Wednesday, July 1, 2026

पुस्तकों जैसा कोई साथी नहीं है

   


महाराष्ट्र के नासिक में 17 मार्च, 1991 को गढ़ी-पाड़वा-चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को आयोजित सार्वजनिक वाचनालय के स्वर्ण जयंती महोत्सव को संबोधित करते हुए श्री अटल बिहारी वाजपेयी ने पुस्तकालयों और वाचनालयों के महत्व पर प्रकाश डाला. अपने संबोधन में उन्होंने कहा- गुढ़ीपाड़वा के पावन पर्व पर आयोजित यह सांस्कृतिक समारोह, अब अपनी समाप्ति की ओर बढ़ रहा है. आपने इस वाचनालय के डेढ़ सौ वर्ष के संघर्षपूर्ण गौरवशाली इतिहास का वर्णन सुना. भविष्य की योजना भी आपके सामने आ गई. जिन विशिष्ट व्यक्तियों का सम्मान होना था, वह सम्मान भी कर दिया गया. मुझे भी केवल मंगल कलश नहीं दिया गया, साथ-साथ धन्यवाद भी दिया गया. अब तो एक ही कार्यक्रम बचा है कि सभा समाप्त कर दी जाए और हम लोग अपने-अपने घर जाएं.

लेकिन मेरे जैसे एक राजनीतिक प्राणी के लिए बोलने के लोभ का संवरण करना, जरा कठिन काम है. और श्रोता आप जैसे हों तो और भी कठिन. मैं अपना सौभाग्य समझता हूं कि मैं इस समारोह में शामिल हो सका. यह वाचनालय डेढ़ सौ वर्षों का है, इसमें स्वातंत्र्यवीर सावरकर, डॊ. आंबेडकर जैसे मनीषी आ चुके हैं, तो मैंने भी आना स्वीकार कर लिया. तब मुझे पता नहीं था कि दिल्ली का राजनीतिक मौसम अचानक इतना बदल जाएगा. बिना बादलों के भी बरखा होती है कभी-कभी. कभी-कभी तो अनवरत वज्रपात भी होता है. बिना बादलों के बिजली गिर जाती है. राजनीतिक अस्थिरता जरूर थी दिल्ली की हवा में, लेकिन वह आंधी बनकर दूसरी बार दिल्ली के तख्त को उखाड़ फेंकेगी, इसकी निकट भविष्य में आशंका नहीं थी. नाशिक के हमारे मित्रों को अवश्य चिंता रही होगी, कि मैं आ पाऊंगा या नहीं. भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॊ. जोशी जी ने चुनाव की रणनीति पर विचार करने के लिए राष्ट्रीय कार्य समिति की बैठक बुलाई है. आज मैं उस बैठक में भाग नहीं ले सका. कारण स्पष्ट है. मैं राजनीति में जरूर हूं, लेकिन राजनीति मेरा पहला आकर्षण नहीं है. राजनीति ने मुझे प्रतिष्ठा दी है, पद दिया है, संसद की सदस्यता दी है, जनता जनार्दन की सेवा का अवसर दिया है, लेकिन राजनीति एक ऐसा खेल है, जो व्यक्तियों को खाली करता है. अभ्यंतर में एक रिक्तता रहती है. यदि संतोष के क्षण आते हैं,  तो असंतोष के प्रहर भी आते हैं. एक संवेदनशील व्यक्ति के लिए आज की राजनीति असहनीय बनती जा रही है. पिछले दिनों दिल्ली में एक परिचर्चा का आयोजन किया गया था, जिसका विषय था ’राजनीति का अपराधीकरण.’ उस परिचर्चा में यह कहा गया कि केवल राजनीति का अपराधीकरण नहीं हुआ है. अपराध का भी राजनीतिकरण हुआ है. उसमें मैंने एक बात कही थी और उस बात को मैं यहां दोहराना चाहता हूं- सारी प्रामाणिकता के साथ- कि राजनीति का अपराधीकरण और अपराध का राजनीतिकरण सभी सीमाओं को लांघकर भारत की राजनीति अपने में एक अपराध बनती जा रही है. आप पूछ सकते हैं कि अगर यह अपराध बनती जा रही है, तो आप इस अपराध में क्यों संलग्न हैं ? क्योंकि हृदय के कोने में कहीं न कहीं यह आशा विद्यमान है कि इस आदर्शविहीन-सिद्धांतविहीन राजनीति में मूल्यों की प्रतिष्ठा जरूर हो सकेगी. 

