Saturday, March 9, 2019

विकास के पथ पर भारत


आजतक 
माखनलाल चतुर्वेदी राष्‍ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्‍वविद्यालय के सहायक प्राध्यापक डॉ. सौरभ मालवीय ने गहन अध्ययन के बाद 'विकास के पथ पर भारत' किताब के माध्यम से केंद्र व राज्य सरकारों की 36 प्रमुख योजनाओं को समझाने की पहल की है.
लोकसभा चुनाव के दौर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का समर्थन करने वाले लेखकों में उनकी तारीफ करने की होड़ सी लगी है.उन पर लिखी किताबों की बाढ़ सी आ गई है. कुछ लोग उनके व्यक्तित्व पर लिख रहे, तो कुछ कृतित्व पर, कुछ जीवनी लिख रहे तो कुछ उनके व्याख्यान सहेज रहे. पर माखनलाल चतुर्वेदी राष्‍ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्‍वविद्यालय के सहायक प्राध्यापक डॉ. सौरभ  मालवीय की किताब 'विकास के पथ पर भारत' इससे  थोड़ी अलग है.  हालांकि किताब के कवर पर संसद भवन के साथ प्रधानमंत्री मोदी की खिलखिलाती तस्वीर देख यह लगता है कि यह किताब भी उनका प्रचार करने वाली ही है, पर इसके अध्याय व पृष्ठ पलटने के बाद यह मान्यता बदलती सी लगती है,  और यह स्पष्ट सा हो जाता है कि यह किताब सरकारी योजनाओं के सूचनात्मक, व्याख्यात्मक विवरण और तथ्यों पर आधारित है न कि तारीफ पर. सौरभ मालवीय ने गहन अध्ययन के बाद इस किताब के माध्यम से केंद्र व राज्य सरकारों की 36 प्रमुख योजनाओं को समझाने की पहल की है. 

इस किताब की प्रस्तावना में सौरभ मालवीय ने लिखा भी है कि देश के लोगों के सामाजिक, आर्थिक और शैक्षिक विकास के लिए सरकार अनेक योजनाएं चला रही है। हर योजना का उद्देश्य होता है कि उसका लाभ हर व्यक्ति तक पहुंचे। जब योजना का लाभ व्यक्ति तक पहुंचता है, वह योजना सफल होती है। इस समय देश में लगभग डेढ़ सौ योजनाएं चल रही हैं। इनमें अधिकतर पुरानी योजनाएं हैं। इनमें कई ऐसी पुरानी योजनाएं भी हैं, जिनके नाम बदल दिए गए हैं। इनमें कई ऐसी योजनाएं भी हैं, जो लगभग बंद हो चुकी थीं और उन्हें दोबारा शुरू किया गया है। इनमें कुछ नई योजनाएं भी सम्मिलित हैं। देश में दो प्रकार की सरकारी योजनाएं चल रही हैं। पहली योजनाएं वे हैं, जो केंद्र सरकार द्वारा चलाई जाती हैं। इस तरह की योजनाएं पूरे देश या देश के कुछ विशेष राज्यों में चलाई जाती हैं। दूसरी योजनाएं वे हैं, जो राज्य सरकारें चलाती हैं। इस पुस्तक के माध्यम से सरकारी की कुछ महत्वपूर्ण योजनाओं पर प्रकाश डालते हुए उन्हें पाठकों तक पहुंचाने का प्रयास किया गया है। अकसर ऐसा होता है कि अज्ञानता और अशिक्षा के कारण लोगों को सरकार की जन हितैषी योजनाओं की जानकारी नहीं होती, जिसके कारण वे इन योजनाओं का लाभ उठाने से वंचित रह जाते हैं। इस पुस्तक का उद्देश्य यही है कि लोग उन सभी योजनाओं का लाभ उठाएं, जो सरकार उनके कल्याण के लिए चला रही है. इन योजनाओं की जानकारी संबंधित मंत्रालयों से प्राप्त जानकारी पर आधारित है. उल्लेखनीय है कि समय-समय पर योजनाओं में आंशिक रूप से परिवर्तन भी होता रहता है.  

