Tuesday, September 30, 2025

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और राष्ट्र


डॉ. सौरभ मालवीय
राष्ट्र, किसी भूभाग पर रहने वालो का भू भाग, भूसंस्कृति, उसभूमि का प्राकृतिक वैभव, उस भूमि पर रहने वालो के बीच श्रद्धा और प्रेम, उनकी समान परस्परा, समान सुख­दुख, किन्ही अर्थों में भाषिक एकरूपता, दैशिक स्तरपर समान शत्रु मित्र आदि अनेक भावों का समेकित रूप होता है। यह भाव बाहर से सम्प्रेषित नहीं किया जाता अपितु जन्मजात होता है।
भारत में यह बोध अनादिकाल से है। अभी वैज्ञानिक युग में भी यह तय नहीं हो पा रहा है कि वेदो की रचना कब हुई और वेदो में राष्ट्रवाद अपने उत्कर्ष पर है। इसी संकल्पना के कारण वैदिक ऋषियों ने घोषणा की है कि
समानो मन्त्रः समितिः समानी
समानं मनः सहचित्तमेषाम्।
समानं मन्त्रमभिमन्त्रये वः
समानेन वो हविषा जुहोमि।।
अर्थात् हम लोगों के मन्त्र (कार्यसूत्र का सिद्धन्त ) एक जैसे हो। उस मन्त्र के अनुरूप हमलोगो की समिति (संगठन), हमारे चित्त, हमारी मानसिक दशा और कार्यप्रणाली भी समान हो। हमलोग समेकित रूप से लक्ष्य प्राप्ति हेतु परमात्मा से एक समान प्रार्थना करें।
इसी क्रम में हमारे ऋषियों ने आगे कहा कि­
समानी वः अकूतीः समाना हृदयानि वः।
समानमस्तु वो मनो यथा वः सुसहासति।।
हमारे लक्ष्य, हमारे हृदय के भाव और हमारे चिन्तन भी समान हो और हमलोग आपस में संगठित रहे।
संगच्छध्वं संवध्वं सं वो मनांसि जनताम्।
देवा भागं यथा पूर्वे सञ्जानाना उपासते।।
अर्थात हमलोग साथ साथ चले, एक साथ बोले, हमारे मनोभाव समान रहें। हमलोग समानरूप से अपने लक्ष्य सिद्धि हेतु देवाताओं की साधना करें।
ऋषियों ने यह उद्घोष श्रुतियों में शताधिक बार किया है। हर बार वे हमे संगठित और सुव्यवस्थित रहकर अपने लक्ष्य के लिये समर्पित होने का आदेश दे रहे है। ऐसा राष्ट्रगीत धरती के किसी समाज में कभी नहीं पैदा हुआ है। पूरा का पूरा वैदिक वाङ्मय ही भारत का राष्ट्रगान है।
ओउम् सह नाववतु सह नौ भुनक्तु सह वीर्यं करवावहै।
तेजस्विनावधीतमस्तु मा विद्विषावहै ओउम् शान्तिः शान्ति: शान्ति।।
हम दोनों की परमात्मा साथ साथ रक्षा करें, हमदोनो साथ साथ लक्ष्य भोग करें, साथ साथ पराक्रम करें, हम दोनों के द्वारा पढी गयी विद्या तेजस्वी हो और हम कभी आपस में द्वेष न करें। हमारे त्रितापों (दैविक, दैहिक, भौतिक) का शमन हो।
यहाँ ऋषि हम दोनो का अर्थ केवल दो से ही नहीं कह रहे है अपितु गुरू शिष्य से है। यह एक परम्परा की वार्ता है। जो सगम्र गुरूओं व्दारा समग्र शिष्यों को अनादिकाल से अविच्छिन्न रूप से दी गयी शिक्षा है जिससे भारत की राष्ट्रियता सिञ्चित, पल्लवित, पुष्पित और फलित होती रही है।
भारत का यह अक्षुण्ण राष्ट्र भारत के चप्पे चप्पे में सदैव दृष्टिगोचर होता रहता है। देश मे दुर्भाग्य से देश में पराधीनता का काल आ गया। 1235 वर्षो तक के प्रदीर्घ पराधीन काल में, हिमालय, गंगा, काशी, प्रयाग, कुंभमेला, अनेकतीर्थ, अनन्तऋषि, महात्मा, महापुरूष, समुद्र, सरिता पेड, पौधे आदि भारत के राष्ट्रिय गीत तो अहर्निश गाते ही रहते है, पर उनकी मानवीय अभिव्यक्ति सुप्त पड़ गयी थी। इस कोढ में खाज जैसी स्थिती मैकाले की शिक्षा पद्धति ने पूरी कर दी। हमें बताया गया कि वेद गडरियो के गीत हैं, भारत कभी एक राष्ट्र नहीं रहा। यहाँ मे मूल निवासी तो कोल भील द्रविड आदि रहे है, आर्य मध्यएशिया से आकर उनपर आक्रमण करके देशपर कब्जा कर लिया, भारत गर्म देश है, सपेरों और नटों का बाहुल्य रहा है, यह एक देश ही नहीं रहा है बल्कि उपमहाद्विप है, मुस्लिम आक्रान्ताओं ने भारत को कपडा, भोजन, और अन्य तहजीब सिखाया, अब ईसाई आक्रान्ता भारतीयों के पाप का बोझ उतारने के लिये भगवान के आदेश पर भारत आये हैं। यह भारत का सौभाग्य है कि प्रभु ईसा मसीह भारत पर प्रसन्न हो गये है अब भारत इन ईसाइयों की कृपासे सुशिक्षित और सभ्य हो जायेगा, शैतानी परम्पराओं और झूठे देवताओं से मुक्त होकर असली देवताओं की कृपा पा जायेगा। इस प्रकार के सुझावो को जब सत्ता सहयोग मिल जाता है तो करैला नीम चढ जाता है। और इस स्थिति ने हमें इतना आत्मविस्मृत कर दिया कि हम मूढता की सीमा तक विक्षिप्त हो गये। वैदिक ऋषियों की गरिमावान पंरम्परा को अपना कहने में लज्जानुभव होने लगा। यत्किञ्चित इसका प्रभाव अभी भी अवशेष है। हम जान ही लिय थे कि हम जादू टोने वालों के वंशज हैं। अपनी किसी भी बात की साक्षी के लिये विदेशी प्रमाण खोजने लगे। यदि गौराड्ग शासको ने मान्यता दी तो हमार सीना फूल गया वरना एक अघोषित आत्मग्लानि से हम छूट भी नहीं पाते थे। और तो और हम धर्म की परिभाषा भी ह्विटने, स्पेंसर, थोरो, नीत्से, फिक्टे आदि की डायरियों से खोजना चालू कर दिये। वेदो के भाष्य के सन्दर्भ में मेक्समूलकर, ए.बी. कीथ अदि भगवान वेदव्यास पर भी भारी पडने लगे। आत्मदीनता की इस पराकाष्ठा में महानायक स्वामी विवेकानंन्द ने अमृत तत्व भरा और बडे शान से घोषित किया कि हमे हिंन्दू होने पर गर्व है। इसी घोषणा के बाद हमारी तन्द्रा टूटने लगी। बडे सौभाग्य की बात है कि इस वर्ष उसी महानायक की डेढ सौवी वर्ष गांठ है।
संघ के प्रथमपुरूष जन्मजात क्रान्तदर्शी थे। भारत पराधीनदासता से छूटे यह प्रथम प्रयास था पर उस स्वतन्त्रता के बाद का भारत कैसा हो इसका ब्लू प्रिण्ट समग्र भारत में केवल और केवल डा. केशव बलिराम हेडगेवार नें ही तैयार किया था। वे स्वामी विवेकानंन्द के राष्ट्रियत्व जागरण से अपने अभियान की ऊर्जा ले रहे थे। या यूँ कहे कि स्वामी जी के संकल्पना के 100 तरुण डा. हेडगेवार जी ने तैयार किया और भारत की आत्मा को बचा लिया वरना भारतीय संस्कृति भी बेबीलोन, मिस्र, एजटेक, इन्का, यूफ्रेटस और यूनान आदि की सभ्यताओं जैसे बडे-बडे पुस्तकालयों में भी नही मिलती। प्रो. अर्नाल्ड टायनवी जैसा विद्वान भी भारतीय संस्कृति नहीं खोज पाता।
डा. हेडगेवार जी ने अनुभव किया कि भारतीय मानस की आत्म विस्मृति केवल राष्ट्रवाद के मन्त्र से ही टूटेगी। इसके लिये स्वामी जी का सौद्धान्तिक राजपथ तो उन्होने चुन ही लिया था पर साक्षात् दर्शन हेतु योगी अरविन्द घोष का राष्ट्रिय आह्वान उन्हे सशरीर गुरुतुल्य लगा। श्री अरविन्द घोष के संगठन “अनुशीलन समिति” से जुडकर वे सिद्धान्त और क्रिया दोनो का अभूतपूर्व प्रयोग किये। सन 1915 से 1925 तक के कालखण्ड में वे केवल और केवल राष्ट्रवाद का ही चिन्तन, मनन और प्रयोग करते रहे। योगी अरविन्द अलीपुर जेल से बाहर आने पर कहे थे कि- “ भारत जब भी जागा है तो केवल अपने लिये नहीं अपितु सनातन धर्म के लिये जागा है। जब भी यह कहा जाता है कि भारत महान है तो इसका अर्थ है कि सनातन धर्म महान है। सनातन धर्म का प्रसार ही भारत का प्रसार है। भारत धर्म है और धर्म ही भारत है।
