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Showing posts from 2013

राष्ट्र की अस्मिता का गीत

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सौरभ मालवीय
जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी अर्थात जननी और जन्मभूमि स्वर्ग से भी बढ़कर है. फिर अपनी मातृभूमि से प्रेम क्यों नहीं ? अपनी मातृभूमि की अस्मिता से संबद्ध प्रतीक चिन्हों से घृणा क्यों? प्रश्न अनेक हैं, परंतु उत्तर कोई नहीं. प्रश्न है राष्ट्रगीत वंदे मातरम का. क्यों कुछ लोग इसका इतना विरोध करते हैं कि वे यह भी भूल जाते हैं कि वे जिस भूमि पर रहते हैं, जिस राष्ट्र में निवास करते हैं, यह उसी राष्ट्र का गीत है, उस राष्ट्र की महिमा का गीत है?

वंदे मातरम को लेकर प्रारंभ से ही विवाद होते रहे हैं, परंतु इसकी लोकप्रियता में दिन-प्रतिदिन वृद्धि होती चली गई.  2003 में बीबीसी वर्ल्ड सर्विस द्वारा आयोजित एक अंतर्राष्ट्रीय सर्वेक्षण के अनुसार वंदे मातरम विश्व का दूसरा सर्वाधिक लोकप्रिय गीत है. इस सर्वेक्षण विश्व के लगभग सात हज़ार गीतों को चुना गया था. बीबीसी के अनुसार 155 देशों और द्वीप के लोगों ने इसमें मतदान किया था.  उल्लेखनीय है कि विगत दिनों कर्नाटक विधानसभा के इतिहास में पहली बार शीतकालीन सत्र की कार्यवाही राष्ट्रगीत वंदे मातरम के साथ शुरू हुई. अधिकारियों के अनुसार कई विधानसभा सदस…

मीडिया सम्मान से सम्मानित होंगे डॉ. सौरभ मालवीय

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आगामी 21 दिसंबर 2013 को उत्तर प्रदेश के देवरिया जिला पंचायत सभागार में नया मीडिया एवं ग्रामीण पत्रकारिता विषयक संगोष्ठी का आयोजन नया मीडिया मंच द्वारा किया जा रहा है. उक्त कार्यक्रम में नया मीडिया के विस्तार एवं ग्रामीण अंचलों में इसकी जरुरत पर तमाम राष्ट्रीय स्तर के पत्रकारों का वक्तव्य होना है. उक्त आयोजन में दिल्ली से वरिष्ठ पत्रकार एवं पूर्वं संपादक श्री शंभूनाथ शुक्ल माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय के इलेक्ट्रोनिक मीडिया विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ श्रीकांत सिंह संपादक श्री पंकज चतुर्वेदी वरिष्ठ स्तंभकार एवं टीवी पत्रकार श्री उमेश चतुर्वेदी सहित संपादक श्री पंकज झा श्री यशवंत सिंह श्रीमती अलका सिंह (रेडियो पत्रकार) श्री संजीव सिन्हा आदि वक्ता उपस्थित रहेंगे. कार्यक्रम में बतौर मुख्य अतिथि जिलाधिकारी देवरिया एवं आईपीएस श्री अमिताभ ठाकुर उपस्थित होंगे. कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रख्यात साहित्यकार आचार्य रामदेव शुक्ल करेंगे. उक्त कार्यक्रम के माध्यम से नया मीडिया एवं ग्रामीण पत्रकारिता की तमाम संभावनाओं को टटोलने का प्रयास किया जाएगा. कार्यक्रम के दौरान ही पत्रकारिता एवं अध्य…

भारतीय संस्कृति

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डॉ. सौरभ मालवीय
संस्कृति का उद्देश्य मानव जीवन को सुन्दर बनाना है। मानव की जीवन पद्धति और धर्माधिष्ठित उस जीवन पद्धति का विकास भी उस संस्कृति शब्द से प्रकट होने वाला अर्थ है। इस अर्थ में राष्ट्र उसकी संतति रूप समाज, उस समाज का धर्म इतिहास एवं परम्परा आदि सभी बातों का आधार संस्कृति है। सम्पर्क सूत्र दृष्टि से देखा जाए तो इस संस्कृति का मूल वेदों में है। भाषा की उच्चता से समृद्ध, विचारों से परिपक्व, मानवीय मूल्यों का संरक्षक, समाज रचना एवं जीवन पद्धति का समुचित मार्गदर्शन कराने वाला यह वैदिक वाङ्मय गुरु शिष्य परम्परा की असाधारण प्रणाली से उसके मूल स्वरूप में आज तक यथावत् चला आ रहा है। ऐतिहासिक रूप में संसार के सभी विद्वान इस बात पर एकमत हैं कि वेद ही इस धरती की प्राचीनतम पुस्तक है और वे वेद जिस संस्कृति के मूल हैं वह संस्कृति भी इस पृथ्वी पर सर्वप्रथम ही उदित हुई। उसका निश्चित काल बताना सम्भव ही नहीं हो रहा है। लाख प्रयत्नों के बावजूद विद्वान इसे ईसा पूर्व 6000 वर्ष के इधर नहीं खींच पा रहे हैं।
भारतीय ऋषियों ने लोकमंगल की कामना से द्रवित होकर मानवीय गुणों को दैवीय उच्चता से विभूषित करने…

