वन्दे मातरम् को भारत के स्वाधीनता संग्राम में एक प्रेरणा-स्रोत माना गया। यह केवल एक गीत नहीं, बल्कि देशभक्ति की वह शक्ति थी जिसने लाखों लोगों में स्वतंत्रता का साहस जगाया।
Saturday, November 29, 2025
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वन्दे मातरम् को भारत के स्वाधीनता संग्राम में एक प्रेरणा-स्रोत माना गया। यह केवल एक गीत नहीं, बल्कि देशभक्ति की वह शक्ति थी जिसने लाखों लोगों में स्वतंत्रता का साहस जगाया।
शोध विषय की अखिल भारतीय बैठक
शोध विषय की अखिल भारतीय बैठक - लखनऊ
अखिल भारतीय विद्या भारती शिक्षा संस्थान
मा. गोविन्द जी महंत, राष्ट्रीय संगठन मंत्री
डॉ. नंदिनी जी, राष्ट्रीय शोध प्रमुख
श्री हेमचंद्र जी, क्षेत्रीय संगठन मंत्री
“भारतीय ज्ञान परंपरा, आधुनिक शोध और राष्ट्रीय पुनर्निर्माण के समन्वय से एक ऐसा शिक्षा मॉडल प्रस्तुत करना जो न केवल ज्ञान का संवाहक हो, बल्कि चरित्र, संस्कृति और राष्ट्र निर्माण का आधार भी बने।”
यह दृष्टि संस्थान को केवल एक शैक्षणिक केंद्र नहीं बल्कि राष्ट्रीय चेतना, सांस्कृतिक पुनर्जागरण और वैश्विक स्तर पर भारतीयता के प्रचार का माध्यम बनाती है।
2. मिशन (Mission)
• भारतीय ज्ञान प्रणालियों (Indian Knowledge Systems – IKS) का संरक्षण, शोध, और समकालीन शिक्षा में एकीकरण।
• विद्यालयी और उच्च शिक्षा में मूल्य-आधारित, योग्यता-आधारित और प्रौद्योगिकी-सक्षम शोध मॉडल विकसित करना।
• शोध को नीति निर्माण, सामाजिक विकास, और शिक्षा सुधार से सीधे जोड़ना।
• विद्या भारती के शिक्षकों, शोधार्थियों और छात्रों को आधुनिक एवं पारंपरिक शोध पद्धतियों में प्रशिक्षित करना।
• भारत की सांस्कृतिक, शैक्षिक और सामाजिक विरासत को वैश्विक स्तर पर प्रतिष्ठित करना।
3. प्रमुख उद्देश्य (Core Objectives)
1. भारतीय दर्शन, वेद, उपनिषद, आयुर्वेद, गणित, खगोल विज्ञान और लोककला जैसे विषयों पर प्रमाण-आधारित शोध।
2. राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के विभिन्न प्रावधानों के मैदान-स्तरीय प्रयोग और प्रभाव अध्ययन।
3. स्थानीय आवश्यकता एवं मूल्यों के अनुरूप पाठ्यचर्या, शिक्षण सामग्री और मूल्यांकन प्रणाली का विकास।
4. एआई, डिजिटल आर्काइविंग, और ई-लर्निंग जैसी आधुनिक शोध एवं शिक्षण तकनीकों का अपनाना।
5. शोध के निष्कर्षों को सरकारी नीतियों, सामाजिक सुधार कार्यक्रमों और विद्यालयी शिक्षा में लागू करना।
4. रिसर्च सेंटर के बुनियादी घटक
(a) दृष्टि, मिशन और उद्देश्य (Research Vision & Mission)
• दृष्टि: सेंटर का दीर्घकालिक सपना या लक्ष्य (जैसे—“टिकाऊ ऊर्जा पर अत्याधुनिक शोध करना”).
• मिशन: निकट भविष्य में कैसे काम करेगा, इसकी रूपरेखा.
• उद्देश्य: स्पष्ट और मापने योग्य लक्ष्य.
(b) संचालन एवं संगठनात्मक ढांचा
• सलाहकार परिषद: राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञ, नीति निर्माता, शिक्षाविद, उद्योग प्रतिनिधि।
• निदेशक/प्रमुख: संस्थान के प्रशासनिक और शैक्षणिक संचालन का नेतृत्व।
• शोध विभाग:
o भारतीय दर्शन एवं शिक्षा परंपरा
o आधुनिक शिक्षा एवं नीति अध्ययन
o तकनीकी एवं डिजिटल शिक्षा
o सामाजिक-सांस्कृतिक अध्ययन
• प्रशासनिक इकाई: वित्त, मानव संसाधन, कानूनी, जनसंपर्क।
• सहयोगी प्रकोष्ठ: विश्वविद्यालय, उद्योग, सरकारी और अंतरराष्ट्रीय संगठन।
(c) अवसंरचना एवं सुविधाएं
• भौतिक: शोध भवन, प्रयोगशालाएं, कॉन्फ्रेंस हॉल, डिजिटलीकरण केंद्र।
• तकनीकी: हाई-परफॉर्मेंस कंप्यूटिंग, सर्वर, क्लाउड स्टोरेज, डिजिटल लाइब्रेरी।
• सुरक्षा: लैब सेफ्टी प्रोटोकॉल, फायर सेफ्टी, डेटा सुरक्षा प्रणाली।
(d) वित्त पोषण एवं प्रबंधन
• प्रारंभिक अनुदान – सरकारी योजनाएं, CSR, संस्थागत सहयोग।
• सतत वित्त स्रोत – प्रशिक्षण कार्यक्रम, परामर्श सेवाएं, प्रकाशन, उद्योग साझेदारी।
• पारदर्शी वित्त प्रबंधन – वार्षिक बजट, ऑडिट, फंड उपयोग रिपोर्ट।
(e) शोध के क्षेत्र
• स्पष्ट थीम और डोमेन।
• अल्पकालिक व दीर्घकालिक शोध रोडमैप।
• अंतर्विषयक दृष्टिकोण।
(f) मानव संसाधन
• मुख्य शोधकर्ता: विषय विशेषज्ञ, जिनका शोध में अच्छा रिकॉर्ड हो.
• शोध सहयोगी / फेलो: पोस्ट-डॉक, पीएचडी छात्र.
• तकनीकी स्टाफ: लैब टेक्नीशियन, डेटा एनालिस्ट.
• सहायक स्टाफ: प्रशासन, संचार, आईटी सपोर्ट.
(g) ज्ञान संसाधन
• लाइब्रेरी एवं डेटाबेस: Scopus, Web of Science, JSTOR जैसी पहुंच.
• डेटा भंडार: ओपन एक्सेस और आंतरिक डेटा.
• पेटेंट/IP प्रबंधन: बौद्धिक संपदा का पंजीकरण और संरक्षण.
(h) सहयोग एवं नेटवर्किंग
• विश्वविद्यालयों के साथ MoU: शोध आदान-प्रदान.
• उद्योग साझेदारी: संयुक्त R&D, तकनीकी हस्तांतरण.
• सरकारी एजेंसियां: नीति-स्तर पर शोध और अनुदान.
(i) शोध परिणाम एवं प्रसार
• प्रकाशन: जर्नल, कॉन्फ्रेंस पेपर, पुस्तकें.
• पेटेंट और प्रोटोटाइप.
• कार्यशालाएं और सम्मेलन: ज्ञान साझा करना.
• नीति संक्षेप (Policy Briefs): सरकार को सुझाव.
(j) निगरानी, मूल्यांकन एवं प्रभाव आकलन
• वार्षिक प्रदर्शन समीक्षा.
• शोध का प्रभाव मापना (साइटेशन, पेटेंट, सामाजिक बदलाव).
• हितधारकों से फीडबैक.
(k) स्थायित्व एवं भविष्य तैयारी
• स्टाफ का नियमित कौशल उन्नयन.
• उभरती प्रौद्योगिकियों को अपनाना.
• वित्त पोषण के स्रोतों का विविधीकरण.
5. विद्या भारती के विशेष शोध क्षेत्र
भारतीय ज्ञान प्रणाली (Indian Knowledge Systems – IKS) का समावेश
• भारतीय दर्शन एवं शिक्षा परंपरा पर शोध: प्राचीन भारतीय शिक्षण पद्धतियों का दस्तावेजीकरण, संरक्षण और आधुनिक संदर्भ में उपयोग।
• पारंपरिक ज्ञान डिजिटल संग्रहालय: पांडुलिपियों, लोकज्ञान, और स्थानीय नवाचारों का डिजिटल आर्काइव।
• आधुनिक शिक्षा में प्रयोग: गुरुकुल पद्धति और आधुनिक शिक्षण विज्ञान का संयोजन।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP 2020) के साथ तालमेल
• ग्रामीण, अर्ध-शहरी और शहरी विद्यालयों में NEP के क्रियान्वयन पर मॉडल शोध।
• मूल्य-आधारित और योग्यता-आधारित मूल्यांकन के स्वदेशी फ्रेमवर्क का विकास।
• बहुभाषी शिक्षा और व्यावसायिक प्रशिक्षण के प्रभाव का आकलन।
प्रौद्योगिकी-समर्थित भारतीय संदर्भ शोध
• एआई-संचालित पांडुलिपि विश्लेषण: संस्कृत एवं प्रादेशिक ग्रंथों का डिजिटलीकरण और अनुवाद।
• एडुटेक प्रयोगशालाएं: भारतीय सांस्कृतिक संदर्भ में डिजिटल शिक्षा और गेम-आधारित लर्निंग का परीक्षण।
• वर्चुअल म्यूज़ियम एवं AR/VR: इतिहास, संस्कृति और पर्यावरण को immersive अनुभव में प्रस्तुत करना।
सामाजिक-सांस्कृतिक शोध प्रकोष्ठ
• मूल्य शिक्षा पर अध्ययन: नैतिक शिक्षा का विद्यार्थियों के व्यवहार पर प्रभाव।
• समुदाय आधारित ज्ञान प्रणालियां: कृषि, हस्तकला, और स्वास्थ्य में स्थानीय ज्ञान का अध्ययन।
• सांस्कृतिक स्थिरता: लोककला, बोलियों और विरासत को विद्यालय गतिविधियों के माध्यम से संरक्षित करना।
प्रमाण-आधारित नीति एवं पाठ्यचर्या विकास
• पाठ्यचर्या प्रयोगशालाएं: भारतीय ethos से युक्त पाठ्यपुस्तक, शिक्षण सामग्री और कहानियों का नवाचार।
• नीति थिंक टैंक: सरकार और शैक्षिक निकायों को सुझाव देना।
• प्रभाव अध्ययन: विद्या भारती के पूर्व विद्यार्थियों के सामाजिक योगदान का दीर्घकालिक विश्लेषण।
राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय सहयोग
• AICTE, NCERT, IGNCA एवं अन्य शोध निकायों से साझेदारी।
• यूनेस्को के साथ अमूर्त सांस्कृतिक विरासत पर संयुक्त शोध।
• उद्योगों से कौशल-आधारित शिक्षा और पारंपरिक ज्ञान के व्यावसायीकरण में सहयोग।
7. क्षमता निर्माण एवं शोध प्रशिक्षण
• द्विभाषी शोध पद्धति कार्यशालाएं (अंग्रेज़ी + हिंदी/संस्कृत शब्दावली)।
• एथ्नोग्राफिक रिसर्च (लोक परंपराओं का फील्ड डॉक्यूमेंटेशन) में प्रशिक्षण।
• एआई-आधारित लेखन और डेटा विश्लेषण में शिक्षकों और शोधार्थियों को दक्ष बनाना।
8. जनसंपर्क एवं प्रसार-
• वार्षिक भारतीय शोध सम्मेलन: शोध निष्कर्ष, छात्र प्रोजेक्ट, और सामुदायिक नवाचार प्रस्तुत करना।
• ओपन नॉलेज पोर्टल: शोध कार्यों को ओपन एक्सेस में उपलब्ध कराना।
• पॉडकास्ट, डॉक्यूमेंट्री और यूट्यूब व्याख्यान हिंदी एवं स्थानीय भाषाओं में।
6. संचालन तंत्र (Operational Framework)
• वार्षिक शोध योजना – प्राथमिकता वाले विषयों और परियोजनाओं का निर्धारण।
• थीम आधारित प्रोजेक्ट – भारतीय ज्ञान प्रणाली, शिक्षा सुधार, तकनीकी नवाचार।
• क्षमता निर्माण कार्यक्रम – शोध पद्धति, डेटा विश्लेषण, अकादमिक लेखन।
• साझेदारी – AICTE, NCERT, IGNCA, UNESCO, उद्योग संगठनों के साथ संयुक्त पहल।
• वित्त पोषण – अनुदान, CSR, उद्योग सहयोग, प्रशिक्षण/प्रकाशन से आय।
7. शोध परिणामों का प्रसार-
• उच्च गुणवत्ता वाले शोध-पत्र, पुस्तकें, नीति दस्तावेज।
• भारतीय शोध सम्मेलन और संगोष्ठियां।
• ओपन एक्सेस नॉलेज पोर्टल, मल्टीमीडिया सामग्री, पॉडकास्ट, डॉक्यूमेंट्री।
8. मूल्यांकन एवं प्रभाव आकलन-
• वार्षिक प्रदर्शन मूल्यांकन और लक्ष्य समीक्षा।
• शोध के सामाजिक, शैक्षिक और नीति-स्तर के प्रभाव का मापन।
• फीडबैक आधारित सुधारात्मक योजनाएं।
9. भविष्य दृष्टि-
• जलवायु परिवर्तन, सतत विकास, और AI नैतिकता जैसे नए विषयों पर शोध।
