती है, प्राणियों को सौभाग्य प्राप्त होता है तथा विद्या में कुशलता प्राप्त होती है.
"यथा वु देवि भगवान ब्रह्मा लोकपितामहः।
त्वां परित्यज्य नो तिष्ठंन, तथा भव वरप्रदा।।
वेद शास्त्राणि सर्वाणि नृत्य गीतादिकं चरेत्।
वादितं यत् त्वया देवि तथा मे सन्तुसिद्धयः।।
लक्ष्मीर्वेदवरा रिष्टिर्गौरी तुष्टिः प्रभामतिः।
एताभिः परिहत्तनुरिष्टाभिर्मा सरस्वति।।
अर्थात् देवी! जिस प्रकार लोकपितामह ब्रह्मा आपका कभी परित्याग नहीं करते, उसी प्रकार आप भी हमें वर दीजिए कि हमारा भी कभी अपने परिवार के लोगों से वियोग न हो. हे देवी! वेदादि सम्पूर्ण शास्त्र तथा नृत्य गीतादि जो भी विद्याएं हैं, वे सभी आपके अधिष्ठान में ही रहती हैं, वे सभी मुझे प्राप्त हों. हे भगवती सरस्वती देवी! आप अपनी- लक्ष्मी, मेधा, वरारिष्टि, गौरी, तुष्टि, प्रभा तथा मति- इन आठ मूर्तियों के द्वारा मेरी रक्षा करें.

पुराणों के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण ने सरस्वती से प्रसन्न होकर उन्हें वरदान दिया था कि वसंत पंचमी के दिन तुम्हारी भी आराधना की जाएगी. इस तरह भारत के कई हिस्सों में वसंत पंचमी के दिन विद्या की देवी सरस्वती की भी पूजा होने लगी. त्रेता युग में जिस दिन श्रीराम शबरी मां के आश्रम में पहुंचे थे, वह वसंत पंचमी का ही दिन था. श्रीराम ने भीलनी शबरी मां के झूठे बेर खाए थे. गुजरात के डांग जिले में जिस स्थान पर शबरी मां के आश्रम था, वहां आज भी एक शिला है. लोग इस शिला की पूजा-अर्चना करते हैं. बताया जाता है कि श्रीराम यहीं आकर बैठे थे. इस स्थान पर शबरी माता का मंदिर भी है, जहां दूर-दूर से श्र्द्धालु आते हैं.

वसंत पंचमी के दिन मथुरा में दुर्वासा ऋषि के मंदिर पर मेला लगता है. सभी मंदिरों में उत्सव एवं भगवान के विशेष शृंगार होते हैं. वृंदावन के श्रीबांके बिहारीजी मंदिर में बसंती कक्ष खुलता है. शाह जी के मंदिर का बसंती कमरा प्रसिद्ध है. मंदिरों में वसंती भोग रखे जाते हैं और वसंत के राग गाये जाते हैं वसंम पंचमी से ही होली गाना शुरू हो जाता है. ब्रज का यह परम्परागत उत्सव है.

इस दिन हरियाणा के कुरुक्षेत्र जिले के पौराणिक नगर पिहोवा में सरस्वती की विशेष पूजा-अर्चना होती है. पिहोवा को सरस्वती का नगर भी कहा जाता है, क्योंकि यहां प्राचीन समय से ही सरस्वती सरिता प्रवाहित होती रही है. सरस्वती सरिता के तट पर इस क्षेत्र में अनेक प्राचीन तीर्थ स्थल हैं. यहां सरस्वती सरिता के तट पर विश्वामित्र जी ने गायत्री छंद की रचना की थी. पिहोवा का सबसे मुख्य तीर्थ सरस्वती घाट है, जहां सरस्वती नदी बहती है. यहां देवी सरस्वती का अति प्राचीन मंदिर है. इन प्राचीन मंदिरों में देशभर के श्रद्धालु आते हैं. यहां भव्य शोभायात्रा निकलती है.