प्रकाशक यश पब्लिकेशंस ने भी अपनी बात कही है. प्रकाशक ने लिखा है कि देश की केंद्र सरकार और राज्य सरकारें जनता के कल्याण के लिए अनेक योजनाएं चला रही हैं. इन योजनाओं का मुख्य उद्देश्य जनता के जीवन स्तर में सुधार लाना तथा  सभी क्षेत्रों का समान विकास सुनिश्चित बनाना है. सरकार द्वारा विभिन्न कल्याणकारी योजनाओं को लक्षित समूहों की स्थिति के अनुरूप तैयार किया जाता है,  ताकि लक्षित वर्ग इन से लाभान्वित हो सके. सरकार महिला सशक्तिकरण पर विशेष ध्यान दे रही है और इसके लिए विभिन्न योजनाएं चलाई जा रही हैं. सरकार द्वारा  बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ,  प्रधानमंत्री उज्जवला योजना, जन धन योजना, प्रधानमंत्री जीवन ज्योति योजना, डिजीटल इंडिया तथा स्वच्छ भारत मिशन आदि महत्वकांक्षी योजनाएं चलाई जा रही हैं. यह पुस्तक केंद्र और राज्य सरकारों की ऐसी ही कुछ योजनाओं पर प्रकाश डालती है. इस पुस्तक के माध्यम से सरकार की जनहितैषी योजनाओं की जानकारी जन-जन तक पहुंचाने का प्रयास किया गया है. निश्चित रूप से यह पुस्तक  अपने उद्देश्य में सफलता प्राप्त करेगी. 

किताब की भूमिका में वरिष्ठ पत्रकार शिशिर सिन्हा ने लिखा है कि विकास के आंकड़ों में आम आदमी हमेशा ही  एक सवाल का जवाब ढ़ूंढता है. सवाल ये है कि इन आंकड़ों का 'मेरे' लिए क्या मतलब है? सवाल तब और भी अहम बन जाता है कि एक ही दिन अखबार की दो सुर्खियां अलग-अलग कहानी कहती हैं. पहली सुर्खी है, 'भारत दुनिया में सबसे तेजी से विकास करने वाला देश बना' या फिर 'भारत अगले दो वर्षों तक सबसे तेजी से विकास करने वाला बना रहेगा देश,' वहीं दूसरी सुर्खी है 'अरबपतियों की संपत्ति रोजाना औसतन 2200 करोड़ रुपए बढ़ी,  भारी गरीबी में जी रही 10 फीसदी आबादी लगातार 14 सालों से कर्ज में है डूबी.'ऐसे में ये सवाल और भी अहम बन जाता है कि 7.3, 7.5 या 7.7 फीसदी की सालाना विकास दर के मायने आबादी के एक बहुत ही छोटे हिस्से तक सीमित है, या फिर इनका फायदा समाज में आखिरी पायदान के व्यक्ति को भी मिल पा रहा है या नहीं?