• वैश्विक स्तर पर भारतीय ज्ञान प्रणाली के प्रमाणीकरण और प्रसार के लिए डिजिटल नेटवर्क।
• संस्थान को भारतीयता में निहित, विश्व-स्तरीय शोध और नीति केंद्र के रूप में स्थापित करना।
Thursday, November 27, 2025
भगवान पार्श्वनाथ जन्मकल्याणम् और गुफा मंदिर का लोकार्पण
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा कि भारत की परम्परा ऋषियों, सन्तों, मुनियों और महापुरुषों के त्याग और बलिदान की एक महागाथा से परिपूर्ण है। युगों-युगों से विश्व मानवता इस महागाथा से प्रेरणा प्राप्त कर अपने भविष्य को तय करती रही है। हमारे ऋषि-मुनि श्रद्धा भाव से युक्त होकर विविध पवित्र उपासना पद्धतियों के माध्यम से इस व्यवस्था को आज भी आगे बढ़ा रहे हैं।
मुख्यमंत्री 27 नवम्बर 2025 को जनपद गाजियाबाद में पंचकल्याणक महामहोत्सव में भगवान पार्श्वनाथ जन्मकल्याणम् तथा गुफा मन्दिर का लोकार्पण करने के पश्चात अपने विचार व्यक्त कर रहे थे। इस अवसर पर मुख्यमंत्री जी ने जैन धर्म पर आधारित पुस्तकों का विमोचन किया। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा कि तीन दिन पूर्व अयोध्या में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी के कर कमलों द्वारा प्रभु श्रीराम के भव्य मंदिर के शिखर पर धर्मध्वजा का पुनर्स्थापन कार्यक्रम सम्पन्न हुआ है। देश व दुनिया ने भारत की सनातन परम्परा के वैभव को देखा व अनुभव किया है। प्रत्येक व्यक्ति इक्ष्वाकु कुल के प्रथम राजा तथा प्रथम जैन तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव का स्मरण श्रद्धा भाव के साथ करता है। यह उत्तर प्रदेश का सौभाग्य है कि यहां प्रथम जैन तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव और चार पवित्र जैन तीर्थंकर अयोध्या की धरती पर पैदा हुए।
उन्होंने कहा कि दुनिया की आध्यात्मिक नगरी काशी में चार जैन तीर्थंकरों का अवतरण हुआ। जैन तीर्थंकर भगवान सम्भवनाथ जी का जन्म श्रावस्ती की धरती पर हुआ था। यद्यपि भगवान महावीर का जन्म वैशाली में हुआ, लेकिन उनका महापरिनिर्वाण उत्तर प्रदेश के कुशीनगर के पावागढ़ में हुआ था। प्रदेश सरकार द्वारा भगवान महावीर स्वामी के महापरिनिर्वाण स्थल फाजिल नगर का नामकरण पावानगरी के रूप में करने हेतु कार्यवाही आगे बढ़ाई जा रही है।
उन्होंने कहा कि जैन धर्म के 24 तीर्थंकरों ने समाज को नई दिशा प्रदान की। उन्होंने करुणा, मैत्री, अहिंसा तथा जियो और जीने दो की प्रेरणा विश्व मानवता को दी। केवल मनुष्य ही नहीं, बल्कि प्रत्येक जीव जन्तु को नई दिशा प्रदान की। उसकी प्रासंगिकता आज भी उसी रूप में बनी हुई है। यदि मानव सभ्यता को विकास की नित नई ऊंचाइयों तक पहुंचाना है, तो हमें अध्यात्म की शरण में जाना पड़ेगा। अध्यात्म के साथ भौतिक विकास व सांस्कृतिक उन्नयन के लिए एक सुरक्षित, सुसभ्य तथा साफ-सुथरा वातावरण आवश्यक है। भारत ने पहले से ही दुनिया को ऐसा वातावरण दिया है। भारत की ऋषि परम्परा द्वारा दिए गये विश्व मानवता के संदेश को आत्मसात कर उसका अनुसरण करने से विश्व मानवता के कल्याण का मार्ग प्रशस्त होगा।
उन्होंने ‘णमो अरिहंताणं, णमो सिद्धाणं, णमो आयरियाणं, णमो उवज्झायाणं, णमो लाए सव्वसाहूणं, एसो पंच नमुक्कारो, सव्वपावप्पणासणो, मंगलाणं चसव्वेसिं, पढमं हवइ मंगलं’ नवकार महामंत्र का उच्चारण करते हुए कहा कि इस वर्ष अप्रैल माह में प्रधानमंत्री जी ने दिल्ली में विश्व नवकार महामंत्र दिवस पर ‘वन वर्ल्ड-वन चैन्ट’ कार्यक्रम का उद्घाटन किया था। तब उन्होंने हमें 09 संकल्प प्रदान किए थे, जिनमें पानी की बचत, एक पेड़ मां के नाम, स्वच्छता मिशन, वोकल फॉर लोकल, देश-दर्शन, नेचुरल फार्मिंग, हेल्दी लाइफस्टाइल अर्थात् योग और खेल को जीवन में सम्मिलित करना और गरीबों के कल्याण के लिए सदैव समर्पण के भाव के साथ कार्य करना शामिल हैं।
उन्होंने कहा कि जैन मुनियों की परम्परा साधन की पवित्रता को आगे बढ़ाने का कार्य कर रही है। आज यहां हमें आचार्य श्री प्रसन्न सागर जी महाराज तथा उपाध्याय मुनि श्री पीयूष सागर जी महाराज की 557 दिनों की कठोर साधना तथा 496 दिनों का निर्जल उपवास, तप, अनुशासन और आत्म संयम के अद्भुत उदाहरण से परिचित होने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। यह चीजें दिखाती हैं कि यदि हम संकल्पित हों, तो ‘पिंड माही ब्रह्मांड समाया’ अर्थात् जो कुछ हमें बाहर दिखाई दे रहा है, उसका अनुभव हम अपने शरीर में कर सकेंगे।
आचार्य श्री प्रसन्न सागर जी महाराज तथा उपाध्याय मुनि श्री पीयूष सागर जी महाराज ने भी कार्यक्रम को सम्बोधित किया।
इस अवसर पर प्रवर्तक मुनि श्री महत सागर जी महाराज, निर्यापक मुनि श्री नव पद्म सागर जी महाराज, मुनि श्री अप्रत्य सागर जी महाराज, मुनि श्री परिमल सागर जी महाराज, इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री सुनील कुमार शर्मा, पिछड़ा वर्ग कल्याण एवं दिव्यांगजन सशक्तिकरण राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) नरेन्द्र कुमार कश्यप सहित अन्य गणमान्य व्यक्ति उपस्थित थे।
27 नवम्बर 2025
Wednesday, November 26, 2025
पक्षी अभयारण्यमें एआर-वीआर डोम की सुविधा
उत्तर प्रदेश के उन्नाव स्थित अंतर्राष्ट्रीय महत्व रखने वाले शहीद चंद्रशेखर आजाद पक्षी अभयारण्य में पर्यटकों के लिए अत्याधुनिक एआर-वीआर डोम की सुविधा शीघ्र उपलब्ध होने वाली है। उत्तर प्रदेश ईको टूरिज्म विकास बोर्ड द्वारा यहां कई पर्यटन सुविधाओं का तेजी से विकास कराया जा रहा है। इन पर लगभग 2.81 करोड़ रुपये व्यय किए जा रहे हैं।
उत्तर प्रदेश के पर्यटन एवं संस्कृति मंत्री जयवीर सिंह ने 26 नवम्बर 2025 को लखनऊ में यह जानकारी देते हुए कहा कि राज्य के ईको टूरिज्म डेस्टिनेशन पर पहली बार आगंतुकों को जंगल का वर्चुअल अनुभव प्राप्त होगा। लखनऊ से लगभग 43 किलोमीटर दूर कानपुर हाईवे स्थित शहीद चन्द्रशेखर आजाद पक्षी अभयारण्य प्रमुख रामसर साइट है। पक्षी प्रेमियों, प्रकृति को निकट से अनुभव करने वालों और शहरी भागदौड़ से दूर शांत वातावरण की खोज में जुटे पर्यटकों के लिए यह एक प्रमुख आकर्षण है। शांत, हरेभरे प्राकृतिक वातावरण में स्थित यह सेंचुरी सप्ताहांत पर्यटन के लिए बेहतरीन गतंव्य है। सर्दियों में यहां स्थानीय तथा प्रवासी पक्षियों की भारी आमद होती है। उत्तर प्रदेश ईको टूरिज्म विकास बोर्ड द्वारा यहां एआर-वीआर डोम के साथ-साथ कई अन्य सुविधाओं का विकास कराया जा रहा है, जिनमें रिसेप्शन/टिकट/वेटिंग एरिया, टिकट काउंटर, फूड एवं ओडीओपी कियोस्क, लैंडस्केपिंग एवं साइट डेवलपमेंट, पौधरोपण, बाहरी प्रकाश व्यवस्था, साइनेज आदि सम्मिलित हैं।
एआर-वीआर डोम एक विशिष्ट प्रकार की अत्याधुनिक तकनीकी है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह कि इसमें जंगल के किसी भी समय की सीन क्रिएट की जा सकती है। सुबह, देर शाम या रात के जंगल का दृश्य, जो अक्सर हम नहीं देख पाते हैं, वह हम इस अत्याधुनिक सुविधा के माध्यम से देख सकते हैं। डोम में बैठने के बाद आप चारों ओर का दृश्य देख सकते हैं। कई जगह तो ऊपर और नीचे का भी दृश्य दिखता है। इस पक्षी अभयारण्य में पर्यटन विकास की व्यापक संभावनाओं को साकार करने के लिए बोर्ड सक्रिय है। इसी क्रम में लखनऊ के विविध विद्यालयों के विद्यार्थियों के लिए क्यूरेटेड टूर कराए जा रहे हैं। इस उद्देश्य से इज माय ट्रिप के साथ एमओयू किया गया है। उत्तर प्रदेश प्राकृतिक संपदाओं से समृद्ध राज्य है, जो बड़ी संख्या में प्रकृति प्रेमियों को आकर्षित करता है। हमारा लक्ष्य है कि यहां आने वाले पर्यटक अद्वितीय और यादगार अनुभव लेकर लौटें। इसी दिशा में सुविधाओं का निरंतर विकास किया जा रहा है।
लखनऊ: 26 नवंबर, 2025
Tuesday, November 25, 2025
भारतीय संविधान भारतीय जीवन दर्शन का ग्रंथ है
डॉ. सौरभ मालवीय
किसी भी देश के लिए एक विधान की आवश्यकता होती है। देश के विधान को संविधान कहा जाता है। यह अधिनियमों का संग्रह है। भारत के संविधान को विश्व का सबसे लम्बा लिखित विधान होने का गौरव प्राप्त है। भारतीय संविधान हमारे देश की आत्मा है। इसका देश से वही संबंध है, जो आत्मा का शरीर से होता है।
भारत का संविधान 26 नवम्बर 1949 को बनकर पूर्ण हुआ था। चूंकि डॉ. भीमराव आम्बेडकर संविधान सभा के प्रारूप समिति के अध्यक्ष थे, इसलिए भारत सरकार द्वारा उनकी 125वीं जयंती वर्ष के रूप में 26 नवम्बर 2015 को प्रथम बार संविधान दिवस संपूर्ण देश में मनाया गया। उसके पश्चात 26 नवम्बर को प्रत्येक वर्ष संविधान दिवस मनाया जाने लगा। इससे पूर्व इसे राष्ट्रीय विधि दिवस के रूप में मनाया जाता था। संविधान सभा द्वारा देश के संविधान को 2 वर्ष 11 माह 18 दिन में पूर्ण किया गया था। इस पर 114 दिन तक चर्चा हुई तथा 12 अधिवेशन आयोजित किए गए। भारतीय संविधान को बनाने में लगभग एक करोड़ की लागत आई थी। भारतीय संविधान में डॉ. राजेंद्र प्रसाद को 11 दिसंबर 1946 में स्थाई अध्यक्ष मनोनीत किया गया था। भारतीय संविधान पर 284 लोगों ने हस्ताक्षर किए थे। यह 26 नवम्बर 1949 को पूर्ण कर राष्ट्र को समर्पित किया गया। इसके पश्चात 26 जनवरी 1950 से देश में संविधान लागू किया गया। इससे पूर्व देश में भारत सरकार अधिनियम-1935 का कानून लागू था। कोई भी वस्तु पूर्ण नहीं होती है। समय के अनुसार उसमें परिवर्तन होते रहते हैं। भारतीय संविधान लागू होने के पश्चात इसमें 100 से अधिक संशोधन किए जा चुके हैं। ऐसा भविष्य में भी होने की पूर्ण संभावना है।