राष्ट्रियता केवल राजनीति नहीं है अपितु यह एक विश्र्वास है, एक आस्था है, एक धर्म है। मैं इतना ही नहीं कह रहा हूँ अपितु यह भी कि सनातन धर्म ही हमारी राष्ट्रियता है। इस हिंदू राष्ट्रकी उत्पत्ति ही सनातान धर्म के साथ हुई है। सनातन धर्म के साथ ही यह राष्ट्र आंदोलित होता है और उसी के साथ बढता है। सनातन धर्म कभी नष्ट होगा तो उसके साथ ही हिन्दू राष्ट्र भी नष्ट हो जायेगा। सनातन धर्म अर्थात् हिन्दू राष्ट्र……….।”
संघ संस्थापक डा. हेडगेवार इन विचारो से इतना प्रभावित हुए कि उन्होने स्वामी विवेकानन्द के समान सगर्व घोषित किया कि
“हो ओउम्। हे भारत हिन्दू राष्ट्र आहे ”
और उपर्युक्त मन्त्र राष्ट्रिय स्वंयसेवक संघ का पथ प्रदर्शक मन्त्र बन गया। इसके उच्चारण मात्र से एक ही साथ स्वामी विवेकानन्द और योगी अरविन्द दोनो ऋषियों की आत्माएं तृप्त होती है, अनादि काल से चला आरहा सत्य सनातन धर्म परिपुष्ट होता है, अनादिकाल से चला आर हा सत्य, विज्ञान, धर्म, संस्कार सब मजबूत होते है, भारतीय जनमें आत्मविश्वास पैदा होता है, भारत माता गर्वोन्नत होती है और प्रसन्न भाव से अपने पुत्रों को लाख­लाख आशीषें देती है। यह भारत माता की स्तुति का बीज मन्त्र है। इससे सम्पुटित कर काई भी पूजन अर्चन लोक परलोक दोनो में अभ्युदय ओर निःश्रेयस का कारण होता है।
यह कोई योगायोग की बात नही है। नियति के चक्र में सब कुछ नियत है। सड्घ के द्वितीय सरसंघचालक श्री माधव सदाशिव गोलवलकर उपाख्य श्री गुरूजी स्वामी विवेकानन्द के गुरुभाई स्वामी श्री अखण्डनन्दजी के दीक्षित शिष्य थे। निश्चित ही स्वामी विवेकान्द अपने सिद्धान्तों को साकाररूप देखने हेतु श्री गुरूजी को शिष्य बनन के लिये प्रेरित किये हांेगे।
संघ की राष्ट्रभक्ति का ज्वलन्त उदाहरण पग पग पर दष्टिगोचर होत है।
शाखा की नित्य प्रार्थना की प्रत्येक पंक्ति इसकी दुन्दुभी बजा रही है। नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमे से लेकर परं वैभवंनेतु मेतत्स्वराष्ट्रं समर्था भवत्वा शिषा ते मृशम् तक और अन्ततः भारत माता की जय में भी केवल राष्ट्रवाद ही तो भासित हो रहा है। कोई पंक्ति ऐसी नही है जिंसमे राष्ट्रवाद का साक्षात्कार न हो। इससे बडा राष्ट्रगीत क्या हो सकता है।
एकात्मता स्त्रोत्र, एकात्मता मन्त्र, प्रातःस्मरण, संघ की शाखओं के गीत, बौद्धिक, और शाखा की पूरी संचरना विशुद्ध राष्ट्रवादी प्रयोग है जिससे स्वामी विवेकानन्द की आकांक्षाओ के राष्ट्रिय पुरूषों की अखण्ड मालिका पैदा होती रहे। संघ ने समग्र सांस्कृतिक भारत की वन्दना के गीत गाये है जो किसी भी दृष्टिकोण से भगवान परशुराम, जगद्गुरू शड्कराचार्य और आचार्य चाणक्य के राष्ट्रिय अभियान को ही पुष्ट करते हैं। संघ के कारण सबने जाना कि भारत का परिमाप “हिमालयं समारभ्य यावदिन्दु सरोवरम्” तक है। छुआछूत, भाषा, क्षेत्र, जाति और ऊँच नीच के भाव तो संघ को समाप्त करने की जरूरत ही नहीं पडी। भारत गान की पवित्र गंगा मे स्नान करते ही उपर्युक्त समास्त विकार अनायास भाग गये। बए एक ही मन्त्र गूंज उठा कि
रत्नाकराद्यौत पदां हिमालयं किरीटिनीम्
ब्रम्हराजर्षि रत्नाद्रयां वन्दे भारत मातरम्।।
यही तो राष्ट्रर्षि वंकिम बाबू का राष्ट्रवाद है। श्री गुरूजी ने तो इससे भी आगे बढ़कर शुक्ल यजुर्वेद मे मन्त्र मे एक नव प्राण भर दिया कि
“राष्ट्राय स्वाहा। राष्ट्रायमिदं न मम।।
यही भारत का सनातन राष्ट्रवाद है जो हिन्दुत्व की जड़ है।
भाषागत समानता राष्ट्रवाद के लिये आति महत्वपूर्ण तत्व नही है। इसी से संघ देश की सारी आंचलिक भाषाओं के पिष्टपोषण की बात कहते हुए संस्कृत को केन्द्र में रखता है क्योकि संस्कृत समस्त भाषाओं की जननी है।
अमेरिका मे अंग्रजी भाषी लोग ब्रिटिश सत्ता से अलग होकर (1774 अड) में फ्रेच और स्पेनिशों के साथ मिलकर स्वतन्त्र अमेरिकन राष्ट्र गठित कर लिये।
भाषा ही राष्ट्र हेतु मुख्य तत्व होता तो स्वीटजरलॅण्ड चार देशों मे टूट गया होता। वहां चार भाषाएं जर्मन, फ्रेंच, इटेलियन और रोमन चलती है पर एक ही राष्ट्र है। बेल्जियम के फ्रेंची अपने को बेल्जियमी कहते है फ्रेंच नहीं। भाषाई दृष्टि से स्पेनिश और पोर्तगीज एकदम निकट हैं पर दो राष्ट्र है।
समानपूजा पद्धति भी राष्ट्र का आधार होती तो विश्व मे 63 मुस्लिम देश एक राष्ट्र बन जाते। संसार मे शाताधिक इसाई देश एक राष्ट्र बन जाते। पर और तो और अरब के यहूदी और मुस्लिम ही एक राष्ट्र न बन सके। ईरान­ईराक, लीबिया, मिश्र, सूडान, यमन आदि तेा इसके जीवन्त उदाहरण है।
रक्तगट भी राष्ट्रका आवश्यक तत्व न होने से स्कैन्डिनेविया और आइबेरिया भी अनेक राष्ट्रों मे विभक्त हैं।
राष्ट्र हेतु सर्वाधिक आवश्यक तत्व राष्ट्रजन के हृदय की एकता है। संघ अपनी सम्पूर्ण ऊर्जा केवल इसी बात पर खर्च कर रहा है कि
“भारतवासी एक हृदय हैं”
संघ का भारत राष्ट्र वृहत्तर है। इसमे वे सब देश समाहित है जो किन्ही राजनीतिक करणों से अलग हो गये। परन्तु उनकी राष्ट्रिय पहचान तो भारत ही है।
पाकिस्तान के “जिये सिन्ध” के नेता श्री जी.एम.सईद कहते है कि -पाकिस्तान के निर्माण का अर्थ है भारत के भूगोल और इतिहास को नकारना। पाकिस्तान को अब एक संघ राज्य बनकर विशाल भारत में सम्मिलित हो जाना चाहिए। मुहाजिरों को कृष्ण तथा कबीर का अनुयायी होना चाहिए। पंजाबी मुसलामान तो नानक, वारिस शाह तथा बुल्ले शाह के वारिस हैं। मै स्वयम 50 वर्षोसे पाकिस्तानी हुँ, 500 वर्षो से मुसलमान हूं लेकिन 5000 वर्षो से सिन्धी हूँ। मुहम्मद बिन कासिम तो लुटेरा था। सिन्ध स्वातंत्र्य के बाद वहां का बन्दरगाह राजा दाहर सेन के नाम पर हो गया।
इण्डियन एक्सप्रेस 02.02.1992
यह राष्ट्रिय स्वयंसेवक संघ की ही सोच थी कि पण्डित श्री दीनदयाल उपाध्याय ने भारत­पाक और बंगला देश मे महासंघ बनाने की बात कही थी । बाद में प्रख्यात समाजवादी डा. राममनोहर लोहिया भी उपाध्याय जी के साथ जुड गये।
संघ के वरिष्ठतम प्रचारक श्री दत्तोपन्त ठेगडी ने तो गहन शोध मे उपरान्त यह सिद्ध कर दिया है कि राष्ट्र की और नेशन की अवधारणा अलग अलग बाते है। “राष्ट्र नेशन एक नहीं है। योगी अरविन्दने भी संयुक्त राष्ट्र संघ मे नामकरण का विरोध किया था। उन्होंने कहा था कि जबकत राष्ट्र की परिभाषा तय न हो तबतक यह नाम रखना ठिक नही होगा। सच में राष्ट्र के समग्र अर्थो में सांगोपांगरूपेण कोई देश इस धरा पर है तोवह केवल भारत है। भारत में ही राष्ट्र की परिभाषा वैज्ञानिक, सांस्कृतिक तथा दार्शनिक रूपेण तृप्त होती है। अन्य किसी देश में नही। राष्ट्रिय स्वयंसेवक संघ मौन तपस्वी के रूप में अहर्निश भारतवासियो में राष्ट्र तत्व भरने का कार्य कर रहा है। संघ के ही कारण राष्ट्र शब्द की गरिमा और महिमा जानने का योग बना है वरना इतना महत्वपूर्ण शब्द केवल वैदिक वाडम्य का कैदी बनकर रह जया होता।
“संघे शक्ति सर्वदा”
“भारत मातरम् विजयते तराम्”