जब मैं कॊलेज का विद्यार्थी था, तो पत्रकार बनना चाहता. वाचनालय से मेरा गहरा संबंध है. ग्वालियर में इसी तरह का एक वाचनालय है- ’सार्वजनिक पुस्तकालय और वाचनालय.’ जब मैं समारोह के लिए आया और द्वार पर उतरा तो मैंने देखा कि केवल वाचनालय है- पुस्तकालय नहीं है. तो मैंने अपने मित्र से पूछा कि केवल वाचनालय है कि पुस्तकालय भी है ? तो उन्होंने मुझे बताया कि पुस्तकालय भी है- वाचनालय भी है. मुझे घर में पढ़ने की सुविधा नहीं थी और कॊलेज का मेरा पठन-पाठन पुस्तकालय में हुआ है. वहां उस कोर्स की किताबें उपलब्ध हुआ करती थीं, जिन्हें कुछ छात्र-छात्राएं खरीद नहीं सकते थे. पढ़ने के लिए एकांत भी था. संदर्भ की पुस्तकें भी थीं. लेकिन आपके इस वाचनालय ने तो सचमुच में एक इतिहास बना दिया है. डेढ़ सौ साल ! ये इतिहास की एक ऐसी घटना है, जो केवल अतीत को समेटे हुए नहीं है, जो वर्तमान के लिए भूषणभूत है और हमारे लिए भविष्य की दिशा का भी संकेत करती है. 

किसी देश में साहित्य का- संस्कृति का स्थान क्या है, इसे परखने के लिए उस देश में कितने पुस्तकालय हैं- वाचनालय हैं, वे किस तरह से चलते हैं, इनको देखना पर्याप्त होना चाहिए. नई बस्तियां बस रही हैं, नये भवन बन रहे हैं, गृहनिर्माण का एक विशाल राष्ट्रीय कार्यक्रम चल रहा है. सरकार चिंता करती है- वहां डाकखाना होना चाहिए, सरकार चिंता करती है- वहां पुलिस स्टेशन होना चाहिए. ये चिंता नहीं होती कि पुस्तकालय भी चाहिए- वाचनालय भी होना चाहिए. मैं डॊ. आंबेडकर का अभिप्राय पढ़ रहा था, उन्होंने उस समय शिकायत की थी कि इस वाचनालय को जो सरकारी सहायता मिलती है, वह पर्याप्त नहीं है. वह शिकायत अभी भी बाकी है. ये तो सभासदों का योगदान है और संचालकों की प्रबंधकुशलता है तथा वाचनालय के प्रति उनकी निष्ठा है कि यह वाचनालय उत्तरोत्तर प्रगति कर रहा है. लेकिन शासन को इसमें अधिक रुचि लेनी चाहिए. पुस्तकें इतनी महंगी हो गई हैं. उनकी कीमतें इतनी बढ़ती जा रही हैं कि सामान्य आय वाला व्यक्ति इच्छा होते हुए भी बड़ी संख्या में पुस्तकें नहीं खरीद सकता.