भारतीय संविधान में सरकार के अधिकारियों के कर्तव्य एवं नागरिकों के अधिकारों के बारे में विस्तार से बताया गया है। संविधान सभा के कुल सदस्यों की संख्या 389 थी। इनमें 292 ब्रिटिश प्रांतों के 4 चीफ कमिश्नर थे, जबकि 93 सदस्य देशी रियासतों के थे। विशेष बात यह है कि देश की स्वतंत्रता के पश्चात संविधान सभा के सदस्य ही देश की संसद के प्रथम सदस्य बने थे। देश की संविधान सभा का चुनाव भारतीय संविधान के निर्माण के लिए ही किया गया था। भारतीय संविधान के अनुसार केंद्रीय कार्यपालिका का संवैधानिक प्रमुख राष्ट्रपति होता है। भारतीय संविधान का निर्माण करने वाली संविधान सभा का गठन 19 जुलाई 1946 को किया गया था। संविधान के कुछ अनुच्छेदों को 26 नवंबर 1949 को पारित किया गया, जबकि शेष अनुच्छेदों को 26 जनवरी 1950 को लागू किया गया।
संविधान की विशेषता
भारत एक विशाल देश है। इसमें विभिन्न संस्कृतियों के लोग निवास करते हैं। यहां विभिन्न संप्रदायों, पंथों, जातियों आदि के लोग हैं। उनके रीति-रिवाज, भाषाएं, रहन-सहन एवं खान-पान भी भिन्न-भिन्न हैं। इस सबके मध्य वे आपस में मिलजुल कर रहते हैं। वास्तव में यही भारत का स्वभाव है। भारतीय संविधान में भारत के नागरिकों को छह मौलिक अधिकार प्रदान किए गए हैं, जिनका वर्णन अनुच्छेद 12 से 35 के मध्य किया गया है। इनमें समानता का अधिकार, स्वतंत्रता का अधिकार, शोषण के विरुद्ध अधिकार, धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार, संस्कृति और शिक्षा से संबंधित अधिकार एवं संवैधानिक उपचारों का अधिकार सम्मिलित है। उल्लेखनीय है कि पहले संविधान में सात मौलिक अधिकार थे, जिसे ‘44वें संविधान संशोधन- 1978 के अंतर्गत हटा दिया गया। सातवां मौलिक अधिकार संपति का अधिकार था। मूल अधिकार का एक दृष्टांत है- "राज्य नागरिकों के बीच परस्पर विभेद नहीं करेगा।“ भारतीय संविधान में भी किसी के साथ किसी भी प्रकार का भेद नहीं किया जाता। यही इसकी विशेषता है।
ऋषि परम्परा का धर्मशास्त्र
भारतीय संविधान "हम भारत के लोगों" के लिए हमारी अद्वितीय सांस्कृतिक विरासत जनित स्वतंत्रता एवं समानता के आदर्श मूल्यों के प्रति एक राष्ट्र के रूप में हमारी प्रतिबद्धता का परिचायक है। वर्तमान के आधुनिक भारत की संकल्पना के समय संविधान निर्माताओं ने इसी सांस्कृतिक विरासत को उसके मूल स्वरूप में अक्षुण्ण रखने के ध्येय से भारतीय संविधान की मूल प्रतिलिपि में सांस्कृतिक एवं ऐतिहासिक महत्व के रुचिकर चित्रों को स्थान दिया, जो मूलतः भारतीय संविधान के भारतीय चैतन्य को ही परिभाषित करते हैं। भारतीय ज्ञान परम्परा के अलोक में निर्मित भारतीय संविधान भारत की ऋषि परम्परा का धर्मशास्त्र है। भारतीय जीवन दर्शन का ग्रंथ है।
भारत एक लोकतांत्रिक देश है। यहां सबका सम्मान किया जाता है। वसुधैव कुटुम्बकम भारतीय संस्कृति का मूल आधार है। यह सनातन धर्म का मूल संस्कार है। यह एक विचारधारा है। महा उपनिषद सहित कई ग्रंथों में इसका उल्लेख मिलता है।
अयं निजः परोवेति गणना लघुचेतसाम् ।
उदारचरितानां वसुधैव कुटुम्बकम् ।।
अर्थात यह मेरा अपना है और यह नहीं है, इस तरह की गणना छोटे चित्त वाले लोग करते हैं। उदार हृदय वाले लोगों की तो संपूर्ण धरती ही परिवार है। कहने का अभिप्राय है कि धरती ही परिवार है। यह वाक्य भारतीय संसद के प्रवेश कक्ष में भी अंकित है।
निसंदेह भारत के लोग विराट हृदय वाले हैं। वे सबको अपना लेते हैं। विभिन्न संस्कृतियों के पश्चात भी सब आपस में परस्पर सहयोग भाव बनाए रखते हैं। एक-दूसरे के साथ मिलजुल कर रहते हैं। यही हमारी भारतीय संस्कृति की महानता है।
उल्लेखनीय है कि भारत का संविधान बहुत ही परिश्रम से तैयार किया गया है। इसके निर्माण से पूर्व विश्व के अनेक देशों के संविधानों का अध्ययन किया गया। तत्पश्चात उन पर गंभीर चिंतन किया गया। इन संविधानों में से उपयोगी संविधानों के शब्दों को भारतीय संविधान में सम्मिलित किया गया। आजादी के बाद भारत का वैचारिक दृष्टिकोण भारतीय ज्ञान परम्परा के आलोक में विकास के पाठ पर खड़ा करने का प्रयास होना चाहिए था।
भारतीय संविधान की उद्देशिका
हम, भारत के लोग, भारत को एक संपूर्ण प्रभुत्व संपन्न, समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने के लिए, तथा उसके समस्त नागरिकों को:
सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय,
विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता,
प्रतिष्ठा और अवसर की समता, प्राप्त कराने के लिए,
तथा उन सब में,
व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता और अखण्डता सुनिश्चित कराने वाली, बंधुता बढ़ाने के लिए,
दृढ़ संकल्पित होकर अपनी संविधानसभा में आज तारीख 26 नवम्बर 1949 ई॰ (मिति मार्गशीर्ष शुक्ल सप्तमी, संवत दो हजार छह विक्रमी) को एतद्द्वारा इस संविधान को अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित करते हैं।
भारतीय संविधान की इस उद्देशिका में भारत की आत्मा निवास करती है। इसका प्रत्यके शब्द एक मंत्र के समान है। हम भारत के लोग- से अभिप्राय है कि भारत एक प्रजातांत्रिक देश है तथा भारत के लोग ही सर्वोच्च संप्रभु है। इसी प्रकार संप्रभुता- से अभिप्राय है कि भारत किसी अन्य देश पर निर्भर नहीं है। समाजवादी- से अभिप्राय है कि संपूर्ण साधनों आदि पर सार्वजनिक स्वामित्व या नियंत्रण के साथ वितरण में समतुल्य सामंजस्य। ‘पंथनिरपेक्ष राज्य’ शब्द का स्पष्ट रूप से संविधान में कोई उल्लेख नहीं है। लोकतांत्रिक- से अभिप्राय है कि लोक का तंत्र अर्थात जनता का शासन। गणतंत्र- से अभिप्राय है कि एक ऐसा शासन जिसमें राज्य का मुखिया एक निर्वाचित प्रतिनिधि होता है। न्याय- से आशय है कि सबको न्याय प्राप्त हो। स्वतंत्रता- से अभिप्राय है कि सभी नागरिकों को स्वतंत्रता से जीवन यापन करने का अधिकार है। समता- से अभिप्राय है कि देश के सभी नागिरकों को समान अधिकार प्राप्त हैं। इसी प्रकार बंधुत्व- से अभिप्राय है कि देशवासियों के मध्य भाईचारे की भावना।
विचारणीय विषय यह है कि भारतीय संविधान ने देश के सभी नागरिकों को समान अधिकार प्रदान किए हैं तथा उनके साथ किसी भी प्रकार का भेदभाव नहीं किया। किन्तु देश में आज भी ऊंच-नीच, अस्पृश्यता आदि जैसे बुराइयां व्याप्त हैं। इन बुराइयों को समाप्त करने के लिए कानून भी बनाए गए, परन्तु इनका विशेष लाभ देखने को नहीं मिला। ग्रामीण क्षेत्रों में यह समस्या अधिक देखने को मिलती है। सामाजिक समरसता भारतीय समाज का सौंदर्य है, अस्पृश्यता से संबंधित अप्रिय घटनाएं भी चर्चा में रहती हैं। इन बुराइयों को समाप्त करने के लिए जागरूक लोगों को ही आगे आना चाहिए तथा सभी लोगों को अपने देश के संविधान का पालन करना चाहिए।
(लेखक- मीडिया शिक्षक एवं राजनीतिक विश्लेषक हैं)
आज सम्पूर्ण भारत, सम्पूर्ण विश्व राममय है: प्रधानमंत्री
राष्ट्र के सामाजिक-सांस्कृतिक और आध्यात्मिक परिदृश्य में एक महत्वपूर्ण अवसर के रूप में, प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने आज उत्तर प्रदेश के अयोध्या में पवित्र श्री राम जन्मभूमि मंदिर के शिखर पर भगवा ध्वज फहराया। ध्वजारोहण उत्सव मंदिर निर्माण के पूर्ण होने और सांस्कृतिक उत्सव एवं राष्ट्रीय एकता के एक नए अध्याय की शुरुआत का प्रतीक है। इस अवसर पर उपस्थित जनसमूह को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि आज अयोध्या नगरी भारत की सांस्कृतिक चेतना के एक और उत्कर्ष-बिंदु की साक्षी बन रही है। श्री मोदी ने कहा, "आज पूरा भारत और पूरा विश्व भगवान श्री राम की भावना से ओतप्रोत है।" उन्होंने इस बात पर प्रकाश डाला कि प्रत्येक राम भक्त के हृदय में अद्वितीय संतोष, असीम कृतज्ञता और अपार दिव्य आनंद है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि सदियों पुराने घाव भर रहे हैं, सदियों का दर्द समाप्त हो रहा है और सदियों का संकल्प आज सिद्ध हो रहा है। उन्होंने घोषणा करते हुए कहा कि यह उस यज्ञ की परिणति है जिसकी अग्नि 500 वर्षों तक प्रज्वलित रही, एक ऐसा यज्ञ जिसकी आस्था कभी डगमगाई नहीं, आस्था क्षण भर के लिए भी खंडित नहीं हुई। उन्होंने कहा कि आज भगवान श्री राम के गर्भगृह की अनंत ऊर्जा और श्री राम परिवार की दिव्य महिमा, इस धर्म ध्वजा के रूप में, इस दिव्यतम एवं भव्य मंदिर में प्रतिष्ठित हुई है।
श्री मोदी ने जोर देकर कहा, "यह धर्म ध्वजा केवल एक ध्वज नहीं है, बल्कि यह भारतीय सभ्यता के पुनर्जागरण का ध्वज है।" उन्होंने बताया कि इसका केसरिया रंग, इस पर अंकित सूर्यवंश की महिमा, अंकित पवित्र ॐ और उत्कीर्ण कोविदार वृक्ष, रामराज्य की महानता के प्रतीक हैं। उन्होंने कहा कि यह ध्वज संकल्प है, यह ध्वज सिद्धि है, यह ध्वज संघर्ष से सृजन की गाथा है, यह ध्वज सदियों से संजोए गए स्वप्नों का साकार रूप है, और यह ध्वज संतों की तपस्या और समाज की सहभागिता की सार्थक परिणति है।
