Monday, March 31, 2025

संत चरण

संत चरण
आध्यात्मिक शिक्षा से व्यक्तित्व निर्माण की दिशा में असंख्य लोगों के मार्गदर्शक एवं प्रेरणास्रोत आदरणीय सर्वदेव जी का सानिध्य सुख 

शक्तिपीठ पाटन देवी माता

 




भारतीय नव वर्ष के पावन अवसर पर शक्तिपीठ पाटन देवी माता (तुलसीपुर) दर्शन का सौभाग्य मिला


Saturday, March 29, 2025

भारतीय नववर्ष उत्सव का उमंग

 

डॉ. सौरभ मालवीय
भारतीय नववर्ष के साथ अनेक त्यौहार आते हैं। इनमें चैत्र शुक्लादि, नवरेह, गुड़ी पड़वा, उगादि, साजिबु नोंगमा पांबा अथवा साजिबु चेराओबा एवं चेटीचंड आदि सम्मिलित हैं। चैत्र शुक्लादि विक्रम संवत के नववर्ष के प्रारम्भ का प्रतीक है। इसे वैदिक अथवा हिन्दू कैलेंडर के रूप में भी जाना जाता है। इस दिन से नवरात्रि का प्रारम्भ होता है। भारतीय नववर्ष के साथ वसंत ऋतु का भी आगमन होता है। इसलिए ये सब त्यौहार वसंत के उत्सव हैं।

नवरेह
जम्मू कश्मीर में नवरेह का त्यौहार हर्ष एवं उल्लास से मनाया जाता है। नव चंद्रवर्ष के रूप में मनाया जाने वाला यह त्यौहार उत्साह एवं रंगों का उत्सव है। यह कश्मीरी पंडितों का विशेष त्यौहार माना जाता है। त्यौहार से एक दिन पूर्व वे पवित्र विचर नाग के झरने की यात्रा करते हैं। इसके पश्चात वे पवित्र जल में स्नान करके अपनी समस्त मलिनताओं का त्याग करते हैं। इसके पश्चात् वे पूजा-अर्चना करके प्रसाद ग्रहण करते हैं। यह प्रसाद चावल एवं विभिन्न प्रकार की जड़ी-बूटियों से बनाया जाता है। नवरेह के प्रातःकाल में वे लोग सर्वप्रथम चावल से भरे पात्र को देखते हैं। उनका मानना है कि ऐसा करने से घर में समृद्धि आती है, क्योंकि चावल धन-धान्य एवं समृद्धि का प्रतीक है।

गुड़ी पड़वा
महाराष्ट्र में गुड़ी पड़वा का त्यौहार धूमधाम से मनाया जाता है। गुड़ी का अर्थ है विजय पताका तथा पड़वा का अर्थ है चंद्रमा का प्रथम दिवस। इस दिन लोग बांस के ऊपर चांदी, तांबे अथवा पीतल के कलश को उल्टा रखते हैं। कलश पर स्वास्तिक का चिह्न बनाया जाता है। बांस पर केसरिया रंग का पताका लगाया जाता है। तदुपरान्त इसे नीम एवं आम की पत्तियां और पुष्पों से सुसज्जित किया जाता है। इसे घर के सबसे उच्च स्थान पर लगाया जाता है। गृह द्वारों पर आम के पत्तों का तोरण लगाया जाता है। मान्यता है कि आम के पत्ते पवित्र होते हैं। इसके लगाने से नकारात्मक शक्तियां घर में प्रवेश नहीं कर पाती हैं तथा घर इनसे सुरक्षित रहता है।  

इस दिन भोजन में गुड़ एवं नीम परोसा जाता है। गुड़ की मिठास सुख एवं नीम की कड़वाहट दुःख का प्रतीक है अर्थात जीवन के सुख- दुःख को समान भाव से अपनाना चाहिए, क्योंकि मानव की परीक्षा दुःख में ही होती है।   
देश के विभिन्न भागों में इसे भिन्न-भिन्न नामों से जाना जाता है। गुड़ी पड़वा गोवा में संवत्सर पड़वा के रूप में मनाया जाता है। केरल में इसे संवत्सर पड़वो के रूप में मनाया जाता है। आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, कर्नाटक एवं तमिलनाडु सहित दक्षिण भारत के कई क्षेत्रों में इसे उगादी के रूप में मनाया जाता है। राजस्थान में इसे थापना एवं मणिपुर में साजिबु चेराओबा अथवा साजिबु नोंगमा पांबा के रूप में मनाया जाता है।

सिन्धी समुदाय के लोग चेटीचंड का त्यौहार हर्षोल्लास से मनाते हैं। यह त्यौहार भगवान झूलेलाल के जन्म दिवस के रूप में जाना जाता है। उनका जन्म पाकिस्तान के सिंध प्रांत के ग्राम नसरपुर में हुआ था। उनका वास्तविक नाम उदयचंद था। वे वरुण देव के अवतार माने जाते हैं। उन्हें उदेरोलाल, घोड़ेवारो, जिन्दपीर, लालसाँई, पल्लेवारो, ज्योतिनवारो, अमरलाल आदि नामों से भी जाना जाता है। वह सद्भावना के प्रतीक माने जाते हैं।

विक्रम सम्वत् का इतिहास
30 मार्च से विक्रम सम्वत् 2082 का प्रारम्भ चुका है। विक्रम सम्वत् को नव संवत्सर भी कहा जाता है। संवत्सर पांच प्रकार के होते हैं, जिनमें सौर, चन्द्र, नक्षत्र, सावन और अधिमास सम्मिलित हैं। मेष, वृष, मिथुन, कर्क, सिंह, कन्या, तुला, वृश्चिक, धनु, मकर, कुम्भ एवं मीन नामक बारह राशियां सूर्य वर्ष के महीने हैं। सूर्य का वर्ष 365 दिन का होता है। इसका प्रारम्भ सूर्य के मेष राशि में प्रवेश करने से होता है।  चैत्र, वैशाख, ज्येष्ठ, आषाढ़, श्रावण, भाद्रपद, आश्विन, कार्तिक, अग्रहायण, पौष, माघ और फाल्गुन चन्द्र वर्ष के महीने हैं। चन्द्र वर्ष 355 दिन का होता है। इस प्रकार इन दोनों वर्षों में दस दिन का अंतर हो जाता है। चन्द्र माह के बढ़े हुए दिनों को ही अधिमास या मलमास कहा जाता है। नक्षत्र माह 27 दिन का होता है, जिन्हें अश्विन नक्षत्र, भरणी नक्षत्र, कृत्तिका नक्षत्र, रोहिणी नक्षत्र, मृगशिरा नक्षत्र, आर्द्रा नक्षत्र, पुनर्वसु नक्षत्र, पुष्य नक्षत्र, आश्लेषा नक्षत्र, मघा नक्षत्र, पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्र, उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र, हस्त नक्षत्र, चित्रा नक्षत्र, स्वाति नक्षत्र, विशाखा नक्षत्र, अनुराधा नक्षत्र, ज्येष्ठा नक्षत्र, मूल नक्षत्र, पूर्वाषाढ़ा नक्षत्र, उत्तराषाढ़ा नक्षत्र, श्रवण नक्षत्र, घनिष्ठा नक्षत्र, शतभिषा नक्षत्र, पूर्वाभाद्रपद नक्षत्र, उत्तराभाद्रपद नक्षत्र, रेवती नक्षत्र कहा जाता है। सावन वर्ष में 360 दिन होते हैं। इसका एक महीना 30 दिन का होता है।   
 
विक्रम सम्वत् का महत्त्व
भारतीय संस्कृति में विक्रम सम्वत् का बहुत महत्त्व है। चैत्र का महीना भारतीय कैलेंडर के हिसाब से वर्ष का प्रथम महीना है। नवीन संवत्सर के संबंध में अनेक पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं। वैदिक पुराण एवं शास्त्रों के अनुसार चैत्र शुक्ल पक्ष प्रतिपदा तिथि को आदिशक्ति प्रकट हुई थीं। आदिशक्ति के आदेश पर ब्रह्मा ने सृष्टि की प्रारम्भ की थी। इसीलिए इस दिन को अनादिकाल से नववर्ष के रूप में जाना जाता है। मान्यता यह भी है कि इसी दिन भगवान विष्णु ने मत्स्य अवतार लिया था। इसी दिन सतयुग का प्रारम्भ हुआ था। मान्यता है कि इसी दिन सम्राट विक्रमादित्य ने अपना राज्य स्थापित किया था। श्रीराम का राज्याभिषेक भी इसी दिन हुआ था। युधिष्ठिर का राज्याभिषेक भी इसी दिन हुआ था। नवरात्र भी इसी दिन से प्रारम्भ होते हैं। इसी तिथि को राजा विक्रमादित्य ने शकों पर विजय प्राप्त की थी। विजय को चिर स्थायी बनाने के लिए उन्होंने विक्रम सम्वत् का शुभारंभ किया था, तभी से विक्रम सम्वत् चली आ रही है। इसी दिन से महान गणितज्ञ भास्कराचार्य ने सूर्योदय से सूर्यास्त तक दिन, महीने और वर्ष की गणना करके पंचांग की रचना की थी। चैत्र शुक्ल प्रतिपदा का ऐतिहासिक महत्त्व भी है। स्वामी दयानंद सरस्वती ने इसी दिन आर्य समाज की स्थापना की थी। इस दिन महर्षि गौतम जयंती मनाई जाती है। इस दिन संघ संस्थापक डॉ. केशवराव बलिराम हेडगेवार का जन्मदिवस भी मनाया जाता है।

उत्कृष्ट काल गणना
सृष्टि की सर्वाधिक उत्कृष्ट काल गणना का श्रीगणेश भारतीय ऋषियों ने अति प्राचीन काल से ही कर दिया था। तदनुसार हमारे सौरमंडल की आयु लगभग चार अरब 32 करोड़ वर्ष हैं। आधुनिक विज्ञान भी कार्बन डेटिंग और हॉफ लाइफ पीरियड की सहायता से इसे लगभग चार अरब वर्ष पुराना मान रहा है। इतना ही नहीं, श्रीमद्भागवद पुराण, श्री मारकंडेय पुराण और ब्रह्म पुराण के अनुसार अभिशेत् बाराह कल्प चल रहा है और एक कल्प में एक हजार चतुरयुग होते हैं। जिस दिन सृष्टि का प्रारम्भ हुआ, वह आज ही का पवित्र दिन था। इसी कारण मदुराई के परम पावन शक्तिपीठ मीनाक्षी देवी के मंदिर में चैत्र पर्व मनाने की परंपरा बन गई। नवरात्रि के दौरान यहां भक्तों की भीड़ लगी रहती है।

