Sunday, May 8, 2016
Saturday, May 7, 2016
काव्य संग्रह ’बिखरने से बचाया जाए’ का लोकार्पण
दिल्ली के कन्सटीट्यूशन क्लब (डिप्टी चेयरमैन हॉल) में आज शाम लेखिका श्रीमती अलका सिंह के काव्य संग्रह ’बिखरने से बचाया जाए’ का लोकार्पण प्रख्यात साहित्यकार एवं आलोचक डॊ. नामवर सिंह ने किया. इस मौक़े पर उन्होंने कहा कि हिंदी में ग़ज़ल लिखना मुश्किल काम है. बहुत कम लोग ही लिखते हैं, लेकिन अलका सिंह की किताब एक उम्मीद जगाती है कि कविता, ग़ज़लें और मुक्तक को आने वाली पीढ़ी ज़िंदा रखेंगी. यह अनूठा काव्य संग्रह है. उन्होंने कहा कि लोकार्पण कार्यक्रम में इतने लोगों का जुटना अपने आप में मायने रखता है. राजनीति करने वालों ने दिल्ली को उजाड़ दिया है, यह केवल राजधानी बन कर न रहे, बिखरने से बचे. इसके लिए कविताएं ज़रूरी हैं. ’ज़रूरी तो नहीं खुशियां ही मिलें दामन में, कुछ ग़मो को भी तो सीने से लगाया जा’ बेहतरीन शेअर है.
समीक्षक अनंत विजय ने कहा कि यह संग्रह कॉकटेल है, जिसमे ग़ज़लें, कविताएं और मुक्तक हैं. हिंदी साहित्य में प्रेम का भाव है, लेकिन इस संग्रह ने नई उम्मीद जगाई है. रिश्तों को लेकर लेखिका की बेचैनी साफ़ झलकती है.
’दाग़ अच्छे है’ में अंग्रेज़ी के शब्दो का प्रयोग धूप में मोती की तरह है. आधुनिक युग की त्रासदी ’सुख बेच दिए, सुविधाओं की ख़ातिर’ में साफ़ झलकती है. शब्दों के साथ ठिठोली क़ाबिले-तारीफ़ है.
कवयित्री अनामिका ने कहा कि लेखिका की सोच व्यापक है, समावेशी है समेटने की कोशिश है. स्पष्ट और मुखर होकर बेबाकी से हर बात कही गई है. कई आयामों को छूती ये रचनाएं सीधे मन को छूती हैं.
अमरनाथ अमर ने कहा की कविता कई सवाल उठाती है और समाधान देती है. "अपना कफ़न ओढ़ कर सोने लगे हैं लोग" विश्व स्थिति को व्यक्त करती है. मंच संचालन माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल में सहायक प्राध्यापक डॊ. सौरभ मालवीय ने किया. सार्थक पहल का यह आयोजन प्रवक्ता डॉट कॉम तथा नया मीडिया मंच के संयुक्त तत्वावधान में हुआ. इस अवसर पर साहित्य और पत्रकारिता के क्षेत्र की जानी मानी हस्तियां मौजूद थीं.
लोकार्पण समारोह की एक झलक
Thursday, May 5, 2016
'बिखरने से बचाया जाए' काव्य संग्रह का लोकार्पण कल
नई दिल्ली. आगामी 7 मई दिन (शनिवार) को कन्सटीट्यूशन क्लब (डिप्टी चेयरमैन हॉल) में शाम चार बजे लेखिका श्रीमती अलका सिंह के काव्य संग्रह ’बिखरने से बचाया जाए’ का लोकार्पण प्रख्यात साहित्यकार एवं आलोचक डॊ. .नामवर सिंह द्वारा किया जाएगा. इस साहित्य समागम का आयोजन नया मीडिया मंच और प्रवक्ता.कॉम के संयुक्त तत्वाधान में किया जा रहा है. कार्यक्रम की अध्यक्षता डॊ. नामवर सिंह करेंगे तथा बतौर वक्ता साहित्यकार एवं सुप्रसिद्ध कवयित्री डॊ.अनामिका, श्री अमरनाथ अमर, कार्यक्रम निर्देशक दुरदर्शन, नई दिल्ली तथा वरिष्ठ पत्रकार एवं समीक्षक अनंत विजय होंगे. मंच संचालन माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल में सहायक प्राध्यापक डॊ. सौरभ मालवीय करेंगे. लेखिका अलका सिंह ने बताया कि कार्यक्रम में और भी कई लेखक, कवि और पत्रकार अपनी उपस्थिति दर्ज कराएंगे.
