Saturday, May 12, 2007

श्री चिरंजीव सौरभ के मंगल परिणय पर सस्नेह समर्पित

 

ब्रजेन्द्र कुमार मालवीय
अयि सुमन: सुमन: सुमन: सुमन: सुमनोहर कान्तियुते,
श्रित रजनीरज-नीरज-नीरजनी-रजनीकर वक्त्रयुते।
सुनयन विभ्रम-रभ्र-मर-भ्रमर-भ्रम-रभ्रमराधिपते,
जय जय हे महिषासुर मार्दिनि रम्य कपर्दिनि शैल सुते॥
- जगद्गुरू श्रीशंकराचार्य

काशी गौरीशंकर पद में
हैं दुर्बलसुत वन्दन करते।
हम हैं राम भरोसे के तो
राम रक्ष में रत रहते॥1॥
हे देव तुम्हारी अमित कृपा से
सुमनों को सौरभ मिलता।
शंकर चरणों में चढ़ने पर
भक्तों का जीवन खिलता॥2॥

सुमन जीव, सौरभ शिव हैं
यह जगत् ब्रह्म का नाता है।
जब तक देही देह सहित है
तब तक ही जग भाता है॥3॥

सुमन तुम्हारी सार्थकता है
सौरभ साथ निभाने में।
बिन सौरभ तुम प्राणहीन हो
हो बिनमोल जमाने में॥4॥

सौरभ भी तो हैं अनंद
रति सुमन संग उसका परिचय।
उससे ही वह चर्चित होते
अन्यथा लुप्त होते निश्चय॥5॥

जब भी सुमन देखता कोई
कहता कहां सुरभि इसकी।
सुरक्षित पवन देव को पाकर
सुमन खोजती मति सबकी॥6॥

यद्यपि चन्दन सौरभयुत है।
देव शीश पर चढ़ता है।
फिर भी सुमन हीन होने की
पीड़ा में ही रहता है॥7॥

स्वर्ण सुमन की यही वेदना
उसको सौरभ नहीं मिला।
कनक चाहता जग जी भर
पर उसे ब्रह्म से यही मिला॥8॥

सौरभ सुमन साथ रहकर ही
करते हैं जग को सन्दर।
छोटा-बड़ा नहीं है कोई
एक से एक उभय बढ़कर॥9॥

सुमन युक्त होवें सौरभ से
सौरभ भी होवें सुमन।
श्रीश ब्रजेन्द्र पीयूष कृपा से
करें सृजित सुन्दर जीवन॥10॥

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