धर्म और संस्कृति : अटल बिहारी वाजपेयी के अनमोल विचार

  1. हिन्दू धर्म तथा संस्कृति की एक बड़ी विशेषता समय के साथ बदलने की उसकी क्षमता रही है.
  2. हिन्दू धर्म के प्रति मेरे आकर्षण का सबसे मुख्य कारण है कि यह मानव का सर्वोत्कृष्ट धर्म है.
  3. हिन्दू धर्म ऐसा जीवन्त धर्म है, जो धार्मिक अनुभवों की वृद्धि और उसके आचरण की चेतना के साथ निरंतर विकास करता रहता है.
  4. हिन्दू धर्म के अनुसार जीवन का न प्रारंभ है और न अंत ही. यह एक अनंत चक्र है.
  5. मुझे अपने हिन्दूत्व पर अभिमान है, किंतु इसका उरर्थ यह नहीं है कि मैं मुस्तिम-विरोधी हूं. 
  6. हमें हिन्दू कहलाने में गर्व महसूस करना चाहिए, बशर्ते कि हम भारतीय होने में भी आत्मगौरव महसूस करें. 
  7. हिन्दू समाज इतना विशाल है, इतना विविध है कि किसी बैंक में नहीं समा सकता.
  8. हिन्दू समाज गतिशील है, हिंदू समाज में परिवर्तन हुए हैं, परिवर्तन की प्रक्रिया चल रही है. हिन्दू समाज जड़ समाज नहीं है.
  9. भारत के ऋषियों-महर्षियों ने जिस एकात्मक जीवन के ताने-बाने को बुना था, आज वह उपेक्षा तथा उपहास का विषय बनाया जा रहा है.
  10. भारतीय संस्कृति कभी किसी एक उपासना पद्धति से बंधी नहीं रही और न उसका आधार प्रादेशिक रहा.
  11. उपासना, मत और ईश्वर संबंधी विश्वास की स्वतंत्रता भारतीय संस्कृति की परम्परा रही है.
  12. मजहब बदलने से न राष्ट्रीयता बदलती है और न संस्कृति में परिवर्तन होता.
  13. सभ्यता कलेवर है, संस्कृति उसका अन्तरंग. सभ्यता स्थूल होती है, संस्कृति सूक्ष्म. सभ्यता समय के साथ बदलती है, किंतु संस्कृति अधिक स्थायी होती है.
  14. इंसान बनो, केवल नाम से नहीं, रूप से नहीं, शक्ल से नहीं, हृदय से, बुद्धि से, सरकार से, ज्ञान से.
  15. जीवन के फूल को पूर्ण ताकत से खिलाएं.
  16. मनुष्य जीवन अनमोल निधि है, पुण्य का प्रसाद है. हम केवल अपने लिए न जिएं, औरों के लिए भी जिएं. जीवन जीना एक कला है, एक विज्ञान है. दोनों का समन्वय आवश्यक है.
  17. समता के साथ ममता, अधिकार के साथ आत्मीयता, वैभव के साथ सादगी-नवनिर्माण के प्राचीन स्तंभ हैं.
  18. मैं अपनी सीमाओं से परिचित हूं. मुझे अपनी कमियों का अहसास है. सद्भाव में अभाव दिखाई नहीं देता है. यह देश बड़ा ही अद्भुत है, बड़ा अनूठा है. किसी भी पत्थर को सिंदूर लगाकर अभिवादन किया जा सकता है, अभिनन्दन किया जा सकता है.
  19. भगवान जो कुछ करता है, वह भलाई के लिए ही करता है.
  20. परमात्मा एक ही है, लेकिन उसकी प्राप्ति के अनेकानेक मार्ग हैं.
  21. जीवन को टुकड़ों में नहीं बांटा जा सकता, उसका ‘पूर्णता’ में ही विचार किया जाना चाहिए.
  22. मैं हिन्दू परंपरा में गर्व महसूस करता हूं, लेकिन मुझे भारतीय परंपरा में और ज्यादा गर्व है.
  23. सदा से ही हमारी धार्मिक और दार्शनिक विचारधारा का केन्द्र बिंदु व्यक्ति रहा है. हमारे धर्मग्रंथों और महाकाव्यों में सदैव यह संदेश निहित रहा है कि समस्त ब्रह्मांड और सृष्टि का मूल व्यक्ति औरउसका संपूर्ण विकास है.
  24. राष्ट्रशक्ति को अपमानित करने का मूल्य रावण को अपने दस शीशों के रूप में सव्याज चुकाना पड़ा. असुरों की लंका भारत के पावन चरणों में भक्तिभाव से भरकर कन्दकली की भांति सुशोभित हुई. धर्म की स्थापना हुई, अधर्म का नाश हुआ.

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