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Showing posts from 2017

वंदे मातरम का विभिन्न भाषाओं में अनुवाद होगा

डॊ. सौरभ मालवीय
राष्ट्र गीत वंदे मातरम एक बार भी चर्चा में है. इस बार मद्रास उच्च न्यायालय की वजह से इसके गायन का मुद्दा गरमाया है.   मद्रास उच्च न्यायालय के न्यायधीश एमवी मुरलीधरन ने आदेश दिया है कि राष्ट्रगीत वंदे-मातरम को हर सरकारी/ग़ैर-सरकारी कार्यालयों/संस्थानों/उद्योगों में हर महीने कम से कम एक बार गाना होगा. यह गीत मूल रूप से बांग्ला और संस्कृत भाषा में है, इसलिए इसे तमिल और अंग्रेज़ी में अनुवाद करने के भी आदेश दिए गए हैं. उल्लेखनीय है कि एक ओर मुस्लिम समुदाय से ही वंदे मातरम के विरोध में स्वर उठ रहे हैं, वहीं दूसरी ओर एक मुस्लिम लड़की ने ही वंदे मातरम का पंजाबी में अनुवाद कर सराहनीय कार्य किया है.वंदे मातरम का पंजाबी अनुवाद करने वाली फ़िरदौस ख़ान शाइरा, लेखिका और पत्रकार हैं. अरबिंदो घोष ने इस गीत का अंग्रेज़ी में और आरिफ़ मोहम्मद ख़ान ने उर्दू में अनुवाद किया. उर्दू में ’वंदे मातरम’ का अर्थ है ’मां तुझे सलाम’. ऐसे में किसी को भी अपनी मां को सलाम करने में आपत्ति नहीं होनी चाहिए. आशा है कि आगे भी देश-विदेश की अन्य भाषाओं में इसका अनुवाद होगा.

उल्लेखनीय यह भी है कि जिस मामले में मद…

सेवाकार्य

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आशीष भैया है
कुष्ट पीड़ित बन्धुओं/ भगनियों की सेवा हेतु जीवन समर्पित 'दिव्यप्रेम सेवा मिशन' नाम से हरिद्वार में प्रकल्प है अनाथ बच्चों और उस पीड़ित परिवार के बच्चो की शिक्षा,चिकित्सा हेतु आवासीय सेवाकार्य का प्रकल्प है।
आशीष भैया विज्ञान संकाय से स्नातकोत्तर करने के बाद माँ भारती की सेवा हेतु संघ के प्रचारक बन गए गोरखपुर में महानगर प्रचारक रहे उस समय मैं 10वी का विद्यार्थी था आशीष जी स्कूटर से चलते थे मुझे सौभाग्य मिला कुछ वर्ष साथ रहने का । कुष्ट पीड़ित लोगों की समाज में उपेक्षा और तिरस्कार देख कर उनके लिए कुछ करना चाहिए यह सोचते हुए उन पीड़ितों के साथ ही अपना आश्रम बना लिए । इस पुनीत कार्य हेतु आशीष जी को प्रणाम।

नवभारत टाइम्स

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सहारनपुर का सच
नवभारत टाइम्स

सावरकर जयंती

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स्वातंत्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर की जयंती है।
भारत माता के लिए असंख्य कष्ट भोगने वाले सावरकर को कोटि-कोटि प्रणाम...

प्रसिद्ध इतिहासकार प्रो.मक्खन सिंह

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सानिध्य
प्रसिद्ध इतिहासकार प्रो.मक्खन सिंह
विचार दर्शन भारतीय दृष्टि
विश्व सभ्यता और विचार-चिन्तन का इतिहास काफी पुराना है। लेकिन इस समूची पृथ्वी पर पहली बार भारत में ही मनुष्य की संवेदनाओं चिंतन प्रारंभ किया भारतीय चिंतन का आधार हमारी युगों पुरानी संस्कृति है। भारत एक देश है और सभी भारतीय जन एक है, परन्तु हमारा यह विश्वास है कि भारत के एकत्व का आधार उसकी युगों पुरानी अपनी संस्कृति में निहित है- इस बात को न्यायालयों ने उनके निर्णयों में स्वीकार किया है। सांस्कृतिक चिंतन एक आध्यात्मिक अवधारणा है और यही है भारतीय का वैशिष्ट्य। राष्ट्र का आधार हमारी संस्कृति और विरासत है। हमारे लिए ऐसे राष्ट्रवाद का कोई अर्थ नहीं जो हमे वेदों, पुराणों, रामायण, महाभारत, गौतमबुद्ध, भगवान महावीर स्वामी, शंकराचार्य, गुरूनानक, महाराणा प्रताप, शिवाजी महाराज, स्वामी दयानन्द, लोकमान्य तिलक, महात्मा गांधी, पण्डित दीनदयाल उपाध्याय और असंख्य अन्य राष्ट्रीय अधिनायकों से अलग करता हो। यह राष्ट्रवाद ही हमारा धर्म है।