ऐसे ही सवालों का जवाब जानने के लिए ये जरुरी हो जाता है कि विकास को सुर्खी से आगे जन-जन तक पहुंचाने के लिए आखिरकार सरकार ने किया क्या, या फिर जो किया वो पहले से किस तरह से अलग था?इस सवाल का जवाब जानने की कोशिश यह किताब करती है...अपनी भूमिका में उन्होंने आगे लिखा है कि सच तो यही है कि किसी भी सरकारी योजना की सार्थकता इस बात पर निर्भर करती है कि कितनी जल्दी वो सरकारी सोच से आम आदमी की सोच में अपनी जगह बना पाती है. साथ ही जरुरी ये भी है कि सरकारी योजनाओं को महज पैसा बांटने का एक माध्यम नहीं माना जाए,  बल्कि ये देखना भी जरुरी होगा कि वो किस तरह व्यक्ति से लेकर समाज, राज्य और फिर देश की बेहतरी मे योगदान कर सके. ये भी बेहतर होगा कि मुफ्त में कुछ भी बांटने का सिलसिला बंद होना चाहिए. क्या ऐसा सब कुछ पिछले साढ़े चार साल के दौरान शुरु की गयी योजनाओं में देखने को मिला है, इसका जवाब काफी हद तक हां में होगा. एक और बात. राज्यों के बीच भी नए प्रयोगों के साथ योजनाएं शुरु करने की प्रतिस्पर्धा चल रही है और सुखद निष्कर्ष ये है कि चाहे वो किसी भी राजनीतिक दल की सरकार ने शुरु की हो, उसकी उपयोगिता को दूसरी राजनीतिक दलों की सरकारों ने पहचाना.  तेलंगाना की रायतु बंधु योजना और ओड़िशा की कालिया योजना को ही ले लीजिए. किसानों की जिंदगी बदलने की इन योजनाओं का केंद्र सरकार अध्ययन कर रही है, ताकि राष्ट्रीय स्तर की योजना में इन योजनाओं की कुछ खास बातों को शामिल किया किया जा सके. 
विभिन्न सरकारी योजनाओं को शुरू करने का लक्ष्य यही है कि विकास का फायदा हर किसी को मिले यानी विकास समावेशी हो. कुछ ऐसे ही पैमानों के आधार पर यहां उल्लेखित 36 योजनाओं का आंकलन किया जाना चाहिए. फिर ये सवाल उठाया जा सकता है कि क्या ये योजनाएं कामयाब हैं? अगर सरकार कहे कामयाब तो असमानता को लेकर जारी नई रिपोर्ट को सामने रख चर्चा करने से नहीं हिचकना चाहिए.  एक बात तो तय है कोई कितना भी धर्म-जाति-संप्रदाय को आधार बनाकर राजनीति कर ले लेकिन मतदाता ईवीएम पर बटन दबाने के पहले एक बार जरुर सोचता है कि अमुक उम्मीदवार ने विकास के लिए क्या कुछ किया है, या फिर क्या वो आगे विकास के बारे में कुछ ठोस कर सकेगा.  मत भूलिए सरकारी योजनाएं आपके ही पैसे से चलती हैं और इन योजनाओं की सार्थकता पर अपना पक्ष रखने के लिए हर पांच साल में आपको एक मौका तो मिलता ही है.  ऐसी सोच विकसित करने के लिए जरुरी है कि आपके समक्ष सरकारी योजनाओं का ब्यौरा सरल और सहज तरीके से पेश किया जाए. पुस्तक 'विकास के पथ पर भारत' इस काम में मदद करेगी.

पुस्तकः विकास के पथ पर भारत 
लेखकः डॉ सौरभ मालवीय
प्रकाशकः यश पब्लिकेशंस

Tuesday, February 26, 2019

आज भोपाल परिसर में



आज भोपाल परिसर में
संपादक 
ज़ी मीडिया
मित्रवर श्री दिलीप तिवारी

Wednesday, February 13, 2019

श्री लालजी टण्डन को बधाई


भाजपा के वरिष्ठ नेता एवं लखनऊ के पूर्व सांसद श्री लालजी टण्डन जी को बिहार का राज्यपाल बनायें जाने की बधाई, शुभकामनाएं...
टण्डन जी बीजेपी के उन नेताओं में है जो अटल जी का अपार स्नेह पाए है। अटलजी पर केंद्रित पुस्तक लेखन से पूर्व चर्चा करते हुए।

Thursday, January 10, 2019

भारतीय पत्रकारिता का पिंड है राष्ट्रवाद, फिर इससे गुरेज क्यों?