महीनों का नामकरण
भारतीय महीनों का नामकरण भी बड़ा रोचक है अर्थात जिस महीने की पूर्णिमा जिस नक्षत्र में पड़ती है, उसी के नाम पर उस महीने का नामकरण किया गया है, उदाहरण के लिए इस महीने की पूर्णिमा चित्रा नक्षत्र में हैं, इसलिए इसे चैत्र महीने का नाम दिया गया। क्रांति वृत पर 12 महीने की सीमाएं तय करने के लिए आकाश में 30-30 अंश के 12 भाग किए गए और उनके नाम भी तारा मंडलों की आकृतियों के आधार पर रखे गए। इस प्रकार बारह राशियां बनीं।

चूंकि सूर्य क्रांति मंडल के ठीक केंद्र में नहीं हैं, अत: कोणों के निकट धरती सूर्य की प्रदक्षिणा 28 दिन में कर लेती है और जब अधिक भाग वाले पक्ष में 32 दिन लगते हैं। इसलिए प्रति तीन वर्ष में एक मास अधिक हो जाता है।

काल गणना की वैज्ञानिक व्यवस्था
भारतीय काल गणना इतनी वैज्ञानिक व्यवस्था है कि शताब्दियों तक एक क्षण का भी अंतर नहीं पड़ता, जबकि पश्चिमी काल गणना में वर्ष के 365.2422 दिन को 30 और 31 के हिसाब से 12 महीनों में विभक्त करते हैं। इस प्रकार प्रत्येक चार वर्ष में फरवरी महीने को लीप ईयर घोषित कर देते हैं। तब भी नौ मिनट 11 सेकेंड का समय बच जाता है, तो प्रत्येक चार सौ वर्षों में भी एक दिन बढ़ाना पड़ता है, तब भी पूर्णाकन नहीं हो पाता। अभी कुछ वर्ष पूर्व ही पेरिस के अंतर्राष्ट्रीय परमाणु घड़ी को एक सेकेंड धीमा कर दिया गया। फिर भी 22 सेकेंड का समय अधिक चल रहा है। यह पेरिस की वही प्रयोगशाला है, जहां के सीजीएस सिस्टम से संसार भर के सारे मानक तय किए जाते हैं। रोमन कैलेंडर में तो पहले 10 ही महीने होते थे। किंगनुमापाजुलियस ने 355 दिनों का ही वर्ष माना था, जिसे जुलियस सीजर ने 365 दिन घोषित कर दिया और उसी के नाम पर एक महीना जुलाई बनाया गया। उसके एक सौ वर्ष पश्चात किंग अगस्ट्स के नाम पर एक और महीना अगस्ट अर्थात अगस्त भी बढ़ाया गया। चूंकि ये दोनों राजा थे, इसलिए इनके नाम वाले महीनों के दिन 31 ही रखे गए। आज के इस वैज्ञानिक युग में भी यह कितनी हास्यास्पद बात है कि लगातार दो महीने के दिनों की संख्या समान हैं, जबकि अन्य महीनों में ऐसा नहीं है। जिसे हम अंग्रेजी कैलेंडर का नौवां महीना सितम्बर कहते हैं, दसवां महीना अक्टूबर कहते हैं, ग्यारहवां महीना नवम्बर और बारहवां महीना दिसम्बर हैं। इनके शब्दों के अर्थ भी लैटिन भाषा में 7,8,9 और 10 होते हैं। भाषा विज्ञानियों के अनुसार भारतीय काल गणना पूरे विश्व में व्याप्त थी और सचमुच सितम्बर का अर्थ सप्ताम्बर था, आकाश का सातवां भाग, उसी प्रकार अक्टूबर अष्टाम्बर, नवम्बर तो नवमअम्बर और दिसम्बर दशाम्बर है।
उल्लेखनीय है कि ज्योतिष विद्या में ग्रह, ऋतु, मास, तिथि एवं पक्ष आदि की गणना भी चैत्र प्रतिपदा से ही की जाती है। मान्यता है कि नव संवत्सर के दिन नीम की कोमल पत्तियों और पुष्पों का मिश्रण बनाकर उसमें काली मिर्च, नमक, हींग, मिश्री, जीरा और अजवाइन मिलाकर उसका सेवन करने से शरीर स्वस्थ रहता है। इस दिन आंवले का सेवन भी बहुत लाभदायक बताया गया है। माना जाता है कि आंवला नवमीं को जगत पिता ने सृष्टि पर पहला सृजन पौधे के रूप में किया था। यह पौधा आंवले का था। इस तिथि को पवित्र माना जाता है। इस दिन मंदिरों में विशेष पूजा-अर्चना होती है।

वसंत का उल्लास
भारतीय नववर्ष में वातावरण अत्यंत मनोहारी रहता है। केवल मनुष्य ही नहीं, अपितु जड़ चेतना नर-नाग यक्ष रक्ष किन्नर-गंधर्व, पशु-पक्षी लता, पादप, नदी नद, देवी, देव, मानव से समष्टि तक सब प्रसन्न होकर उस परम शक्ति के स्वागत में सन्नध रहते हैं। वृक्षों पर नए पत्ते आ जाते हैं। उपवनों में भी रंग- बिरंगे पुष्प दिखाई देते हैं।   
नववर्ष पर दिवस सुनहले, रात रूपहली, उषा सांझ की लाली छन-छन कर पत्तों में बनती हुई चांदनी जाली कितनी मनोहारी लगती है। शीतल मंद सुगंध पवन वातावरण में हवन की सुरभि कर देते हैं। ऐसे ही शुभ वातावरण में अखिल लोकनायक श्रीराम का अवतार होता है।

भारतीय नववर्ष वसंत का उल्लास साथ लाता है। जब भारतीय नववर्ष का प्रारम्भ होता है तो प्रकृति चहक उठती है। हमारे गौरवशाली भारत देश की बात ही निराली है। हमारे तीज-त्यौहार, व्रत, उपवास, रामनवमी, जन्माष्टमी, गृह प्रवेश, विवाह तथा अन्य शुभ कार्यों के शुभमुहूर्त आदि सभी आयोजन भारतीय कैलेंडर अर्थात हिन्दू पंचांग के अनुसार ही देखे जाते हैं। इसलिए हमारे जीवन में इसका अत्यंत महत्त्व है।

भारतीय नववर्ष : सृष्टि की रचना का दिन


डॊ. सौरभ मालवीय
नव रात्र हवन के झोके, सुरभित करते जनमन को।
है शक्तिपूत भारत, अब कुचलो आतंकी फन को॥
नव सम्वत् पर संस्कृति का, सादर वन्दन करते हैं।
हो अमित ख्याति भारत की, हम अभिनन्दन करते हैं॥
30 मार्च विक्रम संवत 2082 का प्रारंभ हो रहा है. भारतीय पंचांग में हर नवीन संवत्सर को एक विशेष नाम से जाना जाता है. इस वर्ष इस नवीन संवत्सर का नाम विरोधकर्त है. भारतीय संस्कृति में विक्रम संवत का बहुत महत्व है. चैत्र का महीना भारतीय कैलंडर के हिसाब से वर्ष का प्रथम महीना है. नवीन संवत्सर के संबंध में अन्य पौराणिक कथाएं हैं. वैदिक पुराण एवं शास्त्रों के अनुसार चैत्र शुक्ल पक्ष प्रतिपदा तिथि को आदिशक्ति प्रकट हुईं थी. आदिशक्ति के आदेश पर ब्रह्मा ने सृष्टि की प्रारंभ की थी. इसीलिए इस दिन को अनादिकाल से नववर्ष के रूप में जाना जाता है. मान्यता यह भी है कि इसी दिन भगवान विष्णु ने मत्स्य अवतार लिया था. इसी दिन सतयुग का प्रारंभ  हुआ था. इसी तिथि को राजा विक्रमादित्य ने शकों पर विजय प्राप्त की थी. विजय को चिर स्थायी बनाने के लिए उन्होंने विक्रम संवत का शुभारंभ किया था, तभी से विक्रम संवत चली आ रही है. इसी दिन से महान गणितज्ञ भास्कराचार्य ने सूर्योदय से सूर्यास्त तक दिन, महीने और साल की गणना कर पंचांग की रचना की थी.

सृष्टि की सर्वाधिक उत्कृष्ट काल गणना का श्रीगणेश भारतीय ऋषियों ने अति प्राचीन काल से ही कर दिया था. तदनुसार हमारे सौरमंडल की आयु चार अरब 32 करोड़ वर्ष हैं. आधुनिक विज्ञान भी, कार्बन डेटिंग और हॉफ लाइफ पीरियड की सहायता से इसे चार अरब वर्ष पुराना मान रहा है. यही नहीं हमारी इस पृथ्वी की आयु भी 29 मार्च को, एक अरब 97 करोड़ 29 लाख 49 हजार एक सौ 30 वर्ष पूरी हो गई. इतना ही नहीं, श्रीमद्भागवद पुराण, श्री मारकंडेय पुराण और ब्रह्म पुराण के अनुसार अभिशेत् बाराह कल्प चल रहा है और एक कल्प में एक हजार चतुरयुग होते है. इस खगोल शास्त्रीय गणना के अनुसार हमारी पृथ्वी 14 मनवंतरों में से सातवें वैवस्वत मनवंतर के 28वें चतुरयुगी के  अंतिम चरण कलयुग भी. आज 51 सौ 25 वर्ष में प्रवेश कर लिया.जिस दिन सृष्टि का प्रारंभ हुआ, वह आज ही का पवित्र दिन है. इसी कारण मदुराई के परम पावन शक्तिपीठ मीनाक्षी देवी के मंदिर में चैत्र पर्व की परंपरा बन गई.