आशीष

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माननीय प्रभात झा जी को राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनने पर हार्दिक शुभकामना

सत्याग्रह कर रहे श्याम जी को अपना समर्थन

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श्री श्याम रूद्र पाठक की अदम्य जिजीविषा को नमन। ऐसे ही छोटे- छोटे गाँधी की बदौलत देश में परिवर्तन साकार हो रहा है। सर्वोच्च न्यायलय और उच्च न्यायालयों में अंग्रेजी की अनिवार्यता गुलामी की निशानी है। 161 दिन से श्रीमती सोनिया गाँधी के निवास के सामने दो साथियों के साथ सत्याग्रह कर रहे श्याम जी को अपना समर्थन देने मै कल मित्र संजीव सिन्हा और भारत भूषण के साथ सत्याग्रह स्थल पहुंचा। इस राष्ट्रीय कार्य में सबको भागीदार बनना चाहिए।

मीडिया के साथी

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देश के ये सभी चर्चित चेहरे है जो दिखते भी है और लिखते भी भारतीय जनता पार्टी की कार्यकरणी बैठक गोवा से वापस दिल्ली जाते समय भोपाल स्टेशन पे मेरे सभी अजीज पत्रकार मित्र

भोज

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आज दोपहर का भोजन आर्य भवन भोपाल मे आदरणीय पुष्पेंद्र सिंह जी, पत्रकारिता मे खास मुकाम बनाने वाले भाई संजय द्विवेदी जी.

एक मुलाक़ात

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भारतीय जनता युवा मोर्चा के राष्‍ट्रीय अध्‍यक्ष एवं सांसद श्री अनुराग ठाकुर. उनके साथ (बाएं से) कमल संदेश संपादक मंडल सदस्‍य श्री विकाश आनंद, सहायक संपादक संजीव कुमार सिन्‍हा एवं डॉ. सौरभ मालवीय.

बैठक

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‘प्रवक्ता डॉट कॉम’ के 5 वर्ष पूर्ण होने के उपलक्ष्य में 18 अक्तूबर 2013 को constitution club, नई दिल्ली में एक भव्य कार्यक्रम आयोजित करने के निमित्त आज प्रथम बैठक इंडियन कॉफी हाउस (मोहन सिंह पैलेस, कनौट प्लेस) में सायं 5 बजे से 7 बजे तक सम्पन्न हुई.

भारतीय राजनीति

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श्री चंदूलाल साहू सांसद बीजेपी लोक सभा महासमुंद छत्तीसगद से मिलना हुआ. बड़े ही सरल, शालीन और विद्वान हैं. उनसे कई मुद्दों पर चर्चा हुई. यह बताते हुए हर्ष हो रहा है कि भारतीय राजनीति मे ऐसे जन नेता जनता के बीच काम कर रहे हैं.


विश्‍वविद्यालय परिवार

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माखनलाल चतुर्वेदी राष्‍ट्रीय पत्रकारिता विश्‍वविद्यालय, भोपाल