लड़की तो नहीं मिली, जिन्दगी का मिशन मिल गया

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17 अगस्त 2006 को रोड एक्सीडेंट में सर फट गया. 60 प्रतिशत हिस्सा बाहर निकल गया. डॉक्टरों ने मृत बता दिया. शरीर को अग्नि में सुपुर्द करने की तैयारी शुरू हो गई, लेकिन नियति को कुछ और ही कराना था इसलिए आजाद पाण्डेय की सांसे किसी कोने में छुपी थी. आजाद जिन्दा थे, शरीर में कुछ हल-चल हुई. गोरखपुर सावित्री नर्सिंग होम में भगवन बनकर एक डॉक्टर आजाद को नई जिन्दगी देने में सहायक बने, परन्तु आजाद स्मरण शक्ति खो दिए थे. शरीर और दिमाग दोनों का इलाज दिल्ली और गोरखपुर में चलता रहा. धीरे-धीरे सुधार होता गया. इसी बिच एक घटना होती है दिल्ली इलाज के लिए आजाद अपने पापा के साथ आते है. ट्रेन के जनरल डिब्बे में दोनों बैठे है. खिड़की से बहार आजाद की नज़र पड़ती है. एक छोटी सी बच्ची 7-8 साल की जो ट्रेन से फेकी हुई गंदगी को खा रही थी. यह देखकर आजाद चिल्लाये,शोर मचाये और पापा से बोले इसे अपना खाना दीजिये. पापा ने डांटा, लोगो ने समझाया. मगर आजाद के जिद्द के सामने किसी की नही चली और पापा ने पूरा खाना दे दिया. बच्ची खाने लगी. ट्रेन चल पड़ी. आजाद बोलने लगे पापा को ख़ुशी हुई. मेरा बेटा ठीक हो गया.
कुछ वर्षो तक आजाद पाण्डेय…

लोकार्पण

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वर्तमान परिप्रेक्ष्य में राष्ट्रीय पत्रकारिता, पुस्तिका का लोकार्पण

आखिर राष्ट्रवाद से भय क्यों

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पत्रकारिता के राष्ट्रवादी स्वरूप के इतने महत्वपूर्ण योगदान के बाद भी, दुर्भाग्यवश स्वाधीनता प्राप्ति के बाद पत्रकारिता जगत में राष्ट्रवाद की उपेक्षा होने लगी | आज स्थिति यह है कि पत्रकारिता के आधुनिक स्वरूप में राष्ट्रवाद को संकुचित विचार माना जाता है | इसलिए राष्ट्रवादी विचारों और मुद्दों पर की जाने वाली पत्रकारिता को मुख्यधरा की पत्रकारिता में शामिल नही किया जाता ,परन्तु यदि हम राष्ट्रवाद की परिभाषा और व्यख्या पर नजर डालें तो यह स्थापित सत्य दीखता है कि पत्रकारिता का राष्ट्रवाद से सीधा सम्बन्ध है सामाजिक मान्यता है कि मीडिया संस्कृति का वाहक भी है, दर्पण भी है और निर्माता भी अतएव पत्रकारिता का मौलिक कार्य समाज की विकास के प्रक्रियाओं को मजबूत करना है जिसके लिए उसे निर्भीक ,सत्यवादी और सुचितापूर्ण अनुशासन की भूमिका मे अपने को रखना है |

देश के सांस्कृतिक और ऐतिहासिक अस्मिता को जगाने के व्यापक एवं उच्चादर्श से जुड़ा है भारतीय पत्रकारिता।इसे समझने के लिए भारतीय मन का बोध होना जरुरी है, रहते भारत में है और सोचते पश्चिम की दृष्टि से ना ना अब वक्त के हिसाब से अपनी सोच बदलिए (लाल चश्मा) और …