Wednesday, May 4, 2016
सदगुरु का सानिध्य
मैं कभी मेधावी छात्र नहीं रहा जबकि बारहवी तक विज्ञान संकाय का विद्यार्थी था फिर स्नातक हिन्दी साहित्य में, स्नातकोत्तर प्रसारण पत्रकारिता में और PhD भी मीडिया में ही पूर्ण की. उन दिनों उदंडता, कुतर्क और विवाद यह मेरे स्वभाव का अंग था. प्रायः किसी न किसी से बहसबाजी हो ही जाती और उसका अंत विवाद के साथ होता. इस कारण मेरी छवि ठीक नहीं बन रही थी. इसी बीच मुझे संघ कार्यालय पर रहने का अवसर मिला. यहां यह बताना चाहूँगा कि संघ कार्यालय अर्थात संघ के पूर्णकालिक प्रचारक का निवास (प्रचारक वह होता है, जो अपना पूरा जीवन संघ कार्य के लिए देता है) कार्यालय की दिनचर्या सुनिश्चित है. प्रातः जागरण मंत्र से प्रारम्भ होकर जलपान, भोजन, संध्या और रात्रि भोजन, विश्राम तक सब कुछ समयबद्ध रहता. अनुशासन और आध्यात्मिक वातावरण के कारण लगता की कार्यालय एक मन्दिर है.
कार्यालय पर रहते हुए मेरे श्रद्धा के केन्द्र में अनेक ऋषितुल्य प्रचारक हैं, जिनका जिक्र अभी और करूँगा. इसी क्रम में उस समय देवरिया के जिला प्रचारक श्री बालमुकुन्द जी से परिचय हुआ. बालमुकुंद जी इतिहास में स्नातकोत्तर, बीएड और PhD हैं. स्वभावतया मिलनसार, मृदुभाषी, सरल-सहज हैं, जो प्रचारक वृत्ति होती ही है. मैं अपने गाँव देवरिया जाता रहता था. इस कारण इनसे आत्मीयता बढ़ती गई. पहली यात्रा वैष्णव देवी 1999 में बालमुकुंद जी के साथ हुई. समय की गति बढ़ती रही और अपने जीवन की यात्रा होती रही. इनके साथ कुशीनगर, मऊ, आजमगढ़ आदि जिलों मे मोटरसाइकिल से खूब घूमा.
एक घटना का जिक्र करना चाहूँगा. बालमुकुंद जी बस्ती में विभाग प्रचारक थे. नगर के एक कार्यकर्ता के पुत्र का विवाह सम्पन्न हुआ. पुत्र भी स्वयंसेवक है. दोनों लोग कार्यालय आए और इस खुशी के अवसर पर भाई साहब को एक घड़ी दी. अगले दिन जब मैं वापस आने लगा, तो बालमुकुंद जी ने वह घड़ी मुझे दी. मैं हतप्रभ था. भाई साहब बोले "आप विश्विद्यालय में पढ़ते हैं, समय को समझें." इसी मंत्र ने मुझे स्वयं को और समय को समझने की शक्ति विकसित की. और आज भी मैं समझने का सार्थक प्रयास कर रहा हूँ.
ऐसे सदगुरु का आज आशीर्वाद भोपाल में प्राप्त है. माननीय डॉ.बालमुकुन्द जी वर्तमान में इतिहास संकलन योजना के राष्ट्रीय संगठन मंत्री हैं, केंद्र दिल्ली है.