Monday, September 29, 2025

विराट सांस्कृतिक चेतना की पुनर्स्थापना का संकल्प : एक भारत श्रेष्ठ भारत


डॉ. सौरभ मालवीय 
भारत एक विशाल राष्ट्र है। इसका निर्माण सनातन संस्कृति से हुआ है। अनेक संस्कृतियां भारत रूपी गुलदान में विभिन्न प्रकार के पुष्पों की भांति रही हैं। इसका अर्थ यह है कि इन विभिन्न संस्कृतियों, भाषाओं, धर्मों एवं पंथों आदि ने इस देश के सांस्कृतिक सौन्दर्य में वृद्धि की है। यहां विविधता में भी एकता है। भारत शान्ति- प्रिय देश है। यह अहिंसा में विश्वास रखता है। परन्तु देश में गुलामी एवं संघर्षों के बाद आजादी से लेकर एक लंबे कालखंड तक ‘बांटो और राज करो’ की नीति पर चलते हुए समाज, जाति, पंथ, मत, मजहब, खान-पान, वेशभूषा आदि के आधार पर विभाजन जारी रहा। इसके परिणाम स्वरूप देश की सांस्कृतिक प्रतिष्ठा पर गंभीर कुठाराघात हुआ। भारत में हिंदूकुश से हिंद महासागर तक फैली हुई सांस्कृतिक एकता छिन्न-भिन्न हो गई और इसका लाभ देशद्रोही शक्तियों ने उठाया। 

केंद्र की भाजपा सरकार देश को सांस्कृतिक रूप से सुदृढ़ करना चाहती है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लौह पुरुष नाम से विख्यात सरदार वल्लभ भाई पटेल के 140वें जन्मदिन के अवसर पर 31 अक्टूबर, 2015 को शिक्षा मंत्रालय के अंतर्गत ‘एक भारत श्रेष्ठ भारत’ पहल की घोषणा की थी। इस योजना की प्रेरणा सरदार वल्लभ भाई पटेल के जीवन दर्शन से ली गई है। देश की स्वतंत्रता और इसे गणराज्य बनाने में सरदार वल्लभ भाई पटेल की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही है, जिसे भुलाया नहीं जा सकता है। उन्होंने स्वतंत्रता आन्दोलन के दौरान देश के विभिन्न राजघरानों को भारत से पृथक न होकर इसमें सम्मिलित होने के लिए तैयार किया था। उनकी सदैव से ही अभिलाषा थी कि एक भारत श्रेष्ठ भारत का निर्माण हो। उन्होंने आजीवन देश की एकता और अखंडता के लिए कार्य किया। उनका कहना था कि एकता के बिना जनशक्ति शक्ति नहीं है जब तक उसे ठीक तरह से सामंजस्य में ना लाया जाए और एकजुट ना किया जाए और तब यह आध्यात्मिक शक्ति बन जाती है। वे यह भी कहते थे कि यह हर एक नागरिक की जिम्मेदारी है कि वह यह अनुभव करे कि उसका देश स्वतंत्र है और उसकी स्वतंत्रता की रक्षा करना उसका कर्तव्य है। हर एक भारतीय को अब यह भूल जाना चाहिए कि वह एक राजपूत है, एक सिख या जाट है या अन्य कुछ है। उसे यह याद होना चाहिए कि वह एक भारतीय है और उसे इस देश में हर अधिकार है, पर कुछ जिम्मेदारियां भी हैं। वे कहते थे कि इस मिट्टी में कुछ अनूठा है, जो कई बाधाओं के बावजूद हमेशा महान आत्माओं का निवास रहा है।

इस योजना का उद्देश्य विभिन्न राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की संस्कृति, परंपराओं और प्रथाओं का ज्ञान इस रचनात्मक कदम के परिणामस्वरूप राज्यों के बीच बेहतर समझ और बंधन को बढ़ावा देना है, जिससे भारत की एकता और अखंडता में वृद्धि हो। इस कार्यक्रम के माध्यम से विभिन्न राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की संस्कृति, आदतों और परंपराओं का साझा ज्ञान राज्यों के बीच संबंध और समझ को बढ़ाकर देश की एकता और अखंडता में सुधार करना है। अंतर- सांस्कृतिक संपर्क से देश के सभी नागरिकों के बीच 'एक राष्ट्र' की भावना पैदा करने में मदद मिलेगी।

वास्तव में ‘एक भारत श्रेष्ठ भारत अभियान’ संपूर्ण देश को एक दूसरे के साथ पुनः जोड़कर एक विराट सांस्कृतिक चेतना के पुनर्स्थापना का अभियान है। भारत की सांस्कृतिक अंतर्दृष्टि स्वयं में एक बहुलतावादी विचारों की समष्टि है। यही कारण है कि एक ही भगवान राम को अयोध्या में रामलला के रूप में तो कर्नाटक में कोदंडराम अर्थात धनुषधारी के रूप में पूजा जाता है। मथुरा के कान्हा, द्वारका में द्वारकाधीश, मराठों में गर्वीले विठोवा, पुरी में जगन्नाथ जी तो राजपुताने में श्रीनाथ जी के रूप में पूजित हैं। जिस समाज ने जैसी दृष्टि से देखा वैसी ही सृष्टि का सृजन किया, यही भारतीय सांस्कृतिक चेतना की बहुलतावादी दृष्टि के एकत्व का स्वरूप है। एक भारत श्रेष्ठ भारत के माध्यम से हम पुनः एक ऐसे ही समष्टि की स्थापना करने जा रहे हैं।

इस कार्यक्रम के माध्यम से एक श्रेष्ठ भारत की परिकल्पना की गई है। एक ऐसे राष्ट्र के रूप में भारत के विचार का जश्न मनाना है, जिसमें विभिन्न भौगोलिक क्षेत्रों की विभिन्न सांस्कृतिक इकाइयां एकजुट होती हैं और एक- दूसरे के साथ बातचीत करती हैं। विविध भाषाओं, व्यंजनों, संगीत, नृत्य, रंगमंच, फिल्मों, हस्तशिल्प, खेल, साहित्य, त्योहारों, चित्रकला, मूर्तिकला आदि की यह शानदार अभिव्यक्ति लोगों को बंधन और भाईचारे की सहज भावना को आत्मसात करने में सक्षम बनाएगी। हमारे लोगों को विशाल भूभाग में फैले आधुनिक भारतीय राज्य के निर्बाध अभिन्न अंग के बारे में जागरूक करना, जिसकी मजबूत नींव पर देश की भू-राजनीतिक ताकत से सभी को लाभ सुनिश्चित होता है। विभिन्न संस्कृतियों और परंपराओं के घटकों के बीच बढ़ते अंतर-संबंध के बारे में बड़े पैमाने पर लोगों को प्रभावित करना, जो राष्ट्र-निर्माण की भावना के लिए बहुत महत्वपूर्ण है।  इन घनिष्ठ अंतर- सांस्कृतिक अंतःक्रियाओं के माध्यम से समग्र रूप से राष्ट्र के लिए जिम्मेदारी और स्वामित्व की भावना पैदा करना, क्योंकि इसका उद्देश्य स्पष्ट रूप से अंतर- निर्भरता मैट्रिक्स का निर्माण करना है। एक ही समय में राष्ट्र की विविधता और एकता का जश्न मनाना है। लोगों के बीच समझ और प्रशंसा की भावना पैदा करना और राष्ट्र में एकता की एक समृद्ध मूल्य प्रणाली को सुरक्षित करने के लिए आपसी संबंध बनाना है।

