Saturday, April 4, 2026

भोजन मंत्र





ब्रह्मार्पणं ब्रह्म हविः
ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणा हुतम्।
ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं
ब्रह्मकर्मसमाधिना॥
ॐ सह नाववतु।
सह नौ भुनक्तु।
सह वीर्यं करवावहै।
तेजस्विनावधीतमस्तु मा विद्विषावहै॥
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥
पहला श्लोक भगवद्गीता से है, और दूसरा मंत्र उपनिषदों का शांति मंत्र है।
यह पूरा मंत्र भोजन को ईश्वर को अर्पित करने और मिलकर, प्रेमपूर्वक भोजन करने की भावना व्यक्त करता है।
भोजन मंत्र केवल एक औपचारिकता नहीं, बल्कि उसकी सामूहिक जीवन पद्धति का सशक्त प्रतीक है। इसमें सहजता, सादगी और समरसता का गहरा भाव निहित है। भोजन के समय सभी स्वयंसेवक एक साथ बैठकर, बिना किसी भेदभाव के, समानता और एकात्मता का अनुभव करते हैं। यह परंपरा हमें न केवल अनुशासन सिखाती है, बल्कि सामाजिक समता और पारस्परिक आत्मीयता का भी संस्कार प्रदान करती है।

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