राष्ट्रीय परिसंवाद राष्ट्रवाद और मीडिया

डॉ सौरभ मालवीय
भारत में पलने-बढ़ने वाले विदेशी मानसिकता के ये लोग यज्ञ से डरते हैं. यह कटु सत्य है कि बामपंथी विचारकों का भारत की बुद्धिवाद पर और कॉंग्रेंस का देश की सत्ता पर दीघ्रकाल तक आधिपत्य या गाहे बगाहे कब्जा रहा है । इनके लिये राष्ट्र जमीन का एक टुकड़ा और उपभोग के केन्द्र के सिवाय कुछ नहीं है । यह वह वर्ग है जो रहता भारत में है खाता और जीता भी भारत में ही है देश के संसाधनों और अधिकांश प्रतिष्ठानों पर भी लम्बे समय तक यही वर्ग काबिज रहा है बावजूद इसके इनके लिये देश सत्ता उपभोग का केन्द्र या हेतु मात्र है। ये नहीं चाहते कि भारत दुनियां के सामने सिरमौर राष्ट्र के रूप में स्थापित हो ये यह भी नहीं चाहते कि भारत एक बार फिर से विश्व गुरू के रूप में अपना पुराना स्थान हासिल करें। इनके लिये दुनिया के सामने दीन-हीन हिन्दुस्तान शोषित अपमानित और निम्नतर भारत की तस्वीर प्रस्तुत करना गर्व का विषय रहा है। इन्हें सिर्फ यहां की बुराई के सिवाय कुछ भी नहीं दिखाई देता। इस खास वर्ग को गौरवहीन भारत और अपमानति हिन्दू अच्छा लगता है। राष्ट्र हिन्दुत्व व राष्ट्रवादी प्रतिष्ठानों का शक्तिशाली या प्रतिष्ठित दिखना इन्हें अच्छा नहीं लगता। परम वैभव की ओर जाता राष्ट्र इस वर्ग को पसंद नही आता है । गाय-गंगा और हिन्दू पूजा प्रतीकों के अपमान में ही इस वर्ग को सहिष्णुता और उदारवादी भारत की प्रगति दिखाई देती है। 
इन कथित बुद्धिजीवियों द्वारा मायाजाल फैलाकर यह स्थापित किये जाने की कोशिश की जा रही है आजादी के बाद पहली बार देश अघोषित व अकल्पित संकट की ओर अग्रसर है। इन्हें जम्मू कश्मीर में सेना-प्रतिकामी हिंसा भयावह हिंसा नजर आती है जबकि अलगाववादियों की हिंसा और देशद्रोही गतिविधियों में इन्हें सहानुभूति नजर आती है । जब अलगावादियों के मंसूबें से सेना थोड़ी सख्ती से निपटने का प्रयास करती है तो इन्हें अल्पसंख्यकवाद की कोरी चिंता सताने लगती है। देश पर हो रहे सांस्कृतिक हमलें में इन्हें विकास की गंध आती है। इन बुद्धिजीवियों को वैयक्तिक अधिकार की चिंता अधिक होती है, सापेक्षित तौर पर इन्हें सांस्कृतिक अवनति की कोई परवाह नहीं है । यह कभी नहीं चाहते कि भारत की आर्थिक सांस्कृति व शैक्षणिक प्रगति, भारतीय परिवेश व मनोवृत्ति के अनुकूल हो। जब कही से इसके लिये प्रयास होता है तो इन्हें देश असहिष्णु नजर आने लगता है और ये पुरस्कार वापसी सरीखी घिनौनी हरकत करने लगते है। वहीं जब राष्ट्रविरोधी शक्तियां हावी होती हैं या सिर उठाने का प्रयास करती हैं। देश में महिलाओं व राष्ट्र पर सांस्कृतिक हमलें होते हैं तो इन लोगों का पता नहीं चलता। देश में जब कोई खास आंतकवादी मारा जाता है तो उसके मातम पर इनके द्वारा मातम मनाया जाता है। जबकि हाल फिलहाल में पाकिस्तानी सेना द्वारा एक पूर्व भारतीय सैनिक को ईरान की सीमा से गिरफ्तार कर उसे जबरन भारतीय खुफियां ऐजेन्सी का एजेन्ट साबित कर प्राकृतिक न्याय की कसौटियों की धज्जियां उड़ाकर वहां की सैन्य अदालत द्वारा फांसी की सजा सुनाई गई तब न इनकी सहिष्णुता प्रभावित होती है और न ही इनके द्वारा पुरस्कार वापसी की महानता ही दिखाई जाती है।