 ‘एक भारत श्रेष्ठ भारत’ कार्यक्रम के अंतर्गत अनेक गतिविधियां की जाती हैं। इसके अंतर्गत पांच पुरस्कार विजेता पुस्तकों और कविता, लोकप्रिय लोकगीतों का एक भाषा से भागीदार राज्य की भाषा में अनुवाद किया गया है। साझेदार राज्यों की पाक पद्धतियों को सीखने के लिए पाक कार्यक्रम आयोजित किए गए हैं। साझेदार राज्यों से आने वाले आगंतुकों के लिए होमस्टे की व्यवस्था की गई है। पर्यटकों के लिए राज्य दर्शन की सुविधा उपलब्ध करवाई गई है। अन्य राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की पारंपरिक पोशाक को स्वीकार करना भी इसमें सम्मिलित है। भागीदार राज्यों के साथ पारंपरिक कृषि पद्धतियों जैसी सूचनाओं का आदान-प्रदान किया जा रहा है। 

किसी भी भू-भाग अथवा देश की विभिन्न संस्कृतियों को एक सूत्र में बांधे रखने का कार्य आपसी प्रेम, सद्भाव एवं भाईचारे की भावना से ही संभव है। भारत में एक हजार से भी अधिक भाषाएं और बोलियां हैं। यहां कुछ कोस की दूरी पर बोली बदल जाती है। भाषाएं ही नहीं, अपितु यहां अनेक धर्म भी हैं। यहां विभिन्न धर्मों को मानने वाले लोग रहते हैं। इनकी संस्कृति, सभ्यता, रीति-रिवाज, भाषा, व्यंजन, वेशभूषा आदि भी एक-दूसरे से भिन्न है, परन्तु सब मिलजुल कर रहते हैं। एक-दूसरे के त्योहारों में सम्मिलित होते हैं। ऐसा करना आवश्यक भी है, क्योंकि एक दूसरे से मिलने जुलने से ही उन्हें समझने का अवसर प्राप्त होता है। देश को श्रेष्ठ भारत बनाने के लिए सभी देशवासियों का सहयोग आवश्यक है। विविधता में एकता के लिए आवश्यक है कि विभिन्न संस्कृतियों के लोग आपस में मिलजुल कर रहें। इसके लिए यह भी आवश्यक है कि हम एक दूसरे की आस्थाओं एवं उनकी धार्मिक मान्यताओं का सम्मान करें। जब हम सामने वाले की आस्था का सम्मान करेंगे, तो वह भी हमारी आस्था का सम्मान करेगा। ऐसा करने से आपपास में प्रेम और सद्भाव की भावना उत्पन्न होगी। सरकार की इस योजना के माध्यम से देशवासियों के मन में अपने- अपने धर्म के अतिरिक्त अन्य धर्म के लोगों के प्रति भी प्रेम एवं सम्मान की भावना विकसित हो सकेगी। 
नि:संदेह आज के समय में ऐसी योजनाओं की अत्यधिक आवश्यकता है। 

टीवी पर लाइव



विकास के पथ पर उत्तर प्रदेश 
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में राज्य "दंगा मुक्त" हुआ है। कानून-व्यवस्था की स्थिति में सुधार और अपराध नियंत्रण को लेकर सरकार की प्रतिब्धता स्पष्ट हैँ. 
अपराधों पर अंकुश लगाने के लिए पुलिस एनकाउंटर, गैंगस्टर एक्ट, और एनएसए (राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम) जैसे सख्त उपाय)
सबकी रक्षा सबकी सुरक्षा सरकार का संकल्प

पत्रिका में मेरा लेख

 





युगवार्ता पाक्षिक भारतीय भाषा पर केंद्रित इस अंक में मेरा लेख प्रस्तुत है. अवलोकन करें। सादर 

Sunday, September 28, 2025

प्रांतीय विषय संयोजक कार्यशाला





कानपुर प्रांत
विद्या भारती कानपुर प्रांत की विषय संयोजक कार्यशाला के उद्घाटन सत्र में मा.हेमचंद्र जी क्षेत्रीय संगठन मंत्री पूर्वी उत्तर प्रदेश, श्री रजनीश जी संगठन मंत्री कानपुर प्रांत, रामकरण जी सह मंत्री जी कानपुर प्रांत, अयोध्या प्रसाद जी प्रदेश निरीक्षक जी (शहरी) धीरेन्द्र सिंह जी प्रदेश निरीक्षक ग्रामीण के साथ रहना हुआ.

Thursday, September 25, 2025

समाचार-पत्र में

 पंडित दीनदयाल उपाध्याय की जयंती पर सादर नमन



राष्ट्रीय संविमर्श







बाबासाहेब भीमराव अम्बेडकर विश्वविद्यालय - लखनऊ
विषय - भारतीय ज्ञान परम्परा और हिन्दी साहित्य

Wednesday, September 24, 2025

क्षेत्रीय बैठक

 


24 सितम्बर 2025
ग्राम भारती, परतोष धम्मौर, अमेठी
शिक्षा एवं ग्राम विकास' विषय की क्षेत्रीय बैठक सम्पन्न
विद्या भारती पूर्वी उत्तर प्रदेश द्वारा आयोजित 'शिक्षा एवं ग्राम विकास' विषयक क्षेत्रीय बैठक सफलतापूर्वक सम्पन्न हुई।
बैठक में प्रान्तीय संयोजकों ने सहभाग कर शिक्षा और ग्राम विकास के विभिन्न आयामों पर विचार-विमर्श किया।
मुख्य अतिथि 
डॉ. सौरभ मालवीय – क्षेत्रीय मंत्री, विद्या भारती पूर्वी उ.प्र. एवं विभागाध्यक्ष (पत्रकारिता, ल0वि0वि0)
श्री राजबहादुर जी – प्रदेश निरीक्षक, जन शिक्षा समिति काशी प्रान्त

Tuesday, September 23, 2025

जागरूकता कार्यक्रम






लखनऊ विश्वविद्यालय के जनसंचार एवं पत्रकारिता विभाग में आज “डिजिटल बैंकिंग एवं साइबर धोखाधड़ी : जोखिम एवं समाधान” विषय पर एक जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किया गया।
 यह कार्यक्रम एवोक इंडिया फाउंडेशन द्वारा भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) के तत्वावधान में आयोजित किया गया था।
कार्यक्रम विशेष रूप से एमए जनसंचार एवं पत्रकारिता (प्रथम एवं तृतीय सेमेस्टर) के विद्यार्थियों के लिए आयोजित किया गया, जिसका मुख्य उद्देश्य सुरक्षित डिजिटल बैंकिंग प्रथाओं एवं साइबर सुरक्षा जागरूकता को बढ़ावा देना था।
कार्यक्रम की शुरुआत विभाग की सहायक प्रोफेसर डॉ कृतिका अग्रवाल ने अतिथियों के स्वागत से किया। इसके बाद एवोक इंडिया फाउंडेशन के संस्थापक एवं अध्यक्ष प्रवीन कुमार द्विवेदी ने स्वागत भाषण दिया और डिजिटल बैंकिंग की बढ़ती आवश्यकता एवं नागरिकों की जिम्मेदारी पर प्रकाश डाला।
प्रबीर दास (वित्तीय शिक्षक, एवोक इंडिया फाउंडेशन) ने साइबर सुरक्षा और RBI मॉड्यूल्स पर विस्तृत सत्र प्रस्तुत किया। उन्होंने डिजिटल बैंकिंग उपयोगकर्ताओं द्वारा झेले जाने वाले सामान्य साइबर खतरों, उनके बचाव उपायों और नियामक ढाँचे की भूमिका पर जानकारी दी।
रवजीत महाजन (असिस्टेंट वाइस प्रेसिडेंट, ट्रेनिंग – एवोक इंडिया फाउंडेशन) ने वित्तीय जागरूकता फैलाने में संचार की भूमिका पर जोर दिया। उन्होंने छात्रों से समाज को सुरक्षित डिजिटल प्रथाओं के प्रति जागरूक करने का आह्वान किया।
विभाग की प्रतिक्रिया
विभागाध्यक्ष डॉ सौरभ मालवीय ने कहा कि “मीडिया छात्रों के लिए वित्तीय साक्षरता और साइबर जागरूकता समय की आवश्यकता है।”
कार्यक्रम में RBI जागरूकता मॉड्यूल्स पर इंटरैक्टिव सत्र भी आयोजित किए गए। विद्यार्थियों ने सक्रिय भागीदारी करते हुए साइबर धोखाधड़ी की पहचान, सुरक्षा उपाय और समाधान से संबंधित व्यावहारिक जानकारी प्राप्त की। अंत में प्रबीर दास ने धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत किया। 
छात्रों ने कहा कि इस कार्यशाला से उन्हें डिजिटल वित्तीय तंत्र में स्वयं को सुरक्षित रखने की व्यवहारिक जानकारी प्राप्त हुई।