भारतीय महीनों के नाम जिस महीने की पूर्णिमा जिस नक्षत्र में पड़ती है, उसी के नाम पर पड़ा. जैसे इस महीने की पूर्णिमा चित्रा नक्षत्र में हैं, इसलिए इसे चैत्र महीने का नाम हुआ. श्रीमद्भागवत के द्वादश  स्कंध के द्वितीय अध्याय के अनुसार जिस समय सप्तर्षि मघा नक्षत्र पर यह उसी समय से कलयुग का प्रारंभ हुआ, महाभारत और भागवत के इस खगोलीय गणना को आधार मान कर विश्वविख्यात डॉ. वेली ने यह निष्कर्ष दिया है कि कलयुग का प्रारंभ 3102 बी.सी. की रात दो बजकर 20 मिनट 30 सेकेंड पर हुआ था. डॉ. बेली महोदय आश्चर्य चकित है कि अत्यंत प्रागैतिहासिक काल में भी भारतीय ऋणियों ने इतनी सूक्ष्तम और सटीक गणना कैसे कर ली. क्रांति वृंत पर 12 हो महीने की सीमाएं तय करने के लिए आकाश में 30-30 अंश के 12 भाग किए गए और नाम भी तारा मंडलों की आकृतियों के आधार पर रखे गए. जो मेष, वृष, मिथुन इत्यादित 12 राशियां बनीं.

चूंकि सूर्य क्रांति मंडल के ठीक केंद्र में नहीं हैं, अत: कोणों के निकट धरती सूर्य की प्रदक्षिणा 28 दिन में कर लेती है और जब अधिक भाग वाले पक्ष में 32 दिन लगता है. प्रति तीन वर्ष में एक मास अधिक मास कहलाता है. संयोग से यह अधिक मास अगले महीने ही प्रारंभ हो रहा है.

भारतीय काल गणना इतनी वैज्ञानिक व्यवस्था है कि सदियों-सदियों तक एक पल का भी अंतर नहीं पड़ता, जबकि पश्चिमी काल गणना में वर्ष के 365.2422 दिन को 30 और 31 के हिसाब से 12 महीनों में विभक्त करते हैं. इस प्रकार प्रत्येक चार वर्ष में फरवरी महीने को लीप ईयर घोषित कर देते हैं फिर भी. नौ मिनट 11 सेकेंड का समय बच जाता है, तो प्रत्येक चार सौ वर्षों में भी एक दिन बढ़ाना पड़ता है, तब भी पूर्णाकन नहीं हो पाता है. अभी 10 साल पहले ही पेरिस के अंतर्राष्ट्रीय परमाणु घड़ी को एक सेकेंड स्लो कर दिया गया. फिर भी 22 सेकेंड का समय अधिक चल रहा है. यह पेरिस की वही प्रयोगशाला है, जहां के सीजीएस सिस्टम से संसार भर के सारे मानक तय किए जाते हैं. रोमन कैलेंडर में तो पहले 10 ही महीने होते थे. किंगनुमापाजुलियस ने 355 दिनों का ही वर्ष माना था, जिसे जुलियस सीजर ने 365 दिन घोषित कर दिया और उसी के नाम पर एक महीना जुलाई बनाया गया. उसके एक सौ साल बाद किंग अगस्ट्स के नाम पर एक और महीना अगस्ट भी बढ़ाया गया. चूंकि ये दोनों राजा थे, इसलिए इनके नाम वाले महीनों के दिन 31 ही रखे गए. आज के इस वैज्ञानिक युग में भी यह कितनी हास्यास्पद बात है कि लगातार दो महीने के दिन समान हैं, जबकि अन्य महीनों में ऐसा नहीं है. यदि नहीं जिसे हम अंग्रेजी कैलेंडर का नौवां महीना सितंबर कहते हैं, दसवां महीना अक्टूबर कहते हैं, ग्यारहवां महीना नवंबर और बारहवां महीना दिसंबर हैं. इनके शब्दों के अर्थ भी लैटिन भाषा में 7,8,9 और 10 होते हैं. भाषा विज्ञानियों के अनुसार भारतीय काल गणना पूरे विश्व में व्याप्त थी और सचमुच सितंबर का अर्थ सप्ताम्बर था, आकाश का सातवां भाग, उसी प्रकार अक्टूबर अष्टाम्बर, नवंबर तो नवमअम्बर और दिसंबर दशाम्बर है.

सन् 1608 में एक संवैधानिक परिवर्तन द्वारा एक जनवरी को नव वर्ष घोषित किया गया. जेनदअवेस्ता के अनुसार धरती की आयु 12 हजार वर्ष है, जबकि बाइबिल केवल दो हजार वर्ष पुराना मानता है. चीनी कैलेंडर एक करोड़ वर्ष पुराना मानता है, जबकि खताईमत के अनुसार इस धरती की आयु 8 करोड़ 88 लाख 40 हजार तीन सौ 18 वर्षों की है. चालडियन कैलेंडर धरती को दो करोड़ 15 लाख वर्ष पुराना मानता है. फीनीसयन इसे मात्र 30 हजार वर्ष की बताते हैं. सीसरो के अनुसार यह 4 लाख 80 हजार वर्ष पुरानी है. सूर्य सिद्धांत और सिद्धांत शिरोमाणि आदि ग्रंथों में चैत्रशुक्ल प्रतिपदा रविवार का दिन ही सृष्टि का प्रथम दिन माना गया है.

संस्कृत के होरा शब्द से ही, अंग्रेजी का आवर (Hour) शब्द बना है. इस प्रकार यह सिद्ध हो रहा है कि वर्ष प्रतिपदा ही नव वर्ष का प्रथम दिन है. एक जनवरी को नव वर्ष मनाने वाले दोहरी भूल के शिकार होते हैं, क्योंकि भारत में जब 31 दिसंबर की रात को 12 बजता है, तो ब्रिटेन में सायंकाल होता है, जो कि नव वर्ष की पहली सुबह हो ही नहीं सकता. और जब उनका एक जनवरी का सूर्योदय होता है, तो यहां के Happy New Year वालों का नशा उतर चुका रहता है. सनसनाती हुई ठंडी हवायें कितना भी सुरा डालने पर शरीर को गरम नहीं कर पाती हैं. ऐसे में सवेरे सवेरे नहा धोकर भगवान सूर्य की पूजा करना तो अत्यंत दुष्कर रहता है. वही पर भारतीय नव वर्ष में वातावरण अत्यंत मनोहारी रहता है. केवल मनुष्य ही नहीं, अपितु जड़ चेतना नर-नाग यक्ष रक्ष किन्नर-गंधर्व, पशु-पक्षी लता, पादप, नदी नद, देवी, देव, मानव से समष्टि तक सब प्रसन्न होकर उस परम शक्ति के स्वागत में सन्नध रहते हैं.

दिवस सुनहले रात रूपहली उषा सांझ की लाली छन-छन कर पत्तों में बनती हुई चांदनी जाली. शीतल मंद सुगंध पवन वातावरण में हवन की सुरभि कर देते हैं. ऐसे ही शुभ वातावरण में जब मध्य दिवस अतिशित न धामा की स्थिति बनती है, तो अखिल लोकनायक श्रीराम का अवतार होता है. आइए इस शुभ अवसर पर हम भारत को पुन: जगतगुरू के पद पर आसीन करने में कृत संकल्प हों.

ज्योतिषाचार्यों के अनुसार इस वर्ष के राजा सूर्य हैं और शनि मंत्री होंगे. यह वर्ष सभी के लिए काफी सुखद रहेगा. उल्लेखनीय है कि ज्योतिष विद्या में ग्रह, ऋतु, मास, तिथि एवं पक्ष आदि की गणना भी चैत्र प्रतिपदा से ही की जाती है. मान्यता है कि नव संवत्सर के दिन नीम की कोमल पत्तियों और पुष्पों का मिश्रण बनाकर उसमें काली मिर्च, नमक, हींग, मिश्री, जीरा और अजवाइन मिलाकर उसका सेवन करने से शरीर स्वस्थ रहता है. इस दिन आंवले का सेवन भी बहुत लाभदायद बताया गया है. माना जाता है कि आंवला नवमीं को जगत पिता ने सृष्टि पर पहला सृजन पौधे के रूप में किया था. यह पौधा आंवले का था. इस तिथि को पवित्र माना जाता है. इस दिन मंदिरों में विशेष पूजा-अर्चना होती है.
निसंदेह, जब भारतीय नववर्ष का प्रारंभ होता है, तो चहुंओर प्रकृति चहक उठती है. भारत की बात ही निराली है.
कवि श्री जयशंकर प्रसाद के शब्दों में-
अरुण यह मधुमय देश हमारा
जहां पहुंच अनजान क्षितिज को
मिलता एक सहारा
अरुण यह मधुमय देश हमारा


विकास के पथ पर उत्तर प्रदेश

 



Wednesday, March 26, 2025

संभाग निरीक्षक बैठक




संस्कारयुक्त शिक्षा विद्या भारती पूर्वी उत्तर प्रदेश
संभाग निरीक्षक बैठक
लखनऊ

Monday, March 24, 2025

योगी सरकार के आठ वर्ष


डॉ. सौरभ मालवीय   
उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ की सरकार ने अपने द्वितीय कार्यकाल के तीन वर्ष पूर्ण कर लिए हैं। उन्होंने 25 मार्च 2022 को द्वितीय बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली थी। इस अवसर पर उन्होंने शपथ लेते हुए कहा था कि “मैं आदित्यनाथ योगी, ईश्वर की शपथ लेता हूं कि मैं विधि द्वारा स्थापित भारत के संविधान के प्रति सच्ची श्रद्धा और निष्ठा रखूंगा। मैं भारत की प्रभुता और अखंडता को अक्षुण्ण रखूंगा। मैं उत्तर प्रदेश राज्य के मुख्यमंत्री के रूप में अपने कर्तव्यों का श्रद्धापूर्वक और शुद्ध अंतःकरण से निर्वाहन करूंगा तथा मैं भय या पक्षपात, अनुराग या द्वेष के बिना, सभी प्रकार के लोगों के प्रति संविधान और विधि के अनुसार न्याय करूंगा।“