भारत की राष्ट्रीयता हिन्दुत्व है

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डॉ. सौरभ मालवीय
हिन्दू शब्द का प्रयोग कब प्रारम्भ हुआ यह बताना कठिन है। परन्तु यह सत्य है कि हिन्दू शब्द अत्यंत प्राचीन वैदिक वाङ्मय के ग्रन्थों मे साक्षात् नहीं पाया जाता है। परन्तु यह भी निर्विवाद है कि हिन्दू शब्द का मूल निश्चित रूप से वेदादि प्राचीन ग्रन्थों में विद्यमान है।
भारत में हिन्दू नाम की उपासना पद्धति है ही नही यहां तो कोई वैष्णव है या शैव अथवा शक्य है कबीरपंथी है सिख है आर्यसमाजी है जैन और बौद्ध है। वैष्णवों में भी उपासना के अनेक भेद हैं. अर्थात् जितने व्यक्ति उपासना और आस्था की उतनी ही विधियां हर विधि को समाज से स्वीकारोक्ति प्राप्त है। पश्चिम के राजनीतिज्ञ व समाजशात्री  भारतीय संस्कृति और समाज के इस पक्ष को या तो समझ ही नहीं सके या उन्होने पश्चिमी अवधारणाओं के बने सांचों में ही भारत को ढ़ालने का प्रयास किया।
अनेक सज्जनों द्वारा विभिन्न प्रकार की व्याख्याओं से यह शब्द भी विवादित हो गया है। यद्यपि यह शब्द भारत का ही पर्याय है और यह जीवन पद्धति की ओर इंगित करता है। विख्यात स्तम्भकार पद्म श्री मुजफ्फर हुसैन कहते हैं कि-
‘‘भारतीयता तो भारत की नागरिकता है, भारत की राष्ट्रीय…

संस्कार

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डॉ. सौरभ मालवीय
किसी भी समाज को चिरस्थायी प्रगत और उन्नत बनाने के लिए कोई न कोई व्यवस्था देनी ही पडती है और संसार के किसी भी मानवीय समाज में इस विषय पर भारत से ज्यादा चिंतन नहीं हुआ है। कोई भी समाज तभी महान बनता है जब उसके अवयव श्रेष्ठ हों। उन घटकों को श्रेष्ठ बनाने के लिए यह अत्यावश्यक है कि उनमें दया, करुणा, आर्जव, मार्दव, सरलता, शील, प्रतिभा, न्याय, ज्ञान, परोपकार, सहिष्णुता, प्रीति, रचनाधर्मिता, सहकार, प्रकृति प्रेम, राष्ट्रप्रेम एवं अपने महापुरुषों आदि तत्वों के प्रति अगाध श्रद्धा हो। मनुष्य में इन्हीं सारे सद्गुणों के आधार पर जो समाज बनता है वह चिरस्थायी होता है। यह एक महत्वपूर्ण चिन्तनीय विषय हजारों साल पहले से मानव के सम्मुख था कि आखिर किस विधि से सारे उत्तम गुणों का आह्वान एक-एक व्यक्ति में किया जाए कि यह समाज राष्ट्र और विश्व महान बन सके। भारतीय ऋषियों ने इस पर गहन चिन्तन मनन किया। आयुर्वेद के वन्दनीय पुरुष आचार्य चरक कहते हैं कि-
संस्कारोहि गुणान्तरा धानमुच्चते

अर्थात् यह असर अलग है। मनुष्य के दुर्गुणों को निकाल कर उसमें सद्गुण आरोपित करने की प्रक्रिया का नाम संस्कार है। वा…

ताजमहल भगवान शंकर का प्राचीन मंदिर था

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डॉ. सौरभ मालवीय
अनेक विचारकों ने गहन शोध के उपरान्त इस स्थापत्य को बारहवी शताब्दी के पूर्वार्ध में निर्मित भगवान शंकर का मंदिर मानते है । जिसे बुंदेलखंड के महाराजा पर्माद्रि देव ने बनवाया था। पंद्रहवी शताब्दी में जयपुर के राजा ने राजा पर्माद्रि देव के वंशजो को पराजित कर आगरा को अधिन कर लिया। और यह  विश्वविख्यात “तेजो महालय मन्दिर ‘’ के साथ साथ जयपुर के राजा का अस्थायी आवास भी हो गया, जिसे शाहजहा ने नाम मात्र का मुआवजा देकर कब्जा कर लिया और थोड़ी बहुत तरमीन के साथ उसे मजार बनवा दिया। आज भी मूलरूप से वह स्थापत्य अपनी हिन्दू गरिमा को गा रहा है । विश्व के किसी भी मुस्लिम ढ़ाचे मे मीनार भूमि पर नहीं बनायी जाती है। वह दीवारों के ऊपर ही बनायी जाती है जबकि ताजमहल के चारों कोनों पर बने मीनार मन्दिर के दीप स्तम्भ है । इस्लामी रचनावों मे किसी भी प्रकार की प्रकृतिक वस्तुवों का चित्रण वर्जित है वे वेल –बूटे तथा अल्पना मानते है । जबकि ताजमहल कमल पुष्पों ,कलश, नारियल आदि शुभ प्रतीकों से अलंकृत है । ताजमहल की अष्ठफलकीय संरचना उसके हिन्दू स्थापत्य को सिद्ध कर रही है । दुनिया भर के मजारों मे मुर्दे का …