Monday, September 22, 2025

भारतीय सुराज में उत्तर प्रदेश की भूमिका


डॉ. सौरभ मालवीय 

भारतीय स्वराज में उत्तर प्रदेश की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही है। 1857 की क्रांति से लेकर भारत छोड़ो आंदोलन तक उत्तर प्रदेश ने स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय भूमिका निभाई है। यहां के लोगों ने देश की स्वतंत्रता के लिए संघर्ष किया और अपने प्राणों की आहुति दी।
1857 की क्रांति
उत्तर प्रदेश भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में एक महत्वपूर्ण स्थान रखता है। उस समय उत्तर प्रदेश को संयुक्त प्रांत कहा जाता था। 10 मई, 1857 को मेरठ में ब्रिटिश सेना के भारतीय सैनिकों ने चर्बी लगे कारतूसों के प्रयोग के विरोध में विद्रोह किया। यह विद्रोह मेरठ से आरंभ होकर दिल्ली तक फैल गया, जहां विद्रोहियों ने मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर को अपना नेता घोषित किया। तदुपरांत यह विद्रोह कानपुर, लखनऊ, झांसी और अन्य नगरों से होता हुआ संपूर्ण देश में फैल गया। इस प्रकार 1857 का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम प्रारंभ हुआ। इस विद्रोह में उत्तर प्रदेश के लोगों ने बढ़-चढ़कर भाग लिया और अंग्रेजों के विरुद्ध  लड़ाई लड़ी।
असहयोग आंदोलन
महात्मा गांधी के नेतृत्व में 1920-22 में हुए असहयोग आंदोलन में भी उत्तर प्रदेश ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। 
इस आंदोलन में उत्तर प्रदेश के किसानों, श्रमिकों, व्यापारियों, अधिवक्ताओं और छात्रों ने भी सक्रिय रूप से भाग लिया। उत्तर प्रदेश में जमकर प्रदर्शन हुए। लोगों ने ब्रिटिश वस्तुओं का बहिष्कार किया और स्वदेशी वस्तुओं को अपनाया। ब्रिटिश शासन ने इसे कुचलने का प्रयास किया। 4 फरवरी, 1922 को गोरखपुर जिले के चौरी चौरा में हुई हिंसक घटना के कारण गांधीजी ने आंदोलन वापस ले लिया।
स्वराज के उद्देश्य को लेकर दिसम्बर 1922 में स्वराज पार्टी की स्थापना हुई, जिसमें उत्तर प्रदेश के नेताओं चित्तरंजन दास, नरसिंह चिंतामन केलकर और मोतीलाल नेहरू का महत्वपूर्ण योगदान रहा। स्वराज पार्टी ने ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध विधानमंडलों में स्वर मुखर किया और स्वशासन की मांग की।
भारत छोड़ो आंदोलन
महात्मा गांधी द्वारा 8 अगस्त 1942 को प्रारंभ किए गये भारत छोड़ो आंदोलन में भी उत्तर प्रदेश ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इस आंदोलन में उत्तर प्रदेश भूमिगत कार्यकर्ताओं का केंद्र बन गया। लोगों ने ब्रिटिश शासन के विरुद्ध जमकर प्रदर्शन किए। ब्रिटिश शासन द्वारा उन पर बहुत अत्याचार किए गए, परन्तु उन्होंने हार नहीं मानी और अंग्रेजों को भारत छोड़ने के लिए विवश कर दिया। 
राजनीति में अग्रणी 
उत्तर प्रदेश ने देश को कई शीर्ष नेता दिए, जिन्होंने सुराज की नींव रखी। देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू, द्वितीय प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री, इंदिरा गांधी, अटल बिहारी वाजपेयी और राजनाथ सिंह आदि राजनेताओं ने भारतीय लोकतंत्र और सुशासन को सुदृढ़ किया।
योगी आदित्य नाथ का सुराज 
योगी आदित्य नाथ के मुख्यमंत्रित्व काल में उत्तर प्रदेश के अंतिम व्यक्ति तक के जीवन को सुखी एवं समृद्ध करने के सपने को साकार करने के लिए निरंतर प्रयास किए जा रहे हैं। भाजपा शासन की इस समयावधि में उत्तर प्रदेश ने लगभग सभी क्षेत्रों में सराहनीय उन्नति की है। कृषि, उद्योग, रोजगार, आवास, परिवहन, विद्युत्, पानी, शिक्षा, चिकित्सा, धर्म, संस्कृति, पर्यावरण एवं सुरक्षा व्यवस्था आदि क्षेत्रों में योगी सरकार ने प्रशंसनीय कार्य किए हैं। विद्यार्थियों को छात्रवृत्ति दी जा रही है। वृद्धजन, विधवा एवं दिव्यांगजन को पेंशन के रूप में आर्थिक सहायता प्रदान की जा रही है। अनाथ बच्चों के भरण-पोषण की भी व्यवस्था की गई है। जिन परिवारों में कोई कमाने वाला व्यक्ति नहीं है, सरकार उन्हें भी वित्तीय सहायता उपलब्ध करा रही है। निर्धन परिवार की लड़कियों एवं दिव्यांगजन के विवाह लिए अनुदान प्रदान किया जा रहा है। निराश्रित गौवंश के संरक्षण पर भी योगी सरकार विशेष ध्यान दे रही है। चुनाव के समय भाजपा ने अपने घोषणा-पत्र में जनता से जो वादे किए थे, योगी सरकार उन पर शत-प्रतिशत खरी उतरी है।      
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का कहना है कि देश की स्वतंत्रता अनगिनत त्याग और बलिदान का परिणाम है। स्वाधीनता त्याग और बलिदान मांगती है। स्वाधीनता की यह लड़ाई राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के निर्णायक नेतृत्व के उपरान्त प्राप्त हुई। उन्होंने कहा कि स्वतंत्रता का मतलब स्वच्छन्दता नहीं हो सकती। हम सभी बाबा साहब डॉ. भीमराव आंबेडकर के बनाए संविधान का सम्मान करते हुए उनके प्रति आदर का भाव रखते हुए संविधान के अनुरूप अपने राष्ट्रीय कर्तव्यों का पालन करें। भारत वर्ष 2047 में दुनिया की एक बड़ी ताकत होगा। विगत 11 वर्षों में भारत की विकास यात्रा का आत्मवलोकन करने का अवसर देशवासियों को प्राप्त हुआ है। 11 वर्ष पूर्व भारत दुनिया की ग्यारहवीं बड़ी अर्थव्यवस्था था। एक सुनियोजित प्रयास, व्यापक कार्ययोजना और टीम वर्क के परिणामस्वरूप आज भारत दुनिया की चौथी बड़ी अर्थव्यवस्था बन गया है।
उन्होंने कहा कि आगामी तीन माह में वर्ष 2047 तक के लिए उत्तर प्रदेश अपना विजन डॉक्युमेंट तैयार करेगा और विकसित भारत की तर्ज पर विकसित उत्तर प्रदेश के निर्माण हेतु प्रतिबद्धता के साथ कार्य करेगा। उन्होंने कहा कि वर्ष 2017 से पूर्व परम्परागत वस्तुओं तथा उत्पादों कीउपेक्षा की गई थी। सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम के क्लस्टर प्रदेश में मौजूद थे। आठ वर्ष पूर्व परम्परागत क्षेत्र से जुड़े हस्तशिल्पी व कारीगर पलायन कर रहे थे। उनमें निराशा तथा हताशा थी। वह छोटा-मोटा काम करके आजीविका चलाने के लिए मजबूर थे। प्रधानमंत्री जी के मार्गदर्शन में प्रदेश ने अपने सामर्थ्य को पहचाना तथा ‘एक जनपद एक उत्पाद’ योजना के माध्यम से हस्तशिल्पियों एवं कारीगरों को एक प्लेटफार्म उपलब्ध करवाया। उत्तर प्रदेश की यह योजना देश और दुनिया में धूम मचा रही है। इसने प्रदेश के डोमेस्टिक मार्कट तथा एक्सपोर्ट को दोगुना किया है।
उन्होंने कहा कि ‘मेक इन इंडिया’ की संकल्पना को साकार कर हम देश को समृद्ध बना सकते हैं। ‘मेक इन इंडिया’ के अंतर्गत युवाओं के लिए रोजगार के अवसर सुलभ होंगे। किसानों के चेहरे पर खुशी आएगी। हस्तशिल्पी और कारीगर समृद्धि के पथ पर अग्रसर होकर इनोवेशन, रिसर्च एंड डेवलपमेंट के कार्यक्रम को आगे बढ़ा सकते
हैं। हमें तकनीक, डिजाइन और मार्केट की मांग के अनुरूप पैकेजिंग को तैयार करना होगा। आत्मनिर्भरता के इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए हमें स्वदेशी वस्तुओं को ज्यादा से ज्यादा अपनाना होगा और ‘वोकल फॉर लोकल’ अभियान के साथ मिलकर कार्य करना होगा। हमें स्वदेशी को जीवन का मंत्र बनाकर चलना होगा। दुनिया का कोई भी देश तभी आगे बढ़ा है, जब उसने अपने कारीगरों, हस्तशिल्पियों तथा युवा शक्ति की ऊर्जा को पहचाना है। उनकी प्रतिभा को आगे बढ़ाने के साथ-साथ उन्हें प्रोत्साहित किया है। देश व प्रदेश के युवाओं में यह सामर्थ्य है। प्रदेश सरकार ने विश्वकर्मा श्रम सम्मान योजना तथा प्रधानमंत्री विश्वकर्मा योजना ने हस्तशिल्पियों व कारीगरों को नई प्रेरणा प्रदान करते हुए उन्हें एक प्लेटफार्म दिया है। उन्हें आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया है। इन सेक्टरों से जुड़े 16 प्रकार के हस्तशिल्पी और कारीगर चिन्हित किए गये हैं। समाज और मार्केट की मांग के अनुरूप इन हस्तशिल्पियों ने नये डिजाइन, नई टेक्नोलॉजी के साथ स्वयं को जोड़कर सामर्थ्य तथा स्वावलंबन का मॉडल प्रस्तुत किया है।
उन्होंने कहा कि अन्नदाता किसानों ने मिशन मिलेट के अन्तर्गत मोटे अनाजों के उत्पादन का कार्य परम्परागत रूप से पुनः प्रारम्भ किया है। उत्तर प्रदेश के 34 जनपद इस अभियान से जुड़कर तेजी से इस कार्यक्रम को आगे बढ़ा रहे हैं। अन्नदाता किसान नेचुरल फार्मिंग के माध्यम से खेती की लागत कम करते हुए उत्पादन बढ़ा सकते हैं। इसके अन्तर्गत फर्टिलाइजर, केमिकल और पेस्टिसाइड का कम प्रयोग करना होगा। यदि नेचुरल फार्मिंग से अन्नदाता किसान खेती-बाड़ी करते हैं, तो यह किसानों की लागत को कम करेगा तथा उत्पादन क्षमता व आमदनी को कई गुना बढ़ाएगा।
उन्होंने कहा कि विगत आठ वर्षों में उत्तर प्रदेश ने एक लंबी छलांग लगाई है। युवाओं, महिलाओं, अन्नदाता किसानों, श्रमिकों तथा समाज से जुड़े प्रत्येक तबके के उत्थान व कल्याण के लिए प्रदेश प्रत्येक सेक्टर में नये-नये कीर्तिमान स्थापित करने की दिशा में अग्रसर हुआ है। विगत आठ पूर्व प्रदेश के सामने पहचान का संकट था, यहां के युवा अपनी पहचान को छुपाते थे, लेकिन आज हमारा युवा अपनी पहचान को छुपाता नहीं है। देश और दुनिया ने प्रदेश के युवाओं की प्रतिभा का लोहा माना है।
नि:संदेह योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में उत्तर प्रदेश प्रत्येक क्षेत्र में निरंतर आगे बढ़ रहा है।
(लेखक - लखनऊ विश्वविद्यालय में पत्रकारिता विभाग के अध्यक्ष है)