योगी आदित्यनाथ अपनी इस शपथ का किस प्रकार हृदय से पालन कर रहे हैं, यह सर्वविदित है। इससे पूर्व उन्होंने प्रथम बार 17 मार्च 2017 को मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी। वह पांच बार गोरखपुर से सांसद रहे चुके हैं। प्रदेश की जनता को उनकी कार्यशैली इतनी सर्वोत्तम लगी कि उसने वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव में पुन: भारतीय जनता पार्टी को पूर्ण बहुमत से विजयी बना दिया अर्थात 403 सदस्यों वाली उत्तर प्रदेश विधानसभा के चुनाव में भाजपा और उसके सहयोगी दलों को 273 सीटों पर विजय प्राप्त हुई। इस प्रकार योगी आदित्यनाथ को द्वितीय बार उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।  

उल्लेखनीय है कि उत्तर प्रदेश के राजनीतिक इतिहास में लगभग साढ़े तीन दशक के पश्चात किसी राज्नीतिक दल को पुन: सत्ता में लाने वाले योगी आदित्यनाथ प्रथम राजनेता हैं। उन्हें अपने मुख्यमंत्रित्व कार्यकाल में अनेक समस्याओं से जूझना पड़ा। उन पर अनेक आरोप लगे। उन पर बुल्डोजर से लोगों के मकान तोड़ने के आरोप लगे। इसके लिए उनकी बहुत आलोचना हुई, परंतु उन्होंने इसकी कोई चिंता नहीं की तथा अपना कार्य को निरंतर जारी रखा।  इसके अतिरिक्त अधिकारियों के स्थानान्तरण के कारण योगी सरकार पर अनके प्रश्नचिन्ह लगे, परंतु उनकी कार्यशैली में कोई अंतर नहीं आया।  

योगी आदित्यनाथ हिंदुत्वादी हैं। उनके शासनकाल में प्रदेश में धार्मिक गतिविधियों को अत्यंत प्रोत्साहित किया जा रहा है। महाकुंभ का सफल आयोजन इस बात का प्रमाण है। महाकुंभ से पूर्व प्रयागराज के ऐतिहासिक मंदिरों का जीर्णोद्धार एवं नवीनीकरण किया गया। योगी आदित्यनाथ के निर्देश पर पर्यटन विभाग, स्मार्ट सिटी एवं प्रयागराज विकास प्राधिकरण मिलकर यह कार्य संपन्न किया। मेला प्रशासन ने श्रद्धालुओं और पर्यटकों की आस्था एवं सुविधा को प्राथमिकता दी। महाकुंभ मेले के दृष्टिगत प्रदेश को हरभरा बनाने पर विशेष ध्यान दिया गया। इसके अतिरिक्त स्वच्छता पर विशेष बल दिया गया। यातायात सुविधाओं को सुदृढ़ किया गया। योगी आदित्यनाथ के परिश्रम का परिणाम है कि इस मेले में 50 करोड़ से अधिक लोगों ने स्नान कर पुण्य अर्जित किया। इसके अतिरिक्त राज्य में प्रत्येक वर्ष कांवड़ यात्रा पर यात्रियों की सुविधाओं का विशेष ध्यान रखा जाता है। यात्रियों के मार्ग में टेंट लगाए जाते हैं। उन पर हेलिकॉप्टर से पुष्प वर्षा की जाती है। प्रशासनिक अधिकारी इस आयोजन में बढ़ चढ़कर सम्मिलित होते हैं।     

वास्तव में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ बिना किसी पूर्वाग्रह एवं भेदभाव के कार्य करते हैं, जिससे लोगों में सरकार के प्रति सकारात्मक संदेश जाता है। उनकी समयावधि में धार्मिक स्थलों से लाउडस्पीकरों को उतरवा दिया गया। रमजान से पूर्व मस्जिदों की निरीक्षण किया गया कि उनमें लाउडस्पीकर तो नहीं लगे हैं। इस वर्ष होली पर मस्जिदों को तिरपाल से ढक गया। 

वास्तव में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भाजपा के चाल, चरित्र एवं चेहरे के अनुसार ही हिंदुत्व की छवि को सुदृढ़ करने का निरंतर प्रयास कर रहे हैं। प्राचीन नगरों के नाम परिवर्तित करना तथा अयोध्या में मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम के मंदिर का निर्माण इसके उदाहरण हैं। सरकार नमामि गंगे योजना के अंतर्गत गंगा को स्वच्छ एवं निर्मल करने पर विशेष बल दे रही है। गंगा का प्रदूषण कम करने के लिए स्मार्ट गंगा सिटी परियोजना पर कार्य चल रहा है। योगी सरकार राज्य में पर्यटन विशेषकर धार्मिक पर्यटन को भी प्रोत्साहित कर रही है। राज्य में गौ संरक्षण एवं संवर्धन के लिए मुख्यमंत्री निराश्रित गौवंश सहभागिता योजना प्रारम्भ की गई है, जिसके सुखद परिणाम सामने आ रहे हैं।   

उत्तर प्रदेश में निरा श्रय लोगों को आवास देने के लिए उत्तर प्रदेश आवास विकास योजना प्रारम्भ की गई। निर्धन परिवारों को आर्थिक सहायता उपलब्ध कराने के लिए राष्ट्रीय पारिवारिक लाभ योजना आरम्भ की गई। प्रवासी श्रमिकों को आजीविका देने के लिए आत्मनिर्भर उत्तर प्रदेश रोजगार अभियान प्रारम्भ किया गया। बेरोजगारों को स्वरोजगार के लिए ऋण उपलब्ध कराने के लिए मुख्यमंत्री युवा स्वरोजगार योजना आरम्भ की गई। बेरोजगार युवाओं को प्रशिक्षण दिलाने के लिए उत्तर प्रदेश कौशल विकास मिशन तथा मुख्यमंत्री शिक्षुता प्रोत्साहन योजना प्रारम्भ की गई। राज्य के युवाओं को आत्मनिर्भर बनाने के लिए मुख्यमंत्री ग्रामोद्योग रोजगार योजना प्रारम्भ की गई। बेरोजगार युवाओं को बेरोजगारी भत्ता प्रदान करने के लिए उत्तर प्रदेश बेरोजगारी भत्ता नामक योजना आरम्भ की गई। राज्य के श्रमिकों को सरकारी योजनाओं का पूरा लाभ देने के लिए श्रमिक पंजीकरण योजना प्रारम्भ की गई। श्रमिकों के भरण पोषण के लिए राज्य में श्रमिक भरण पोषण योजना आरम्भ की गई है। इसके साथ ही राज्य की समृद्धि के लिए उद्योगों को प्रोत्साहित किया जा रहा है।

योगी सरकार ने कृषि क्षेत्र पर भी विशेष ध्यान दिया है। प्रदेश में जैविक खेती को प्रोत्साहन देने के लिए परम्परागत खेती विकास योजना चलाई जा रही है। खेतों को पर्याप्त सिंचाई जल उपलब्ध कराने के लिए उत्तर प्रदेश नि:शुल्क बोरिंग योजना तथा उत्तर प्रदेश किसान उदय योजना संचालित की जा रही है। इनके अतिरिक्त बीज ग्राम योजना के अंतर्गत किसानों को धान एवं गेहूं के बीज पर विशेष अनुदान दिया जा रहा है। पारदर्शी किसान सेवा योजना के अंतर्गत किसानों को आर्थिक सहायता प्रदान की जा रही है। मुख्यमंत्री किसान एवं सर्वहित बीमा योजना के अंतर्गत किसानों को समुचित उपचार की सुविधा प्रदान की जा रही है। किसानों को ऋण के बोझ से मुक्त करने के लिए किसान ऋण मोचन योजना प्रारम्भ की गई। मुख्यमंत्री कृषक दुर्घटना कल्याण योजना के अंतर्गत किसानों को वित्तीय सहायता प्रदान की जा रही है।  

प्रदेश में अनाथ बच्चों को शरण देने के लिए मुख्यमंत्री बाल सेवा योजना प्रारम्भ की गई। महिला सशक्तिकरण के लिए भी सरकार अनेक योजनाएं चला रही है। मुख्यमंत्री कन्या सुमंगला योजना के अंतर्गत निर्धन परिवारों की पुत्रियों को शिक्षा के लिए वित्तीय सहायता प्रदान की जा रही है। उत्तर प्रदेश भाग्यलक्ष्मी योजना के अंतर्गत पुत्री की शिक्षा और विवाह के लिए आर्थिक सहायता प्रदान की जा रही है। इसके अतिरिक्त लोगों को घर बैठे बैंकिंग सुविधाएं उपलब्ध कराने के लिए बैंकिंग संवाददाता सखी योजना प्रारम्भ की गई है। इससे जहां लोगों को घर पर बैंकिंग सुविधाएं प्राप्त हो रही हैं, वहीं महिलाओं को भी रोजगार प्राप्त हुआ है। 

प्रदेश में अनेक पेंशन योजनाएं संचालित की जा रही हैं, जिनमें उत्तर प्रदेश पेंशन योजना, विधवा पेंशन योजना तथा उत्तर प्रदेश दिव्यांगजन पेंशन योजना सम्मिलित हैं। सरकार लड़कियों और दिव्यांगों के विवाह के लिए अनुदान प्रदान कर रही है। उत्तर प्रदेश विवाह अनुदान योजना के अंतर्गत लड़कियों के विवाह के लिए सरकार द्वारा अनुदान प्रदान किया जाता है। दिव्यांगजन विवाह प्रोत्साहन योजना के अंतर्गत दिव्यांगजनों के विवाह लिए आर्थिक सहायता प्रदान की जाती है। 

योगी सरकार शिक्षा के क्षेत्र में भी उल्लेखनीय कार्य कर रही है। प्रदेश में विद्यालयों, महाविद्यालयों एवं व्यवसायिक प्रशिक्षण केंद्रों एवं उनके नये भवनों की स्थापना की जा रही है। गोरखपुर में आयुष विश्वविद्यालय का निर्माण किय जा रहा है। उत्तर प्रदेश छात्रवृत्ति योजना के अंतर्गत छात्रों को छात्रवृत्ति प्रदान की जा रही है। उच्च शिक्षा में 119 राजकीय महाविद्यालयों में ई-लर्निंग पाठ्यक्रम विकसित किए गए हैं तथा 87 राजकीय महाविद्यालयों में स्मार्ट कक्षाओं की व्यवस्था की गई है तथा प्रदेश के 27 विश्वविद्यालयों द्वारा राष्ट्रीय स्तर के संस्थानों के साथ 111 अनुबंध पर हस्ताक्षर किए गए हैं। इसके अतिरिक्त 26 नये सरकारी पॉलिटेक्निक स्वीकृत किए गए हैं, जबकि 24 निर्माणाधीन हैं। 

