संत एकनाथ के पिताजी का श्राद्ध था. उन्होंने ब्राह्मणों को आमंत्रित किया. तरह-तरह की मिठाइयां एवं पकवान तैयार कराए. ब्राह्मणों के आने की प्रतीक्षा करने लगे.
तभी एकनाथ ने देखा- एक महार, उसकी पत्नी तथा बच्चे दरवाजे पर खड़े कह रहे हैं- "महाराज, हम कई दिन से भूखे हैं. कुछ खाना देकर हमारे प्राण बचाइए."
"आइए दरिद्रनारायण, अंदर आइए." संत उन्हें देखते ही खड़े हो गए.
"बैठिए, भोजन कीजिए." उन्होंने उनके सामने भोजन परोसवा दिया. सभी आनंदपूर्वक भोजन करने लगे.
वे लोग भोजन कर ही रहे थे कि ब्राह्मण आ गए. संत एकनाथ ने आदर के साथ उनका भी स्वागत किया. ब्राह्मण यह देखकर बुरी तरह बिगड़ गए. सोचने लगे- ’ श्राद्ध के लिए बनाया भोजन हमसे पहले ही नीची जाति के लोग जीम रहे हैं.’
"तू संत है या ढोंगी ? हमारा अपमान करने के लिए बुलाया था या अपने पितरों की तृप्ति के लिए ?" पंडित बड़बड़ाने लगे.
एकनाथ हाथ जोड़कर बोले- "महाराज, ये भूख से व्याकुल थे. इन्हें भोजन न कराता, तो महापाप का भागी बनता. आप आदर के साथ भोजन करें."
"नहीं, हम भूखे ही जा रहे हैं. अब तेरे पितर भी भूखे रहेंगे. तू नरक में जाएगा." ब्राह्मण क्रोध में भरकर वहां से चल दिए.
अचानक महार परिवार के बीच एक आकृति उभर आई. सबने देखा, वह संत एकनाथ के स्वर्गवासी पिता की आकृति थी. उन्होंने लौटते हुए पंडितों से कहा- "ब्राह्मणों, मैं पूरी तरह से तृप्त हूं इन भूखों को खाना खिलाने से मैं जितना प्रसन्न हूं, उतना तुम जैसे घमंडियों को खाना खिलाकर कभी न होता.
यह सुनते ही ब्राह्मणों का घमंड चूर-चूर हो गया. उनका सिर भी झुका और भूखा अलग से रहना पड़ा.
-डॉ. सौरभ मालवीय
(पुस्तक- 'राष्ट्रवादी पत्रकारिता के शिखर पुरुष अटल बिहारी वाजपेयी' से)


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