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Showing posts from March, 2016

मुझे अपने गांव पर गर्व है

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गांव की चौपाल, जहां बौद्धिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक स्वस्थ विमर्श जीवंत है.
होली के दिन मेरे गांव पटनेजी (जनपद देवरिया, उत्तर प्रदेश) के एक यादव परिवार का बालक जिसकी उम्र 20-21 वर्ष थी, का ब्लड कैंसर से मुम्बई में निधन हो गया. पूरे गांव ने इस दुख को स्वीकार किया और होली नहीं मनाने का निर्णय लिया गया. गांव की इस संवेदना का मैं साक्षी हूं. मुझे गर्व है कि मैं इस गांव का रहने वाला हूं. मेरा गांव मेरा तीर्थ है.

मेरा गांव मेरा तीर्थ

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वृक्ष की छांव तले

गांव पटनेजी
जनपद देवरिया
उत्तर प्रदेश

मेरा गांव मेरा तीर्थ

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सोना उगलते खेत
गांव पटनेजी
जनपद देवरिया
उत्तर प्रदेश

मेरा गांव मेरा तीर्थ

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नदी दर्शन


गांव पटनेजी
जनपद देवरिया
उत्तर प्रदेश

उमंग का पर्व है होली

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डॊ. सौरभ मालवीय
होली हर्षोल्लास, उमंग और रंगों का पर्व है. यह पर्व फाल्गुन मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है. इससे एक दिन पूर्व होलिका जलाई जाती है, जिसे होलिका दहन कहा जाता है. दूसरे दिन रंग खेला जाता है, जिसे धुलेंडी, धुरखेल तथा धूलिवंदन कहा जाता है. लोग एक-दूसरे को रंग, अबीर-गुलाल लगाते हैं. रंग में भरे लोगों की टोलियां नाचती-गाती गांव-शहर में घूमती रहती हैं. ढोल बजाते और होली के गीत गाते लोग मार्ग में आते-जाते लोगों को रंग लगाते हुए होली को हर्षोल्लास से खेलते हैं.  सांध्य काल में लोग एक-दूसरे के घर जाते हैं और मिष्ठान बांटते हैं.

पुरातन धार्मिक पुस्तकों में होली का वर्णन अनेक मिलता है. नारद पुराण औऱ भविष्य पुराण जैसे पुराणों की प्राचीन हस्तलिपियों और ग्रंथों में भी इस पर्व का उल्लेख है. विंध्य क्षेत्र के रामगढ़ स्थान पर स्थित ईसा से तीन सौ वर्ष पुराने एक अभिलेख में भी होली का उल्लेख किया गया है. होली के पर्व को लेकर अनेक कथाएं प्रचलित हैं. सबसे प्रसिद्ध कथा विष्णु भक्त प्रह्लाद की है. माना जाता है कि प्राचीन काल में हिरण्यकशिपु नाम का एक अत्यंत बलशाली असुर था. वह स्वयं को भगवान मा…

भारतीय संस्कृति और पाश्चात्य दृष्टिकोण

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सौरभ मालवीय
अनादिकाल से ही भारत में वैचारिक स्वतंत्रता प्रत्येक मनुष्य को प्राप्त रही है। प्राचीनकाल से ऋषियों, मनीषियों द्वारा समग्र जीवन दांव पर लगाकर भी अप्रतिम जीवन रहस्य खोजे गये। आत्मा ओर परमात्मा के गूढ़तर समबन्ध के इस सत्य शोधकों ने कभी भी अन्तिम सत्य प्राप्त कर लेने का दावा नहीं किया। अपना अन्तिम अनुभव बताने के पश्चात् भी वे ऋषिगण 'नेति-नेति' कहकर अपने आगत पीढ़ियों को पर्याप्त अवसर उपलब्ध कराते थे। ''नेति-(न+इति, यह अन्तिम नहीं है) नेति'' कहने वालों ने यह उद्धोष ही कर दिया था कि ''आत्मा दीपो भव'' (उपनिषद वाक्य) अर्थात् स्वयं का ज्ञानदीप प्रज्जवलित करो। इसी मौलिक विचार सूत्र से अनुप्राणित होकर महात्मा बुध्द ने भी कहा था कि ''किसी सत्य को इसलिए मत मान लो कि किसी बड़ी पुस्तक में लिखा है या इसलिए भी मत मान लो कि किसी अत्यन्त प्रभावशाली व्यक्ति ने कहा है अपितु उस विचार को अपनी प्रज्ञा की कसौटी पर देखा और यदि सत्य लगे तो ही स्वीकार करना। उपर्युक्त श्रुति सूत्र को ही उन्होंने पालि भाषा में ''अप्प दीपो भव'' कहा था। इस प्रका…