Sunday, September 21, 2025

नवरात्रि का संदेश : नारी सशक्तीकरण

 

डॉ. सौरभ मालवीय 
भारतीय पर्व हमारी सांस्कृतिक विरासत के प्रतीक हैं। इनसे हमें ज्ञात होता है कि हमारी प्राचीन संस्कृति कितनी विशाल, संपन्न एवं समृद्ध है। यदि नवरात्रि की बात करें तो यह पर्व भी भारतीय संस्कृति की महानता को दर्शाता है। विगत कुछ दशकों से देश में महिला सशक्तीकरण की बात हो रही है। कुछ लोग विदेशों के उदाहरण देते हैं कि वहां की महिलाएं सशक्त हैं तथा उन्हें बहुत से अधिकार प्राप्त हैं। किंतु ये लोग अपने देश के इतिहास पर चिंतन एवं मनन नहीं करते हैं। वास्तव में भारत विश्व का एकमात्र ऐसा देश है, जहां महिलाओं को पुरुषों के समान माना गया है। उदाहरण के लिए भारत में देवियों की पूजा-अर्चना की जाती है। यहां पर उन्हें भी देवताओं के समान ही पूजा जाता है, अपितु देवियों का स्थान देवता से पहले आता है जैसे राधा कृष्ण, सीता राम आदि। भगवान शिव के साथ देवी पार्वती की भी पूजा की जाती है। भगवान राम के साथ देवी सीता की पूजा की जाती है तथा भगवान श्रीकृष्ण के साथ राधा की पूजा-अर्चना करने का विधान प्राचीन काल से ही चला आ रहा है। हमारी मान्यता के अनुसार शक्ति की देवी दुर्गा है। धन एवं समृद्धि की देवी लक्ष्मी है तथा ज्ञान की देवी सरस्वती है। कहने का अभिप्राय यह है कि मनुष्य को जीवन में जिन वस्तुओं की आवश्यकता होती है, वह सब उन्हें इन देवियों से ही तो प्राप्त होती हैं।    
नवरात्रि देवी दुर्गा को समर्पित एक महत्वपूर्ण पर्व है। नवरात्रि का पर्व वर्ष में चार बार आता है अर्थात चैत्र, आषाढ़, अश्विन, माघ। इनमें से चैत्र एवं आश्विन माह में आने वाली नवरात्रि अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है। माघ एवं आषाढ़ माह में आने वाली नवरात्रि को गुप्त नवरात्रि कहा जाता है, क्योंकि इनमें कोई सार्वजनिक उत्सव का आयोजन नहीं किया जाता है। आश्विन माह में आने वाली नवरात्रि को शारदीय नवरात्रि कहा जाता है। इसका  आरंभ अश्विन मास के शुक्ल पक्ष की प्रथम तिथि से होता है। इस दिवस पर शुभ मुहूर्त में कलश की स्थापना की जाती है। नवरात्रि में नौ दिन देवी दुर्गा के नौ रूपों की पूजा-अर्चना की जाती है।
प्रथमं शैलपुत्री च द्वितीयं ब्रह्मचारिणी।
तृतीयं चन्द्रघण्टेति कूष्माण्डेति चतुर्थकम्।।
पंचमं स्कन्दमातेति षष्ठं कात्यायनीति च।
सप्तमं कालरात्रीति महागौरीति चाष्टमम्।।
नवमं सिद्धिदात्री च नवदुर्गा: प्रकीर्तिता:।
उक्तान्येतानि नामानि ब्रह्मणैव महात्मना:।।
अर्थात देवी पहली शैलपुत्री, दूसरी ब्रह्मचारिणी, तीसरी चंद्रघंटा, चौथी कूष्मांडा, पांचवी स्कंध माता, छठी कात्यायिनी, सातवीं कालरात्रि, आठवीं महागौरी एवं नौवीं देवी सिद्धिदात्री है।

शैलपुत्री
नवरात्रि के प्रथम दिन देवी दुर्गा के प्रथम स्वरूप मां शैलपुत्री की पूजा-अर्चना की जाती है। मां शैलपुत्री को सफेद वस्तुएं अत्यंत प्रिय हैं, इसलिए उन्हें सफेद मिष्ठान का भोग लगाया जाता है। यह प्रसाद गाय के शुद्ध घी से बनाया जाता है। सफेद रंग पवित्रता एवं शांति का प्रतीक माना जाता है। जीवन में सर्वाधिक पवित्रता एवं शांति का ही महत्व है। इनके बिना सब व्यर्थ है। देवी की साधना से सुख एवं समृद्धि में वृद्धि होती है।

ब्रह्मचारिणी
नवरात्रि के दूसरे दिन देवी देवी दुर्गा के द्वितीय स्वरूप मां ब्रह्मचारिणी की पूजा-अर्चना की जाती है। मां ब्रह्मचारिणी को शक्कर एवं पंचामृत का भोग लगाया जाता है। शक्कर जीवन में मिठास का प्रतीक है। जिस प्रकार भोजन में मिष्ठान का महत्व है, उसी प्रकार जीवन में मधुर वाणी का महत्व है। मृदु भाषी व्यक्ति सबका मन मोह लेते हैं। देवी की साधना से भाग्य में वृद्धि होती है तथा आयु भी लम्बी होती है।  

चंद्रघंटा
नवरात्रि के तीसरे दिन देवी दुर्गा के तृतीय स्वरूप मां चंद्रघंटा की पूजा-अर्चना की जाती है। मां चंद्रघंटा को दुग्ध से बने मिष्ठान एवं खीर का भोग लगाया जाता है। खीर भी दुग्ध से बनाई जाती है। दुग्ध समृद्धि एवं अच्छे स्वास्थ्य का प्रतीक है। देवी की साधना से व्यक्ति बुरी शक्तियों से सुरक्षित रहता है।

कुष्मांडा
नवरात्रि के चौथे दिन देवी दुर्गा के चतुर्थ स्वरूप मां कुष्मांडा की पूजा-अर्चना की जाती है। मां कुष्मांडा को मालपुये का भोग लगाया जाता है। देवी की साधना से मनुष्य की समस्त इच्छाएं पूर्ण होती हैं।

स्कंदमाता
नवरात्रि के पांचवे दिन देवी दुर्गा के पांचवे स्वरूप स्कंदमाता की पूजा-अर्चना की जाती है। स्कंदमाता को फल विशेषकर केला अत्यंत प्रिय है, इसलिए उन्हें केले का भोग लगाया जाता है। देवी की साधना से सुख एवं एश्वर्य में वृद्धि होती है। 