वैसे खरीद कर पढ़ने की हमारी आदत भी कम है. हम उधार लेकर ज्यादा पढ़ते हैं. वर्ष में एक पुस्तक खरीदने का तो सबको संकल्प करना चाहिए. कम से कम एक- अब एक से तो कम नहीं हो सकती, आधी किताब भी आप खरीद नहीं सकते. हम घर का सामान खरीदते हैं, घर को सजाने के लिए वस्तुएं लाते हैं. क्या घर में कुछ पुस्तकें नहीं होनी चाहिए ? पुस्तकों जैसा कोई साथी नहीं है- कोई मित्र नहीं है. पुस्तकें जड़ नहीं होतीं- चेतन होती हैं. पुस्तकें बोलती हैं, पुस्तकें गाती हैं, पुस्तकें पाठक को गुदगुदाती हैं. पुस्तकों में नवरस है. पुस्तकों में षडरिपु है. जब चाहें, आप तब उस रस का पान कर सकते हैं. आप जब चाहें, उस लोक में पहुंच सकते हैं. इसके लिए केवल उस लोक से संबंधित पुस्तक खोलने की आवश्यकता है और पुस्तकें ऐसी मित्र हैं, जो बोर नहीं करती हैं, क्योंकि आप जब चाहें उनको बंद कर सकते हैं- मित्र का मुंह बंद करना मुश्किल है. वे साथ देती हैं, साहस देते हैं. धरती का- आसमान का- अंतरिक्ष का- भूत का- वर्तमान का, भविष्य का परिचय देती हैं.  मगर पुस्तकों से मित्रता करना आना चाहिए. कठिनाई यह होती है कि जब छात्र-छात्राएं पढ़ते हैं, तो उन पर पाठ्य पुस्तकों का ऐसा भार होता है कि पुस्तकों के बारे में उनमें अरुचि पैदा हो जाती है. वैसे पुराने जमाने की तुलना में आजकल के बच्चे- आज के छात्र-छात्राएं बहुत पढ़ रहे हैं. उन्हें बहुत ज्यादा जानकारी है, क्योंकि विश्व में जो परिवर्तन हो रहे हैं, वह सूचना को, ज्ञान को इतना निकट ला रहे हैं- जिसकी पहले कभी कल्पना नहीं की गई थी. अब तो पुस्तकों के साथ कैसेट चल गए हैं. आवाज को सुरक्षित रखा जा सकता है. पहले ये सुविधाएं उपलब्ध नहीं थीं. हम लोकमान्य तिलक का भाषण उनकी आवाज में सुनना चाहें, पर मुश्किल है. अभी दिल्ली में केंद्रीय समिति बनी है- लाला लाजपतराय के जीवन के संबंध में एक आयोजन सारे देश में कर रही है, जिसमें बाल और पाल का भी समावेश है. उस समय लाऊड स्पीकर नहीं थे, मगर हमारे नेता- राष्ट्रीय नेता हजारों की भीड़ में बोलते थे. कैसी भाषा थी, कैसा स्वर था, देश को अनुप्राणित करने वाली कौन सी वाणी थी, इसका अब रिकॊर्ड नहीं है. तब ये सुविधा नहीं थी- आज ये सुविधा है. ये काम ग्रंथालय कर सकते हैं, लेकिन उनके पास साधन चाहिए, पैसे चाहिए. इस बारे में शासन का भी दायित्व बनता है. पुरानी किताबों को दीमक खा रही है, मिट्टी निगल रही है. कांच की या लकड़ी की अलमारियां उन्हें सुरक्षित नहीं रख सकतीं. उनकी माइक्रोफिल्म बनाई जा सकती है. मैंने इसकी चर्चा की थी, अपने मित्रों से. अर्थाभाव फिर से एक बड़ी बाधा है.  हमें इस बात के लिए अनेक पीढ़ियों तक पश्चाताप करना होगा कि स्वाधीनता के बाद हमने विद्याभ्यास को अनिवार्य नहीं किया, प्राथमिक शिक्षण को अनिवार्य नहीं किया, हमने देश की निरक्षरता का निर्मूलन करने के लिए राष्ट्रीय अभियान नहीं चलाया. हम सरस्वती की पूजा करते हैं, हर समारोह के पहले सरस्वती की वंदना होती है, लेकिन इस अभागे देश में जितने निरक्षर हैं, उतने शायद संसार के किसी देश में नहीं होंगे. कहीं इसका कारण ये तो नहीं है कि प्रयाग में गंगा-यमुना तो है, लेकिन सरस्वती लुप्त हो गई है. क्या हमारे देश को प्रयाग का कुंभ बना दिया है ?