सरकार ने अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में पदक प्राप्त करने वाले और विभिन्न विभागों में 24 पदों की पहचान करने वाले खिलाड़ियों को राजपत्रित अधिकारी बनाने का भी निर्णय लिया है। एक जिला एक खेल योजना के अंतर्गत प्रत्येक जिले में खेलो इंडिया सेंटर स्थापित किए जा रहे हैं। 

स्वास्थ्य के क्षेत्र में भी योगी सरकार सरहनीय कार्य कर रही है। प्रदेश के सभी 4600 प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में हेल्थ एटीएम लगाए जा रहे हैं। प्रदेश के 65 जिलों में चिकित्सा महाविद्यालय चल रहे हैं तथा गोरखपुर और रायबरेली में एम्स चल रहे हैं। इसके अतिरिक्त आयुष्मान कार्ड के माध्यम से प्रदेश के करोड़ों लोगों को पांच लाख रुपये तक के स्वास्थ्य बीमा के अंतर्गत लाया गया है। योगी सरकार सुरक्षा व्यवस्था को लेकर भी गंभीर है। महिलाओं को सुरक्षा प्रदान करने के लिए सेफ सिटी योजना प्रारम्भ की गई है। विद्युत क्षेत्र में भी योगी सरकार उत्कृष्ट कार्य किया है। परिवहन के क्षेत्र में भी सरकार ने सराहनीय कार्य किए हैं। 

नि:संदेह उत्तर प्रदेश में योगी श्री आदित्य नाथ ने मुख्यमंत्री का पदभार ग्रहण करने के पश्चात प्रदेश प्रदेश में विकास कार्यों की गंगा बहा दी है। आज उत्तर प्रदेश ने विभिन्न क्षेत्रों में देशभर में अपनी पृथक पहचान स्थापित की है। कृषि उत्पादों में भी उत्तर प्रदेश अग्रणी रहा है। गन्ना एवं चीनी उत्पादन में उत्तर प्रदेश लगातार देश में प्रथम स्थान पर रहा। गन्ना मूल्य का भुगतान कर उत्तर प्रदेश देश में अग्रणी रहा। खाद्यान्न गेहूं, आलू, हरी मटर, आम, आंवला एवं दुग्ध उत्पादन में उत्तर प्रदेश देश में प्रथम रहा। तिलहन उत्पादन में भी उत्तर प्रदेश प्रथम स्थान पर रहा। किसानों को देय अनुदान को डीबीटी के माध्यम से भुगतान करने वाला उत्तर प्रदेश देश का प्रथम राज्य है। उत्तर प्रदेश किसानों के लिए बाजार को व्यापक बनाने हेतु मंडी अधिनियम में संशोधन करने वाला देश का प्रथम राज्य है। प्रधानमंत्री स्वनिधि योजना के क्रियान्वयन में भी उत्तर प्रदेश देश में प्रथम स्थान पर रहा। 
लोगों को नि:शुल्क विद्युत कनेक्शन देने में उत्तर प्रदेश देश में प्रथम रहा। इसी प्रकार उज्ज्वला योजना के अंतर्गत नि:शुल्क गैस कनेक्शन देने में उत्तर प्रदेश देश में अग्रणी रहा। उत्तर प्रदेश प्रधानमंत्री जीवन ज्योति योजना के अंतर्गत लोगों को लाभान्वित कर देश में द्वितीय स्थान पर रहा।   

निर्माण कार्यों में भी उत्तर प्रदेश किसी से पीछे नहीं है। प्रधानमंत्री आवास योजना के अंतर्गत शहरी एवं ग्रामीण क्षेत्रों में 40 लाख से अधिक निर्माण एवं निर्माण कार्यों को स्वीकृति देकर उत्तर प्रदेश अग्रणी रहा। इसके अतिरिक्त उत्तर प्रदेश पांच एक्सप्रेस वे का एक साथ निर्माण कर अग्रणी रहा। साथ ही 30 नये मेडिकल कॉलेजों का निर्माण करके भी उत्तर प्रदेश अग्रणी रहा है। उत्तर प्रदेश आवास योजना के अंतर्गत लाभार्थियों के आधार कार्ड सीडिंग, आवास चयन, प्रथम द्वितीय, तृतीय किस्त जारी करने और आवास निर्माण आदि के प्रदर्शन में भी अग्रणी रहा। उत्तर प्रदेश दो करोड़ 61 लाख व्यक्तिगत शौचालयों का निर्माण करके भी देश में प्रथम स्थान पर रहा है।         
उत्तर प्रदेश स्वास्थ्य नीति लागू करने वाला देश का प्रथम राज्य है। उत्तर प्रदेश सर्वाधिक कोरोना जांच एवं टीकाकरण करने वाला राज्य है। उत्तर प्रदेश कोरोना काल में सर्वाधिक नि:शुल्क खाद्यान्न वितरित करने वाला राज्य रहा। उत्तर प्रदेश कोरोना काल में दूसरे राज्यों से घर वापस आने वाले कामगारों तथा असंगठित श्रमिकों, फेरी वालों, रिक्शा चालकों, कुलियों, पल्लेदारों आदि को नि:शुल्क खाद्यान्न एवं भरण पोषण भत्ता देने वाला अग्रणी राज्य है। नोएडा में उत्तर भारत के प्रथम डेटा सेंटर की स्थापना हुई।   

औद्योगीकरण के लिए भूमि उपलब्धता एवं आवंटन में भी उत्तर प्रदेश देश के शीर्ष राज्यों में सम्मिलित है। साथ ही उत्तर प्रदेश सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्योगों की स्थापना में देश में अग्रणी रहा। सैनिटाइजर और मास्क उत्पादन में भी उत्तर प्रदेश अग्रणी रहा। उत्तर प्रदेश सर्वाधिक सरकारी नौकरियां और रोजगार देने वाला राज्य है। 

उत्तर प्रदेश ने ‘एक जनपद-एक योजना’ को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई। उत्तर प्रदेश सभी थानों में महिला हेल्प डेस्क की स्थापना करने वाला उत्तर भारत का प्रथम राज्य है। उत्तर प्रदेश ने महात्मा गांधी रोजगार गारंटी अधिनियम के अंतर्गत 101 करोड़ से अधिक मानव दिवस सृजित कर डेढ़ करोड़ श्रमिकों को रोजगार दिया। उत्तर प्रदेश कौशल विकास नीति को लागू करने वाला प्रथम राज्य है। 

उत्तर प्रदेश में प्रधानमंत्री जनधन योजना के अंतर्गत सर्वाधिक सात करोड़ दो लाख खाते खोले गए। उत्तर प्रदेश अटल पेंशन योजना के अंतर्गत 36 लाख 60 हजार 615 लोगों को लाभान्वित कर देश में अग्रणी रहा। उत्तर प्रदेश ई-मार्केट प्लेस जेम के माध्यम से सर्वाधिक सरकारी खरीददारी करने में अग्रणी रहा। उत्तर प्रदेश ई-चालान व्यवस्था लागू करने वाला देश का प्रथम राज्य है। ई-प्रोसिसक्यूशन प्रणाली लागू करने में भी यह राज्य अग्रणी है। उत्तर प्रदेश ने 39 करोड़ 42 लाख पौधारोपण करके रिकॉर्ड स्थापित किया। उत्तर प्रदेश मानव वन्य जीव संघर्ष को आपदा घोषित करने वाला प्रथम राज्य है। उत्तर प्रदेश सूचनाओं के आदान-प्रदान एवं पारदर्शिता में भी अग्रणी है।  
उत्कृष्ट कार्यों के लिए उत्तर प्रदेश सरकार को अनेक पुरस्कार प्राप्त हुए हैं। प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि योजना के क्रियान्वयन में उत्तर प्रदेश को देश में सर्वाधिक प्रदर्शन का पुरस्कार प्राप्त हुआ। भारत सरकार द्वारा उत्तर प्रदेश को दो करोड़ रुपये का कृषि कर्मण पुरस्कार प्राप्त हुआ। उत्तर प्रदेश को पंचायती राज मंत्रालय भारत सरकार द्वारा उत्कृष्ट प्रदर्शन हेतु राष्ट्रीय ई-गवर्नेंस पुरस्कार प्राप्त हुआ है। ई-टेंडरिंग प्रणाली में उत्तर प्रदेश ने सर्वोत्तम प्रदर्शन के लिए अवार्ड प्राप्त किया। महिलाओं की सुरक्षा के लिए सभी बसों में पैनिक बटन एवं सीसीटीवी कैमरों की व्यवस्था करने वाला उत्तर प्रदेश देश का प्रथम राज्य बना। उत्तर प्रदेश में अविरल और निर्मल गंगा के प्रति जन जागरूकता के लिए प्रथम बार गंगा यात्रा का आयोजन किया गया। अयोध्या दीपोत्सव में उत्तर प्रदेश ने विश्व कीर्तिमान स्थापित किया। भाजपा अपने घोषणा-पत्र में जनता से किए वादों को पूर्ण करने के लिए निरंतर प्रयासरत है। 

Wednesday, March 19, 2025

नैतिक शिक्षा




प्रान्त संयोजक नैतिक शिक्षा - दो दिवसीय बैठक के उद्घाटन सत्र में रहने का सुखद अवसर !!
निरालानगर - लखनऊ

Tuesday, March 18, 2025

मेरी पुस्तकें

1 राष्ट्रवादी पत्रकारिता के शिखर पुरुष अटल बिहारी वाजपेयी (2018)


2 विकास के पथ पर भारत (2019)


3 राष्ट्रवाद और मीडिया (सम्पादन) (2020)


4 भारत बोध (2021)


5 अंत्योदय को साकार करता उत्तर प्रदेश  (2021)


6 भारतीय राजनीति के महानायक नरेन्द्र मोदी (2024)


7 भारतीय पत्रकारिता के स्वर्णिम हस्ताक्षर (2024)


8 भारतीय संत परम्परा : धर्मदीप से राष्ट्रदीप (2025)