कात्यायनी
नवरात्रि के छठे दिन देवी दुर्गा के छठे स्वरूप मां कात्यायनी की पूजा-अर्चना की जाती है। मां कात्यायनी को मीठे पान एवं मधु का भोग लगाया जाता है। देवी की साधना से दुखों का नाश होता है तथा जीवन में सुख का आगमन होता है।

कालरात्रि
नवरात्रि के सातवें दिन देवी दुर्गा के सातवे स्वरूप मां कालरात्रि की पूजा-अर्चना की जाती है। मां कालरात्रि को गुड़ अत्यंत प्रिय है, इसलिए उन्हें गुड़ से बने व्यंजन का भोग लगाया जाता है। देवी की साधना से समस्त नकारात्मक शक्तियों का नाश होता है तथा सकारात्मकता में वृद्धि होती है। जीवन सुखी हो जाता है। 

महागौरी
नवरात्रि के आठवें दिन देवी दुर्गा के आठवे स्वरूप मां महागौरी की पूजा-अर्चना की जाती है। मां महागौरी को नारियल अत्यंत प्रिय है, इसलिए उन्हें नारियल का भोग लगाया जाता है अर्थात नारियल अर्पित किया जाता है। देवी की साधना से व्यक्ति के रुके हुए कार्य पूर्ण होते हैं। 

सिद्धिदात्री
नवरात्रि के अंतिम दिन देवी दुर्गा के नौवें स्वरूप मां सिद्धिदात्री की पूजा-अर्चना की जाती है। इस दिन कन्या पूजन का विधान है। कन्याओं की पूजा की जाती है। उन्हें भोजन ग्रहण कराया जाता है। इसके पश्चात उनके चरण स्पर्श कर उनसे आशीर्वाद लिया जाता है। कन्याओं को प्रसाद के साथ उपहार भेंट किए जाते हैं। तदुपरांत देवी को काले चने, हलवा पूड़ी एवं खीर का भोग लगाया जाता है। देवी की साधना से व्यक्ति के समस्त पापों का नाश होता है तथा उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है।

वास्तव में नवरात्रि का पर्व नारी शक्ति का उत्सव है। प्राचीन काल से ही यह पर्व भारतीय संस्कृति में नारी शक्ति का प्रतीक रहा है। कन्या पूजन इस बात को सिद्ध करता है कि भारतीय समाज में कन्या का महत्वपूर्ण स्थान रहा है। कन्या भ्रूण हत्या तथा नवजात कन्याओं का वध कर देने जैसी बुराइयां हमारे समाज में कब और कैसे सम्मिलित हो गईं, ज्ञात ही नहीं हो पाया। निरंतर घटता लिंगानुपात अत्यंत चिंता का विषय बना हुआ है। विदेशों में भारत की जिन बुराइयों का उल्लेख कुछ लोग बड़े गर्व के साथ करते हैं, वे बुराइयों तो हमारे समाज में कभी नहीं थीं। जिस समय विश्व के अधिकांश देश अशिक्षित एवं असभ्य थे, उस समय हमारा देश शिक्षा के क्षेत्र में अग्रणी था। पुरुष ही नहीं, अपितु महिलाएं भी शिक्षित थीं। वे शास्त्रार्थ करती थीं, अस्त्र-शस्त्र चलाती थीं। देवियों ने कितने ही राक्षसों का अकेले वध किया है।

नारी को ईश्वर ने श्रेष्ठ बनाया है। अनेक मामलों में वह पुरुष से उच्च स्थान पर है। वह जन्मदात्री है। जिस प्रकार एक स्त्री अपने बालकों का पालन-पोषण कर लेती है, उस प्रकार एक पुरुष उनका पालन-पोषण नहीं कर पाता। उदाहरण के लिए यदि किसी की पत्नी की मृत्यु हो जाए, तो वह न चाहते हुए भी इसलिए विवाह कर लेगा कि बच्चों का पालन-पोषण ठीक से हो जाएगा। यदि किसी के पति की मृत्यु हो जाए, तो महिला जीविकोपार्जन के साथ-साथ बच्चों का पालन-पोषण भी कर लेती है। यदि दृष्टि डालें तो आसपास ऐसे बहुत से उदाहरण मिल जाएंगे। कहने का तात्पर्य यह है कि ईश्वर ने नारी को अत्यंत सबल बनाया है। नारी प्रत्येक क्षेत्र में अपनी योग्यता एवं प्रतिभा का सफल प्रदर्शन कर रही है।

संस्कारयुक्त शिक्षा के लिए कार्य कर रही है विद्या भारती : डॉ. सौरभ मालवीय









रामनगर, अम्बेडकर नगर।
जय बजरंग इंटरमीडिएट कॉलेज मे  एक दिवसीय प्रचार प्रमुख कार्यशाला सम्पन्न हुई। कार्यशला मे अवध प्रान्त के 12 जनपदों के नगरीय और ग्रामीण क्षेत्रों के संकुल व जिला प्रचार प्रमुख सम्मिलित हुए। कार्यशाला का प्रारम्भ माँ शारदा के चित्र के समक्ष क्षेत्रीय मंत्री विद्या भारती पूर्वी उत्तर प्रदेश क्षेत्र डॉ. सौरभ मालवीय, क्षेत्रीय प्रचार प्रमुख डॉ. योगेंद्र प्रताप सिंह ने संयुक्त रूप से दीप प्रज्वलन एवं पुष्पार्चन के साथ किया। उद्घाटन सत्र में अतिथि परिचय एवं स्वागत आयोजक विद्यालय के प्रधानाचार्य राजेंद्र सिंह ने किया। 
 कार्यशाला में उपस्थित प्रचार प्रमुखों के मध्य अपने विचार साझा करते हुए क्षेत्रीय मंत्री विद्या भारती पूर्वी उत्तर प्रदेश क्षेत्र एवं विभागाध्यक्ष  पत्रकारिता विभाग लखनऊ विश्वविद्यालय डॉ. सौरभ मालवीय ने कहां कि हम विश्व के सबसे बड़े अशासकीय संगठन के घटक है, जो भारतीय ज्ञान परंपरा के आलोक में भारत, भारतीयता, राष्ट्र प्रेम के साथ-साथ आध्यात्मिकता के भाव को शिक्षा के क्षेत्र में स्थापित करने के लिए विद्या भारती के विद्यालय निरंतर क्रियाशील है। श्री मालवीय ने कहा कि यह वर्ष हमारे मातृ संगठन का शताब्दी वर्ष है जिसमें हम विभिन्न गतिविधियों, कार्यक्रमों के माध्यम से समाज के अधिकाधिक जनों से  संपर्क  कर अपने कार्यों, योजनाओं, गतिविधियों को पहुंचाने हेतु सतत संपर्क अभियान चलाएंगे। सप्त शक्ति संगम के माध्यम से हम एक विशेष अभियान चलाने जा रहे हैं जो 5 अक्टूबर से प्रारंभ होकर 5 फरवरी 2026 तक चलेगा जिसमें हमारा लक्ष्य है कि देश के 75 लाख मातृ शक्तियों से संपर्क कर उनके बीच कार्यक्रमों एवं गतिविधियों के माध्यम से उन्हें  अपने से जोड़ने का प्रयास करेंगे। हमारे पूर्व छात्र लाखों की संख्या में देश -विदेश में समाज के नवनिर्माण में अपना अहम योगदान दे रहे हैं। हम समाज को कुटुंब प्रबोधन के माध्यम से भी जोड़ने के लिए निरंतर प्रयत्नशील है।
इस अवसर पर डॉ. योगेंद्र सिंह, प्रान्त प्रचार प्रमुख, सुनील सिंह, अरुणेश कुमार, वीरेंद्र वर्मा, सहित अन्य उपस्थित रहे।