यह घोषणा करते हुए कि आने वाली सदियों और सहस्राब्दियों तक, यह धर्म ध्वज भगवान राम के आदर्शों और सिद्धांतों का उद्घोष करेगा, श्री मोदी ने जोर देकर कहा कि यह आह्वान करेगा कि विजय केवल सत्य की होती है, असत्य की नहीं। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि यह उद्घोषणा करेगा कि सत्य स्वयं ब्रह्म का रूप है और सत्य में ही धर्म की स्थापना होती है। उन्होंने कहा कि यह धर्म ध्वज जो कहा गया है उसे अवश्य पूरा करने के संकल्प को प्रेरित करेगा। उन्होंने कहा कि यह संदेश देगा कि संसार में कर्म और कर्तव्य को ही प्रधानता देनी चाहिए। उन्होंने कहा कि यह भेदभाव और पीड़ा से मुक्ति और समाज में शांति और सुख की उपस्थिति की कामना व्यक्त करेगा। उन्होंने जोर देकर कहा कि यह धर्म ध्वज हमें इस संकल्प के लिए प्रतिबद्ध करेगा कि हमें एक ऐसे समाज का निर्माण करना है जहां कोई गरीबी न हो और कोई भी दुखी या असहाय न हो।
श्री मोदी ने अपने धर्मग्रंथों का स्मरण करते हुए कहा कि जो लोग किसी भी कारण से मंदिर में नहीं आ पाते, लेकिन उसकी ध्वजा के आगे झुकते हैं, उन्हें भी समान पुण्य प्राप्त होता है। उन्होंने जोर देकर कहा कि यह धर्म ध्वजा मंदिर के उद्देश्य का प्रतीक है और दूर से ही यह रामलला की जन्मभूमि के दर्शन कराती रहेगी और युगों-युगों तक भगवान श्री राम के आदेशों और प्रेरणाओं को मानवता तक पहुंचाती रहेगी। उन्होंने इस अविस्मरणीय और अनूठे अवसर पर दुनिया भर के करोड़ों राम भक्तों को हार्दिक शुभकामनाएं दीं। उन्होंने सभी भक्तों को नमन किया और राम मंदिर निर्माण में योगदान देने वाले प्रत्येक दानदाता के प्रति कृतज्ञता व्यक्त की। उन्होंने मंदिर निर्माण से जुड़े प्रत्येक कार्यकर्ता, प्रत्येक कारीगर, प्रत्येक योजनाकार और प्रत्येक वास्तुकार को नमन किया।
प्रधानमंत्री ने जोर देकर कहा, "अयोध्या वह भूमि है जहां आदर्श आचरण में बदलते हैं।" उन्होंने कहा कि यही वह नगरी है जहां से श्री राम ने अपनी जीवन यात्रा शुरू की थी। उन्होंने इस बात पर प्रकाश डाला कि अयोध्या ने दुनिया को दिखाया कि कैसे एक व्यक्ति, समाज और उसके मूल्यों की शक्ति से पुरुषोत्तम बनता है। उन्होंने स्मरण किया कि जब श्री राम वनवास के लिए अयोध्या से निकले थे, तो वे युवराज राम थे, लेकिन जब वे लौटे, तो वे 'मर्यादा पुरुषोत्तम' बनकर लौटे। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि श्री राम के मर्यादा पुरुषोत्तम बनने में महर्षि वशिष्ठ का ज्ञान, महर्षि विश्वामित्र की दीक्षा, महर्षि अगस्त्य का मार्गदर्शन, निषादराज की मित्रता, माता शबरी का स्नेह और भक्त हनुमान की भक्ति, सभी ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
विकसित भारत के निर्माण के लिए समाज की सामूहिक शक्ति को अनिवार्य बताते हुए, श्री मोदी ने प्रसन्नता व्यक्त की कि राम मंदिर का दिव्य प्रांगण भारत के सामूहिक सामर्थ्य की भी चेतना स्थली बन रहा है। उन्होंने इस बात पर प्रकाश डाला कि यहां सात मंदिर निर्मित हैं, जिनमें माता शबरी का मंदिर भी शामिल है, जो आदिवासी समुदाय की प्रेम और आतिथ्य परंपराओं का प्रतीक है। प्रधानमंत्री ने निषादराज के मंदिर का भी जिक्र किया, जो उस मैत्री का साक्षी है जो साधनों की नहीं, बल्कि उद्देश्य और भावना की पूजा करती है। उन्होंने बताया कि एक ही स्थान पर माता अहिल्या, महर्षि वाल्मीकि, महर्षि वशिष्ठ, महर्षि विश्वामित्र, महर्षि अगस्त्य और संत तुलसीदास विराजमान हैं, जिनकी रामलला के साथ उपस्थिति भक्तों को उनके दर्शन कराती है। उन्होंने जटायु जी और गिलहरी की मूर्तियों का जिक्रं किया, जो महान संकल्पों की सिद्धि में छोटे से छोटे प्रयास के महत्व को दर्शाती हैं। उन्होंने प्रत्येक नागरिक से आग्रह किया कि जब भी वे राम मंदिर जाएं, तो सप्त मंदिरों के भी दर्शन अवश्य करें। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि ये मंदिर हमारी आस्था को मजबूत करने के साथ-साथ मैत्री, कर्तव्य और सामाजिक सद्भाव के मूल्यों को भी सशक्त बनाते हैं।
"हमारे राम भेद से नहीं, भाव से जुड़ते हैं", श्री मोदी ने जोर देकर कहा कि श्री राम के लिए व्यक्ति की भक्ति वंश से अधिक महत्वपूर्ण है, संस्कार वंश से अधिक प्रिय हैं और सहयोग महज शक्ति से भी बड़ा है। उन्होंने कहा कि आज हम भी इसी भावना के साथ आगे बढ़ रहे हैं। उन्होंने इस बात पर प्रकाश डाला कि पिछले 11 वर्षों में महिलाओं, दलितों, पिछड़ों, आदिवासियों, वंचितों, किसानों, श्रमिकों और युवाओं - समाज के हर वर्ग को विकास के केंद्र में रखा गया है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि जब राष्ट्र का प्रत्येक व्यक्ति, प्रत्येक वर्ग और प्रत्येक क्षेत्र सशक्त होगा, तो सभी का प्रयास संकल्प की पूर्ति में योगदान देगा, और इन्हीं सामूहिक प्रयासों से 2047 तक एक विकसित भारत का निर्माण होगा।
रामलला की प्राण प्रतिष्ठा के ऐतिहासिक अवसर पर विचार करते हुए, प्रधानमंत्री ने राष्ट्र के संकल्प को भगवान राम से जोड़ने की बात कही और याद दिलाया कि आने वाले हजार वर्षों के लिए भारत की नींव मजबूत होनी चाहिए। उन्होंने जोर देकर कहा कि जो लोग केवल वर्तमान के बारे में सोचते हैं, वे आने वाली पीढ़ियों के साथ अन्याय करते हैं, और हमें केवल आज के बारे में ही नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के बारे में भी सोचना चाहिए, क्योंकि राष्ट्र हमसे पहले भी था और हमारे बाद भी रहेगा। उन्होंने जोर देकर कहा कि हम एक जीवंत समाज हैं, हमें दूरदृष्टि के साथ काम करना होगा, हमें आने वाले दशकों, आने वाली सदियों को ध्यान में रखना ही होगा। इसके लिए हमें भगवान राम से सीखना होगा—उनके व्यक्तित्व को समझना होगा, उनके आचरण को अपनाना होगा, और यह याद रखना होगा कि राम आदर्शों, अनुशासन और जीवन के सर्वोच्च चरित्र के प्रतीक हैं। राम सत्य और वीरता के संगम हैं, धर्म के मार्ग पर चलने के साक्षात स्वरूप हैं, लोक-सुख को सर्वोपरि रखने वाले हैं, धैर्य और क्षमा के सागर हैं, ज्ञान और बुद्धि के शिखर हैं, सौम्यता में दृढ़ता, कृतज्ञता का सर्वोच्च उदाहरण हैं, उत्तम संगति के वरणकर्ता हैं, महाबल में विनम्रता हैं, सत्य का अटूट संकल्प हैं और सजग, अनुशासित एवं निष्कपट मन हैं। उन्होंने कहा कि राम के ये गुण हमें एक सशक्त, दूरदर्शी और स्थायी भारत के निर्माण में मार्गदर्शन प्रदान करें।
श्री मोदी ने कहा, "राम सिर्फ एक व्यक्ति नहीं, राम एक मूल्य हैं, एक मर्यादा हैं, एक दिशा हैं।" उन्होंने कहा कि यदि भारत को 2047 तक विकसित बनाना हैं, अगर समाज को सामर्थ्यवान बनाना है, तो हमे अपने भीतर “राम” को जगाना होगा। हमारे हृदय में प्रतिष्ठित करना होगा। उन्होंने जोर देकर कहा कि ऐसा संकल्प लेने के लिए आज से बेहतर कोई दिन नहीं हो सकता। उन्होंने कहा कि 25 नवंबर हमारी विरासत पर गर्व का एक और असाधारण क्षण लेकर आया है, जिसका प्रतीक धर्म ध्वज पर अंकित कोविदार वृक्ष है। उन्होंने बताया कि कोविदार वृक्ष हमें याद दिलाता है कि जब हम अपनी जड़ों से अलग हो जाते हैं, तो हमारा गौरव इतिहास के पन्नों में दफन हो जाता है।
प्रधानमंत्री ने उस प्रसंग का स्मरण किया जब भरत अपनी सेना के साथ चित्रकूट पहुंचे और लक्ष्मण ने दूर से ही अयोध्या की सेना को पहचान लिया। श्री मोदी ने वाल्मीकि द्वारा वर्णित उस वर्णन का जिक्र किया जिसमें लक्ष्मण ने राम से कहा था कि एक विशाल वृक्ष जैसा दीप्तिमान, ऊंचा ध्वज अयोध्या का है, जिस पर कोविदार का शुभ प्रतीक अंकित है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि आज, जब राम मंदिर के प्रांगण में कोविदार की पुनः प्राण-प्रतिष्ठा हो रही है, तो यह केवल एक वृक्ष की वापसी नहीं है, बल्कि स्मृति की वापसी, पहचान का पुनरुत्थान और एक गौरवशाली सभ्यता का नवघोष है। कोविदार हमें याद दिलाता है कि जब हम अपनी पहचान भूल जाते हैं, तो हम स्वयं को खो देते हैं, लेकिन जब पहचान लौटती है, तो राष्ट्र का आत्मविश्वास भी लौटता है। उन्होंने निष्कर्ष निकाला कि देश को आगे बढ़ने के लिए अपनी विरासत पर गर्व करना होगा।
अपनी विरासत पर गर्व के साथ-साथ गुलामी की मानसिकता से पूर्ण मुक्ति को भी उतना ही महत्वपूर्ण बताते हुए, प्रधानमंत्री ने याद दिलाया कि 190 साल पहले, 1835 में, मैकाले नामक एक अंग्रेज संसदविद ने भारत को उसकी जड़ों से उखाड़ फेंकने का बीज बोया और मानसिक गुलामी की नींव रखी। उन्होंने कहा कि 2035 में उस घटना को दो सौ साल पूरे हो जाएंगे और आग्रह किया कि आने वाले दस साल भारत को इस मानसिकता से मुक्त करने के लिए समर्पित होने चाहिए। उन्होंने खेद व्यक्त किया कि सबसे बड़ा दुर्भाग्य यह है कि मैकाले के विचारों का व्यापक प्रभाव पड़ा। भारत को स्वतंत्रता तो मिली, लेकिन हीन भावना से मुक्ति नहीं मिली। उन्होंने कहा कि एक विकृति फैल गई, जहां हर विदेशी चीज को श्रेष्ठ माना जाने लगा, जबकि हमारी अपनी परंपराओं और प्रणालियों को केवल दोष की दृष्टि से देखा जाने लगा।