संवाद की ज्योति

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इंदौर (मध्य प्रदेश). माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय-भोपाल और इंदौर प्रेस क्लब के संयुक्त तत्वावधान में राष्ट्रीय संविमर्श 'संवाद का स्वराज' का आयोजन इंदौर प्रेस क्लब स्थित सभागार में शुक्रवार, 11 मार्च 2016 को अपरान्ह 03.30 बजे किया गया. माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के कुलाधिसचिव श्री लाजपत आहूजा ने विषय प्रवर्तन किया. इस राष्ट्रीय संविमर्श के मुख्य अतिथि केंद्रीय विश्वविद्यालय, धर्मशाला (हिमाचल प्रदेश) के कुलपति डॉ. कुलदीप चन्द्र अग्निहोत्री थे कार्यक्रम की अध्यक्षता माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. बृज किशोर कुठियाला ने की साथ ही वरिष्ठ पत्रकार श्री शशीन्द्र जलधारी ने काव्यपाठ किया एवं स्वागत तथा आभार प्रदर्शन इंदौर प्रेस क्लब के अध्यक्ष जाने-मानें पत्रकार श्री प्रवीण खारीवाल ने किया. वन्देमातरम गायन खंडवा से आयी सुश्री नेहा द्वारा किया गया और मंच संचालन डॉ. सौरभ मालवीय ने किया.

भारतीय बनाम सांस्कृतिक राष्ट्रवाद

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डॉ. सौरभ मालवीय
भारतीय राजनीति में अनेक विचारधाराएं प्रचलित हैं। इसमें ''सांस्कृतिक राष्ट्रवाद'' प्रमुख है। ऐसी परिस्थितियां बन गईं है कि अब सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की उपेक्षा नहीं हो सकती। यह विचारधारा भारत की मूलचितंन से उपजी है। सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का अर्थ बहुत व्यापक है। सामान्य तौर पर देखा जाए तो राष्ट्रवाद की दुनिया में इसे ठीक से व्याख्यायित नहीं किया गया है। विभिन्न विचारकों के मत में राष्ट्रवाद के सम्बन्ध में जबरदस्त विरोधाभास है। प्रमुख तौर पर दुनियाभर में जिन विचारधाराओं ने अपनी प्रभावी छाप छोड़ी है उनमें से समाजवाद, पूंजीवाद, साम्यवाद उल्लेखनीय है।
पूंजीवाद जहां अमीरों की संख्या बढ़ाता है वहीं दूसरी तरफ गरीबों की संख्या में वृध्दि होती जाती है। यह समाज में खाईं पैदा करता है। वहीं समाजवाद कोई निश्चित विचारधारा नहीं है। ऐसा कहा जाता है कि समाजवाद वैसी टोपी है, जिसको सब पहनना चाहते हैं जिसके फलस्वरूप उसकी शक्ल बिगड़ गई। समाजवाद विचारधारा कहीं सफल नहीं हो सकी। यह समाज में समानता की बात जरूर करता, लेकिन जो परिणाम विभिन्न देशों और अपने देश में देखने को मिले वे बिल्क…

भारत की पहचान है सांस्कृतिक राष्ट्रवाद

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डॉ. सौरभ मालवीय
''सांस्कृतिक राष्ट्रवाद'' प्राचीन अवधारणा है। राष्ट्र वही होगा, जहां संस्कृति होगी। जहां संस्कृति विहीन स्थिति होगी, वहां राष्ट्र की कल्पना भी बेमानी है। भारत में आजादी के बाद शब्दों की विलासिता का जबर्दस्त दौर कुछ तथाकथित बुध्दिजीवियों ने चलाया। इन्होंने देश में तत्कालीन सत्ताधारियों को छल-कपट से अपने घेरे में ले लिया। परिणामस्वरूप राष्ट्रीयता से ओत-प्रोत जीवनशैली का मार्ग निरन्तर अवरूध्द होता गया। अब अवरूध्द मार्ग खुलने लगा है। संस्कृति से उपजा संस्कार बोलने लगा है। सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का आधार हमारी युगों पुरानी संस्कृति है, जो सदियों से चली आ रही है। यह सांस्कृतिक एकता है, जो किसी भी बन्धन से अधिक मजबूत और टिकाऊ है, जो किसी देश में लोगों को एकजुट करने में सक्षम है और जिसमें इस देश को एक राष्ट्र के सूत्र में बांध रखा है। भारत की संस्कृति भारत की धरती की उपज है। उसकी चेतना की देन है। साधना की पूंजी है। उसकी एकता, एकात्मता, विशालता, समन्वय धरती से निकला है। भारत में आसेतु-हिमालय एक संस्कृति है। उससे भारतीय राष्ट्र जीवन प्रेरित हुआ है। अनादिकाल से यहां…