प्रातः संविमर्श

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आइआइएमसी में यज्ञ ,पूजन और ॐ शंखनाद के साथ प्रारम्भ हुआ आज प्रातः संविमर्श

राष्ट्रीय परिसंवाद राष्ट्रवाद और मीडिया

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डॉ सौरभ मालवीय
भारत में पलने-बढ़ने वाले विदेशी मानसिकता के ये लोग यज्ञ से डरते हैं. यह कटु सत्य है कि बामपंथी विचारकों का भारत की बुद्धिवाद पर और कॉंग्रेंस का देश की सत्ता पर दीघ्रकाल तक आधिपत्य या गाहे बगाहे कब्जा रहा है । इनके लिये राष्ट्र जमीन का एक टुकड़ा और उपभोग के केन्द्र के सिवाय कुछ नहीं है । यह वह वर्ग है जो रहता भारत में है खाता और जीता भी भारत में ही है देश के संसाधनों और अधिकांश प्रतिष्ठानों पर भी लम्बे समय तक यही वर्ग काबिज रहा है बावजूद इसके इनके लिये देश सत्ता उपभोग का केन्द्र या हेतु मात्र है। ये नहीं चाहते कि भारत दुनियां के सामने सिरमौर राष्ट्र के रूप में स्थापित हो ये यह भी नहीं चाहते कि भारत एक बार फिर से विश्व गुरू के रूप में अपना पुराना स्थान हासिल करें। इनके लिये दुनिया के सामने दीन-हीन हिन्दुस्तान शोषित अपमानित और निम्नतर भारत की तस्वीर प्रस्तुत करना गर्व का विषय रहा है। इन्हें सिर्फ यहां की बुराई के सिवाय कुछ भी नहीं दिखाई देता। इस खास वर्ग को गौरवहीन भारत और अपमानति हिन्दू अच्छा लगता है। राष्ट्र हिन्दुत्व व राष्ट्रवादी प्रतिष्ठानों का शक्तिशाली या प्रतिष्ठित…

स्मृतियों के संसार से

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बात 1996-97 की है मैं गोरखपुर में विद्यार्थी था संघ कार्यालय में रहता था. एक नगर सायं शाखा की जिम्मेदारी थी. वर्तमान का मुहद्दीपुर जिसे (विश्वविद्यालय नगर) संघ की योजना में कहते थे. नगर में शिशु विद्यार्थी से लेकर तरुण विद्यार्थी तक संपर्क करना शाखा एवं अनेक प्रकार के कार्यक्रमों से जोड़ने का प्रयास वास्तव में यह रोमांचपूर्ण कार्य बहुत ही आनंद आता था, उसी क्रम में क्लास ६ से १० तक के छात्रों के साथ एक दिन का वनविहार (कुसमी जंगल) करना तय हुआ. मेरे नगर प्रचारक युगल जी थे. उनके सहयोग से आयोजन सम्पन्न हुआ. उस शिविर में शिशु विद्यार्थी रणवीर सिंह भी थे. वक्त का पहिया अपने गति से चलता रहता है. लम्बे अन्तराल के बाद रणवीर से मिलकर अच्छा लगा. आप के उज्जवल भविष्य की शुभकामनाएं.
(टीवी पत्रकार है Ranveer Singh )

जनेऊ संस्कार

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मेरा गांव पूर्वी उत्तर-प्रदेश का अंतिम गांव है निकट का क़स्बा ’लार बाजार’ की दूरी भी 5 किलोमीटर है सुदूर नदी के तट बसा गांव “पटनेजी” है. साधन सम्पन्न बहुत नहीं है, परन्तु बौद्धिक रूप से सम्पन्न है. गत 7,8 मई को एक छोटे से पारिवारिक आयोजन का अवसर था. मेरे भतीजे का जनेऊ संस्कार और श्रीन्द्र मालवीय का मुंडन. संस्कार इसी क्रम में ग्रामीण परिवेश की खूबशुरती यानि फैले हुए खेत-खलिहान में बौद्धिक मंच सजा अनेक क्षेत्रों से क्षेत्रीय स्वजनों के उपस्थिति के साथ लखनऊ से चलकर “पटनेजी” गांव पहुंचे बीजेपी के प्रवक्ता श्री Shalabh Mani Tripathi और सार्थक संवाद सम्पन्न हुआ. इस प्रकार का प्रयोग हमारे यहां आयोजनों में होता है, अब आप के आगमन की प्रतीक्षा रहेगी.
आप सभी के लिए प्रस्तुत विचार
संस्कार और संस्कृति का उद्देश्य मानव जीवन को सुन्दर बनाना है. किसी भी समाज को प्रगत और उन्नत बनाने के लिए कोई न कोई व्यवस्था देनी ही पड़ती है और संसार के किसी भी मानवीय समाज में इस विषय पर भारत से ज्यादा चिंतन नहीं हुआ है। कोई भी समाज तभी महान बनता है जब उसके अवयव श्रेष्ठ हों। उन घटकों को श्रेष्ठ बनाने के लिए यह अत्याव…