साहित्य और समाज
डॊ. सौरभ मालवीय
साहित्य समाज का दर्पण है, समाज का प्रतिबिम्ब है, समाज का मार्गदर्शक है तथा समाज का लेखा-जोखा है. किसी भी राष्ट्र या सभ्यता की जानकारी उसके साहित्य से प्राप्त होती है. साहित्य लोकजीवन का अभिन्न अंग है. किसी भी काल के साहित्य से उस समय की परिस्थितियों, जनमानस के रहन-सहन, खान-पान व अन्य गतिविधियों का पता चलता है. समाज साहित्य को प्रभावित करता है और साहित्य समाज पर प्रभाव डालता है. दोनों एक सिक्के के दो पहलू हैं. साहित्य का समाज से वही संबंध है, जो संबंध आत्मा का शरीर से होता है. साहित्य समाज रूपी शरीर की आत्मा है. साहित्य अजर-अमर है. महान विद्वान योननागोची के अनुसार समाज नष्ट हो सकता है, राष्ट्र भी नष्ट हो सकता है, किन्तु साहित्य का नाश कभी नहीं हो सकता.
साहित्य संस्कृत के ’सहित’ शब्द से बना है. संस्कृत के विद्वानों के अनुसार साहित्य का अर्थ है- "हितेन सह सहित तस्य भवः” अर्थात कल्याणकारी भाव. कहा जा सकता है कि साहित्य लोककल्याण के लिए ही सृजित किया जाता है. साहित्य का उद्देश्य मनोरंजन करना मात्र नहीं है, अपितु इसका उद्देश्य समाज का मार्गदर्शन करना भी है. राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त के शब्दों में-
केवल मनोरंजन न कवि का कर्म होना चाहिए
उसमें उचित उपदेश का भी मर्म होना चाहिए
महान साहित्यकारों ने साहित्य को लेकर अपने विचार व्यक्त किए हैं. बीसवीं शताब्दी के हिन्दी के प्रमुख साहित्यकार आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने साहित्य को ‘जनता की चित्तवृत्ति का संचित प्रतिबिंब’ माना है. आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी ने साहित्य को ‘ज्ञानराशि का संचित कोश’ कहा है. पंडित बाल कृष्ण भट्ट साहित्य को ‘जन समूह के हृदय का विकास’ मानते हैं.
प्राचीन काल में भारतीय सभ्यता अति समृद्ध थी. हमारी सभ्यता इतनी उन्नत थी कि हम आज भी उस पर गर्व करते हैं. किसी भाषा के वाचिक और लिखित सामग्री को साहित्य कह सकते हैं. विश्व में प्राचीन वाचिक साहित्य आदिवासी भाषाओं में प्राप्त होता है. भारतीय संस्कृत साहित्य ऋग्वेद से प्रारंभ होता है. व्यास, वाल्मीकि जैसे पौराणिक ऋषियों ने महाभारत एवं रामायण जैसे महाकाव्यों की रचना की. भास, कालिदास एवं अन्य कवियों ने संस्कृत में नाटक लिखे, साहित्य की अमूल्य धरोहर है. भक्त साहित्य में अवधी में गोस्वामी तुलसीदास, बृज भाषा में सूरदास, मारवाड़ी में मीरा बाई, खड़ीबोली में कबीर, रसखान, मैथिली में विद्यापति आदि प्रमुख हैं. जिस राष्ट्र और समाज का साहित्य जितना अधिक समृद्ध होगा, वह राष्ट्र और समाज भी उतना ही समृद्ध होगा. किसी राष्ट्र और समाज की स्थिति जाननी हो, तो उसका साहित्य देखना चाहिए.
मानव सभ्यता के विकास में साहित्य का महत्वपूर्ण योगदान रहा है. विचारों ने साहित्य को जन्म दिया तथा साहित्य ने मानव की विचारधारा को गतिशीलता प्रदान की, उसे सभ्य बनाने का कार्य किया. मानव की विचारधारा में परिवर्तन लाने का कार्य साहित्य द्वारा ही किया जाता है. इतिहास साक्षी है कि किसी भी राष्ट्र या समाज में आज तक जितने भी परिवर्तन आए, वे सब साहित्य के माध्यम से ही आए. साहित्यकार समाज में फैली कुरीतियों, विसंगतियों, विकॄतियों, अभावों, विसमताओं, असमानताओं आदि के बारे में लिखता है, इनके प्रति जनमानस को जागरूक करने का कार्य करता है. साहित्य जनहित के लिए होता है. जब सामाजिक जीवन में नैतिक मूल्यों का पतन होने लगता है, तो साहित्य जनमानस मार्गदर्शन करता है.