Saturday, September 20, 2025

श्रद्धा भाव है श्राद्ध


डॉ. सौरभ मालवीय
पितर हमारे किसी भी कार्य में अदृश्य रूप से सहायक की भूमिका अदा करते हैं, क्योंकि अंतत: हम उन्हीं के तो वंशज हैं. ज्योतिष विज्ञान की मान्यता के अनुसार वे हमारे सभी गतिविधियों पर अपनी अतिन्द्रीय सामर्थ के अनुसार निगाह रखे रहते हैं. यदि हम अपना भाव भावात्मक लगाव उनसे जोड़ सके तो वे हमारी अनेक सहायता करते हैं जो हरदम कल्पनातीत होती है. विज्ञान भी इन बातों को स्वीकार करता है कि मनुष्य जो कुछ भी कार्य कर रहा है वह केवल मनुष्य की सामर्थ में ही नहीं है, अपितु कुछ ऐसे भी कार्य हैं जो होने लायक नहीं है और हो जाते हैं. पिछली शताब्दी में विज्ञान के सर्वाधिक महत्वपूर्ण वेन्जीन की अंतर-संरचना की खोज सपने में हुई थी. केकुले नाम के एक प्रख्यात वैज्ञानिक के तीन वर्ष का परिश्रम काम नहीं आ रहा था और एक दिन सपने में उसने एक सापीन को उसकी पूछ अपने मुंह में डाले हुए देखा और उसे सपने में किसी ने कहा बेटे मैं तुम्हारे परिश्रम से अत्यंत प्रसन्न हूं. यही तो वेन्जीन की संरचना है और उसके बाद केकुले की नींद खुल गई. अब वह अत्यंत हल्कापन और आनंद अनुभव कर रहे थे. उन्हें लगा की सपने में बोलने वाला वह पुरुष उन्हीं के वंश परंपरा का कोई हैं. आज रसायन विज्ञान में जो कुछ भी पढ़ाया जा रहा है, उस सबका आधार वेन्जीन की संरचना है. इसी प्रकार सिलाई मशीन के लिए भी आयुवान होने बहुत परिश्रम किया था. फिर भी सफलता तो उसे सपने में ही मिली थी. यह भी कोई संयोग नहीं था, बल्कि उसके पूर्वजों का अदृश्य सहयोग था. भारत के दर्शन में भगवान वेद व्यास ने लिखा है कि ब्यतिरेस्त्दभावा भवित्वानंतूफ्लदिवत (उत्तरमीमांसा-3,54) अर्थात शरीर से आत्मा भिन्न है, क्योंकि शरीर के विद्यमान होते हुए भी उसमें आत्मा अस्पृत रहती है. आत्मा की अतिसूक्ष्म गति है जो लोकान्तरों तक भी जा सकती है और अपने संकल्प के अनुसार शरीर भी धारण करती रहती है. जर्मन वैज्ञानिक हेकल ने अपने शोध ग्रन्थ दी रीडल ऑफ दि इन वर्ष में इसी सिद्धांत को प्रतिपादित किया है. वे अंत में यह भी लिखते हैं कि मनुष्य बिना इंद्रियों की सहायता के भी बाह्य जगत का ज्ञान प्राप्त कर सकता है. भारत में जो कर्मकांड तय किए गए हैं, वह अत्यंत गहन अनुभव के बाद प्रयोग में आए हैं. अब तो विज्ञान भी यह स्वीकार कर रहा है कि पुनःर्जन्म होता है और पुनःर्जन्म में अधिकांशतः अपने पितरों की आत्माएं भी अवतरित होती रहती है, क्योंकि किसी सत्यकर्म के करने पर प्रसन्न होती हैं या पापकर्म के कारण उन्हें दुख भी होता है. प्रत्येक व्यक्ति की कुछ इच्छाएं भी होती हैं किसी कारण बस यदि शरीर पूर्ण हो जाए तो भी वे इच्छाएं सूक्ष्म तरंगों के रूप में आत्मा के साथ जुड़ी रहती है. उन इच्छाओं की पूर्ति के लिए हम श्राद्ध इत्यादि का प्रक्रम करते हैं. अनेक भूगोल विज्ञानी भी शरद ऋतु के आश्विन कृष्ण पक्ष में ग्रह नक्षत्रों की स्थिति कितनी अनुकूल होती है कि पितर अपने वंशजों से अपना पाथेय चाहते हैं. इस प्रक्रिया को श्राद्ध कहा जाता है. श्राद्ध शब्द का अर्थ श्राद्ध भाव से जुड़ा हुआ है. इसलिए यह कर्म अत्यंत श्राद्ध के साथ संपादित होना चाहिए.
ऋग्वेद में ऐसा लिखा है-
अग्निष अग्निष्वातः पितरएतगच्छातः. सदः सदः सदतः सूप्रणीतयः.।
हिमांद्री रत्नाकर में श्राद्ध उसी तिथि को संपन्न करने को कहा गया है जिस तिथि में पूर्वज की मृत्यु हुई हो वे लिखते हैं– यातिथिर्थस्यमासस्य मृताहेतूप्रवर्तते पितर की दिश दक्षिण मानी जाती है. हाथ की हथेलियों में अंगुष्ठ भाग की ओर पितरों का स्थान माना जाता है. अतएव अपने पितरों के लिए श्रद्धापूर्ण ढंग से श्राद्ध संपन्न करना चाहिए. जिसे अपने पितर के तिथि का ज्ञान न हो, उसे अमावस्या के दिन श्राद्ध करना मान्य है. भगवान मनु कहते हैं कि जिस कुल में श्राद्ध नहीं होते हैं पौरुषवान, निरोगी, प्रतिष्ठावान और लम्बी आयु वाला व्यक्ति पैदा नहीं होता है. न तत्रबीरा जायत्रे निरोगी न शतायुसः न च. श्रीयोधीगच्छित यंत्र श्राद्धं-विर्वत्रितम्।।
भारत में पिंडदान के लिए सर्वाधिक महत्वपूर्ण स्थान अल्गू नदी के तट पर गया भूमि में है. इस पवित्र नदी का पौराणिक नाम निरंजना भी है. यह इतना पवित्र स्थान है कि स्वयं भगवान विष्णु अपना चरण चिन्ह दे गए हैं. इस भूमि की ऊर्जा और महत्ता का अनुमान मानवता ने हरदम श्रेष्टतम लगाया है. भगवान बुद्ध आचार्य शाम्वत्यकास्यप, मतंग ऋषि, संजयवेल्किपुत्र और महावीर स्वामी समेत लाखों महापुरुषों ने इस पवित्र स्थान का यशोगान किया है. इसके इतर अग्नि तीर्थ कुमारी अंतरीय (कन्याकुमारी) तीन समुद्रों से घिरी हुई पवित्र भूमि रामेश्वरम् प्रभाव क्षेत्र (सोमनाथ)श्री क्षेत्र नासीक, ब्रह्म क्षेत्र कुरुक्षेत्र, कमल क्षेत्र पुष्कर और पवित्र धाम श्रीबद्रीनारायण भी श्राद्धकर्म के लिए प्रस्सत भूमि है. इसमें आनंदवन काशी और व्रह्म कपाल वद्रीधाम तो जीवित व्यक्ति द्वारा स्वयं के श्राद्ध के लिए उपयुक्त माना जाता है. श्राद्ध कर्म प्रकाश में आचार्य और संतों के लिए भी श्राद्ध करने का विचार है. जिस व्यक्ति के जन्मपत्री में काल सर्प दोष हो, उसे अवश्य ही श्रद्धापूर्ण ढ़ंग से यह कार्य संपन्न करना चाहिए. पितृ क्षेत्र से ग्रस्त व्यक्ति कभी स्थायी तौर पर सफलता नहीं पाता है. पितृदोष समन के लिए अरुणाचल प्रदेश के तेजू जिले में लोहित नदी तट पर स्थित परशुराम कुंड और हिमक्त क्षेत्र लेह स्थित सिन्धु तट भी उत्तम माना गया है. सामान्य रूप से पितृश्राद्ध हेतु उत्तम ब्राह्मणों को दान, मान, आदि से तृप्त कर के भेजना चाहिए गाय, कुत्ता, कौवा और का भोजन उत्तम माना जाता है. हमें श्रृद्धापूर्ण ढंग से अपने पितरों के लिए अपनी सामथ्र्य के अनुसार श्राद्ध तरपण आदि कर्म करने चाहिए. यूं तो प्रत्येक शुभ कर्म में पितरों का आहन्वान, नानदीमुख श्राद्ध एवं विसर्जन, सविधि सम्पन्न करना चाहिए. यह नित्य कर्म न हो सके तो नैमित्रिक रूपेण (महालय पक्ष) में अवश्य ही होना चाहिए.
सर्वमातृ, पितृ चरण कमलेभ्योनमः।

टीवी पर लाइव



नरेंद्र मोदी जी भारत के सबसे लोकप्रिय नेताओं में से एक हैं। 
खासकर 2014 और 2019 और 2024 के आम चुनावों में युवाओं का बड़ा समर्थन देखने को मिला।
Digital India, Startup India, और Skill India युवाओं को केंद्र में रखकर बनाई गई थीं, जिससे युवा प्रभावित हुए हैं।
युवा मोदी को एक निर्णायक और मजबूत नेता मानते हैं, जो भारत को वैश्विक मंच पर आगे बढ़ा रहे हैं।

Thursday, September 18, 2025

टीवी पर लाइव



भू माफिया के प्रति कठोर कार्यवाही होनी चाहिए. 
राजनीति या परिवार का रसूख जो भी हो कानून के दायरे में सभी है.

पुस्तक भेंट



लखनऊ विश्वविद्यालय में पत्रकारिता विभाग के अध्यक्ष प्रोफेसर सौरभ मालवीय जी से आत्मीय भेंटकर अपनी पुस्तक मैं स्वयंसेवक भेंट की।
मनीष शुक्ला 

Tuesday, September 16, 2025

मातृ‑मन्दिर का समर्पित दीप मैं


मातृ‑मन्दिर का समर्पित दीप मैं
चाह मेरी यह कि मैं जलता रहूँ
कर्म पथ पर मुस्कुराऊँ सदा
आपदाओं को समझ वरदान मैं
जग सुने झूमे सदा अनुराग में
उल्लसित हो नित्य गाऊँ गान मैं
चीर तम‑दल अज्ञानता निज तेज से
बन अजय निश्ंक मैं चलता रहूँ.........

विद्या भारती की साधारण सभा बैठक

विद्या भारती की साधारण सभा बैठक   3 अप्रैल से 6 अप्रैल 2026   हरि नगर (दिल्ली)