अंग्रेजी राज आने से पहले इस देश में शिक्षा का व्यापक प्रसार था. विद्यालय थे, पाठशालाएं थीं, गुरुकुल थे और उस समय के आंकड़ें उपलब्ध हैं. शिक्षित व्यक्तियों का प्रतिशत बहुत ज्यादा है था. पर योजनाबद्ध तरीके से लोगों को शिक्षण से वंचित किया गया. हमारा संविधान बना और डॊ. आंबेडकर हमारे संविधान के शिल्पी थे. मैं संविधान को नई स्मृति कहता हूं. इस देश में स्मृतियां बनती रही हैं, मगर बदलती रही हैं. काल के अनुसार, समाज में परिवर्तन हुए. ये ठीक है कि उन परिवर्तनों पर कानून की मुहर बाद में लगी, लेकिन उन परिवर्तनों को समाज की मान्यता थी. स्वाधीनता के बाद हमने इस काल के लिए स्मृति बनाई है. उसमें हमने कहा था कि पंद्रह साल में प्राथमिक शिक्षा अनिवार्य कर देंगे, तो चालीस साल से ऊपर बीत गए. क्या ये प्राथमिकता का काम नहीं है ? क्या ज्ञान के बिना, विद्या के बिना, साक्षरता के बिना प्रगति हो सकती है ? अगर विकास कार्य में लोगों को जुटाना है, तो क्या ये आवश्यक नहीं है कि उन्हें उस विकास के बारे में समझाया जाए ? क्यूबा जैसा देश अगर निन्यानवे फीसद साक्षरता प्राप्त कर सकता है, तो हम क्यों नहीं प्राप्त कर सकते ? इसमें भी, राजनीति बाधक हो जाती है. 

एक तो हमारी प्राथमिकताएं गलत हैं. जिसे अंग्रेजी में कहते हैं Investment in Men. केवल कारखानों में नहीं, केवल उद्योगों में नहीं, केवल भौतिक विकास के साधनों में नहीं, बल्कि मनुष्य में पूंजी लगाना आवश्यक है. इसका प्रारंभ तो साक्षरता से होगा, शिक्षा से होगा. मैं ’शिक्षा’ कह रहा हूं. मुझे मालूम है मराठी में ’शिक्षा’ का अर्थ अलग होता है. शिक्षा माने दंड. ’भला माहीत आहे. मी ग्वाल्हेरचा आहे’. मैंने कुसुमाग्र्ज जी की एक मराठी कविता का बहुत साल पहले हिंदी में अनुवाद किया था. मैं शिक्षण की बात कर रहा था. अर्थशास्त्र के कारण कितने बच्चे स्कूल में प्रवेश करके बीच में छोड़ जाते हैं. इसे Drop Out कहते हैं.  अब ये ठीक है कि विद्या को जीविका के साथ जोड़ना पड़ेगा, जीवन के साथ जोड़ना पड़ेगा. लेकिन बच्चों की शिक्षा का प्रबंध करना पड़ेगा. ये हम नहीं कर पाए. ये बात अलग है कि शिक्षा के अभाव में भारत का नागरिक जैसे-तैसे अपना जीवन जीने में सफल हो रहा है, क्योंकि उसे विरासत में ऐसी संस्कृति मिली है, उसे उत्तराधिकार में ऐसी पूंजी मिली है, जो संकट में उसे साहस देती है, जो भविष्य से लड़ने का सामर्थ्य देती है. कभी-कभी देश की वर्तमान दशा देखकर दुख होता है, उस दुख में से निराशा पैदा नहीं होनी चाहिए. अगर अच्छे दिन नहीं रहे, तो बुरे दिन भी नहीं रहेंगे.