लाइव लोकसभा टीवी

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प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी द्वारा रेडियो कार्यक्रम "मन की बात " की समीक्षा आज 30 अप्रैल रविवार लोकसभा टीवी पर सुबह 10.50 बजे प्रसारित हुई.










राष्ट्र सर्वोपरि

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डॉ. सौरभ मालवीय
भारत यह एक ऐसा अद्भुत शब्द है जिसका उच्चारण ही मन को झंकृत कर देता है। जिस शब्द की कल्पना से ही संगीत निकलने लगे वह भारत है। ‘भारत’ में ‘भा’ का अर्थ होता है उजाला, सत्य, प्रकाश, आभा, ज्ञान, मोक्ष, परिपूर्ण, पोषण, जीवन आनन्द आदि आदि...। कहां तक कहें यहां तो सहस्र नाम की परम्परा ही है। विष्णु सहस्र नाम, शिव सहस्र नाम श्रीराम सहस्र नाम, गोपाल सहस्र नाम...। तो भारत के अनन्त नाम हैं अनन्त अर्थ हैं और यह संस्कृत का शब्द है संस्कृत इतनी तरल भाषा ;सपुनपपिकि संदहनंहद्ध है कि इसके अर्थ की अनन्तता सहज ही हो जाती है। भारत में ‘रत’ का अर्थ है लीन तल्लीन, लवलीन विलीन आदि। भारत का अर्थ हुआ ज्ञान में तल्लीन, भरणपोषण करने वाला, परम प्रकाशक अतएव इस धरा पर जहां भी ज्ञान की सत्य की साधना हो वह भारत भूमि है। प्रख्यात दार्शनिक ओशो की रचना ‘भारत एक सनातन यात्रा’ की प्रस्तावना में विख्यात साहित्यकर्तृ श्रीमती अमृता प्रीतम कहती हैं- ‘‘भारत एक भाव दशा है और इस जगत में जहां भी ज्ञान के अनन्त ऊंचाइयों को छूने का परम्परागत प्रयास चलता है वह भारत है।’’ इन विशिष्टताओं के बिना भारत अधूरा है। भारतीय स…

मुद्दा : कश्मार

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राष्ट्रधर्म

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राष्ट्रधर्म तो कल्पवृक्ष है,संघ-शक्ति ध्रुवतारा है।
बने जगद्गुरु भारत फिर से ,यह संकल्प हमारा है।।
अटल जी कहते है कि छात्र जीवन से ही मेरी इच्छा सम्पादक बनने की थी लिखने पढ़ने का शौक और छपा हुआ नाम देखने का मोह भी। इसलिए जब एम् ए की पढ़ाई पूरी की और कानून की पढ़ाई अधूरी छोड़ने के बाद सरकारी नौकरी न करने का पक्का इरादा बना लिया और साथ ही अपना पूरा समय समाज की सेवा में लगाने का मन भी,उस समय पूज्य भाऊ राव देवरस जी के इस प्रस्ताव को तुरंत स्वीकार कर लिया कि संघ द्वारा प्रकाशित होनेवाले राष्ट्रधर्म के संपादन में कार्य करूँगा श्री राजीवलोचन जी भी साथ होंगे।
अगस्त 1947 में पहला अंक निकला और उस समय के प्रमुख साहित्यकार सर सीताराम,डॉ भगवान दास,अमृतलाल नागर,श्री नारायण चतुर्वेदी,आचार्य वृहस्पति व् प्रोफ धर्मवीर को जोड़ कर धूम मचा दी।
(डीएवीपी के अधिकारियों को सोचना चाहिए नोटिस जारी करते समय की राष्ट्रधर्म पत्रिका अर्थात क्या ??)