श्री मोदी ने इस बात पर जोर दिया कि गुलामी की मानसिकता इस धारणा को पुष्ट करती रही कि भारत ने लोकतंत्र विदेश से उधार लिया है और यहां तक कि इसका संविधान भी विदेश से प्रेरित है, जबकि सच्चाई यह है कि भारत लोकतंत्र की जननी है और लोकतंत्र हमारे डीएनए में है। उन्होंने उत्तरी तमिलनाडु के उत्तिरामेरुर गांव का उदाहरण दिया, जहां एक हजार साल पुराने शिलालेख में बताया गया है कि उस युग में भी शासन कैसे लोकतांत्रिक तरीके से चलाया जाता था और लोग अपने शासक कैसे चुनते थे। उन्होंने कहा कि मैग्ना कार्टा की तो व्यापक प्रशंसा की जाती थी, लेकिन भगवान बसवन्ना के अनुभव मंडप के ज्ञान को सीमित रखा गया था। उन्होंने बताया कि अनुभव मंडप एक ऐसा मंच था जहां सामाजिक, धार्मिक और आर्थिक मुद्दों पर सार्वजनिक रूप से बहस होती थी और सामूहिक सहमति से निर्णय लिए जाते थे। उन्होंने दुःख व्यक्त किया कि गुलामी की मानसिकता के कारण, भारत की पीढ़ियां अपनी लोकतांत्रिक परंपराओं के ज्ञान से वंचित रहीं।
प्रधानमंत्री ने कहा कि गुलामी की मानसिकता हमारी व्यवस्था के हर कोने में समा गई है। उन्होंने याद दिलाया कि सदियों से भारतीय नौसेना के ध्वज पर ऐसे प्रतीक अंकित थे जिनका भारत की सभ्यता, शक्ति या विरासत से कोई संबंध नहीं था। उन्होंने जोर देकर कहा कि अब नौसेना के ध्वज से गुलामी के हर प्रतीक को हटा दिया गया है और छत्रपति शिवाजी महाराज की विरासत को स्थापित किया गया है। उन्होंने कहा कि यह केवल स्वरूप में परिवर्तन नहीं, बल्कि मानसिकता में परिवर्तन का क्षण है, एक ऐसी घोषणा कि भारत अब अपनी शक्ति को दूसरों की विरासत से नहीं, बल्कि अपने प्रतीकों से परिभाषित करेगा।
श्री मोदी ने यह भी कहा कि यही परिवर्तन आज अयोध्या में भी दिखाई दे रहा है। उन्होंने जोर देकर कहा कि यही गुलामी की मानसिकता थी जिसने इतने वर्षों तक रामत्व के सार को नकार दिया। श्री मोदी ने कहा कि ओरछा के राजा राम से लेकर रामेश्वरम के भक्त राम तक, शबरी के प्रभु राम से लेकर मिथिला के पहुना राम जी तक, भगवान राम, स्वयं में एक संपूर्ण मूल्य-व्यवस्था हैं। राम हर घर में, हर भारतीय के हृदय में और भारत के कण-कण में विराजमान हैं। फिर भी, उन्होंने दुःख व्यक्त किया कि गुलामी की मानसिकता इतनी हावी हो गई कि भगवान राम को भी काल्पनिक घोषित कर दिया गया।
श्री मोदी ने इस बात पर जोर देते हुए कि अगर हम अगले दस वर्षों में खुद को गुलामी की मानसिकता से पूरी तरह मुक्त करने का संकल्प लें, तो आत्मविश्वास की ऐसी ज्योति प्रज्वलित होगी कि 2047 तक विकसित भारत के स्वप्न को साकार होने से कोई भी ताकत नहीं रोक पाएगी। उन्होंने जोर देकर कहा कि आने वाले हजार वर्षों के लिए भारत की नींव तभी मज़बूत होगी जब अगले एक दशक में मैकाले की मानसिक गुलामी की परियोजना पूरी तरह ध्वस्त हो जाएगी। उन्होंने इस बात पर प्रकाश डाला कि अयोध्या में रामलला मंदिर परिसर और भी भव्य होता जा रहा है और अयोध्या के सौंदर्यीकरण का कार्य तेज़ी से जारी है। उन्होंने घोषणा की कि अयोध्या एक बार फिर दुनिया के लिए एक मिसाल बनने वाला शहर बन रहा है। उन्होंने कहा कि त्रेता युग में अयोध्या ने मानवता को उसकी आचार संहिता दी थी और 21वीं सदी में अयोध्या मानवता को विकास का एक नया मॉडल दे रही है। उन्होंने आगे कहा कि तब अयोध्या अनुशासन का केंद्र थी और अब अयोध्या एक विकसित भारत की रीढ़ बनकर उभर रही है।
प्रधानमंत्री ने कहा कि भविष्य में अयोध्या परंपरा और आधुनिकता का संगम होगा, जहां सरयू का पावन प्रवाह और विकास की धारा एक साथ बहेगी। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि अयोध्या आध्यात्मिकता और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के बीच सामंजस्य स्थापित करेगी। उन्होंने कहा कि राम पथ, भक्ति पथ और जन्मभूमि पथ मिलकर एक नई अयोध्या का दर्शन कराते हैं। उन्होंने भव्य हवाई अड्डे और शानदार रेलवे स्टेशन का जिक्र किया, जहां वंदे भारत और अमृत भारत एक्सप्रेस ट्रेनें अयोध्या को देश के बाकी हिस्सों से जोड़ती हैं। उन्होंने जोर देकर कहा कि अयोध्या के लोगों को सुविधाएं प्रदान करने और उनके जीवन में समृद्धि लाने के लिए निरंतर काम किया जा रहा है। उन्होंने बताया कि प्राण प्रतिष्ठा के बाद से लगभग 45 करोड़ श्रद्धालु दर्शन के लिए आ चुके हैं, जिससे अयोध्या और आसपास के क्षेत्रों के लोगों की आय में वृद्धि हुई है। उन्होंने कहा कि एक समय अयोध्या विकास के मानकों पर पिछड़ा हुआ था, लेकिन आज यह उत्तर प्रदेश के अग्रणी शहरों में से एक के रूप में उभर रहा है।
21वीं सदी के आने वाले युग को अत्यंत महत्वपूर्ण बताते हुए, श्री मोदी ने इस बात पर प्रकाश डाला कि स्वतंत्रता के बाद के 70 वर्षों में भारत दुनिया की 11वीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन गया, लेकिन पिछले 11 वर्षों में ही भारत 5वीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन गया है। उन्होंने कहा कि वह दिन दूर नहीं जब भारत दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था भी बन जाएगा। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि आने वाला समय नए अवसरों और नई संभावनाओं का है और इस महत्वपूर्ण अवधि में भगवान राम के विचार राष्ट्र को प्रेरित करते रहेंगे। प्रधानमंत्री ने बताया कि जब भगवान श्री राम ने रावण पर विजय की महान चुनौती का सामना किया, तो रथ के पहिये वीरता और धैर्य थे, ध्वज सत्य और सदाचार था, अश्व बल, बुद्धि, संयम और परोपकार थे, और लगाम क्षमा, करुणा और समता थी, जिसने रथ को सही दिशा में आगे बढ़ाया।
प्रधानमंत्री ने कहा कि विकसित भारत की यात्रा को गति देने के लिए ऐसे रथ की आवश्यकता है जिसके पहिए वीरता और धैर्य से संचालित हों, अर्थात चुनौतियों का सामना करने का साहस और परिणाम प्राप्त होने तक अडिग रहने का धैर्य। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि इस रथ का ध्वज सत्य और सर्वोच्च आचरण होना चाहिए, अर्थात नीति, नीयत और नैतिकता से कभी समझौता नहीं किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि इस रथ के घोड़े बल, बुद्धि, अनुशासन और परोपकार होने चाहिए, अर्थात शक्ति, बुद्धि, संयम और दूसरों की सेवा की भावना होनी चाहिए। उन्होंने जोर देकर कहा कि इस रथ की लगाम क्षमा, करुणा और समता होनी चाहिए, अर्थात सफलता में अहंकार नहीं होना चाहिए और असफलता में भी दूसरों के प्रति सम्मान होना चाहिए। श्री मोदी ने श्रद्धापूर्वक कहा कि यह क्षण कंधे से कंधा मिलाकर चलने, गति बढ़ाने और रामराज्य से प्रेरित भारत के निर्माण का है। उन्होंने अंत में कहा कि यह तभी संभव है जब राष्ट्रहित, स्वार्थ से ऊपर रहे, और एक बार फिर सभी को हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं दीं।
उत्तर प्रदेश की राज्यपाल श्रीमती आनंदीबेन पटेल, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री श्री योगी आदित्यनाथ, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत इस कार्यक्रम में अन्य गणमान्य व्यक्तियों के अलावा उपस्थित थे।
उल्लेखनीय है कि यह कार्यक्रम मार्गशीर्ष मास के शुक्ल पक्ष की शुभ पंचमी को, श्री राम और माता सीता के विवाह पंचमी के अभिजीत मुहूर्त के साथ, दिव्य मिलन के प्रतीक दिवस के रूप में मनाया जा रहा है। यह तिथि नौवें सिख गुरु - गुरु तेग बहादुर जी के शहीदी दिवस का भी प्रतीक है, जिन्होंने 17वीं शताब्दी में अयोध्या में 48 घंटे तक निरंतर ध्यान किया था, जिससे इस दिन का आध्यात्मिक महत्व और भी बढ़ जाता है।
दस फुट ऊंचे और बीस फुट लंबे समकोण त्रिभुजाकार ध्वज पर भगवान श्री राम के तेज और पराक्रम का प्रतीक एक दीप्तिमान सूर्य की छवि अंकित है, जिस पर 'ॐ' अंकित है और कोविदार वृक्ष की छवि भी अंकित है। यह पवित्र भगवा ध्वज राम राज्य के आदर्शों को साकार करते हुए गरिमा, एकता और सांस्कृतिक निरन्तरता का संदेश देगा।
ध्वज पारंपरिक उत्तर भारतीय नागर स्थापत्य शैली में निर्मित शिखर के ऊपर फहराया जाएगा, जबकि मंदिर के चारों ओर निर्मित 800 मीटर का परकोटा, जो दक्षिण भारतीय स्थापत्य परंपरा में डिजाइन किया गया है, मंदिर की स्थापत्य विविधता को प्रदर्शित करता है।
मंदिर परिसर में मुख्य मंदिर की बाहरी दीवारों पर वाल्मीकि रामायण पर आधारित भगवान श्री राम के जीवन से जुड़े 87 जटिल रूप से तराशे गए पत्थर के प्रसंग और परिसर की दीवारों पर भारतीय संस्कृति से जुड़े 79 कांस्य-ढाल वाले प्रसंग अंकित हैं। ये सभी तत्व मिलकर सभी आगंतुकों को एक सार्थक और शिक्षाप्रद अनुभव प्रदान करते हैं, जिससे उन्हें भगवान श्री राम के जीवन और भारत की सांस्कृतिक विरासत की गहरी समझ मिलती है।
श्री राम जन्मभूमि मंदिर ध्वजारोहण
श्री राम जन्मभूमि मंदिर ध्वजारोहण उत्सव के दौरान प्रधानमंत्री के भाषण का मूल पाठ
सियावर राम चंद्र की जय !
सियावर राम चंद्र की जय !
जय सियाराम !
उत्तर प्रदेश की राज्यपाल आनंदीबेन पटेल, राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के परम पूजनीय सरसंघचालक डॉक्टर मोहन भागवत जी, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी, श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के अध्यक्ष पूज्य महंत नृत्य गोपाल दास जी, पूज्य संत समाज, यहां पधारे सभी भक्तगण, देश और दुनिया से इस ऐतिहासिक पल के साक्षी बन रहे कोटि-कोटि रामभक्त, देवियों और सज्जनों !