आज गढ़ी पाड़वा है- नया साल है. हमें कामना करनी चाहिए कि नया साल बीते हुए पुराने साल से अच्छा होगा. राजनीतिक अस्थिरता का इलाज लोगों के पास है. लोकतंत्र के कारण जो समस्याएं पैदा होती हैं, उनका निराकरण लोकतंत्र से ही हो सकता है- लोकतंत्र को संकुचित करने से नहीं, हम धरती पर गिरते हैं, तो धरती को ही हाथ लगाकर उठते हैं. कोई कहेगा कि नहीं-नहीं मैं धरती को हाथ नहीं लगाता- मुझे उठाओ-मुझे उठाओ. कोई गोदी में उठा सकता है, मगर पैरों पर खड़ा नहीं कर सकता. और अगर व्यक्ति पैरों पर खड़ा हो भी जाएगा- दूसरों के सहारे, तो वह फिर गिरेगा. हमें गिरकर उठना सीखना है. और अगर फिर गिरे, तो फिर उठना है. हजारों साल का इतिहास उत्थान और पतन की हमारी कहानी है, मगर कभी हमने हिम्मत नहीं हारी और आज तो हिम्मत हारने का कोई कारण नहीं है. इस समय जो संकट है, वह हल हो जाएगा. संकट गंभीर है, इसमें कोई संदेह नहीं. और उसके लिए कोई प्रणाली दोषी नहीं है. प्रणाली में कमियां हो सकती हैं. मनुष्य प्रणाली को बनाता है. कोई व्यवस्था पूर्ण नहीं कही जा सकती. संसदीय प्रणाली में भी अपनी कमियां हैं- खामियां हैं. मगर ये सोचने का कारण नहीं है कि अगर संसदीय प्रणाली छोड़कर हमने राष्ट्रपति की प्रणाली अपना ली, तो सारी समस्याएं हल हो जाएंगी. राष्ट्रपति प्रणाली अपनाने पर विचार हो सकता है- होना चाहिए. 

लेकिन उसमें भी मूल में जाकर इस बात पर विचार होना चाहिए कि सार्वजनिक जीवन में हमारे आचार और व्यवहार का मानदंड क्या हो ? हम कुछ मूल्यों के साथ बंधे हुए हों या न हों. चाहे इस देश के प्रति, इस देश में निवास करने वाले बयासी करोड़ लोगों के प्रति हमारी कोई निष्ठा हो या न हो, राजनीति सत्ता साधन हो या न हो, राजनीति साधन हो या साध्य हो. क्या राजनीति सत्ता के लिए है ? सत्ता किसलिए ? पैसा इकट्ठा करने के लिए. देश-विदेश में जिसका पता न लगे. या कालपात्र में अपना नाम लिखवाने के लिए? वित्तेषण होती है, लोकेषण होती है. मैं भी राज्यसभा में बोलता हूं, तो दूसरे दिन अखबार देखता हूं- मेरा कुछ आया कि नहीं आया. और टेलीविजन अगर किसी को छोड़ दे, तो मेंबर खड़े होकर शिकायत करते हैं- अध्यक्ष महोदय, मैंने कल भाषण दिया था, मगर मेरा नाम नहीं आया. अब ये बात अलग है कि टेलीविजन को नाम देना चाहिए-रेडियो को नामोल्लेख तो करना चाहिए. नामोच्चार ही सही. मगर इसके लिए गलत काम करना ? क्या हम सबके जीवन में कोई ’लक्ष्मण रेखा’ नहीं ? केवल राजनेताओं के जीवन में नहीं, बल्कि साहित्यकार के जीवन में, पत्रकार के जीवन में, उद्योगपति के जीवन में. कहीं न कहीं लक्ष्मण रेखा होनी चाहिए कि मैं यहां तक जाऊंगा- इसके आगे नहीं. आज लक्ष्मण रेखा मिट रही है. इसीलिए लोकतंत्र की सीता का आतंकवाद-अराजकतावाद कहीं अपहरण करके न ले जाएं, यह आशंका पैदा हो गई है- ये भय पैदा हो गया है. हमें इसे रोकना है. जब सब कुछ जाता हुआ दिखाई देता है, तो बीज को बचाने की कोशिश होनी चाहिए.  प्रलय का काल आया और सारी सृष्टि के डूबने का प्रसंग पैदा हो गया, तो मनु ने अपनी छोटी सी नौका में सृष्टि के बीजों की रक्षा करने का प्रयत्न किया और उस प्रयत्न में वे सफल हुए. और एक बार बीजों की रक्षा हो गई, तो पूरी सृष्टि फिर से खड़ी हो सकती है, इसमें कोई संदेह नहीं. मूल्यों के बीज को आदर्शों के दीपक से जलाए रखना चाहिए. यही ठीक है. देखिए आज हमने दिया जलाया था- बुझ गया. नासिक की हवा तेज है. "है अंधेरी रात, पर दीपक जलाना कब मना है ?" रात तो आएगी. और अगर वह पूर्णिमा की रात है, तब भी प्रकाश की आवश्यकता होगी. लेकिन दिया जलाने के लिए किसी को जलना पड़ेगा. अंतरतम का स्नेह निचोड़ना पड़ेगा. रात भर जलने का प्रण लेना पड़ेगा. और ऐसे छोटे-छोटे दिये असंख्य चाहिए. किसी दूसरे का दिया बनने की जरूरत नहीं है- ’आत्मदीपो भव:’- अपना दिया आप बनो. अंधेरे में रास्ता निकालना है. 

