Tuesday, January 27, 2026

मेरा गांव - मेरा तीर्थ









पटनेजी ग्राम में शतचंडी यज्ञ का पूर्णाहुति पर्व : अध्यात्म, संस्कार और लोकमंगल का संदेश
मेरे पिताश्री की अभिलाषा, जिजीविषा और निष्ठा से उनकी मनोकामना पूर्ण हुई. 
मेरे गांव -मेरे घर की पुण्यभूमि पर सम्पन्न हुआ शतचंडी यज्ञ केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि भारतीय सनातन परम्परा के उस शाश्वत चिंतन का सजीव उदाहरण रहा, जिसमें आध्यात्म, संस्कार, समाज और लोककल्याण एक सूत्र में पिरोए जाते हैं। वैदिक मंत्रोच्चार, अग्नि की पवित्र ज्वालाएँ और श्रद्धालुओं की सामूहिक साधना ने पूरे वातावरण को दिव्यता और सकारात्मक ऊर्जा से भर दिया।
शतचंडी यज्ञ का मूल उद्देश्य आत्मिक शुद्धि, मानसिक संतुलन और सामाजिक समरसता की स्थापना है। माँ चंडी की उपासना शक्ति, साहस और धर्मरक्षा का प्रतीक है। यह यज्ञ हमें यह संदेश देता है कि जब समाज आध्यात्मिक चेतना से जुड़ता है, तब व्यक्ति का अहंकार गलता है और सेवा, करुणा व त्याग का भाव जाग्रत होता है।
आज के भौतिकतावादी युग में ऐसे यज्ञ समाज को आंतरिक शांति और नैतिक दिशा प्रदान करते हैं। शतचंडी यज्ञ भारतीय संस्कृति केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं है, बल्कि वह लोकमंगल की भावना से ओत-प्रोत है। यज्ञ की अग्नि में आहुतियाँ केवल सामग्री की नहीं होतीं, बल्कि यह हमारे भीतर की नकारात्मक प्रवृत्तियों—क्रोध, लोभ और अहंकार—की भी आहुति है।
 नारी शक्ति, वृद्धजन का अनुभव और समाज के प्रत्येक वर्ग का सम्मान ही सशक्त राष्ट्र की आधारशिला है। आध्यात्मिक आयोजनों में जब सामाजिक संवेदनशीलता जुड़ती है, तब धर्म केवल कर्मकांड न रहकर जीवन पद्धति बन जाता है।
शतचंडी यज्ञ का समापन हमें यह स्मरण कराता है कि धर्म का अंतिम लक्ष्य आत्मकल्याण के साथ-साथ समाज का उत्थान है।
 ग्राम पटनेजी में सम्पन्न यह यज्ञ आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा बने—कि जब गाँव, समाज और राष्ट्र आध्यात्मिक मूल्यों से जुड़ते हैं, तब संस्कृति जीवित रहती है और राष्ट्र सशक्त होता है।
यही यज्ञ का सार है—स्व से समाज और समाज से राष्ट्र की चेतना का जागरण। 

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