91.2 FM

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नमस्कार
91.2 FM
आज दिन में 1 बजे से 2 बजे मुझे सुन सकते है
विषय-सांस्कृतिक राष्ट्रवाद

टीवी पर लाइव

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सामाजिक विकास, बंधुत्व एवं राष्ट्रीय स्मिता के अनुरूप सरकार की कार्यनीति होनी चाहिए.

टीवी पर लाइव

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गाय की रक्षा पर बहस क्यों ?

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डॊ. सौरभ मालवीय
वैदिक काल से ही भारतीय संस्कृति में गाय का विशेष महत्व है. दुख की बात है कि भारतीय संस्कृति में जिस गाय को पूजनीय कहा गया है, आज उसी गाय को भूखा-प्यासा सड़कों पर भटकने के लिए छोड़ दिया गया है. लोग अपने घरों में कुत्ते तो पाल लेते हैं, लेकिन उनके पास गाय के नाम की एक रोटी तक नहीं है. छोटे गांव-कस्बों की बात तो दूर देश की राजधानी दिल्ली में गाय को कूड़ा-कर्कट खाते हुए देखा जा सकता है. प्लास्टिक और पॊलिथीन खा लेने के कारण उनकी मृत्यु तक हो जाती है. भारतीय राजनीति में जाति, पंथ और धर्म से ऊपर होकर लोकतंत्र और पर्यावरण की भी चिंता होनी चाहिए. गाय की रक्षा, सुरक्षा बहस का मुद्दा आख़िर क्यों बनाया जा रहा है?

धार्मिक ग्रंथों में गाय को पूजनीय माना गया है. श्रीकृष्ण को गाय से विशेष लगाव था. उनकी प्रतिमाओं के साथ गाय देखी जा सकती है.
बिप्र धेनु सूर संत हित, लिन्ह मनुज अवतार।
निज इच्छा निर्मित तनु माया गुन गोपार॥
अर्थात ब्राह्मण (प्रबुद्ध जन) धेनु (गाय) सूर (देवता) संत (सभ्य लोग) इनके लिए ही परमात्मा अवतरित होते हैं. परमात्मा स्वयं के इच्छा से निर्मित होते हैं और मायातीत, गुणातीत एवम…

Live Today

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शपथ ग्रहण समारोह
मुख्यमंत्री श्री योगी आदित्य नाथ

त्वरित टिप्पणी

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योगी आदित्यनाथ बीजेपी यूपी के सर्वमान्य नेता
बधाई

बधाई

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चर्चित सीट देवबंद के विधायक श्री ब्रजेश सिंह
बहुत बहुत बधाई

गुरुजी का आज दर्शन

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गुरुजी का आज दर्शन
जुबली इण्टर कालेज गोरखपुर,क्लास नवीं में जिवविज्ञानं के शिक्षक और मेरे कक्षा अध्यापक श्री शकल नाथ मणि त्रिपाठी अपने कठोर अनुशासन के लिए जाने जाते उनके द्वारा दिए मन्त्र को हम जैसे हजारों विद्यार्थी आज भी अंगीकार करने में लगे रहते जिसे कुछ तो हम जीवन को सार्थक कर सके। सुबह लखनऊ उनके आवास पर मिला सर ने नास्ता स्वयं परोस कर कराया मेरे मना करने पर बोले पुत्र और शिष्य समान होते है सौरभ ।मुझे खिलाने के सुख से मत रोकों ।
वर्षो बाद सर का आशीर्वाद मिला।प्रणाम।

Live Today

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उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री
(1) 300 से अधिक विधायकों और अपने मंत्रियों पर पूरी तरह से नियंत्रण रखने में सक्षम।
(2) 2019 में 70 सांसदों के कार्य का लेखा-जोखा लेने की हिम्मत ।
(3) संगठन की बारीकियों की समझ
(4) कार्यकर्तावो की चिंता
(5) संघ और संगठन और सत्ता की समझ
(6) विकास आधारित राजनीति
(7) कम से कम 15-20 साल का नेतृत्व
(8) निर्णय लेने में सक्षम
(9) सबका साथ सबका विकास
(10) भारत को भारत की आँखों से देखने की समझ