सांस्कृतिक राष्ट्रवाद

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डॉ. सौरभ मालवीय 
सांस्कृतिक राष्ट्रवाद प्राचीन अवधारणा है। राष्ट्र वही होगा, जहां संस्कृति होगी। जहां संस्कृति विहीन स्थिति होगी, वहां राष्ट्र की कल्पना भी बेमानी है। भारत में आजादी के बाद शब्दों की विलासिता का जबर्दस्त दौर कुछ तथाकथित बुद्धिजीवियों ने चलाया। इन्होंने देश में तत्कालीन सत्ताधारियों को छल-कपट से अपने घेरे में ले लिया। परिणामस्वरूप राष्ट्रीयता से ओत-प्रोत जीवनशैली का मार्ग निरन्तर अवरूद्ध होता गया। अब अवरूद्ध मार्ग खुलने लगा है। संस्कृति से उपजा संस्कार बोलने लगा है। सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का आधार हमारी युगों पुरानी संस्कृति है, जो सदियों से चली आ रही है। यह सांस्कृतिक एकता है, जो किसी भी बन्धन से अधिक मजबूत और टिकाऊ है, जो किसी देश में लोगों को एकजुट करने में सक्षम है और जिसमें इस देश को एक राष्ट्र के सूत्र में बांध रखा है। भारत की संस्कृति भारत की धरती की उपज है। उसकी चेतना की देन है। साधना की पूंजी है। उसकी एकता, एकात्मता, विशालता, समन्वय धरती से निकला है। भारत में आसेतु-हिमालय एक संस्कृति है । उससे भारतीय राष्ट्र जीवन प्रेरित हुआ है। अनादिकाल से यहां का समाज अनेक सम्प…

भारतीय समाज और गाय

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डॉ. सौरभ मालवीय
मानवता ने जब भी चेतना को प्राप्त किया तो उसने सर्व शक्ति सम्पन्न को मातृ रूपेण ही देखा है। इसी कारण भारत में ऋषियों ने गऊ माता, गंगा माता, गीता माता, गायत्री माता और धरती माता को समान रूपेण्ा प्रथम पूज्यनीय घोषित किया है। इन पंचमातृकाओं में गाय ही सर्वश्रेष्ठ है और सबकी केन्द्रीय भू-शक्ति है। पौराणिक कथानुसार जब-जब धरती पर विपत्ति आती है तो यह धरणी गाय का भी स्वरूप धारण करती है। परमपिता परमेश्वर के बाद अपनी विपत्ति के निवारण के लिए गाय माता की ही पूजन अर्चन किया जाता है। भारतीय समाज में यह विश्वास है कि गाय देवत्व और प्रकृति की प्रतिनिधि है इसलिये इसकी रक्षा और पूजन कार्य श्रेष्ठ माना जाता है। सर्व शक्तिमान परमात्मा अपने अन्यान्य शक्तियों के साथ इस धरती पर प्रकट होते हैं। परम पूज्यनीय गोस्वामी तुलसी दास जी महाराज लिखते हैं -
”बिप्र धेनु सूर संत हित, लिन्ह मनुज अवतार।
निज इच्छा निर्मित तनु माया गुन गोपार॥
अर्थात ब्राम्हण (प्रबुध्द जन) धेनु (गाय) सूर(देवता) संत (सभ्य लोग) इनके लिए ही परमात्मा अवतरीत होते हैं। वह परमात्मा स्वयं के इच्छा से निर्मित होते हैं और मायातीत, गुण…