वाचनालय जैसी संस्थाएं चाहिए. इनका अधिकारिक उपयोग हो, ऐसी परिस्थिति चाहिए. ये सांस्कृतिक जीवन का केंद्र बन सकें- इसके लिए साधन चाहिए, ऐसी व्यवस्था चाहिए. हमने देश के सांस्कृतिक पक्ष की उपेक्षा की है. लेकिन एक बात निश्चित है- जब तक राजनीति ठीक नहीं होगी, राजनीति शुद्ध नहीं होगी- और क्षेत्रों के अभाव दूर नहीं होंगे, इसे ठीक करना मतदाताओं के हाथ में है. उसका अवसर मिलेगा. मैं उसकी चर्चा करना नहीं चाहता. कार्यक्रम के प्रारंभ में मेरी एक कविता पढ़ी गई थी, बल्कि गायी गई थी. पहले तो मुझे लगा कि- ये मेरी कविता नहीं है. फिर लगा कि है तो मेरी ही, पर इसमें कुछ जोड़ दिया गया है- संशोधन कर दिया गया है. परिवर्तित संस्करण है मेरी कविता का. मैं इस कार्यक्रम में लंबा भाषण नहीं देना चाहता, इसलिए मैं आपको अपनी कुछ कविताएं सुनाना चाहता हूं. मेरी हिंदी कविताएं हैं- आप को कठिनाई जरूर होगी और में कुसुमग्रज जी का मुकाबला नहीं कर सकता. मैं कविता लिखता था, लेकिन राजनीति में आकर काव्य की सारी धारा सूख गई है. कभी-कभी उससे लौटने की कोशिश करता हूं.

परिस्थिति और मन:स्थिति- तीन कविताएं छोटी-छोटी. शायद आप पसंद करेंगे. मैं समझाने के लिए कहना चाहूंगा कि मान लीजिए- 1977 में प्रयोग हुआ था- राजनीतिक प्रयोग. जनता पार्टी टूट गई. हमारा दिल टूट गया. तब कवि की प्रतिक्रिया है. सचमुच में जनता पार्टी को लेकर तो नहीं है, मगर परिस्थिति को लेकर जरूर है.

गीत नहीं गाता हूं
गीत नहीं गाता हूं
बेनकाब चेहरे हैं
दाग बड़े गहरे हैं

टूटता तिलिस्म आज
सच से भय खाता हूं
गीत नहीं गाता हूं
गीत नहीं गाता हूं

बेनकाब चेहरे हैं
दाग बड़े गहरे हैं
टूटता तिलिस्म
तिलिस्म माने जादू
टूटता तिलिस्म
आज सच में भय खाता हूं
गीत नहीं गाता हूं.

लगी कुछ ऐसी नजर
बिखरा शीशे सा शहर
लगी कुछ ऐसी नजर
बिखरा शीशे सा शहर
अपनों के मेले में
मीत नहीं गाता हूं

गीत नहीं गाता हूं
अपनों का मेला है, मगर मित्र कोई नहीं है
अपनों के मेले में
मीत नहीं गाता हूं

अब इसके अंत में एक कल्पना है- चंद्रग्रहण की, विश्वासघात की- पीठ में छुरी सा चांद. जब पीठ में छुरा घोंपा जाता है, तो वह छुरा टेढ़े चंद्रमा जैसा लगता है.