आज अयोध्या नगरी भारत की सांस्कृतिक चेतना के एक और उत्कर्ष बिंदु की साक्षी बन रही है। आज सम्पूर्ण भारत, सम्पूर्ण विश्व, राममय है। हर रामभक्त के हृदय में अद्वितीय संतोष है, असीम कृतज्ञता है, अपार अलौकिक आनंद है। सदियों के घाव भर रहे हैं, सदियों की वेदना आज विराम पा रही है, सदियों का संकल्प आज सिद्धि को प्राप्त हो रहा है। आज उस यज्ञ की पूर्णाहुति है, जिसकी अग्नि 500 वर्ष तक प्रज्वलित रही। जो यज्ञ एक पल भी आस्था से डिगा नहीं, एक पल भी विश्वास से टूटा नहीं। आज, भगवान श्री राम के गर्भगृह की अनंत ऊर्जा, श्री राम परिवार का दिव्य प्रताप, इस धर्म ध्वजा के रूप में, इस दिव्यतम, भव्यतम मंदिर में प्रतिष्ठापित हुआ है।
और साथियों,
ये धर्म ध्वजा केवल एक ध्वजा नहीं, ये भारतीय सभ्यता के पुनर्जागरण का ध्वज है। इसका भगवा रंग, इस पर रचित सूर्यवंश की ख्याति, वर्णित ओम् शब्द और अंकित कोविदार वृक्ष रामराज्य की कीर्ति को प्रतिरूपित करता है। ये ध्वज संकल्प है, ये ध्वज सफलता है। ये ध्वज संघर्ष से सृजन की गाथा है, ये ध्वज सदियों से चले आ रहे स्वप्नों का साकार स्वरूप है। ये ध्वज संतों की साधना और समाज की सहभागिता की सार्थक परिणीति है।
साथियों,
आने वाली सदियों और सहस्र-शताब्दियों तक, ये धर्मध्वज प्रभु राम के आदर्शों और सिद्धांतों का उद्घोष करेगा। ये धर्मध्वज आह्वान करेगा- सत्यमेव जयते नानृतं! यानी, जीत सत्य की ही होती है, असत्य की नहीं। ये धर्मध्वज उद्घोष करेगा- सत्यम्-एकपदं ब्रह्म सत्ये धर्मः प्रतिष्ठितः। अर्थात्, सत्य ही ब्रह्म का स्वरूप है, सत्य में ही धर्म स्थापित है। ये धर्मध्वज प्रेरणा बनेगा- प्राण जाए पर वचन न जाहीं। अर्थात्, जो कहा जाए, वही किया जाए। ये धर्मध्वज संदेश देगा- कर्म प्रधान विश्व रचि राखा! अर्थात्, विश्व में कर्म और कर्तव्य की प्रधानता हो। ये धर्मध्वज कामना करेगा- बैर न बिग्रह आस न त्रासा। सुखमय ताहि सदा सब आसा॥ यानी, भेदभाव, पीड़ा-परेशानी से मुक्ति, समाज में शांति और सुख हो। ये धर्मध्वज हमें संकल्पित करेगा- नहिं दरिद्र कोउ दुखी न दीना। यानी, हम ऐसा समाज बनाएं, जहां गरीबी न हो, कोई दुखी या लाचार न हो।
साथियों,
हमारे ग्रन्थों में कहा गया है- आरोपितं ध्वजं दृष्ट्वा, ये अभिनन्दन्ति धार्मिकाः। ते अपि सर्वे प्रमुच्यन्ते, महा पातक कोटिभिः॥ यानी, जो लोग किसी कारण मंदिर नहीं आ पाते, और दूर से मंदिर के ध्वज को प्रणाम कर लेते हैं, उन्हें भी उतना ही पुण्य मिल जाता है।
साथियों,
ये धर्मध्वज भी इस मंदिर के ध्येय का प्रतीक है। ये ध्वज दूर से ही रामलला की जन्मभूमि के दर्शन कराएगा। और, युगों-युगों तक प्रभु श्रीराम के आदेशों और प्रेरणाओं को मानव मात्र तक पहुंचाएगा।
साथियों,
मैं सम्पूर्ण विश्व के करोड़ों रामभक्तों को इस अविस्मरणीय क्षण की, इस अद्वितीय अवसर की हार्दिक शुभकामनाएँ देता हूँ। मैं आज उन सभी भक्तों को भी प्रणाम करता हूं, हर उस दानवीर का भी आभार व्यक्त करता हूं, जिसने राम मंदिर निर्माण के लिए अपना सहयोग दिया। मैं राम मंदिर के निर्माण से जुड़े हर श्रमवीर, हर कारीगर, हर योजनाकार, हर वास्तुकार, सभी का अभिनंदन करता हूं।
साथियों,
अयोध्या वह भूमि है, जहां आदर्श, आचरण में बदलते हैं। यही वह नगरी है, जहाँ से श्रीराम ने अपना जीवन–पथ शुरू किया था। इसी अयोध्या ने संसार को बताया कि एक व्यक्ति कैसे समाज की शक्ति से, उसके संस्कारों से, पुरुषोत्तम बनता है। जब श्रीराम अयोध्या से वनवास को गए, तो वे युवराज राम थे, लेकिन जब लौटे, तो मर्यादा पुरुषोत्तम बनकर के आए। और उनके मर्यादा पुरुषोत्तम बनने में महर्षि वशिष्ठ का ज्ञान, महर्षि विश्वामित्र की दीक्षा, महर्षि अगस्त्य का मार्गदर्शन, निषादराज की मित्रता, मां शबरी की ममता, भक्त हनुमान का समर्पण, इन सबकी, अनगिनत ऐसे लोगों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है।
साथियों,
विकसित भारत बनाने के लिए भी समाज की इसी सामूहिक शक्ति की आवश्यकता है। मुझे बहुत खुशी है कि राम मंदिर का ये दिव्य प्रांगण, भारत के सामूहिक सामर्थ्य की भी चेतना स्थली बन रहा है। यहां सप्तमंदिर बने हैं। यहां माता शबरी का मंदिर बना है, जो जनजातीय समाज के प्रेमभाव और आतिथ्य परंपरा की प्रतिमूर्ति हैं। यहां निषादराज का मंदिर बना है, ये उस मित्रता का साक्षी है, जो साधन नहीं, साध्य को, उसकी भावना को पूजती है। यहां एक ही स्थान पर माता अहिल्या हैं, महर्षि वाल्मीकी हैं, महर्षि वशिष्ठ हैं, महर्षि विश्वामित्र हैं, महर्षि अगस्त्य हैं, और संत तुलसीदास हैं। रामलला के साथ-साथ इन सभी ऋषियों के दर्शन भी यहीं पर होते हैं। यहां जटायु जी और गिलहरी की मूर्तियां भी हैं, जो बड़े संकल्पों की सिद्धि के लिए हर छोटे से छोटे प्रयास के महत्व को दिखाती हैं। मैं आज हर देशवासी से कहूंगा कि वो जब भी राम मंदिर आएं, तो सप्त मंदिर के दर्शन भी अवश्य करें। ये मंदिर हमारी आस्था के साथ-साथ, मित्रता, कर्तव्य और सामाजिक सद्भाव के मूल्यों को भी शक्ति देते हैं।
साथियों,
हम सब जानते हैं, हमारे राम भेद से नहीं, भाव से जुड़ते हैं। उनके लिए व्यक्ति का कुल नहीं, उसकी भक्ति महत्वपूर्ण है। उन्हें वंश नहीं, मूल्य प्रिय हैं। उन्हें शक्ति नहीं, सहयोग महान लगता है। आज हम भी उसी भावना से आगे बढ़ रहे हैं। पिछले 11 वर्षों में, महिला, दलित, पिछड़े, अति-पिछड़े, आदिवासी, वंचित, किसान, श्रमिक, युवा, हर वर्ग को विकास के केंद्र में रखा गया है। जब देश का हर व्यक्ति, हर वर्ग, हर क्षेत्र सशक्त होगा, तब संकल्प की सिद्धि में सबका प्रयास लगेगा। और सबके प्रयास से ही 2047, जब देश आज़ादी के 100 साल मनाएगा, हमें 2047 तक विकसित भारत का निर्माण करना ही होगा।
साथियों,
रामलला की प्राण प्रतिष्ठा के ऐतिहासिक अवसर पर, मैंने राम से राष्ट्र के संकल्प की चर्चा की थी। मैंने कहा था कि हमें आने वाले एक हज़ार वर्षों के लिए भारत की नींव मज़बूत करनी है। हमें याद रखना है, जो सिर्फ वर्तमान का सोचते हैं, वो आने वाली पीढ़ियों के साथ अन्याय करते हैं। हमें वर्तमान के साथ-साथ भावी पीढ़ियों के बारे में भी सोचना है। क्योंकि, हम जब नहीं थे, ये देश तब भी था, जब हम नहीं रहेंगे, ये देश तब भी रहेगा। हम एक जीवंत समाज हैं, हमें दूरदृष्टि के साथ ही काम करना होगा। हमें आने वाले दशकों, आने वाली सदियों को ध्यान में रखना ही होगा।
और साथियों,
इसके लिए भी हमें प्रभु राम से सीखना होगा। हमें उनके व्यक्तित्व को समझना होगा, हमें उनके व्यवहार को आत्मसात करना होगा, हमें याद रखना होगा, राम यानी- आदर्श, राम यानी- मर्यादा, राम यानी- जीवन का सर्वोच्च चरित्र। राम यानी- सत्य और पराक्रम का संगम, “दिव्यगुणैः शक्रसमो रामः सत्यपराक्रमः।” राम यानी- धर्मपथ पर चलने वाला व्यक्तित्व, “रामः सत्पुरुषो लोके सत्यः सत्यपरायणः।” राम यानी- जनता के सुख को सर्वोपरि रखना, प्रजा सुखत्वे चंद्रस्य। राम यानी- धैर्य और क्षमा का दरिया “वसुधायाः क्षमागुणैः”। राम यानी- ज्ञान और विवेक की पराकाष्ठा, बुद्धया बृहस्पते: तुल्यः। राम यानी- कोमलता में दृढ़ता, “मृदुपूर्वं च भाषते”। राम यानी- कृतज्ञता का सर्वोच्च उदाहरण, “कदाचन नोपकारेण, कृतिनैकेन तुष्यति।” राम यानी- श्रेष्ठ संगति का चयन, शील वृद्धै: ज्ञान वृद्धै: वयो वृद्धै: च सज्जनैः। राम यानी- विनम्रता में महाबल, वीर्यवान्न च वीर्येण, महता स्वेन विस्मितः। राम यानी- सत्य का अडिग संकल्प, “न च अनृत कथो विद्वान्”। राम यानी- जागरूक, अनुशासित और निष्कपट मन, “निस्तन्द्रिः अप्रमत्तः च, स्व दोष पर दोष वित्।”
साथियों,
राम सिर्फ एक व्यक्ति नहीं, राम एक मूल्य हैं, एक मर्यादा हैं, एक दिशा हैं। अगर भारत को साल 2047 तक विकसित बनाना है, अगर समाज को सामर्थ्यवान बनाना है, तो हमें अपने भीतर “राम” को जगाना होगा। हमें अपने भीतर के राम की प्राण प्रतिष्ठा करनी होगी, और इस संकल्प के लिए आज से बेहतर दिन और क्या हो सकता है?