सौरभ मालवीय ने कहा अटल बिहारी वाजपेयी जन्मजात वक्ता थे, जन्मजात कवि हृदय थे, पत्रकार थे, प्रखर राष्ट्रवादी थे. उनके बारे में कहा जाता था कि यदि वह पाकिस्तान से चुनाव लड़ते तो वहां से भी जीत जाते और पाकिस्तान का नेता कहे जाते.
जय प्रकाश पाण्डेय
राष्ट्रीय पुस्तक न्यास के सहयोग से प्रगति मैदान में लगे विश्व पुस्तक मेला 2019 में लेखक मंच पर 'साहित्य आजतक' का अगला सत्र था डॉ. सौरभ मालवीय की पुस्तक 'राष्ट्रवादी पत्रकारिता के शिखर पुरुष- अटल बिहारी वाजपेयी' पर चर्चा का. जहां सईद अंसारी से बातचीत के लिए मौजूद रहे पं माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय के प्राध्यापक और इस किताब के लेखक डॉ. सौरभ मालवीय. सत्र के शुरू में सईद ने मालवीय की राजनीतिक और सामाजिक समझ की तारीफ करते हुए पूछा कि किस तरह वह अटल बिहारी वाजपेयी को एक पत्रकार और वह भी एक राष्ट्रवादी पत्रकारिता के शिखर पुरुष के रूप में देखते हैं.

डॉ. सौरभ मालवीय ने 'साहित्य आजतक' का आभार जताते हुए, 'तेरा तुझको अर्पण' की बात कही और कहा कि देश और समाज ने हमको जो दिया हमने उसे वही लौटाया. अटल बिहारी वाजपेयी इस सोच के महान नायक थे. मेरा मानना है कि राजनीति एक ऐसी विधा है, एक ऐसा क्षेत्र है, जो किसी भी समाज के विकास की प्रक्रिया के लिए बहुत महत्त्वपूर्ण माना जाता है. परंतु दुर्भाग्य यह है कि आजादी के बाद राजनीति को देखने की दृष्टि संकुचित कर दी गई. राजनीति में काम करने वाला व्यक्ति, नेता बनने वाला व्यक्ति समाज में उस तरह से नहीं स्वीकार किया गया, जैसे कि हम चाहते हैं कि हमारे बच्चे पढ़ कर डॉक्टर बने, वकील बने, इंजीनियर बने पर कोई व्यक्ति यह नहीं कहना चाहता कि मैं राजनेता हूं. ऐसे सवालों के जवाब में जिस व्यक्ति ने अपनी पूरी उम्र दी उस व्यक्ति का नाम अटल बिहारी वाजपेयी था.

अटल बिहारी वाजपेयी जन्मजात वक्ता थे, जन्मजात कवि हृदय थे, पत्रकार थे, प्रखर राष्ट्रवादी थे. उनके बारे में कहा जाता था कि यदि वह पाकिस्तान से चुनाव लड़ते तो वहां से भी जीत जाते और पाकिस्तान का नेता कहे जाते. राजनीति को जब प्रश्नों के दायरे में खड़ा किया जा रहा है तब अटल जी की स्वीकार्यता जन-जन में थी. राम मनोहर लोहिया, जय प्रकाश नारायण, नंबूदरीपाद, अटल बिहारी वाजपेयी, दीन दयाल उपाध्याय, श्यामा प्रसाद मुखर्जी, पं जवाहरलाल नेहरू तमाम ऐसे नेता थे, जिन्होंने पहले यह तय किया कि हमें आजादी, राष्ट्र का विकास चाहिए. इन सबने राष्ट्र को सर्वोपरि रखा.

राष्ट्रवादी पत्रकारिता की व्याख्या करते हुए डॉ. सौरभ मालवीय ने कहा कि इसका अर्थ है समाज के सभी वर्गों को, समाज में निचले स्तर पर जीने वाले हर व्यक्ति को सभी संसाधन उपलब्ध कराने में अपना सर्वस्व जीवन निछावर कर देना. अटल बिहारी वाजपेयी ने अपना जीवन इसीलिए निछावर कर दिया. इसीलिए इस किताब को लिखने की जरूरत पड़ी. अटल बिहारी वाजपेयी केवल नेता भर नहीं थे. उनकी सभाएं देश भर में होती थीं, तो दूसरे दलों के नेता भी उनका भाषण एक नेता के तौर पर सुनने जाते थे, किसी दल के नेता विशेष के तौर पर नहीं.

