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उदारमना अटल बिहारी वाजपेयी

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भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी के जन्मदिवस 25 दिसंबर पर विशेष
डॉ. सौरभ मालवीय
भारतीय जहां जाता है, वहां लक्ष्मी की साधना में लग जाता है. मगर इस देश में उगते ही ऐसा लगता है कि उसकी प्रतिभा कुंठित हो जाती है. भारत जमीन का टुकड़ा नहीं, जीता-जागता राष्ट्रपुरुष है. हिमालय इसका मस्तक है, गौरीशंकर शिखा है, कश्मीर किरीट है, पंजाब और बंगाल दो विशाल कंधे हैं. दिल्ली इसका दिल है. विन्ध्याचल कटि है, नर्मदा करधनी है. पूर्वी और पश्चिमी घाट दो विशाल जंघाएं हैं. कन्याकुमारी इसके चरण हैं, सागर इसके पग पखारता है. पावस के काले-काले मेघ इसके कुंतल केश हैं. चांद और सूरज इसकी आरती उतारते हैं, मलयानिल चंवर घुलता है. यह वन्दन की भूमि है, अभिनन्दन की भूमि है. यह तर्पण की भूमि है, यह अर्पण की भूमि है. इसका कंकर-कंकर शंकर है, इसका बिंदु-बिंदु गंगाजल है. हम जिएंगे तो इसके लिए, मरेंगे तो इसके लिए. यह कथन कवि हृदय राजनेता अटल बिहारी वाजपेयी का है. वह कहते हैं, अमावस के अभेद्य अंधकार का अंतःकरण पूर्णिमा की उज्ज्वलता का स्मरण कर थर्रा उठता है. निराशा की अमावस की गहन निशा के अंधकार में हम अपना मस्तक आत्म-गौरव के साथ तनिक…

‘भारत की ज्ञान परंपरा’ विषय पर दो दिवसीय राष्ट्रीय संविमर्श का समापन

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पटना। भारतीय परंपरा के अनुसार हमारे चिंतन में कई धाराएँ हैं, लेकिन पश्चिम ने केवल एक ही धारा को समझा और फैलाया। विदेशी ताकतों ने हमेशा से ही हमारी ज्ञान परंपरा को दबाकर रखने की कोशिश की है। हमारे विज्ञान और सेवा भाव को हमेशा नीचा दिखाने की कोशिश की गयी है, जिसके कारण हमने अपनी समृद्ध ज्ञान परंपरा को बहुत हद तक खो दिया है। आज फिर से हमें अपनी ज्ञान परंपरा और सामाजिक व्यवस्था को समझने और अपने तरीके से परिभाषित करने की ज़रूरत है। यह विचार पूर्व केंद्रीय मंत्री संजय पासवान ने ‘भारतीय की ज्ञान परंपरा’ विषय पर आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय संविमर्श में व्यक्त किये। यह कार्यक्रम माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल द्वारा पटना में आयोजित किया गया। विश्वविद्यालय ने अपने रजत जयंती वर्ष के उपलक्ष्य में देश के अलग-अलग राज्यों और शहरों में विमर्शों का आयोजन कर रहा है।
श्री पासवान ने कहा की आज हमें अपनी ज्ञान परंपरा, सामाजिक व्यवस्था और जीवनशैली को बाजारवाद से बचने की ज़रूरत है। हमें पश्चिमी सभ्यताओं और विदेशी ज्ञान-विज्ञान को दरकिनार कर अपनी परम्पराओं और मान्यताओं का …

‘भारत की ज्ञान परंपरा’ विषय पर दो दिवसीय राष्ट्रीय संविमर्श

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पटना। भारत हमेशा से ही ज्ञान आराधक राष्ट्र रहा है। भारत की ज्ञान परंपरा औरों से विशेष इसलिए है क्योंकि यह केवल हमारे बाहर मौजूद लौकिक (मटेरियल) ज्ञान को ही महत्वपूर्ण नहीं मानती बल्कि आत्म-चिंतन द्वारा प्राप्त भीतर के ज्ञान को भी समान महत्व देती है। हमारे ऋषि-मुनियों ने हजारों वर्ष पूर्व इन दोनों ही प्रकार के ज्ञान को कड़ी साधना से अर्जित कर ग्रंथो के रूप में मानव समाज के लिए प्रस्तुत किया। आज चाहे योग की बात हो, विज्ञान की या फिर गणित की, पूरी दुनिया ने भारतीय ज्ञान से कुछ न कुछ लिया है। इस प्रकार हम एक श्रेष्ठ ज्ञान परंपरा के उत्तराधिकारी हैं। यह विचार ‘भारत की ज्ञान परंपरा’ विषय पर आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय संविमर्श में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह सरकार्यवाहक दत्तात्रेय होसबोले व्यक्त किए। अपने रजत जयंती वर्ष के उपलक्ष्य में इस संविमर्श का आयोजन माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल द्वारा पटना में किया है।
श्री होसबोले ने कहा की ज्ञान केवल पुस्तकें पढ़कर सूचनाओं को एकत्र करना नहीं है। बल्कि इन सूचनाओं का मानव हित में उपयोग कर पाने की क्षमता ज्ञान …