भारतीय समाज, विविधता, अनेकता एवं एकात्मता

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डॉ. सौरभ मालवीय
भारत का समाज अत्यंत प्रारम्भिक काल से ही अपने अपने स्थान भेद, वातावरण भेद, आशा भेद वस्त्र भेद, भोजन भेद आदि विभिन्न कारणों से बहुलवादी रहा है। यह तो लगभग वैदिक काल में भी ऐसा ही रहा है अथर्ववेद के 12वें मण्डल के प्रथम अध्याय में इस पर बड़ी विस्तृत चर्चा हुई है एक प्रश्न के उत्तर में ऋषि यह घोषणा करते हैं कि
जनं विभ्रति बहुधा, विवाचसम्, नाना धर्माणंम् पृथ्वी यथौकसम्।
सहस्र धारा द्रवीणस्यमेदूहाम, ध्रिवेन धेनुंरनप्रस्फरत्नी।।
अर्थात विभिन्न भाषा, धर्म, मत आदि जनों को परिवार के समान धारण करने वली यह हमारी मातृभूमि कामधेनु के समान धन की हजारों धारायें हमें प्रदान करें।
विभिन्नता का यह स्तर इतना गहरा रहा कि केवल मनुष्य ही नहीं अपितु प्रकृति में इसके प्रवाह में चलती रही तभी तो हमारे यहां यह लोक मान्यता बन गयी कि कोस-कोस पर बदले पानी चार कोस पर वाणी।
यहां वाणी दो अर्थों में प्रयोग होता है। वाणी एक बोली के अर्थ में और पहनावे के अर्थ पानी भी दो अर्थी प्रयोग एक सामाजिक प्रतिष्ठा के अर्थ में दूसरा जल के।
इस विविधता में वैचारिक विविधता तो और भी महत्वपूर्ण है। संसार में पढ़ाये जाने …

कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी

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डॉ. सौरभ मालवीय
भगवान श्री कृष्ण ने अपने आप्तवचन श्रीमद्भगवद् गीता में साधिकार घोषणा की है कि
जातस्य हि ध्रुवो मृत्युध्र्रुवं जन्म मृतस्य च।
तस्मादपरिहार्येऽर्थे न त्वं शोचितुमर्हसि
- गीता 2.27
अर्थात् जन्म लिये हुए का मरना सुनिश्चित है। इसी क्रम में नचिकेता ने भी कठोपनिषद में ऐसा ही कहा यह बातें केवल मनुष्यों पर ही नहीं अपितु राष्ट्रों पर भी समान रूपेण प्रभावी है, राष्ट्रांे के जीवन में भी अवसानाविर्भाव आते रहते है अन्यथा पिछली शताब्दी के इस जगतीतल के श्रेष्ठतम प्रतिभा वालों में से एक प्रो. अर्नाल्डटायनवी ने अपने गहन शोधो उपरांत यह घोषणा की है कि समय-समय पर विश्व का सांस्कृतिक नेतृत्व करने वाली 49 सभ्यतायें कठिन काल के कराल गाल में समा गयी है। कई सभ्यताओं की तो अवशेष भी धराधाम पर शेष नहीं है।

सच तो ये है कि अनेक सभ्यताओं के खण्डहर भी अब केवल विलुप्त जन श्रूतियों के माध्यम से पुस्तकागारों के खण्डहर बने हुए हैं। और कई सभ्यताओं के भगना अवशेषों पर तो कई-कई बार नये-नये भगनाअवशेष बन चुके आज कहां पता है इन्का और एजेटेक सभ्यताओं के उत्स। खालडियन, सुनेरियन समेत अनेक सभ्यताएं जिस भूमि पर पली, …