साथियों,
25 नवंबर का ये ऐतिहासिक दिन अपनी विरासत पर गर्व का एक और अद्भुत क्षण लेकर आया है। इसकी वजह है, धर्मधव्जा पर अंकित- कोविदार वृक्ष। ये कोविदार वृक्ष इस बात का उदाहरण है कि जब हम अपनी जड़ों से कट जाते हैं, तो हमारा वैभव इतिहास के पन्नों में दब जाता है।
साथियों,
जब भरत अपनी सेना के साथ चित्रकूट पहुंचे, तो लक्ष्मण ने दूर से ही अयोध्या की सेना को पहचान लिया। ये कैसे हुआ, इसका वर्णन वाल्मीकि जी ने किया है, और वाल्मीकि जी ने क्या वर्णन किया है, उन्होंने कहा है - विराजति उद्गत स्कन्धम्, कोविदार ध्वजः रथे।। लक्ष्मण कहते हैं— “हे राम, सामने जो तेजस्वी प्रकाश में विशाल वृक्ष जैसा ध्वज दिखाई दे रहा है, वही अयोध्या की सेना का ध्वज है, उस पर कोविदार का शुभ चिह्न अंकित है।”
साथियों,
आज जब राम मंदिर के प्रांगण में कोविदार फिर से प्रतिष्ठित हो रहा है, यह केवल एक वृक्ष की वापसी नहीं है, यह हमारी स्मृति की वापसी है, हमारी अस्मिता का पुनर्जागरण है, हमारी स्वाभिमानी सभ्यता का पुनः उद्घोष है। कोविदार वृक्ष हमें याद दिलाता है कि जब हम अपनी पहचान भूलते हैं, तो हम स्वयं को खो देते हैं। और जब पहचान लौटती है, तो राष्ट्र का आत्मविश्वास भी लौट आता है। और इसलिए मैं कहता हूं, देश को आगे बढ़ना है, तो अपनी विरासत पर गर्व करना होगा।
साथियों,
अपनी विरासत पर गर्व के साथ-साथ, एक और बात भी महत्वपूर्ण है, और वो है- गुलामी की मानसिकता से पूरी तरह मुक्ति। आज से 190 साल पहले, 190 साल पहले, साल 1835 में मैकाले नाम के एक अंग्रेज़ ने भारत को अपनी जड़ों से उखाड़ने के बीज बोए थे। मैकाले ने भारत में मानसिक गुलामी की नींव रखी थी। दस साल बाद, यानि 2035 में उस अपवित्र घटना को 200 वर्ष पूरे हो रहे हैं। कुछ दिन पहले ही मैंने एक कार्यक्रम में आग्रह किया था कि हमें आने वाले दस वर्षों तक, उस दस वर्षों का लक्ष्य लेकर चलना है कि भारत को गुलामी की मानसिकता से मुक्त करके रहेंगे।
साथियों,
सबसे बड़ा दुर्भाग्य ये है कि मैकाले ने जो कुछ सोचा था, उसका प्रभाव कहीं व्यापक हुआ। हमें आज़ादी मिली, लेकिन हीन भावना से मुक्ति नहीं मिली। हमारे यहां एक विकार आ गया कि विदेश की हर चीज़, हर व्यवस्था अच्छी है, और जो हमारी अपनी चीजें हैं, उनमें खोट ही खोट है।
साथियों,
गुलामी की यही मानसिकता है, जिसने लगातार ये स्थापित किया, हमने विदेशों से लोकतंत्र लिया, कहा गया कि हमारा संविधान भी विदेश से प्रेरित है, जबकि सच ये है कि भारत लोकतंत्र की जननी है, Mother of Democracy है, लोकतंत्र हमारे DNA में है।
साथियों,
अगर आप तमिलनाडु जाएंगे, तो तमिलनाडु के उत्तरी हिस्से में उत्तिरमेरूर गांव है। वहां हज़ारों वर्ष पहले का एक शिलालेख है। उसमें बताया गया है कि उस कालखंड में भी कैसे लोकतांत्रिक तरीके से शासन व्यवस्था चलती थी, लोग कैसे सरकार चुनते थे। लेकिन हमारे यहां तो मैग्ना कार्टा की प्रशंसा का ही चलन रहा। हमारे यहां भगवान बसवन्ना, उनके अनुभव मंटपा की जानकारी भी सीमित रखी गई। अनुभव मंटपा यानि, जहां सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक विषयों पर सार्वजनिक बहस होती थी। जहां सामूहिक सहमति से निर्णय लिए जाते थे। लेकिन गुलामी की मानसिकता के कारण, इस भारत की कितनी ही पीढ़ियों को इस जानकारी से भी वंचित रखा गया।
साथियों,
हमारी व्यवस्था के हर कोने में गुलामी की इस मानसिकता ने डेरा डाला हुआ था। आप याद करिए, भारतीय नौसेना का ध्वज, सदियों तक उस ध्वज पर ऐसे प्रतीक बने रहे, जिनका हमारी सभ्यता, हमारी शक्ति, हमारी विरासत से कोई संबंध नहीं था। अब हमने नौसेना के ध्वज से गुलामी के हर प्रतीक को हटाया है। हमने छत्रपति शिवाजी महाराज की विरासत को स्थापित किया है। और ये सिर्फ एक डिजाइन में बदलाव नहीं हुआ, ये मानसिकता बदलने का क्षण था। ये वो घोषणा थी कि भारत अब अपनी शक्ति, अपने प्रतीकों से परिभाषित करेगा, न कि किसी और की विरासत से।
और साथियों,
यही परिवर्तन आज अयोध्या में भी दिख रहा है।
साथियों,
ये गुलामी की मानसिकता ही है, जिसने इतने वर्षों तक रामत्व को नकारा है। भगवान राम, अपने आप में एक वैल्यू सिस्टम हैं। ओरछा के राजा राम से लेकर, रामेश्वरम के भक्त राम तक, और शबरी के प्रभु राम से लेकर, मिथिला के पाहुन राम जी तक, भारत के हर घर में, हर भारतीय के मन में, और भारतवर्ष के हर कण-कण में राम हैं। लेकिन गुलामी की मानसिकता इतनी हावी हो गई कि प्रभु राम को भी काल्पनिक घोषित किया जाने लगा।
साथियों,
अगर हम ठान लें, अगले दस साल में मानसिक गुलामी से पूरी तरह मुक्ति पा लेंगे, और तब जाकर के, तब जाकर के ऐसी ज्वाला प्रज्जवलित होगी, ऐसा आत्मविश्वास बढ़ेगा कि 2047 तक विकसित भारत का सपना पूरा होने से भारत को कोई रोक नहीं पाएगा। आने वाले एक हज़ार वर्ष के लिए भारत की नींव तभी सशक्त होगी, जब मैकाले की गुलामी के प्रोजेक्ट को हम अगले 10 साल में पूरी तरह ध्वस्त करके दिखा देंगे।
साथियों,
अयोध्या धाम में रामलला का मंदिर परिसर भव्य से भव्यतम हो रहा है, और साथ ही अयोध्या को संवारने का काम लगातार जारी है। आज अयोध्या फिर से वह नगरी बन रही है, जो दुनिया के लिए उदाहरण बनेगी। त्रेता युग की अयोध्या ने मानवता को नीति दी, 21वीं सदी की अयोध्या मानवता को विकास का नया मॉडल दे रही है। तब अयोध्या मर्यादा का केंद्र थी, अब अयोध्या विकसित भारत का मेरुदंड बनकर उभर रही है।
साथियों,
भविष्य की अयोध्या में पौराणिकता और नूतनता का संगम होगा। सरयू जी की अमृत धारा और विकास की धारा, एक साथ बहेंगी। यहां आध्यात्म और आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस, दोनों का तालमेल दिखेगा। राम पथ, भक्ति पथ और जन्मभूमि पथ से नई अयोध्या के दर्शन होते हैं। अयोध्या में भव्य एयरपोर्ट है, अयोध्या में आज शानदार रेलवे स्टेशन है। वंदे भारत और अमृत भारत एक्सप्रेस जैसी ट्रेनें अयोध्या को बाकी देश से जोड़ रही हैं। अयोध्या वासियों को सुविधाएं मिलें, उनके जीवन में समृद्धि आए, इसके लिए निरंतर काम चल रहा है।
साथियों,
जब से प्राण प्रतिष्ठा हुई है, तब से लेकर आज तक करीब-करीब पैंतालीस करोड़ श्रद्धालु, यहां दर्शन के लिए आ चुके हैं। ये वो पवित्र भूमि है, जहां पैंतालीस करोड़ लोगों के चरण रज पड़े हैं। और इससे अयोध्या और आसपास के लोगों की आय में आर्थिक परिवर्तन आया है, वृद्धि हुई है। कभी अयोध्या विकास के पैमानों में बहुत पीछे थी, आज अयोध्या नगरी यूपी के अग्रणी शहरों में से एक बन रही है।
साथियों,
21वीं सदी का आने वाला समय बहुत महत्वपूर्ण है। आजादी के बाद के 70 साल में भारत, 70 साल में भारत विश्व की 11वीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बना, 70 साल में 11वीं। लेकिन पिछले 11 साल में ही भारत विश्व की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन चुका है। और वो दिन दूर नहीं, जब भारत विश्व की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था भी बन जाएगा। आने वाला समय नए अवसरों का है, नई संभावनाओं का है। और इस अहम कालखंड में भी भगवान राम के विचार ही हमारी प्रेरणा बनेंगे। जब श्रीराम के सामने रावण विजय जैसा विशाल लक्ष्य था, तब उन्होंने कहा था- सौरज धीरज तेहि रथ चाका। सत्य सील दृढ़ ध्वजा पताका।। बल बिबेक दम परहित घोरे। छमा कृपा समता रजु जोरे।। यानि, रावण पर विजय पाने के लिए जो रथ चाहिए, शौर्य और धैर्य उसके पहिए हैं। उसकी ध्वजा सत्य और अच्छे आचरण की है। बल, विवेक, संयम और परोपकार इस रथ के घोड़े हैं। लगाम के रूप में क्षमा, दया और समता हैं, जो रथ को सही दिशा में रखते हैं।
साथियों,
विकसित भारत की यात्रा को गति देने के लिए ऐसा ही रथ चाहिए, ऐसा रथ जिसके पहिए शौर्य और धैर्य हों। यानि चुनौतियों से टकराने का साहस भी हो, और परिणाम आने तक दृढ़ता से डटे रहने का धैर्य भी हो। ऐसा रथ, जिसकी ध्वजा सत्य और सर्वोच्च आचरण हो, यानि नीति, नीयत और नैतिकता से समझौता कभी न हो। ऐसा रथ, जिसके घोड़े बल, विवेक, संयम और परोपकार हों, यानि शक्ति भी हो, बुद्धि भी हो, अनुशासन भी हो और दूसरों के हित का भाव भी हो। ऐसा रथ, जिसकी लगाम क्षमा, करुणा और समभाव हो, यानि जहां सफलता का अहंकार नहीं, और असफलता में भी दूसरों के प्रति सम्मान बना रहे। और इसलिए मैं आदरपूर्वक कहता हूँ, ये पल कंधे से कंधा मिलाने का है, ये पल गति बढ़ाने का है। हमें वो भारत बनाना है, जो रामराज्य से प्रेरित हो। और ये तभी संभव है, जब स्वयंहित से पहले, देशहित होगा। जब राष्ट्रहित सर्वोपरि रहेगा। एक बार फिर आप सभी को बहुत-बहुत शुभकामनाएं देता हूं।
जय सियाराम !
जय सियाराम !
जय सियाराम !
Monday, November 24, 2025
प्राचीन रविदास मंदिर का सौंदर्यीकरण
उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ की सरकार राज्य में धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा दे रही है। उत्तर प्रदेश पर्यटन विभाग राजधानी लखनऊ में धार्मिक पर्यटन को नई दिशा देने के उद्देश्य से धार्मिक स्थलों के समग्र विकास पर तीव्र गति से कार्य कर रहा है। इसी कड़ी में लखनऊ के अलीगंज स्थित प्राचीन संत रविदास मंदिर का समेकित पर्यटन विकास 04.64 करोड़ रुपए की स्वीकृत योजना के अंतर्गत प्रारम्भ हो गया है। सौंदर्यीकरण से लेकर आधुनिक पर्यटक सुविधाओं के विस्तार तक पूरे परिसर को नया रूप देने की तैयारी है।
उत्तर प्रदेश के पर्यटन एवं संस्कृति मंत्री जयवीर सिंह ने 24 नवम्बर 2025 को लखनऊ में यह जानकारी देते हुए कहा कि संत रविदास मंदिर के प्रति श्रद्धालुओं की आस्था, बढ़ती भीड़ और स्थानीय महत्व को ध्यान में रखकर विकास कार्य किए जा रहे हैं। इनमें सड़क मरम्मत, पेयजल व्यवस्था, बेहतर प्रकाश व्यवस्था, श्रद्धालुओं के बैठने के लिए बेंच तथा मंदिर परिसर के जर्जर भागों का पुनरुद्धार जैसे कार्य सम्मिलित हैं। सरकार का प्रयास है कि विकास कार्यों के माध्यम से भक्तों के लिए सुगम, सुरक्षित और बेहतर अनुभव सुनिश्चित किया जा सके।
उल्लेखनीय है कि अलीगंज स्थित संत रविदास मंदिर राजधानी के प्राचीन धार्मिक स्थलों में से एक माना जाता है। मंदिर के मुख्य द्वार पर अंकित स्थापना वर्ष 1924 इस बात का प्रमाण है कि यह मंदिर 101 वर्ष पुराना है। यह स्थल दशकों से स्थानीय समुदाय के धार्मिक, सांस्कृतिक और सामाजिक जीवन का केंद्र रहा है। मंदिर परिसर में तीन प्राचीन समाधियां भी स्थित हैं, जिनमें से एक को मंदिर के निर्माणसे पूर्व का माना जाता है। बाकी दो समाधियां बाबा लीलादास और बाबा टिकाईदास से संबंधित हैं, जिन्होंने लंबे समय तक मंदिर में सेवाएं दीं।