पीठ में छुरी सा चांद
राहु गया रेखा फांद

चंद्रग्रहण पूर्णिमा को लगता है- द्वितीय को नहीं. मगर लग गया चंद्रग्रहण-

पीठ में छुरी सा चांद
राहु गया रेखा फांद
मुक्ति के क्षणों में
बार-बार बंध जाता हूं
गीत नहीं गाता हूं

फिर परिस्थिति बदली, तो मन:स्थिति भी बदली. आपको समझाने के लिए कह दूं- मान लीजिए भारतीय जनता पार्टी बन गई, जनता पार्टी टूटने के बाद भारतीय जनता पार्टी बन गई, तो कवि ने लिखा-

गीत नया गाता हूं
गीत नया गाता हूं
टूटे हुए तारों से, फूटे वासंती स्वर
पत्थर की छाती में उग आया नवअंकुर
झरे सब पीले पात
कोयल की कुहुक रात
प्राची में अरुणिमा की, रेख देख पाता हूं
गीत नया गाता हूं, गीत नया गाता हूं

इसको फिर से सुनिए-
गीत नया गाता हूं
गीत नया गाता हूं
टूटे हुए तारों से, फूटे वासंती स्वर
पत्थर की छाती में उग आया नवअंकुर
झरे सब पीले पात
कोयल की कुहुक रात
प्राची में अरुणिमा की, रेख देख पाता हूं
गीत नया गाता हूं, गीत नया गाता हूं

इसका दूसरा पद है-
टूटे हुए सपनों की सुने कौन सिसकी ? व्यक्ति की सिसकी सुनाई देती है- बल्कि जब रोता है, मगर जब सपना टूटता है, तो कितने सपने टूटे हैं ?

टूटे हुए सपनों की सुने कौन सिसकी ?
अंतर को चीर व्यथा, पलकों पर ठिठकी
हार नहीं मानूंगा
रार नहीं ठानूंगा
काल के कपाल पर लिखता-मिटाता हूं
गीत नया गाता हूं- गीत नया गाता हूं

अब इसकी तीसरी कड़ी और है. मैंने कश्मीर में लिखी दो साल पहले, तब पता नहीं था- कश्मीर का नंदनवन इस तरह से जल जाएगा. लेकिन शायद इसमें उसकी छाया है-

न मैं चुप हूं न गाता हूं
न मैं चुप हूं न गाता हूं
पहला था कि गीत नहीं गाता हूं और अब न मैं चुप हूं न गाता हूं.

सवेरा है, मगर पूरब दिशा में
घिर रहे बादल
सवेरा है, मगर पूरब दिशा में
घिर रहे बादल

रूई से धुंधलके में
मील के पत्थर पड़े घायल
ठिठके पांव
ओझल गांव
जड़ता है न गतिमयता

रूई से धुंधलके में
मील के पत्थर पड़े घायल
ठिठके पांव
ओझल गांव
जड़ता है न गतिमयता

स्वयं को दूसरों की दृष्टि से
मैं देख पाता हूं
न मैं चुप हूं न गाता हूं


कश्मीर की घाटी में चिनार का पेड़ होता है और चीड़ का भी पेड़ होता है. जब बर्फ गिरती है, तो चिनार में जैसे आग लग जाती है- चिनार झुलस जाता है. मगर चीड़ खड़ा रहता है. इसको मैंने चित्रित करने की कोशिश की है-
समय की सर्द सांसों ने
चिनारों को झुलसा डाला
समय की सर्द सांसों ने
चिनारों को झुलसा डाला

मगर हिमपात को देती
चुनौती एक दुर्ममाला

बिखरे नीड़
विहंसे चीड़
आंसू हैं न मुस्कानें
हिमानी झील के तट पर
अकेला गुनगुनाता हूं
न मैं चुप हूं न गाता हूं

मित्रो ! मैं आभारी हूं इस समारोह के संयोजकों का, जिन्होंने मुझे यहां उपस्थित होने का और स्वर्ण महोत्सव में भाग लेने का अवसर दिया. मैं आपका भी अनुगृहित हूं कि आपने बिना बीच में ताली बजाय मुझे सुना. मैंने इस अवसर पर प्रसंग के अनुकूल कुछ कहने का प्रयत्न किया है. अगर आप राजनीति में रुचि रखते हैं, तो जो रात को सभा है, उसमें आ सकते हैं. 
-डॉ. सौरभ मालवीय

(पुस्तक- 'राष्ट्रवादी पत्रकारिता के शिखर पुरुष अटल बिहारी वाजपेयी' से)

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