राष्ट्रवाद को जन-जन तक पहुंचाएं

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जागरण संवाददाता, धनबाद : नेताजी की जयंती एवं दृष्टि 2013 के युवा महोत्सव के अंतर्गत बुधवार को दिल्ली पब्लिक स्कूल के स्वामी विवेकानंद सभागार में परिसंवाद हुआ। इसका विषय स्वामी विवेकानंद और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद था। इसमें बतौर मुख्य वक्ता माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विवि के प्रकाशन पदाधिकारी डा.सौरभ मालवीय उपस्थित हुए। डॉ. मालवीय ने सांस्कृतिक राष्ट्रवाद पर अपने शोध श्रोताओं के समक्ष प्रस्तुत किया। इस दौरान विश्र्वनाथ बागी, कंसारी मंडल, इंद्रजीत सिंह, श्रीकांत मिश्र, शशि तिवारी, पीके भट्टाचार्य, सत्यप्रकाश मानव ने भी इस गंभीर विषय पर अपने-अपने विचार रखे। सभी ने राष्ट्रवाद की भावना जन-जन तक पहुंचाने का संकल्प लिया। कार्यक्रम का सफल बनाने में बृजेश, केशव झा, संतोष झा, रमेश कुमार, रविंद्र, आईएसएम के छात्र और दृष्टि 2013 के अन्य राष्ट्रीय संगठनों का महत्वपूर्ण योगदान रहा। दृष्टि 2013 की ओर से 12 जनवरी से 23 मार्च तक युवा महोत्सव मनाया जा रहा है। यह कार्यक्रम उसी की एक कड़ी है।

सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और मीडिया

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डॉ. सौरभ मालवीय
हिन्दी समाचार पत्रों के आलोक में भारतीय पत्रकारिता विशेषकर हिन्दी समाचार पत्र-पत्रिकाओं में सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की प्रस्तुति को लेकर किये गये अध्ययन में अेनक महत्वपूर्ण तथ्य उभरकर सामने आये हैं। सामान्यतः राष्ट्र, राष्ट्रवाद, संस्कृति और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद जैसे अस्थुल व गुढ़ विषय के बारे में लोगों की अवधारणाएं काफी गड़मड़ है। आधुनिक षिक्षा पद्धति यानि षिक्षा के मौजूदा सरोकार और तौर-तरीके तथा अध्ययन सामाग्री और विधि इसमें दिखाई दे रहे हैं। मीडिया के प्रचलन और इसके विकास के बाद जो आस जागी थी कि यह भारतीय जनमानस में विषयों को भारतीय दृष्टि से एक समग्र दृष्टिकोण (भारतीय दृष्टिकोण) विकसित करने में उपयोगी भूमिका निभायेगी। दुर्भाग्य से जनमाध्यम भी इस संदर्भ में विभ्रम की स्थिति में है। चंूकि इन माध्यमों पर धारा विषेष के लोगों में से अधिकांष की षिक्षा पद्धति और सोच के सरोकार पष्चिमी है या भारतीय होते हुए भी इनकी सोच पर पष्चिम की श्रेष्ठता का आधिपत्य है। ऐसी स्थिति में इनसे वृहद परिवर्तन कामी दृष्टिकोण की दिषा-दषा में आमूल-चूक परिवर्तन की उम्मीद करना ही वेमानी है।
अध्ययन म…

भारतीय समाज और मीडिया

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डॉ. सौरभ मालवीय आज संपूर्ण विश्व विज्ञान की प्रगति और संचार माध्यमों के कारण ऐसे दौर में पहुंच चुका है कि मीडिया अपरिहार्य बन गई है. बड़ी-बड़ी और निरंकुश राज सत्ताएं भी मीडिया के प्रभाव के कारण धूल चाट रही है, वरना किसको अनुमान था कि लीबिया के कर्नल मुहम्मद अल गद्दाफी भी धूल चाट लेंगे. मिस्र, यमन और सूडान में जो जन विद्रोह हुए वह कल्पनातीत ही था. सर्व शक्ति संपन्न अमेरिका के ग्वांतानामो और अबू गरीब जेल में जो अमानुषिक यंत्रणा दी जाती है, वह मीडिया के द्वारा ही तो जाना गया. ऒस्ट्रेलिया के जूलियस असांत्जे की विकीलीक्स में विश्व राजनीतिक संबंधों पर पुर्नविचार के लिए बाध्य हो गया. कुल मिलाकर यह अघोषित सत्य हो गया है कि मीडिया को दरकिनार करके जी पाना अब असंभव है. लोकतांत्रिक देशों में तो मीडिया चतुर्थ स्तंभ के रूप में ही जाने जाता है. इस खबर पालिका को कार्यपालिका, विधायिका, न्यायापालिका के समकक्ष ही रखा जाता है. खबर पालिका के अभाव में वह लोकतंत्र लंगड़ा व तानाशाह भी हो जाता है. बहुत पहले प्रयाग के एक शायर अकबर इलाहाबादी ने खबर पालिका की ताकत को राज सत्ता की तोपों से भी ज्यादा शक्तिशाली मान…