संत रविदास मंदिर के प्रति स्थानीय समुदाय का भावनात्मक जुड़ाव अत्यंत गहरा रहा है। मंदिर के बाहर वर्षों से जूतों की मरम्मत का कार्य करने वाले नौमी लाल बताते हैं कि उनके पिता भी इसी स्थान पर कार्य किया करते थे। वहीं, मिष्ठान विक्रेता भोलानाथ का कहना है कि उनके बाबा 1931 से मंदिर के बाहर दुकान लगाते थे। तभी से यह पूरा क्षेत्र धार्मिक और सामाजिक गतिविधियों का महत्वपूर्ण के केंद्र रहा है। संत रविदास जयंती पर यहां हर वर्ष बड़े पैमाने पर विशेष आयोजन होता है, जिसमें स्थानीय लोग भाग लेते हैं। मंदिर परिसर को सजाने-संवारने में अपना योगदान देते हैं। स्थानीय व्यापारियों का मानना है कि मंदिर के सौंदर्यीकरण के बाद श्रद्धालुओं की संख्या में निश्चित रूप से वृद्धि की संभावना है।
इस मंदिर का समेकित पर्यटन विकास सरकार की प्राथमिकताओं में सम्मिलित है। मंदिर परिसर के सौंदर्यीकरण, अवसंरचनात्मक सुधार और आधुनिक सुविधाओं के विस्तार का कार्य तीव्र गति से प्रारम्भ हो चुका है। सरकार का उद्देश्य श्रद्धालुओं को एक बेहतर, सुरक्षित और सुव्यवस्थित वातावरण उपलब्ध कराना है। इस मंदिर से स्थानीय समुदाय पीढ़ियों से भावनात्मक रूप से जुड़े हैं। इसके विकास से न केवल भक्तों की सुविधा बढ़ेगी, अपितु क्षेत्र में रोजगार-व्यापार के नए अवसर भी सृजित होंगे।
उत्तर प्रदेश के पर्यटन एवं संस्कृति मंत्री जयवीर सिंह ने 24 नवम्बर 2025 को लखनऊ में यह जानकारी देते हुए कहा कि संत रविदास मंदिर के प्रति श्रद्धालुओं की आस्था, बढ़ती भीड़ और स्थानीय महत्व को ध्यान में रखकर विकास कार्य किए जा रहे हैं। इनमें सड़क मरम्मत, पेयजल व्यवस्था, बेहतर प्रकाश व्यवस्था, श्रद्धालुओं के बैठने के लिए बेंच तथा मंदिर परिसर के जर्जर भागों का पुनरुद्धार जैसे कार्य सम्मिलित हैं। सरकार का प्रयास है कि विकास कार्यों के माध्यम से भक्तों के लिए सुगम, सुरक्षित और बेहतर अनुभव सुनिश्चित किया जा सके।
उल्लेखनीय है कि अलीगंज स्थित संत रविदास मंदिर राजधानी के प्राचीन धार्मिक स्थलों में से एक माना जाता है। मंदिर के मुख्य द्वार पर अंकित स्थापना वर्ष 1924 इस बात का प्रमाण है कि यह मंदिर 101 वर्ष पुराना है। यह स्थल दशकों से स्थानीय समुदाय के धार्मिक, सांस्कृतिक और सामाजिक जीवन का केंद्र रहा है। मंदिर परिसर में तीन प्राचीन समाधियां भी स्थित हैं, जिनमें से एक को मंदिर के निर्माणसे पूर्व का माना जाता है। बाकी दो समाधियां बाबा लीलादास और बाबा टिकाईदास से संबंधित हैं, जिन्होंने लंबे समय तक मंदिर में सेवाएं दीं।
संत रविदास मंदिर के प्रति स्थानीय समुदाय का भावनात्मक जुड़ाव अत्यंत गहरा रहा है। मंदिर के बाहर वर्षों से जूतों की मरम्मत का कार्य करने वाले नौमी लाल बताते हैं कि उनके पिता भी इसी स्थान पर कार्य किया करते थे। वहीं, मिष्ठान विक्रेता भोलानाथ का कहना है कि उनके बाबा 1931 से मंदिर के बाहर दुकान लगाते थे। तभी से यह पूरा क्षेत्र धार्मिक और सामाजिक गतिविधियों का महत्वपूर्ण के केंद्र रहा है। संत रविदास जयंती पर यहां हर वर्ष बड़े पैमाने पर विशेष आयोजन होता है, जिसमें स्थानीय लोग भाग लेते हैं। मंदिर परिसर को सजाने-संवारने में अपना योगदान देते हैं। स्थानीय व्यापारियों का मानना है कि मंदिर के सौंदर्यीकरण के बाद श्रद्धालुओं की संख्या में निश्चित रूप से वृद्धि की संभावना है।
इस मंदिर का समेकित पर्यटन विकास सरकार की प्राथमिकताओं में सम्मिलित है। मंदिर परिसर के सौंदर्यीकरण, अवसंरचनात्मक सुधार और आधुनिक सुविधाओं के विस्तार का कार्य तीव्र गति से प्रारम्भ हो चुका है। सरकार का उद्देश्य श्रद्धालुओं को एक बेहतर, सुरक्षित और सुव्यवस्थित वातावरण उपलब्ध कराना है। इस मंदिर से स्थानीय समुदाय पीढ़ियों से भावनात्मक रूप से जुड़े हैं। इसके विकास से न केवल भक्तों की सुविधा बढ़ेगी, अपितु क्षेत्र में रोजगार-व्यापार के नए अवसर भी सृजित होंगे।
24 नवम्बर 2025
ठंड से किसी गोवंश की मृत्यु न हो
उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ की सरकार गोवंश के संरक्षण एवं संवर्धन के लिए प्रतिबद्ध है। इसलिए शीत ऋतु के दृष्टिगत संबंधित अधिकारियों को गोवंश शेड, चारा व जल की चरहिया, खडंजा आदि सुदृढ़ एवं व्यवस्थित करने के निदेश दिए गए हैं। जिन गौ आश्रय स्थलों में अव्यवस्था या गौवंश की देखभाल संबंधी कोई भी शिकायत संज्ञान में आए वहां तत्काल सुधार किया जाए। अवस्थापना संबंधी कार्यों में गुणवत्ता का पूरा ध्यान रखा जाए।
उत्तर प्रदेश के पशुधन विकास मंत्री श्री धर्म पाल सिंह ने 24 नवम्बर 2025 को अधिकारियों को निर्देश दिए हैं कि निराश्रित गोवंश के बेहतर देखभाल, रखरखाव एवं अन्य व्यवस्थाओं के लिए एक सप्ताह में सभी गोशालाओं का निरीक्षण सुनिश्चित किया जाए। गो आश्रय स्थलों पर गोवंश के ठंड से बचाव के लिए तिरपाल, अलाव, एवं भूसा आदि की पर्याप्त व्यवस्था की जाए। ठंड से किसी भी गोवंश की मृत्यु न हो। पशु चिकित्सा अधिकारी गौ आश्रयस्थल पर जाकर गोवंश के उत्तम स्वास्थ्य, चिकित्सा एवं औषधि की व्यवस्था सुनिश्चित करें। जनपद के नोडल अधिकारी गौ आश्रय स्थलों का नियमित रूप से निरीक्षण कर चारा, भूसा, पानी व प्रकाश आदि व्यवस्थाएं सुनिश्चित करें।
पशुधन मंत्री ने विधान भवन स्थित अपने कार्यालय कक्ष में गोआश्रय स्थलों की व्यवस्था गोवंश के रखरखाव एवं सुविधाओं की समीक्षा कर रहे थे। उन्होंने निर्देश देते हुए कहा कि पशु चिकित्सक, उप मुख्य पशु चिकित्सा अधिकारी, मुख्य पशु चिकित्साधिकारी एवं मंडल पर नियुक्त अपर निदेशक नियमित रूप से कम से कम एक गौशाला का निरीक्षण करेंगे। उन्होंने कहा कि सीवीओ स्थानीय स्तर पर जिलाधिकारी एवं मुख्य विकास अधिकारी से संपर्क कर राज्य की सभी निराश्रित गौशालाओं का सघन निरीक्षण सुनिश्चित कराएं। लापरवाही पर पर्यवेक्षण कार्यों के लिए उत्तरदायी अधिकारी की जवाबदेही सुनिश्चित की जाएगी। निराश्रित गौवंश सरकार की प्राथमिकताओं में सम्मिलित है। इसलिए प्रशासनिक अधिकारियों के स्तर पर गौशालाओं की व्यवस्था में कोई कमी नहीं रहे। समस्त जिम्मेदार अधिकारी यह सुनिश्चित करें।
Sunday, November 23, 2025
Saturday, November 22, 2025
शुभकामनायें
लखनऊ में श्री संजय मिश्रा जी , सम्पादक दैनिक जागरण (वाराणसी) की सुपुत्री की शुभ विवाह में सम्मिलित होकर स्वर्णिम दाम्पत्य जीवन की हार्दिक शुभकामनायें और बधाई दी.
Friday, November 21, 2025
टीवी पर लाइव
मतदाता सूची (Voter List) का नियमित पुनरीक्षण एक आवश्यक प्रक्रिया!
जिन लोगों की मृत्यु हो गई है या जो किसी अन्य क्षेत्र में शिफ्ट हो गए हैं, उनके नाम हटाए जा सकें।
नए योग्य मतदाताओं (18+ वर्ष) के नाम जोड़े जा सकें।
गलत या डुप्लिकेट नामों को हटाकर चुनाव की पारदर्शिता l
लोकतांत्रिक प्रक्रिया को मजबूत करने के लिए
सही मतदाता सूची से मतदान प्रतिशत और निष्पक्षता दोनों में सुधार होता है.
नाम, पता, फोटो या अन्य डिटेल्स में हुई गलतियों को सुधारा जा सकता है।
Thursday, November 20, 2025
बैठक
गुणवत्ता विकास हेतु चयनित विद्यालयों की महत्वपूर्ण बैठक – अवध व कानपुर प्रान्त
विद्या भारती पूर्वी उ.प्र. क्षेत्र द्वारा विद्यालयों में गुणवत्ता विकास को सुदृढ़ करने हेतु चयनित विद्यालयों के प्रबन्ध समिति अध्यक्ष, प्रबन्धक, कोषाध्यक्ष, प्रधानाचार्य एवं जिला केन्द्र समिति के सक्रिय सदस्यों की विशेष बैठक आयोजित की जा रही है।
मार्गदर्शन
मा० यतीन्द्र जी, अखिल भारतीय सह संगठन मंत्री, विद्या भारती।
डॉ0 सौरभ मालवीय, क्षेत्रीय मंत्री, विद्या भारती पूर्वी उ0प्र0
मा0 हेमचन्द्र जी, क्षेत्रीय संगठन मंत्री, विद्या भारती पूर्वी उ0प्र0
स्थान: सरस्वती कुंज, निराला नगर, लखनऊ
Sunday, November 16, 2025
Friday, November 14, 2025
टीवी पर लाइव
भारत विविधताओं का देश है — यहाँ अनेक भाषाएँ, संस्कृतियाँ, और परंपराएँ एक साथ पनपती हैं। इन सबमें जनजातीय समुदायों का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण रहा है। भारत के इतिहास, संस्कृति, स्वतंत्रता संग्राम और पर्यावरण संरक्षण में जनजातीय समाज की भूमिका अविस्मरणीय है। इन्हीं महान परंपराओं और वीरता को स्मरण करने के लिए हर वर्ष 15 नवम्बर को “जनजातीय गौरव दिवस” मनाया जाता है।
भारत सरकार ने वर्ष 2021 में प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी के नेतृत्व में यह घोषणा की कि 15 नवम्बर को "जनजातीय गौरव दिवस" के रूप में मनाया जाएगा। यह दिन भगवान बिरसा मुंडा जी की जयंती है — जो एक महान स्वतंत्रता सेनानी, समाज सुधारक और आदिवासी नायक थे। उन्होंने ब्रिटिश शासन के खिलाफ जनजातीय समाज को संगठित कर “उलगुलान” (महान विद्रोह) का नेतृत्व किया।
भगवान बिरसा मुंडा
बिरसा मुंडा का जन्म 15 नवम्बर 1875 को झारखंड के उलिहातू गाँव में हुआ था। उन्होंने जनजातीय समाज को सामाजिक बुराइयों, अंधविश्वास और शोषण से मुक्त करने का प्रयास किया। अंग्रेजों के अन्याय के खिलाफ उन्होंने हथियार उठाए और जनजातीय लोगों को “अबुआ डिसुम, अबुआ राज” (अपना देश, अपना राज) का संदेश दिया।
सिर्फ 25 वर्ष की आयु में उन्होंने अपने अदम्य साहस और बलिदान से भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन को नई दिशा दी।
यह दिवस हमें जनजातीय समाज के संघर्ष, परिश्रम, संस्कृति और परंपरा की याद दिलाता है।
देशभर के लोगों को आदिवासी नायकों के योगदान से परिचित कराना।
जनजातीय समाज की संस्कृति, कला, नृत्य, लोकगीत, और जीवनशैली का सम्मान करना।
आधुनिक भारत में जनजातीय समुदायों के समग्र विकास को बढ़ावा देना। आज की जरूरत है.
भारत सरकार ने वर्ष 2021 में प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी के नेतृत्व में यह घोषणा की कि 15 नवम्बर को "जनजातीय गौरव दिवस" के रूप में मनाया जाएगा। यह दिन भगवान बिरसा मुंडा जी की जयंती है — जो एक महान स्वतंत्रता सेनानी, समाज सुधारक और आदिवासी नायक थे। उन्होंने ब्रिटिश शासन के खिलाफ जनजातीय समाज को संगठित कर “उलगुलान” (महान विद्रोह) का नेतृत्व किया।
भगवान बिरसा मुंडा
बिरसा मुंडा का जन्म 15 नवम्बर 1875 को झारखंड के उलिहातू गाँव में हुआ था। उन्होंने जनजातीय समाज को सामाजिक बुराइयों, अंधविश्वास और शोषण से मुक्त करने का प्रयास किया। अंग्रेजों के अन्याय के खिलाफ उन्होंने हथियार उठाए और जनजातीय लोगों को “अबुआ डिसुम, अबुआ राज” (अपना देश, अपना राज) का संदेश दिया।
सिर्फ 25 वर्ष की आयु में उन्होंने अपने अदम्य साहस और बलिदान से भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन को नई दिशा दी।
यह दिवस हमें जनजातीय समाज के संघर्ष, परिश्रम, संस्कृति और परंपरा की याद दिलाता है।
देशभर के लोगों को आदिवासी नायकों के योगदान से परिचित कराना।
जनजातीय समाज की संस्कृति, कला, नृत्य, लोकगीत, और जीवनशैली का सम्मान करना।
आधुनिक भारत में जनजातीय समुदायों के समग्र विकास को बढ़ावा देना। आज की जरूरत है.
Wednesday, November 12, 2025
अमृतकाल में भारत और मीडिया
'अमृतकाल में भारत और मीडिया'
सम्पादक - डॉ. साधना श्रीवास्तव
प्रकाशक - पार्थ प्रकाशन, देहरादून
बधाई और आभार!!
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