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और राष्ट्र

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डॉ. सौरभ मालवीय
राष्ट्र, किसी भूभाग पर रहने वालो का भू भाग, भूसंस्कृति, उसभूमि का प्राकृतिक वैभव, उस भूमि पर रहने वालो के बीच श्रद्धा और प्रेम, उनकी समान परस्परा, समान सुख­दुख, किन्ही अर्थों में भाषिक एकरूपता, दैशिक स्तरपर समान शत्रु मित्र आदि अनेक भावों का समेकित रूप होता है। यह भाव बाहर से सम्प्रेषित नहीं किया जाता अपितु जन्मजात होता है। भारत में यह बोध अनादिकाल से है। अभी वैज्ञानिक युग में भी यह तय नहीं हो पा रहा है कि वेदो की रचना कब हुई और वेदो में राष्ट्रवाद अपने उत्कर्ष पर है। इसी संकल्पना के कारण वैदिक ऋषियों ने घोषणा की है कि
समानो मन्त्रः समितिः समानी
समानं मनः सहचित्तमेषाम्।
समानं मन्त्रमभिमन्त्रये वः
समानेन वो हविषा जुहोमि।।
अर्थात् हम लोगों के मन्त्र (कार्यसूत्र का सिद्धन्त ) एक जैसे हो। उस मन्त्र के अनुरूप हमलोगो की समिति (संगठन), हमारे चित्त, हमारी मानसिक दशा और कार्यप्रणाली भी समान हो। हमलोग समेकित रूप से लक्ष्य प्राप्ति हेतु परमात्मा से एक समान प्रार्थना करें।
इसी क्रम में हमारे ऋषियों ने आगे कहा कि­
समानी वः अकूतीः समाना हृदयानि वः।
समानमस्तु वो मनो यथा वः सुसहासति।।

वसंतोत्सव : प्रेम का पर्व

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डॊ. सौरभ मालवीय
प्राचीन काल से ही भारतीय संस्कृति में ऋतुओं का विशेष महत्व रहा है. इन ऋतुओं ने विभिन्न प्रकार से हमारे जीवन को प्रभावित किया है. ये हमारे जन-जीवन से गहरे से जुड़ी हुई हैं. इनका अपना धार्मिक और पौराणिक महत्व है. वसंत ऋतु का भी अपना ही महत्व है. भारत की संस्कृति प्रेममय रही है. इसका सबसे बड़ा उदाहरण वसंत पंचमी का पावन पर्व है. वसंत पंचमी को वसंतोत्सव और मदनोत्सव भी कहा जाता है. प्राचीन काल में स्त्रियां इस दिन अपने पति की कामदेव के रूप में पूजा करती थीं, क्योंकि इसी दिन कामदेव और रति ने सर्वप्रथम मानव हृदय में प्रेम और आकर्षण का संचार किया था. यही प्रेम और आकर्षण दोनों के अटूट संबंध का आधार बना, संतानोत्पत्ति का माध्यम बना.
वसंत पंचमी का पर्व माघ मास में शुक्ल पक्ष की पंचमी के दिन मनाया जाता है, इसलिए इसे वसंत पंचमी कहा जाता है. इस दिन विद्या की देवी सरस्वती की पूजा-अर्चना की जाती है. भारत सहित कई देशों में यह पर्व हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है. इस दिन घरों में पीले चावल बनाए जाते हैं, पीले फूलों से देवी सरस्वती की पूजा की जाती है. महिलाएं पीले कपड़े पहनती हैं. बच्चे पीली…

भारतीय संस्कृति में नारी कल, आज और कल

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डॉ. सौरभ मालवीय
‘नारी’ इस शब्द में इतनी ऊर्जा है कि इसका उच्चारण ही मन-मस्तक को झंकृत कर देता है, इसके पर्यायी शब्द स्त्री, भामिनी, कान्ता आदि है, इसका पूर्ण स्वरूप मातृत्व में विलसित होता है। नारी, मानव की ही नहीं अपितु मानवता की भी जन्मदात्री है, क्योंकि मानवता के आधार रूप में प्रतिष्ठित सम्पूर्ण गुणों की वही जननी है। जो इस ब्रह्माण्ड को संचालित करने वाला विधाता है, उसकी प्रतिनिधि है नारी। अर्थात समग्र सृष्टि ही नारी है इसके इतर कुछ भी नही है। इस सृष्टि में मनुष्य ने जब बोध पाया और उस अप्रतिम ऊर्जा के प्रति अपना आभार प्रकट करने का प्रयास किया तो वरवश मानव के मुख से निकला कि –
त्वमेव माता च पिता त्वमेव
त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव।
त्वमेव विधा द्रविणं त्वमेव
त्वमेव सर्वं मम देव देव॥
अर्थात हे प्रभु तुम माँ हो ............।
अक्सर यह होता है कि जब इस सांसारिक आवरण मैं फंस जाते या मानव की किसी चेष्टा से आहत हो जाते हैं तो बरबस हमें एक ही व्यक्ति की याद आती है और वह है माँ । अत्यंत दुःख की घड़ी में भी हमारे मुख से जो ध्वनी उच्चरित होती है वह सिर्फ माँ ही होती है। क्योंकि माँ की ध्वनि आत्मा …