दरअसल मामला यह है कि भारत में पलने-बढ़ने वाले ये विदेशी मानसिकता के लोग हैं जिनका राष्ट्रवाद अराजकतावाद और विदेशी घुसपेठियों के दमन पर ही जागृत होता है। वहीं जब राष्ट्र के हित में आवाज उठाने की बात आती है तो इनका पता नहीं लगता। सच्चाई तो यह है कि ये भले ही हिन्दुस्तान में रहते और जीते हैं, लेकिन इनके मन में राष्ट्र-प्रतिष्ठा के प्रति निष्ठा का घनघोर आभाव है। दुनियां के सामने यह देश ही अल्पसंख्यक विरोधी छवि स्थापित करना चाहते हैं। वहीं उत्तर भारतीयों विशेषकर उत्तरप्रदेश और बिहार के निवासियों के साथ अपने ही देश में कुछ खास राज्यों में दोहरा व्यवहार किया जाता है तो इनका राष्ट्रवाद क्षेत्रवाद का चादर लपेटकर कई कोनें में दुबक जाता है। इनके लिये अल्पसंख्यक का अर्थ मुस्लमान और ईसाई हैं। वहीं जैन, बौद्ध और देश के कुछ खास हिस्सों में जहां हिन्दू अल्पसंख्यक है उन पर होने वाला अत्याचार यह दिखाई नहीं है। इनके खिलाफ देश-विदेश कहीं भी अत्याचार हो इनके कान पर जूं तक नहीं रेंगता। इन्हें ईसाईयत व ईस्लामपोसित राष्ट्रों में होने वाला या किया जाना वाला अत्याचार बिलकुल भी दिखाई नहीं देता। यह इन पर चर्चा करना भी बेईमानी और समय की बर्बादी मानते है। इन्हें तो बस कथित हिन्दू अत्याचार व आतंकवाद ही दिखाई देता है।
देश और राष्ट्र के संबंध में सबकी अपनी अपनी धारणा और विचारधारा हो सकती है। राष्ट्रवादियों के लिये राष्ट्र जमीन का एक टुकड़ा नहीं है जहां कुछ लाख व करोड़ नागरिक निवास करते है और न ही राष्ट्रवादियों के लिये राष्ट्र व देश की परिभाषा आधुनिक और संवैधानिक राष्ट्र-राज्य तक ही सीमित है - जिसके अनुसार एक राष्ट्र या देश वह भौगोलिक ईकाई है जहां निश्चित संख्या या एक या कुछ खास विचारधारा के लोग निवास करते हैं और उनका अपना संविधान तथा सम्प्रभु सरकार होती है। राष्ट्रवादियों के लिये राष्ट्र का अभिप्राय उसके भौतिक या संवैधानिक उपस्थिति मात्र से नहीं है, वरन राष्ट्र इनके लिये जीवन्त ईकाई है जिसे वे माता और स्वयं को पुत्र मानते हैं। इनकी धारणा है कि राष्ट्र भले ही निर्जीव इकाई हो लेकिन उसकी एक जीवन्त अनुभूति होती है जो राष्ट्र और उसके नागरिकों के बीच गहरा तथा अनन्योन्याश्रित संबंध स्थापित करता है। राष्ट्रवादियों के लिये राष्ट्र जननी के सामान है जिसके बारें में कहा गया है कि जननी और जन्मभूमि स्वर्ग से भी बढ़कर हैं। इनके लिये राष्ट्र सांस्कृतिक चिंतन और जुड़ाव है जो अत्यांतिक और अपरिवर्तिनीय है। इनके लिये राष्ट्र और नागरिक का संबंध जन्म जन्मान्तर तक का है । तभी तो आजादी के संघर्ष के दौरान हमारे राष्ट्र नायक स्वाधनीता संघर्ष के दौरान शहादत के बाद फिर से ही जन्म लेने की बात कहकर शहीद हो गये और आजादी मिलने तक बारम्बार जन्म लेने की कामना के साथ शहीद हुए ।
राष्ट्रवादी पत्रकारिता को इसके निमित्त उचित माहौल बनाकर अपनी प्रासंगिता साबित करना होगा। सुखद पक्ष है कि राष्ट्रवादी पत्रकारिता और इसके पुरोधा पूरे प्रण- प्राण से इस कार्य में अपनी महान आहुतियां दे रहे हैं।

मिलते है
20 मई 2017 को राष्ट्रीय परिसंवाद राष्ट्रवाद और मीडिया
भारतीय जनसंचार संस्थान. नई दिल्ली


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