डॉ. सौरभ मालवीय



डॉ. सौरभ मालवीय हिंदी पत्रकारिता एवम् साहित्य के सुपरिचित हस्ताक्षर हैं। वह राष्ट्रवादी विचारों के प्रहरी हैं। उनका वैचारिक धरातल सुस्पष्ट है। उनकी लेखनी धर्म, संस्कृति, समाज, पर्यावरण, राष्ट्रबोध एवं मानवदर्शन से ओतप्रोत है। वह देशभर के विभिन्न समाचार पत्रों, पत्रिकाओं एवं अन्तर्जाल पर समसामयिक विषयों पर तार्किक लेखन करते हैं। वह ज्वलंत एवं राजनीतिक विषयों पर प्रायः टीवी चर्चाओं में अपने विचार रखते हुए देखे जाते हैं। इसके अतिरिक्त वह विभिन्न कार्यक्रमों एवं गोष्ठियों में वक्ता के में रूप में बोलते हुए दिखाई देते हैं। आपको उत्कृष्ट पत्रकारिता एवं लेखन हेतु अनेक पुरस्कारों से सम्मानित किया जा चुका है।    
वह जनसेवा कार्यों से भी जुड़े हैं। 

नाम : डॉ. सौरभ मालवीय
जन्म तिथि : 28 जुलाई, 1982 
जन्म स्थान : ग्राम पटनजी, जनपद देवरिया, उत्तर प्रदेश 
 
शैक्षिक योग्यता
* स्नातकोत्तर (प्रसारण पत्रकारिता) माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय                * पीएचडी (विषय सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और मीडिया)

कार्यभार  
मंत्री : विद्या भारती पूर्वी उत्तर प्रदेश (वर्तमान)

लेखन कार्य 
विभिन्न समाचार-पत्रों, पत्रिकाओं एवं अंतर्जाल पर नियमित लेखन   

प्रकाशित पुस्तकें 
1 राष्ट्रवादी पत्रकारिता के शिखर पुरुष अटल बिहारी वाजपेयी (2018)
2 विकास के पथ पर भारत (2019)
3 राष्ट्रवाद और मीडिया (सम्पादन) (2020)
4 भारत बोध (2021)
5 अंत्योदय को साकार करता उत्तर प्रदेश (2021)
6 भारतीय राजनीति के महानायक नरेन्द्र मोदी  (2024)
7 भारतीय पत्रकारिता के स्वर्णिम हस्ताक्षर (2024)
8  भारतीय संत परम्परा : धर्मदीप से राष्ट्रदीप (2025)
9 यह श्रेष्ठ भारत : आत्मबोध से राष्ट्रबोध (प्रकाशाधीन)

सम्मान 
1 विष्णु प्रभाकर पत्रकारिता सम्मान
2 प्रवक्ता डॉट कॉम लेखक सम्मान
3 लखनऊ रत्न सम्मान
4 अटल बिहारी वाजपेयी संवाद सम्मान
5 अटल श्री सम्मान
6 सर्वपल्ली राधाकृष्णन शिक्षक सम्मान
7 पंडित प्रताप नारायण मिश्र युवा साहित्यकार सम्मान
8 पंडित बृजलाल द्विवेदी सम्मान  

सम्प्रति
विभागाध्यक्ष 
पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग
लखनऊ विश्वविद्यालय - लखनऊ , उत्तर प्रदेश 
ईमेल : malviya.sourabh@gmail.com

Monday, March 17, 2025

टीवी पर लाइव



इतिहास का सबसे क्रूर शासक था औरंगजेब वह एक अपने भाइयों की हत्या और पिता को एक एक बूद पानी के लिए यातना दिया मानवता को लज्जित करने वाला जालिम था।


Wednesday, March 12, 2025

हिंदी साहित्य में होली के रंग


डॉ. सौरभ मालवीय
होली कवियों का प्रिय त्योहार है। यह त्योहार उस समय आता है जब चारों दिशाओं में प्रकृति अपने सौन्दर्य के चरम पर होती है। उपवनों में रंग-बिरंगे पुष्प खिले हुए होते हैं। होली प्रेम का त्योहार माना जाता है, क्योंकि भगवान श्रीकृष्ण और राधा को होली अत्यंत प्रिय थी। भक्त कवियों एवं कवयित्रियों ने होली पर असंख्य रचनाएं लिखी हैं।
 
कृष्ण भक्त कवि रसखान ने ब्रज की होली पर अत्यंत सुंदर रचनाएं लिखी हैं। इनमें श्रीकृष्ण की राधा के साथ खेली जाने वाली होली प्रमुख है। वे कहते हैं-       
मिली खेलत फाग बढयो अनुराग सुराग सनी सुख की रमकै।
कर कुंकुम लै करि कंजमुखि प्रिय के दृग लावन को धमकै।।
रसखानि गुलाल की धुंधर में ब्रजबालन की दुति यौं दमकै।
मनौ सावन सांझ ललाई के मांझ चहुं दिस तें चपला चमकै।।
अर्थात श्रीकृष्ण राधा और गोपियों के साथ होली खेल रहे हैं। इस खेल के साथ-साथ उनमें प्रेम बढ़ रहा है। कमल के पुष्प के समान सुंदर मुख वाली राधा श्रीकृष्ण के मुख पर कुमकुम लगाने की चेष्टा कर रही है। वह गुलाल फेंकने का अवसर खोज रही है। चहुंओर गुलाल ही गुलाल दिखाई दे रहा है। इस गुलाल के कारण ब्रजबालाओं की देहयष्टि इस प्रकार दमक रही है जैसे सावन मास के सायंकाल में सूर्यास्त से लाल हुए आकाश में चारों ओर बिजली चमकती रही हो।
 
कृष्ण भक्त सूरदास ने भी श्रीकृष्ण और राधा की होली पर असंख्य रचनाएं लिखी हैं। होली उनकी रासलीलाओं में महत्वूर्ण स्थान रखती है। वे कहते हैं-
हहरि संग खेलति है सब फाग।
इहिं मिस करति प्रगट गोपी, उर अंतर कौ अनुराग।।
सारी पहिरि सुरंग, कसि कचुकि, काजर दै दै नैन।
बनि बनि निकसि निकसि भई ठाढ़ी, सुनि माधौ के बैन।।
डफ, बांसुरी रुंज अरु महुअरि, बाजत ताल मृदंग।
अति आनंद मनोहर बानी, गावत उठति तरंग।।
एक कोध गोविंद ग्वाल सब, एक कोध ब्रज नारि।
छांड़ि सकुच सब देति परस्पर, अपनी भाई गारि।।
मिलि दस पांच अली कृष्नहिं, गहि लावतिं अचकाइ।
भरि अरगजा अबीर कनकघट, देति सीस तै नाइ।।
छिरकतिं सखी कुमकुमा केसरि, भुरकतिं बदनधूरि।
सोभित है तन सांझ-समै-घन, आए है मनु पूरि।।
दसहूं दिसा भयौ परिपूरन, 'सूर' सुरंग प्रमोद।
सुर विमान कौतूहल भूले, निरखत स्याम विनोद।
 
अर्थात श्रीकृष्ण के साथ सब होली खेल रहे हैं। फागुन के रंगों के माध्यम से गोपियां अपने हृदय का प्रेम प्रकट कर रही हैं। वे अति सुन्दर साड़ी एवं चित्ताकर्षक चोली पहन कर तथा आंखों में काजल लगाकर श्रीकृष्ण की पुकार सुनकर होली खेलने के लिए अपने घरों से बाहर आ गईं हैं।
डफ, बांसुरी, रुंज, ढोल एवं मृदंग बजने लगे हैं। सब लोग आनंदित होकर मधुर स्वरों में गा रहे हैं। एक ओर श्रीकृष्ण और ग्वाल बाल डटे हुए हैं तो दूसरी ओर समस्त ब्रज की महिलाएं संकोच छोड़कर एक दूसरे को मीठी गालियां दे रहे हैं तथा छेड़छाड़ चल रही है। अकस्मात कुछ सखियां मिलकर श्रीकृष्ण को घेर लेती हैं और स्वर्णघट में भरा सुगंधित रंग उनके सिर पर उंडेल देती हैं। कुछ सखियां उन पर कुमकुम केसर छिडक़ देती हैं। इस प्रकार ऊपर से नीचे तक रंग, अबीर गुलाल से रंगे हुए श्रीकृष्ण ऐसे लग रहे हैं जैसे सांझ के समय आकाश में बादल छा गए हों। फाग के रंगों से दसों दिशाएं परिपूर्ण हो गई हैं। आकाश से देवतागण अपना विचरण भूलकर श्याम सुन्दर का फाग विनोद देखने के लिए रुक गए हैं तथा आनंदित हो रहे हैं।
 
मीराबाई श्रीकृष्ण को अपना स्वामी मानती थीं। उन्होंने होली और श्रीकृष्ण के बारे में अनेक रचनाएं लिखी हैं। उनकी रचनाओं में आध्यात्मिक संदेश भी मिलता है। वे कहती हैं-
फागुन के दिन चार होली खेल मना रे।।
बिन करताल पखावज बाजै अणहदकी झणकार रे।
बिन सुर राग छतीसूं गावै रोम रोम रणकार रे।।
सील संतोखकी केसर घोली प्रेम प्रीत पिचकार रे।
उड़त गुलाल लाल भयो अंबर, बरसत रंग अपार रे।।
घटके सब पट खोल दिये हैं लोकलाज सब डार रे।
मीरा के प्रभु गिरधर नागर चरणकंवल बलिहार रे।।
 
इस पद में मीराबाई ने होली एवं फागुन के माध्यम से समाधि का उल्लेख किया है। वे कहती हैं कि फागुन मास में होली खेलने के चार दिन ही होते हैं अर्थात बहुत अल्प समय होता है। इसलिए मन होली खेल ले अर्थात श्रीकृष्ण से प्रेम कर ले। करताल एवं पखावाज के बिना ही अनहद की झंकार हो रही है। मेरा मन बिना सुर एवं राग के आलाप कर रहा है। इस प्रकार रोम-रोम श्रीकृष्ण के प्रेम में लीन है। मैंने अपने प्रिय से होली खेलने के लिए शील एवं संतोष रूपी केसर का रंग घोल लिया है। मेरा प्रिय प्रेम ही मेरी पिचकारी है। गुलाल के उड़ने के कारण संपूर्ण आकाश लाल हो गया है। मैंने अपने हृदय के द्वार खोल दिए हैं, क्योंकि अब मुझे लोक लाज का कोई तनिक भी भय नहीं है। मेरे स्वामी गोवर्धन पर्वत को अपनी अंगुली पर उठाने वाले भगवान श्रीकृष्ण हैं। मैंने उनके चरणों में अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया है।       
 