अटल बिहारी वाजपेयी की पत्रकारिता की उम्र बहुत कम थी. वह आज की पत्रकारिता से अलग थी. उस समय के समाचारपत्रों में वैचारिक पत्रकारिता होती थी. अटल जी जितने भी पत्रपत्रिकाओं से जुड़े रहे उन्होंने अपने छोटे वैचारिक लेखों, संपादकीय से भी अपनी विशिष्ट छाप छोड़ी. उन्हें पढ़ने के बाद मन झंकृत हो जाता है. मेला, राष्ट्रीय एकता, भाषा, हिंदी भाषा पर उनके अद्भुत लेख हैं.

आज के दौर की पत्रकारिता पर डॉ. सौरभ मालवीय का कहना था कि पहले की पत्रकारिता में राष्ट्र सर्वोपरि है. गुलामी से आजादी पाने के बाद कोई भी देश टूटा हुआ ही होता है. भारत की स्थिति भी उससे अलग नहीं थी. पर आज की पत्रकारिता जनोन्मुख है. आज की पत्रकारिता जनजागृति की पत्रकारिता है. अब आप चीजों को छुपा नहीं सकते. आज एक चीज बड़े संकट में है कि पत्रकार पक्षकार बन गया है. और जब पत्रकार पक्षकार बनेगा तो देश और मीडिया के सामने चुनौतियां रहेंगी ही. इसका समाधान जनता और मीडिया को खुद करना होगा. अटल बिहारी वाजपेयी ने वैचारिक प्रतिबद्धता होते हुए भी उसे अपनी पत्रकारिता पर हावी नहीं होने दिया. हर मीडिया घराने में न सही पर हर पत्रकार अपने विंडो टाइम में कहीं न कहीं अपने विचारों को ले ही आता है.

लोहिया, गांधी, नेहरू और अटल का जिक्र करते हुए उन्होंने प्राइम टाइम पत्रकारों पर आरोप लगाया कि वे पक्षकार हो गए हैं. इसीलिए पत्रकारिता को राष्ट्रवाद से जोड़ने की बात इस किताब में की गई. जिन्हें राष्ट्रवाद शब्द से दिक्कत है उन्हें पत्रकार कैसे कह सकते हैं, जबकि सच्चाई यही है कि जब कहीं किसी की बात नहीं सुनी जाती तो वह मीडिया के दरवाजे पर आता है. आपको कहीं न्याय न मिल रहा हो तो आप पत्रकार के पास जाइए वहां न्याय मिलेगा, क्योंकि पत्रकार दर्द से जीता है, लेकिन दूसरे के दर्द को पीता है. पत्रकार की जिंदगी मोमबत्ती के समान है, तिल तिल जलना और दूसरों को रोशनी देना. जहां यह मनोभाव है वहां, राष्ट्रवाद और राष्ट्रवादिता से विरोध क्यों. बाल गंगाधर तिलक, गणेश शंकर विद्यार्थी, माखनलाल चतुर्वेदी को देखिए. हमारी पत्रकारिता का पिंड है राष्ट्रवाद.

Sunday, January 6, 2019

पुस्तक पर चर्चा

'साहित्य आजतक' के बैनर तले मेरी पुस्तक 'राष्ट्रवादी पत्रकारिता के शिखर पुरुष अटल बिहारी बाजपेयी' लोकार्पण एवं परिचर्चा करते हुए प्रख्यात एंकर श्री सईद अंसारी!
विश्व पुस्तक मेला 2019




Saturday, January 5, 2019

पुस्तक पर चर्चा


विश्व पुस्तक मेला में 'साहित्य आजतक' द्वारा आयोजित सौरभ मालवीय की पुस्तक 'राष्ट्रवादी पत्रकारिता के शिखर पुरुष अटलजी' पर चर्चा उपरांत
संजीव सिन्हा 

टीवी पर लाइव

प्रधानमंत्री पद की गरिमा और संसदीय परंपराओं को समझना आवश्यक है। राहुल गांधी द्वारा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को सार्वजनिक बहस की चुनौती देना...