मानव को जन्म से लेकर मृत्यु तक जीवन के हर क्षेत्र में समाज की आवश्यकता पड़ती है. मानव समाज का एक अभिन्न अंग है. जीवन में मानव के साथ क्या घटित होता है, उसे साहित्यकार शब्दों में रचकर साहित्य की रचना करता है, अर्थात साहित्यकार जो देखता है, अनुभव करता है, चिंतन करता है, विश्लेषण करता है, उसे लिख देता है. साहित्य सृजन के लिए विषयवस्तु समाज के ही विभिन्न पक्षों से ली जाती है. साहित्यकार साहित्य की रचना करते समय अपने विचारों और कल्पना को भी सम्मिलित करता है.
वर्तमान में मीडिया समाज के लिए मज़बूत कड़ी साबित हो रहा है. समाचार-पत्रों की प्रासंगिकता सदैव रही है और भविष्य में भी रहेगी. मीडिया में परिवर्तन युगानुकूल है, जो स्वाभाविक है, लेकिन भाषा की दृष्टि से समाचार-पत्रों में गिरावट देखने को मिल रही है. इसका बड़ा कारण यही लगता है कि आज के परिवेश में समाचार-पत्रों से साहित्य लुप्त हो रहा है, जबकि साहित्य को समृद्ध करने में समाचार-पत्रों की महती भूमिका रही है, परंतु आज समाचार-पत्रों ने ही स्वयं को साहित्य से दूर कर लिया है, जो अच्छा संकेत नहीं है. आज आवश्यकता है कि समाचार-पत्रों में साहित्य का समावेश हो और वे अपनी परंपरा को समृद्ध बनाएं. वास्तव में पहले के संपादक समाचार-पत्र को साहित्य से दूर नहीं मानते थे, बल्कि त्वरित साहित्य का दर्जा देते थे. अब न उस तरह के संपादक रहे, न समाचार-पत्रों में साहित्य के लिए स्थान. साहित्य मात्र साप्ताहिक छपने वाले सप्लीमेंट्स में सिमट गया है. समाचार-पत्रों से साहित्य के लुप्त होने का एक बड़ा कारण यह भी है कि अब समाचार-पत्रों में संपादक का दायित्व ऐसे लोग निभा रहे हैं, जिनका साहित्य से कभी कोई सरोकार नहीं रहा. समाचार-पत्रों के मालिकों को ऐसे संपादक चाहिएं, जो उन्हें मोटी धनराशि कमाकर दे सकें. समाचार-पत्रों को अधिक से अधिक विज्ञापन दिला सकें, राजनीतिक गलियारे में उनकी पहुंच बढ़ सके.
इस सबके बीच कुछ समाचार-पत्र ऐसे भी हैं, जो साहित्य को संजोए हुए हैं. साहित्य की अनेक पत्रिकाएं भी प्रकाशित हो रही हैं, परंतु उनके पास पर्याप्त संसाधन न होने के कारण उन्हें आर्थिक समस्याओं का सामना करना पड़ता है. साहित्य ने सदैव राष्ट्र और समाज को नई दिशा देने का कार्य किया है. साहित्य जनमानस को सकारात्मक सोच तथा लोककल्याण के कार्यों के लिए प्रेरणा देने का कार्य करता है. साहित्य के विकास की कहानी मानव सभ्यता के विकास की गाथा है, इसलिए यह अति आवश्यक है कि साहित्य लेखन निरंतर जारी रहना चाहिए, अन्यथा सभ्यता का विकास अवरुद्ध हो जाएगा.
Tuesday, May 3, 2016
Monday, May 2, 2016
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