श्रृंगार रस के विख्यात कवि बिहारीलाल को भी होली का त्योहार बहुत प्रिय था। उन्होंने भी होली को लेकर अनेक रचनाएं लिखी हैं। वे कहते हैं-
उड़ि गुलाल घूंघर भई तनि रह्यो लाल बितान।
चौरी चारु निकुंजनमें ब्याह फाग सुखदान।।
फूलन के सिर सेहरा, फाग रंग रंगे बेस।
भांवरहीमें दौड़ते, लै गति सुलभ सुदेस।।
भीण्यो केसर रंगसूं लगे अरुन पट पीत।
डालै चांचा चौकमें गहि बहियां दोउ मीत।।
रच्यौ रंगीली रैनमें, होरीके बिच ब्याह।
बनी बिहारन रसमयी रसिक बिहारी नाह।।
 
रीतिकालीन कवि पद्माकर ने भी होली का बहुत ही सुन्दर वर्णन किया है। उन्होंने श्रीकृष्ण की राधा और गोपियों के साथ होली खेलने को लेकर अनेक सुन्दर रचनाएं लिखी हैं। वे कहते हैं- 
फागु की भीर, अभीरिन ने गहि गोविंद लै गई भीतर गोरी
भाय करी मन की पद्माकर उपर नाई अबीर की झोरी
छीने पीतांबर कम्मर तें सु बिदा कई दई मीड़ि कपोलन रोरी।
नैन नचाय कही मुसकाय ''लला फिर आइयो खेलन होरी।"
 
अर्थात श्रीकृष्ण गोपियों के साथ होली खेल रहे हैं। पद्माकर कहते हैं कि राधा होली खेल रही भीड़ में से श्रीकृष्ण का हाथ पकड़कर भीतर ले जाती है। फिर वह अपने मन की करते हुए श्रीकृष्ण पर अबीर की झोली उलट देती है तथा उनकी कमर से पीतांबर छीन लेती है। वह श्रीकृष्ण को यूं ही नहीं छोड़ती, अपितु जाते हुए उनके गालों पर गुलाल लगाती है। वह उन्हें निहारते एवं मुस्कराते हुए कहती है कि लला फिर से आना होली खेलने।
 
हिन्दी कविता के छायावादी युग के चार प्रमुख स्तंभों में से एक माने जाने वाले सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ भी होली के रंगों से अछूते नहीं रहे। उन्होंने भी होली के रंगीले त्योहार पर कई कविताएं लिखी हैं। वे कहते हैं-
होली है भाई होली है
मौज मस्ती की होली है
रंगो से भरा ये त्यौहार
बच्चो की टोली रंग लगाने आयी है
बुरा ना मानो होली है
 
राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त ने भी होली पर बहुत सी कविताएं लिखी हैं। वे खड़ी बोली के प्रथम कवि माने जाते हैं। उनकी होली की कविताएं बहुत ही सुन्दर एवं लुभावनी हैं। वे कहते हैं-
जो कुछ होनी थी, सब होली
धूल उड़ी या रंग उड़ा है
हाथ रही अब कोरी झोली
आंखों में सरसों फूली है
सजी टेसुओं की है टोली
पीली पड़ी अपत, भारत-भू,
फिर भी नहीं तनिक तू डोली
 
उत्तर छायावाद काल के प्रमुख कवि हरिवंश राय बच्चन की होली पर लिखी कविताएं बहुत ही सुन्दर हैं। इनमें प्रेम एवं विरह आदि के अनेक रंग हैं। वे कहते हैं-
तुम अपने रंग में रंग लो तो होली है
देखी मैंने बहुत दिनों तक
दुनिया की रंगीनी
किंतु रही कोरी की कोरी
मेरी चादर झीनी
तन के तार छूए बहुतों ने
मन का तार न भीगा
तुम अपने रंग में रंग लो तो होली है
 

होली आई रे

डॊ. सौरभ मालवीय
फागुन आते ही चहुंओर होली के रंग दिखाई देने लगते हैं. जगह-जगह होली मिलन समारोहों का आयोजन होने लगता है. होली हर्षोल्लास, उमंग और रंगों का पर्व है. यह पर्व फाल्गुन मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है. इससे एक दिन पूर्व होलिका जलाई जाती है, जिसे होलिका दहन कहा जाता है. दूसरे दिन रंग खेला जाता है, जिसे धुलेंडी, धुरखेल तथा धूलिवंदन कहा जाता है. लोग एक-दूसरे को रंग, अबीर-गुलाल लगाते हैं. रंग में भरे लोगों की टोलियां नाचती-गाती गांव-शहर में घूमती रहती हैं. ढोल बजाते और होली के गीत गाते लोग मार्ग में आते-जाते लोगों को रंग लगाते हुए होली को हर्षोल्लास से खेलते हैं. विदेशी लोग भी होली खेलते हैं. सांध्य काल में लोग एक-दूसरे के घर जाते हैं और मिष्ठान बांटते हैं.

पुरातन धार्मिक पुस्तकों में होली का वर्णन अनेक मिलता है. नारद पुराण औऱ भविष्य पुराण जैसे पुराणों की प्राचीन हस्तलिपियों और ग्रंथों में भी इस पर्व का उल्लेख है. विंध्य क्षेत्र के रामगढ़ स्थान पर स्थित ईसा से तीन सौ वर्ष पुराने एक अभिलेख में भी होली का उल्लेख किया गया है. होली के पर्व को लेकर अनेक कथाएं प्रचलित हैं. सबसे प्रसिद्ध कथा विष्णु भक्त प्रह्लाद की है. माना जाता है कि प्राचीन काल में हिरण्यकशिपु नाम का एक अत्यंत बलशाली असुर था. वह स्वयं को भगवान मानने लगा था.  उसने अपने राज्य में भगवान का नाम लेने पर प्रतिबंध लगा दिया था. जो कोई भगवान का नाम लेता, उसे दंडित किया जाता था. हिरण्यकशिपु का पुत्र प्रह्लाद भगवान विष्णु का भक्त था. प्रह्लाद की प्रभु भक्ति से क्रुद्ध होकर हिरण्यकशिपु ने उसे अनेक कठोर दंड दिए, परंतु उसने भक्ति के मार्ग का त्याग नहीं किया. हिरण्यकशिपु की बहन होलिका को वरदान प्राप्त था कि वह अग्नि में भस्म नहीं हो सकती. हिरण्यकशिपु ने आदेश दिया कि होलिका प्रह्लाद को गोद में लेकर अग्नि कुंड में बैठे. अग्नि कुंड में बैठने पर होलिका तो जल गई, परंतु प्रह्लाद बच गया. भक्त प्रह्लाद की स्मृति में इस दिन होली जलाई जाती है. इसके अतिरिक्त यह पर्व राक्षसी ढुंढी, राधा कृष्ण के रास और कामदेव के पुनर्जन्म से भी संबंधित है. कुछ लोगों का मानना है कि होली में रंग लगाकर, नाच-गाकर लोग शिव के गणों का वेश धारण करते हैं तथा शिव की बारात का दृश्य बनाते हैं. कुछ लोगों का यह भी मानना है कि भगवान श्रीकृष्ण ने इस दिन पूतना नामक राक्षसी का वध किया था. इससे प्रसन्न होकर गोपियों और ग्वालों ने रंग खेला था.

देश में होली का पर्व विभिन्न प्रकार से मनाया जाता है. ब्रज की होली मुख्य आकर्षण का केंद्र है. बरसाने की लठमार होली भी प्रसिद्ध है. इसमें पुरुष महिलाओं पर रंग डालते हैं और महिलाएं उन्हें लाठियों तथा कपड़े के बनाए गए कोड़ों से मारती हैं. मथुरा का प्रसिद्ध 40 दिवसीय होली उत्सव वसंत पंचमी से ही प्रारंभ हो जाता है. श्री राधा रानी को गुलाल अर्पित कर होली उत्सव शुरू करने की अनुमति मांगी जाती है. इसी के साथ ही पूरे ब्रज पर फाग का रंग छाने लगता है. वृंदावन के शाहजी मंदिर में प्रसिद्ध वसंती कमरे में श्रीजी के दर्शन किए जाते हैं. यह कमरा वर्ष में केवल दो दिन के लिए खुलता है. मथुरा के अलावा बरसाना, नंदगांव, वृंदावन आदि सभी मंदिरों में भगवान और भक्त पीले रंग में रंग जाते हैं. ब्रह्मर्षि दुर्वासा की पूजा की जाती है. हिमाचल प्रदेश के कुल्लू में भी वसंत पंचमी से ही लोग होली खेलना प्रारंभ कर देते हैं. कुल्लू के रघुनाथपुर मंदिर में सबसे पहले वसंत पंचमी के दिन भगवान रघुनाथ पर गुलाल चढ़ाया जाता है, फिर भक्तों की होली शुरू हो जाती है. लोगों का मानना है कि रामायण काल में हनुमान ने इसी स्थान पर भरत से भेंट की थी. कुमाऊं में शास्त्रीय संगीत की गोष्ठियां आयोजित की जाती हैं. बिहार का फगुआ प्रसिद्ध है. हरियाणा की धुलंडी में भाभी पल्लू में ईंटें बांधकर देवरों को मारती हैं. पश्चिम बंगाल में दोल जात्रा निकाली जाती है. यह पर्व चैतन्य महाप्रभु के जन्मदिवस के रूप में मनाया जाता है. शोभायात्रा निकाली जाती है. महाराष्ट्र की रंग पंचमी में सूखा गुलाल खेला जाता है. गोवा के शिमगो में शोभा यात्रा निकलती है और सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है. पंजाब के होला मोहल्ला में सिक्ख शक्ति प्रदर्शन करते हैं. तमिलनाडु की कमन पोडिगई मुख्य रूप से कामदेव की कथा पर आधारित वसंत का उत्सव है. मणिपुर के याओसांग में योंगसांग उस नन्हीं झोंपड़ी का नाम है, जो पूर्णिमा के दिन प्रत्येक नगर-ग्राम में नदी अथवा सरोवर के तट पर बनाई जाती है. दक्षिण गुजरात के आदिवासी भी धूमधाम से होली मनाते हैं. छत्तीसगढ़ में लोक गीतों के साथ होली मनाई जाती है.  मध्यप्रदेश के मालवा अंचल के आदिवासी भगोरिया मनाते हैं. भारत के अतिरिक्त अन्य देशों में भी होली मनाई जाती है.

