Wednesday, August 5, 2026

कटी अंगुली

   


बहुत दिन हुए किसी देश में एक राजा राज्य करता था. उसका मंत्री बड़ा चतुर था. वह राजा को समझाया करता था कि हर व्यक्ति को बिना किसी इच्छा के काम करना चाहिए. फल भगवान पर छोड़ देना चाहिए. मंत्री यह भी कहा करता था कि भगवान जो कुछ करता है, भले के लिए करता है. राजा उसकी बात चुपचाप सुन लेता. जो कुछ होता है, अच्छे के लिए होता है- यह बात राजा के गले से नीचे नहीं उतरती थी.

एक दिन किसी ने मखमली म्यान में लिपटी हुई सोने की तलवार राजा को भेंट की. राजा बड़ा प्रसन्न हुआ. उसने तलवार को म्यान से निकालने की कोशिश की. जल्दबाजी में राजा की एक अंगुली कट गई. राजा बड़ा नाराज हुआ.  मंत्री से पूछने लगा- "बताओ, मेरी अंगुली कटने में कौन-सी भलाई है ?"
मंत्री पहले कुछ बोला नहीं. बाद में उसने कहा कि भगवान जो करता है, अच्छा ही करता है. राजा और भी नाराज हो गया. उसने मंत्री को कारागार में डलवा दिया.

कुछ दिन बाद राजा शिकार खेलने गया. वहां वह रास्ता भूल गया. अपने साथियों से बिछड़कर जंगल में भटक गया. वहां उसे किसी देवता का मंदिर दिखाई दिया. राजा मंदिर के अंदर चला गया. देखा, पुजारी लोग यज्ञ की तैयारी कर रहे थे. पुजारियों ने राजा का बड़ा आदर-सत्कार किया. कहने लगे- "पूजा समाप्त हो गई है. हमें देवता को संतुष्ट करने के लिए किसी मनुष्य की बलि चढ़ानी है. यह आपका सौभाग्य है कि आप यहां पहुंच गए. आपकी बलि पाकर देवता अत्यंत प्रसन्न होंगे."

बलि की बात सुन राजा घबरा गया. इतने में पुजारी की दृष्टि राजा की अंगुली पर पड़ गई. उसने कहा- "राजा के सभी अंग अखंड नहीं हैं. अंगुली कटी है. उसकी बलि नहीं चढ़ाई जा सकती."

राजा ने राहत की सांस ली. कपड़े पहने और घोड़े पर बैठ राजधानी वापस आ गया. कारागार से मंत्री को लाया गया. राजा ने उससे पूछा- मेरी अंगुली कटने में क्या भलाई थी, यह बात तो मेरी समझ में आ गई है. अब यह बताओ कि तुम्हारे कारागार जाने में क्या भलाई थी ?"

मंत्री ने उत्तर दिया- " महाराज, यदि आप मुझे जेल नहीं भेजते, तो शिकार पर मैं आपके साथ जरूर जाता. अंगुली कटे होने के कारण पुजारी आपको तो छोड़ देते, मुझे बलि चढ़ा देते. आपने मुझे कारागार में भेज दिया, इससे मेरी जान बच गई."

उत्तर सुनकर राजा संतुष्ट हो गया. उसने मंत्री को पुरस्कार दिया. यह बात गांठ बांध ली कि भगवान जो कुछ करता है, वह भलाई के लिए ही करता है.
-डॉ. सौरभ मालवीय

(पुस्तक- 'राष्ट्रवादी पत्रकारिता के शिखर पुरुष अटल बिहारी वाजपेयी' से)

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