वसंत पंचमी का साहित्यिक महत्व भी है. इस दिन हिन्दी साहित्य की अमर विभूति महाकवि सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' का जन्मदिवस भी है. 28 फरवरी, 1899 को जिस दिन निराला जी का जन्म हुआ, उस दिन वसंत पंचमी ही थी. वंसत कवियों की अति प्रिय ऋतु रही है. कालजयी रचनाकार रवींद्रनाथ टैगोर ने वसंत ऋतु के महत्व को दर्शाते हुए लिखा है-
आओ आओ कहे वसंत धरती पर, लाओ कुछ गान प्रेमतान
लाओ नवयौवन की उमंग नवप्राण, उत्फुल्ल नई कामनाएं घरती पर
हिंदी साहित्य में छायावादी युग के महान स्तंभ सुमित्रानंदन पंत वसंत का मनोहारी वर्णन करते हुए कहते हैं-
चंचल पग दीपशिखा के धर
गृह मग वन में आया वसंत।
सुलगा फागुन का सूनापन
सौंदर्य शिखाओं में अनंत।
सौरभ की शीतल ज्वाला से
फैला उर-उर में मधुर दाह
आया वसंत भर पृथ्वी पर
स्वर्गिक सुंदरता का प्रवाह।
वसंत पंचमी हमारे जीवन में नव ऊर्जा का संचार करती है. ये निरंतर आगे बढ़ने की प्रेरणा देती है. जिस तरह वृक्ष पुराने पत्तों को त्याग कर नये पत्ते धारण करते हैं, ठीक उसी तरह हमें भी अपने अतीत के दुखों को त्याग कर आने वाले भविष्य के स्वप्न संजोने चाहिए.

संपर्क
डॉ. सौरभ मालवीय
सहायक प्राध्यापक
माखनलाल चतुर्वेदी
राष्‍ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल (मध्य प्रदेश)
मो. +919907890614
ईमेल : drsourabhmalviya@gmail.com

बैठक




नैतिक एवं आध्यात्मिक शिक्षा की क्षेत्रीय बैठक - लखनऊ
सत्यनिष्ठा – सत्य बोलना और सत्य के मार्ग पर चलना।
ईमानदारी – विचार, वाणी और कर्म में पवित्रता रखना।
कर्तव्यबोध – अपने कर्तव्यों का निष्ठापूर्वक पालन करना।
अनुशासन – नियमों का पालन और आत्मसंयम।
सम्मान की भावना – माता-पिता, गुरु, बड़ों और समाज के प्रति आदर।
करुणा और सहानुभूति – दूसरों के दुःख को समझना और सहायता करना।
न्यायप्रियता – सही और गलत में भेद कर न्याय का साथ देना।
सामाजिक जिम्मेदारी – समाज और राष्ट्र के प्रति उत्तरदायित्व।
आत्मचिंतन – स्वयं को जानने और सुधारने की भावना।
ईश्वर में आस्था – परम सत्ता पर विश्वास और श्रद्धा।
सेवा भाव – निःस्वार्थ सेवा को जीवन का उद्देश्य बनाना।
संयम और त्याग – भोग-विलास पर नियंत्रण।
शांति और संतुलन – मानसिक शांति एवं आत्मिक संतुलन।
सहिष्णुता – सभी मतों और विचारों का सम्मान।
ध्यान और साधना – मन की एकाग्रता और आत्मविकास।
लोकमंगल की भावना – संपूर्ण मानवता के कल्याण का चिंतन।
इस शिक्षा से चरित्र निर्माण, समाज की सुदृढ़ता और जीवन को सार्थक दिशा देने में सहायक होते हैं।

विद्या भारती की साधारण सभा बैठक

विद्या भारती की साधारण सभा बैठक   3 अप्रैल से 6 अप्रैल 2026   हरि नगर (दिल्ली)