होली सदैव ही साहित्यकारों का प्रिय पर्व रहा है. प्राचीन काल के संस्कृत साहित्य में होली का उल्लेख मिलता है. श्रीमद्भागवत महापुराण में रास का वर्णन है. अन्य रचनाओं में 'रंग' नामक उत्सव का वर्णन है. इनमें हर्ष की प्रियदर्शिका एवं रत्नावली और कालिदास की कुमारसंभवम् तथा मालविकाग्निमित्रम् सम्मिलित हैं. भारवि एवं माघ सहित अन्य कई संस्कृत कवियों ने अपनी रचनाओं में वसंत एवं रंगों का वर्णन किया है. चंद बरदाई द्वारा रचित हिंदी के पहले महाकाव्य पृथ्वीराज रासो में होली का उल्लेख है. भक्तिकाल तथा रीतिकाल के हिन्दी साहित्य में होली विशिष्ट उल्लेख मिलता है. आदिकालीन कवि विद्यापति से लेकर भक्तिकालीन सूरदास, रहीम, रसखान, पद्माकर, जायसी, मीराबाई, कबीर और रीतिकालीन बिहारी, केशव, घनानंद आदि कवियों ने होली को विशेष महत्व दिया है. प्रसिद्ध कृष्ण भक्त महाकवि सूरदास ने वसंत एवं होली पर अनेक पद रचे हैं. भारतीय सिनेमा ने भी होली को मनोहारी रूप में पेश किया है. अनेक फिल्मों में होली के कर्णप्रिय गीत हैं.

होली आपसी ईर्ष्या-द्वेष भावना को बुलाकर संबंधों को मधुर बनाने का पर्व है, परंतु देखने में आता है कि इस दिन बहुत से लोग शराब पीते हैं, जुआ खेलते हैं, लड़ाई-झगड़े करते हैं. रंगों की जगह एक-दूसरे में कीचड़ डालते हैं. काले-नीले पक्के रंग एक-दूसरे पर फेंकते हैं. ये रंग कई दिन तक नहीं उतरते. रसायन युक्त इन रंगों के कारण अकसर लोगों को त्वचा संबंधी रोग भी हो जाते हैं. इससे आपसी कटुता बढ़ती है. होली प्रेम का पर्व है, इसे इस प्रेमभाव के साथ ही मनाना चाहिए. पर्व का अर्थ रंग लगाना या हुड़दंग करना नहीं है, बल्कि इसका अर्थ आपसी द्वेषभाव को भुलाकर भाईचारे को बढ़ावा देना है. होली खुशियों का पर्व है, इसे शोक में न बदलें.

Wednesday, March 5, 2025

भारतीय संस्कृति में नारी कल, आज और कल


डॉ. सौरभ मालवीय
‘नारी’ इस शब्द में इतनी ऊर्जा है कि इसका उच्चारण ही मन-मस्तक को झंकृत कर देता है, इसके पर्यायी शब्द स्त्री, भामिनी, कान्ता आदि है, इसका पूर्ण स्वरूप मातृत्व में विलसित होता है। नारी, मानव की ही नहीं अपितु मानवता की भी जन्मदात्री है, क्योंकि मानवता के आधार रूप में प्रतिष्ठित सम्पूर्ण गुणों की वही जननी है। जो इस ब्रह्माण्ड को संचालित करने वाला विधाता है, उसकी प्रतिनिधि है नारी। अर्थात समग्र सृष्टि ही नारी है इसके इतर कुछ भी नही है। इस सृष्टि में मनुष्य ने जब बोध पाया और उस अप्रतिम ऊर्जा के प्रति अपना आभार प्रकट करने का प्रयास किया तो वरवश मानव के मुख से निकला कि –
त्वमेव माता च पिता त्वमेव
त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव।
त्वमेव विधा द्रविणं त्वमेव
त्वमेव सर्वं मम देव देव॥
अर्थात हे प्रभु तुम माँ हो ............।
अक्सर यह होता है कि जब इस सांसारिक आवरण मैं फंस जाते या मानव की किसी चेष्टा से आहत हो जाते हैं तो बरबस हमें एक ही व्यक्ति की याद आती है और वह है माँ । अत्यंत दुःख की घड़ी में भी हमारे मुख से जो ध्वनी उच्चरित होती है वह सिर्फ माँ ही होती है। क्योंकि माँ की ध्वनि आत्मा से ही गुंजायमान होती है ।  और शब्द हमारे कंठ से निकलते हैं लेकिन माँ ही एक ऐसा शब्द है जो हमारी रूह से निकलता है। मातृत्वरूप में ही उस परम शक्ति को मानव ने पहली बार देखा और बाद में उसे पिता भी माना। बन्धु, मित्र आदि भी माना। इसी की अभिव्यक्ति कालिदास करते है कि-
वागार्थविव संप्रक्तौ वागर्थ प्रतिपत्तये।
जगतः पीतरौ वन्दे पार्वती परमेश्वरौ ॥ (कुमार सम्भवम)
जगत के माता-पिता (पीतर) भवानी शंकर, वाणी और अर्थ के सदृश एकीभूत है उन्हें वंदन।
इसी क्रम में गोस्वामी तुलसीदास भी यही कहते  हैं –
जगत मातु पितु संभु-भवानी। (बालकाण्ड मानस)
अतएव नारी से उत्पन्न सब नारी ही होते है, शारीरिक आकार-प्रकार में भेद हो सकता है परन्तु, वस्तुतः और तत्वतः सब नारी ही होते है। सन्त ज्ञानेश्वर ने तो स्वयं को“माऊली’’ (मातृत्व,स्त्रीवत) कहा है।
कबीर ने तो स्वयं समेत सभी शिष्यों को भी स्त्री रूप में ही संबोधित किया है वे कहते है –
दुलहिनी गावहु मंगलाचार
रामचन्द्र मोरे पाहुन आये धनि धनि भाग हमार
दुलहिनी गावहु मंगलाचार । - (रमैनी )
घूँघट के पट खोल रे तुझे पीव मिलेंगे
अनहद में मत डोल रे तुझे पीव मिलेंगे । -(सबद )
सूली ऊपर सेज पिया कि केहि बिधि मिलना होय । - (रमैनी )
जीव को सन्त कबीर स्त्री मानते है और शिव (ब्रह्म) को पुरुष यह स्त्री–पुरुष का मिलना ही कल्याण है मोक्ष और सुगति है ।
भारतीय संस्कृति में तो स्त्री ही सृष्टि की समग्र अधिष्ठात्री है, पूरी सृष्टि ही स्त्री है क्योंकि इस सृष्टि में बुद्दि ,निद्रा, सुधा, छाया, शक्ति, तृष्णा, जाति, लज्जा, शान्ति, श्रद्धा, चेतना और लक्ष्मी आदि अनेक रूपों में स्त्री ही व्याप्त है। इसी पूर्णता से स्त्रियाँ भाव-प्रधान होती हैं, सच कहिये तो उनके शरीर में केवल हृदय ही होता है,बुद्दि में भी ह्रदय ही प्रभावी रहता है, तभी तो गर्भधारण से पालन पोषण तक असीम कष्ट में भी आनंद की अनुभूति करती रहती।कोई भी हिसाबी चतुर यह कार्य एक पल भी नही कर सकता। भावप्रधान नारी चित्त ही पति, पुत्र और परिजनों द्वारा वृद्दावस्था में भी अनेकविध कष्ट दिए जाने के बावजूद उनके प्रति शुभशंसा रखती है उनका बुरा नहीं करती,जबकि पुरुष तो ऐसा कभी कर ही नही सकता क्योंकि नर विवेक प्रधान है, हिसाबी है, विवेक हिसाब करता है घाटा लाभ जोड़ता है, और हृदय हिसाब नही करता। जयशंकर प्रसाद ने कामायनी में लिखा है-
यह आज समझ मैं पायी हूँ कि
दुर्बलता में नारी हूँ।
अवयन की सुन्दर कोमलता
लेकर में सबसे हारी हूँ ।।
भावप्रधान नारी का यह चित्त जिसे प्रसाद जी कहते है-
नारी जीवन का चित्र यही
क्या विकल रंग भर देती है।
स्फुट रेखा की सीमा में
आकार कला को देती है।।
परिवार व्यवस्था हमारी सामाजिक व्यवस्था का आधार स्तंभ है,इसके दो स्तम्भ है- स्त्री और पुरुष।परिवार को सुचारू रूप देने में दोनों की भूमिका अत्यंत महतवपूर्ण है,समय के साथ मानवीय विचारों में बदलाव आया है|कई पुरानी परम्पराओं,रूढ़िवादिता एवं अज्ञान का समापन हुआ।महिलाएँ अब घर से बाहर आने लगी है कदम से कदम मिलाकर सभी क्षेत्रों में अपनी धमाकेदार उपस्थिति दे रही है,अपनी इच्छा शक्ति के कारण सभी क्षेत्रों में अपना परचम लहरा रही है अंतरिक्ष हो या प्रशासनिक सेवा,शिक्षा,राजनीति,खेल,मिडिया सहित विविध विधावों में अपनी गुणवत्ता सिद्ध कर कुशलता से प्रत्येक जिम्मेदारी के पद को सँभालने लगी है, आज आवश्यकता है यह समझने की  कि नारी विकास की केन्द्र है और भविष्य भी उसी का है, स्त्री के सुव्यवस्थित एवं सुप्रतिष्ठित जीवन के अभाव में सुव्यवस्थित समाज की रचना नहीं हो सकती। अतः मानव और मानवता दोनों को बनाये रखने के लिए नारी के गौरव को समझना होगा।


Monday, March 3, 2025

प्राथमिक शिक्षा



क्षेत्रीय टोली बैठक
प्राथमिक शिक्षा 
सुल्तानपुर (उत्तर प्रदेश)

विद्या भारती की साधारण सभा बैठक

विद्या भारती की साधारण सभा बैठक   3 अप्रैल से 6 अप्रैल 2026   हरि नगर (दिल्ली)